प्रथम पद (संतोषी स्वभाव):
"वह चिड़िया जो—चोंच मार कर / दूध भरे जुंडी के दाने / रुचि से, रस से खा लेती है / वह छोटी संतोषी चिड़िया / नीले पंखों वाली मैं हूँ / मुझे अन्न से बहुत प्यार है।"
भावार्थ: कवि कहते हैं कि वह छोटी चिड़िया जिसके पंख नीले और सुंदर हैं, अपनी नन्हीं चोंच से बालियों में लगे कच्चे, दूधिया ज्वार (जुंडी) के दानों को बड़े स्वाद और आनंद से खाती है। वह थोड़े से भोजन में ही पूर्ण तृप्त और संतुष्ट रहती है। उसे भोजन (अन्न) के प्रति अगाध आदर और प्रेम है। इसके माध्यम से कवि मनुष्य को कम संसाधनों में भी संतुष्ट रहने की प्रेरणा देते हैं।
द्वितीय पद (एकांत-प्रियता व प्रकृति-प्रेम):
"वह चिड़िया जो—कंठ खोल कर / बूढ़े वन-बाबा की खातिर / रस उँडेल कर गा लेती है / वह छोटी मुँह बोली चिड़िया / नीले पंखों वाली मैं हूँ / मुझे विजन से बहुत प्यार है।"
भावार्थ: चिड़िया पुराने और घने वन (बूढ़े वन-बाबा) को अपना आत्मीय मानकर खुले गले से अत्यंत सुरीले स्वर में गाती है। उसके गायन में बनावटीपन नहीं, अपितु आत्मीयता का रस घुला है। उसे एकांत (विजन) से गहरा प्रेम है, जहाँ वह स्वतंत्र होकर अपनी स्वाभाविक मस्ती में जीती है।
तृतीय पद (अदम्य साहस व स्वाभिमान):
"वह चिड़िया जो—चोंच मार कर / चढ़ी नदी का दिल टटोल कर / जल का मोती ले जाती है / वह छोटी गर्वीली चिड़िया / नीले पंखों वाली मैं हूँ / मुझे नदी से बहुत प्यार है।"
भावार्थ: चिड़िया कायर नहीं है। जब नदी वर्षा के जल से उफन रही होती है (चढ़ी नदी), तब वह भयभीत होकर भागती नहीं, बल्कि अदम्य साहस दिखाते हुए नदी के गहरे जल में गोता लगाकर अपनी चोंच में जल रूपी अनमोल मोती भरकर ले उड़ती है। उसे अपने इस साहसी कृत्य पर गर्व है। वह नदी से गहरा प्रेम करती है।