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WBB • कक्षा XI • Political Science • अध्याय 2
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

राज्य: परिभाषा एवं विशेषताएं

राज्य मानव समाज की सर्वोच्च, संप्रभु और सर्वाधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक संस्था है। लैटिन शब्द 'Status' तथा प्राचीन यूनान के नगर-राज्यों की 'पॉलिस' परंपरा से विकसित होकर आधुनिक पुनर्जागरण काल में निकोलो मैकियावेली के विचारों के माध्यम से 'राज्य' शब्द को पहली बार एक धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक अर्थ प्राप्त हुआ। पश्चिम बंगाल उच्चतर माध्यमिक शिक्षा परिषद (WBCHSE) के कक्षा 11 के पाठ्यक्रम के अंतर्गत इस दूसरे अध्याय में राज्य की विभिन्न दार्शनिक व कानूनी परिभाषाओं, विशेषकर प्रोफेसर जे. डब्ल्यू. गार्नर की विश्वप्रसिद्ध परिभाषा का विशद विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। इसमें राज्य के चार अपरिहार्य तत्वों—स्थायी जनसंख्या, निश्चित त्रिविमीय भू-भाग, संगठित सरकार तथा आंतरिक व बाह्य संप्रभुता—की गहन व्याख्या की गई है। इसके अतिरिक्त, समाज, सरकार, राष्ट्र और अन्य स्वैच्छिक संघों के साथ राज्य के मूलभूत संरचनात्मक अंतरों को अत्यंत स्पष्ट व तार्किक रूप से निरूपित किया गया है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

राज्य की अवधारणा और उसके घटकों की सही समझ एक लोकतांत्रिक समाज में नागरिकता, संप्रभुता और शासन प्रणाली को गहराई से समझने के लिए आवश्यक है। स्थायी राज्य और अस्थायी सरकारों के मध्य अंतर को समझकर ही नागरिक देशभक्ति और वैध लोकतांत्रिक विरोध के मध्य स्वस्थ संतुलन स्थापित कर पाते हैं। पश्चिम बंगाल बोर्ड (WBCHSE) की कक्षा 11 की वार्षिक परीक्षा में इस अध्याय से राज्य की परिभाषा, संप्रभुता के दोहरे आयाम तथा राज्य और सरकार के अंतर पर 8 अंकों के निबंधात्मक प्रश्न और 1 अंक के बहुविकल्पीय प्रश्न प्रतिवर्ष पूछे जाते हैं। साथ ही, यह अध्याय विधि (Law), संविधान, लोक प्रशासन और सिविल सेवा परीक्षाओं (WBCS/UPSC) में राजनीति विज्ञान की ठोस नींव तैयार करता है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. 'राज्य' शब्द की उत्पत्ति, व्युत्...
2 2. राज्य की विभिन्न परिभाषाएं एवं प...
3 3. राज्य के चार अनिवार्य तत्व: 1. ज...
4 4. राज्य के चार अनिवार्य तत्व: 3. स...
5 5. राज्य एवं अन्य सामाजिक संस्थाओं...
6 6. अंतर्राष्ट्रीय मान्यता का सिद्धा...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. 'राज्य' शब्द की उत्पत्ति, व्युत्पत्तिगत अर्थ एवं ऐतिहासिक विकास

व्युत्पत्तिगत स्रोत एवं प्राचीन शब्दावली

अंग्रेजी शब्द 'State' की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द 'Status' से हुई है। मध्यकालीन रोमन कानून के अंतर्गत 'स्टेटस' का तात्पर्य किसी व्यक्ति, समुदाय या निकाय की सामाजिक स्थिति, पद-प्रतिष्ठा या कानूनी दशा से था। कालांतर में लैटिन वाक्यांश 'status rei publicae' का प्रयोग सार्वजनिक व्यवस्था की स्थिति को दर्शाने के लिए होने लगा, जो धीरे-धीरे विकसित होकर एक संप्रभु राजनीतिक समुदाय के रूप में 'राज्य' के नाम से स्थापित हुआ।

प्राचीन एवं मध्यकालीन सभ्यताओं में राजनीतिक व्यवस्था को अभिव्यक्त करने के लिए भिन्न-भिन्न शब्दों का प्रयोग किया जाता था:

  • प्राचीन यूनान: यूनानी विचारक राज्य के लिए 'पॉलिस' (Polis) या 'नगर-राज्य' (City-State) शब्द का प्रयोग करते थे। प्लेटो और अरस्तू के लिए पॉलिस केवल एक कानूनी ढांचा नहीं था, बल्कि यह नागरिकों के सद्गुणों और 'सद्जीवन' (Good Life) की सिद्धि का एक नैतिक व आध्यात्मिक समुदाय था।
  • प्राचीन रोम: रोमनों ने इसके लिए 'सिविटास' (Civitas - संगठित नागरिक समाज) और 'रेस पब्लिका' (Res Publica - सार्वजनिक हित या राष्ट्रकुल) शब्दों का प्रयोग किया। रोमन परंपरा ने राज्य में वैधानिक नियमों और संस्थागत अधिकारों को केंद्रीय स्थान दिया।
  • मध्यकालीन यूरोप: सामंतवादी युग में सामंतों और कबीलों के पास 'लैंड' (Land), 'रील्म' (Realm) या 'किंगडम' (Kingdom) शब्द थे, किंतु एक आधुनिक संप्रभु राज्य की अमूर्त अवधारणा का पूर्ण अभाव था।
निकोलो मैकियावेली एवं आधुनिक 'लो स्तातोज़' (Lo Stato):

इटली के पुनर्जागरणकालीन महान राजनीतिक विचारक निकोलो मैकियावेली (Niccolò Machiavelli) ने अपनी प्रसिद्ध कृति 'द प्रिंस' (The Prince, 1513) के पहले ही वाक्य में आधुनिक वैज्ञानिक अर्थ में इतालवी शब्द 'lo stato' (राज्य) का सर्वप्रथम प्रयोग किया। उन्होंने लिखा: "वे सभी सत्ताएं जिनके अधीन मनुष्य रहे हैं या रहते हैं, वे राज्य रहे हैं और हैं—चाहे वे गणतंत्र हों या राजतंत्र।" मैकियावेली ने राज्य को धर्म और नैतिकता के बंधन से मुक्त कर एक स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया।

2. राज्य की विभिन्न परिभाषाएं एवं प्रोफेसर गार्नर का प्रामाणिक सिद्धांत

राज्य की प्रमुख दार्शनिक एवं वैधानिक परिभाषाएं

इतिहास के विभिन्न चरणों में राजनीतिक विचारकों ने अपनी-अपनी विचारधारा के अनुसार राज्य को परिभाषित किया है:

दृष्टिकोण प्रमुख विचारक प्रामाणिक परिभाषा एवं मूल अर्थ
1. प्राचीन नैतिकवादी अरस्तू (Aristotle) "राज्य परिवारों और गांवों का एक ऐसा समुदाय है जिसका उद्देश्य एक पूर्ण और आत्मनिर्भर जीवन की प्राप्ति है—जिससे हमारा तात्पर्य एक सुखी और सम्मानित जीवन से है।"
2. चरम आदर्शवादी जी. डब्ल्यू. एफ. हीगल (Hegel) "राज्य पृथ्वी पर ईश्वर का पदक्रम (अवतार) है।" (The State is the march of God on earth)। राज्य स्वयं एक सर्वोच्च नैतिक साध्य है और व्यक्ति राज्य का साधन मात्र है।
3. वैधानिक परिभाषा वुडरो विल्सन (Woodrow Wilson) "एक निश्चित भू-भाग के भीतर कानून के माध्यम से संगठित जनसमूह को राज्य कहते हैं।" (A people organized for law within a definite territory)।
4. समाजशास्त्रीय / बहुलवादी हेरोल्ड लास्की / मैकाइवर लास्की: "राज्य एक प्रादेशिक समाज है जो शासक और शासित में विभाजित है और जो अपने निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र में अन्य सभी संस्थाओं पर सर्वोच्चता का दावा करता है।"
5. मार्क्सवादी वर्ग दृष्टिकोण कार्ल मार्क्स / लेनिन राज्य पूंजीपति शासक वर्ग द्वारा बहुसंख्यक श्रमिक वर्ग का दमन और शोषण करने का एक संगठित दमनकारी यंत्र है।
राजनीति विज्ञान की सर्वश्रेष्ठ व प्रामाणिक परिभाषा: प्रोफेसर जे. डब्ल्यू. गार्नर

अमेरिकी राजनीति विज्ञानी प्रोफेसर जे. डब्ल्यू. गार्नर (J.W. Garner) द्वारा अपनी पुस्तक 'Political Science and Government' में दी गई परिभाषा को राजनीति विज्ञान में सर्वसम्मति से सबसे सटीक, पूर्ण और वैज्ञानिक माना जाता है:

प्रोफेसर गार्नर की अमर परिभाषा:

"राज्य राजनीति विज्ञान और सार्वजनिक कानून की दृष्टि से अनेक व्यक्तियों का ऐसा समुदाय है (Population), जो एक निश्चित भू-भाग में स्थायी रूप से रहता है (Territory), जो बाह्य नियंत्रण से पूर्णतः या प्रायः स्वतंत्र है (External Sovereignty) और जिसकी एक संगठित सरकार है (Government), जिसके आदेशों का पालन अधिकांश निवासी स्वभाववश करते हैं (Internal Sovereignty)।"

गार्नर की इस वैज्ञानिक परिभाषा में राज्य के चार अनिवार्य तत्व पूरी तरह समाहित हैं।

3. राज्य के चार अनिवार्य तत्व: 1. जनसंख्या एवं 2. निश्चित भू-भाग

राज्य का मानवीय एवं भौगोलिक आधार

आधुनिक राजनीति विज्ञान के अनुसार किसी भी राजनीतिक संगठन को 'राज्य' कहलाने के लिए चार अनिवार्य तत्वों का एक साथ होना अनिवार्य है। यदि इनमें से एक भी तत्व अनुपस्थित हो, तो राज्य का अस्तित्व नहीं हो सकता।

1. जनसंख्या (Population) — राज्य का मानवीय तत्व

राज्य मूलतः मनुष्यों का ही एक संगठन है। मानवविहीन कोई भी भूखंड, चाहे वह कितना भी विशाल या खनिज-संपन्न क्यों न हो, राज्य नहीं बन सकता। प्राचीन काल से जनसंख्या के आकार पर विचारकों में विमर्श रहा है:

  • प्लेटो (Plato): अपनी पुस्तक 'द लॉज' (The Laws) में प्लेटो ने एक आदर्श राज्य की नागरिक संख्या ठीक 5,040 निर्धारित की थी। इसका गणितीय कारण यह था कि 5,040 संख्या 1 से 10 तक के सभी पूर्णांकों से विभाजित हो जाती है, जिससे प्रशासनिक व सैन्य बंटवारा सरल होता है।
  • अरस्तू (Aristotle): अरस्तू ने कोई कठोर गणितीय संख्या तय करने के बजाय संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने कहा कि जनसंख्या "न अत्यधिक बड़ी होनी चाहिए और न ही अत्यधिक छोटी।" यह इतनी पर्याप्त होनी चाहिए कि राज्य आत्मनिर्भर व सुरक्षित रहे, और इतनी सीमित होनी चाहिए कि सुशासन संभव हो और नागरिक एक-दूसरे से परिचित रहें।
  • रूसो (Rousseau): प्रत्यक्ष लोकतंत्र के समर्थक रूसो ने आदर्श राज्य के लिए 10,000 नागरिकों की संख्या सुझाई थी।
  • आधुनिक यथार्थ: आधुनिक युग में जनसंख्या की कोई निश्चित सीमा नहीं है। वैटिकन सिटी की जनसंख्या लगभग 800 है, नौरू की 12,000, मोनाको की 38,000; वहीं भारत और चीन की जनसंख्या 140 करोड़ से भी अधिक है। वर्तमान में कुशल मानव संसाधन राज्य की आर्थिक व सैन्य शक्ति का सबसे बड़ा संबल है।
  • जनसंख्या का वर्गीकरण: राज्य की जनसंख्या में शामिल होते हैं: (क) नागरिक (जिन्हें पूर्ण नागरिक व राजनीतिक अधिकार प्राप्त होते हैं); (ख) विदेशी (जिन्हें नागरिक अधिकार तो मिलते हैं पर मताधिकार नहीं मिलता); और (ग) शरणार्थी व राज्यविहीन लोग।
2. निश्चित भू-भाग (Territory) — राज्य का भौगोलिक तत्व

स्थायी निवास के लिए एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र राज्य का दूसरा अनिवार्य तत्व है। घुमंतू या बंजारा कबीलों के पास जनसंख्या और नेता होने पर भी निश्चित भूमि के अभाव में वे राज्य नहीं कहलाते। 1948 में इजरायल की स्थापना से पूर्व यहूदी अपनी विशिष्ट पहचान के बावजूद राज्यविहीन थे।

राज्य का संप्रभु भू-भाग केवल जमीन की सतह तक सीमित नहीं है, यह एक त्रिविमीय (Three-Dimensional) भौगोलिक क्षेत्र है:

  • क. स्थलीय भाग एवं भूगर्भ: अंतर्राष्ट्रीय सीमा के भीतर की संपूर्ण भूमि, पर्वत, वन तथा पाताल (पृथ्वी के केंद्र) तक स्थित सभी खनिज व प्राकृतिक संसाधन।
  • ख. प्रादेशिक जलसीमा (Territorial Waters): आंतरिक नदियां, झीलें, नहरें और समुद्र तट से लगा हुआ जलक्षेत्र। संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन (UNCLOS, 1982) के अनुसार समुद्र तट से समुद्र की ओर 12 समुद्री मील (लगभग 22.2 किमी) तक का क्षेत्र राज्य की पूर्ण संप्रभु जलसीमा माना जाता है। इसके आगे 200 समुद्री मील तक विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) होता है।
  • ग. वायुमंडल (Airspace): भूमि और जलसीमा के ठीक ऊपर स्थित संपूर्ण वायुमंडल राज्य की अनन्य संप्रभुता के अधीन होता है (1944 की शिकागो संधि के अनुसार)। बिना पूर्व अनुमति के कोई विदेशी विमान इस आकाशसीमा में प्रवेश नहीं कर सकता।
  • भू-भाग का आकार: आकार की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। मोनाको (2 वर्ग किमी) और वैटिकन सिटी (0.49 वर्ग किमी) जैसे लघु राज्य भी रूस (1.71 करोड़ वर्ग किमी) और भारत (32.87 लाख वर्ग किमी) जैसे विशाल राज्यों के समान संप्रभु हैं।

4. राज्य के चार अनिवार्य तत्व: 3. सरकार एवं 4. संप्रभुता

राज्य का प्रशासनिक तंत्र एवं उसका प्राणतत्व
3. सरकार (Government) — राज्य की कार्यपालिका एजेंसी

जनसंख्या और भू-भाग होने पर भी यदि कोई सुव्यवस्थित प्रशासनिक व्यवस्था न हो, तो समाज में अराजकता फैल जाएगी। सरकार राज्य का वह व्यावहारिक माध्यम और कार्यपालिका संस्था है जिसके द्वारा राज्य की सामूहिक इच्छा का निर्माण, अभिव्यक्ति और क्रियान्वयन होता है। राज्य यदि एक अमूर्त विचार है, तो सरकार उसका सजीव और क्रियाशील मस्तिष्क है।

  • सरकार के तीन प्रमुख अंग:
    1. व्यवस्थापिका (Legislature): जो कानूनों का निर्माण व संशोधन करती है।
    2. कार्यपालिका (Executive): जो कानूनों को लागू करती है और शासन चलाती है।
    3. न्यायपालिका (Judiciary): जो संविधान व कानूनों की व्याख्या करती है तथा न्याय प्रदान करती है।
  • सरकार का स्वरूप: राज्य के अस्तित्व के लिए सरकार का होना आवश्यक है, किंतु सरकार का स्वरूप (लोकतांत्रिक, राजतंत्रीय, संसदीय, अध्यक्षीय या एकात्मक) कैसा भी हो सकता है। मुख्य शर्त यह है कि सरकार प्रभावी और समाज में कानून व्यवस्था बनाए रखने में सक्षम हो।
4. संप्रभुता (Sovereignty) — राज्य का प्राणतत्व एवं सर्वोच्च लक्षण

संप्रभुता राज्य का सबसे महत्वपूर्ण, केंद्रीय और अद्वितीय तत्व है। यह वह सर्वोच्च, निरपेक्ष और अविभाज्य शक्ति है जो राज्य को समाज की अन्य सभी संस्थाओं और संघों से श्रेष्ठ बनाती है। फ्रांसीसी दार्शनिक ज्यां बोदां (Jean Bodin) ने 1576 में अपनी कृति 'सिक्स बुक्स ऑफ द कॉमनवेल्थ' में आधुनिक संप्रभुता के सिद्धांत का प्रतिपादन किया।

संप्रभुता के दोहरे आयाम
संप्रभुता का रूप परिभाषा एवं अधिकार व्यावहारिक अनुप्रयोग
क. आंतरिक संप्रभुता (Internal Sovereignty) राज्य की सीमाओं के भीतर रहने वाले सभी व्यक्तियों, नागरिकों, राजनीतिक दलों, धार्मिक संस्थाओं और संगठनों पर राज्य का अंतिम व सर्वोच्च आदेश देने का अधिकार। मैक्स वेबर के अनुसार राज्य के पास वैध शारीरिक बलप्रयोग का एकाधिकार होता है। कोई भी संस्था राज्य के कानून से ऊपर नहीं हो सकती; कानून का उल्लंघन करने वाले को दंडित करने की अंतिम शक्ति राज्य के पास है।
ख. बाह्य संप्रभुता (External Sovereignty) किसी भी विदेशी शक्ति, विदेशी सरकार या बाहरी दबाव से पूर्ण मुक्ति और राष्ट्रीय स्वतंत्रता। स्वतंत्र विदेश नीति का संचालन, अंतर्राष्ट्रीय संधियां करना, युद्ध व शांति का निर्णय तथा संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(1) के तहत सभी संप्रभु राज्यों के साथ समानता का अधिकार। 1947 से पूर्व भारत के पास यह नहीं थी।

5. राज्य एवं अन्य सामाजिक संस्थाओं में संरचनात्मक अंतर

राज्य बनाम समाज, सरकार, राष्ट्र एवं संघ

दैनिक बातचीत में राज्य, सरकार, समाज और राष्ट्र को अक्सर एक मान लिया जाता है, किंतु राजनीति विज्ञान में इनके मध्य स्पष्ट सीमाएं हैं:

1. राज्य बनाम समाज (State vs Society)
  • प्राचीनता: समाज राज्य से कहीं अधिक प्राचीन है। राज्य के उदय से हजारों वर्ष पूर्व आदिम मानव परिवार और समाज बनाकर रहता था।
  • व्यापकता: समाज का दायरा असीम है—मानव के सामाजिक, धार्मिक, पारिवारिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सभी संबंध समाज के अंग हैं। राज्य समाज के भीतर केवल कानून व्यवस्था व न्याय बनाए रखने वाली एक विशेष राजनीतिक संस्था मात्र है। मैकाइवर के शब्दों में: राज्य "समाज के भीतर एक संस्था" (an association within society) है।
  • बाध्यकारी शक्ति: समाज नैतिक नियमों, परंपराओं और सामाजिक बहिष्कार द्वारा कार्य करता है, उसके पास दंड देने की शक्ति नहीं होती। राज्य के पास संप्रभु कानूनी बलप्रयोग और पुलिस-जेल का अधिकार होता है।
  • भू-भाग: समाज के लिए निश्चित भू-भाग अनिवार्य नहीं है (जैसे विश्व हिंदू या मुस्लिम समाज); राज्य के लिए निश्चित सीमाएं अनिवार्य हैं।
2. राज्य बनाम सरकार (State vs Government)
  • स्वामी बनाम सेवक: राज्य मूल स्वामी (Principal) है और संप्रभुता का वास्तविक धारक है; सरकार राज्य की प्रतिनिधि या सेवक (Agent) है जो राज्य की शक्तियों का प्रयोग करती है।
  • स्थायित्व: राज्य स्थायी होता है (भारत राज्य हमेशा रहेगा); सरकार अस्थायी होती है (चुनावों, अविश्वास प्रस्ताव या त्यागपत्र से सरकारें बदलती रहती हैं)।
  • सदस्यता: देश का प्रत्येक नागरिक राज्य का सदस्य होता है; किंतु केवल चुने हुए प्रतिनिधि और सरकारी अधिकारी ही सरकार के अंग होते हैं।
  • विरोध का अधिकार: राज्य का विनाश चाहना या उसके विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह करना राजद्रोह (Treason) है; किंतु लोकतंत्र में सरकार की नीतियों की आलोचना करना नागरिक का वैधानिक लोकतांत्रिक अधिकार है।
3. राज्य बनाम राष्ट्र (State vs Nation)
  • मूल प्रकृति: राष्ट्र एक मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक एकता की भावना है (समान भाषा, इतिहास या धर्म पर आधारित); जबकि राज्य एक कानूनी, राजनीतिक और संप्रभु संगठन है।
  • राज्यविहीन राष्ट्र: राष्ट्र बिना राज्य के भी जीवित रह सकता है। उदाहरणार्थ, 1948 से पूर्व लगभग 2000 वर्षों तक यहूदी राष्ट्र बिना किसी राज्य के जीवित रहा; आज 3 करोड़ कुर्द लोगों के पास राष्ट्र की भावना है पर कोई राज्य नहीं है।
  • बहुराष्ट्रीय राज्य: एक राज्य में अनेक राष्ट्र हो सकते हैं (जैसे ब्रिटेन में अंग्रेज, स्कॉटिश और वेल्श; या भारत की बहुरंगी राष्ट्रीयताएं)। जब राष्ट्र और राज्य की सीमाएं एक हो जाती हैं, तो उसे राष्ट्र-राज्य (Nation-State) कहते हैं।
4. राज्य बनाम संघ या समितियां (State vs Associations)
  • सदस्यता: राज्य की सदस्यता जन्मजात और अनिवार्य होती है; किसी क्लब, ट्रेड यूनियन या संस्था की सदस्यता पूर्णतः स्वैच्छिक होती है।
  • संख्या: एक व्यक्ति एक समय में कई संस्थाओं का सदस्य हो सकता है, परंतु सामान्यतः वह एक ही राज्य का नागरिक हो सकता है।
  • दंड शक्ति: कोई संस्था अवज्ञा करने पर अधिक से अधिक सदस्य को निष्कासित कर सकती है, किंतु राज्य व्यक्ति की स्वतंत्रता और संपत्ति को कानूनन जब्त या दंडित कर सकता है।

6. अंतर्राष्ट्रीय मान्यता का सिद्धांत एवं उच्च माध्यमिक परीक्षा रणनीति

क्या अंतर्राष्ट्रीय मान्यता राज्य का पांचवां तत्व है?

अंतर्राष्ट्रीय कानून में यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है कि क्या अंतर्राष्ट्रीय मान्यता (International Recognition) राज्य का अनिवार्य तत्व है। इस पर न्यायविदों में दो मुख्य सिद्धांत प्रचलित हैं:

मान्यता का सिद्धांत प्रमुख समर्थक मुख्य वैधानिक दृष्टिकोण
1. रचनात्मक / संस्थापकमूलक सिद्धांत (Constitutive Theory) हीगल, ओपेनहाइम, एंजिलोटी चारों तत्व होने मात्र से राज्य नहीं बनता; जब विश्व के अन्य संप्रभु राज्य उसे मान्यता देते हैं, तभी एक नए राज्य का वास्तविक कानूनी निर्माण होता है।
2. उद्घोषणात्मक सिद्धांत (Declaratory Theory) हॉल, ब्रायरली, मोंटेवीडियो सम्मेलन (1933) चारों तत्व मौजूद होते ही राज्य वस्तुगत रूप से अस्तित्व में आ जाता है। मान्यता नए राज्य को बनाती नहीं है, बल्कि केवल एक पूर्व-विद्यमान तथ्य की औपचारिक घोषणा करती है।
कक्षा 11 परीक्षा में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने की रणनीति
  • गार्नर की परिभाषा अवश्य लिखें: 8 अंक के उत्तर के आरंभ में प्रोफेसर गार्नर की प्रामाणिक परिभाषा उद्धृत करने से परीक्षक पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
  • चारों तत्वों का क्रमबद्ध विभाजन: जनसंख्या, भू-भाग, सरकार और संप्रभुता—इन चारों शीर्षकों को रेखांकित करके लिखें। संप्रभुता के अंतर्गत आंतरिक व बाह्य भेदों को विस्तार दें।
  • तुलनात्मक तालिकाओं का प्रयोग: राज्य और सरकार अथवा राज्य और समाज के अंतर को पैराग्राफ के बजाय अंतर के आधार सहित तालिका (Table) बनाकर प्रस्तुत करें।

महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक सिद्धांत एवं कालक्रम

प्रोफेसर गार्नर का राज्य निर्माण सूत्र
राज्य = [1. जनसंख्या] + [2. निश्चित भू-भाग] + [3. संगठित सरकार] + [4. संप्रभुता]
संप्रभुता का दोहरा स्वरूप सूत्र (ज्यां बोदां एवं ऑस्टिन)
संप्रभुता = आंतरिक सर्वोच्चता (वैध बलप्रयोग का एकाधिकार) + बाह्य स्वतंत्रता (विदेशी नियंत्रण मुक्ति)
राज्य के भू-भाग का त्रिविमीय सूत्र
भू-भाग = स्थलीय भाग व भूगर्भ + प्रादेशिक जलसीमा (12 समुद्री मील) + संपूर्ण वायुमंडल
राज्य बनाम सरकार सूत्र
राज्य (स्वामी + स्थायी + संप्रभु + समस्त जनता) ➔ सरकार (सेवक + अस्थायी + प्रदत्त शक्तियां + कुछ प्रतिनिधि)

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
राज्य की परिभाषा दीजिए। राज्य के चार अनिवार्य तत्वों की विस्तारपूर्वक समीक्षा कीजिए। (अंक: 8)
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
1. राज्य की परिभाषा: राज्य मानव समाज की सर्वोच्च और संप्रभु राजनीतिक संस्था है। अमेरिकी राजनीति विज्ञानी प्रोफेसर जे. डब्ल्यू. गार्नर (J.W. Garner) की परिभाषा राजनीति विज्ञान में सर्वाधिक प्रामाणिक मानी जाती है:
"राज्य राजनीति विज्ञान और सार्वजनिक कानून की दृष्टि से अनेक व्यक्तियों का ऐसा समुदाय है, जो एक निश्चित भू-भाग में स्थायी रूप से रहता है, जो बाह्य नियंत्रण से पूर्णतः या प्रायः स्वतंत्र है और जिसकी एक संगठित सरकार है, जिसके आदेशों का पालन अधिकांश निवासी स्वभाववश करते हैं।"

2. राज्य के चार अनिवार्य तत्व: किसी भी समुदाय को राज्य बनने के लिए निम्नलिखित चार तत्वों का होना अनिवार्य है:

I. जनसंख्या (Population):
  • राज्य मनुष्यों का समुदाय है। जनसंख्या के बिना राज्य की कल्पना असंभव है।
  • आदर्श आकार: प्लेटो ने 5,040 और रूसो ने 10,000 नागरिकों की संख्या सुझाई थी। अरस्तू के अनुसार जनसंख्या आत्मनिर्भरता और सुशासन के अनुकूल संतुलित होनी चाहिए।
  • आधुनिक स्थिति: आज जनसंख्या का कोई निश्चित पैमाना नहीं है। वैटिकन सिटी में 800 लोग हैं, जबकि भारत में 140 करोड़ से अधिक। आज कुशल जनसंख्या राज्य की वास्तविक शक्ति है।

II. निश्चित भू-भाग (Territory):
  • जनसंख्या का स्थायी निवास आवश्यक है; खानाबदोश कबीले राज्य नहीं बना सकते।
  • त्रिविमीय विस्तार: इसमें शामिल हैं: (क) स्थलीय भाग व भूगर्भ के खनिज; (ख) प्रादेशिक जलसीमा (नदियां, झीलें तथा तट से 12 समुद्री मील तक का समुद्र); तथा (ग) संपूर्ण ऊपरी वायुमंडल।
  • आकार का कोई बंधन नहीं है; मोनाको जैसा छोटा देश और रूस जैसा विशाल देश समान रूप से संप्रभु राज्य हैं।

III. सरकार (Government):
  • सरकार राज्य की व्यावहारिक कार्यपालिका एजेंसी और मस्तिष्क है, जिसके माध्यम से राज्य की इच्छा का निर्माण और क्रियान्वयन होता है।
  • यह व्यवस्थापिका (कानून निर्माण), कार्यपालिका (कानून लागू करना) और न्यायपालिका (न्याय निर्णय) के माध्यम से कार्य करती है।
  • सरकार का रूप चाहे लोकतांत्रिक हो या एकात्मक, उसका प्रभावी व संगठित होना आवश्यक है।

IV. संप्रभुता (Sovereignty):
  • संप्रभुता राज्य का प्राणतत्व और सर्वोच्च निरपेक्ष शक्ति है, जो इसे अन्य सभी संस्थाओं से श्रेष्ठ बनाती है। ज्यां बोदां (1576) ने इसका आधुनिक सिद्धांत दिया।
  • आंतरिक संप्रभुता: देश की सीमाओं के भीतर सभी व्यक्तियों और संगठनों पर राज्य का अंतिम व सर्वोच्च आदेश देने का अधिकार तथा वैध बलप्रयोग का एकाधिकार।
  • बाह्य संप्रभुता: किसी भी विदेशी सत्ता के नियंत्रण से पूर्ण स्वतंत्रता और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संप्रभु समानता।

निष्कर्ष: इन चारों तत्वों के संगम से ही राज्य का निर्माण होता है। यदि एक भी तत्व अनुपस्थित हो (जैसे 1947 से पूर्व भारत के पास संप्रभुता नहीं थी), तो वह राज्य नहीं कहला सकता।
उदाहरण 2
राज्य का सबसे महत्वपूर्ण तत्व कौन-सा है और क्यों? संप्रभुता के आंतरिक और बाह्य रूपों की व्याख्या कीजिए। (अंक: 8)
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
1. संप्रभुता सबसे महत्वपूर्ण तत्व क्यों है? राज्य के चार तत्वों (जनसंख्या, भू-भाग, सरकार और संप्रभुता) में से संप्रभुता (Sovereignty) को सर्वसम्मति से राज्य का प्राणतत्व, केंद्रीय आधार और सबसे महत्वपूर्ण लक्षण माना जाता है।
  • अन्य तीन तत्व (जनसंख्या, भू-भाग और सरकार) किसी पराधीन देश या राज्य के प्रांत (जैसे पश्चिम बंगाल या कैलिफोर्निया) में भी पाए जा सकते हैं, किंतु संप्रभुता के अभाव में उन्हें स्वतंत्र राज्य नहीं कहा जा सकता। 15 अगस्त 1947 से पूर्व भारत के पास विशाल जनसंख्या, भू-भाग और शासन तंत्र था, किंतु संप्रभुता ब्रिटिश संसद के पास होने के कारण भारत एक राज्य नहीं बल्कि उपनिवेश था।
  • संप्रभुता ही वह विशिष्ट शक्ति है जो राज्य को समाज, परिवार, ट्रेड यूनियन या किसी क्लब से अलग और सर्वोच्च बनाती है।

2. संप्रभुता का अर्थ एवं उत्पत्ति: लैटिन शब्द 'Superanus' (सर्वोच्च) से उत्पन्न संप्रभुता का अर्थ राज्य की परम, असीम, स्थायी और अविभाज्य सत्ता है। फ्रांसीसी विचारक ज्यां बोदां (1576) ने इसे "नागरिकों और प्रजाजनों पर कानून द्वारा अनियंत्रित सर्वोच्च शक्ति" कहा है।

3. संप्रभुता के दोहरे रूप:
क. आंतरिक संप्रभुता (Internal Sovereignty):
  • परिभाषा: राज्य की भौगोलिक सीमाओं के भीतर रहने वाले सभी नागरिकों, संघों, धार्मिक समुदायों और व्यापारिक संगठनों पर राज्य की अंतिम और सर्वोच्च आदेश देने की कानूनी शक्ति।
  • प्रमुख लक्षण:
    1. राज्य का कानून सर्वोपरि है; किसी भी क्लब या संघ का नियम राज्य के कानून का उल्लंघन नहीं कर सकता।
    2. समाजशास्त्री मैक्स वेबर के अनुसार राज्य के पास शारीरिक बलप्रयोग का वैध एकाधिकार होता है।
    3. कानून का उल्लंघन करने वालों को गिरफ्तार करने, दंडित करने या कारावास में डालने की अंतिम शक्ति केवल राज्य के पास है।

ख. बाह्य संप्रभुता (External Sovereignty):
  • परिभाषा: किसी विदेशी शक्ति, विदेशी सरकार या बाहरी सत्ता के नियंत्रण, प्रभुत्व और हस्तक्षेप से राज्य की पूर्ण स्वतंत्रता।
  • प्रमुख लक्षण:
    1. राज्य स्वतंत्र रूप से अपनी विदेश नीति तय करने, अंतर्राष्ट्रीय संधियां करने और युद्ध अथवा शांति की घोषणा करने का अधिकारी है।
    2. संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(1) के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय कानून में प्रत्येक संप्रभु राज्य को समान कानूनी दर्जा (Sovereign Equality) प्राप्त है।

निष्कर्ष: आंतरिक और बाह्य संप्रभुता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आंतरिक संप्रभुता देश के भीतर शांति और कानून का राज स्थापित करती है, जबकि बाह्य संप्रभुता विश्व पटल पर राष्ट्र की गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करती है।
उदाहरण 3
राज्य और सरकार में प्रमुख अंतरों को स्पष्ट कीजिए। (अंक: 8)
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: सामान्य बोलचाल में राज्य और सरकार को प्रायः एक ही समझ लिया जाता है, किंतु राजनीति विज्ञान में दोनों के मध्य अत्यंत मौलिक अंतर हैं:

राज्य और सरकार का तुलनात्मक विवरण:
अंतर का आधार राज्य (The State) सरकार (The Government)
1. मूल स्वरूप राज्य एक अमूर्त, अदृश्य और वैचारिक राजनीतिक संगठन है। सरकार राज्य की मूर्त, प्रत्यक्ष और सजीव कार्यपालिका संस्था है।
2. स्वामी बनाम सेवक राज्य मूल स्वामी (Principal) है और संप्रभु शक्ति का वास्तविक स्रोत है। सरकार राज्य की प्रतिनिधि या सेवक (Agent) है, जो सौंपी गई शक्तियों का प्रयोग करती है।
3. स्थायित्व राज्य स्थायी और अविचल होता है। भारत राज्य सदियों से विद्यमान है। सरकार अस्थायी होती है। चुनावों, अविश्वास प्रस्ताव या त्यागपत्र से सरकारें बदलती रहती हैं।
4. सदस्यता देश के सभी निवासी व नागरिक जन्म से राज्य के सदस्य होते हैं। केवल चुने हुए मंत्री, सांसद और प्रशासनिक अधिकारी ही सरकार के अंग होते हैं।
5. संप्रभुता संप्रभुता केवल राज्य की अनन्य और अविभाज्य निधि है। सरकार संप्रभु नहीं होती; वह संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं में कार्य करती है।
6. विरोध का अधिकार राज्य के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह करना गंभीर अपराध या राजद्रोह (Treason) है। लोकतंत्र में सरकार की नीतियों की आलोचना करना नागरिक का संवैधानिक मौलिक अधिकार है।

निष्कर्ष: सरकार राज्य का वह यंत्र है जिसके माध्यम से राज्य कार्य करता है। निरंकुश शासक (जैसे लुई चौदहवां: "मैं ही राज्य हूं") सरकार और राज्य को एक मान लेते हैं, किंतु स्वस्थ लोकतंत्र में इन दोनों का अंतर बनाए रखना परम आवश्यक है।
उदाहरण 4
राज्य और समाज के मध्य अंतर को रेखांकित कीजिए। (अंक: 8)
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: मनुष्य एक ही समय में समाज का सदस्य भी होता है और राज्य का नागरिक भी। किंतु दोनों संस्थाओं के मध्य स्पष्ट अंतर हैं:

1. ऐतिहासिक प्राचीनता: समाज राज्य से हजारों वर्ष पूर्व अस्तित्व में आ चुका था। राज्य के जन्म से बहुत पहले आदिम मानव कबीलों और परिवारों में सामाजिक जीवन व्यतीत करता था। राज्य सभ्यता के विकास के बाद उत्पन्न हुई एक राजनीतिक संस्था है।

2. कार्यक्षेत्र की व्यापकता:
  • समाज: संपूर्ण मानवीय संबंधों का जाल है—परिवार, धर्म, संस्कृति, कला, व्यापार और खेलकूद सब समाज के भीतर आते हैं।
  • राज्य: समाज के भीतर केवल कानून व्यवस्था, न्याय और सुरक्षा बनाए रखने वाला एक विशिष्ट राजनीतिक अंग मात्र है। समाजशास्त्री मैकाइवर ने लिखा है कि राज्य "समाज के भीतर एक संगठन" (an association within society) है।

3. नियंत्रण पद्धति एवं बलप्रयोग:
  • समाज: नैतिक नियमों, रीति-रिवाजों और सामाजिक सम्मान/अपमान के माध्यम से कार्य करता है। समाज किसी को जेल नहीं भेज सकता, अधिक से अधिक सामाजिक बहिष्कार कर सकता है।
  • राज्य: संप्रभु लिखित कानूनों द्वारा शासन करता है और कानून तोड़ने वालों को पुलिस, सेना और न्यायपालिका के माध्यम से शारीरिक व आर्थिक दंड देने का वैधानिक अधिकार रखता है।

4. निश्चित भू-भाग की अनिवार्यता: राज्य के लिए एक निश्चित भौगोलिक सीमा अनिवार्य है। जबकि समाज के लिए कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती—जैसे विश्व मुस्लिम समाज या हिंदू समाज सीमाओं से परे विश्वभर में फैला हुआ है।

5. सदस्यता का स्वरूप: राज्य की सदस्यता कानूनी रूप से अनिवार्य होती है (जन्म से ही व्यक्ति किसी राज्य का नागरिक बनता है)। समाज में विभिन्न सांस्कृतिक या साहित्यिक समूहों की सदस्यता स्वैच्छिक होती है।

निष्कर्ष: राज्य और समाज को एक मान लेना सर्वाधिकारवाद (Fascism) को जन्म देता है, जहां राज्य व्यक्ति के व्यक्तिगत, सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में अनुचित हस्तक्षेप करने लगता है।
उदाहरण 5
राज्य और राष्ट्र में क्या अंतर है? क्या कोई राष्ट्र बिना राज्य के जीवित रह सकता है? (अंक: 8)
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
1. राज्य और राष्ट्र में अंतर:
आधार राज्य (State) राष्ट्र (Nation)
मूल स्वरूप कानूनी, राजनीतिक एवं संप्रभु बाध्यकारी संगठन। एक मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक एवं भावनात्मक एकता की अनुभूति।
आवश्यक तत्व जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार और संप्रभुता। समान भाषा, ऐतिहासिक स्मृति, संस्कृति व साझा भविष्य की भावना।
संप्रभुता संप्रभुता राज्य का अनिवार्य प्राण है। राष्ट्र के पास कानूनी संप्रभुता होना अनिवार्य नहीं है।

2. क्या कोई राष्ट्र बिना राज्य के जीवित रह सकता है? हां, कोई राष्ट्र बिना किसी संप्रभु राज्य के भी जीवित रह सकता है।
  • यहूदी राष्ट्र का उदाहरण: 70 ईस्वी में रोमनों द्वारा यरूशलेम नष्ट किए जाने के बाद यहूदी विश्वभर में बिखर गए (डायस्पोरा)। उनके पास कोई अपनी भूमि, सरकार या राज्य नहीं था, फिर भी वे लगभग 2000 वर्षों तक अपनी राष्ट्रीय पहचान जीवित रखकर 1948 में इजरायल राज्य बनाने में सफल रहे।
  • पोलिश राष्ट्र का इतिहास: 18वीं सदी के अंत में जब रूस, प्रशा और ऑस्ट्रिया ने पोलैंड का विभाजन कर लिया, तब यूरोप के मानचित्र से पोलैंड राज्य मिट गया। किंतु पोलिश भाषा व संस्कृति के बल पर राष्ट्र जीवित रहा और 1918 में पुनः स्वतंत्र राज्य बना।
  • वर्तमान कुर्द राष्ट्र: तुर्की, इराक, ईरान और सीरिया में रह रहे 3 करोड़ से अधिक कुर्द अपनी विशिष्ट भाषा व संस्कृति के कारण एक राष्ट्र हैं, किंतु उनके पास अपना कोई राज्य नहीं है।

3. बहुराष्ट्रीय राज्य एवं राष्ट्र-राज्य: एक ही राज्य में कई राष्ट्रीयताएं हो सकती हैं (जैसे ब्रिटेन में अंग्रेज, स्कॉटिश और वेल्श; अथवा बहुभाषी भारत)। और जब एक राष्ट्र की सीमाएं एक स्वतंत्र राज्य की सीमाओं से मिल जाती हैं, तो उसे राष्ट्र-राज्य (Nation-State) कहा जाता है।
उदाहरण 6
राज्य के अनिवार्य तत्व के रूप में भू-भाग के महत्व और इसके त्रिविमीय स्वरूप की विवेचना कीजिए। (अंक: 8)
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
1. भू-भाग की अनिवार्यता: निश्चित भौगोलिक भू-भाग के बिना आधुनिक राज्य का निर्माण असंभव है। यद्यपि सर जॉन सीले जैसे कुछ विचारकों ने इसे गौण माना, किंतु राजनीति विज्ञान का सर्वमान्य मत है कि स्थायी भूमि के बिना राजनीतिक समाज टिक नहीं सकता। खानाबदोश कबीलों के पास नेता और लोग होने पर भी भूमि के अभाव में वे राज्य नहीं हैं।

2. राज्य के भू-भाग का त्रिविमीय (Three-Dimensional) स्वरूप: राज्य का भू-भाग केवल जमीन की सतह नहीं है, बल्कि इसके तीन स्पष्ट आयाम हैं:
  • क. स्थलीय भाग एवं भूगर्भ (Terrestrial Domain): अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर की समस्त भूमि, पर्वत, मैदान तथा जमीन के नीचे पाताल तक स्थित सभी खनिज संपदा (कोयला, पेट्रोलियम, धातुएं)।
  • ख. प्रादेशिक जलसीमा (Maritime Domain):
    1. आंतरिक जल: समस्त नदियां, झीलें और नहरें।
    2. प्रादेशिक समुद्र (Territorial Sea): संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन (UNCLOS, 1982) के अनुसार समुद्र तट से समुद्र की ओर 12 समुद्री मील (लगभग 22.2 किमी) तक का जलक्षेत्र राज्य की पूर्ण संप्रभुता के अधीन होता है।
    3. इसके आगे 24 समुद्री मील तक का सीमा शुल्क क्षेत्र और 200 समुद्री मील तक का विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) होता है।
  • ग. वायुमंडल (Aerial Domain): 1944 की शिकागो अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संधि के अनुसार प्रत्येक संप्रभु राज्य अपने भू-भाग और जलसीमा के ऊपर स्थित संपूर्ण वायुमंडल पर अनन्य संप्रभु अधिकार रखता है। बिना अनुमति कोई विदेशी विमान इसमें प्रवेश नहीं कर सकता।

3. भू-भाग के आकार का महत्व: कानूनन राज्य के आकार की कोई न्यूनतम सीमा नहीं है। मोनाको (2 वर्ग किमी) और रूस (1.71 करोड़ वर्ग किमी) दोनों समान राज्य हैं। किंतु व्यावहारिक दृष्टि से विशाल भू-भाग राज्य को प्राकृतिक संसाधन, कृषि सुरक्षा और सामरिक गहराई (सुरक्षा) प्रदान करता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

राज्य और सरकार को एक ही समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

राज्य स्थायी, संप्रभु और अमूर्त संस्था है जिसका सदस्य प्रत्येक नागरिक होता है; जबकि सरकार राज्य की अस्थायी प्रतिनिधि है जिसमें कुछ चुने हुए लोग होते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि राज्य के लिए किसी निश्चित जनसंख्या का होना कानूनी रूप से जरूरी है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

प्राचीन विचारकों ने संख्या सुझाई थी, किंतु आधुनिक राजनीति विज्ञान में जनसंख्या का कोई निश्चित नियम नहीं है (वैटिकन सिटी की 800 और भारत की 140 करोड़ दोनों राज्य हैं)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

राज्य और राष्ट्र को एक मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

राज्य एक कानूनी और राजनीतिक संगठन है जिसके पास संप्रभुता होती है; जबकि राष्ट्र एक सांस्कृतिक व भावनात्मक एकता की भावना है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भू-भाग का अर्थ केवल जमीन की ऊपरी सतह समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

राज्य का भू-भाग त्रिविमीय होता है: इसमें जमीन, पाताल का भूगर्भ, 12 समुद्री मील तक की जलसीमा और ऊपर का संपूर्ण वायुमंडल शामिल है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

राज्य के चार अनिवार्य तत्व एवं अन्य सामाजिक संगठनों से अंतर WBCHSE कक्षा 11 • राजनीति विज्ञान • प्रोफेसर गार्नर का प्रामाणिक सिद्धांत एवं संप्रभुता के दो आयाम 1. जनसंख्या (Population) • मानव समाज के बिना राज्य की कल्पना असंभव • प्लेटो: 5,040 नागरिक | रूसो: 10,000 • अरस्तू: न अत्यधिक बड़ी, न अत्यंत छोटी (संतुलित) • नागरिक, विदेशी और प्रवासियों का वर्गीकरण 2. निश्चित भू-भाग (Territory) • घुमंतू कबीले राज्य का निर्माण नहीं कर सकते • स्थलीय भाग, भूगर्भीय खनिज व प्राकृतिक संपदा • प्रादेशिक जलसीमा (12 समुद्री मील / UNCLOS) • थल और जल सीमा के ऊपर का संपूर्ण वायुमंडल 3. सरकार (Government) • राज्य की व्यावहारिक कार्यपालिका एवं इच्छा का संवाहक • कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका का तंत्र • राज्य अमूर्त व स्थायी है; सरकार मूर्त व परिवर्तनशील • संसदीय, अध्यक्षीय, एकात्मक एवं संघीय स्वरूप 4. संप्रभुता (Sovereignty) • राज्य का प्राणतत्व और सर्वोच्च निरपेक्ष शक्ति • ज्यां बोदां (1576): संप्रभुता के जनक • आंतरिक: सीमाओं के भीतर पूर्ण कानूनी सर्वोच्चता • बाह्य: किसी विदेशी सत्ता या दबाव से पूर्ण स्वतंत्रता राज्य एवं अन्य सामाजिक संस्थाओं में मूलभूत तुलनात्मक अंतर राज्य बनाम समाज (Society)

समाज राज्य से प्राचीन और व्यापक है। समाज के पास निश्चित भू-भाग या दमनकारी शक्ति नहीं होती; राज्य के पास बाध्यकारी संप्रभु शक्ति होती है।

राज्य बनाम सरकार (Govt)

राज्य मूल अमूर्त संस्था है; सरकार उसका अस्थायी प्रतिनिधि है। राज्य का विरोध देशद्रोह है, जबकि सरकार की आलोचना एक वैध लोकतांत्रिक अधिकार है।

राज्य बनाम राष्ट्र (Nation)

राष्ट्र एक मनोवैज्ञानिक व सांस्कृतिक एकता की भावना है; राज्य एक राजनीतिक व कानूनी ढांचा है। बिना राज्य के भी राष्ट्र संभव है (जैसे 1948 से पूर्व यहूदी)।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
अंग्रेजी शब्द 'State' लैटिन 'Status' से निकला है, और मैकियावेली ने 1513 में आधुनिक अर्थ में 'lo stato' का प्रयोग किया।
मुख्य बिंदु 2
प्रोफेसर जे. डब्ल्यू. गार्नर द्वारा दी गई परिभाषा राजनीति विज्ञान में सबसे प्रामाणिक व वैज्ञानिक मानी जाती है।
मुख्य बिंदु 3
राज्य के चार अनिवार्य तत्व हैं: जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार और संप्रभुता।
मुख्य बिंदु 4
प्लेटो ने आदर्श जनसंख्या 5040 और रूसो ने 10,000 सुझाई थी; आधुनिक राज्यों में जनसंख्या की कोई निश्चित सीमा नहीं है।
मुख्य बिंदु 5
राज्य का भू-भाग त्रिविमीय है—स्थलीय भाग व भूगर्भ, 12 समुद्री मील तक प्रादेशिक जलसीमा (UNCLOS), और ऊपरी आकाशसीमा।
मुख्य बिंदु 6
सरकार राज्य की व्यावहारिक कार्यपालिका एजेंसी है, जिसके माध्यम से राज्य की इच्छा का निर्माण व क्रियान्वयन होता है।
मुख्य बिंदु 7
ज्यां बोदां ने 1576 में संप्रभुता का सिद्धांत दिया; संप्रभुता राज्य की सर्वोच्च, निरपेक्ष और अविभाज्य शक्ति है।
मुख्य बिंदु 8
आंतरिक संप्रभुता घरेलू मामलों में सर्वोच्चता देती है, जबकि बाह्य संप्रभुता अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है।
मुख्य बिंदु 9
राज्य स्थायी और संप्रभु है, जबकि सरकार अस्थायी है; सरकार की नीतियों का विरोध करना नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है।
मुख्य बिंदु 10
समाज राज्य से प्राचीन व व्यापक है; राष्ट्र एक सांस्कृतिक-मनोवैज्ञानिक भावना है, जबकि राज्य एक कानूनी-राजनीतिक संरचना है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
1513 में किस राजनीतिक विचारक ने सर्वप्रथम आधुनिक अर्थ में 'lo stato' (राज्य) शब्द का प्रयोग किया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: इटली के पुनर्जागरणकालीन विचारक निकोलो मैकियावेली ने अपनी पुस्तक 'द प्रिंस' में।
2
प्रोफेसर गार्नर के अनुसार राज्य के चार अनिवार्य तत्व कौन-से हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
  1. जनसंख्या; 2. निश्चित भू-भाग; 3. सरकार; 4. संप्रभुता।

3
अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानून (UNCLOS 1982) के अनुसार प्रादेशिक जलसीमा की मानक चौड़ाई कितनी है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: तटरेखा से 12 समुद्री मील (लगभग 22.2 किलोमीटर) तक।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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