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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 6 • Hindi (भाषा मंजरी-6) • अध्याय 2
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

बचपन (संस्मरण)

हिंदी साहित्य की वरिष्ठ लेखिका कृष्णा सोबती द्वारा रचित "बचपन" एक अत्यंत रोचक और आत्मीय संस्मरण है। इसमें लेखिका ने बीसवीं शताब्दी के अपने बचपन के दिनों (शिमला और दिल्ली के परिवेश) और आज के समय के बाल-जीवन के अंतर को बड़े ही सजीव ढंग से उकेरा है। रंग-बिरंगे पहनावे, शनिवार को कैस्टर ऑयल पीने की मजबूरी, शिमला मॉल की सैर, ब्राउन ब्रेड, ग्रामोफोन का दौर, चश्मे का लगना और भाई-बहनों की छेड़छाड़—यह संस्मरण बदलते दौर की सामाजिक और तकनीकी यात्रा का सजीव दस्तावेज है।

जब फ्रिज, टीवी और मोबाइल नहीं थे, तब बच्चे कैसे जीते थे?

सोचिए उस दौर की जब गाने सुनने के लिए ग्रामोफोन बजाना पड़ता था, गर्मी में शरबत के लिए फाल्से और काफल के बीज चूसे जाते थे, और हर शनिवार को कड़वा अरंडी का तेल (कैस्टर ऑयल) पीना पड़ता था! लेखिका कृष्णा सोबती के बचपन के इस जादुई सफर में कदम रखिए!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

हिंदी साहित्य की वरिष्ठ लेखिका कृष्णा सोबती द्वारा रचित "बचपन" एक अत्यंत रोचक और आत्मीय संस्मरण है। इसमें लेखिका ने बीसवीं शताब्दी के अपने बचपन के दिनों (शिमला और दिल्ली के परिवेश) और आज के समय के बाल-जीवन के अंतर को बड़े ही सजीव ढंग से उकेरा है। रंग-बिरंगे पहनावे, शनिवार को कैस्टर ऑयल पीने की मजबूरी, शिमला मॉल की सैर, ब्राउन ब्रेड, ग्रामोफोन का दौर, चश्मे का लगना और भाई-बहनों की छेड़छाड़—यह संस्मरण बदलते दौर की सामाजिक और तकनीकी यात्रा का सजीव दस्तावेज है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • संस्मरण विधा का सामान्य ज्ञान
  • बीते समय और आधुनिक परिवेश के तुलनात्मक अंतर की समझ

इस अध्याय के लक्ष्य

  • संस्मरण विधा की विशेषताओं और लेखिका की सहज, आत्मीय भाषा शैली को समझना।
  • बीसवीं सदी के उत्तरार्ध और आज के खान-पान, पहनावे और मनोरंजन के साधनों की तुलना करना।
  • बालपन में स्वास्थ्य, चश्मा लगने के अनुभव और पारिवारिक अनुशासन के महत्व को जानना।
  • शिमला, मॉल रोड, रीज और कालका ट्रेन मॉडल के ऐतिहासिक संदर्भों से परिचित होना।
  • भाषा ज्ञान: अंग्रेजी शब्दों का हिंदी में स्वाभाविक प्रयोग (चेस्टनट, पेस्ट्री, कन्फेक्शनरी, कैस्टर ऑयल)।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. पहनावे और रुचियों में ऐतिहासिक ब...
2 2. खान-पान और मनोरंजन की दुनिया
3 3. चश्मा लगना और चचेरे भाई की छेड़ख...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. पहनावे और रुचियों में ऐतिहासिक बदलाव

उम्र का पड़ाव: लेखिका कहती हैं कि अब वे पिछली शताब्दी में पैदा हुई थीं और अब वे स्वयं को दादी या नानी की उम्र का महसूस करती हैं। उम्र बढ़ने के साथ उनके पहनावे में गहरा बदलाव आया है—बचपन में जहाँ वे फ्रॉक, निक्कर-वॉकर, गरारे और गहरे चटकीले रंगों (नीले, जामुनी, काले) के कपड़े पहनती थीं, वहीं अब वे हल्के, सफेद और सादे वस्त्र पहनना पसंद करती हैं।

शनिवार का कड़वा नियम: हर शनिवार की सुबह घर के सभी बच्चों को कैस्टर ऑयल (अरंडी का तेल) या ऑलिव ऑयल (जैतून का तेल) पीना अनिवार्य था। उस तेल की गंध से ही लेखिका का जी मिचलाने लगता था। उनका मानना है कि यदि वह कड़वी खुराक न भी पी जाती, तो सेहत पर कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता!

2. खान-पान और मनोरंजन की दुनिया

क्षेत्रलेखिका के बचपन का समयआज का आधुनिक समय
मनोरंजन के साधनकुछ ही घरों में ग्रामोफोन थे; रेडियो और टेलीविजन नहीं थे।स्मार्टफोन, इंटरनेट, टीवी, कंप्यूटर और वीडियो गेम्स।
मिष्ठान्न व नमकीनकुल्फी, कचौड़ी-समोसा, शहतूत, फाल्से और खसखस का शरबत।आइसक्रीम, पेटीज, बर्गर, पिज़्ज़ा और शीतल पेय (कोला)।
फल व स्नैक्सकाफल (खट्टे-मीठे पहाड़ी फल), आग पर भुने हुए चेस्टनट।पैकेटबंद चिप्स, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ।

शिमला मॉल और रीज: लेखिका का बचपन शिमला में बीता। शाम को मॉल रोड की रौनक, रिज पर घूमना, स्कैंडल प्वाइंट, क्राइस्ट चर्च की घंटियों की गूंज और सूर्यास्त का दृश्य मनमोहक होता था। दुकान के शो-रूम में शिमला-कालका ट्रेन का सुंदर मॉडल बना हुआ था।

3. चश्मा लगना और चचेरे भाई की छेड़खानी

चश्मा लगने का कारण: लेखिका दिन की कुदरती रोशनी में पढ़ने के बजाय रात को टेबल लैंप की धीमी रोशनी में पढ़ती थीं। इससे उनकी आँखों पर अत्यधिक तनाव पड़ा और छोटी उम्र में ही उन्हें ऐनक (चश्मा) लगाना पड़ा।

भाई की छेड़छाड़: जब उन्होंने पहली बार चश्मा लगाया, तो उनके चेहरे का रूप देखकर उनके चचेरे भाई उन्हें खूब चिढ़ाते थे:

"सर पर चश्मा लगाया ताकि सूझे दूर की, / यह नहीं लड़की को मालूम सूरत बनी लंगूर की!"

शुरुआत में लेखिका को यह सुनकर बहुत बुरा लगा और वे खीझ उठीं, लेकिन धीरे-धीरे आईने के सामने चश्मा लगाकर देखने पर उन्हें इसकी आदत हो गई और आज चश्मा उनके चेहरे का अभिन्न अंग बन चुका है।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

संस्मरण विधा की संरचना
स्मृति (बचपन) + व्यक्तिपरक अनुभूति + युग-बोध (ऐतिहासिक तुलना) = सजीव संस्मरण
कृष्णा सोबती के संस्मरण की मूल साहित्यिक शैली।
नेत्र-स्वास्थ्य नियम
धीमी टेबल-लैंप रोशनी में पठन ⇒ आँखों पर तनाव (मायोपिया) → अल्पायु में चश्मा
लेखिका के चश्मा लगने का मुख्य कारण।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
लेखिका बचपन में इतवार की सुबह क्या-क्या काम करती थीं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
इतवार (रविवार) की सुबह लेखिका और उनके भाई-बहन अपने मोज़े स्वयं धोते थे, क्योंकि नौकरों को मोज़े धोने की सख्त मनाही थी। मोज़े धोने और सुखाने के बाद वे अपने-अपने जूतों पर पॉलिश करके उन्हें कपड़े या ब्रश से चमकाते थे।
उदाहरण 2
"तुम्हें बताऊँगी कि हमारे समय और तुम्हारे समय में कितनी दूरी हो चुकी है"—इस बात के लिए लेखिका क्या-क्या उदाहरण देती हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
लेखिका कई उदाहरण देती हैं: (१) उस समय मनोरंजन के लिए गिने-चुने घरों में ग्रामोफोन थे, रेडियो और टीवी नहीं थे। (२) समोसा और कचौड़ी अब पेटीज में बदल गए हैं। (३) कुल्फी आइसक्रीम बन गई है। (४) शहतूत, फाल्से और खसखस के ताजे शरबतों की जगह अब कोक और पेप्सी ने ले ली है।
उदाहरण 3
पाठ से पता करके लिखो कि लेखिका के चश्मा लगाने पर उनके चचेरे भाई उन्हें क्यों चिढ़ाते थे?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
कम उम्र में चश्मा लगाने के कारण लेखिका का चेहरा कुछ अजीब लग रहा था। उनके चचेरे भाई उनके नए रूप का मज़ाक उड़ाते हुए उन्हें चिढ़ाते थे कि "सर पर चश्मा लगाया ताकि सूझे दूर की, यह नहीं लड़की को मालूम सूरत बनी लंगूर की!"
उदाहरण 4
लेखिका अपने बचपन में कौन-कौन सी चीज़ें मज़ा ले-लेकर खाती थीं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
लेखिका शिमला के खट्टे-मीठे 'काफल', रसभरी, चेस्टनट (जिन्हें आग पर भूनकर छिलका उतारकर खाया जाता था), चने-जोर-गरम की पुड़िया, अनारदाने का चूर्ण, तथा ब्राउन ब्रेड और चॉकलेट-पेस्ट्री बड़े मजे से खाती थीं।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि लेखिका को जन्म से ही आँखों की बीमारी थी।

सही वैज्ञानिक तथ्य

लेखिका की आँखों में कमजोरी दिन की रोशनी छोड़कर रात में टेबल लैंप की मंद रोशनी में पढ़ने के कारण आई थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सोचना कि लेखिका के बचपन में सभी घरों में टेलीविजन थे।

सही वैज्ञानिक तथ्य

उस युग में टीवी तो दूर, अधिकांश घरों में रेडियो भी नहीं था; केवल कुछ संपन्न घरों में ग्रामोफोन होता था।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

कृष्णा सोबती का बचपन: तब बनाम अब

संस्कृति, स्वाद और तकनीक का युगीन परिवर्तन

बीसवीं सदी का बचपन

ग्रामोफोन, शहतूत-फाल्से, भुने चेस्टनट, कड़वा कैस्टर ऑयल, लैंप की रोशनी और हाथ से मोज़े धोना।

इक्कीसवीं सदी का बचपन

स्मार्टफोन, टीवी, बर्गर-पिज़्ज़ा, सॉफ्ट ड्रिंक्स, एलईडी लाइट्स और स्वचालित घरेलू उपकरण।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1

कृष्णा सोबती का संस्मरण "बचपन" पिछली शताब्दी के बाल-जीवन और शिमला के प्राकृतिक-सामाजिक वातावरण की मनमोहक झलक प्रस्तुत करता है। लेखिका अपने रंग-बिरंगे कपड़ों, शनिवार को कैस्टर ऑयल पीने के कष्ट, मोज़े धोने के पारिवारिक अनुशासन, और उस दौर के खान-पान (काफल, शहतूत शरबत, भुने चेस्टनट) का वर्णन करती हैं। रात में टेबल लैंप में पढ़ने से उन्हें चश्मा लगा, जिस पर भाई ने उन्हें लंगूर कहकर चिढ़ाया। यह पाठ पुरानी और नई पीढ़ी के जीवन-शैलियों का सुंदर तुलनात्मक चित्र है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
लेखिका ने चश्मा लगने के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: स्वयं अपनी गलत आदत को, क्योंकि वे दिन के प्राकृतिक उजाले में न पढ़कर रात में मंद लैंप के नीचे पढ़ती थीं।
डॉक्टर और लेखिका के आत्ममंथन पर ध्यान दें।
2
चने जोर-गरम की पुड़िया की क्या विशेषता थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: वह नीचे से तिरछी लपेटते हुए ऊपर से इतनी चौड़ी बनाई जाती थी कि हाथ आसानी से चनों तक पहुँच सके, और उसका स्वाद तीखा व चटपटा होता था।
कागज़ की उस पुरानी पुड़िया के आकार को याद करें।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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अध्याय 1: वह चिड़िया जो (कविता) अध्याय 2: बचपन (संस्मरण) अध्याय 3: नादान दोस्त (कहानी) अध्याय 4: चाँद से थोड़ी सी गप्पें (कविता) अध्याय 5: अक्षरों का महत्व (निबंध) अध्याय 6: पार नज़र के (कहानी) अध्याय 7: साथी हाथ बढ़ाना (गीत) अध्याय 8: ऐसे-ऐसे (एकांकी) अध्याय 9: टिकट अलबम (कहानी) अध्याय 10: झाँसी की रानी (कविता) अध्याय 11: जो देखकर भी नहीं देखते (निबंध) अध्याय 12: संसार पुस्तक है (पत्र) अध्याय 13: मैं सबसे छोटी होऊँ (कविता) अध्याय 14: लोकगीत (निबंध) अध्याय 15: नौकर (निबंध) अध्याय 16: वन के मार्ग में (कविता) अध्याय 17: साँस-साँस में बाँस (निबंध) अध्याय 18: बाल रामकथा: अवधपुरी में राम अध्याय 19: बाल रामकथा: जंगल और जनकपुर अध्याय 20: बाल रामकथा: दो वरदान व राम का वन-गमन

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