राजतिलक का निर्णय: राजा दशरथ वृद्ध हो चले थे। श्रीराम के सद्गुणों, न्यायप्रियता और प्रजा के अपार स्नेह को देखते हुए राजा ने राज्यसभा में राम के राज्याभिषेक की घोषणा की। उस समय भरत और शत्रुघ्न अपने ननिहाल (कैकेय देश) गए हुए थे। पूरी अयोध्या नगरी तोरणों, फूलों और दीपों से सज गई।
मंथरा का विषवमन: कैकेयी की कुबड़ी दासी मंथरा अयोध्या की इस खुशी को देखकर ईर्ष्या से जल उठी। वह दौड़ी-दौड़ी कैकेयी के पास गई और विलाप करते हुए बोली: "रानी! उठो, विनाश आ गया है! राजा दशरथ ने षड्यंत्र करके भरत की अनुपस्थिति में कल सुबह ही राम का राजतिलक तय कर दिया है। यदि राम राजा बन गए तो भरत राम के दास बन जाएँगे और तुम्हें कौशल्या की दासी बनकर रहना पड़ेगा!"
पहले तो कैकेयी ने राम को भरत जैसा ही मानकर मंथरा को डांटा, किंतु मंथरा के लगातार भड़काने से रानी की बुद्धि भ्रष्ट हो गई और वह भय और ईर्ष्या के जाल में फँस गई।