जनता का संगीत: लोकगीत अपनी लोच (लचीलापन), ताजगी और लोकप्रियता में शास्त्रीय संगीत से बिल्कुल भिन्न होते हैं। लोकगीतों के लिए किसी लंबी साधना या संगीत की कठिन शिक्षा की आवश्यकता नहीं होती। ये सीधे जन-साधारण के हृदय से निकलते हैं और त्योहारों, खेती के अवसरों व पारिवारिक उत्सवों पर स्वाभाविक रूप से गाए जाते हैं।
सामूहिकता का आनंद: इनके रचयिता अधिकतर गाँव के ही आम लोग होते हैं। इन्हें किसी एक व्यक्ति के बजाय पूरे समूह द्वारा, विशेषकर स्त्रियों द्वारा, ढोलक, करताल, झांझ और एकतारे की संगत में दल बांधकर गाया जाता है।