Follow Us
माध्यम चुनें / Select Medium:
Eng (English) Beng (বাংলা) Hindi (हिन्दी)
WBB • कक्षा XI • Political Science • अध्याय 10
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

समकालीन भारतीय राजनीतिक चिंतन: चयनित विचारक

समकालीन भारतीय राजनीतिक चिंतन भारतीय सभ्यता की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, उपनिवेशवाद विरोधी स्वतंत्रता संग्राम तथा आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों का एक अद्भुत एवं गतिशील बौद्धिक समन्वय है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर बीसवीं सदी के मध्य तक भारतीय विचारकों ने एक ओर ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति का शंखनाद किया, तो दूसरी ओर सदियों पुरानी जाति व्यवस्था, अस्पृश्यता, निर्धनता एवं सामाजिक रूढ़ियों के समूल उन्मूलन का मार्ग प्रशस्त किया। इस अध्याय में पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद (WBCHSE) द्वारा निर्धारित छह महान विचारकों के राजनीतिक दर्शन का गहन परीक्षण किया गया है: स्वामी विवेकानंद का आध्यात्मिक राष्ट्रवाद एवं शूद्र जागरण; रवींद्रनाथ टैगोर का विश्वमानवतावाद एवं आक्रामक राष्ट्र-राज्य की समीक्षा; महात्मा गांधी की सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह एवं सर्वोदय की नैतिक राजनीति; डॉ. बी.आर. आंबेडकर का सामाजिक न्याय, जाति उन्मूलन एवं संवैधानिक लोकतंत्र; नेताजी सुभाषचंद्र बोस का पूर्ण स्वराज्य, साम्यवाद एवं राष्ट्रीय नियोजन; तथा मानवेंद्रनाथ रॉय (एम.एन. रॉय) का मार्क्सवाद से उग्र मानवतावाद एवं दलविहीन लोकतंत्र की ओर वैचारिक विकास।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

समकालीन भारतीय राजनीतिक चिंतन का अध्ययन राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए आधुनिक भारतीय लोकतंत्र, सामाजिक न्याय एवं विदेश नीति के दार्शनिक आधारों को समझने हेतु परम आवश्यक है। पश्चिमी राजनीतिक सिद्धांतों का अंधानुकरण करने के बजाय इन मनीषियों ने स्वतंत्रता को केवल विदेशी शासन से मुक्ति तक सीमित न रखकर उसे नैतिक स्वाधीनता, मानवीय गरिमा, सामाजिक समता तथा वैश्विक बंधुत्व के व्यापक फलक पर परिभाषित किया। उनके विचार आज भी भारत में पंथनिरपेक्षता, सत्ता के विकेंद्रीकरण, कमजोर वर्गों के सशक्तिकरण तथा विश्व शांति के विमर्श को निरंतर दिशा प्रदान करते हैं।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. स्वामी विवेकानंद: आध्यात्मिक राष...
2 2. रवींद्रनाथ टैगोर: विश्वमानवतावाद...
3 3. महात्मा गांधी: सत्य, अहिंसा, सत्...
4 4. डॉ. बी.आर. आंबेडकर: सामाजिक न्या...
5 5. नेताजी सुभाषचंद्र बोस: उग्र साम्...
6 6. मानवेंद्रनाथ रॉय (एम.एन. रॉय): म...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. स्वामी विवेकानंद: आध्यात्मिक राष्ट्रवाद, व्यावहारिक वेदांत एवं शूद्र जागरण

व्यावहारिक वेदांत, मानव सेवा एवं शूद्र जागरण

श्री रामकृष्ण परमहंस के प्रमुख शिष्य स्वामी विवेकानंद (1863–1902) ने अद्वैत वेदांत के प्राचीन दर्शन को गुफाओं व जंगलों से निकालकर सामाजिक उत्थान और राष्ट्रीय नवजागरण का सशक्त माध्यम बनाया। वर्ष 1893 में शिकागो की विश्व धर्म संसद में दिए गए उनके ऐतिहासिक उद्बोधन ने भारतीय संस्कृति को वैश्विक पटल पर प्रतिष्ठित किया और पराधीन भारतवासियों में अभूतपूर्व आत्मगौरव का संचार किया।

विवेकानंद के राजनीतिक एवं सामाजिक चिंतन के प्रमुख आयाम:
  • व्यावहारिक वेदांत (Practical Vedanta): उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रत्येक प्राणी के भीतर एक ही दिव्य आत्मा (ब्रह्म) का वास है। इसलिए मानव-मात्र की निस्वार्थ सेवा ही ईश्वर की सच्ची उपासना है ('जीव ही शिव है')।
  • दरिद्र नारायण की संकल्पना: विवेकानंद ने घोषित किया कि ईश्वर सर्वाधिक रूप से भूखे, शोषित और निरक्षर गरीबों के रूप में प्रकट होते हैं। उन्होंने निर्भीक शब्दों में कहा—'भूखे पेट धर्म नहीं सिखाया जा सकता'; भूखी जनता को आध्यात्मिकता का उपदेश देना एक क्रूर उपहास है।
  • शूद्र जागरण की ऐतिहासिक भविष्यवाणी: सामाजिक विकास के चक्रीय सिद्धांत के आधार पर उन्होंने रेखांकित किया कि समाज क्रमशः चार वर्गों के आधिपत्य से गुजरता है—ब्राह्मण (पुरोहित), क्षत्रिय (शासक/योद्धा), वैश्य (व्यापारी), और अंततः शूद्र (श्रमिक/मेहनतकश)। उन्होंने भविष्यवाणी की कि आगामी युग श्रमजीवी सर्वहारा वर्ग का होगा, जिसे उन्होंने 'शूद्र जागरण' कहा।
  • मनुष्य निर्माणकारी शिक्षा (Man-Making Education): वे ऐसी शिक्षा के पक्षधर थे जो चरित्र का निर्माण करे, आत्मविश्वास जगाए तथा पूर्वी आध्यात्मिक मूल्यों और पश्चिमी वैज्ञानिक-तकनीकी कौशल का समन्वय करे।

विवेकानंद का आध्यात्मिक राष्ट्रवाद किसी अन्य देश या संस्कृति के प्रति आक्रामक नहीं था; यह आत्म-बलिदान, दरिद्रों के उद्धार तथा विश्व-कल्याण के नैतिक दायित्व पर आधारित एक उदात्त मानवीय राष्ट्रवाद था।

2. रवींद्रनाथ टैगोर: विश्वमानवतावाद एवं आक्रामक राष्ट्र-राज्य की समीक्षा

विश्वमानवता, 'नेशनलिज्म' एवं स्वदेशी समाज

नोबेल पुरस्कार विजेता कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर (1861–1941) आधुनिक युग में आक्रामक एवं संकीर्ण राष्ट्रवाद के सबसे प्रखर आलोचक थे। प्रथम विश्व युद्ध के संहारकारी विनाश की पृष्ठभूमि में प्रकाशित उनकी अमर कृति नेशनलिज्म (Nationalism, 1917) में उन्होंने विश्वमानवतावाद (Universal Humanism) का उद्घोष किया।

टैगोर के राजनीतिक विचारों के आधारभूत स्तंभ:
  • समाज एवं राष्ट्र-राज्य में अंतर: टैगोर ने 'समाज' (Society) और 'नेशन' (Nation) के मध्य स्पष्ट भेद किया। समाज मानव संबंधों, सहयोग, संस्कृति और नैतिक संवेदनाओं का एक स्वाभाविक व सजीव संगठन है; जबकि पश्चिमी 'नेशन-स्टेट' शक्ति विस्तार, आर्थिक दोहन और सैन्य प्रभुत्व स्थापित करने वाली एक यांत्रिक व निर्दयी संस्था है।
  • देशभक्ति बनाम मानवता: टैगोर ने स्पष्ट शब्दों में कहा—'देशभक्ति हमारा अंतिम आध्यात्मिक आश्रय नहीं हो सकती; मेरा सच्चा आश्रय मानवता है। मैं कांच के मूल्य पर हीरा नहीं खरीदूंगा, और जीते-जी मानवता पर देशभक्ति को कभी विजयी नहीं होने दूंगा।'
  • स्वदेशी समाज (1904): राज्य की सत्ता पर निर्भर रहने के बजाय उन्होंने ग्रामीण समाज की आत्मनिर्भरता और आत्मशक्ति (आत्म-विश्वास) पर बल दिया। ग्राम सुधार, कृषि सहकारी समितियां, लोककला और शिक्षा के माध्यम से सामाजिक एकता सुदृढ़ करना उनका लक्ष्य था।
  • विश्वभारती एवं वैश्विक समन्वय: शांतिनिकेतन में स्थापित 'विश्वभारती' का ध्येय-वाक्य था—'यत्र विश्वं भवत्येकनीड़म्' (जहां संपूर्ण विश्व एक घोंसले में आकर मिलता है)।

3. महात्मा गांधी: सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह एवं सर्वोदय

राजनीति का नैतिकीकरण, स्वराज्य एवं ग्रामीण आत्मनिर्भरता

राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (1869–1948) ने राजनीति को शक्ति-लोलुपता से मुक्त कर सत्य और अहिंसा के नैतिक धरातल पर प्रतिष्ठित किया। मैकियावेली के विचारों को खारिज करते हुए गांधीजी ने सिद्ध किया कि साधन और साध्य का संबंध अटूट है; हिंसक या अनैतिक साधनों से कभी भी न्यायसंगत एवं नैतिक लक्ष्य प्राप्त नहीं किए जा सकते।

मूल अवधारणादार्शनिक अर्थ एवं व्यावहारिक स्वरूप
सत्य एवं अहिंसा (Satya & Ahimsa)गांधीजी के अनुसार 'सत्य ही ईश्वर है'। अहिंसा केवल हिंसा न करना नहीं है, बल्कि समस्त प्राणियों के प्रति अगाध प्रेम व करुणा है। यह कायरता नहीं, सर्वोच्च आत्मबल है।
सत्याग्रह (Satyagraha)'सत्य पर दृढ़ आग्रह'। विरोधी को कष्ट दिए बिना स्वयं कष्ट (तपस्या) सहकर विरोधी के विवेक और हृदय को परिवर्तित करने का नैतिक संघर्ष।
स्वराज्य (Swaraj)केवल अंग्रेजों का निष्कासन नहीं, बल्कि अपनी इंद्रियों पर आत्म-नियंत्रण, आर्थिक स्वावलंबन और नैतिक आत्म-शासन (हिंद स्वराज, 1909)।
सर्वोदय एवं ट्रस्टीशिपजॉन रस्किन की पुस्तक Unto This Last से प्रेरित 'सभी का सर्वांगीण उत्थान'। ट्रस्टीशिप सिद्धांत के अनुसार पूंजीपति अपने धन के स्वामी नहीं, बल्कि समाज के कल्याण हेतु उसके न्यासी (Trustee) हैं।
ग्राम स्वराज्य (Gram Swaraj)सत्ता का पूर्ण विकेंद्रीकरण, जहां प्रत्येक गांव प्रत्यक्ष लोकतंत्र व कुटीर उद्योगों (खादी) द्वारा संचालित एक आत्मनिर्भर स्वायत्त गणराज्य बने।

4. डॉ. बी.आर. आंबेडकर: सामाजिक न्याय, जाति उन्मूलन एवं संविधान

सामाजिक लोकतंत्र, दलित मुक्ति एवं संवैधानिक नैतिकता

भारतीय संविधान के मुख्य निर्माता डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर (1891–1956) आधुनिक भारत में सामाजिक लोकतंत्र एवं मानवाधिकारों के सबसे प्रखर प्रणेता थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि यदि राजनीतिक स्वाधीनता के साथ सामाजिक व आर्थिक समानता स्थापित नहीं हुई, तो स्वतंत्रता केवल उच्च वर्ग के एकाधिकार में बदल जाएगी।

डॉ. आंबेडकर के राजनीतिक दर्शन के मुख्य तत्व:
  • जाति प्रथा का उन्मूलन (Annihilation of Caste, 1936): जाति प्रथा केवल श्रम का विभाजन नहीं, अपितु श्रमिकों का अस्वाभाविक एवं श्रेणीबद्ध विभाजन है। जन्म आधारित अस्पृश्यता और ऊंच-नीच मानवीय गरिमा पर कलंक है। इसके निवारण हेतु उन्होंने अंतर्जातीय विवाह एवं धर्मग्रंथों की अंधभक्ति समाप्त करने का आह्वान किया।
  • राजनीतिक लोकतंत्र की नींव सामाजिक लोकतंत्र: 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा के अंतिम भाषण में उन्होंने चेतावनी दी—'26 जनवरी 1950 को हम अंतर्विरोधों के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हमारे पास समानता होगी ('एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य'), लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता रहेगी। इस अंतर्विरोध को जल्द से जल्द दूर करना होगा, अन्यथा असमानता के शिकार लोग राजनीतिक लोकतंत्र के इस ढांचे को ध्वस्त कर देंगे।'
  • लोकतंत्र की पवित्र त्रयी: स्वतंत्रता (Liberty), समता (Equality) और बंधुता (Fraternity) परस्पर अविभाज्य हैं। बंधुता के अभाव में स्वतंत्रता और समता कभी स्वाभाविक नहीं बन सकतीं।
  • दलित समाज को आह्वान: अधिकारों की प्राप्ति एवं आत्मसम्मान के जागरण हेतु उनका अमर मंत्र था: 'शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो' (Educate, Agitate, Organize)।
  • संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality): बहुमत के अत्याचार से अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा हेतु विधि के शासन एवं संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अटूट निष्ठा।

5. नेताजी सुभाषचंद्र बोस: उग्र साम्राज्यवाद-विरोध, साम्यवाद एवं राष्ट्रीय पुनर्निर्माण

पूर्ण स्वराज्य, साम्यवाद का भारतीय स्वरूप एवं राष्ट्रीय योजना

नेताजी सुभाषचंद्र बोस (1897–1945) भारतीय स्वाधीनता संग्राम में वामपंथी एवं क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के सिरमौर थे। उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से किसी भी प्रकार के समझौते को अस्वीकार करते हुए तत्काल एवं बिना शर्त पूर्ण स्वराज्य तथा स्वतंत्र भारत के समाजवादी पुनर्निर्माण का संकल्प लिया।

नेताजी के राजनीतिक चिंतन की प्रमुख विशेषताएं:
  • साम्यवाद की अवधारणा (Samyavada): अपनी पुस्तक The Indian Struggle में नेताजी ने 'साम्यवाद' का प्रतिपादन किया। यह पश्चिमी साम्यवाद का अंधानुकरण नहीं था, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक व आध्यात्मिक मूल्यों के साथ वैज्ञानिक समाजवाद और राजकीय अनुशासन का एक मौलिक भारतीय समन्वय था।
  • राष्ट्रीय योजना समिति (1938): 1938 में हरिपुरा कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में 'राष्ट्रीय योजना समिति' (National Planning Committee) का गठन किया। वे निर्धनता उन्मूलन हेतु राज्य-नियंत्रित भारी औद्योगिकीकरण और वैज्ञानिक कृषि के अग्रदूत थे।
  • पंथनिरपेक्ष एकता एवं महिला सशक्तिकरण: आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) और आज़ाद हिंद सरकार में उन्होंने हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई को एक साझा राष्ट्रीय पहचान में पिरोया। कैप्टन लक्ष्मी सहगल के नेतृत्व में गठित रानी झांसी रेजिमेंट आधुनिक एशिया की प्रथम महिला सैन्य वाहिनी थी।
  • सशस्त्र प्रतिरोध: उनका अटूट विश्वास था कि साम्राज्यवादी शक्ति बिना सशस्त्र संघर्ष के सत्ता नहीं छोड़ेगी। उनका प्रसिद्ध जयघोष था: 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा!'

6. मानवेंद्रनाथ रॉय (एम.एन. रॉय): मार्क्सवाद से उग्र मानवतावाद

क्रांतिकारी विकास, 22 सूत्र एवं दलविहीन लोकतंत्र

मानवेंद्रनाथ रॉय (नरेंद्रनाथ भट्टाचार्य, 1887–1954) बीसवीं सदी के एक विलक्षण अंतरराष्ट्रीय दार्शनिक थे। युगांतर क्रांतिकारी दल से अपनी यात्रा शुरू कर उन्होंने मैक्सिकन कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की, 1920 में लेनिन के साथ कॉमिन्टर्न में उपनिवेशी नीति पर बहस की, और अंततः रूढ़िवादी मार्क्सवाद का त्याग कर 1946 में अपने 22 सूत्रों (22 Theses) के माध्यम से उग्र मानवतावाद (Radical Humanism / New Humanism) का प्रतिपादन किया।

उग्र मानवतावाद एवं दलविहीन लोकतंत्र के सिद्धांत:
  • व्यक्ति की सर्वोच्चता: रॉय ने प्रोटागोरस के कथन को दोहराते हुए कहा—'मनुष्य ही सभी वस्तुओं का मानदंड है' (Man is the measure of all things)। राष्ट्र, राज्य या वर्ग के नाम पर व्यक्ति की स्वतंत्रता और तार्किकता की बलि नहीं दी जा सकती।
  • संसदीय दलीय व्यवस्था की आलोचना: उन्होंने आधुनिक संसदीय लोकतंत्र को राजनीतिक दलों के अभिजात्य वर्ग की तानाशाही बताया। दलगत राजनीति सत्ता हथियाने का अवसरवादी साधन बन चुकी है जो नागरिक को केवल चुनाव में वोट देने वाली जड़ वस्तु बना देती है।
  • दलविहीन संगठित लोकतंत्र (Partyless Democracy): उन्होंने राजनीतिक दलों से मुक्त प्रत्यक्ष लोकतंत्र का प्रस्ताव दिया, जिसका निर्माण गांवों और नगरों में स्थानीय 'जन समितियों' (People's Committees / लोक समिति) द्वारा होगा। जनता स्वयं नीति निर्माण में भाग लेगी और जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने (Right to Recall) का अधिकार रखेगी।
  • वैज्ञानिक नवजागरण: किसी भी राजनीतिक परिवर्तन से पूर्व वे जनता के विवेक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के नवजागरण को अनिवार्य मानते थे, ताकि समाज धार्मिक रूढ़ियों और भाग्यवाद से मुक्त हो सके।

महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक सिद्धांत एवं कालक्रम

गांधीवादी नैतिक राजनीति का समीकरण
सत्याग्रह = सत्य (Truth) + अहिंसा (Non-violence) + तपस्या (विरोधी के विवेक को जगाने हेतु आत्म-कष्ट)
आंबेडकर की लोकतांत्रिक त्रयी
संवैधानिक सामाजिक लोकतंत्र = स्वतंत्रता (Liberty) + समता (Equality) + बंधुता (Fraternity)
रॉय का उग्र मानवतावादी समीकरण
उग्र मानवतावाद = व्यक्ति की स्वतंत्रता + वैज्ञानिक तार्किकता + दलविहीन जन समितियां

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1: स्वामी विवेकानंद के 'व्यावहारिक वेदांत' (Practical Vedanta) से क्या तात्पर्य है? इसका राजनीतिक एवं सामाजिक महत्व क्या है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

स्वामी विवेकानंद ने अद्वैत वेदांत के ब्रह्मज्ञान को संन्यासियों की कुटिया से निकालकर समाज की दैनंदिन सेवा में प्रयुक्त किया, जिसे 'व्यावहारिक वेदांत' कहा जाता है:

  1. सर्वव्यापी ब्रह्म की धारणा: अद्वैत वेदांत के अनुसार प्रत्येक मनुष्य की आत्मा में वही परम चैतन्य (ब्रह्म) विद्यमान है। अतः जन्म के आधार पर किसी को अछूत, नीच या तुच्छ समझना घोर आध्यात्मिक अपराध है।

  2. जीव सेवा ही शिव सेवा: विवेकानंद ने सिखाया कि मंदिरों में ईश्वर को ढूंढने के बजाय समाज के सबसे पीड़ित, असहाय और शोषित 'दरिद्र नारायण' की सेवा करना ही ईश्वर की सर्वोत्तम पूजा है।

  3. राजनीतिक व सामाजिक महत्व: पराधीनता और हीनभावना से ग्रस्त भारतवासियों में इस दर्शन ने अद्भुत आत्मविश्वास, निर्भयता और देशप्रेम का संचार किया। स्वाधीनता सेनानियों के लिए देश के गरीबों का उत्थान और विदेशी दासता से मुक्ति एक पवित्र आध्यात्मिक कर्तव्य बन गई।

उदाहरण 2
प्रश्न 2: रवींद्रनाथ टैगोर ने पश्चिमी आक्रामक राष्ट्रवाद की आलोचना किस प्रकार की?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

रवींद्रनाथ टैगोर ने अपने 1917 के व्याख्यान संग्रह 'नेशनलिज्म' (Nationalism) में पश्चिमी राष्ट्रवाद की कटु आलोचना की:

  1. समाज और नेशन में अंतर: टैगोर के अनुसार 'समाज' मनुष्य के स्वाभाविक प्रेम, संस्कृति और नैतिक सहयोग का सजीव रूप है। इसके विपरीत 'नेशन' (राष्ट्र-राज्य) सत्ता, शोषण और आक्रामकता का एक यांत्रिक संगठन है जो मानवीय संवेदनाओं को समाप्त कर देता है।

  2. राष्ट्रवाद विनाशकारी यंत्र के समान: पश्चिमी राष्ट्र-राज्य स्वार्थ और घमंड की ऐसी मशीन बन चुका है जो अन्य देशों को गुलाम बनाती है और अनिवार्य रूप से विश्व युद्धों को जन्म देती है।

  3. विश्वमानवता की सर्वोच्चता: टैगोर ने देशभक्ति से ऊपर मानवता को स्थान दिया। उनका स्पष्ट उद्घोष था—'देशभक्ति हमारा अंतिम आध्यात्मिक आश्रय नहीं हो सकती; मेरा आश्रय मानवता है।' वे संकीर्ण सीमाओं के बजाय विश्व-बंधुत्व और सांस्कृतिक समन्वय के पक्षधर थे।

उदाहरण 3
प्रश्न 3: महात्मा गांधी के 'सत्याग्रह' के मूल तत्वों की विवेचना कीजिए। यह निष्क्रिय प्रतिरोध से किस प्रकार भिन्न है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

महात्मा गांधी के अनुसार 'सत्याग्रह' सत्य की शक्ति या आत्मबल पर आधारित अहिंसक संघर्ष है (सत्य + आग्रह = सत्य पर दृढ़ता से अड़े रहना):

सत्याग्रह और निष्क्रिय प्रतिरोध (Passive Resistance) में मूलभूत अंतर:

  1. दुर्बलों का हथियार बनाम आत्मबल: निष्क्रिय प्रतिरोध दुर्बलों का हथियार माना जाता है जिसमें शक्ति की कमी के कारण हिंसा का प्रयोग नहीं किया जाता, परंतु अवसर मिलने पर हिंसक बल का प्रयोग हो सकता है। इसके विपरीत सत्याग्रह नैतिक रूप से अत्यंत सबल व्यक्तियों का आध्यात्मिक अस्त्र है, जो किसी भी परिस्थिति में हिंसा से समझौता नहीं करता।

  2. द्वेष और घृणा की अनुपस्थिति: निष्क्रिय प्रतिरोध में विरोधी के प्रति मन में द्वेष, कटुता और बदले की भावना रह सकती है। सत्याग्रह में विरोधी के प्रति तनिक भी घृणा नहीं होती; सत्याग्रही व्यवस्था की बुराई से लड़ता है, व्यक्ति से नहीं।

  3. उद्देश्य: निष्क्रिय प्रतिरोध का लक्ष्य विरोधी को पराजित करना या झुकाना होता है। सत्याग्रह का लक्ष्य स्वयं कष्ट (तपस्या) सहकर विरोधी के विवेक को जगाना और उसके हृदय को परिवर्तित करना होता है।

उदाहरण 4
प्रश्न 4: डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने राजनीतिक लोकतंत्र के स्थायित्व के लिए सामाजिक लोकतंत्र को क्यों अपरिहार्य माना?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

25 नवंबर 1949 को संविधान सभा के समापन भाषण में डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि सामाजिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र बालू की दीवार सिद्ध होगा:

  1. सामाजिक लोकतंत्र का स्वरूप: आंबेडकर के अनुसार स्वतंत्रता, समता और बंधुता का जीवन में अंगीकार ही सामाजिक लोकतंत्र है। ये तीनों अलग-अलग नहीं, बल्कि एक अविभाज्य त्रयी हैं। बंधुता के बिना समता और स्वतंत्रता अस्तित्वहीन हैं।

  2. अंतर्विरोधों का जीवन: उन्होंने रेखांकित किया कि 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने पर भारत एक व्यक्ति, एक वोट और एक मूल्य के आधार पर राजनीतिक समता प्राप्त कर लेगा, परंतु समाज में जातिगत भेदभाव और अर्थव्यवस्था में भारी विषमता बनी रहेगी।

  3. राजनीतिक विनाश की आशंका: यदि इस सामाजिक-आर्थिक विषमता को समय रहते समाप्त नहीं किया गया, तो विषमता की चक्की में पिसने वाले करोड़ों पीड़ित लोग संविधान सभा द्वारा बनाए गए राजनीतिक लोकतंत्र के इस विशाल भवन को आक्रोश में आकर ध्वस्त कर देंगे।

उदाहरण 5
प्रश्न 5: नेताजी सुभाषचंद्र बोस की 'साम्यवाद' (Samyavada) की संकल्पना स्पष्ट कीजिए तथा राष्ट्रीय योजना में उनके योगदान पर प्रकाश डालिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

नेताजी सुभाषचंद्र बोस का समाजवादी और आर्थिक दृष्टिकोण अत्यंत मौलिक एवं व्यावहारिक था:

  1. साम्यवाद की संकल्पना: नेताजी ने अपनी पुस्तक 'The Indian Struggle' में लिखा कि स्वतंत्र भारत की विचारधारा 'साम्यवाद' होगी। यह सोवियत कम्युनिज्म की अंधी नकल नहीं थी। नेताजी ने भारतीय संस्कृति के आध्यात्मिक मूल्यों, अहिंसक परंपराओं और वैज्ञानिक समाजवाद व राजकीय अनुशासन का एक मौलिक भारतीय समन्वय प्रस्तुत किया।

  2. पूर्ण स्वाधीनता एवं शोषण-मुक्ति: नेताजी का मानना था कि आजादी का अर्थ केवल अंग्रेजों का जाना नहीं है, बल्कि भूख, निर्धनता, निरक्षरता और सामंती जमींदारों के शोषण से मुक्ति भी है।

  3. राष्ट्रीय योजना समिति (1938): 1938 में हरिपुरा कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में नेताजी ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में 'राष्ट्रीय योजना समिति' का गठन किया। उन्होंने रेखांकित किया कि स्वतंत्र भारत को गरीबी मिटाने के लिए राज्य के नेतृत्व में भारी औद्योगिकीकरण, वैज्ञानिक कृषि और सुनियोजित आर्थिक विकास को अपनाना होगा।

उदाहरण 6
प्रश्न 6: मानवेंद्रनाथ रॉय के 'उग्र मानवतावाद' (Radical Humanism) तथा 'दलविहीन लोकतंत्र' की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

एम.एन. रॉय ने बीसवीं सदी के चौथे दशक में रूढ़िवादी मार्क्सवाद का त्याग कर अपने '22 सूत्रों' में उग्र मानवतावाद की नींव रखी:

  1. उग्र मानवतावाद का मूल मंत्र: 'मनुष्य ही सभी वस्तुओं का मानदंड है' (Man is the measure of all things)। राज्य, वर्ग या राष्ट्र के नाम पर व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसकी तर्कबुद्धि को दबाया नहीं जा सकता। मनुष्य की तार्किकता और नैतिक विवेक ही प्रगति का वास्तविक आधार हैं।

  2. दलीय राजनीति की विफलता: रॉय के अनुसार संसदीय व्यवस्था में राजनीतिक दल केवल सत्ता हथियाने का अवसरवादी साधन बन गए हैं। वे चुनाव के समय जनता से छल करते हैं और निर्वाचित होने के बाद नागरिकों को सत्ता से पूर्णतः बेदखल कर देते हैं।

  3. दलविहीन लोकतंत्र (Partyless Democracy): उन्होंने राजनीतिक दलों के उन्मूलन का प्रस्ताव दिया। इसके स्थान पर गांवों और नगरों के वार्डों में स्थानीय 'जन समितियां' (People's Committees) गठित होंगी। यह समितियां शासन चलाएंगी, कानून बनाएंगी और जनप्रतिनिधियों के भ्रष्ट होने पर उन्हें वापस बुलाने (Right to Recall) का पूर्ण अधिकार रखेंगी।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि रवींद्रनाथ टैगोर राष्ट्रवाद के आलोचक थे इसलिए वे भारतीय स्वतंत्रता के विरोधी थे।

सही वैज्ञानिक तथ्य

टैगोर भारतीय स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे; उन्होंने केवल आक्रामक, साम्राज्यवादी और संकीर्ण पश्चिमी राष्ट्र-पूजा का विरोध किया जो मानवता को नष्ट करती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गांधीजी के सत्याग्रह और निष्क्रिय प्रतिरोध (Passive Resistance) को एक समान मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

निष्क्रिय प्रतिरोध दुर्बल व्यक्तियों की विवशता व तात्कालिक रणनीति है जिसमें द्वेष हो सकता है; सत्याग्रह नैतिक रूप से सबल व्यक्तियों का अहिंसक प्रेम और आत्मबल पर आधारित संघर्ष है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि डॉ. आंबेडकर केवल आरक्षण तक सीमित थे और पूरे संविधान के निर्माण में उनकी व्यापक भूमिका नहीं थी।

सही वैज्ञानिक तथ्य

डॉ. आंबेडकर केवल दलित हितों के रक्षक नहीं थे, अपितु वे भारतीय गणराज्य के मौलिक अधिकारों, निष्पक्ष न्यायपालिका, संसदीय लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं के मुख्य वास्तुकार थे।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

समकालीन भारतीय राजनीतिक चिंतन: मनीषियों का वैचारिक दर्शन विवेकानंद • टैगोर • गांधी • अंबेडकर • सुभाष चंद्र बोस • एम.एन. रॉय स्वामी विवेकानंद आध्यात्मिक राष्ट्रवाद व शूद्र जागरण
मनुष्य निर्माण शिक्षा, निर्भीक देशभक्ति, दरिद्र नारायण सेवा व शोषित वर्ग का उत्थान।
रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वमानवतावाद व स्वदेशी समाज
आंतरिक स्वतंत्रता, पश्चिमी हिंसक राष्ट्र-राज्य की आलोचना व सांस्कृतिक महामिलन (भारततीर्थ)।
महात्मा गांधी सत्य, अहिंसा, स्वराज व सर्वोदय
सत्याग्रह, ग्राम स्वराज (विकेंद्रीकृत लोकतंत्र), ट्रस्टीशिप सिद्धांत व राजनीति का नैतिकीकरण।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर सामाजिक न्याय व जाति-उन्मूलन
संवैधानिक लोकतंत्र, दलितों का उद्धार, सामाजिक लोकतंत्र की अनिवार्यता व बौद्ध नैतिकता।
सुभाष चंद्र बोस क्रांतिकारी साम्राज्यवाद विरोध व साम्यवाद
पूर्ण स्वराज्य, आजाद हिंद फौज, राष्ट्रीय योजना निर्माण व भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल समाजवाद।
मानवेंद्र नाथ रॉय (M.N. Roy) नव-मानवतावाद व दलविहीन लोकतंत्र
व्यक्ति की सर्वोच्च संप्रभु स्वतंत्रता, वैज्ञानिक तर्कवाद तथा जन-समितियों पर आधारित प्रत्यक्ष लोकतंत्र।
✦ भारतीय राजनीतिक दर्शन की कालजयी धरोहर: उपनिवेशवाद के विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम तथा आधुनिक भारत के सामाजिक, आर्थिक व मानवीय पुनर्निर्माण का प्रकाशपुंज।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. समकालीन भारतीय राजनीतिक चिंतन औपनिवेशिक पराधीनता से मुक्ति और न्यायपूर्ण आधुनिक समाज निर्माण का दार्शनिक समन्वय है।
मुख्य बिंदु 2
  1. स्वामी विवेकानंद ने व्यावहारिक वेदांत द्वारा मानव सेवा को ही ईश्वर सेवा ('जीव ही शिव है') सिद्ध किया और सर्वहारा वर्ग के ऐतिहासिक उत्थान को 'शूद्र जागरण' कहा।
मुख्य बिंदु 3
  1. रवींद्रनाथ टैगोर ने विश्वमानवतावाद के आधार पर पश्चिमी आक्रामक राष्ट्र-राज्य की यंत्रीकृत हिंसा की आलोचना की और 'स्वदेशी समाज' द्वारा ग्रामीण स्वावलंबन का आह्वान किया।
मुख्य बिंदु 4
  1. महात्मा गांधी ने राजनीति का नैतिकीकरण करते हुए सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह, स्वराज्य, सर्वोदय तथा सत्ता के विकेंद्रीकरण हेतु 'ग्राम स्वराज्य' का प्रतिपादन किया।
मुख्य बिंदु 5
  1. पूंजीपतियों को अपनी अतिरिक्त संपत्ति का स्वामी न मानकर समाज का ट्रस्टी बनने के लिए गांधीजी ने ट्रस्टीशिप सिद्धांत दिया।
मुख्य बिंदु 6
  1. डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने सामाजिक लोकतंत्र को राजनीतिक लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त बताया, जाति प्रथा के समूल उन्मूलन की वकालत की तथा 'शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो' का नारा दिया।
मुख्य बिंदु 7
  1. आंबेडकर ने चेतावनी दी कि यदि सामाजिक असमानता दूर नहीं हुई, तो पीड़ित जनता राजनीतिक लोकतंत्र के ढांचे को ही ध्वस्त कर देगी।
मुख्य बिंदु 8
  1. नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने बिना शर्त पूर्ण स्वराज्य और भारतीय परंपराओं से समन्वित समाजवादी विचारधारा 'साम्यवाद' का प्रारूप प्रस्तुत किया।
मुख्य बिंदु 9
  1. नेताजी ने 1938 में राष्ट्रीय योजना समिति गठित कर स्वतंत्र भारत के राजकीय औद्योगिकीकरण की नींव रखी तथा आज़ाद हिंद फ़ौज में पंथनिरपेक्षता व रानी झांसी रेजिमेंट द्वारा महिला समानता स्थापित की।
मुख्य बिंदु 10
  1. एम.एन. रॉय ने रूढ़ मार्क्सवाद से आगे बढ़कर उग्र मानवतावाद स्थापित किया तथा जन समितियों (लोक समितियों) के माध्यम से दलविहीन प्रत्यक्ष लोकतंत्र की रूपरेखा दी।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
2
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
5
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

ऑनलाइन CBT टेस्ट देकर तैयारी का मूल्यांकन करें

झारखण्ड बोर्ड परीक्षा पैटर्न पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्नों का ऑनलाइन टेस्ट दें। तुरंत परिणाम, समय विश्लेषण और प्रत्येक प्रश्न का विस्तृत हल प्राप्त करें।

AI अध्ययन मित्र

त्वरित शंका समाधान

समकालीन भारतीय राजनीतिक चिंतन: चयनित विचारक में कोई संदेह या प्रश्न है? हमारे AI अध्ययन मित्र से तुरंत समझें।