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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 6 • Hindi (भाषा मंजरी-6) • अध्याय 14
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

लोकगीत (निबंध)

प्रसिद्ध विद्वान और इतिहासकार डॉ. भगवतशरण उपाध्याय द्वारा रचित "लोकगीत" भारतीय लोक-संस्कृति, संगीत और जन-जीवन का एक अत्यंत प्रामाणिक और रोचक निबंध है। लोकगीत वे गीत हैं जो किसी शास्त्रीय संगीत के कड़े नियमों के बंधनों में नहीं बंधे होते, बल्कि सीधे जनता के हृदय से, बिना किसी विशेष साधना के, स्वाभाविक रूप से फूटते हैं। ये गीत ढोलक, झांझ, मंजीरे और बांसुरी की थाप पर सामूहिक रूप से गाए जाते हैं। त्योहारों, विवाह, सावन, खेती, कजरी, सोहर और बिदा के समय गाए जाने वाले ये गीत हमारी मिट्टी की सच्ची सुगंध और सामाजिक सौहार्द के संवाहक हैं।

शास्त्रीय संगीत से कोसों दूर, फिर भी करोड़ों दिलों की धड़कन!

न कोई सुर-ताल की कठिन साधना, न कोई घराने की तालीम! फिर भी गाँव की चौपालों और खेतों में जब औरतें ढोलक की थाप पर कजरी और सोहर गाती हैं, तो पूरा गाँव क्यों झूम उठता है? जानिए भारत की असली धड़कन—हमारे जीवंत और रंग-बिरंगे लोकगीतों की दुनिया!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

प्रसिद्ध विद्वान और इतिहासकार डॉ. भगवतशरण उपाध्याय द्वारा रचित "लोकगीत" भारतीय लोक-संस्कृति, संगीत और जन-जीवन का एक अत्यंत प्रामाणिक और रोचक निबंध है। लोकगीत वे गीत हैं जो किसी शास्त्रीय संगीत के कड़े नियमों के बंधनों में नहीं बंधे होते, बल्कि सीधे जनता के हृदय से, बिना किसी विशेष साधना के, स्वाभाविक रूप से फूटते हैं। ये गीत ढोलक, झांझ, मंजीरे और बांसुरी की थाप पर सामूहिक रूप से गाए जाते हैं। त्योहारों, विवाह, सावन, खेती, कजरी, सोहर और बिदा के समय गाए जाने वाले ये गीत हमारी मिट्टी की सच्ची सुगंध और सामाजिक सौहार्द के संवाहक हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • भारतीय लोक-संस्कृति और ग्रामीण जनजीवन का सामान्य परिचय
  • शास्त्रीय संगीत और लोक-संगीत के अंतर की समझ

इस अध्याय के लक्ष्य

  • लोकगीतों के स्वरूप, उत्पत्ति और शास्त्रीय संगीत से उनके मौलिक अंतर को समझना।
  • भारत के विभिन्न क्षेत्रों (बुंदेलखंड, भोजपुरी क्षेत्र, पंजाब, राजस्थान, पहाड़ी अंचल) के प्रमुख लोकगीतों को जानना।
  • लोकगीतों के प्रमुख वाद्ययंत्रों (ढोलक, करताल, झांझ, बाँसुरी) और सामूहिक गायन की परंपरा को पहचानना।
  • स्त्रियों के विशेष लोकगीतों (विवाह, सोहर, बन्ना-बन्नी, कजरी) के सांस्कृतिक महत्व को जानना।
  • शब्दावली संवर्धन: लोकगीत, शास्त्रीय, लोच, तान, आल्हा, कजरी, सोहर, बाउल, भटियाली।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. लोकगीत: परिभाषा और शास्त्रीय संग...
2 2. भारत के प्रमुख क्षेत्रीय लोकगीत...
3 3. स्त्रियों की भूमिका और लोकगीतों...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. लोकगीत: परिभाषा और शास्त्रीय संगीत से अंतर

जनता का संगीत: लोकगीत अपनी लोच (लचीलापन), ताजगी और लोकप्रियता में शास्त्रीय संगीत से बिल्कुल भिन्न होते हैं। लोकगीतों के लिए किसी लंबी साधना या संगीत की कठिन शिक्षा की आवश्यकता नहीं होती। ये सीधे जन-साधारण के हृदय से निकलते हैं और त्योहारों, खेती के अवसरों व पारिवारिक उत्सवों पर स्वाभाविक रूप से गाए जाते हैं।

सामूहिकता का आनंद: इनके रचयिता अधिकतर गाँव के ही आम लोग होते हैं। इन्हें किसी एक व्यक्ति के बजाय पूरे समूह द्वारा, विशेषकर स्त्रियों द्वारा, ढोलक, करताल, झांझ और एकतारे की संगत में दल बांधकर गाया जाता है।

2. भारत के प्रमुख क्षेत्रीय लोकगीत और शैलियाँ

क्षेत्र / राज्यप्रमुख लोकगीत एवं शैलियाँविशेषताएँ एवं विषय
बुंदेलखंडआल्हा (आल्हा-ऊदल के वीर काव्य)बुंदेली भाषा में रचित वीर रस के ओजस्वी गीत, जो जगनिक के आल्हा-खंड से प्रेरित हैं।
भोजपुरी अंचल (बिहार व पूर्वी उ.प्र.)बिदेसिया, सोहर, कजरी, चैता'बिदेसिया' परदेसी प्रेमी की विरह-वेदना का अत्यंत लोकप्रिय लोकगीत है; सोहर पुत्र-जन्म पर गाया जाता है।
पंजाबमाहिया, हीर-रांझा, सोहनी-महीवालपंजाबी भाषा में प्रेमी-प्रेमिकाओं की अमर गाथाएँ और भांगड़ा-गिद्दा के ताल पर थिरकते गीत।
राजस्थानढोला-मारू, पनिहारीराजस्थानी भाषा में ढोला और मारू के अमर प्रेम की दास्तानें।
बंगालबाउल और भटियालीआध्यात्मिक, नदी और माझी (नाविक) के जीवन पर आधारित हृदयस्पर्शी धुनें।
पहाड़ी अंचल (गढ़वाल, कुमाऊँ)न्यौली, चांचरीपहाड़ों की अपनी विशेष धुनें और सामूहिक नृत्य-गीत।

3. स्त्रियों की भूमिका और लोकगीतों का सामाजिक मूल्य

स्त्रियों का विशेष योगदान: भारत में लोकगीतों का एक बहुत बड़ा भाग स्त्रियों का अपना है। विवाह के मटकोड़, ज्योनार के हंसी-मजाक वाले गाली-गीत, सोहर (पुत्र-जन्म), कजरी (सावन के झूले), और बिदा के कारुणिक गीत स्त्रियाँ ही गाती हैं। महाकवि कालिदास ने भी अपने ग्रंथों में स्त्रियों के इन पारंपरिक गीतों का उल्लेख किया है।

सच्चा सांस्कृतिक दर्पण: लोकगीत हमारी मिट्टी, हमारे श्रम और हमारी अनूठी सामाजिक परंपराओं के सच्चे आईने हैं। आज आधुनिकता और सिनेमा के प्रभाव के बावजूद गाँवों में लोकगीतों की सरस धारा अनवरत बह रही है।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

लोकगीत की मौलिकता का सूत्र
सहज जन-जीवन + स्थानीय बोली + सामूहिक वाद्य (ढोलक, करताल) = सजीव लोकगीत
शास्त्रीय साधना के बिना जन-जन का संगीत।
शास्त्रीय बनाम लोक-संगीत द्वंद्व
शास्त्रीय (नियम, राग, घराना, कठिन साधना) लोकगीत (लोच, ताजगी, सामूहिक आनंद)
डॉ. उपाध्याय का मुख्य वर्गीकरण।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
निबंध में लोकगीतों के किन पक्षों की चर्चा की गई है? संक्षेप में लिखो।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
निबंध में लोकगीतों के विभिन्न पक्षों की चर्चा की गई है: (१) लोकगीतों की परिभाषा और शास्त्रीय संगीत से उनका अंतर। (२) लोकगीतों के रचयिता और उनके सरल वाद्ययंत्र (ढोलक, झांझ, बाँसुरी)। (३) भारत के विभिन्न अंचलों के प्रसिद्ध लोकगीत (आल्हा, बिदेसिया, ढोला-मारू, हीर-रांझा, बाउल)। (४) लोकगीतों में स्त्रियों की महत्ता और उनके द्वारा गाए जाने वाले संस्कार-गीत।
उदाहरण 2
हमारे यहाँ स्त्रियों के खास गीत कौन-कौन से हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
स्त्रियों के विशेष गीतों में शामिल हैं: (१) बच्चे के जन्म पर गाए जाने वाले 'सोहर', (२) विवाह के अवसर पर मटकोड़, ज्योनार के हंसी-मजाक वाले गीत, (३) दुल्हन की विदाई के समय गाए जाने वाले कारुणिक बिदा-गीत, (४) सावन के महीने में झूले झूलते समय गाए जाने वाले 'कजरी' गीत।
उदाहरण 3
भोजपुरी अंचल में कौन सा लोकगीत सर्वाधिक लोकप्रिय है और उसका क्या विषय है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
भोजपुरी में पिछले तीस-चालीस वर्षों में 'बिदेसिया' का प्रचार बहुत अधिक हुआ है। इसके रचयिता भिखारी ठाकुर माने जाते हैं। इन गीतों में परदेस कमाने गए पति (बिदेसिया) के प्रति गाँव में छूटी विरहिणी पत्नी की मार्मिक विरह-वेदना और करुणा का चित्रण होता है।
उदाहरण 4
बुंदेलखंड के प्रसिद्ध लोकगीत "आल्हा" की क्या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
आल्हा बुंदेलखंड का प्रसिद्ध वीर रस प्रधान लोकगीत है। इसकी शुरुआत चंदेल राजा परमार्दिदेव के राजकवि जगनिक द्वारा रचित महाकाव्य से मानी जाती है, जिसमें महोबा के दो वीर भाइयों—आल्हा और ऊदल—की अदम्य वीरता और युद्धों का ओजस्वी वर्णन है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि लोकगीत केवल अनपढ़ और पिछड़े लोगों का ही संगीत है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

लोकगीत किसी राष्ट्र की समृद्धतम सांस्कृतिक धरोहर होते हैं, जिनकी धुनें और भाव इतने सशक्त होते हैं कि बड़े-बड़े संगीतकार भी इनसे प्रेरणा लेते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

लोकगीत के लिए शास्त्रीय संगीत की तरह सख्त रियाज जरूरी मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

लोकगीत अपनी ताजगी और स्वाभाविक लोच पर आधारित होते हैं; इनके लिए किसी औपचारिक घराने की साधना नहीं चाहिए।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

भारत के प्रमुख क्षेत्रीय लोकगीत

डॉ. भगवतशरण उपाध्याय का सांस्कृतिक मानचित्र

बुंदेलखंड

आल्हा (वीर रस के वीर आल्हा-ऊदल के गीत)।

भोजपुरी

बिदेसिया (विरह), सोहर (जन्म), कजरी (सावन)।

पंजाब & राजस्थान

माहिया, हीर-रांझा एवं ढोला-मारू के प्रेम गीत।

बंगाल

बाउल और भटियाली (नाविकों के आध्यात्मिक गीत)।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1

डॉ. भगवतशरण उपाध्याय का निबंध "लोकगीत" भारत की लोक-साधना और जन-संस्कृति का सजीव दस्तावेज है। लोकगीत कड़े शास्त्रीय नियमों से मुक्त होकर जनसाधारण के हृदय से सहज रूप से फूटते हैं। बुंदेलखंड का आल्हा, भोजपुरी का बिदेसिया और कजरी, पंजाब का हीर-रांझा और बंगाल के बाउल-भटियाली जैसे गीत हमारी विविध संस्कृतियों की एकता के प्रतीक हैं। ढोलक की थाप पर गाए जाने वाले ये गीत सामाजिक जीवन की सच्ची मिठास संजोए हुए हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
लोकगीतों को "सीधे जनता का संगीत" क्यों कहा गया है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि इन्हें जनता स्वयं अपने दैनिक जीवन, श्रम, सुख-दुख और स्थानीय बोलियों में बिना किसी शास्त्रीय तामझाम के गाती है।
लोकगीत और जन-साधारण के आत्मीय संबंध पर विचार करें।
2
आल्हा गायन की भाषा और शैली की क्या मुख्य विशेषता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: यह बुंदेली मिश्रित भाषा में ढोलक पर अत्यंत ओजस्वी, जोशीले और वीर रसपूर्ण स्वर में गाया जाता है।
आल्हा के वीर रस और प्रभाव को याद करें।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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