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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 6 • Hindi (भाषा मंजरी-6) • अध्याय 8
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

ऐसे-ऐसे (एकांकी)

हिंदी के प्रसिद्ध नाटककार विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित "ऐसे-ऐसे" एक अत्यंत लोकप्रिय, हास्यपूर्ण और मनोवैज्ञानिक एकांकी (नाटक) है। इसमें तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले एक नटखट बालक 'मोहन' के पेट दर्द के नाटक का सजीव चित्रण है। मोहन छुट्टियों का गृहकार्य (होमवर्क) पूरा न होने के डर से स्कूल जाने से बचने के लिए पेट में अजीब सा दर्द—"ऐसे-ऐसे होता है"—का बहाना बनाता है। माँ, पिता, पड़ोसी और डॉक्टर-वैद्य सब परेशान हो जाते हैं, पर अंत में मोहन के समझदार मास्टर जी आते हैं और बिना किसी दवा के इस मनोवैज्ञानिक बीमारी की असली जड़ पकड़ लेते हैं।

क्या पेट दर्द की दवा भी कभी स्कूल की छुट्टी हो सकती है?

पेट पकड़कर कराहता हुआ मोहन, हींग-अजवाइन पिलाती माँ, चूर्ण की पुड़िया देते वैद्य जी और इंजेक्शन का डर दिखाते डॉक्टर साहब! आखिर यह कौन सी रहस्यमयी बीमारी थी जिसका नाम ही 'ऐसे-ऐसे' था? जानिए कैसे मास्टर जी की एक मुस्कान ने बिना एक भी घूँट दवा पिलाए मोहन को भला-चंगा कर दिया!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

हिंदी के प्रसिद्ध नाटककार विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित "ऐसे-ऐसे" एक अत्यंत लोकप्रिय, हास्यपूर्ण और मनोवैज्ञानिक एकांकी (नाटक) है। इसमें तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले एक नटखट बालक 'मोहन' के पेट दर्द के नाटक का सजीव चित्रण है। मोहन छुट्टियों का गृहकार्य (होमवर्क) पूरा न होने के डर से स्कूल जाने से बचने के लिए पेट में अजीब सा दर्द—"ऐसे-ऐसे होता है"—का बहाना बनाता है। माँ, पिता, पड़ोसी और डॉक्टर-वैद्य सब परेशान हो जाते हैं, पर अंत में मोहन के समझदार मास्टर जी आते हैं और बिना किसी दवा के इस मनोवैज्ञानिक बीमारी की असली जड़ पकड़ लेते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • एकांकी (नाटक) विधा का सामान्य परिचय
  • स्कूली गृहकार्य से बचने के बाल-सुलभ बहानों की समझ

इस अध्याय के लक्ष्य

  • एकांकी विधा, संवाद अदायगी और हास्य-व्यंग्य के तत्वों को समझना।
  • बाल मनोविज्ञान—गृहकार्य न करने के अपराध-बोध और भय—का विश्लेषण करना।
  • मास्टर जी की समझदारी और सहानुभूतिपूर्ण शिक्षण पद्धति का मूल्यांकन करना।
  • घरेलू नुस्खों (हींग, अजवाइन) और चिकित्सकीय परामर्श के अंतर को जानना।
  • शब्दावली संवर्धन: एकांकी, बला, गुलज़ार, गडबड, अट्टाहास, धता बताना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. मोहन का पेट दर्द और घर में हड़कं...
2 2. वैद्य जी, डॉक्टर और पड़ोसिन का आ...
3 3. मास्टर जी का मनोवैज्ञानिक निदान...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. मोहन का पेट दर्द और घर में हड़कंप

रहस्यमयी बीमारी: आठ-नौ साल का मोहन तीसरी कक्षा में पढ़ता है। दोपहर को अचानक वह अपने पेट पर हाथ रखकर जोर-जोर से कराहने लगता है—"माँ ओ माँ, पेट में कुछ ऐसे-ऐसे होता है!" माँ घबराकर पूछती है कि दर्द कैसा है? क्या चुभन है या मरोड़? मोहन केवल एक ही रट लगाए रहता है—"बस ऐसे-ऐसे होता है!"

घरेलू उपचार और पिता की घबराहट: माँ उसे गरम पानी की बोतल से सेकती है, हींग, हींग-अजवाइन और नींबू का पानी देती है, पर दर्द कम नहीं होता। पिता बताते हैं कि इसने दफ्तर में केवल एक केला और एक संतरा खाया था, कोई उल्टी-सीधी चीज़ नहीं खाई। घबराकर पिता वैद्य जी और डॉक्टर साहब को फोन करते हैं।

2. वैद्य जी, डॉक्टर और पड़ोसिन का आगमन

वैद्य जी का निदान: वैद्य जी आते हैं और मोहन की नाड़ी (नब्ज) देखकर कहते हैं कि वात का प्रकोप है और पेट में वायु (गैस) रुक गई है। वे कब्ज और बदहजमी की एक पुड़िया आधे-आधे घंटे बाद गर्म पानी से देने को कहते हैं।

डॉक्टर साहब का प्रवेश: डॉक्टर साहब जीभ देखकर कहते हैं कि बदहजमी और कोलिक पेन (पेट दर्द) है। वे एक खुराक दवा भेजते हैं और कहते हैं कि एकाध दस्त होने के बाद दर्द फुर्र हो जाएगा। पड़ोसी दीनानाथ और पड़ोसिन भी नई-नई बीमारियों की चर्चा करके माँ की घबराहट और बढ़ा देते हैं।

3. मास्टर जी का मनोवैज्ञानिक निदान और रहस्योद्घाटन

मास्टर जी की अंतर्दृष्टि: तभी मोहन के स्कूल के मास्टर जी आते हैं। वे मोहन का उतरा हुआ चेहरा देखते हैं और माँ से पूछते हैं कि क्या मोहन ने स्कूल का काम पूरा कर लिया है? माँ कहती है—"नहीं, काम तो पूरा नहीं हुआ।"

रहस्य पर से पर्दा उठा: मास्टर जी हँस पड़ते हैं और पूरा माजरा समझ जाते हैं। वे मोहन से कहते हैं:

"मोहन! तुम्हारी 'ऐसे-ऐसे' की बीमारी की दवा मेरे पास है। महीने भर की छुट्टियों में तुमने खूब मौज की, पर जब स्कूल खुलने का समय आ गया और होमवर्क बाकी रह गया, तो उसी के डर के मारे तुम्हारे पेट में 'ऐसे-ऐसे' होने लगा है!"

मोहन मुँह छिपाकर चादर में दुबक जाता है। मास्टर जी उसे दो दिन की मोहलत देते हैं कि वह अपना काम पूरा करे और फिर स्कूल आए। यह सुनकर पिता के हाथ से दवा की शीशी छूटकर फर्श पर गिर पड़ती है। माँ और पिता सिर पकड़ लेते हैं और पूरा कमरा ठहाकों से गूँज उठता है।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

बाल मनोवैज्ञानिक बहानेबाजी सूत्र
अधूरा गृहकार्य + स्कूल खुलने का भय ⇒ काल्पनिक बीमारी (ऐसे-ऐसे)
विष्णु प्रभाकर का मुख्य नाट्य निष्कर्ष।
सहानुभूतिपूर्ण शिक्षण नियम
सख्त सजा → झूठ और छल सहानुभूति व मोहलत → सुधार व काम पूरा
मास्टर जी की मनोवैज्ञानिक शिक्षण शैली।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
सड़क के किनारे, सुंदर फ़्लैट में बैठक का दृश्य। उसका एक दरवाज़ा गली वाले बरामदे में खुलता है... इस बैठक की पूरी तस्वीर उभारो।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
बैठक अत्यंत व्यवस्थित और सुंदर है। कमरे में तीन दरवाजे हैं—एक बरामदे में, दूसरा अंदर के कमरे में और तीसरा रसोईघर में। बीच में एक तख्त बिछा है जिस पर चादर डली है और मोहन उस पर लेटा कराह रहा है। दीवार के पास एक छोटी मेज पर फोन रखा है, कुर्सियाँ और रेडियो का सेट लगा है।
उदाहरण 2
माँ मोहन के "ऐसे-ऐसे" कहने पर क्यों घबरा रही थी?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
माँ इसलिए घबरा रही थी क्योंकि मोहन किसी निश्चित बीमारी या दर्द का नाम नहीं ले रहा था। जब भी माँ पूछती कि मरोड़ है या चुभन, मोहन केवल यही कहता कि 'बस ऐसे-ऐसे होता है'। माँ को लगा कि कहीं कोई नई और भयानक बीमारी तो नहीं हो गई है।
उदाहरण 3
मास्टर जी ने मोहन के पेट दर्द का क्या कारण बताया और उसकी क्या दवा दी?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
मास्टर जी ने बताया कि मोहन को कोई शारीरिक बीमारी नहीं है, बल्कि महीने भर की छुट्टियों में स्कूल का होमवर्क न करने के डर से उसके पेट में 'ऐसे-ऐसे' हो रहा है। मास्टर जी ने उसे दवा के रूप में डांटने के बजाय दो दिन की छूट दी कि वह इन दो दिनों में अपना अधूरा काम पूरा करे।
उदाहरण 4
एकांकी के अंत में पिता के हाथ से दवा की शीशी छूटकर क्यों गिर गई?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
जब पिता ने सुना कि मोहन कोई बीमार नहीं था, बल्कि केवल स्कूल का गृहकार्य न करने के कारण बीमारी का स्वांग रच रहा था और सब को मूर्ख बना रहा था, तो वे अत्यधिक चकित और हक्के-बक्के रह गए, जिससे उनके हाथ से शीशी छूटकर गिर गई।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि मोहन ने सचमुच कोई विषैली चीज़ खा ली थी।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मोहन का पेट बिल्कुल ठीक था; उसका दर्द पूर्णतः काल्पनिक और मनोवैज्ञानिक था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

वैद्य और डॉक्टर को धूर्त समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वे धूर्त नहीं थे; वे बच्चे के बताए गए झूठे लक्षणों के आधार पर वास्तविक शारीरिक रोग का उपचार करने का प्रयास कर रहे थे।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

मोहन की बीमारी 'ऐसे-ऐसे' का निदान

शारीरिक रोग बनाम मनोवैज्ञानिक भय

वैद्य व डॉक्टर का भ्रम

वात का प्रकोप, कब्ज, बदहजमी और कोलिक पेन।

असली कारण

छुट्टियों का गृहकार्य न होने पर डांट का गहरा भय।

मास्टर जी की दवा

दो दिन की मोहलत और काम पूरा करने की सहानुभूति।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1

विष्णु प्रभाकर की हास्य एकांकी "ऐसे-ऐसे" में तीसरी कक्षा के छात्र मोहन द्वारा गृहकार्य न करने के डर से पेट दर्द का बहाना बनाने का सजीव चित्रण है। मोहन के "ऐसे-ऐसे" दर्द से परेशान होकर माता-पिता हींग-अजवाइन, वैद्य जी और डॉक्टर की दवाइयों का प्रबंध करते हैं। अंत में मास्टर जी आते हैं और बिना दवा के यह भेद खोल देते हैं कि छुट्टियों का काम अधूरा होने के डर से ही मोहन यह नाटक कर रहा है। यह नाटक बाल-मनोविज्ञान और सहानुभूतिपूर्ण शिक्षण का उत्कृष्ट उदाहरण है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
यदि मास्टर जी मोहन को आते ही पीटते तो क्या होता?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मोहन डर के मारे और अधिक झूठ बोलता तथा उसका मानसिक तनाव और बढ़ जाता।
मास्टर जी के व्यवहार की सकारात्मकता पर विचार करें।
2
इस पाठ से विद्यार्थियों को क्या सीख मिलती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: समय पर अपना गृहकार्य और दायित्व पूरा करना चाहिए, बहानों और झूठ का सहारा नहीं लेना चाहिए।
गृहकार्य के प्रति अनुशासन के संदर्भ में उत्तर दें।
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कक्षा 6 Hindi (भाषा मंजरी-6) के सभी अध्याय

अध्याय 1: वह चिड़िया जो (कविता) अध्याय 2: बचपन (संस्मरण) अध्याय 3: नादान दोस्त (कहानी) अध्याय 4: चाँद से थोड़ी सी गप्पें (कविता) अध्याय 5: अक्षरों का महत्व (निबंध) अध्याय 6: पार नज़र के (कहानी) अध्याय 7: साथी हाथ बढ़ाना (गीत) अध्याय 8: ऐसे-ऐसे (एकांकी) अध्याय 9: टिकट अलबम (कहानी) अध्याय 10: झाँसी की रानी (कविता) अध्याय 11: जो देखकर भी नहीं देखते (निबंध) अध्याय 12: संसार पुस्तक है (पत्र) अध्याय 13: मैं सबसे छोटी होऊँ (कविता) अध्याय 14: लोकगीत (निबंध) अध्याय 15: नौकर (निबंध) अध्याय 16: वन के मार्ग में (कविता) अध्याय 17: साँस-साँस में बाँस (निबंध) अध्याय 18: बाल रामकथा: अवधपुरी में राम अध्याय 19: बाल रामकथा: जंगल और जनकपुर अध्याय 20: बाल रामकथा: दो वरदान व राम का वन-गमन

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