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WBB • कक्षा XI • Political Science • अध्याय 4
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

संविधान की समझ: परिभाषा एवं प्रकार

संविधान किसी संप्रभु राज्य का आधारभूत विधिक दस्तावेज एवं सर्वोच्च राजनीतिक विधान होता है। लैटिन क्रियापद 'कॉन्स्टिट्युएरे' से व्युत्पन्न संविधान राज्य की मूल सर्वोच्च विधि या न्यायशास्त्रीय भाषा में 'ग्रुंडनॉर्म' को निरूपित करता है, जिससे शासन के तीनों अंगों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—की संरचना, कार्यक्षेत्र एवं सीमाओं का निर्धारण होता है। संविधान न केवल राज्य सत्ता के अधिकारों को नियमित करता है, बल्कि सीमित सरकार के सिद्धांत द्वारा नागरिकों की मूलभूत स्वतंत्रताओं की रक्षा भी करता है। इस अध्याय में अरस्तू, लॉर्ड ब्राइस, ए. वी. डायसी एवं के. सी. व्हेयर द्वारा दी गई परिभाषाओं, संविधानवाद के दार्शनिक आधार, लिखित बनाम अलिखित तथा विकसित बनाम निर्मित संविधानों के तुलनात्मक स्वरूप, कठोर एवं लचीले संविधान के अंतर, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 में कठोरता व लचीलेपन के अद्वितीय समन्वय तथा एक आदर्श संविधान के आवश्यक लक्षणों का सांगोपांग विवेचन किया गया है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

लोकतांत्रिक सुशासन, विधि के शासन और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा को समझने के लिए संविधान की प्रकृति का अध्ययन अपरिहार्य है। राजनीति विज्ञान के अध्येताओं के लिए यह स्पष्ट करता है कि क्यों कोई भी सामान्य कानून संविधान से ऊपर नहीं हो सकता तथा संघीय व्यवस्था में लिखित और कठोर संविधान क्यों अनिवार्य होता है। ब्रिटिश संसद की लचीली सर्वोच्चता तथा अमेरिकी न्यायिक सर्वोच्चता के विपरीत भारतीय संविधान ने किस प्रकार सामाजिक न्याय, मौलिक अधिकारों और राष्ट्र के गतिशील विकास के बीच संतुलन साधने वाले एक सजीव दस्तावेज की रचना की, यह इस अध्याय से स्पष्ट होता है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. संविधान: अर्थ, परिभाषाएं एवं सर्...
2 2. संविधानवाद (Constitutionalism):...
3 3. प्रारूप आधारित वर्गीकरण: लिखित ब...
4 4. संशोधन प्रक्रिया आधारित वर्गीकरण...
5 5. भारतीय समन्वय: कठोरता एवं लचीलेप...
6 6. एक आदर्श संविधान के अनिवार्य लक्...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. संविधान: अर्थ, परिभाषाएं एवं सर्वोच्च विधिक प्रकृति

संविधान की संकल्पना एवं सर्वोच्च आधारभूत विधिक स्वरूप

अंग्रेजी शब्द Constitution की व्युत्पत्ति लैटिन क्रियापद 'Constituere' से हुई है, जिसका अर्थ है स्थापित करना, बनाना या व्यवस्था करना। आधुनिक विधि शास्त्र में संविधान विधायिका द्वारा पारित साधारण कानूनों जैसा कानून नहीं है; यह राज्य की सर्वोच्च आधारभूत विधि (Supreme Law of the Land / lex superior) या विधिवेत्ता हैंस केल्सन के शब्दों में ग्रुंडनॉर्म (Grundnorm) है।

प्रमुख राजनीतिक विचारकों द्वारा दी गई परिभाषाएं:
  • अरस्तू की परिभाषा (Politics): अरस्तू के अनुसार, 'संविधान राज्य के विभिन्न पदों की वह व्यवस्था है, जिसके द्वारा उन पदों के वितरण की पद्धति निर्धारित होती है, संप्रभु सत्ता का स्थान निश्चित होता है तथा राज्य और उसके सभी सदस्यों का अंतिम लक्ष्य तय किया जाता है।'
  • लॉर्ड जेम्स ब्राइस की परिभाषा (Studies in History and Jurisprudence): ब्राइस ने परिभाषित करते हुए लिखा है, 'संविधान उन लिखित एवं अलिखित कानूनों व परंपराओं का समुच्चय है, जिनके माध्यम से राज्य का जीवन संचालित होता है और संप्रभु शक्ति का आदतन प्रयोग किया जाता है।'
  • ए. वी. डायसी की परिभाषा (The Law of the Constitution): प्रसिद्ध ब्रिटिश न्यायविद डायसी के अनुसार, 'वे सभी नियम जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से राज्य की संप्रभु सत्ता के वितरण या प्रयोग को प्रभावित करते हैं, संविधान कहलाते हैं।'
  • के. सी. व्हेयर की परिभाषा (Modern Constitutions): व्हेयर ने लिखा है, 'संविधान उन नियमों का संकलन है जो सरकार को स्थापित करते हैं, उसके कार्यों को नियमित करते हैं और शासन का संचालन करते हैं।'
  • थॉमस पेन का विश्लेषण (Rights of Man, 1791): पेन ने स्पष्ट किया था, 'संविधान सरकार का कार्य नहीं, बल्कि सरकार बनाने वाली जनता का कार्य है; और संविधान के बिना सरकार अधिकार विहीन शक्ति का दुरुपयोग है।'
अंतर का आधारसंवैधानिक विधि (सर्वोच्च मूल विधि)सामान्य विधि (साधारण अधिनियम)
स्रोत एवं निर्माणसंप्रभु संविधान सभा या जनता की प्रत्यक्ष संप्रभु शक्ति द्वारा निर्मित व अंगीकृत।संविधान प्रदत्त शक्तियों के अधीन नियमित विधायिका (संसद या विधानसभा) द्वारा पारित।
विधिक दर्जासर्वोच्च कानून (Lex Superior); राज्य के अन्य सभी कानूनों की वैधानिकता का मूल आधार।संविधान के अधीन; संविधान के असंगत होने पर न्यायालय द्वारा शून्य घोषित (अनुच्छेद 13)।
संशोधन प्रक्रियाविशेष व जटिल संविधान संशोधन प्रक्रिया की आवश्यकता (जैसे अनुच्छेद 368)।संसद के सामान्य बहुमत द्वारा सरलता से पारित, संशोधित अथवा निरसित।

2. संविधानवाद (Constitutionalism): सीमित सरकार एवं विधि का शासन

संविधान का होना बनाम वास्तविक संविधानवाद

राजनीति विज्ञान में किसी राज्य में एक लिखित 'संविधान' होने और वहां वास्तविक संविधानवाद (Constitutionalism) होने में बुनियादी अंतर है। कई तानाशाही, सैनिक जुंटा अथवा एकदलीय व्यवस्थाओं में भी नाममात्र का लिखित संविधान होता है, किंतु वहां संविधानवाद शून्य होता है।

संविधानवाद के मूलभूत आधार स्तंभ:
  • 1. सीमित सरकार (Limited Government): शासन की शक्तियां निरंकुश या असीमित नहीं हो सकतीं; वे विधिक मर्यादाओं से बंधी होती हैं। शासक कानून के अधीन होते हैं, कानून से ऊपर नहीं।
  • 2. विधि का शासन (Rule of Law): व्यक्ति की निरंकुश इच्छा के स्थान पर कानून की सर्वोच्चता (Lex Rex—कानून ही राजा है, न कि राजा कानून है)।
  • 3. शक्ति पृथक्करण एवं संतुलन (Separation of Powers): मोंटेस्क्यू के सिद्धांत के अनुरूप कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के कार्यों का स्पष्ट विभाजन व नियंत्रण ताकि सत्ता का दुरुपयोग रोका जा सके।
  • 4. मौलिक अधिकारों की गारंटी: नागरिकों की मौलिक स्वतंत्रताओं का संविधान में स्पष्ट उल्लेख, जिन्हें साधारण बहुमत वाली सरकार भी छीन न सके।
  • 5. स्वतंत्र न्यायपालिका एवं न्यायिक समीक्षा: एक निष्पक्ष और निर्भीक न्यायपालिका जो असंवैधानिक कानूनों को अमान्य करने का अधिकार रखती हो।

3. प्रारूप आधारित वर्गीकरण: लिखित बनाम अलिखित एवं निर्मित बनाम विकसित

दस्तावेजी स्वरूप एवं ऐतिहासिक उत्पत्ति के आधार पर वर्गीकरण

दस्तावेजी स्वरूप के आधार पर संविधान को लिखित व अलिखित तथा ऐतिहासिक निर्माण के आधार पर निर्मित व विकसित संविधानों में वर्गीकृत किया जाता है।

श्रेणीलिखित संविधान (Written Constitution)अलिखित संविधान (Unwritten Constitution)
परिभाषावह संविधान जिसके मूलभूत सिद्धांत और शासन ढांचा एक निश्चित एकल औपचारिक विधिक दस्तावेज में संहिताबद्ध होते हैं।वह संविधान जो किसी एकल दस्तावेज में लिपिबद्ध न होकर परंपराओं, अभीसमयों, न्यायिक निर्णयों और ऐतिहासिक संलेखों पर आधारित होता है।
ऐतिहासिक उत्पत्तिनिर्मित (Enacted): एक निश्चित तिथि को संविधान सभा द्वारा सुविचारित रूप से तैयार और अंगीकृत किया गया।विकसित (Evolved): बिना किसी संविधान सभा के सदियों के ऐतिहासिक विकासक्रम में स्वाभाविक रूप से उभरा।
प्रमुख उदाहरणभारत (26 नवंबर 1949 अंगीकृत, 26 जनवरी 1950 लागू), संयुक्त राज्य अमेरिका (1787), फ्रांस।ब्रिटेन (UK), न्यूजीलैंड, इजराइल।
प्रमुख गुणनिश्चितता, स्पष्टता, स्थिरता, मनमाने शासन पर रोक और संघीय ढांचे में केंद्र-राज्यों के मध्य शक्तियों का निर्विवाद बंटवारा।अत्यधिक लचीलापन; बिना किसी हिंसक क्रांति के बदलती सामाजिक परिस्थितियों के साथ सहज अनुकूलन।
दोष / सीमाएंकदाचित अत्यधिक जड़ हो जाता है; निरंतर न्यायिक मुकदमों और विधिक व्याख्याओं पर निर्भरता बढ़ जाती है।अस्पष्टता, परंपराओं के मनमाने अर्थ निकालने का जोखिम और विधायी बहुमत द्वारा मनमाने परिवर्तनों का खतरा।
लिखित व अलिखित का व्यावहारिक यथार्थ:

राजनीति विज्ञानी के. सी. व्हेयर और सी. एफ. स्ट्रॉन्ग के अनुसार लिखित और अलिखित संविधान का अंतर केवल मात्रा का है, प्रकृति का नहीं। विश्व में कोई भी संविधान शत-प्रतिशत लिखित नहीं हो सकता—भारत और अमेरिका के लिखित संविधान में भी कई अलिखित परंपराएं अत्यंत महत्वपूर्ण हैं (जैसे लोकसभा के बहुमत दल के नेता को प्रधानमंत्री बनाना या मंत्रिमंडल का सामूहिक उत्तरदायित्व)। इसी प्रकार ब्रिटेन के 'अलिखित' संविधान में भी कई ऐतिहासिक लिखित अधिनियम शामिल हैं, जैसे 1215 का मैग्ना कार्टा, 1628 का पिटीशन ऑफ राइट्स, 1689 का बिल ऑफ राइट्स तथा 1911 व 1949 के पार्लियामेंट एक्ट।

4. संशोधन प्रक्रिया आधारित वर्गीकरण: कठोर बनाम लचीला संविधान

संशोधन की जटिलता के आधार पर लॉर्ड ब्राइस का वर्गीकरण

संशोधन की प्रक्रिया के आधार पर लॉर्ड ब्राइस ने संविधानों का सर्वाधिक वैज्ञानिक वर्गीकरण किया है: कठोर अथवा अनम्य संविधान (Rigid Constitution) तथा लचीला अथवा नम्य संविधान (Flexible Constitution)।

मानदंडकठोर संविधान (Rigid Constitution)लचीला संविधान (Flexible Constitution)
संशोधन प्रक्रियासंशोधन हेतु सामान्य कानून निर्माण से सर्वथा भिन्न एक विशेष, जटिल एवं कठिन विधिक प्रक्रिया अपनाई जाती है।साधारण कानून जिस सरल बहुमत से संसद में पारित होते हैं, उसी प्रक्रिया से संविधान का कोई भी प्रावधान संशोधित किया जा सकता है।
कानूनों में दर्जा भेदसंवैधानिक कानून और साधारण कानून के मध्य स्पष्ट गुणात्मक व पदानुक्रमित भेद होता है।संवैधानिक कानून और साधारण कानून में कोई विधिक अंतर नहीं होता; दोनों का संसदीय स्तर समान होता है।
प्रमुख उदाहरणसंयुक्त राज्य अमेरिका (अनुच्छेद 5 के तहत कांग्रेस के दोनों सदनों का 2/3 बहुमत और 3/4 राज्यों की विधायिकाओं का अनुसमर्थन अनिवार्य; 230 वर्षों में केवल 27 संशोधन)।ब्रिटेन (ब्रिटिश संसद सामान्य मोटर वाहन कानून की भांति ही साधारण बहुमत से किसी भी संवैधानिक कानून को बदल सकती है)।
संघीय अनिवार्यतासंघात्मक शासन हेतु अपरिहार्य, ताकि केंद्रीय संसद राज्यों की स्वायत्तता व शक्तियों को एकतरफा समाप्त न कर सके।केवल एकात्मक व समरूप राज्यों के लिए उपयुक्त; संघीय राज्यों में लचीला संविधान सर्वथा अनुपयुक्त है।

5. भारतीय समन्वय: कठोरता एवं लचीलेपन का अनूठा सम्मिश्रण (अनुच्छेद 368)

भारतीय संविधान की संशोधन प्रक्रिया एवं केशवानंद भारती वाद

भारतीय संविधान के निर्माताओं ने अमेरिकी अति-कठोरता और ब्रिटिश अति-लचीलेपन के दोनों छोरों से बचते हुए एक मध्यमार्ग अपनाया। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में कहा था: 'यद्यपि हम इस संविधान को यथासंभव सुदृढ़ और स्थायी बनाना चाहते हैं, किंतु संविधान में कोई शाश्वत जड़ता नहीं हो सकती। लचीलापन अनिवार्य है; यदि आप किसी चीज को सर्वथा कठोर व स्थायी बना देंगे, तो राष्ट्र का विकास अवरुद्ध हो जाएगा।'

भारतीय संविधान में संशोधन के तीन प्रमुख मार्ग:
  1. संसद के साधारण बहुमत द्वारा संशोधन (लचीला मार्ग): कई प्रशासनिक प्रावधानों को संसद साधारण कानून की भांति सामान्य बहुमत से संशोधित कर सकती है (जो अनुच्छेद 368 की औपचारिक परिधि से बाहर हैं)। जैसे—नए राज्यों का निर्माण, सीमा परिवर्तन (अनुच्छेद 3), राज्य विधान परिषदों का सृजन या उत्सादन (अनुच्छेद 169), नागरिकता व राजभाषा संबंधी सामान्य नियम।
  2. संसद के विशेष बहुमत द्वारा संशोधन (कठोर मूल मार्ग - अनुच्छेद 368): संविधान के अधिकांश बुनियादी प्रावधानों में संशोधन के लिए संसद के प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत तथा उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्यों का समर्थन अनिवार्य है। जैसे—मौलिक अधिकार (भाग 3) और नीति निदेशक तत्व (भाग 4)।
  3. विशेष बहुमत एवं राज्यों का अनुसमर्थन (अति-कठोर संघीय मार्ग - अनुच्छेद 368): संघीय ढांचे और केंद्र-राज्य संबंधों को प्रभावित करने वाले विषयों के लिए संसद के विशेष बहुमत के साथ-साथ कम से कम आधे (50%) राज्यों के विधानमंडलों की स्वीकृति आवश्यक है। जैसे—राष्ट्रपति के निर्वाचन की विधि (अनुच्छेद 54, 55), सर्वोच्च व उच्च न्यायालयों की शक्तियां, 7वीं अनुसूची की सूचियां और स्वयं अनुच्छेद 368।
मूल संरचना का सिद्धांत (Basic Structure Doctrine - केशवानंद भारती वाद, 1973):

वर्ष 1973 के ऐतिहासिक केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य वाद में भारत के सर्वोच्च न्यायालय की 13 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 'मूल संरचना के सिद्धांत' का प्रतिपादन किया। न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि संसद को अनुच्छेद 368 के अंतर्गत व्यापक संशोधन शक्ति प्राप्त है, किंतु संसद संविधान के बुनियादी ढांचे (लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता, न्यायिक समीक्षा, शक्ति पृथक्करण, विधि का शासन व संघवाद) को नष्ट या विकृत नहीं कर सकती।

6. एक आदर्श संविधान के अनिवार्य लक्षण एवं गुण

सफल लोकतांत्रिक संविधान की प्रमुख विशेषताएं

किसी राज्य में विधिक स्थिरता, नागरिक स्वतंत्रता और कुशल शासन सुनिश्चित करने हेतु एक आदर्श संविधान में निम्न गुणों का होना आवश्यक है:

आदर्श संविधान के गुणप्रशासनिक महत्व एवं अंतर्निहित स्वरूप
1. स्पष्टता एवं निश्चितता (Clarity and Precision)संविधान के प्रत्येक अनुच्छेद की भाषा सरल, असंदिग्ध और सुस्पष्ट होनी चाहिए ताकि न्यायिक विवादों और विधिक संशय की स्थिति उत्पन्न न हो।
2. संक्षिप्तता एवं व्यापकता (Brevity and Comprehensiveness)शासन के अनिवार्य अंगों की रूपरेखा समाहित हो, किंतु दैनिक सामान्य नियमों के अनावश्यक विस्तार से दस्तावेज को अनावश्यक बोझिल न बनाया जाए।
3. गतिशीलता एवं अनुकूलनशीलता (Dynamic Balance)संविधान न तो इतना कठोर हो कि जनआकांक्षाओं के दबाव में टूट जाए और न ही इतना लचीला हो कि सत्तारूढ़ दल का खिलौना बन जाए।
4. मौलिक अधिकारों की ठोस गारंटीनागरिक स्वतंत्रताओं का स्पष्ट संकलन होना चाहिए तथा उनके उल्लंघन पर संवैधानिक उपचार (अनुच्छेद 32 के तहत रिट जारी करने की शक्ति) उपलब्ध होनी चाहिए।
5. स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिकासंविधान की व्याख्या और उसके संरक्षण हेतु कार्यपालिका के प्रभाव से सर्वथा मुक्त एक स्वतंत्र न्यायपालिका का होना अनिवार्य है।

महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक सिद्धांत एवं कालक्रम

संविधानवाद का आधारभूत सूत्र
संविधानवाद = लिखित/अलिखित संविधान + सीमित सरकार + विधि का शासन (Lex Rex) + न्यायिक समीक्षा
भारतीय अनुच्छेद 368 का संशोधन त्रिकोण
स्तर 1: साधारण बहुमत | स्तर 2: 2/3 विशेष बहुमत | स्तर 3: विशेष बहुमत + 50% राज्यों का अनुसमर्थन
संवैधानिक वैधता का नियम
यदि (सामान्य कानून ∩ संविधान = असंगति), तो सामान्य कानून = शून्य (Ultra Vires)

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
ए. वी. डायसी एवं के. सी. व्हेयर द्वारा दी गई संविधान की परिभाषाएं बताइए। संविधान को राज्य की सर्वोच्च विधि क्यों कहा जाता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. ए. वी. डायसी की परिभाषा: 'वे समस्त नियम जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से राज्य में संप्रभु शक्ति के वितरण अथवा प्रयोग को निर्धारित करते हैं, संविधान कहलाते हैं।'
  2. के. सी. व्हेयर की परिभाषा: 'संविधान उन नियमों का संग्रह है जो सरकार की स्थापना करते हैं, उसके कार्यों को नियमित करते हैं और शासन का संचालन करते हैं।'

सर्वोच्च विधि (Grundnorm / Lex Superior) कहे जाने के कारण:

  • शासन के तीनों अंग (कार्यपालिका, विधायिका व न्यायपालिका) अपनी सत्ता और प्राधिकार संविधान से ही प्राप्त करते हैं।
  • विधायिका द्वारा पारित कोई भी सामान्य कानून यदि संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करता है, तो न्यायपालिका उसे शून्य व असंवैधानिक घोषित कर देती है।
उदाहरण 2
संविधानवाद (Constitutionalism) से क्या अभिप्राय है? केवल एक संविधान होने और संविधानवाद में क्या अंतर है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

संविधानवाद एक ऐसी राजनीतिक अवधारणा है जिसका मूल आधार 'सीमित सरकार' (Limited Government) और 'विधि का शासन' है।

अंतर:

  1. मात्र संविधान का होना: कई निरंकुश या सैनिक तानाशाही वाले देशों में भी दिखावे के लिए लिखित संविधान मौजूद हो सकता है। किंतु वहां शासक की सत्ता असीमित होती है और नागरिकों के अधिकार कुचले जाते हैं, अतः वहां संविधानवाद नहीं होता।
  2. वास्तविक संविधानवाद: संविधानवाद तब स्थापित होता है जब शासन की शक्तियां विधिक सीमाओं में बंधी हों, शक्ति पृथक्करण लागू हो, मौलिक अधिकारों की गारंटी हो और एक स्वतंत्र न्यायपालिका विधि के शासन की रक्षा करे।
उदाहरण 3
लिखित एवं अलिखित संविधान में उदाहरण सहित अंतर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. लिखित संविधान: वह संविधान जिसके आधारभूत नियम एवं शासन ढांचा किसी विशेष संविधान सभा द्वारा एक निश्चित तिथि को औपचारिक रूप से एकल दस्तावेज में संहिताबद्ध किए गए हों (जैसे भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका)। यह स्पष्ट और सुनिश्चित होता है।
  2. अलिखित संविधान: वह संविधान जो किसी एक ग्रंथ या दस्तावेज में संहिताबद्ध नहीं होता, बल्कि ऐतिहासिक विकासक्रम में परंपराओं, रीति-रिवाजों, ऐतिहासिक सनदों और अदालती निर्णयों से विकसित होता है (जैसे ब्रिटेन, न्यूजीलैंड)। यह अत्यधिक लचीला होता है।

नोट: आधुनिक विचारकों के अनुसार यह अंतर केवल मात्रा का है, क्योंकि ब्रिटेन में भी लिखित चार्टर (मैग्ना कार्टा) हैं और लिखित संविधानों में भी अलिखित परंपराएं चलती हैं।

उदाहरण 4
संशोधन प्रक्रिया के आधार पर कठोर और लचीले संविधान की तुलना कीजिए। संघात्मक राज्य में कठोर संविधान क्यों आवश्यक है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. लचीला संविधान: जिसे सामान्य कानून निर्माण की सरल बहुमत वाली प्रक्रिया से आसानी से संशोधित किया जा सकता है (जैसे ब्रिटेन)।
  2. कठोर संविधान: जिसके संशोधन हेतु सामान्य कानून निर्माण से सर्वथा भिन्न एक विशेष, जटिल और कठिन संवैधानिक प्रक्रिया अपनाई जाती है (जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका)।

संघात्मक शासन में अनिवार्यता: संघीय शासन में केंद्र और राज्यों के मध्य शक्तियों का विभाजन होता है। यदि संविधान लचीला होगा, तो केंद्र सरकार अपनी सामान्य बहुमतीय शक्ति से राज्यों की स्वायत्तता और अधिकारों को मनमाने ढंग से छीन लेगी। कठोर संशोधन प्रक्रिया राज्यों की सहमति के बिना केंद्र को ऐसा करने से रोकती है।

उदाहरण 5
अनुच्छेद 368 के संदर्भ में समझाइए कि भारतीय संविधान किस प्रकार कठोरता और लचीलेपन का अनूठा समन्वय है।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

भारतीय संविधान न तो अमेरिकी संविधान की तरह अत्यधिक कठोर है और न ही ब्रिटिश संविधान की तरह अत्यधिक लचीला। इसमें तीन संशोधन पद्धतियां हैं:

  1. लचीली पद्धति: साधारण बहुमत द्वारा नए राज्यों का निर्माण (अनुच्छेद 3), नागरिकता व विधान परिषदों से संबंधित नियम बदले जा सकते हैं।
  2. कठोर पद्धति (अनुच्छेद 368): मौलिक अधिकारों व नीति निदेशक तत्वों में संशोधन के लिए संसद के प्रत्येक सदन का कुल बहुमत तथा उपस्थित व मतदान करने वालों का 2/3 विशेष बहुमत अनिवार्य है।
  3. अति-कठोर पद्धति (अनुच्छेद 368): राष्ट्रपति निर्वाचन, केंद्र-राज्य संबंध व न्यायपालिका की शक्तियों में संशोधन हेतु संसद के विशेष बहुमत के साथ-साथ कम से कम 50% राज्यों के विधानमंडलों का अनुसमर्थन आवश्यक है।
उदाहरण 6
मूल संरचना का सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) क्या है? भारतीय लोकतंत्र के लिए इसका क्या महत्व है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

सर्वोच्च न्यायालय ने 1973 के ऐतिहासिक 'केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य' वाद में मूल संरचना का सिद्धांत प्रतिपादित किया।

महत्व:

  1. न्यायालय ने व्यवस्था दी कि संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, किंतु वह संविधान के 'मूल ढांचे' (प्रजातंत्र, पंथनिरपेक्षता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संघवाद व विधि का शासन) को समाप्त या नष्ट नहीं कर सकती।
  2. यह सिद्धांत संसद के तानाशाही बहुमत पर न्यायिक अंकुश लगाता है और भारतीय लोकतंत्र के मूल स्वरूप को स्थायी संरक्षण प्रदान करता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

लिखित संविधान होने को ही संविधानवाद मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

तानाशाहों के पास भी लिखित संविधान हो सकता है। संविधानवाद के लिए सीमित सरकार, मौलिक अधिकारों की सुरक्षा और स्वतंत्र न्यायपालिका अनिवार्य है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि ब्रिटेन में कोई लिखित कानून ही नहीं है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

ब्रिटेन का संविधान असंहिताबद्ध है, किंतु उसमें मैग्ना कार्टा, बिल ऑफ राइट्स और कई महत्वपूर्ण लिखित संसदीय अधिनियम शामिल हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि भारतीय संसद संविधान के किसी भी हिस्से को मनमाने ढंग से नष्ट कर सकती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

केशवानंद भारती वाद (1973) के मूल संरचना सिद्धांत के अनुसार, संसद संविधान के बुनियादी ढांचे को कभी समाप्त नहीं कर सकती।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

संविधान की समझ: परिभाषा, प्रकार एवं संविधानवाद WBCHSE कक्षा 11 राजनीति विज्ञान • लिखित बनाम अलिखित • कठोर बनाम लचीला • आदर्श संविधान के लक्षण संविधान की मूल अवधारणा लैटिन 'Constituere' • सर्वोच्च आधारभूत विधि • डायसी: संप्रभु सत्ता के वितरण व प्रयोग को नियंत्रित करने वाले नियम • ब्राइस: राज्य के शासन को संचालित करने वाले नियमों का समुच्चय • मूल विधि (Grundnorm): सामान्य कानूनों की सर्वोच्च नियामक संहिता • संविधानवाद: सीमित सरकार (Limited Govt) व विधि का शासन प्रारूप आधारित वर्गीकरण लिखित बनाम अलिखित संविधान • लिखित: एकल संहिताबद्ध दस्तावेज (भारत, सं.रा. अमेरिका) • अलिखित: परंपराओं, अभीसमयों व न्यायिक निर्णयों पर आधारित (ब्रिटेन) • निर्मित (Enacted): संविधान सभा द्वारा विधिवत अंगीकृत • विकसित (Evolved): ऐतिहासिक विकासक्रम द्वारा सदियों में निर्मित संशोधन पद्धति आधारित वर्गीकरण कठोर बनाम लचीला संविधान • कठोर (Rigid): संशोधन हेतु विशेष व जटिल प्रक्रिया आवश्यक (USA) • लचीला (Flexible): सामान्य विधि निर्माण प्रक्रिया द्वारा परिवर्तनीय (UK) ★ भारतीय समन्वय: कठोरता एवं लचीलेपन का अनूठा सम्मिश्रण • अनुच्छेद 368: साधारण बहुमत, विशेष बहुमत व राज्यों का अनुसमर्थन एक आदर्श संविधान के लक्षण लोकतांत्रिक सुशासन के प्रमुख आधार 1. स्पष्टता एवं निश्चितता: असंदिग्ध विधिक शब्दावली 2. संक्षिप्तता व पूर्णता: शासन के अनिवार्य अंगों का व्यवस्थित विवरण 3. मौलिक अधिकारों का संरक्षण: न्यायिक समीक्षा एवं संवैधानिक उपचार 4. स्वतंत्र न्यायपालिका: संविधान की रक्षक एवं निष्पक्ष व्याख्याता

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
संविधान किसी राज्य का सर्वोच्च आधारभूत कानून (Grundnorm) है, जो शासन के अंगों की स्थापना और उनकी शक्तियों का नियमन करता है।
मुख्य बिंदु 2
अरस्तू, ब्राइस, डायसी और व्हेयर ने संविधान को संप्रभु शक्ति के वितरण और शासन संचालन के मूलभूत नियमों का समुच्चय माना।
मुख्य बिंदु 3
संविधानवाद का तात्पर्य सीमित सरकार, विधि का शासन और निरंकुशता के विरुद्ध नागरिक अधिकारों के संस्थागत संरक्षण से है।
मुख्य बिंदु 4
लिखित संविधान संविधान सभा द्वारा रचित एकल औपचारिक दस्तावेज में संहिताबद्ध होता है (जैसे भारत, सं.रा. अमेरिका)।
मुख्य बिंदु 5
अलिखित संविधान परंपराओं, प्रथाओं, ऐतिहासिक संलेखों और न्यायिक दृष्टांतों के माध्यम से विकसित होता है (जैसे ब्रिटेन)।
मुख्य बिंदु 6
कठोर संविधान में संशोधन हेतु जटिल विशेष प्रक्रिया आवश्यक होती है, जो संघीय व्यवस्था के अस्तित्व हेतु अपरिहार्य है।
मुख्य बिंदु 7
लचीला संविधान साधारण विधायिका द्वारा सामान्य बहुमत से सरलतापूर्वक कभी भी बदला जा सकता है।
मुख्य बिंदु 8
भारतीय संविधान अनुच्छेद 368 के तहत साधारण बहुमत, विशेष बहुमत और राज्यों के अनुसमर्थन द्वारा कठोरता व लचीलेपन का समन्वय करता है।
मुख्य बिंदु 9
1973 के केशवानंद भारती वाद में प्रतिपादित मूल संरचना का सिद्धांत संसद द्वारा संविधान के विनाशकारी संशोधनों को रोकता है।
मुख्य बिंदु 10
आदर्श संविधान के प्रमुख लक्षण स्पष्टता, संक्षिप्तता, अनुकूलनशीलता, मौलिक अधिकारों की गारंटी और स्वतंत्र न्यायपालिका हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

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