"पुर तें निकसी रघुबीर-बधू, धरि धीर दए मग में डग द्वै। / झलकीं भरि भाल कनी जल की, पुट सूखि गए मधुराधर वै। / फिरि बूझति हैं, 'चलनो अब केतिक, पर्नकुटी करिहौ कित ह्वै?' / तिय की लखि आतुरता पिय की अँखियाँ अति चारु चलीं जल च्वै।"
विस्तृत भावार्थ: जैसे ही श्री रामचंद्र जी की वधू (सीताजी) अयोध्या नगरी से बाहर वन के मार्ग पर निकलीं और बड़े धैर्य के साथ अभी केवल दो ही कदम (डग द्वै) आगे बढ़ी थीं, कि महलों में पली सुकुमारी सीताजी के सुंदर माथे (भाल) पर पसीने की बूँदें (जल की कनी) छलक आईं। उनके दोनों कोमल और मधुर होंठ (मधुराधर) प्यास और थकावट से सूख गए। वे व्याकुल होकर श्रीराम से पूछने लगीं—"हे नाथ! अभी और कितना पैदल चलना है? और आप घास-पत्तों की झोपड़ी (पर्णकुटी) कहाँ बनाएँगे?" अपनी कोमल पत्नी (तिय) की ऐसी व्याकुलता और थकान देखकर प्रियतम श्रीराम की अत्यंत सुंदर आँखों से प्रेमाश्रुओं की अविरल धारा बहने लगी (अँखियाँ अति चारु चलीं जल च्वै)।