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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 6 • Hindi (भाषा मंजरी-6) • अध्याय 16
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

वन के मार्ग में (कविता)

भक्तिकाल के शिरोमणि कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 'कवितावली' (अयोध्याकांड) से लिए गए ये दो सवैये "वन के मार्ग में" अत्यंत मार्मिक, भक्तिमय और वात्सल्य-शृंगार से परिपूर्ण हैं। श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जब अयोध्या से वनवास के लिए निकलते हैं, तो राजमहलों के कोमल सुखों में पली राजकुमारी सीताजी को वन के बीहड़, कंकरीले और तपीले रास्तों पर पैदल चलना पड़ता है। पहले सवैये में सीताजी की सुकोमलता, उनकी थकावट और व्याकुलता का सजीव चित्र है, जबकि दूसरे सवैये में पत्नी की थकावट देखकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के अगाध प्रेम और उनकी आँखों से छलकते आंसुओं का हृदयद्रावक चित्रण है।

दो ही कदम चलते ही जिनके माथे पर पसीना छलक आया!

राजमहलों के मखमली बिस्तरों पर सोने वाली जानकी जब काँटों भरी वन की पगडंडियों पर निकलीं, तो दो कदम चलते ही उनके होंठ सूख गए! लेकिन जब उन्होंने पति राम से पूछा—"पर्णकुटी कहाँ बनाओगे?", तो प्रभु राम की आँखों में आँसू क्यों उमड़ पड़े? पढ़िए तुलसीदास के अमर सवैये!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

भक्तिकाल के शिरोमणि कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 'कवितावली' (अयोध्याकांड) से लिए गए ये दो सवैये "वन के मार्ग में" अत्यंत मार्मिक, भक्तिमय और वात्सल्य-शृंगार से परिपूर्ण हैं। श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जब अयोध्या से वनवास के लिए निकलते हैं, तो राजमहलों के कोमल सुखों में पली राजकुमारी सीताजी को वन के बीहड़, कंकरीले और तपीले रास्तों पर पैदल चलना पड़ता है। पहले सवैये में सीताजी की सुकोमलता, उनकी थकावट और व्याकुलता का सजीव चित्र है, जबकि दूसरे सवैये में पत्नी की थकावट देखकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के अगाध प्रेम और उनकी आँखों से छलकते आंसुओं का हृदयद्रावक चित्रण है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • रामायण के वनवास प्रसंग की सामान्य जानकारी
  • अवधी / ब्रज भाषा मिश्रित सवैया छंद की समझ

इस अध्याय के लक्ष्य

  • तुलसीदास के सवैया छंदों का लयबद्ध, सस्वर और भावपूर्ण पाठ करना।
  • सीताजी की शारीरिक सुकोमलता और उनके अगाध पति-प्रेम को समझना।
  • श्रीराम के हृदय में पत्नी के प्रति सम्मान, संवेदनशीलता और करुणा का रसास्वादन करना।
  • लक्ष्मण के प्रति स्नेह और भाईचारे के प्रसंग को जानना।
  • काव्य-शिल्प: सवैया छंद, अनुप्रास अलंकार, ब्रजभाषा का माधुर्य और शब्दार्थ (धरि धीर, पुट, कनी, कुटी)।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. प्रथम सवैया: सीताजी की सुकोमलता...
2 2. द्वितीय सवैया: लक्ष्मण का जल लान...
3 3. काव्य-सौंदर्य एवं भाषा-शिल्प

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. प्रथम सवैया: सीताजी की सुकोमलता और वन-मार्ग की व्याकुलता

"पुर तें निकसी रघुबीर-बधू, धरि धीर दए मग में डग द्वै। / झलकीं भरि भाल कनी जल की, पुट सूखि गए मधुराधर वै। / फिरि बूझति हैं, 'चलनो अब केतिक, पर्नकुटी करिहौ कित ह्वै?' / तिय की लखि आतुरता पिय की अँखियाँ अति चारु चलीं जल च्वै।"

विस्तृत भावार्थ: जैसे ही श्री रामचंद्र जी की वधू (सीताजी) अयोध्या नगरी से बाहर वन के मार्ग पर निकलीं और बड़े धैर्य के साथ अभी केवल दो ही कदम (डग द्वै) आगे बढ़ी थीं, कि महलों में पली सुकुमारी सीताजी के सुंदर माथे (भाल) पर पसीने की बूँदें (जल की कनी) छलक आईं। उनके दोनों कोमल और मधुर होंठ (मधुराधर) प्यास और थकावट से सूख गए। वे व्याकुल होकर श्रीराम से पूछने लगीं—"हे नाथ! अभी और कितना पैदल चलना है? और आप घास-पत्तों की झोपड़ी (पर्णकुटी) कहाँ बनाएँगे?" अपनी कोमल पत्नी (तिय) की ऐसी व्याकुलता और थकान देखकर प्रियतम श्रीराम की अत्यंत सुंदर आँखों से प्रेमाश्रुओं की अविरल धारा बहने लगी (अँखियाँ अति चारु चलीं जल च्वै)।

2. द्वितीय सवैया: लक्ष्मण का जल लाना और राम का अनन्य प्रेम

"'जल को गए लक्खन, हैं लरिका परखो, पिय! घाम घरीक ह्वै ठाढ़े। / पोंछि पसेउ बयारि करौं, अरु पाँय पखारिहौं भूभुरि-डाढ़े।' / तुलसी रघुबीर प्रिया-श्रम जानि कै, बैठि बिलंब लौं कंटक काढ़े। / जानकी नाह को नेहु लख्यो, पुलक्यौ तनु, बारि बिलोचन बाढ़े।"

विस्तृत भावार्थ: सीताजी श्रीराम से कहती हैं कि देवर लक्ष्मण अभी बालक हैं और वे पानी लेने गए हैं; अतः हे प्रियतम! किसी वृक्ष की छाया में थोड़ी देर (घरीक) खड़े होकर उनकी प्रतीक्षा कर लीजिए। तब तक मैं आपका पसीना पोंछकर हवा कर देती हूँ और गर्म रेत व धूप से तपे हुए (भूभुरि-डाढ़े) आपके चरणों को धो देती हूँ।

महाकवि तुलसीदास कहते हैं कि श्रीराम अपनी पत्नी (प्रिया) को अत्यधिक थकी हुई जानकर, उन्हें विश्राम देने के उद्देश्य से, जानबूझकर देर तक बैठकर सीताजी के पैरों से काँटे निकालने का अभिनय करते रहे। जब जानकी (सीताजी) ने अपने स्वामी (नाह) के इस अगाध, निश्छल प्रेम (नेहु) को देखा, तो उनका संपूर्ण शरीर रोमांच से पुलकित हो उठा और उनके भी दोनों नयनों (नेत्रों) में प्रेम के आँसू उमड़ पड़े।

3. काव्य-सौंदर्य एवं भाषा-शिल्प

  • भाषा: ब्रजभाषा की मधुर, सरस और कोमलकांत पदावली।
  • छंद: शास्त्रीय सवैया छंद, जिसमें 22 से 26 वर्ण होते हैं और जो अत्यंत गेय होता है।
  • रस: शृंगार रस (संयोग व करुण की छाया) और दांपत्य प्रेम की पवित्र पराकाष्ठा।
  • अलंकार: "पुट सूखि गए मधुराधर वै", "कंटक काढ़े", "बारि बिलोचन बाढ़े" में अनुप्रास अलंकार का मनोहारी प्रयोग।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

तुलसीदास का दांपत्य प्रेम सूत्र
सीता की थकावट (व्याकुलता) →{सहानुभूति} राम के नयनों में अश्रु + काँटे निकालने का विलंब
भारतीय आदर्श दांपत्य की सर्वोच्च अभिव्यक्ति।
सवैया छंद लक्षण
4 चरण, 22-26 वर्ण, ब्रजभाषा, गेय व संगीतात्मक
कवितावली के सवैये का छंद-विधान।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
नगर से बाहर निकलकर दो पग चलने के बाद सीताजी की क्या दशा हुई?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
नगर (अयोध्या) से बाहर निकलकर दो कदम चलने के बाद सुकुमारी सीताजी बुरी तरह थक गईं। उनके सुंदर माथे पर पसीने की बूँदें छलक आईं, उनके दोनों कोमल होंठ सूख गए और वे अत्यंत व्याकुल होकर श्रीराम से पूछने लगीं कि अभी और कितना चलना है और पर्णकुटी कहाँ बनेगी।
उदाहरण 2
सीता की आतुरता देखकर राम की क्या दशा हुई?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
राजमहलों के सुखों में पली अपनी अत्यंत सुकोमल पत्नी सीताजी को वन के कंकरीले मार्ग पर पसीने से तर-बतर और प्यास से व्याकुल देखकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का हृदय करुणा से भर गया और उनकी सुंदर आँखों से आँसू बहने लगे।
उदाहरण 3
राम ने थकी हुई सीता को देखकर क्या किया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
श्रीराम समझ गए कि सीताजी अत्यधिक थक चुकी हैं और उन्हें विश्राम की आवश्यकता है। इसलिए उन्होंने सीताजी को अधिक समय तक आराम देने के उद्देश्य से एक वृक्ष की छांव में बैठकर बड़ी देर तक उनके पैरों में चुभे काँटे निकालने का जतन किया।
उदाहरण 4
सीताजी ने लक्ष्मण की प्रतीक्षा करने के लिए क्या युक्ति सुझाई?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
सीताजी ने कहा कि लक्ष्मण पानी लेने गए हैं और वे अभी बालक हैं, अतः किसी घने पेड़ की छांव में थोड़ी देर खड़े होकर उनकी प्रतीक्षा कर ली जाए। तब तक वे श्रीराम का पसीना पोंछकर हवा कर देंगी और गर्म बालू से तपे उनके पैरों को धो देंगी।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि यह प्रसंग रामचरितमानस के चौपाई-दोहा छंद का है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह प्रसंग तुलसीदास जी के मुक्तक काव्य 'कवितावली' के अयोध्याकांड से लिया गया सवैया छंद है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

"भूभुरि" शब्द का अर्थ कोई जानवर समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

"भूभुरि" का अर्थ धूप से तपी हुई गर्म रेत या गर्म धूल होता है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

तुलसीदास के सवैयों में दांपत्य प्रेम का चरमोत्कर्ष

कवितावली (अयोध्याकांड) का भाव-साम्य

प्रथम सवैया: सीताजी की सुकोमलता

माथे पर पसीना, होंठ सूखना और राम का रो पड़ना।

द्वितीय सवैया: श्रीराम का निश्छल प्रेम

सीता को विश्राम देने हेतु देर तक पैर से काँटा निकालना।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1

गोस्वामी तुलसीदास कृत "वन के मार्ग में" (कवितावली) में वनवास के समय माता सीता की सुकोमलता और श्रीराम के निश्छल दांपत्य प्रेम का अमर चित्रण है। अयोध्या से निकलते ही दो कदम चलकर सीताजी के माथे पर पसीना आ जाता है और होंठ सूख जाते हैं। उनकी दशा देखकर श्रीराम रो पड़ते हैं। दूसरे सवैये में सीताजी लक्ष्मण की प्रतीक्षा का अनुरोध करती हैं और श्रीराम उन्हें विश्राम देने के लिए देर तक उनके पैरों से काँटे निकालते हैं। यह प्रसंग मानवीय संवेदना और भारतीय मर्यादा का अनुपम शिखर है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
सीताजी द्वारा लक्ष्मण को 'लरिका' (बालक) कहना उनके किस स्वभाव को प्रकट करता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: सीताजी का अपने देवर लक्ष्मण के प्रति वात्सल्यपूर्ण, स्नेही और मातृत्व तुल्य आत्मीय भाव।
पारिवारिक रिश्तों के प्रेम पर ध्यान दें।
2
श्रीराम द्वारा देर तक काँटे निकालना उनके चरित्र की किस महानता को दर्शाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पत्नी के प्रति अपार संवेदनशीलता, सम्मान, आत्मीय चिंता और उन्हें बिना संकोच के विश्राम देने की चतुराई।
प्रिया-श्रम जानि कै... पंक्ति का विश्लेषण करें।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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