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WBB • कक्षा XI • Political Science • अध्याय 7
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

राजनीतिक सिद्धांत की मूल अवधारणाएं

राजनीतिक सिद्धांत राजनीति विज्ञान की दार्शनिक एवं सैद्धांतिक रीढ़ है, जो मानव समाज, राज्य की संप्रभु सत्ता तथा न्यायपूर्ण शासन व्यवस्था की मूलभूत अवधारणाओं का तर्कसंगत और व्यवस्थित विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस अध्याय में राजनीतिक सिद्धांत के पांच प्रमुख स्तंभों—विधि (कानून), स्वतंत्रता, समानता, न्याय तथा अधिकारों के साथ-साथ नागरिक कर्तव्यों के जैविक अंतर्संबंधों का सांगोपांग विवेचन किया गया है। ये अवधारणाएं पृथक-पृथक अमूर्त विचार नहीं हैं, अपितु एक सुदृढ़ अंतर्संबंधित ताना-बाना निर्मित करती हैं। विधि राज्य के प्रामाणिक अनुशासन का ढांचा स्थापित करती है; स्वतंत्रता मानव व्यक्तित्व के चहुंमुखी विकास का अनिवार्य उन्मुक्त वातावरण प्रदान करती है; समानता यह सुनिश्चित करती है कि सामाजिक अवसर और गरिमा कुछ विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों की बपौती न बनें; न्याय समाज के प्रतिस्पर्धी दावों के मध्य सामंजस्य साधकर एक निष्पक्ष सामाजिक संतुलन गढ़ता है; तथा अधिकार और कर्तव्य नागरिक गरिमा और सामाजिक उत्तरदायित्व को एक सूत्र में पिरोते हैं। शास्त्रीय, उदारवादी, मार्क्सवादी तथा रॉल्सियन दृष्टिकोणों के आलोक में यह पाठ्य सामग्री कक्षा 11 के विद्यार्थियों के लिए एक समग्र विश्लेषणात्मक दृष्टि प्रदान करती है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

राजनीतिक सिद्धांत की मूल अवधारणाओं का गहन अनुशीलन विद्यार्थियों को समकालीन राजनीतिक बहसों, लोक नीतियों और संवैधानिक विवादों का निष्पक्ष व आलोचनात्मक मूल्यांकन करने की बौद्धिक क्षमता प्रदान करता है। यह स्पष्ट करता है कि कानूनी मर्यादाओं के बिना स्वतंत्रता क्यों असंभव है, अनियंत्रित स्वतंत्रता किस प्रकार सामाजिक विषमता को जन्म देती है, औपचारिक कानूनी न्याय के साथ-साथ पुनर्वितरणकारी सामाजिक न्याय की आवश्यकता क्यों है, तथा आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य में मौलिक अधिकारों एवं नागरिक कर्तव्यों में संतुलन कैसे साधा जाता है। यह बोध विद्यार्थियों को एक प्रबुद्ध, सजग और उत्तरदायी लोकतांत्रिक नागरिक के रूप में विकसित करता है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. विधि (कानून) की अवधारणा: अर्थ, प...
2 2. स्वतंत्रता की अवधारणा: नकारात्मक...
3 3. समानता की अवधारणा: आयाम, रूप तथा...
4 4. न्याय की अवधारणा एवं जॉन रॉल्स क...
5 5. अधिकार की अवधारणा एवं अधिकार संब...
6 6. अधिकार और कर्तव्यों का सह-संबंध:...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. विधि (कानून) की अवधारणा: अर्थ, प्रमुख स्रोत, वर्गीकरण एवं नैतिकता से संबंध

विधि का स्वरूप एवं विधिशास्त्रीय आधार

अंग्रेजी शब्द 'Law' ट्यूटोनिक मूल शब्द 'Lag' से निकला है, जिसका अर्थ है स्थिर, समरूप या अपरिवर्तनीय। राजनीति विज्ञान एवं विधिशास्त्र में कानून का अभिप्राय राज्य की संप्रभु सत्ता द्वारा निर्मित, मान्यता प्राप्त तथा लागू किए जाने वाले उन अनिवार्य नियमों से है जो व्यक्तियों के बाह्य आचरण को नियंत्रित करते हैं:

  • जॉन ऑस्टिन (विश्लेषणात्मक विधिशास्त्र): 'कानून संप्रभु का वह आदेश है, जिसके पीछे बाध्यकारी दंड या अनुशास्ति (Sanction) का भय होता है।'
  • टी.ई. हॉलैंड: 'संप्रभु राजनीतिक सत्ता द्वारा लागू किए जाने वाले मानव के बाह्य आचरण के सामान्य नियम ही कानून हैं।'
  • वुडरो विल्सन: 'कानून स्थापित विचारों और आदतों का वह भाग है जिसे समान नियमों के रूप में औपचारिक मान्यता प्राप्त है तथा जो सरकार के अधिकार और शक्ति द्वारा समर्थित है।'
  • सालमंड: 'न्याय प्रशासन में राज्य द्वारा स्वीकृत एवं प्रयुक्त सिद्धांतों का निकाय ही कानून है।'
विधि (कानून) के छह प्रमुख स्रोत:
  1. रीति-रिवाज एवं प्रथाएं (Customs): प्राचीन समय से समाज में स्वतः विकसित वे आचरण जिन्हें कालान्तर में अदालतों द्वारा मान्यता देकर कानूनी बल प्रदान किया गया (उदा. ब्रिटिश कॉमन लॉ)।
  2. धर्म (Religion): प्राचीन व मध्यकालीन समाजों में धार्मिक संहिताएं ही नागरिक व आपराधिक कानूनों का आधार थीं (उदा. हिंदू धर्मशास्त्र, इस्लामिक शरीयत)।
  3. न्यायिक निर्णय (Judicial Precedents): उच्च न्यायालयों द्वारा दिए गए वे ऐतिहासिक निर्णय जो भविष्य के मुकदमों के लिए बाध्यकारी नजीर बन जाते हैं।
  4. विधि वेत्ताओं की टीकाएं (Scientific Commentaries): कोक, ब्लैकस्टोन, डायसी जैसे प्रख्यात न्यायविदों के ग्रंथ जो कानूनों की प्रामाणिक व्याख्या में सहायक होते हैं।
  5. साम्या या औचित्य (Equity): जहाँ संहिताबद्ध कानून मौन या कठोर हो, वहाँ न्यायाधीश अपने विवेक, निष्पक्षता और स्वाभाविक न्यायबोध के आधार पर निर्णय देते हैं।
  6. विधानमंडल / व्यवस्थापिका (Legislation): आधुनिक लोकतांत्रिक युग में जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा निर्मित विधियां कानून का सबसे प्रत्यक्ष व मुख्य स्रोत हैं।
तुलना का आधारविधि / कानून (Law)नैतिकता (Morality)
नियंत्रण का क्षेत्रकेवल व्यक्ति के बाह्य आचरण व क्रियाकलापों को नियंत्रित करता है।व्यक्ति के आंतरिक विचारों, मनोभावों, अंतरात्मा और चरित्र को नियंत्रित करती है।
प्रवर्तन शक्तिराज्य की संप्रभु शक्ति, पुलिस तथा शारीरिक दंड के प्रावधानों द्वारा लागू।अंतरात्मा की आवाज, सामाजिक प्रतिष्ठा तथा आत्म-ग्लानि द्वारा मार्गदर्शित।
निश्चितता व समरूपतासुस्पष्ट, संहिताबद्ध, लिखित तथा संपूर्ण राज्य में समान रूप से लागू।अस्पष्ट, परिवर्तनशील तथा विभिन्न समाजों व व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न।

2. स्वतंत्रता की अवधारणा: नकारात्मक बनाम सकारात्मक स्वतंत्रता तथा सुरक्षा उपाय

स्वतंत्रता का अर्थ एवं उसकी बहुआयामी प्रकृति

लैटिन भाषा के शब्द 'Liber' से अंग्रेजी के 'Liberty' शब्द की उत्पत्ति हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है बंधनों का अभाव। किंतु सभ्य नागरिक समाज में स्वतंत्रता का तात्पर्य मनमानी करने की छूट या उच्छृंखलता नहीं हो सकता, क्योंकि यदि प्रत्येक व्यक्ति मनमानी करेगा तो किसी की भी स्वतंत्रता सुरक्षित नहीं रहेगी। राजनीति विज्ञान में स्वतंत्रता का आशय उस वातावरण से है जिसमें व्यक्ति दूसरों के अधिकारों को हानि पहुँचाए बिना अपने व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कर सके।

आइज़ाया बर्लिन के स्वतंत्रता के दो आयाम (Two Concepts of Liberty, 1958):
  • नकारात्मक स्वतंत्रता (Negative Liberty - 'बंधनों का अभाव'): इसका अभिप्राय है व्यक्ति के निजी जीवन में बाहरी हस्तक्षेप या नियंत्रण का न होना। यह व्यक्ति के चारों ओर एक ऐसा सुरक्षित क्षेत्र रेखांकित करती है जिसमें राज्य कोई दखल न दे। जॉन लॉक, एडम स्मिथ, जे.एस. मिल ('ऑन लिबर्टी', 1859) तथा आधुनिक समय में रॉबर्ट नोज़िक इसके प्रबल समर्थक हैं। मिल ने 'हानि का सिद्धांत' (Harm Principle) प्रतिपादित करते हुए कहा कि राज्य केवल तभी व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप कर सकता है जब व्यक्ति का कार्य दूसरों को हानि पहुँचा रहा हो।
  • सकारात्मक स्वतंत्रता (Positive Liberty - 'सामर्थ्य की उपस्थिति'): इसका अर्थ केवल बंधनों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि आत्मविकास हेतु वास्तविक अवसरों व सामर्थ्य की उपस्थिति है। टी.एच. ग्रीन ने इसे परिभाषित करते हुए कहा कि 'यह उन कार्यों को करने या उन वस्तुओं का उपभोग करने की सकारात्मक शक्ति है जो करने या उपभोग करने योग्य हों।' हेराल्ड लास्की के अनुसार, एक अशिक्षित अथवा भुखमरी के शिकार व्यक्ति के लिए कानूनी स्वतंत्रता निरर्थक है; राज्य का दायित्व है कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य व रोजगार की अनुकूल दशाएं निर्मित करे।
स्वतंत्रता के प्रमुख संस्थागत सुरक्षा कवच:
  1. विधि का शासन (Rule of Law - डायसी): कानून के समक्ष सबकी समानता तथा मनमानी प्रशासनिक शक्तियों की समाप्ति।
  2. मौलिक अधिकारों का संवैधानिक अंकन: कार्यपालिका व विधायिका के मनमाने हस्तक्षेप से अधिकारों की सर्वोच्च रक्षा।
  3. स्वतंत्र व निष्पक्ष न्यायपालिका: न्यायिक समीक्षा तथा बंदी प्रत्यक्षीकरण जैसी रिटों (अनुच्छेद 32 व 226) द्वारा नागरिक अधिकारों की गारंटी।
  4. शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत (मॉन्टेस्क्यू): शासन के अंगों (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) में संतुलन ताकि तानाशाही न पनपे।
  5. शक्तियों का लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण: स्थानीय स्वशासन के माध्यम से सत्ता का निचले स्तर पर प्रसार।
  6. सदा सजग नागरिकता (Eternal Vigilance): नागरिकों की प्रबुद्ध चेतना; जॉन फिलपॉट करन का अमर कथन—'सदा सजग रहना ही स्वतंत्रता का वास्तविक मूल्य है'।

3. समानता की अवधारणा: आयाम, रूप तथा स्वतंत्रता से संबंध का विवाद

समानता का यथार्थ स्वरूप एवं बहुआयामी विश्लेषण

समानता का अभिप्राय पूर्णतः यांत्रिक एकरूपता या सभी व्यक्तियों के साथ हर परिस्थिति में समान व्यवहार नहीं है, क्योंकि प्रकृति ने सभी मनुष्यों को भिन्न-भिन्न क्षमताएं और रुचियां प्रदान की हैं। हेराल्ड लास्की के शब्दों में, समानता के दो मूलभूत पहलू हैं: पहला, समाज में किसी भी विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की अनुपस्थिति; और दूसरा, जाति, धर्म, लिंग या वर्ग के भेदभाव के बिना प्रत्येक नागरिक को अपने व्यक्तित्व के विकास हेतु पर्याप्त एवं समान अवसरों की सुलभता।

समानता का आयाममूल तत्व एवं संवैधानिक प्रावधान
नागरिक / कानूनी समानताविधि के समक्ष समता तथा विधियों का समान संरक्षण (भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 व 15)।
राजनीतिक समानताशासन में भागीदारी का समान अधिकार: सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार ('एक व्यक्ति, एक मत, एक मूल्य'), चुनाव लड़ने व पद धारण करने का अधिकार।
सामाजिक समानताजाति, धर्म, नस्ल या लिंग के आधार पर सामाजिक भेदभाव तथा अस्पृश्यता का पूर्ण उन्मूलन (अनुच्छेद 17); प्रत्येक व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा की सुरक्षा।
आर्थिक समानताधन के अत्यधिक संकेंद्रण पर रोक, न्यूनतम जीवन स्तर की गारंटी, काम का अधिकार तथा संसाधनों का न्यायसंगत वितरण।
स्वतंत्रता और समानता का संबंध: परस्पर विरोधी अथवा पूरक?

1. विरोधी दृष्टिकोण (लॉर्ड एक्टन एवं एलेक्सिस डी टोकेविले): लॉर्ड एक्टन ने प्रसिद्ध टिप्पणी की, 'समानता की तीव्र लालसा ने स्वतंत्रता की आशा को व्यर्थ कर दिया।' इनका तर्क था कि आर्थिक समानता स्थापित करने के लिए राज्य को संपत्ति व व्यापार पर कठोर नियंत्रण लगाना पड़ता है, जिससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता नष्ट हो जाती है।

2. पूरक दृष्टिकोण (हेराल्ड लास्की, आर.एच. टॉनी एवं रूसो): लास्की ने सिद्ध किया कि 'समानता के बिना स्वतंत्रता एक खोखली कल्पना है; स्वतंत्रता की प्राप्ति हेतु पर्याप्त समानता अनिवार्य शर्त है।' टॉनी ने व्यंग्य किया कि एक पूंजीपति और निर्धन मजदूर के बीच संविदा की स्वतंत्रता दरअसल भेड़ और भेड़िए के बीच समझौते जैसी है। आर्थिक विषमता को मिटाए बिना निर्धन के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता अर्थहीन है।

4. न्याय की अवधारणा एवं जॉन रॉल्स का न्याय सिद्धांत (Theory of Justice)

न्याय का दार्शनिक महत्व एवं रॉल्स का न्याय सिद्धांत

लैटिन भाषा के शब्द 'Jus' (जिसका अर्थ है जोड़ना या बांधना) से Justice या न्याय शब्द बना है। न्याय वह सर्वोच्च समन्वयक सिद्धांत है जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक कल्याण में संतुलन स्थापित करता है। जॉन रॉल्स ने अपनी प्रसिद्ध कृति 'ए थ्योरी ऑफ जस्टिस' (1971) में लिखा: 'जिस प्रकार चिंतन की प्रणालियों में सत्य प्रथम गुण है, उसी प्रकार सामाजिक संस्थाओं में न्याय प्रथम सद्गुण है।'

प्रक्रियात्मक न्याय बनाम वितरणात्मक (तात्विक) न्याय:
  • प्रक्रियात्मक न्याय (Procedural Justice): स्वतंत्र बाजार के समर्थक (जैसे हायक व नोज़िक) मानते हैं कि यदि प्रतियोगिता व आदान-प्रदान के कानूनी नियम निष्पक्ष हैं, तो परिणाम चाहे कितना भी विषम हो, वह न्यायसंगत है।
  • वितरणात्मक न्याय (Distributive Justice): केवल प्रक्रिया नहीं, बल्कि परिणामों की नैतिक शुद्धता भी आवश्यक है। समाज के संसाधनों, पदों और लाभों का वितरण मानवीय आवश्यकताओं व वंचितों के हितों को ध्यान में रखकर होना चाहिए।
जॉन रॉल्स का 'निष्पक्षता के रूप में न्याय' (Justice as Fairness):

रॉल्स एक काल्पनिक 'मूल स्थिति' (Original Position) तथा 'अज्ञानता के पर्दे' (Veil of Ignorance) की संकल्पना प्रस्तुत करते हैं। इस पर्दे के पीछे बैठे व्यक्तियों को समाज में अपनी वास्तविक स्थिति (जाति, वर्ग, लिंग, प्राकृतिक प्रतिभा) का कोई ज्ञान नहीं होता। अनिश्चितता से बचने हेतु वे सर्वसम्मति से न्याय के दो क्रमिक सिद्धांतों को चुनते हैं:

  1. समान मूलभूत स्वतंत्रताओं का सिद्धांत: प्रत्येक व्यक्ति को सबसे व्यापक बुनियादी स्वतंत्रताओं (विचार, अभिव्यक्ति, राजनीतिक अधिकार) का समान अधिकार प्राप्त होगा।
  2. सामाजिक एवं आर्थिक विषमताओं का सिद्धांत: आर्थिक व सामाजिक विषमताएं केवल तभी स्वीकार्य होंगी जब वे दो शर्तें पूरी करती हों:
      क) अवसरों की निष्पक्ष समानता: सभी पद और अवसर सभी के लिए खुले हों।
      ख) भेदभाव / अंतर का सिद्धांत (Difference Principle): विषमताएं केवल तभी न्यायपूर्ण मानी जाएंगी जब वे समाज के सबसे कमजोर व वंचित वर्ग को अधिकतम लाभ पहुँचाती हों।

5. अधिकार की अवधारणा एवं अधिकार संबंधी प्रमुख सिद्धांत

अधिकार का स्वरूप एवं विभिन्न सिद्धांत

अधिकार व्यक्ति की मनमानी मांगें नहीं हैं, बल्कि समाज द्वारा स्वीकृत और राज्य द्वारा संरक्षित न्यायसंगत दावे हैं। हेराल्ड जे. लास्की के अनुसार: 'अधिकार सामाजिक जीवन की वे अनिवार्य परिस्थितियां हैं जिनके बिना सामान्यतः कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का सर्वोत्तम विकास नहीं कर सकता।'

अधिकार का सिद्धांतप्रमुख प्रतिपादकमुख्य विचार एवं आलोचना
प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धांतजॉन लॉक, थॉमस पेन, रूसोजीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकार जन्मजात व राज्य की उत्पत्ति से पूर्व विद्यमान हैं। आलोचना: राज्य व समाज के बिना अधिकारों का व्यावहारिक अस्तित्व संभव नहीं है।
कानूनी अधिकारों का सिद्धांतजेरेमी बेंथम, जॉन ऑस्टिनअधिकार राज्य के सकारात्मक कानूनों की ही देन हैं। बेंथम ने प्राकृतिक अधिकारों को 'बकवास' (Nonsense upon stilts) कहा। आलोचना: राज्य के अन्यायी कानूनों के विरुद्ध नैतिक विरोध का आधार समाप्त हो जाता है।
ऐतिहासिक सिद्धांतएडमंड बर्कअधिकार सदियों के ऐतिहासिक विकास, परंपराओं व रीति-रिवाजों का परिणाम हैं। आलोचना: यह सामाजिक कुप्रथाओं को भी उचित ठहराने का जोखिम रखता है।
आदर्शवादी / नैतिक सिद्धांतइमैनुएल कांट, टी.एच. ग्रीनअधिकार मानव व्यक्तित्व के नैतिक विकास की आवश्यक शर्तें हैं। राज्य केवल नैतिक आचरण हेतु बाह्य परिस्थितियां बनाता है।
समाज कल्याणकारी सिद्धांतबेंथम, जे.एस. मिल, लास्कीअधिकारों का औचित्य इस बात पर निर्भर करता है कि वे समाज के अधिकतम कल्याण में कितना योगदान देते हैं।
मार्क्सवादी अधिकार सिद्धांतकार्ल मार्क्स, एंगेल्सपूंजीवादी समाज में अधिकार बुर्जुआ वर्ग के शोषण का साधन होते हैं। शोषणमुक्त वर्गहीन समाज में ही वास्तविक मानवाधिकार संभव हैं।

6. अधिकार और कर्तव्यों का सह-संबंध: एक जैविक संतुलन

अधिकार एवं कर्तव्यों की अंतर्संबंधित एकता

अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। कर्तव्यहीन अधिकार समाज में अराजकता पैदा करते हैं और अधिकारहीन कर्तव्य नागरिकों को दास बना देते हैं। हेराल्ड जे. लास्की ने इस संबंध को तीन मूलभूत सूत्रों द्वारा स्पष्ट किया:

लास्की का त्रिपक्षीय सह-संबंध:
  • एक का अधिकार दूसरे का कर्तव्य: मेरे जीने और अभिव्यक्ति के अधिकार का अर्थ है कि समाज के अन्य सभी व्यक्तियों का यह कानूनी कर्तव्य है कि वे मेरे अधिकारों में बाधा न डालें।
  • अधिकार के उपभोग में ही कर्तव्य निहित: जिस अधिकार का मैं उपभोग करता हूँ, दूसरों के लिए भी वैसे ही अधिकार स्वीकार करना मेरा नैतिक व सामाजिक कर्तव्य है।
  • राज्य के प्रति नागरिक कर्तव्य: क्योंकि लोकतांत्रिक राज्य मेरे अधिकारों की रक्षा करता है, अतः राज्य के प्रति निष्ठा रखना, कर चुकाना और कानूनों का पालन करना मेरा परम कर्तव्य है।

विश्व के महान विचारकों ने इस संबंध को अद्वितीय रूप में रेखांकित किया:

  • ज्युसेपे मैजिनी (मनुष्य के कर्तव्य): फ्रांसीसी क्रांति ने अधिकारों पर अत्यधिक बल देकर व्यक्तिवादी स्वार्थ को बढ़ाया; मानव कल्याण का मार्ग परिवार, देश और मानवता के प्रति कर्तव्य पालन में है।
  • महात्मा गांधी: 'अधिकारों का वास्तविक स्रोत कर्तव्य पालन है। यदि हम सभी अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करें, तो अधिकारों को खोजना नहीं पड़ेगा; वे स्वतः प्राप्त हो जाएंगे।'

महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक सिद्धांत एवं कालक्रम

विधि आधारित स्वतंत्रता सूत्र
वास्तविक स्वतंत्रता = मनमानी सत्ता पर कानूनी अंकुश + स्वतंत्र न्यायपालिका + नागरिक सजगता
रॉल्स का न्याय समीकरण
निष्पक्षता के रूप में न्याय = समान मूल स्वतंत्रताएं + अवसरों की समानता + अंतर का सिद्धांत (Maximin)
अधिकार एवं कर्तव्य संतुलन समीकरण
सामाजिक सद्भाव = मौलिक अधिकारों का संरक्षण ⇄ नागरिक कर्तव्यों का निष्ठावान पालन

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
कानून और स्वतंत्रता के संबंध का विश्लेषण कीजिए। 'जहाँ कानून नहीं, वहाँ स्वतंत्रता नहीं'—जॉन लॉक के इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. विरोधी दृष्टिकोण: अराजकतावादी व उग्र व्यक्तिवादी मानते हैं कि कानून और स्वतंत्रता परस्पर विरोधी हैं—कानून जितने बढ़ेंगे, स्वतंत्रता उतनी कम होगी।
  2. वास्तविक समन्वय: सभ्य समाज में कानून ही स्वतंत्रता का सबसे बड़ा रक्षक और पूर्वशर्त है। जॉन लॉक ने अपनी पुस्तक 'सिविल गवर्नमेंट पर दूसरा निबंध' में लिखा: 'जहाँ कानून नहीं, वहाँ स्वतंत्रता नहीं।'
  3. आशय: कानूनहीन समाज में बलवान व्यक्ति दुर्बलों का दमन करता है (मत्स्य न्याय), जिससे किसी की स्वतंत्रता सुरक्षित नहीं रहती। राज्य का कानून अन्यायी तत्वों पर अंकुश लगाकर सभी के लिए सुरक्षित व स्वतंत्र वातावरण सुनिश्चित करता है।
उदाहरण 2
जे.एस. मिल तथा टी.एच. ग्रीन के विचारों के संदर्भ में नकारात्मक और सकारात्मक स्वतंत्रता में अंतर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. नकारात्मक स्वतंत्रता: इसका अर्थ है बाहरी बंधनों का अभाव। जे.एस. मिल ने 'ऑन लिबर्टी' में हानि का सिद्धांत देते हुए कहा कि राज्य केवल दूसरों को नुकसान से बचाने हेतु ही व्यक्ति पर प्रतिबंध लगा सकता है। यह राज्य के न्यूनतम हस्तक्षेप पर बल देती है ('Freedom from')।
  2. सकारात्मक स्वतंत्रता: इसका अर्थ है आत्मविकास हेतु वास्तविक सामर्थ्य व अनुकूल अवसरों की उपस्थिति। टी.एच. ग्रीन के अनुसार, यह कोई सार्थक कार्य करने की वास्तविक सकारात्मक क्षमता है ('Freedom to')।
  3. मुख्य अंतर: नकारात्मक स्वतंत्रता कानूनी बंधनों के अभाव को पर्याप्त मानती है; सकारात्मक स्वतंत्रता यह मानती है कि भुखमरी व अशिक्षा से पीड़ित व्यक्ति वास्तव में स्वतंत्र नहीं हो सकता, अतः राज्य को शिक्षा व रोजगार जैसी कल्याणकारी सुविधाएं देनी चाहिए।
उदाहरण 3
जॉन रॉल्स के 'अंतर के सिद्धांत' (Difference Principle) की व्याख्या कीजिए। यह समानता और न्याय का समन्वय कैसे करता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. संदर्भ: जॉन रॉल्स ने अपनी पुस्तक 'ए थ्योरी ऑफ जस्टिस' (1971) में न्याय के दूसरे सिद्धांत के रूप में अंतर का सिद्धांत प्रतिपादित किया।
  2. मूल विचार: सामाजिक और आर्थिक विषमताएं केवल तभी न्यायपूर्ण मानी जा सकती हैं जब वे समाज के सबसे पिछड़े व वंचित वर्ग के अधिकतम लाभ हेतु कार्य करें।
  3. समानता व न्याय का समन्वय: रॉल्स पूर्ण यांत्रिक आर्थिक समानता के पक्षधर नहीं थे (जो प्रतिभा और उत्पादन को बाधित कर सकती है), बल्कि उन्होंने प्रतिभा के उपयोग और धन सृजन की अनुमति इस शर्त पर दी कि उस आर्थिक विकास से निर्धनतम व्यक्तियों के जीवन स्तर में सुधार हो।
उदाहरण 4
जेरेमी बेंथम ने प्राकृतिक अधिकारों को 'बकवास' (Nonsense upon stilts) क्यों कहा? कानूनी अधिकार सिद्धांत से इसकी तुलना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. बेंथम का तर्क: उपयोगितावादी विचारक जेरेमी बेंथम का मानना था कि अधिकार कोई प्राकृतिक या काल्पनिक वस्तु नहीं हो सकते। संप्रभु राज्य और दंड की व्यवस्था के बिना अधिकारों का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं होता।
  2. कानूनी अधिकार सिद्धांत: बेंथम और ऑस्टिन के अनुसार, अधिकार केवल राज्य के सकारात्मक लिखित कानूनों की देन हैं। कोई भी दावा केवल तभी अधिकार बनता है जब उसे राज्य की व्यवस्थापिका मान्यता दे और न्यायालय उसे लागू कराए।
उदाहरण 5
क्या स्वतंत्रता और समानता परस्पर विरोधी हैं अथवा पूरक? लॉर्ड एक्टन एवं हेराल्ड लास्की के विचारों का उल्लेख कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. विरोधी दृष्टिकोण (लॉर्ड एक्टन): एक्टन का विचार था कि समानता की चाह ने स्वतंत्रता की आशा को नष्ट कर दिया। आर्थिक बराबरी लाने के लिए राज्य को कठोर नियंत्रण लगाने पड़ते हैं, जिससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता नष्ट होती है।
  2. पूरक दृष्टिकोण (हेराल्ड लास्की): लास्की ने सिद्ध किया कि समानता के बिना स्वतंत्रता एक भ्रम है। अत्यधिक निर्धन मजदूर के पास कोई वास्तविक स्वतंत्रता नहीं होती। आर्थिक समानता और समान अवसर ही वास्तविक स्वतंत्रता की आधारशिला हैं।
उदाहरण 6
अधिकार और कर्तव्य के संबंध की विवेचना कीजिए। महात्मा गांधी का इस विषय में क्या दृष्टिकोण था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. अविभाज्य संबंध: अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब अन्य लोग अपने कर्तव्य का पालन करते हैं तभी मेरा अधिकार सुरक्षित होता है। राज्य अधिकारों की रक्षा करता है, इसलिए राज्य के प्रति कर देना और आज्ञापालन नागरिक का कर्तव्य है।
  2. महात्मा गांधी का दृष्टिकोण: गांधीजी ने कर्तव्य को अधिकारों से अधिक प्राथमिक माना। उनका कथन था: 'अधिकारों का वास्तविक स्रोत कर्तव्य है। यदि हम सब अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करें, तो अधिकार अपने आप प्राप्त हो जाएंगे।'

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि कानून और स्वतंत्रता हमेशा एक-दूसरे के विरोधी होते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

कानून के बिना स्वतंत्रता जंगलराज में बदल जाती है; कानून ही सभी के लिए सुरक्षित व समान स्वतंत्रता का वातावरण बनाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

समानता का अर्थ सभी के लिए एक समान वेतन या संपत्ति मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

समानता का अर्थ अनुचित विशेषाधिकारों का अंत और प्रतिभा के विकास हेतु समान अवसर प्रदान करना है, यांत्रिक एकरूपता नहीं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि जॉन रॉल्स समाज में किसी भी प्रकार की आर्थिक विषमता के विरोधी थे।

सही वैज्ञानिक तथ्य

रॉल्स ने अंतर के सिद्धांत के तहत सशर्त विषमता की अनुमति दी, बशर्ते उससे समाज के सबसे कमजोर वर्ग को अधिकतम लाभ मिले।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

राजनीतिक सिद्धांत की मूल अवधारणाएं: पंचस्तंभ समन्वय विधि • स्वतंत्रता • समानता • न्याय • अधिकार एवं कर्तव्यों का जैविक संतुलन विधि / कानून (Law) सार्वभौम आदेश व व्यवस्था
संप्रभु की आज्ञा व समाज स्वीकृत नियम; न्याय एवं स्वतंत्रता का रक्षा कवच।
स्वतंत्रता (Liberty) आत्मविकास का अनुकूल वातावरण
नकारात्मक (प्रतिबंधों का अभाव) व सकारात्मक (क्षमताओं का विकास)।
समानता (Equality) अवसरों की निष्पक्ष उपलब्धता
विशेषाधिकारों की समाप्ति तथा व्यक्तित्व विकास हेतु समान अवसर।
अधिकार एवं कर्तव्य (Rights & Duties) सामाजिक मांग व दायित्व
मानव कल्याण की अपरिहार्य दशाएं तथा राज्य व समाज के प्रति कर्तव्य।
⚖ न्याय (Justice) रॉल्स का न्याय सिद्धांत व सामंजस्य: अज्ञानता का पर्दा, निष्पक्ष अवसर तथा वंचितों हेतु विशेष सुरक्षा। Rawls' 2 Principles: Equal Basic Liberties + Difference Principle (Fairness for Least Advantaged) ✦ द्वंद्वात्मक अंतर्संबंध एवं संवैधानिक संतुलन विधि के बिना स्वतंत्रता असंभव (जॉन लॉक: 'जहाँ कानून नहीं, वहाँ स्वतंत्रता नहीं') समानता विहीन स्वतंत्रता स्वैच्छाचारिता है; स्वतंत्रता विहीन समानता दासता है (लास्की) अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं (गांधीजी व मैजिनी)

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
विधि (ट्यूटोनिक 'Lag' से) संप्रभु राज्य द्वारा लागू किए जाने वाले नियमों का निकाय है जो बाह्य आचरण को नियंत्रित करता है।
मुख्य बिंदु 2
कानून के छह प्रमुख स्रोत हैं: प्रथाएं, धर्म, न्यायिक निर्णय, विधि वेत्ताओं की टीकाएं, साम्या तथा विधानमंडल।
मुख्य बिंदु 3
कानून बाह्य आचरण को राज्य की दंड शक्ति से नियंत्रित करता है, जबकि नैतिकता आंतरिक अंतरात्मा और चरित्र का मार्गदर्शन करती है।
मुख्य बिंदु 4
नकारात्मक स्वतंत्रता बंधनों के अभाव पर बल देती है (मिल), जबकि सकारात्मक स्वतंत्रता आत्मविकास के सामर्थ्य की मांग करती है (ग्रीन)।
मुख्य बिंदु 5
विधि का शासन, मौलिक अधिकार, स्वतंत्र न्यायपालिका, शक्ति पृथक्करण तथा निरंतर सजगता स्वतंत्रता के मुख्य सुरक्षा उपाय हैं।
मुख्य बिंदु 6
समानता का अर्थ यांत्रिक समरूपता नहीं, बल्कि विशेषाधिकारों की समाप्ति और सभी के लिए पर्याप्त अवसरों की उपलब्धता है (लास्की)।
मुख्य बिंदु 7
लॉर्ड एक्टन ने स्वतंत्रता और समानता को विरोधी माना, किंतु लास्की और टॉनी ने सिद्ध किया कि वे एक-दूसरे के पूरक हैं।
मुख्य बिंदु 8
जॉन रॉल्स के न्याय सिद्धांत में अज्ञानता का पर्दा, समान स्वतंत्रता तथा वंचितों के कल्याण हेतु अंतर का सिद्धांत शामिल है।
मुख्य बिंदु 9
अधिकारों के सिद्धांतों में प्राकृतिक अधिकार (लॉक), कानूनी अधिकार (बेंथम), आदर्शवादी (ग्रीन) तथा समाज कल्याण सिद्धांत प्रमुख हैं।
मुख्य बिंदु 10
अधिकार और कर्तव्य अविभाज्य हैं; गांधीजी के अनुसार निष्ठापूर्वक कर्तव्य पालन से ही वास्तविक मानवाधिकारों का उदय होता है।

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