गुरुकुल में पारंगत: चारों राजकुमारों ने अल्पायु में ही वेदों, शास्त्रों, नीति और धनुर्विद्या में अद्वितीय निपुणता प्राप्त कर ली। राम चारों में सबसे ज्येष्ठ, शांत, गंभीर, आज्ञाकारी और सर्वप्रिय थे।
विश्वामित्र की कठिन मांग: जब राम लगभग सोलह वर्ष के हुए, तब एक दिन महातपस्वी महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ के दरबार में पधारे। दशरथ ने उनका पाद्य-अर्घ्य से सत्कार किया और कहा कि "मुनिवर! आज्ञा दीजिए, मैं आपका क्या कार्य सिद्ध कर सकता हूँ?"
तब विश्वामित्र ने कहा: "राजन! मैं अपने सिद्धाश्रम में एक पवित्र महायज्ञ कर रहा हूँ। किंतु दो मायावी राक्षस—मारीच और सुबाहु—उसमें रक्त और मांस फेंककर यज्ञ को अपवित्र कर देते हैं। उन राक्षसों का संहार केवल आपका ज्येष्ठ पुत्र राम ही कर सकता है। अतः मुझे अपने पुत्र राम को दस दिनों के लिए सौंप दीजिए!"
यह सुनकर राजा दशरथ पर मानो बिजली गिर पड़ी। वे मूर्छित हो गए। होश आने पर उन्होंने रोते हुए कहा कि राम अभी अबोध बालक है, मैं स्वयं अपनी चतुरंगिणी सेना लेकर राक्षसों से लड़ूँगा, पर राम को नहीं दूँगा। तब कुलगुरु वशिष्ठ ने दशरथ को समझाया कि विश्वामित्र सिद्ध पुरुष हैं, राम उनके सानिध्य में पूर्णतः सुरक्षित रहेंगे और उनका भविष्य उज्ज्वल होगा। अंततः दशरथ ने भारी मन से राम और लक्ष्मण दोनों को विश्वामित्र के साथ विदा कर दिया।