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WBB • कक्षा 8 • Science • अध्याय 6
अनुमानित समय: 55 मिनट
प्रगति: अध्ययनरत

जीवों की संरचना

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 8 विज्ञान पाठ्यक्रम "पर्यावरण एवं विज्ञान" के अंतर्गत छठे अध्याय "जीवों की संरचना" (Structure of Living Organism) के प्रामाणिक एवं विस्तृत अध्ययन सामग्री में आपका स्वागत है। एककोशिकीय अमीबा व जीवाणुओं से लेकर गगनचुंबी विशाल वृक्षों और जटिल मानव शरीर तक—संसार के प्रत्येक सजीव की मूलभूत संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई "कोशिका" (Cell) है। यह संपूर्ण मार्गदर्शिका 5 प्रमुख शैक्षणिक मॉड्यूल में संरचित है: (1) कोशिका की खोज, सूक्ष्मदर्शी एवं आकारिकी विविधता—रॉबर्ट हुक, एंटनी वॉन ल्यूवेनहॉक, श्लाइडेन-श्वान-विरचो का कोशिका सिद्धांत, संयुक्त प्रकाश व इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (TEM/SEM), अभिरंजन विधियां और माप परास; (2) कोशिका सीमाएं एवं जीवद्रव्य गतिकी—कोशिका भित्ति, मध्य पटलिका, प्लाज्मोडेस्मेटा, सिंगर व निकोलसन का फ्लूइड मोज़ेक मॉडल, चयनात्मक पारगम्य झिल्ली, विसरण, परासरण, जीवद्रव्यकुंचन, स्फीति दाब व सॉल-जेल अवस्था परिवर्तन; (3) कोशिकांग एवं श्रम विभाजन—केंद्रक (नियंत्रण केंद्र), माइटोकॉन्ड्रिया (कोशिका का ऊर्जाघर व ATP निर्माण), लवक (हरितलवक, वर्णीलवक, अवर्णीलवक), अंतर्द्रव्यी जालिका तंत्र (RER, SER, गॉल्जी काय, लयनकाय या आत्मघाती थैली), राइबोसोम, तारककाय व रसधानी; (4) तुलनात्मक कोशिका विज्ञान एवं विशेषीकरण—प्रोकैरियोटिक बनाम यूकैरियोटिक कोशिका, पादप बनाम जंतु कोशिका, लाल रक्त कणिकाओं व तंत्रिका कोशिकाओं का संरचनात्मक विशेषीकरण और पृष्ठीय क्षेत्रफल व आयतन अनुपात ($A/V$); तथा (5) ऊतक संगठन एवं शारीरिक पदानुक्रम—जैव अणुओं से संपूर्ण जीव का पदानुक्रम, पादप ऊतक (विभज्योतक तथा सरल व जटिल स्थायी ऊतक: पैरेन्काइमा, कॉलेन्काइमा, स्क्लेरेन्काइमा, जाइलम व फ्लोएम) और जंतु ऊतक (उपकला, संयोजी, पेशी व तंत्रिका ऊतक)। इस अध्याय में 25 शैक्षणिक उपखंड, उत्तरदायी वेक्टर SVG संकल्पना मानचित्र, 8 वैज्ञानिक सिद्धांत कार्ड, 8 मानक पाठ्यपुस्तक उदाहरण, 7 परीक्षक जाल चेतावनियां, 8 मुख्य निष्कर्ष, 5 स्व-मूल्यांकन प्रश्न और 5 सीबीटी डायग्नोस्टिक बहुविकल्पीय प्रश्न शामिल हैं।

🔬 सूक्ष्म जगत का रहस्य: खरबों जीवित ईंटों से कैसे निर्मित हुआ आपका शरीर?

अपने हाथ को ध्यान से देखिए: आपकी त्वचा के नीचे 37 खरब (Trillion) से अधिक स्वतंत्र जीवित कोशिकाओं का एक अद्भुत महानगर बसा है, जिसमें निरंतर रासायनिक कारखाने, परिवहन मार्ग और सूक्ष्म विद्युत केंद्र सक्रिय हैं!

1665 में अंग्रेज वैज्ञानिक रॉबर्ट हुक ने कॉर्क के टुकड़े को अपने स्वनिर्मित सूक्ष्मदर्शी से देखकर मधुमक्खी के छत्ते जैसे कोष्ठकों को पहली बार देखकर आधुनिक जीवविज्ञान की नींव कैसे रखी और उन्हें "कोशिका" (Cell) नाम क्यों दिया?

और प्रकाश की तरंगदैर्घ्य से भी छोटे कोशिकांग कैसे एक साथ मिलकर सूर्य के प्रकाश से भोजन बनाते हैं, पोषक तत्वों को जलाकर सार्वभौमिक ATP ऊर्जा मुद्रा तैयार करते हैं और 100 मीटर प्रति सेकंड की गति से तंत्रिका संकेत भेजते हैं? आइए, कोशिका विज्ञान की इस असाधारण यात्रा पर चलें!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 8 विज्ञान पाठ्यक्रम "पर्यावरण एवं विज्ञान" के अंतर्गत छठे अध्याय "जीवों की संरचना" (Structure of Living Organism) के प्रामाणिक एवं विस्तृत अध्ययन सामग्री में आपका स्वागत है। एककोशिकीय अमीबा व जीवाणुओं से लेकर गगनचुंबी विशाल वृक्षों और जटिल मानव शरीर तक—संसार के प्रत्येक सजीव की मूलभूत संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई "कोशिका" (Cell) है। यह संपूर्ण मार्गदर्शिका 5 प्रमुख शैक्षणिक मॉड्यूल में संरचित है: (1) कोशिका की खोज, सूक्ष्मदर्शी एवं आकारिकी विविधता—रॉबर्ट हुक, एंटनी वॉन ल्यूवेनहॉक, श्लाइडेन-श्वान-विरचो का कोशिका सिद्धांत, संयुक्त प्रकाश व इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (TEM/SEM), अभिरंजन विधियां और माप परास; (2) कोशिका सीमाएं एवं जीवद्रव्य गतिकी—कोशिका भित्ति, मध्य पटलिका, प्लाज्मोडेस्मेटा, सिंगर व निकोलसन का फ्लूइड मोज़ेक मॉडल, चयनात्मक पारगम्य झिल्ली, विसरण, परासरण, जीवद्रव्यकुंचन, स्फीति दाब व सॉल-जेल अवस्था परिवर्तन; (3) कोशिकांग एवं श्रम विभाजन—केंद्रक (नियंत्रण केंद्र), माइटोकॉन्ड्रिया (कोशिका का ऊर्जाघर व ATP निर्माण), लवक (हरितलवक, वर्णीलवक, अवर्णीलवक), अंतर्द्रव्यी जालिका तंत्र (RER, SER, गॉल्जी काय, लयनकाय या आत्मघाती थैली), राइबोसोम, तारककाय व रसधानी; (4) तुलनात्मक कोशिका विज्ञान एवं विशेषीकरण—प्रोकैरियोटिक बनाम यूकैरियोटिक कोशिका, पादप बनाम जंतु कोशिका, लाल रक्त कणिकाओं व तंत्रिका कोशिकाओं का संरचनात्मक विशेषीकरण और पृष्ठीय क्षेत्रफल व आयतन अनुपात ($A/V$); तथा (5) ऊतक संगठन एवं शारीरिक पदानुक्रम—जैव अणुओं से संपूर्ण जीव का पदानुक्रम, पादप ऊतक (विभज्योतक तथा सरल व जटिल स्थायी ऊतक: पैरेन्काइमा, कॉलेन्काइमा, स्क्लेरेन्काइमा, जाइलम व फ्लोएम) और जंतु ऊतक (उपकला, संयोजी, पेशी व तंत्रिका ऊतक)। इस अध्याय में 25 शैक्षणिक उपखंड, उत्तरदायी वेक्टर SVG संकल्पना मानचित्र, 8 वैज्ञानिक सिद्धांत कार्ड, 8 मानक पाठ्यपुस्तक उदाहरण, 7 परीक्षक जाल चेतावनियां, 8 मुख्य निष्कर्ष, 5 स्व-मूल्यांकन प्रश्न और 5 सीबीटी डायग्नोस्टिक बहुविकल्पीय प्रश्न शामिल हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • सजीव व निर्जीव के प्रमुख लक्षण तथा जीवन प्रक्रियाओं की प्राथमिक समझ (कक्षा 6 व 7 विज्ञान)।
  • पदार्थ की भौतिक अवस्थाएं, कणों की गति, विलयन तथा विसरण का मूलभूत ज्ञान।
  • पादप अंगों (जड़, तना, पत्ती) और जंतु तंत्रों (पाचन, परिसंचरण, तंत्रिका तंत्र) का प्राथमिक परिचय।
  • सजीवों में ऊर्जा उत्पादन, पोषण तथा अपशिष्ट निष्कासन की आवश्यकता का सामान्य ज्ञान।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • कोशिका की खोज के ऐतिहासिक क्रम को समझना तथा आधुनिक कोशिका सिद्धांत के तीनों मूल सिद्धांतों का प्रतिपादन करना।
  • संयुक्त प्रकाश सूक्ष्मदर्शी तथा इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की आवर्धन एवं विभेदन क्षमता (Resolving power) की तुलना करना।
  • पादप कोशिका भित्ति की संरचना तथा कोशिका झिल्ली के फ्लूइड मोज़ेक मॉडल का रासायनिक विश्लेषण करना।
  • कोशिका परिवहन प्रक्रियाओं—विसरण, अंतःपरासरण, बहिःपरासरण, जीवद्रव्यकुंचन और स्फीति दाब की गतिकी को स्पष्ट करना।
  • कोशिकांगों (केंद्रक, माइटोकॉन्ड्रिया, लवक, ER, गॉल्जी काय, लयनकाय, राइबोसोम) की परासंरचना और उनके विशिष्ट कार्यों में संबंध स्थापित करना।
  • प्रोकैरियोटिक व यूकैरियोटिक तथा पादप व जंतु कोशिकाओं में विभेद कर पादप एवं जंतु ऊतकों का वैज्ञानिक वर्गीकरण करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. कोशिका की खोज, सूक्ष्मदर्शी एवं...
2 2. कोशिका सीमाएं एवं जीवद्रव्य गतिक...
3 3. कोशिकांग एवं श्रम विभाजन
4 4. तुलनात्मक कोशिका विज्ञान एवं विश...
5 5. ऊतक संगठन एवं शारीरिक पदानुक्रम

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. कोशिका की खोज, सूक्ष्मदर्शी एवं आकारिकी विविधता

1.1 कोशिका की खोज: हुक एवं ल्यूवेनहॉक

प्रत्येक सजीव जीवधारी की मूलभूत संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई को कोशिका (Cell) कहते हैं। लैटिन शब्द Cellula (जिसका अर्थ "छोटा कमरा या कोष्ठक" है) से "Cell" शब्द की उत्पत्ति हुई है। 1665 ईस्वी में अंग्रेज वैज्ञानिक रॉबर्ट हुक (Robert Hooke, 1635–1703) ने सर्वप्रथम कोशिका की खोज की।

  • रॉबर्ट हुक का अवलोकन (1665): बोतल के ढक्कन में प्रयुक्त होने वाले कॉर्क (स्पैनिश ओक वृक्ष, Quercus suber की मृत छाल) की पतली काट को अपने स्वनिर्मित संयुक्त सूक्ष्मदर्शी में देखकर हुक ने पाया कि उसमें मधुमक्खी के छत्ते के समान अनेक छोटे-छोटे खाली कोष्ठक बने हुए हैं। उन्होंने इन कोष्ठकों को "Cell" नाम दिया और अपनी पुस्तक Micrographia में इनके चित्र प्रकाशित किए। वास्तव में हुक द्वारा देखी गई संरचनाएं मृत पादप कोशिकाओं की सेलुलोज निर्मित कोशिका भित्तियां थीं, जिनमें जीवित जीवद्रव्य अनुपस्थित था।
  • एंटनी वॉन ल्यूवेनहॉक (1674): डच सूक्ष्मदर्शी विशेषज्ञ ल्यूवेनहॉक ने उच्च गुणवत्ता वाले एकल लेंस युक्त सरल सूक्ष्मदर्शी (आवर्धन क्षमता 270 से 300 गुना) की सहायता से तालाब के पानी, वर्षा के जल और दांतों की खुरचन में पहली बार जीवित एवं गतिशील मुक्त कोशिकाओं का प्रत्यक्ष अवलोकन किया। उन्होंने इन्हें "Animalcules" (सूक्ष्म जंतुक) कहा, जिन्हें आज हम जीवाणु (Bacteria), प्रोटोजोआ (जैसे पैरामीशियम, वॉर्टिसेला), स्पाइरोगायरा शैवाल, मानव लाल रक्त कणिकाएं और शुक्राणु के रूप में जानते हैं।

1.2 कोशिका सिद्धांत एवं विरचो का सूत्र

उन्नीसवीं शताब्दी में दो जर्मन वैज्ञानिकों के गहन हिस्टोलॉजिकल अनुसंधानों के फलस्वरूप आधुनिक जीवविज्ञान का आधारस्तंभ—कोशिका सिद्धांत (Cell Theory) प्रतिपादित हुआ:

  • मैथियास जैकब श्लाइडेन (1838): जर्मन वनस्पतिशास्त्री श्लाइडेन ने अनेक पादप ऊतकों का अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला कि सभी पौधों का शरीर एक अथवा अनेक कोशिकाओं और उनके उत्पादों से मिलकर बना होता है।
  • थियोडोर श्वान (1839): जर्मन प्राणीशास्त्री श्वान ने विभिन्न जंतु ऊतकों का परीक्षण किया और पाया कि सभी जंतुओं का शरीर भी कोशिकाओं से बना होता है। श्वान ने देखा कि जंतु कोशिकाओं के बाहर एक पतली झिल्ली (कोशिका झिल्ली) होती है, जबकि पादप कोशिकाओं में इसके अतिरिक्त एक विशिष्ट बाहरी भित्ति (कोशिका भित्ति) पाई जाती है। उन्होंने वनस्पति व जंतु विज्ञान को एकीकृत करते हुए सिद्धांत प्रस्तुत किया: "सभी जीवधारी (पौधे व जंतु) कोशिकाओं तथा कोशिकाओं के उत्पादों से निर्मित होते हैं।"
  • रुडोल्फ विरचो (1855): प्रारंभिक कोशिका सिद्धांत यह स्पष्ट करने में असमर्थ था कि नई कोशिकाओं की उत्पत्ति कैसे होती है। जर्मन रोगविज्ञानी रुडोल्फ विरचो ने लैटिन भाषा में अपना सुप्रसिद्ध सूत्र प्रस्तुत किया: $$\mathbf{\text{Omnis cellula e cellula}}$$ जिसका अर्थ है: "सभी नई कोशिकाओं की उत्पत्ति पूर्ववर्ती जीवित कोशिकाओं के विभाजन द्वारा ही होती है।"

आधुनिक कोशिका सिद्धांत के मूल सिद्धांत:

  1. सभी सजीवों का शरीर एक या अधिक कोशिकाओं और उनके उत्पादों से मिलकर बना होता है।
  2. कोशिका जीवन की मूलभूत संरचनात्मक, क्रियात्मक एवं जैविक इकाई है।
  3. सभी नई कोशिकाओं की उत्पत्ति केवल पूर्ववर्ती जीवित कोशिकाओं के विभाजन से होती है।
  4. बहुकोशिकीय जीवों में प्रत्येक कोशिका अपनी स्वतंत्र उपापचयी क्रियाएं करती हुई पूरे शरीर के साथ समन्वय स्थापित करती है।

कोशिका सिद्धांत के अपवाद: विषाणु (Virus), विरोइड्स एवं प्रीयॉन्स का कोई कोशिकीय संगठन नहीं होता (इनमें कोशिकाद्रव्य, कोशिका झिल्ली और उपापचयी तंत्र नहीं होता; ये जीवित कोशिका के बाहर निर्जीव रवेदार अवस्था में रहते हैं)। इसी प्रकार बहुकेंद्रकीय सीनोसाइटिक कवक (जैसे राइजोपस) और शैवाल (जैसे वाउचेरिया) भी सामान्य एककेंद्रकीय कोशिका की परिभाषा के अपवाद हैं।

1.3 सूक्ष्मदर्शी के प्रकार: संयुक्त प्रकाश बनाम इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी

मानव नेत्र की विभेदन सीमा (Resolving limit) लगभग $0.1\text{ मिमी} = 100\ \mu\text{m}$ होती है, इसलिए सूक्ष्म कोशिकाओं और कोशिकांगों को देखने के लिए आवर्धक उपकरणों की आवश्यकता होती है:

विशेषता संयुक्त प्रकाश सूक्ष्मदर्शी ट्रांसमिशन इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (TEM) स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (SEM)
प्रकाश / किरण स्रोत दृश्य प्रकाश किरणें ($\lambda = 400–700\text{ nm}$) उच्च ऊर्जा इलेक्ट्रॉन पुंज ($\lambda \approx 0.005\text{ nm}$) केंद्रित स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन पुंज
लेंस प्रणाली कांच के ऑप्टिकल लेंस (आईपीस, ऑब्जेक्टिव) विद्युत-चुंबकीय लेंस (Electromagnetic lenses) विद्युत-चुंबकीय लेंस व डिफ्लेक्टर कुंडलियां
नमूने की स्थिति जीवित या संरक्षित पतली अभिरंजित काट उच्च निर्वात में अति-पतली मृत काट ($50–100\text{ nm}$) भारी धातु (स्वर्ण/प्लैटिनम) से विलेपित नमूना
अधिकतम आवर्धन 1,000 गुना से 2,000 गुना 5,00,000 गुना से 10,00,000 गुना 1,00,000 गुना से 3,00,000 गुना
विभेदन क्षमता ($d$) लगभग $0.2\ \mu\text{m}$ ($200\text{ nm}$) लगभग $0.1–0.2\text{ nm}$ ($1–2\ \text{Å}$) लगभग $1–2\text{ nm}$
प्रतिबिंब का स्वरूप आईपीस से सीधा रंगीन द्विविमीय दृश्य फ्लोरोसेंट पर्दे पर आंतरिक परासंरचना (2D) कंप्यूटर स्क्रीन पर सतह का त्रिविमीय दृश्य (3D)

आवर्धन बनाम विभेदन क्षमता: आवर्धन (Magnification) का अर्थ है वस्तु के मूल आकार की तुलना में प्रतिबिंब को कितना बड़ा दिखाया गया है ($M_{\text{कुल}} = M_{\text{आईपिस}} \times M_{\text{ऑब्जेक्टिव}}$)। जबकि विभेदन क्षमता (Resolving Power) दो अत्यंत निकटवर्ती बिंदुओं को अलग-अलग स्पष्ट रूप से देखने की क्षमता है। इलेक्ट्रॉन पुंज की तरंगदैर्घ्य प्रकाश की तुलना में अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता हजारों गुना अधिक होती है।

1.4 नमूना निर्माण एवं अभिरंजन विधियां (Staining Protocols)

जीवित कोशिका का जीवद्रव्य पूर्णतः पारदर्शी, रंगहीन और जल के समान अपवर्तनांक वाला होता है, जिससे सामान्य प्रकाश में उसके आंतरिक अंग दिखाई नहीं देते। विशिष्ट घटकों को रंगने के लिए रासायनिक रंजकों (Stains) का प्रयोग किया जाता है:

  • मिथाइलीन ब्लू (Methylene Blue): क्षारीय रंजक, जो कोशिका के अम्लीय घटकों विशेषकर केंद्रक एवं क्रोमैटिन जालिका को गहरे नीले रंग में अभिरंजित करता है (मानव गाल की उपकला कोशिकाओं के अध्ययन में प्रयुक्त)।
  • सैफ्रेनिन (Safranin): क्षारीय लाल रंजक, जो पादप कोशिकाओं की लिग्निनयुक्त कोशिका भित्ति और केंद्रक को चमकीला लाल/गुलाबी रंग प्रदान करता है (प्याज की झिल्ली के अवलोकन में प्रयुक्त)।
  • एसिटोकार्मिन (Acetocarmine): कोशिका विभाजन के समय क्रोमोसोम और क्रोमैटिन तंतुओं को गहरा लाल रंग देता है।
  • आयोडीन विलयन (Lugol's Iodine): पादप लवकों में संचित मंड (Starch) के साथ क्रिया करके उसे गहरा नीला-काला रंग प्रदान करता है।
  • ग्लिसरीन की भूमिका (Mounting Medium): अस्थायी स्लाइड बनाते समय नमूने को नम रखने, सूखने से बचाने और कांच के कवरस्लिप के अपवर्तनांक से मेल खाकर प्रकाश के प्रकीर्णन को कम करने के लिए ग्लिसरीन लगाई जाती है।

1.5 कोशिकाओं के परिमाप एवं आकृति की विविधता

सजीव जगत में कोशिकाओं के आकार और आकृति में अद्भुत विविधता पाई जाती है, जो उनके विशिष्ट कार्यों के पूर्णतः अनुकूल होती है:

  • आकार (Size) की विविधता:
    • लघुतम कोशिका: माइकोप्लाज्मा गैलीसेप्टिकम (Mycoplasma gallisepticum / PPLO), जिसका व्यास मात्र $0.1\ \mu\text{m} = 100\text{ nm}$ होता है।
    • सामान्य जीवाणु: लंबाई लगभग $1\ \mu\text{m} \text{ से } 5\ \mu\text{m}$।
    • मानव लाल रक्त कणिका (RBC): व्यास लगभग $7.0–7.5\ \mu\text{m}$।
    • मानव अंडाणु (Ovum): व्यास लगभग $100–120\ \mu\text{m}$ ($0.1\text{ मिमी}$), जो नग्न आंखों से भी देखा जा सकता है।
    • दीर्घतम जंतु कोशिका: तंत्रिका कोशिका (Neuron), जिसका एक्सॉन मनुष्य में $1\text{ मीटर}$ से भी अधिक लंबा हो सकता है।
    • विशालतम एकल कोशिका: शुतुरमुर्ग का अंडा, जिसका माप लगभग $17\text{ सेमी} \times 13\text{ सेमी}$ और भार लगभग $1.5\text{ किग्रा}$ होता है।
    • विशालतम एककोशिकीय शैवाल: एसिटाबुलैरिया (Acetabularia), जिसकी लंबाई $10\text{ सेमी}$ तक हो सकती है।
  • आकृति (Shape) और कार्यों का संबंध:
    • द्वि-अवतल गोल RBC: मध्य में पतली गोल तश्तरीनुमा आकृति सतही क्षेत्रफल बढ़ाती है जिससे तेजी से $O_2$ विसरण होता है और संकरी केशिकाओं से आसानी से मुड़कर निकल सकती है।
    • शाखित लंबी तंत्रिका कोशिका: शरीर के दूरस्थ अंगों से मस्तिष्क तक तीव्र गति से विद्युत-रासायनिक आवेगों का संवहन करने में सक्षम।
    • तर्कुरूपी चिकनी पेशी कोशिका: दोनों सिरों पर नुकीली आकृति संकुचन एवं शिथिलन द्वारा आंतरिक अंगों की गति कराती है।
    • अनियमित श्वेत रक्त कणिका (WBC) व अमीबा: पादाभ (Pseudopodia) बनाकर रक्त वाहिकाओं से बाहर निकलना (डायपेडेसिस) और रोगाणुओं का भक्षण (फैगोसाइटोसिस) करना।
    • वृक्काकार द्वार कोशिकाएं (Guard Cells): रंध्रों के खुलने और बंद होने का नियमन कर वाष्पोत्सर्जन व गैस विनिमय को नियंत्रित करती हैं।
    • नलिकाकार जाइलम वाहिकाएं: लंबी खोखली वाहिकाएं जड़ से पत्तियों तक जल के निरंतर ऊर्ध्वगामी संवहन में सहायक हैं।

2. कोशिका सीमाएं एवं जीवद्रव्य गतिकी

2.1 पादप कोशिका भित्ति: रासायनिक संघटन एवं परासंरचना

पादप कोशिकाओं, कवकों, जीवाणुओं और शैवालों की कोशिका झिल्ली के बाहर स्थित दृढ़, निर्जीव, प्रत्यास्थ और पूर्णतः पारगम्य सुरक्षात्मक आवरण को कोशिका भित्ति (Cell Wall) कहते हैं। जंतु कोशिकाओं में कोशिका भित्ति पूर्णतः अनुपस्थित होती है।

  • रासायनिक संघटन:
    • पादप: मुख्य रूप से सेलुलोज (Cellulose) के सूक्ष्मतंतुओं से निर्मित होती है, जो हेमीसेलुलोज व पेक्टिन के मैट्रिक्स में अंतःस्थापित रहते हैं। परिपक्व कोशिकाओं में लिग्निन (कठोरता व जलरोधी हेतु), सुबेरिन (कॉर्क में) और क्यूटिन संचित होते हैं।
    • कवक: मुख्य रूप से काइटिन (Chitin) द्वारा निर्मित।
    • जीवाणु: पेप्टिडोग्लाइकन / म्यूरिन (Peptidoglycan) द्वारा निर्मित।
  • कोशिका भित्ति के प्रमुख स्तर:
    1. मध्य पटलिका (Middle Lamella): दो निकटवर्ती कोशिकाओं को आपस में जोड़ने वाली सीमेंटिंग परत। यह चिपचिपे कैल्शियम व मैग्नीशियम पेक्टेट ("पादप सीमेंट") से बनी होती है। फल पकने पर पेक्टिनेज एंजाइम इसे घोल देता है जिससे फल मुलायम हो जाता है।
    2. प्राथमिक भित्ति (Primary Wall): मध्य पटलिका के दोनों ओर बनने वाली पहली भित्ति। यह पतली, लचीली तथा सेलुलोज व पेक्टिन से बनी होती है, जो वृद्धि करती हुई कोशिका में फैल सकती है।
    3. द्वितीयक भित्ति (Secondary Wall): परिपक्व कोशिकाओं (जैसे जाइलम वाहिकाओं) में प्राथमिक भित्ति के भीतर घने लिग्निन युक्त दृढ़ स्तर के रूप में निक्षेपित होती है।
  • प्लाज्मोडेस्मेटा (Plasmodesmata): पास-पास स्थित दो पादप कोशिकाओं की भित्ति के गर्तों (Pits) से होकर गुजरने वाले सूक्ष्म जीवद्रव्यी तंतु, जो संलग्न कोशिकाओं के बीच सूचना व पोषक पदार्थों के संवहन का सेतु बनाते हैं।

2.2 कोशिका झिल्ली एवं फ्लूइड मोज़ेक मॉडल

प्रत्येक सजीव कोशिका के जीवद्रव्य को घेरे रहने वाली अति-सूक्ष्म ($7.5–10\text{ nm}$), सजीव, लचीली एवं चयनात्मक पारगम्य द्विपरतीय झिल्ली को कोशिका झिल्ली या प्लाज्मा झिल्ली (Plasma Membrane) कहते हैं। 1972 ईस्वी में एस. जे. सिंगर तथा जी. एल. निकोलसन ने इसका सर्वमान्य "फ्लूइड मोज़ेक मॉडल" (Fluid Mosaic Model) प्रस्तुत किया:

  • फॉस्फोलिपिड द्विपरत: झिल्ली का मूल ढांचा फॉस्फोलिपिड अणुओं की एक दोहरी परत होती है। प्रत्येक फॉस्फोलिपिड अणु के दो भाग होते हैं:
    • एक जलस्नेही (Hydrophilic) ध्रुवीय फॉस्फेट "शीर्ष", जो बाह्य व आंतरिक जलीय माध्यम की ओर उन्मुख रहता है।
    • दो जलविरोधी (Hydrophobic) अध्रुवीय फैटी एसिड "पुच्छ", जो द्विपरत के भीतरी भाग में जल से सुरक्षित आमने-सामने स्थित होती हैं।
  • झिल्ली की तरलता (Fluidity): फॉस्फोलिपिड्स की असंतृप्त वसीय अम्लों की पूंछों के कारण कमरे के ताप पर यह परत एक गाढ़े तेल की भांति तरल व्यवहार करती है, जिससे प्रोटीन अणु इसमें पार्श्व गति कर सकते हैं।
  • प्रोटीन की मोज़ेक व्यवस्था: सिंगर व निकोलसन का प्रसिद्ध कथन है—"फॉस्फोलिपिड के तरल समुद्र में तैरते हुए प्रोटीन रूपी हिमखंड" (Protein icebergs floating in a sea of lipids)। प्रोटीन दो प्रकार के होते हैं:
    • समाकल (आंतरिक) प्रोटीन (Integral Proteins): लिपिड परत में गहराई तक धंसे हुए या आर-पार फैले हुए (ट्रांसमेम्ब्रेन चैनल व वाहक प्रोटीन)।
    • परिधीय (बाह्य) प्रोटीन (Peripheral Proteins): लिपिड सतह पर ढीले रूप से जुड़े होते हैं, जिन्हें आसानी से अलग किया जा सकता है।
  • ग्लाइकोकैलिक्स: लिपिड या प्रोटीन से जुड़ी छोटी कार्बोहाइड्रेट श्रृंखलाएं (ग्लाइकोलिपिड व ग्लाइकोप्रोटीन), जो कोशिका की पहचान व रिसेप्टर का कार्य करती हैं।

2.3 झिल्ली परिवहन: विसरण, परासरण एवं जीवद्रव्यकुंचन

कोशिका झिल्ली चयनात्मक पारगम्य (Selectively Permeable) होती है—यह जल तथा विलायक अणुओं को तो आसानी से आने-जाने देती है, किंतु विलेय अणुओं के आवागमन का कठोरता से नियमन करती है।

  • 1. सरल विसरण (Simple Diffusion): किसी बाह्य ऊर्जा या वाहक के बिना अणुओं या आयनों का अपनी गतिज ऊर्जा द्वारा उच्च सांद्रता वाले क्षेत्र से निम्न सांद्रता वाले क्षेत्र की ओर स्वतः संचलन। श्वसन गैसें ($O_2, CO_2$) सीधे लिपिड परत से विसरित होती हैं।
  • 2. परासरण (Osmosis): अर्धपारगम्य / चयनात्मक पारगम्य झिल्ली द्वारा पृथक दो घोलों के बीच विलायक (जल) के अणुओं का उच्च जल विभव (तनु घोल) से निम्न जल विभव (सांद्र घोल) की ओर स्वतः प्रवाह परासरण कहलाता है।
    • अल्पपरासारी विलयन (Hypotonic Solution): बाह्य विलयन की सांद्रता कोशिकाद्रव्य की तुलना में कम होती है $\implies$ अंतःपरासरण (Endosmosis) द्वारा जल कोशिका में प्रवेश करता है। जंतु कोशिका फूलकर फट जाती है (Lysis); पादप कोशिका फूलकर तनी हुई (Turgid) हो जाती है।
    • अतिपरासारी विलयन (Hypertonic Solution): बाह्य विलयन की सांद्रता कोशिकाद्रव्य की तुलना में अधिक होती है $\implies$ बहिःपरासरण (Exosmosis) द्वारा जल कोशिका से बाहर निकल जाता है। जंतु कोशिका सिकुड़ जाती है; पादप कोशिका में जीवद्रव्यकुंचन होता है।
    • समपरासारी विलयन (Isotonic Solution): बाह्य विलयन व कोशिकाद्रव्य की सांद्रता समान होती है $\implies$ जल का कोई शुद्ध विनिमय नहीं होता।
  • जीवद्रव्यकुंचन (Plasmolysis) एवं विकुंचन (Deplasmolysis): जब किसी जीवित पादप कोशिका (जैसे प्याज की झिल्ली) को अतिपरासारी नमक या शर्करा के घोल में रखा जाता है, तो बहिःपरासरण द्वारा रसधानी से जल बाहर निकल जाता है। इससे जीवद्रव्य सिकुड़कर कोशिका भित्ति से अलग होकर एक कोने में सिमट जाता है। इसे जीवद्रव्यकुंचन कहते हैं। जब इस कुंचित कोशिका को पुनः शुद्ध जल (अल्पपरासारी माध्यम) में रखा जाता है, तो अंतःपरासरण द्वारा जल पुनः प्रवेश करता है और कोशिका अपनी पूर्व स्थिति प्राप्त कर लेती है, जिसे जीवद्रव्य विकुंचन कहते हैं।
  • स्फीति दाब ($TP$) बनाम भित्ति दाब ($WP$): अंतःपरासरण से जल प्रवेश के कारण फूला हुआ जीवद्रव्य कोशिका भित्ति पर जो बाहर की ओर दाब डालता है, उसे स्फीति दाब (Turgor Pressure) कहते हैं। इसके प्रत्युत्तर में दृढ़ कोशिका भित्ति जीवद्रव्य पर अंदर की ओर बराबर विपरीत दाब डालती है जिसे भित्ति दाब (Wall Pressure) कहते हैं। पूर्ण स्फीति पर $TP = WP$ होता है, जिससे शाकीय तने सीधे खड़े रहते हैं और रंध्र खुलते हैं।

2.4 सक्रिय परिवहन एवं वृहद पदार्थों का संवहन (Bulk Transport)

  • सक्रिय परिवहन (Active Transport): सांद्रता प्रवणता के विपरीत (कम सांद्रता से उच्च सांद्रता की ओर) विशिष्ट वाहक प्रोटीनों (पंपों) की सहायता से और ATP ऊर्जा के प्रत्यक्ष उपभोग द्वारा पदार्थों का संवहन। उदाहरण: $Na^+/K^+$ पंप (प्रति ATP पर 3 $Na^+$ बाहर व 2 $K^+$ भीतर)।
  • थैलीनुमा वृहद परिवहन (Endocytosis & Exocytosis):
    • एंडोसाइटोसिस (Endocytosis): कोशिका झिल्ली द्वारा पुटिका बनाकर बाह्य पदार्थों को भीतर ग्रहण करना:
      • फैगोसाइटोसिस ("कोशिका भक्षण"): पादाभों द्वारा ठोस भोजन या जीवाणुओं को निगलना (जैसे अमीबा तथा मानव रक्त के न्यूट्रोफिल व मैक्रोफेज)।
      • पिनोसाइटोसिस ("कोशिका पान"): तरल बूंदों को सूक्ष्म पुटिकाओं द्वारा ग्रहण करना।
    • एक्सोसाइटोसिस (Exocytosis): गॉल्जी काय की स्रावी पुटिकाओं का कोशिका झिल्ली से मिलकर एंजाइम, हार्मोन, श्लेष्मा अथवा अपशिष्टों को कोशिका से बाहर त्यागने की क्रिया।

2.5 जीवद्रव्य एवं कोशिकाद्रव्य की भौतिक प्रकृति (सॉल-जेल गतिकी)

1839 ईस्वी में चेक शरीरक्रियाविज्ञानी जे. ई. पुरकिंजे (Jan Evangelista Purkinje) ने कोशिका के समस्त सजीव पदार्थ के लिए जीवद्रव्य (Protoplasm) शब्द दिया। ब्रिटिश वैज्ञानिक टी. एच. हक्सले (1868) ने जीवद्रव्य को "जीवन का भौतिक आधार" (Physical Basis of Life) घोषित किया क्योंकि जीवन की सभी उपापचयी क्रियाएं इसी माध्यम में संपन्न होती हैं।

$$\mathbf{\text{जीवद्रव्य} = \text{कोशिकाद्रव्य} + \text{केंद्रक}}$$
  • कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm): कोशिका झिल्ली और केंद्रक कला के मध्य स्थित अर्ध-पारदर्शी, चिपचिपा, जेलीनुमा सजीव आधार पदार्थ। इसके तीन मुख्य भाग होते हैं:
    • साइटोसोल (तरल भाग): जिसमें 75-85% जल, घुलित खनिज लवण, शर्करा, अमीनो अम्ल और एंजाइम होते हैं।
    • कोशिकांग: सजीव उपापचयी अंग (माइटोकॉन्ड्रिया, लवक, गॉल्जी काय आदि)।
    • अजीव द्रव्य (अंतर्विष्टियां): संचित खाद्य (मंड, वसा), स्रावी पदार्थ और उत्सर्जी रवे।
  • कोशिकाद्रव्य की कोलॉइडी प्रकृति (सॉल-जेल अवस्था परिवर्तन): कोशिकाद्रव्य कोई साधारण घोल नहीं है बल्कि एक जटिल पॉलीफेजिक कोलॉइडी निकाय है। यह तरल "सॉल" (Sol) अवस्था तथा अर्ध-ठोस जेलीनुमा "जेल" (Gel) अवस्था के बीच उत्क्रमणीय रूप से बदलता रहता है। इसी परिवर्तन के कारण अमीबा में पादाभीय गति तथा जलीय पौधों (जैसे हाइड्रिला या वैलिसनेरिया) में कोशिकाद्रव्यी भ्रमण (Cyclosis / घूर्णन गति) होती है, जिससे पोषक तत्वों का समान वितरण होता है।

3. कोशिकांग एवं श्रम विभाजन

3.1 केंद्रक: कोशिका का मस्तिष्क एवं नियंत्रण केंद्र

1831 ईस्वी में स्कॉटिश वनस्पतिशास्त्री रॉबर्ट ब्राउन (Robert Brown) ने ऑर्किड की जड़ों में केंद्रक (Nucleus) की खोज की। यह यूकैरियोटिक कोशिका का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण अंगक है, जो कोशिका की समस्त उपापचयी, आनुवंशिक व विकासात्मक गतिविधियों का संचालन करता है, इसलिए इसे "कोशिका का मस्तिष्क / नियंत्रण केंद्र" कहा जाता है।

प्ररूपी केंद्रक की संरचना:

  1. केंद्रक कला (Nuclear Membrane): लाइपोप्रोटीन की दोहरी झिल्ली। बाहरी झिल्ली खुरदरी अंतर्द्रव्यी जालिका से जुड़ी होती है और उस पर राइबोसोम होते हैं। झिल्ली में हजारों सूक्ष्म केंद्रक रंध्र (Nuclear Pores) होते हैं, जो केंद्रक व कोशिकाद्रव्य के बीच RNA और प्रोटीनों के आवागमन का नियमन करते हैं।
  2. केंद्रकद्रव्य (Nucleoplasm): केंद्रक झिल्ली से घिरा स्वच्छ, अर्ध-तरल जेलीनुमा मैट्रिक्स, जिसमें एंजाइम, न्यूक्लियोटाइड्स और खनिज आयन पाए जाते हैं।
  3. क्रोमैटिन जालिका (Chromatin Network): केंद्रकद्रव्य में बिखरे महीन धागेनुमा तंतु। यह मूलतः DNA (लगभग 35%) और क्षारीय हिस्टोन प्रोटीन (लगभग 60%) के संघनन से न्यूक्लियोसोम के रूप में बना होता है। कोशिका विभाजन के समय यह संघनित होकर स्पष्ट छड़नुमा गुणसूत्रों (Chromosomes) में बदल जाता है, जिन पर आनुवंशिकी की इकाइयां जीन (Genes) स्थित होती हैं।
    • यूक्रोमैटिन: हल्का अभिरंजित, ढीला बंधा हुआ, आनुवंशिक रूप से सक्रिय भाग।
    • हेटरोक्रोमैटिन: गहरा अभिरंजित, सघन, आनुवंशिक रूप से निष्क्रिय भाग।
  4. केंद्रिका (Nucleolus): 1781 में फोंटाना द्वारा खोजी गई केंद्रकद्रव्य में स्थित सघन, गोल, झिल्लीरहित रचना। यह ribosomal RNA (rRNA) का संश्लेषण करती है, अतः इसे "राइबोसोम निर्माण की फैक्ट्री" कहा जाता है।

3.2 माइटोकॉन्ड्रिया: कोशिका का ऊर्जाघर एवं ATP निर्माण

1857 में कोलिकर द्वारा खोजे गए और 1898 में कार्ल बेंडा द्वारा माइटोकॉन्ड्रिया (Mitochondria) नाम दिए गए इस अंगक को "कोशिका का ऊर्जाघर" (Powerhouse of the Cell) कहा जाता है, क्योंकि यहां वायवीय श्वसन द्वारा भोजन का ऑक्सीकरण होकर सार्वभौमिक ऊर्जा मुद्रा ATP (एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट) का निर्माण होता है।

माइटोकॉन्ड्रिया की परासंरचना:

  • दोहरी झिल्ली का आवरण:
    • बाहरी झिल्ली: चिकनी और पोरिन प्रोटीन के कारण सुगमता से पारगम्य होती है।
    • आंतरिक झिल्ली: चयनात्मक पारगम्य होती है और भीतर की ओर अंगुलीनुमा अनेक वलनों के रूप में मुड़ी रहती है, जिन्हें क्रिस्टी (Cristae) कहते हैं। क्रिस्टी श्वसन एंजाइमों और इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र के लिए पृष्ठीय क्षेत्रफल को अत्यधिक बढ़ा देती है।
    • अंतरा-झिल्ली अवकाश: दोनों झिल्लियों के बीच का स्थान जहां इलेक्ट्रॉन परिवहन के दौरान प्रोटॉन ($H^+$) एकत्र होकर सांद्रता प्रवणता बनाते हैं।
  • ऑक्सीसोम ($F_0-F_1$ कण): क्रिस्टी की आंतरिक सतह पर धंसे हुए हजारों सूक्ष्म घुंडीदार कण। इनमें एक आधार ($F_0$) और गोल शीर्ष ($F_1$) होता है, जो ATP सिंथेज (ATP Synthase) एंजाइम के रूप में कार्य कर ADP और अकार्बनिक फॉस्फेट ($P_i$) को जोड़कर ATP बनाते हैं: $$\text{ADP} + \text{P}_i + \text{ऊर्जा} \xrightarrow{\text{ATP Synthase}} \text{ATP}$$
  • मैट्रिक्स (धাত্র): आंतरिक गुहा में भरा सघन तरल, जिसमें क्रेब्स चक्र (Krebs Cycle) के सभी एंजाइम, अपना स्वयं का गोलाकार द्विरज्जुकी DNA और 70S राइबोसोम पाए जाते हैं।
  • अर्ध-स्वायत्त अंगक (Semi-autonomous Organelle): स्वयं का DNA व राइबोसोम होने के कारण माइटोकॉन्ड्रिया अपने कुछ आवश्यक प्रोटीनों का संश्लेषण स्वयं कर सकता है और द्विविखंडन द्वारा विभाजित हो सकता है।

3.3 लवक (प्लास्टिड): पादपों की खाद्य फैक्ट्री एवं वर्णक भंडार

1866 में अर्नस्ट हेकेल द्वारा खोजे गए लवक (Plastids) पादप कोशिकाओं तथा प्रकाश-संश्लेषी प्रोटिस्टों (जैसे युग्लीना) में पाए जाने वाले दोहरी झिल्ली युक्त बड़े अंगक हैं। ये जंतुओं और कवकों में नहीं पाए जाते।

वर्णकों के आधार पर शिम्पर (1883) ने इन्हें तीन श्रेणियों में बांटा:

लवक का प्रकार उपस्थित वर्णक रंग एवं प्राप्ति स्थान प्रमुख कार्य
अवर्णीलवक (Leucoplast) वर्णकहीन (रंगहीन) प्रकाश रहित अंग: जड़ें, भूमिगत तने (आलू), बीज पोषक पदार्थों का संचय:
• एमाइलोप्लास्ट: मंड (Starch) का संचय (आलू)
• इलायोप्लास्ट: वसा व तेल का संचय (अरंडी)
• एल्यूरोप्लास्ट: प्रोटीन का संचय (मक्का)
वर्णीलवक (Chromoplast) कैरोटीनॉइड्स (कैरोटीन: नारंगी, जैंथोफिल: पीला), लाइकोपीन (लाल) फूलों की पंखुड़ियां, पके फल (टमाटर, मिर्च), गाजर चमकीले रंग प्रदान कर परागण हेतु कीटों और बीज प्रकीर्णन हेतु जंतुओं को आकर्षित करना
हरितलवक (Chloroplast) क्लोरोफिल a, क्लोरोफिल b, कैरोटीनॉइड्स पत्तियों का मेसोफिल ऊतक, कोमल हरे तने प्रकाश-संश्लेषण: सौर ऊर्जा को अवशोषित कर जल व $CO_2$ से शर्करा (ग्लूकोज) बनाना — "कोशिका का रसोईघर"

हरितलवक की परासंरचना: दोहरी झिल्ली से घिरे हरितलवक में दो मुख्य भाग होते हैं:
1. ग्रेना (Grana): सिक्कों के चट्टे जैसी थैलियों का समूह, जिन्हें थायलाकोइड्स कहते हैं। थायलाकोइड झिल्ली में क्लोरोफिल अणु होते हैं। ग्रेना में प्रकाश-संश्लेषण की प्रकाशिक अभिक्रिया (Light Reaction) होती है।
2. स्ट्रोमा (Stroma): ग्रेना के चारों ओर भरा रंगहीन पारदर्शी तरल, जिसमें वृत्ताकार DNA, 70S राइबोसोम और RuBisCO एंजाइम होते हैं। स्ट्रोमा में प्रकाश-संश्लेषण की अप्रकाशिक अभिक्रिया (Dark Reaction) होती है। हरितलवक भी अर्ध-स्वायत्त अंगक है।

3.4 अंतर्द्रव्यी जालिका तंत्र: ER, गॉल्जी काय एवं लयनकाय

कोशिका के वे झिल्लीयुक्त अंगक जो संयुक्त रूप से प्रोटीन व वसा के निर्माण, रूपांतरण, संवेष्टन और पाचन का कार्य करते हैं, अंतर्द्रव्यी झिल्ली तंत्र कहलाते हैं:

  • अंतर्द्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum - ER): 1945 में कीथ पोर्टर द्वारा खोजी गई नलिकाओं, सिस्टर्नी और पुटिकाओं का जाल:
    • खुरदरी ER (RER): बाहरी सतह पर 80S राइबोसोम चिपके होते हैं। मुख्य कार्य: स्रावी प्रोटीनों का संश्लेषण व परिवहन। अग्न्याशय की कोशिकाओं में प्रचुरता।
    • चिकनी ER (SER): सतह पर राइबोसोम नहीं होते; नलिकाकार होती है। मुख्य कार्य: लिपिड, फॉस्फोलिपिड एवं स्टेरॉयड हार्मोन का संश्लेषण। यकृत में हानिकारक औषधियों व विषों का विषहरण (Detoxification) करती है तथा पेशियों में $\text{Ca}^{2+}$ आयनों का संचय करती है।
  • गॉल्जी उपकरण / गॉल्जी काय (Golgi Apparatus): 1898 में इतालवी वैज्ञानिक कैमिलो गॉल्जी (Camillo Golgi) ने उल्लू की तंत्रिका कोशिकाओं में खोजा।
    • संरचना: 4 से 8 समानांतर मुड़ी हुई चपटी थैलियों (सिस्टर्नी), पुटिकाओं और रसधानियों से बना। इसके दो सिरे होते हैं: निर्माणकारी उत्तल Cis-सिरा (ER की ओर) और परिपक्व अवतल Trans-सिरा (झिल्ली की ओर)। पादप कोशिकाओं में बिखरे असंबद्ध गॉल्जी काय को डिक्टियोसोम (Dictyosome) कहते हैं।
    • कार्य: "कोशिका का ट्रैफिक पुलिस / पोस्ट ऑफिस": ER से आए प्रोटीनों व वसाओं में कार्बोहाइड्रेट जोड़कर ग्लाइकोप्रोटीन व ग्लाइकोलिपिड बनाना, उनका संवेष्टन (पैकेजिंग) कर स्रावी पुटिकाओं में भरकर गंतव्य तक भेजना। इसके अतिरिक्त यह प्राथमिक लयनकाय, शुक्राणु का एक्रोसोम तथा पादप कोशिका विभाजन में कोशिका पट्टिका (Cell plate) का निर्माण करता है।
  • लयनकाय (Lysosome): 1955 में क्रिश्चियन डी डुवे (Christian de Duve) ने खोजा। गॉल्जी काय से बनी एकल झिल्लीयुक्त थैली, जिसमें लगभग 50 प्रकार के अम्लीय जल-अपघटकीय पाचक एंजाइम (प्रोटिएज, लाइपेज, न्यूक्लिएज) भरे होते हैं ($pH \approx 4.5–5.0$)।
    • अंतःकोशिकीय पाचन: फैगोसाइटोसिस द्वारा निगले गए भोजन या बाहरी रोगाणु जीवाणुओं को पचाकर नष्ट करना।
    • स्वभक्षण (Autophagy): भुखमरी के समय कोशिका के पुराने व निष्क्रिय अंगों को पचाकर पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण करना।
    • स्व-लयन एवं "आत्मघाती थैली" (Suicide Bags): कोशिका के गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त या मृतप्राय होने पर लयनकाय की झिल्ली फट जाती है और मुक्त एंजाइम पूरी कोशिका को ही पचाकर नष्ट कर देते हैं। मेंढक के टैडपोल के कायांतरण में पूंछ का विलोपन भी लयनकाय द्वारा होता है।

3.5 राइबोसोम, तारककाय, रसधानी एवं परऑक्सीसोम

  • राइबोसोम (Ribosome): 1955 में जॉर्ज पैलाडे द्वारा खोजा गया। कोशिकाद्रव्य में मुक्त अथवा RER पर स्थित झिल्लीरहित राइबोन्यूक्लियोप्रोटीन कण। इन्हें "कोशिका की प्रोटीन फैक्ट्री" (Protein Factory of the Cell) कहते हैं।
    • 70S राइबोसोम: प्रोकैरियोट्स तथा माइटोकॉन्ड्रिया व लवकों के मैट्रिक्स में पाया जाता है। दो उप-इकाइयां: 50S और 30S ($S = \text{स्वेडबर्ग इकाई}$, अवसादन गुणांक)।
    • 80S राइबोसोम: यूकैरियोटिक कोशिकाद्रव्य और RER पर पाया जाता है। दो उप-इकाइयां: 60S और 40S।
  • तारककाय एवं तारककेंद्र (Centrosome & Centrioles): 1888 में बोवेरी द्वारा वर्णित जंतु कोशिका के केंद्रक के समीप स्थित झिल्लीरहित अंगक (उच्च पादपों में अनुपस्थित)। यह परस्पर समकोण ($90^\circ$) पर स्थित दो बेलनाकार तारककेंद्रों (Centrioles) से बना होता है, जिनका अनुप्रस्थ काट $9+0$ कार्टव्हील प्रारूप दर्शाता है। जंतु कोशिका विभाजन में यह तुर्क तंतु (Spindle fibers) और एस्टर किरणें बनाता है तथा सिलिया व फ्लैजिला का आधार काय बनाता है।
  • रसधानी (Vacuole): कोशिकाद्रव्य में स्थित तरल से भरी अजीव गुहा, जो टोनोप्लास्ट (Tonoplast) नामक चयनात्मक पारगम्य एकल झिल्ली से घिरी होती है।
    • पादप रसधानी: परिपक्व पादप कोशिका में 70-90% आयतन घेरने वाली विशाल केंद्रीय रसधानी होती है, जो केंद्रक को परिधि की ओर धकेल देती है। इसमें कोशिका रस (Cell Sap)—जल, खनिज, शर्करा और एंथोसायनिन वर्णक होते हैं। यह कोशिका का स्फीति दाब व दृढ़ता बनाए रखती है।
    • जंतु रसधानी: अत्यंत छोटी व अस्थाई होती है (जैसे अमीबा की संकुचनशील रसधानी व खाद्य रसधानी)।
  • परऑक्सीसोम (Peroxisome): एकल झिल्लीयुक्त सूक्ष्मकाय जिसमें कैटालेज एंजाइम होता है। यह उपापचय में उत्पन्न अत्यंत विषैले हाइड्रोजन परऑक्साइड को जल और ऑक्सीजन में अपघटित कर निराविषीकृत करता है: $$2\text{H}_2\text{O}_2 \xrightarrow{\text{Catalase}} 2\text{H}_2\text{O} + \text{O}_2$$

4. तुलनात्मक कोशिका विज्ञान एवं विशेषीकरण

4.1 प्रोकैरियोटिक कोशिका बनाम यूकैरियोटिक कोशिका

केंद्रक के संगठन के आधार पर पृथ्वी के समस्त सजीवों को दो मूलभूत श्रेणियों में विभाजित किया गया है: प्रोकैरियोट्स (असीमकेंद्रकी) तथा यूकैरियोट्स (ससीमकेंद्रकी)।

तुलना का आधार प्रोकैरियोटिक कोशिका (आदिम कोशिका) यूकैरियोटिक कोशिका (सुविकसित कोशिका)
1. केंद्रक संगठन अविकसित; केंद्रक झिल्ली व केंद्रिका अनुपस्थित। नग्न DNA युक्त क्षेत्र केंद्रकाभ (Nucleoid) कहलाता है। सुविकसित; दोहरी केंद्रक झिल्ली, केंद्रकद्रव्य, केंद्रिका व क्रोमैटिन युक्त स्पष्ट केंद्रक।
2. आनुवंशिक पदार्थ (DNA) एकल, वृत्ताकार द्विरज्जुकी नग्न DNA; हिस्टोन प्रोटीन अनुपस्थित। प्रायः अतिरिक्त प्लाज्मिड DNA उपस्थित। अनेक रेखीय द्विरज्जुकी DNA क्षारीय हिस्टोन प्रोटीनों के साथ मिलकर क्रोमोसोम बनाते हैं।
3. झिल्लीयुक्त कोशिकांग पूर्णतः अनुपस्थित (माइटोकॉन्ड्रिया, लवक, ER, गॉल्जी काय, लयनकाय नहीं होते)। सुस्पष्ट रूप से उपस्थित (माइटोकॉन्ड्रिया, लवक, ER, गॉल्जी काय आदि द्वारा प्रकोष्ठीकरण)।
4. राइबोसोम छोटे 70S प्रकार के (उप-इकाइयां: 50S + 30S) कोशिकाद्रव्य में मुक्त। कोशिकाद्रव्य व RER पर बड़े 80S (60S + 40S); माइटोकॉन्ड्रिया व लवक में 70S।
5. श्वसन स्थल कोशिका झिल्ली के अंतर्वलन मीसोसोम (Mesosome) पर श्वसन एंजाइम होते हैं। वायवीय श्वसन का क्रेब्स चक्र व ATP निर्माण माइटोकॉन्ड्रिया में संपन्न होता है।
6. कोशिका भित्ति अ-सेलुलोजिक; मुख्य रूप से पेप्टिडोग्लाइकन (म्यूरिन) से निर्मित। पौधों में सेलुलोज, कवकों में काइटिन; जंतुओं में अनुपस्थित।
7. कोशिका विभाजन प्रत्यक्ष विभाजन या असूत्री (द्विविखंडन); कोई तुर्क तंतु नहीं बनते। समसूत्री (Mitosis) या अर्धसूत्री (Meiosis) विभाजन; तुर्क तंतु बनते हैं।
8. उदाहरण जीवाणु (ई. कोलाई), नील-हरित शैवाल (सायनोबैक्टीरिया: नॉस्टॉक), माइकोप्लाज्मा। पादप कोशिकाएं, जंतु कोशिकाएं, कवक (यीस्ट), प्रोटोजोआ (अमीबा, पैरामीशियम)।

4.2 पादप कोशिका बनाम जंतु कोशिका

दोनों यूकैरियोटिक होते हुए भी पौधों के स्थिर स्वपोषी स्वभाव और जंतुओं के गतिशील परपोषी स्वभाव के कारण उनकी कोशिकीय संरचना में विशिष्ट अंतर पाए जाते हैं:

विशेषता पादप कोशिका (Plant Cell) जंतु कोशिका (Animal Cell)
1. कोशिका भित्ति कोशिका झिल्ली के बाहर सेलुलोज की कठोर व मोटी कोशिका भित्ति उपस्थित। कोशिका भित्ति पूर्णतः अनुपस्थित; केवल लचीली कोशिका झिल्ली होती है।
2. लवक (Plastids) उपस्थित (हरितलवक, वर्णीलवक व अवर्णीलवक पाए जाते हैं)। पूर्णतः अनुपस्थित।
3. तारककाय व तारककेंद्र उच्च पादपों में अनुपस्थित (बिना एस्टर किरणों के एनास्ट्रल तुर्क बनता है)। केंद्रक के समीप तारककेंद्र उपस्थित (एम्फियास्ट्रल तुर्क बनता है)।
4. रसधानी (Vacuole) केंद्र में एक विशाल स्थायी रसधानी (70-90% स्थान घेरती है)। रसधानी अनुपस्थित या अत्यंत छोटी व अस्थायी होती हैं।
5. संचित खाद्य पदार्थ मुख्य रूप से मंड (Starch) और पादप तेल। मुख्य रूप से ग्लाइकोजन ("जंतु स्टार्च") और वसा।
6. कोशिकाद्रव्य विभाजन केंद्र से बाहर की ओर कोशिका पट्टिका (Cell Plate) निर्माण द्वारा। परिधि से केंद्र की ओर झिल्ली में खांच (Furrowing) बनने द्वारा।
7. आकार व स्थिति निश्चित बहुभुजाकार/आयताकार; विशाल रसधानी के कारण केंद्रक परिधि पर होता है। लचीला गोल या अनियमित; केंद्रक प्रायः केंद्र में स्थित होता है।

4.3 बहुकोशिकीय जीवों में कोशिका विशेषीकरण एवं श्रम विभाजन

एककोशिकीय जीवों में एक ही कोशिका सारे जीवन कार्य करती है। किंतु जटिल बहुकोशिकीय जीवों में विभिन्न कार्यों को अत्यंत कुशलता से संपादित करने के लिए कोशिकाओं का संरचनात्मक रूपांतरण होता है जिसे श्रम विभाजन (Division of Labor) कहते हैं:

  • परिपक्व मानव लाल रक्त कणिका (RBC): अस्थिमज्जा में परिपक्वता के समय केंद्रक, माइटोकॉन्ड्रिया व ER का त्याग कर देती है।
    • लाभ 1: समस्त आंतरिक स्थान लगभग 28 करोड़ हीमोग्लोबिन अणुओं से भर जाता है, जिससे $O_2$ वहन क्षमता अधिकतम होती है।
    • लाभ 2: माइटोकॉन्ड्रिया न होने से RBC स्वयं उस ऑक्सीजन का उपभोग नहीं करती (अवायवीय ग्लाइकोलिसिस से ऊर्जा बनाती है)।
    • लाभ 3: द्वि-अवतल तश्तरीनुमा रूप सतही क्षेत्रफल बढ़ाता है और संकरी रक्त केशिकाओं ($4\ \mu\text{m}$) से आसानी से मुड़कर निकल सकती है।
  • तंत्रिका कोशिका (Neuron): लंबे एक्सॉन व शाखित डेंड्राइट्स के कारण 100 मीटर/सेकंड की गति से विद्युत-रासायनिक आवेगों का संचरण करती है।
  • पेशी कोशिकाएं (Muscle Cells): संकुचनशील एक्टिन व मायोसिन प्रोटीन तंतुओं से भरी होने के कारण संकुचन-शिथिलन द्वारा गति उत्पन्न करती हैं।
  • मूलरोम कोशिकाएं (Root Hair Cells): जड़ की सतह पर पतले प्रवर्ध बनाकर मृदा जल के संपर्क का क्षेत्रफल सैकड़ों गुना बढ़ा देती हैं।
  • जाइलम वाहिकाएं: कोशिकाएं मृत होकर निरंतर खोखली नलिकाएं बनाती हैं जो गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध जल को सैकड़ों फीट ऊपर पहुंचाती हैं।

4.4 कोशिका परिमाप की ज्यामितीय सीमा: क्षेत्रफल व आयतन अनुपात ($A/V$)

कोशिकाएं असीमित रूप से बड़ी क्यों नहीं हो सकतीं? अधिकांश कोशिकाएं सूक्ष्मदर्शीय क्यों होती हैं? इसका मूल भौतिक कारण है पृष्ठीय क्षेत्रफल व आयतन का अनुपात ($A/V$ Ratio):

त्रिज्या $r$ वाली एक गोलाकार कोशिका के लिए:

$$\text{क्षेत्रफल } (A) = 4\pi r^2 \quad \text{तथा} \quad \text{आयतन } (V) = \frac{4}{3}\pi r^3$$ $$\frac{A}{V} = \frac{4\pi r^2}{\frac{4}{3}\pi r^3} = \mathbf{\frac{3}{r}}$$
  • यदि कोशिका की त्रिज्या $n$ गुना बढ़ जाए:
    • कोशिका झिल्ली का सतही क्षेत्रफल (आदान-प्रदान का द्वार) वर्ग के अनुपात में बढ़ता है: $n^2$।
    • कोशिकाद्रव्य का आयतन (उपापचयी मांग व अपशिष्ट उत्पादन) घन के अनुपात में बढ़ता है: $n^3$।
  • परिणाम: बड़ी कोशिका में $A/V$ अनुपात बहुत कम हो जाता है। अतः झिल्ली द्वारा भीतर के विशाल आयतन को विसरण द्वारा पर्याप्त ऑक्सीजन व पोषक तत्व नहीं मिल पाते और अपशिष्ट विषैला स्तर छू लेते हैं।
  • केंद्रक-कोशिकाद्रव्य सूचकांक: एक केंद्रक सीमित कोशिकाद्रव्य को ही नियंत्रित कर सकता है। अतः संतुलन बनाए रखने के लिए कोशिका समसूत्री विभाजन द्वारा दो छोटी कोशिकाओं में बंट जाती है।

4.5 कोशिका विभाजन की मूलभूत विधियां: असूत्री, समसूत्री एवं अर्धसूत्री

कोशिका विभाजन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मातृ कोशिका विभाजित होकर नई संतति कोशिकाएं बनाती है, जिससे जीवों की वृद्धि, मरम्मत और जनन संभव होता है:

  1. असूत्री विभाजन (Amitosis): केंद्रक बिना गुणसूत्र या तुर्क तंतु बनाए सीधे डंबल के आकार में संकुचित होकर दो भागों में बंट जाता है। जीवाणुओं, यीस्ट व अमीबा के द्विखंडन में पाया जाता है।
  2. समसूत्री विभाजन (Mitosis): कायिक कोशिकाओं में होने वाला विभाजन, जिसमें एक द्विगुणित ($2n$) मातृ कोशिका से समान गुणसूत्रों वाली दो द्विगुणित ($2n$) संतति कोशिकाएं बनती हैं।
    • प्रोफेज: क्रोमैटिन संघनित होकर गुणसूत्र बनते हैं; केंद्रक कला व केंद्रिका विलुप्त होती हैं; तुर्क तंतु बनते हैं।
    • मेटाफेज: गुणसूत्र मध्य रेखा (इक्वेटर) पर व्यवस्थित होते हैं; सेंट्रोमियर से तुर्क तंतु जुड़ते हैं।
    • एनाफेज: सेंट्रोमियर विभाजित होकर संतति गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों की ओर खिंचते हैं (V, L, J, I रूप)।
    • टीलोफेज: गुणसूत्र ध्रुवों पर पहुंचकर पुनः क्रोमैटिन बनाते हैं; केंद्रक कला व केंद्रिका पुनः बन जाती हैं। इसके बाद कोशिकाद्रव्य विभाजन (Cytokinesis) होता है।
  3. अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis): जनन कोशिकाओं (युग्मक निर्माण) में होने वाला न्यूनकारी विभाजन, जिसमें गुणसूत्रों की संख्या आधी ($n$) रह जाती है और चार अगुणित कोशिकाएं बनती हैं। क्रॉसिंग ओवर द्वारा आनुवंशिक विविधता उत्पन्न होती है।

5. ऊतक संगठन एवं शारीरिक पदानुक्रम

5.1 जैविक पदानुक्रम: जैव अणुओं से संपूर्ण जीवधारी तक

सजीवों में सरलतम स्तर से प्रारंभ होकर उत्तरोत्तर जटिल स्तरों का निर्माण होता है:

उप-परमाण्विक कण $\to$ परमाणु $\to$ जैव अणु (DNA, प्रोटीन) $\to$ कोशिकांग $\to$ कोशिका $\to$ ऊतक $\to$ अंग $\to$ अंग तंत्र $\to$ संपूर्ण सजीव प्राणी

ऊतक की परिभाषा (Tissue): समान उत्पत्ति, संरचना और किसी विशिष्ट कार्य को करने वाली कोशिकाओं के समूह को ऊतक (Tissue) कहते हैं। ऊतकों की सूक्ष्म संरचना के वैज्ञानिक अध्ययन को औतिकी या हिस्टोलॉजी (Histology) कहते हैं।

5.2 पादप ऊतक: विभज्योतक (Meristematic Tissues)

विभाजन क्षमता के आधार पर पादप ऊतकों को दो वर्गों में बांटा जाता है: विभज्योतक तथा स्थायी ऊतक।

विभज्योतक (Meristematic Tissue): अपरिपक्व, निरंतर विभाजित होने में सक्षम सजीव कोशिकाओं का समूह।
लक्षण: कोशिकाएं छोटी, पतली सेलुलोज भित्ति युक्त, सघन जीवद्रव्य व बड़े केंद्रक युक्त होती हैं; अंतराकोशिकीय स्थान नहीं होते; रसधानियां अनुपस्थित या अत्यंत छोटी होती हैं; उपापचय दर अति उच्च होती है।

स्थिति के आधार पर वर्गीकरण:

  • शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical Meristem): जड़ और तने के वृद्धि करते शीर्षों पर स्थित। कार्य: प्राथमिक वृद्धि द्वारा पौधे की लंबाई या ऊंचाई बढ़ाना।
  • अंतर्वेशी विभज्योतक (Intercalary Meristem): एकबीजपत्री पौधों (घास, बांस, गन्ना) के पर्व व पर्वसंधियों के आधार पर स्थित। कार्य: पर्वों की लंबाई तेजी से बढ़ाना और शाकाहारी जंतुओं द्वारा खाए जाने पर पुनर्वृद्धि करना।
  • पार्श्वीय विभज्योतक (Lateral Meristem): तने व जड़ के पार्श्व में अनुदैर्घ्य रूप से स्थित (जैसे संवहन कैम्बियम व कॉर्क कैम्बियम)। कार्य: द्वितीयक वृद्धि द्वारा पौधे के तने की मोटाई / घेरा (Girth / Diameter) बढ़ाना।

5.3 पादप ऊतक: स्थायी ऊतक (सरल एवं जटिल)

स्थायी ऊतक (Permanent Tissue): विभज्योतक से उत्पन्न वे कोशिकाएं जिनकी विभाजन क्षमता समाप्त हो चुकी है और जिन्होंने विशिष्ट कार्य हेतु निश्चित आकार व स्वरूप प्राप्त कर लिया है।

क. सरल स्थायी ऊतक (Simple Permanent Tissues): केवल एक ही प्रकार की कोशिकाओं से बने ऊतक:

सरल ऊतक संरचनात्मक लक्षण प्राप्ति स्थान प्रमुख कार्य
मृदूतक (Parenchyma) जीवित, पतली सेलुलोज भित्ति, सुस्पष्ट रसधानी, स्पष्ट अंतराकोशिकीय अवकाश। पौधे के कोमल भाग: कॉर्टेक्स, मज्जा, पत्तियों का मेसोफिल। भोजन व जल संचय; क्लोरोफिल युक्त होने पर भोजन निर्माण (क्लोरेन्काइमा); जलीय पौधों में हवा भरकर तैरने में सहायता (एरेन्काइमा)।
स्थूलकोण ऊतक (Collenchyma) जीवित, लंबी कोशिकाएं; कोनों पर पेक्टिन व हेमीसेलुलोज का असमान स्थूलन; अंतराकोशिकीय अवकाश अनुपस्थित। द्विबीजपत्री तने की अधस्त्वचा (Hypodermis), पर्णवृंत, पुष्पवृंत। लचीली यांत्रिक शक्ति प्रदान करना जिससे हवा के तेज झोंकों में पत्तियां व कोमल तने बिना टूटे आसानी से मुड़ जाते हैं।
दृढ़ोतक (Sclerenchyma) परिपक्व अवस्था में मृत; अत्यधिक मोटी व लिग्निनयुक्त द्वितीयक भित्ति; संकरा अवकाश (Lumen); जीवद्रव्य विहीन। संवहन बंडल के चारों ओर, बीजावरण, अखरोट के छिलके, नारियल का जटा छिलका। अत्यंत कठोर यांत्रिक सहारा व सुरक्षा देना। रूप: लंबे रेशे (Fibers) जैसे पटसन/जूट तथा दृढ़ कोशिकाएं (Sclereids) जो नाशपाती को किरकिरापन देती हैं।

ख. जटिल स्थायी ऊतक (संवहन ऊतक - Vascular Tissues): एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं का समूह जो मिलकर जल, खनिज व भोजन का संवहन करता है:

  • जाइलम (Xylem / दारू): जड़ों द्वारा अवशोषित जल और खनिज लवणों का पत्तियों की ओर ऊर्ध्वगामी संवहन (Ascent of Sap) करता है। यह एकदिशीय संवहनी ऊतक है। इसके 4 घटक हैं:
    1. वाहिनिकाएं (Tracheids): मृत, लंबी नलिकाकार कोशिकाएं जिनके सिरे नुकीले होते हैं; गर्तयुक्त लिग्निन भित्ति।
    2. वाहिकाएं (Vessels): मृत, खोखली चौड़ी नलिकाएं जो एक के ऊपर एक जुड़कर निरंतर जल नली बनाती हैं; आवृतबीजियों का मुख्य जल संवाहक।
    3. जाइलम मृदूतक (Xylem Parenchyma): जाइलम का एकमात्र जीवित घटक; भोजन संचय व पार्श्व संवहन करता है।
    4. जाइलम रेशे (Xylem Fibers): मृत लिग्निनयुक्त रेशे जो यांत्रिक दृढ़ता देते हैं।
  • फ्लोएम (Phloem / बास्ट): पत्तियों में बने कार्बनिक भोजन (सुक्रोज) का संचय अंगों व वृद्धि क्षेत्रों में द्विदिशीय / बहुदिशीय संवहन करता है। इसके 4 घटक हैं:
    1. चालनी नलिकाएं (Sieve Tubes): जीवित लंबी नलिकाएं जिनकी अंत भित्तियां चालनी प्लेट के समान छिद्रित होती हैं। परिपक्व होने पर इनमें केंद्रक नहीं होता, किंतु ये सहकोशिकाओं के नियंत्रण में जीवित रहती हैं।
    2. सहकोशिकाएं (Companion Cells): सघन जीवद्रव्य व बड़े केंद्रक वाली सजीव कोशिकाएं जो चालनी नलिका के कार्यों का नियमन करती हैं।
    3. फ्लोएम मृदूतक: सजीव कोशिकाएं जो भोजन, रेजिन व लेटेक्स का संचय करती हैं।
    4. फ्लोएम रेशे (Bast Fibers): फ्लोएम का एकमात्र मृत घटक; अत्यधिक मजबूत रेशे (व्यावसायिक जूट व सन के रेशे)।

5.4 जंतु ऊतक: उपकला ऊतक एवं संयोजी ऊतक

जंतु ऊतकों को 4 मूल श्रेणियों में विभाजित किया गया है: उपकला, संयोजी, पेशी एवं तंत्रिका ऊतक।

  • 1. उपकला ऊतक (Epithelial Tissue): जो शरीर की बाहरी सतह को ढकता है तथा आंतरिक खोखले अंगों व देहगुहाओं की आंतरिक परत बनाता है।
    • लक्षण: कोशिकाएं एक निर्जीव कोलेजन निर्मित आधार कला (Basement Membrane) पर सघनता से स्थित होती हैं; अंतराकोशिकीय मैट्रिक्स नगण्य होता है; रक्त वाहिका विहीन (Avascular) होता है।
    • प्रकार:
      • शल्की (Squamous): फर्श की टाइलों जैसी चपटी कोशिकाएं। फेफड़ों की कूपिकाओं और रक्त केशिकाओं की भित्ति में विसरण हेतु पाई जाती हैं।
      • घनाकार (Cuboidal): घन जैसी कोशिकाएं। वृक्क नलिकाओं व लार ग्रंथियों में स्रावण व अवशोषण हेतु पाई जाती हैं।
      • स्तंभाकार (Columnar): खंभे जैसी लंबी कोशिकाएं। आमाशय व आंत के श्लेष्मल स्तर पर पोषक अवशोषण हेतु पाई जाती हैं।
      • पक्ष्माभी (Ciliated): सतह पर बाल जैसी पक्ष्माभ (Cilia) होती हैं। श्वासनली व अंडवाहिनी में श्लेष्मा या अंडाणु को निश्चित दिशा में गति कराती हैं।
  • 2. संयोजी ऊतक (Connective Tissue): भ्रूणीय मीसोडर्म से उत्पन्न और शरीर के विभिन्न अंगों को परस्पर जोड़ने, आलंबन व सुरक्षा देने वाला ऊतक। इसमें कोशिकाओं की संख्या कम और प्रचुर मात्रा में निर्जीव बाह्यकोशिकीय मैट्रिक्स व प्रोटीन रेशे (कोलेजन व इलास्टिन) होते हैं।
    • वास्तविक संयोजी ऊतक: अंतरालीय ऊतक (Areolar) (अंगों को अपने स्थान पर बांधता है) और वसीय ऊतक (Adipose) (त्वचा के नीचे वसा संचय कर ऊष्मारोधी व आघात-शोषक का कार्य करता है)। इसके अतिरिक्त कंडरा / टेंडन (पेशी को अस्थि से जोड़ता है) और स्नायु / लिगामेंट (अस्थि को अस्थि से जोड़ता है)।
    • कंकाल ऊतक (Skeletal Tissue):
      • अस्थि (Bone): कठोर, दृढ़, संवहनी ऊतक। इसका मैट्रिक्स ओसीन प्रोटीन व कैल्शियम फॉस्फेट युक्त कठोर हैवरसियन तंत्र बनाता है जिसमें जीवित अस्थि कोशिकाएं (ऑस्टियोसाइट्स) होती हैं।
      • उपास्थि (Cartilage): लचीला, प्रत्यास्थ व रक्तवाहिका विहीन ऊतक। इसके कॉन्ड्रिन मैट्रिक्स में जीवित उपास्थि कोशिकाएं (कॉन्ड्रोसाइट्स) होती हैं। प्राप्ति स्थान: कान का पिन्ना, नाक की नोक, श्वासनली के छल्ले।
    • तरल संयोजी ऊतक (Fluid Connective Tissue):
      • रक्त (Blood): तरल मैट्रिक्स या प्लाज्मा (55%) और उसमें तैरती रक्त कणिकाएं (45%)। लाल रक्त कणिकाएं (RBC, $O_2$ व $CO_2$ संवहन), श्वेत रक्त कणिकाएं (WBC, प्रतिरक्षा व जीवाणु भक्षण) तथा प्लेटलेट्स (रक्त का थक्का जमाना)।
      • लसिका (Lymph): रक्त केशिकाओं से छना हुआ रंगहीन तरल जिसमें RBC नहीं होते, लिम्फोसाइट्स प्रचुर होते हैं; वसा संवहन व प्रतिरक्षा का कार्य करता है।

5.5 जंतु ऊतक: पेशी ऊतक एवं तंत्रिका ऊतक

  • 3. पेशी ऊतक (Muscular Tissue): संकुचनशील पेशी तंतुओं से बना ऊतक जिसमें एक्टिन व मायोसिन प्रोटीन होते हैं, जो शरीर की गति और आंतरिक अंगों के संचलन हेतु उत्तरदायी है।
    तुलना का लक्षण रेखित या कंकाल पेशी (ऐच्छिक) अरेखित या चिकनी पेशी (अनैच्छिक) हृद् पेशी (Cardiac Muscle)
    संरचना व आकार लंबे, बेलनाकार, अशाखित तंतु। तर्कुरूपी (दोनों सिरों पर नुकीले) तंतु। छोटे, बेलनाकार, शाखित तंतुओं का जाल।
    धारियां / पट्टियां स्पष्ट एकांतर गहरी व हल्की अनुप्रस्थ धारियां। कोई धारी नहीं; चिकना एकसमान रूप। हल्की धारियां तथा विशिष्ट इंटरकैलेटेड डिस्क।
    केंद्रक की स्थिति बहुकेंद्रकीय (Syncytial); परिधि पर स्थित। एककेंद्रकीय; केंद्र में स्थित। एक या द्विकेंद्रकीय; केंद्र में स्थित।
    नियंत्रण ऐच्छिक (इच्छाधीन नियंत्रित)। अनैच्छिक (स्वायत्त तंत्रिका तंत्र द्वारा)। अनैच्छिक (मायोजेनिक; स्वतः गतिमान पेसमेकर)।
    थकान तीव्र गति से संकुचन; जल्दी थकती हैं (लैक्टिक अम्ल जमाव)। धीमी लयबद्ध गति; आसानी से नहीं थकतीं। निरंतर लयबद्ध तीव्र संकुचन; जीवन भर कभी नहीं थकतीं।
    स्थान कंकाल से जुड़ी: हाथ, पैर, जीभ, ग्रसनी। आंतरिक खोखले अंग: आमाशय, आंत, रक्त वाहिकाएं। केवल हृदय की भित्ति (Myocardium) में।
  • 4. तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue): संवेदनाओं को ग्रहण करने और उन्हें विद्युत-रासायनिक आवेगों के रूप में तीव्र गति से संवाहित करने में विशेषीकृत ऊतक। इसके दो घटक हैं:
    1. न्यूरॉन / तंत्रिका कोशिका (Neuron): तंत्रिका तंत्र की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई। इसके तीन भाग हैं:
      • कोशिकाकाय (Cyton): केंद्रक, न्यूरोप्लाज्म व प्रोटीन निर्माण हेतु निस्ल कण (Nissl's granules) युक्त। तारककेंद्र निष्क्रिय होने से परिपक्व न्यूरॉन विभाजित नहीं हो सकते।
      • डेंड्राइट्स (Dendrites): छोटे शाखित प्रवर्ध जो उद्दीपनों को ग्रहण कर कोशिकाकाय की ओर लाते हैं (संवेदी / अंतर्मुखी)।
      • एक्सॉन (Axon): एकल सबसे लंबा बेलनाकार प्रवर्ध, जो माइलिन आवरण से ढका होता है और नियमित अंतराल पर रैनवियर की गांठें (Nodes of Ranvier) होती हैं। अंतिम छोर पर सिनेप्टिक घुंडियों से न्यूरोट्रांसमीटर (जैसे एसिटाइलकोलीन) निकलता है। यह आवेगों को कोशिकाकाय से दूर ले जाता है (चालक / बहिर्मुखी)।
    2. न्यूरोग्लिया (Neuroglia): तंत्रिका तंत्र की अ-तंत्रिकीय आलंबन कोशिकाएं जो न्यूरॉन को पोषण, रोधन व सुरक्षा देती हैं (जैसे एस्ट्रोसाइट्स, माइक्रोग्लिया, श्वान कोशिकाएं)। ये मस्तिष्क के 50% से अधिक भाग का निर्माण करती हैं और जीवन भर विभाजित हो सकती हैं।

महत्वपूर्ण रासायनिक सूत्र, अभिक्रियाएँ एवं समीकरण

कोशिका सिद्धांत एवं विरचो का सिद्धांत
Omnis cellula e cellula (Virchow, 1855)
सभी जीव कोशिकाओं से बने हैं; सभी नई कोशिकाएं पूर्ववर्ती कोशिकाओं के विभाजन से उत्पन्न होती हैं।
संयुक्त सूक्ष्मदर्शी का कुल आवर्धन सूत्र
M_कुल = M_आईपिस × M_ऑब्जेक्टिव
कुल आवर्धन नेत्रिका लेंस (आईपिस) और अभिदृश्यक लेंस (ऑब्जेक्टिव) के आवर्धनों का गुणनफल होता है।
सूक्ष्मदर्शी की विभेदन सीमा (रेले नियम)
d = (0.61 · λ) / NA
विभेदन दूरी (d) प्रकाश की तरंगदैर्घ्य (λ) के समानुपाती होती है। इलेक्ट्रॉन पुंज की λ अत्यंत लघु होने से विभेदन क्षमता बेजोड़ होती है।
गोलाकार कोशिका का पृष्ठीय क्षेत्रफल व आयतन अनुपात
A / V = (4πr²) / (4/3 πr³) = 3 / r
कोशिका की त्रिज्या (r) बढ़ने पर क्षेत्रफल व आयतन का अनुपात 3/r की दर से घटता है, जो कोशिका के आकार की प्राकृतिक सीमा तय करता है।
पादप कोशिका में स्फीति व परासरणी संतुलन
DPD = OP - TP (अथवा Ψw = Ψs + Ψp)
विसरण दाब न्यूनता (DPD) = परासरण दाब (OP) - स्फीति दाब (TP)। पूर्ण स्फीति पर TP = OP होने से जल प्रवेश रुक जाता है।
वायवीय श्वसन एवं ATP निर्माण का समग्र समीकरण
C₆H₁₂O₆ + 6O₂ → 6CO₂ + 6H₂O + 36-38 ATP
माइटोकॉन्ड्रिया में ग्लूकोज के पूर्ण ऑक्सीकरण से 36 से 38 ATP अणु जैव रासायनिक ऊर्जा मुद्रा के रूप में बनते हैं।
परऑक्सीसोम में कैटालेज एंजाइम द्वारा विषहरण
2H₂O₂ —(Catalase)→ 2H₂O + O₂
परऑक्सीसोम का कैटालेज कोशिका में निर्मित विषैले हाइड्रोजन परऑक्साइड को सुरक्षित जल व ऑक्सीजन में बदलता है।
केंद्रक-कोशिकाद्रव्य सूचकांक (Kernplasma Ratio)
NP = Vn / (Vc - Vn)
केंद्रक के आयतन (Vn) और प्रभावी कोशिकाद्रव्य के आयतन का अनुपात। इसका विचलन कोशिका विभाजन को प्रेरित करता है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
एक छात्र संयुक्त सूक्ष्मदर्शी में 10× आईपिस और 40× उच्च क्षमता वाले ऑब्जेक्टिव लेंस का उपयोग करके प्याज की झिल्ली की कोशिका का प्रेक्षण करता है। कुल आवर्धन कितना है? यदि सूक्ष्मदर्शी में कोशिका के प्रतिबिंब की मापी गई लंबाई 8.0 मिमी है, तो कोशिका की वास्तविक सूक्ष्म लंबाई माइक्रोमीटर (µm) में ज्ञात कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

चरण 1: कुल आवर्धन क्षमता ($M_{\text{कुल}}$) की गणना:

$$M_{\text{कुल}} = M_{\text{आईपिस}} \times M_{\text{ऑब्जेक्टिव}} = 10 \times 40 = \mathbf{400\times}$$

चरण 2: प्रतिबिंब के आकार से वास्तविक आकार ज्ञात करना:

$$\text{वास्तविक आकार} = \frac{\text{प्रतिबिंब का आकार}}{M_{\text{कुल}}}$$ $$\text{प्रतिबिंब का आकार} = 8.0\text{ मिमी} = 8.0 \times 1,000\ \mu\text{m} = 8,000\ \mu\text{m}$$ $$\text{वास्तविक आकार} = \frac{8,000\ \mu\text{m}}{400} = \mathbf{20\ \mu\text{m}}$$

उत्तर: सूक्ष्मदर्शी में नमूना 400 गुना आवर्धित दिखाई देता है और प्याज की कोशिका की वास्तविक लंबाई $20\ \mu\text{m}$ (या 0.02 मिमी) है।

उदाहरण 2
आसुत जल (0% लवण) में रखने पर: (क) मानव लाल रक्त कणिका (RBC), तथा (ख) प्याज की झिल्ली की पादप कोशिका पर क्या प्रभाव पड़ेगा? उनकी भिन्न जैविक प्रतिक्रियाओं का वैज्ञानिक कारण स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

(क) आसुत जल में लाल रक्त कणिका की प्रतिक्रिया:

आसुत जल RBC के आंतरिक कोशिकाद्रव्य (0.9% समतुल्य) की तुलना में अत्यधिक अल्पपरासारी (Hypotonic) होता है। अतः अंतःपरासरण (Endosmosis) द्वारा तेजी से जल RBC के भीतर प्रवेश करता है। जंतु कोशिका में कोई कठोर कोशिका भित्ति न होने के कारण लचीली कोशिका झिल्ली जल के आंतरिक द्रवस्थैतिक दाब को सहन नहीं कर पाती और फूलकर फट जाती है, जिसे हीमोलिसिस (Hemolysis) कहते हैं।

(ख) आसुत जल में प्याज की झिल्ली की कोशिका की प्रतिक्रिया:

अंतःपरासरण द्वारा जल पादप कोशिका की केंद्रीय रसधानी में प्रवेश करता है जिससे वह फूलकर बाहर की ओर स्फीति दाब ($TP$) डालती है। किंतु पादप कोशिका के चारों ओर सेलुलोज की बनी दृढ़ व प्रत्यास्थ कोशिका भित्ति होती है जो अंदर की ओर समान व विपरीत भित्ति दाब ($WP$) डालती है। जब $TP = WP$ हो जाता है, तो जल का और अधिक प्रवेश रुक जाता है। कोशिका पूर्णतः फूलकर तनी हुई (Turgid) हो जाती है, किंतु फटती नहीं है।

मुख्य निष्कर्ष: सेलुलोज कोशिका भित्ति की उपस्थिति ही पादप कोशिकाओं को अल्पपरासारी माध्यम में फटने से बचाती है।

उदाहरण 3
एक गोलाकार जीवाणु की त्रिज्या r₁ = 1 µm तथा एक विशाल उत्परिवर्ती कोशिका की त्रिज्या r₂ = 10 µm है। दोनों के पृष्ठीय क्षेत्रफल व आयतन के अनुपातों (A/V) की गणना कर तुलना कीजिए। विशाल कोशिका केवल विसरण द्वारा जीवित क्यों नहीं रह सकती?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

चरण 1: गोलाकार कोशिका के A/V अनुपात का सूत्र:

$$\frac{A}{V} = \frac{4\pi r^2}{\frac{4}{3}\pi r^3} = \frac{3}{r}$$

चरण 2: जीवाणु के लिए ($r_1 = 1\ \mu\text{m}$):

$$\left(\frac{A}{V}\right)_1 = \frac{3}{1\ \mu\text{m}} = \mathbf{3\ \mu\text{m}^{-1}}$$

चरण 3: विशाल कोशिका के लिए ($r_2 = 10\ \mu\text{m}$):

$$\left(\frac{A}{V}\right)_2 = \frac{3}{10\ \mu\text{m}} = \mathbf{0.3\ \mu\text{m}^{-1}}$$

शारीरिक व्याख्या:

छोटे जीवाणु का $A/V$ अनुपात बड़ी कोशिका से 10 गुना अधिक है। बड़ी कोशिका में त्रिज्या 10 गुना बढ़ने से पोषक पदार्थों की उपापचयी मांग (आयतन) $10^3 = 1,000$ गुना बढ़ गई, किंतु झिल्ली का विसरण द्वार (क्षेत्रफल) केवल $10^2 = 100$ गुना ही बढ़ा। अतः बाहरी झिल्ली से विसरण द्वारा 10 माइक्रोमीटर गहरे आंतरिक कोशिकाद्रव्य तक ऑक्सीजन और ग्लूकोज समय पर नहीं पहुंच पाएंगे और कोशिका भूखों मर जाएगी। इसी कारण कोशिकाएं सूक्ष्मदर्शीय होती हैं।

उदाहरण 4
5 प्रमुख संरचनात्मक लक्षणों के आधार पर प्रोकैरियोटिक कोशिका और यूकैरियोटिक कोशिका के बीच एक स्पष्ट तुलनात्मक सारणी बनाइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
तुलना का लक्षण प्रोकैरियोटिक कोशिका (आदिम) यूकैरियोटिक कोशिका (सुविकसित)
1. केंद्रक कला व केंद्रिका अनुपस्थित; नग्न DNA युक्त आदिम केंद्रकाभ (Nucleoid) पाया जाता है। उपस्थित; दोहरी केंद्रक कला, केंद्रिका व केंद्रकद्रव्य युक्त सुगठित केंद्रक।
2. हिस्टोन प्रोटीन अनुपस्थित; DNA नग्न अवस्था में रहता है। उपस्थित; DNA क्षारीय हिस्टोन प्रोटीनों के साथ मिलकर गुणसूत्र बनाता है।
3. झिल्लीबद्ध कोशिकांग पूर्णतः अनुपस्थित (माइटोकॉन्ड्रिया, लवक, ER, गॉल्जी काय नहीं होते)। उपस्थित (माइटोकॉन्ड्रिया, लवक, ER, गॉल्जी काय, लयनकाय सभी उपस्थित)।
4. राइबोसोम का प्रकार छोटे 70S प्रकार के (उप-इकाइयां: 50S + 30S)। कोशिकाद्रव्य में 80S (60S + 40S); कोशिकांगों में 70S।
5. कोशिका विभाजन विधि प्रत्यक्ष असूत्री विभाजन (द्विविखंडन); तुर्क तंतु नहीं बनते। समसूत्री अथवा अर्धसूत्री विभाजन; तुर्क तंतु बनते हैं।
उदाहरण 5
5 प्रमुख संरचनात्मक विशेषताओं के आधार पर पादप कोशिका और जंतु कोशिका के बीच एक स्पष्ट तुलनात्मक सारणी तैयार कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
तुलनात्मक विशेषता पादप कोशिका (Plant Cell) जंतु कोशिका (Animal Cell)
1. कोशिका भित्ति कोशिका झिल्ली के बाहर सेलुलोज की दृढ़ कोशिका भित्ति उपस्थित। कोशिका भित्ति अनुपस्थित; केवल लचीली कोशिका झिल्ली पाई जाती है।
2. लवक (Plastids) उपस्थित (हरितलवक, वर्णीलवक व अवर्णीलवक पाए जाते हैं)। पूर्णतः अनुपस्थित।
3. तारककाय व तारककेंद्र उच्च पादपों में अनुपस्थित (एनास्ट्रल तुर्क बनता है)। केंद्रक के समीप उपस्थित; कोशिका विभाजन में तुर्क तंतु बनाता है।
4. रसधानी (Vacuole) केंद्र में एक विशाल स्थायी रसधानी होती है जो 70-90% स्थान घेरती है। रसधानी अनुपस्थित या अत्यंत छोटी व अस्थायी होती हैं।
5. कोशिकाद्रव्य विभाजन केंद्र से परिधि की ओर कोशिका पट्टिका (Cell plate) निर्माण द्वारा। परिधि से केंद्र की ओर झिल्ली में खांच (Furrowing) बनने द्वारा।
उदाहरण 6
एक पादप ऊतक की सूक्ष्मदर्शीय काट में लंबी सजीव कोशिकाएं दिखाई देती हैं जिनके कोनों पर पेक्टिन का असमान स्थूलन है और अंतराकोशिकीय स्थान नहीं हैं। इस ऊतक को पहचानिए, शाकीय पौधों में इसका यांत्रिक महत्व बताइए और दृढ़ोतक (Sclerenchyma) से इसका अंतर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

1. ऊतक की पहचान: वर्णित ऊतक स्थूलकोण ऊतक (Collenchyma) है, जो पादपों का एक सरल सजीव यांत्रिक स्थायी ऊतक है।

2. यांत्रिक महत्व: स्थूलकोण ऊतक पौधों के बढ़ते हुए कोमल भागों (जैसे तरुण तना, पर्णवृंत व पुष्पवृंत) को लचीलापन एवं तनन सामर्थ्य प्रदान करता है। इससे तेज हवा चलने पर पत्तियां और डालियां बिना टूटे या मुड़े आसानी से लहरा सकती हैं।

3. दृढ़ोतक (Sclerenchyma) से अंतर:

  • सजीवता: स्थूलकोण ऊतक परिपक्व अवस्था में सजीव होता है और इसमें सक्रिय जीवद्रव्य होता है। जबकि दृढ़ोतक परिपक्व अवस्था में मृत होता है और उसमें जीवद्रव्य नहीं होता।
  • भित्ति का स्थूलन: स्थूलकोण ऊतक की भित्ति के कोनों पर पेक्टिन व हेमीसेलुलोज का जमाव होता है जो लचीला होता है। जबकि दृढ़ोतक की द्वितीयक भित्ति अत्यंत मोटी और कठोर लिग्निन से बनी होती है जो अनम्य व कठोर होती है।
उदाहरण 7
4.0 मोल ग्लूकोज के पूर्ण वायवीय ऑक्सीकरण से कुल कितने अणु ATP प्राप्त होंगे (प्रति मोल ग्लूकोज 38 ATP मानकर)? कोशिका में क्रेब्स चक्र तथा ऑक्सीडेटिव फॉस्फोरिलीकरण कहां संपन्न होते हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

चरण 1: वायवीय श्वसन का समीकरण:

$$\text{C}_6\text{H}_{12}\text{O}_6 + 6\text{O}_2 \to 6\text{CO}_2 + 6\text{H}_2\text{O} + 38\text{ ATP}$$

1 मोल ग्लूकोज के पूर्ण वायवीय दहन से $38\text{ मोल ATP}$ ऊर्जा प्राप्त होती है।

चरण 2: 4.0 मोल के लिए गणना:

$$\text{कुल ATP} = 4.0 \times 38 = \mathbf{152\text{ मोल ATP}}$$

चरण 3: कोशिका में संपन्न होने के स्थान:

  • क्रेब्स चक्र (Krebs Cycle): माइटोकॉन्ड्रिया के आंतरिक तरल मैट्रिक्स (Matrix) में संपन्न होता है।
  • ऑक्सीडेटिव फॉस्फोरिलीकरण व इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र (ETC): माइटोकॉन्ड्रिया की मुड़ी हुई आंतरिक झिल्ली की क्रिस्टी (Cristae) तथा $F_0-F_1$ ATP सिंथेज कणों पर संपन्न होता है।
उदाहरण 8
परिपक्व मानव लाल रक्त कणिका (RBC) में केंद्रक, माइटोकॉन्ड्रिया और अंतर्द्रव्यी जालिका क्यों नहीं होते? इस चरम संरचनात्मक विशेषीकरण के 3 प्रमुख शारीरिक लाभों की विवेचना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

मानव अस्थिमज्जा में RBC के परिपक्वन के समय कोशिका जानबूझकर अपने केंद्रक, माइटोकॉन्ड्रिया व ER का त्याग कर देती है। इस चरम विशेषीकरण के तीन प्रमुख शारीरिक लाभ हैं:

  1. हीमोग्लोबिन क्षमता का अधिकतमीकरण: केंद्रक और बड़े कोशिकांग न होने से कोशिका का लगभग 90-95% आंतरिक आयतन हीमोग्लोबिन अणुओं ($\approx 28\text{ करोड़}$) से भर जाता है, जिससे रक्त की ऑक्सीजन वहन क्षमता चरम सीमा तक बढ़ जाती है।
  2. ऑक्सीजन का शून्य आंतरिक उपभोग: माइटोकॉन्ड्रिया वायवीय श्वसन में ऑक्सीजन खर्च करता है। माइटोकॉन्ड्रिया न होने से RBC अपनी ऊर्जा अवायवीय ग्लाइकोलिसिस से बनाती है, जिससे फेफड़ों से बंधी 100% ऑक्सीजन सुरक्षित रूप से ऊतकों तक पहुंचाई जाती है।
  3. द्वि-अवतल लचीलापन व तीव्र विसरण: केंद्रक न होने से कोशिका बीच में दबकर द्वि-अवतल तश्तरी का रूप ले लेती है। इससे पृष्ठीय क्षेत्रफल व आयतन अनुपात ($A/V$) बढ़ जाता है जिससे त्वरित गैस विनिमय होता है और RBC संकरी रक्त केशिकाओं ($4\ \mu\text{m}$) से आसानी से मुड़कर गुजर सकती है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

रॉबर्ट हुक को जीवित कोशिका का खोजकर्ता समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

रॉबर्ट हुक (1665) ने केवल कॉर्क की मृत सेलुलोज कोशिका भित्तियों को देखा था। एंटनी वॉन ल्यूवेनहॉक (1674) ने पहली बार जीवित, गतिशील कोशिकाओं (जीवाणु, प्रोटोजोआ) को देखा।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

कोशिका भित्ति और कोशिका झिल्ली की पारगम्यता में भ्रम होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पादप कोशिका भित्ति निर्जीव और जल व विलेय दोनों के लिए पूर्णतः पारगम्य होती है। केवल सजीव कोशिका झिल्ली ही चयनात्मक पारगम्य (Selectively Permeable) होती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

विषाणु द्वारा रोग उत्पन्न करने के कारण उसे कोशिकीय जीव समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

विषाणु अकोशिकीय (Acellular) होते हैं; इनमें न कोशिकाद्रव्य होता है, न झिल्ली और न स्वतंत्र उपापचय। ये कोशिका सिद्धांत के प्रमुख अपवाद हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

क्लोरोप्लास्ट और माइटोकॉन्ड्रिया को एक दूसरे का विकल्प मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पादप कोशिकाओं में क्लोरोप्लास्ट और माइटोकॉन्ड्रिया दोनों होते हैं। क्लोरोप्लास्ट प्रकाश से ग्लूकोज बनाता है, जबकि माइटोकॉन्ड्रिया दिन-रात उस ग्लूकोज को जलाकर ATP ऊर्जा बनाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

समान लगने वाले नामों के कारण उनके कार्यों को आपस में बदल देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

राइबोसोम झिल्लीरहित कण हैं जो प्रोटीन बनाते हैं। लयनकाय एकल झिल्लीयुक्त थैलियां हैं जिनमें पाचक एंजाइम होते हैं जो कोशिका को पचाते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

जंतुओं की तरह पौधों में भी तारककेंद्र द्वारा तुर्क तंतु निर्माण सोचना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

उच्च पादप कोशिकाओं (आवृतबीजी व अनावृतबीजी) में तारककाय व तारककेंद्र अनुपस्थित होते हैं। उनका तुर्क तंतु सूक्ष्मनलिका केंद्रों द्वारा एनास्ट्रल विधि से बनता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

रक्त की तरल प्रकृति के कारण उसे हिस्टोलॉजिकल ऊतक न पहचान पाना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

रक्त भ्रूणीय मीसोडर्म से उत्पन्न एक विशिष्ट तरल संयोजी ऊतक (Fluid Connective Tissue) है, जिसके तरल प्लाज्मा मैट्रिक्स में रक्त कोशिकाएं तैरती हैं।

जीवों की संरचना — 4-चतुर्थांश संकल्पना मानचित्र (Vector Concept Map)

🔬 १. कोशिका की खोज एवं सूक्ष्मदर्शी हुक • कोशिका सिद्धांत • परिमाप व आकारिकी • रॉबर्ट हुक (1665): कॉर्क में प्रथम मृत कोष्ठकों का अवलोकन • ल्यूवेनहॉक: प्रथम जीवित मुक्त सूक्ष्मजीवों व कोशिकाओं की खोज • कोशिका सिद्धांत: श्लाइडेन, श्वान एवं रुडोल्फ विरचो (1855) • सूक्ष्मदर्शी: संयुक्त प्रकाश (2000×) व इलेक्ट्रॉन (5 लाख×) • माप परास: माइकोप्लाज्मा (0.1 µm) से शुतुरमुर्ग का अंडा (17 सेमी) • आकृति: द्वि-अवतल RBC, शाखित तंत्रिका कोशिका, तर्कु पेशी 🛡️ २. कोशिका सीमा एवं जीवद्रव्य कोशिका भित्ति • मोज़ेक झिल्ली • परासरण • कोशिका भित्ति: सेलुलोज ढांचा, मध्य पटलिका व प्लाज्मोडेस्मेटा • कोशिका झिल्ली: फॉस्फोलिपिड द्विपरत व प्रोटीन का मोज़ेक प्रारूप • चयनात्मक पारगम्य झिल्ली: चयनित अणुओं के परिवहन का नियमन • परासरण व कुंचन: अल्प, सम व अतिपरासारी विलयन की क्रिया • स्फीति व भित्ति दाब: पादप अंगों की यांत्रिक सुदृढ़ता व आकार • जीवद्रव्य (प्रोटोप्लाज्म) = कोशिकाद्रव्य (सॉल-जेल) + केंद्रकद्रव्य ⚙️ ३. कोशिकांग एवं श्रम विभाजन केंद्रक • माइटोकॉन्ड्रिया • लवक • अंतर्द्रव्यी तंत्र • केंद्रक: केंद्रक कला, द्रव्य, जालिका व केंद्रिका (नियंत्रण केंद्र) • माइटोकॉन्ड्रिया: दोहरी झिल्ली, क्रिस्टी, F0-F1 कण, ATP ऊर्जाघर • लवक (प्लास्टिड): हरितलवक (ग्रेना/स्ट्रोमा), वर्णी व अवर्णीलवक • अंतर्द्रव्यी जालिका: खुरदरी RER (प्रोटीन) व चिकनी SER (लिपिड) • गॉल्जी काय: पैकेजिंग, स्रावण व लयनकाय निर्माण (ट्रैफिक पुलिस) • लयनकाय (आत्मघाती थैली) व राइबोसोम (प्रोटीन की फैक्ट्री) 🌿 ४. कोशिका प्रकार एवं ऊतक संगठन प्रोकैरियोट/यूकैरियोट • पादप/जंतु • ऊतक पदानुक्रम • प्रोकैरियोटिक (केंद्रकाभ, 70S) बनाम यूकैरियोटिक (सत्य केंद्रक, 80S) • पादप बनाम जंतु कोशिका: भित्ति, लवक, बड़ी रसधानी व तारककाय • पदानुक्रम: कोशिकांग → कोशिका → ऊतक → अंग → तंत्र → सजीव • पादप ऊतक: विभज्योतक (वृद्धि) व स्थायी ऊतक (जाइलम व फ्लोएम) • जंतु ऊतक: उपकला, संयोजी ऊतक, पेशी ऊतक व तंत्रिका ऊतक • तारककाय: जंतु कोशिका विभाजन में तुर्क तंतुओं का निर्माण WBBSE कक्षा 8 जीवों की संरचना कोशिका व ऊतक विज्ञान

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
कोशिका सभी सजीवों की मूलभूत संरचनात्मक, क्रियात्मक एवं जैविक इकाई है; रॉबर्ट हुक (1665) ने कॉर्क में मृत कोशिका भित्ति तथा ल्यूवेनहॉक (1674) ने पहली जीवित मुक्त कोशिका देखी।
मुख्य बिंदु 2
श्लाइडेन व श्वान (1838-1839) द्वारा प्रतिपादित तथा रुडोल्फ विरचो (1855, Omnis cellula e cellula) द्वारा विस्तारित कोशिका सिद्धांत के अनुसार सभी जीव पूर्ववर्ती कोशिकाओं के विभाजन से बनी कोशिकाओं से निर्मित हैं।
मुख्य बिंदु 3
कोशिका सीमाओं में पादप कोशिका भित्ति निर्जीव व पूर्णतः पारगम्य है; जबकि प्लाज्मा झिल्ली सजीव तथा सिंगर-निकोलसन के फ्लूइड मोज़ेक मॉडल अनुसार चयनात्मक पारगम्य है।
मुख्य बिंदु 4
झिल्ली परिवहन सरल विसरण, परासरण (अल्पपरासारी में स्फीति, अतिपरासारी में जीवद्रव्यकुंचन), ATP चालित सक्रिय परिवहन तथा पुटिका परिवहन (फैगोसाइटोसिस) द्वारा होता है।
मुख्य बिंदु 5
कोशिकांगों में श्रम विभाजन स्पष्ट है: केंद्रक (नियंत्रण केंद्र), माइटोकॉन्ड्रिया (ATP ऊर्जाघर), लवक (हरितलवक रसोईघर), ER (प्रोटीन/लिपिड निर्माण), गॉल्जी काय (पैकेजिंग/स्रावण), लयनकाय (आत्मघाती थैली) व राइबोसोम (प्रोटीन फैक्ट्री)।
मुख्य बिंदु 6
प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं (जीवाणु) में केंद्रक कला व झिल्लीबद्ध कोशिकांग अनुपस्थित होते हैं तथा 70S राइबोसोम पाए जाते हैं; यूकैरियोटिक कोशिकाओं में सुगठित केंद्रक व 80S राइबोसोम होते हैं।
मुख्य बिंदु 7
कोशिका आकार बढ़ने पर पृष्ठीय क्षेत्रफल व आयतन अनुपात (A/V = 3/r) अत्यधिक घट जाता है, जो कोशिका विभाजन को प्रेरित कर उपापचयी संतुलन बहाल करता है।
मुख्य बिंदु 8
शारीरिक पदानुक्रम अणुओं से अंग तंत्र तक विस्तृत है। पादप ऊतक विभज्योतक व स्थायी ऊतक (पैरेन्काइमा, कॉलेन्काइमा, स्क्लेरेन्काइमा, जाइलम, फ्लोएम) तथा जंतु ऊतक उपकला, संयोजी, पेशी व तंत्रिका ऊतक में विभक्त हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
आधुनिक कोशिका सिद्धांत के तीन प्रमुख सिद्धांत बताइए। विषाणुओं को इस सिद्धांत का अपवाद क्यों माना जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

आधुनिक कोशिका सिद्धांत के तीन मूल सिद्धांत:

  1. सभी सजीव प्राणी एक या अधिक कोशिकाओं और उनके उत्पादों से बने होते हैं (श्लाइडेन व श्वान)।
  2. कोशिका जीवन की मूलभूत संरचनात्मक, जैविक एवं क्रियात्मक इकाई है।
  3. सभी जीवित कोशिकाओं की उत्पत्ति केवल पूर्ववर्ती जीवित कोशिकाओं के विभाजन से होती है (रुडोल्फ विरचो: Omnis cellula e cellula)।

विषाणु क्यों अपवाद हैं:

विषाणुओं में कोई कोशिकीय संगठन नहीं होता—इनमें कोशिकाद्रव्य, कोशिका झिल्ली या कोशिकांग नहीं होते। पोषक कोशिका के बाहर ये निर्जीव रवेदार न्यूक्लियोप्रोटीन कण के रूप में पड़े रहते हैं और कोई स्वतंत्र उपापचय नहीं करते। ये केवल जीवित पोषक कोशिका की जैव-संश्लेषण मशीनरी पर कब्जा करके ही प्रतिकृति बनाते हैं। अतः विषाणु कोशिका सिद्धांत के स्पष्ट अपवाद हैं।


2
संरचना, संलग्न राइबोसोम और शारीरिक कार्यों के आधार पर खुरदरी अंतर्द्रव्यी जालिका (RER) और चिकनी अंतर्द्रव्यी जालिका (SER) में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
तुलना का लक्षण खुरदरी अंतर्द्रव्यी जालिका (RER) चिकनी अंतर्द्रव्यी जालिका (SER)
राइबोसोम की उपस्थिति बाहरी सतह पर 80S राइबोसोम चिपके रहते हैं जिससे यह खुरदरी दिखती है। सतह पर कोई राइबोसोम नहीं होते; सतह पूर्णतः चिकनी होती है।
संरचनात्मक स्वरूप मुख्य रूप से समानांतर चपटी सिस्टर्नी और पुटिकाओं से बनी होती है। मुख्य रूप से परस्पर जुड़ी शाखित नलिकाओं (Tubules) से बनी होती है।
प्रमुख कार्य स्रावी प्रोटीनों का संश्लेषण, वलन तथा प्रारंभिक रूपांतरण। लिपिड, फॉस्फोलिपिड, कोलेस्ट्रॉल व स्टेरॉयड हार्मोन का निर्माण।
विशिष्ट भूमिका केंद्रक की बाहरी झिल्ली से जुड़ी; अग्न्याशय में प्रचुर। यकृत में औषधियों व विषों का विषहरण; पेशी में Ca²⁺ आयन संचय।

3
जीवद्रव्यकुंचन (Plasmolysis) क्या है? प्याज की झिल्ली की कोशिका को 10% सांद्र शर्करा घोल में रखने पर होने वाले परिवर्तनों का वर्णन कीजिए और बताइए कि विकुंचन कैसे कराया जा सकता है।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

जीवद्रव्यकुंचन (Plasmolysis): जब किसी सजीव पादप कोशिका को अतिपरासारी घोल में रखा जाता है, तो बहिःपरासरण द्वारा जल बाहर निकल जाने के कारण कोशिका भित्ति से जीवद्रव्य के संकुचित होकर अलग हो जाने की क्रिया को जीवद्रव्यकुंचन कहते हैं।

10% शर्करा घोल में क्रमिक परिवर्तन:

  1. 10% शर्करा घोल प्याज के कोशिका रस की तुलना में अतिपरासारी (Hypertonic) होता है।
  2. बहिःपरासरण (Exosmosis) द्वारा केंद्रीय रसधानी से जल बाहर विलयन में निकलने लगता है।
  3. रसधानी सिकुड़ने लगती है जिससे स्फीति दाब ($TP$) शून्य हो जाता है।
  4. निरंतर जल ह्रास से जीवद्रव्य सेलुलोज भित्ति के कोनों को छोड़कर केंद्र में एक गोल पिण्ड के रूप में सिमट जाता है। भित्ति और सिकुड़े जीवद्रव्य के बीच का रिक्त स्थान बाहरी सांद्र शर्करा घोल से भर जाता है।

विकुंचन (Deplasmolysis) कराने की विधि: कुंचित प्याज की कोशिका को तुरंत शुद्ध आसुत जल (अल्पपरासारी माध्यम) में स्थानांतरित करने पर अंतःपरासरण द्वारा जल पुनः रसधानी में प्रवेश कर जाता है, जिससे जीवद्रव्य फैलकर पुनः भित्ति से सट जाता है और कोशिका स्फीत हो जाती है।


4
संवहनी घटकों, सजीव-निर्जीव स्थिति और संवहन की दिशा के आधार पर जाइलम और फ्लोएम ऊतकों का तुलनात्मक विश्लेषण कीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
तुलना का बिंदु जाइलम ऊतक (Xylem) फ्लोएम ऊतक (Phloem)
मुख्य संवाहक घटक वाहिनिकाएं (Tracheids) और वाहिकाएं (Vessels)। चालनी नलिकाएं (Sieve tubes) और सहकोशिकाएं।
सजीव व मृत स्थिति अधिकांश घटक मृत होते हैं (वाहिनिका, वाहिका व रेशे मृत; केवल जाइलम मृदूतक सजीव)। अधिकांश घटक सजीव होते हैं (चालनी नलिका, सहकोशिका व मृदूतक सजीव; केवल फ्लोएम रेशे मृत)।
संवहित पदार्थ जड़ों द्वारा अवशोषित जल और खनिज लवण। हरी पत्तियों में प्रकाश-संश्लेषण से निर्मित कार्बनिक भोजन (सुक्रोज)।
संवहन की दिशा सदैव एकदिशीय (जड़ से तने के माध्यम से पत्तियों की ओर ऊपर)। द्विदिशीय अथवा बहुदिशीय (पत्तियों से संचय अंगों व वृद्धि करते शीर्षों की ओर)।

5
लयनकाय को "आत्मघाती थैली" (Suicide Bags) क्यों कहा जाता है? स्वभक्षण (Autophagy), स्व-लयन और टैडपोल के कायांतरण में इसकी क्या भूमिका है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

1. "आत्मघाती थैली" नाम का कारण: लयनकाय एकल झिल्ली से घिरी एक ऐसी थैली है जिसमें लगभग 50 प्रकार के अत्यंत शक्तिशाली अम्लीय पाचक एंजाइम होते हैं जो सभी जैव अणुओं को पचा सकते हैं। यदि कोशिका किसी रोग, चोट या ऑक्सीजन की कमी से गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो जाती है, तो लयनकाय की झिल्ली फट जाती है और उसके पाचक एंजाइम पूरी कोशिका को भीतर से ही पचाकर नष्ट कर देते हैं। इस आत्मघाती प्रकृति के कारण इसे "आत्मघाती थैली" कहते हैं।

2. स्वभक्षण (Autophagy): सामान्य जीवन या भुखमरी के समय कोशिका के पुराने, टूटे-फूटे व निष्क्रिय अंगों (जैसे पुराने माइटोकॉन्ड्रिया) को लयनकाय निगलकर पचा डालता है, जिससे प्राप्त पोषक तत्वों का नई संरचनाओं में पुनर्चक्रण होता है।

3. टैडपोल का कायांतरण: जब जलीय टैडपोल वयस्क स्थलीय मेंढक में बदलता है, तो उसकी पूंछ की अब कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। तीव्र लयनकायिक स्व-लयन द्वारा पूंछ के ऊतक पूरी तरह पचकर विलोपित हो जाते हैं और उसके पोषक तत्व वयस्क अंगों के निर्माण में काम आते हैं।


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