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WBB • कक्षा XI • Political Science • अध्याय 3
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

नागरिकता

नागरिकता किसी संप्रभु राज्य और व्यक्ति के मध्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं विधिक संबंध को अभिव्यक्त करती है। लैटिन शब्द 'सिविटास' से व्युत्पन्न नागरिकता किसी संगठित राजनीतिक समाज में व्यक्ति की पूर्ण व समान सदस्यता का प्रतीक है, जिसके अंतर्गत नागरिक को दीवानी, राजनीतिक और सामाजिक अधिकार प्राप्त होते हैं तथा वह राज्य के प्रति मौलिक निष्ठा व कर्तव्य से बंधा होता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक केवल एक आज्ञाकारी प्रजा नहीं, बल्कि संप्रभु सत्ता एवं सार्वजनिक शासन प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार होता है। इस अध्याय में अरस्तू, हेरोल्ड लास्की एवं टी. एच. मार्शल के नागरिकता सिद्धांतों, नागरिक व विदेशी के मध्य आधारभूत अंतर, रक्त के अधिकार व जन्मस्थान के आधार पर नागरिकता प्राप्ति, देशीयकरण, नागरिकता समाप्ति के तरीकों तथा लॉर्ड ब्राइस द्वारा प्रतिपादित आदर्श नागरिकता के तीन सद्गुणों एवं लोकतंत्र की तीन विनाशकारी बाधाओं का गहन विश्लेषण किया गया है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

आधुनिक लोकतांत्रिक शासन प्रणाली और संवैधानिक व्यवस्था को समझने के लिए नागरिकता का अध्ययन अत्यंत अनिवार्य है। यह स्पष्ट करता है कि क्यों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मताधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार और सार्वजनिक नियोजन में समानता जैसे विशेषाधिकार केवल नागरिकों के लिए सुरक्षित हैं, जबकि जीवन की सुरक्षा व कानून के समक्ष समानता जैसे मूलभूत अधिकार विदेशियों को भी उपलब्ध कराए जाते हैं। वैश्वीकरण, अंतरराष्ट्रीय प्रवासन, शरणार्थी संकट और दोहरी नागरिकता की समकालीन बहसों के संदर्भ में राज्य की संप्रभुता और व्यक्ति के मानवीय अधिकारों के संतुलन को समझने में नागरिकता की संकल्पना बुनियादी आधार प्रदान करती है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. नागरिकता: अर्थ, स्वरूप एवं ऐतिहा...
2 2. नागरिक बनाम विदेशी: विधिक, राजनी...
3 3. नागरिकता प्राप्ति के तरीके: जन्म...
4 4. नागरिकता समाप्ति एवं विलोपन के त...
5 5. आदर्श नागरिक के गुण एवं प्रमुख ब...
6 6. एकल बनाम दोहरी नागरिकता: भारतीय...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. नागरिकता: अर्थ, स्वरूप एवं ऐतिहासिक विकास

नागरिकता की अवधारणा एवं सैद्धांतिक विकास

अंग्रेजी शब्द Citizenship की व्युत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द 'Civis' (नागरिक) और 'Civitas' (नगर-राज्य) से हुई है। प्राचीन यूनानी नगर-राज्यों में प्रत्यक्ष रूप से शासन व न्याय प्रक्रिया में भाग लेने वाले व्यक्तियों को ही नागरिक माना जाता था। कालांतर में आधुनिक विशाल लोकतांत्रिक राज्यों में नागरिकता की अवधारणा अत्यंत व्यापक, समावेशी एवं सार्वभौमिक हो गई है।

प्रमुख विचारकों के अनुसार नागरिकता की परिभाषाएं:
  • अरस्तू की परिभाषा (Politics): अरस्तू के अनुसार, 'नागरिक वह व्यक्ति है जिसे राज्य के विचार-विमर्श संबंधी अथवा न्यायिक शासन में सहभागिता करने का अधिकार प्राप्त है।' किंतु अरस्तू की यह यूनानी अवधारणा अत्यंत संकीर्ण व बहिष्करणकारी थी। उन्होंने महिलाओं, दासों, विदेशी प्रवासियों और शारीरिक श्रमिकों को नागरिकता से वंचित कर दिया था, क्योंकि उनका मानना था कि निरंतर शारीरिक श्रम करने वालों के पास राज्यकार्य व सद्गुण संवर्धन हेतु आवश्यक 'अवकाश' (Leisure) नहीं होता।
  • हेरोल्ड जे. लास्की की परिभाषा (A Grammar of Politics): आधुनिक लोकतांत्रिक चिंतक लास्की ने लिखा है कि 'नागरिकता लोककल्याण के लिए अपनी सुप्रशिक्षित निर्णयबुद्धि का योगदान है' (Citizenship is the contribution of one's instructed judgment to the public good)। लास्की के अनुसार नागरिक मूक प्रजा नहीं है, बल्कि अन्यायपूर्ण नीतियों के विरुद्ध आवाज उठाना उसका नैतिक कर्तव्य है।
  • टी. एच. मार्शल का त्रिविमीय विकास सिद्धांत (Citizenship and Social Class, 1950): ब्रिटिश समाजशास्त्री टी. एच. मार्शल ने स्पष्ट किया कि आधुनिक नागरिकता के अधिकार तीन सदियों में क्रमिक रूप से विकसित हुए हैं:
शताब्दीअधिकार का आयाममूल अंतर्वस्तु एवं संस्थागत आधार
18वीं शताब्दीनागरिक अधिकार (Civil Rights)व्यक्तिगत स्वतंत्रता, विचार, अभिव्यक्ति एवं अंतःकरण की स्वतंत्रता, संपत्ति का अधिकार और स्वतंत्र न्यायालयों से न्याय पाने का अधिकार।
19वीं शताब्दीराजनीतिक अधिकार (Political Rights)सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, चुनाव में प्रत्याशी बनने का अधिकार और संसद व शासन में भाग लेने का अधिकार।
20वीं शताब्दीसामाजिक अधिकार (Social Rights)आर्थिक सुरक्षा, रोजगार, सार्वभौमिक शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और कल्याणकारी राज्य द्वारा एक गरिमापूर्ण मानवीय जीवन का अधिकार।

2. नागरिक बनाम विदेशी: विधिक, राजनीतिक एवं संवैधानिक अंतर

नागरिक और विदेशी के मध्य विधिक स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन

किसी राज्य की सीमाओं के भीतर रहने वाले सभी व्यक्ति उस राज्य के नागरिक नहीं होते। विधिक स्थिति के आधार पर राज्य की जनसंख्या को दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जाता है: नागरिक (Citizens) और विदेशी (Aliens / Foreigners)।

अंतरराष्ट्रीय विधि में विदेशियों के प्रकार:
  • मित्र विदेशी (Alien Friends): उन देशों के नागरिक जिनके साथ मेजबान देश के शांतिपूर्ण व राजनयिक संबंध हैं। उन्हें जीवन व स्वतंत्रता की व्यापक सुरक्षा प्राप्त होती है।
  • शत्रु विदेशी (Alien Enemies): उन देशों के नागरिक जिनके साथ मेजबान देश का युद्ध या सशस्त्र संघर्ष चल रहा हो। उनकी गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी जाती है और उन्हें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22 (गिरफ्तारी व नजरबंदी के विरुद्ध संरक्षण) का लाभ नहीं मिलता।
  • विहीन नागरिक (Stateless Persons) व शरणार्थी: जिनका किसी भी संप्रभु राज्य में वैधानिक नागरिकता दर्जा नहीं है।
अंतर का आधारनागरिक (Citizens)विदेशी (Aliens)
निष्ठा का स्वरूपराज्य के प्रति स्थायी, अटूट एवं मौलिक निष्ठा रखता है।मेजबान राज्य में रहने के दौरान केवल स्थानीय कानूनों के प्रति अस्थायी निष्ठा रखता है। मूल निष्ठा अपने गृह राज्य के प्रति होती है।
राजनीतिक अधिकारपूर्ण राजनीतिक अधिकार प्राप्त हैं: मतदान करना, चुनाव लड़ना और उच्च संवैधानिक पद (राष्ट्रपति, न्यायाधीश) धारण करना।राजनीतिक अधिकारों से पूर्णतः वंचित होता है; वह न तो वोट दे सकता है और न ही किसी सार्वजनिक पद पर आसीन हो सकता है।
भारतीय मूल अधिकारसभी मौलिक अधिकार प्राप्त हैं। अनुच्छेद 15, 16, 19, 29 और 30 केवल नागरिकों के लिए आरक्षित हैं।अनुच्छेद 14, 20, 21, 21A, 22, 23, 24, 25-28 के अंतर्गत जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा प्राप्त है, किंतु 15, 16, 19, 29, 30 प्राप्त नहीं हैं।
सैन्य दायित्वराष्ट्रीय सुरक्षा हेतु संकटकाल में अनिवार्य सैन्य सेवा (Conscription) करने के लिए विधिक रूप से बाध्य किया जा सकता है।सैन्य सेवा से पूर्णतः मुक्त होता है; उसे सेना में भर्ती होने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
निष्कासन एवं प्रत्यर्पणकिसी संप्रभु राज्य द्वारा अपने ही नागरिक को देश से निष्कासित या निर्वासित नहीं किया जा सकता।राज्य को विधिक प्रक्रिया के तहत किसी भी अवांछित विदेशी को देश से निर्वासित (Deport) करने का पूर्ण अधिकार है।

3. नागरिकता प्राप्ति के तरीके: जन्मजात एवं देशीयकृत नागरिकता

नागरिकता अर्जन के वैधानिक तरीके एवं सिद्धांत

प्राप्ति के तरीके के आधार पर नागरिकों को दो प्रमुख श्रेणियों में बांटा जाता है: जन्मजात नागरिक (Natural-Born Citizens) और देशीकृत या अर्जित नागरिक (Naturalized Citizens)।

क. जन्म के आधार पर नागरिकता (जन्मजात नागरिक):
  • 1. रक्त का सिद्धांत (Jus Sanguinis): इस सिद्धांत के अनुसार बच्चे की नागरिकता उसके माता-पिता की नागरिकता अथवा रक्त संबंध से तय होती है, चाहे बच्चे का जन्म विश्व के किसी भी भूभाग में हुआ हो। यह सिद्धांत जर्मनी, इटली और भारतीय नागरिकता कानून के वंशानुगत प्रावधानों में प्रमुखता से लागू है।
  • 2. जन्मस्थान का सिद्धांत (Jus Soli): इस सिद्धांत के अनुसार बच्चे की नागरिकता इस बात से तय होती है कि उसका जन्म किस भौगोलिक भूभाग पर हुआ है, भले ही उसके माता-पिता किसी भी देश के नागरिक हों। यह सिद्धांत एंग्लो-अमेरिकन विधि तथा अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन का आधार है।
  • आधुनिक सम्मिश्रण: वर्तमान समय में भारत सहित अधिकांश लोकतांत्रिक देश दोनों सिद्धांतों के तार्किक संतुलन को अपनाते हैं।
ख. देशीयकरण अथवा वैधानिक प्रक्रिया द्वारा अर्जन (Naturalization):

जब कोई विदेशी नागरिक आवेदन करके और तय वैधानिक शर्तों को पूरा करके किसी राज्य की नागरिकता प्राप्त करता है:

  • दीर्घकालिक निवास (Residence): राज्य में बिना किसी अपराध के एक निश्चित समय (जैसे भारत में 5 से 12 वर्ष) तक निरंतर निवास करना।
  • विवाह (Marriage): संबंधित देश के नागरिक से वैधानिक विवाह करने पर नागरिकता सुगमता से मिल जाती है।
  • सरकारी सेवा (Government Employment): मेजबान देश की सरकार के अधीन विशिष्ट प्रशासनिक या शैक्षणिक सेवा देना।
  • अचल संपत्ति क्रय अथवा निवेश: कुछ देशों में बड़े पूंजीगत निवेश या संपत्ति खरीदने पर नागरिकता प्रदान की जाती है।
  • दत्तक ग्रहण (Adoption): किसी नागरिक द्वारा विदेशी बच्चे को कानूनी रूप से गोद लेने पर बच्चा माता-पिता की नागरिकता प्राप्त कर लेता है।
  • नए भूभाग का विलय (Incorporation of Territory): जब कोई नया क्षेत्र किसी संप्रभु राज्य में शामिल होता है, तो वहां के सभी निवासी स्वतः उस देश के नागरिक बन जाते हैं (जैसे 1961 में गोवा तथा 1975 में सिक्किम के भारत में विलय पर हुआ)।

4. नागरिकता समाप्ति एवं विलोपन के तरीके

नागरिकता के अंत, त्याग एवं वंचना के वैधानिक आधार

जिस प्रकार वैधानिक प्रक्रियाओं से नागरिकता अर्जित की जाती है, उसी प्रकार कुछ निश्चित परिस्थितियों में इसका विलोपन भी हो सकता है। भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 एवं आधुनिक विधि शास्त्र में नागरिकता समाप्ति के तीन प्रमुख मार्ग मान्य हैं:

समाप्ति का तरीकाविधिक प्रक्रियाआधार एवं परिस्थितियां
1. स्वेच्छा से त्याग (Renunciation)स्वैच्छिक घोषणा पत्रकोई वयस्क व सक्षम व्यक्ति जो किसी अन्य देश की नागरिकता ले चुका हो, वह अपनी मूल नागरिकता को स्वेच्छा से छोड़ने की औपचारिक घोषणा कर सकता है। युद्धकाल में सरकार इस घोषणा को रोकने का अधिकार रखती है।
2. स्वतः समाप्ति (Termination)कानून के संचालन द्वारायदि कोई नागरिक स्वेच्छा से किसी अन्य विदेशी राज्य की नागरिकता ग्रहण कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता कानूनन स्वतः समाप्त हो जाती है (संविधान के अनुच्छेद 9 के तहत एकल नागरिकता का सिद्धांत)।
3. अनिवार्य वंचना (Deprivation)शासकीय आदेश द्वारायह मुख्यतः देशीयकृत नागरिकों पर लागू होती है। यदि नागरिकता धोखाधड़ी या असत्य तथ्यों से ली गई हो, संविधान के प्रति अनादर दिखाया गया हो, युद्ध के समय शत्रु देश से अवैध व्यापार या गुप्त संबंध रखे गए हों, अथवा देशीयकरण के 5 वर्षों के भीतर 2 वर्ष की सजा पाई हो।

5. आदर्श नागरिक के गुण एवं प्रमुख बाधाएं (लॉर्ड ब्राइस का सिद्धांत)

लॉर्ड ब्राइस का नागरिकता दर्शन: सद्गुण एवं लोकतांत्रिक विकृतियां

प्रसिद्ध ब्रिटिश न्यायविद लॉर्ड जेम्स ब्राइस (Lord James Bryce) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तकों 'The American Commonwealth' एवं 'Modern Democracies' में सिद्ध किया कि किसी भी लोकतंत्र की सफलता उसके लिखित विधान से अधिक नागरिकों के नैतिक चरित्र पर निर्भर करती है। ब्राइस ने एक आदर्श नागरिक के तीन प्रमुख सद्गुण तथा नागरिकता की तीन घातक बाधाएं रेखांकित की हैं।

लॉर्ड ब्राइस के अनुसार एक आदर्श नागरिक के 3 सद्गुण:
  1. बुद्धि (Intelligence): राजनीतिक चेतना, विवेक और समसामयिक मुद्दों की समझ। नागरिक में यह बौद्धिक क्षमता होनी चाहिए कि वह राजनीतिक प्रचार व झूठ से सच को अलग कर सके और योग्य प्रत्याशी के पक्ष में विवेकपूर्ण मतदान कर सके।
  2. आत्मसंयम (Self-Control): अपने व्यक्तिगत अथवा गुटीय स्वार्थों को व्यापक सार्वजनिक हित के अधीन रखना, विधि के शासन का सम्मान करना, विरोधी विचारों के प्रति सहिष्णुता रखना तथा लोकतांत्रिक जनादेश को विनम्रता से स्वीकार करना।
  3. विवेक एवं कर्तव्यनिष्ठा (Conscience): सार्वजनिक कल्याण के प्रति नैतिक समर्पण। अन्याय का विरोध करना, ईमानदारी से कर चुकाना, भ्रष्टाचार के विरुद्ध सक्रिय रहना तथा व्यक्तिगत लाभ की अपेक्षा राष्ट्रहित को प्राथमिकता देना।
सुनागरिकता के मार्ग में 3 प्रमुख विनाशकारी बाधाएं:
  1. अकर्मण्यता / उदासीनता (Indolence / Apathy): यह लोकतंत्र का सबसे प्राणघातक रोग है। जब प्रबुद्ध नागरिक राजनीति से तटस्थ हो जाते हैं, मतदान करने नहीं जाते और सार्वजनिक समस्याओं की अनदेखी करते हैं, तब भ्रष्ट और स्वार्थी तत्व शासन सत्ता पर कब्जा कर लेते हैं।
  2. निजी स्वार्थपरता (Selfishness): व्यक्तिगत, पारिवारिक, जातीय या सांप्रदायिक लाभ को राष्ट्रीय हित से ऊपर रखना। जब नागरिक और जनप्रतिनिधि सार्वजनिक पद का उपयोग निजी धनोपार्जन हेतु करने लगते हैं, तो लोकतंत्र का पतन हो जाता है।
  3. अंध दलीय निष्ठा (Party Spirit / Blind Partisanship): किसी राजनीतिक दल के प्रति अंधभक्ति जो सही-गलत और न्याय-अन्याय के विवेक को नष्ट कर देती है। यह निष्ठा राष्ट्रीय एकता को खंडित कर समाज में कटुता और हिंसक ध्रुवीकरण पैदा करती है।

6. एकल बनाम दोहरी नागरिकता: भारतीय संवैधानिक ढांचा

संघीय शासन प्रणालियों में एकल एवं दोहरी नागरिकता का स्वरूप

विश्व के संघीय राज्यों में राष्ट्रीय एकता और राज्यों की स्वायत्तता के संतुलन हेतु नागरिकता के दो भिन्न मॉडल अपनाए जाते हैं:

विशेषताएकल नागरिकता (Single Citizenship)दोहरी नागरिकता (Dual Citizenship)
मूल संकल्पनासमस्त देश में केवल एक ही राष्ट्रीय नागरिकता होती है। किसी प्रांत या राज्य की पृथक नागरिकता नहीं होती।व्यक्ति एक साथ संघीय देश का नागरिक होता है और जिस राज्य या कैंटन में रहता है, उसका भी अलग नागरिक होता है।
प्रमुख उदाहरणभारत, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया।संयुक्त राज्य अमेरिका, स्विट्जरलैंड।
भारतीय परिप्रेक्ष्य व कारणडॉ. बी. आर. अम्बेडकर एवं संविधान निर्माताओं ने संघीय ढांचा होने पर भी 1947 के विभाजन के बाद राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने, संकीर्ण प्रांतीयता व अलगाववाद को रोकने हेतु एकल नागरिकता का चयन किया। पश्चिम बंगाल, बिहार या केरल के सभी निवासी समान भारतीय हैं।अमेरिका में नागरिक संघ के साथ-साथ कैलिफोर्निया या न्यूयॉर्क राज्य की नागरिकता रखते हैं, जहां राज्य स्तर पर अलग अधिकार और शिक्षा शुल्क में रियायतें मिलती हैं।
प्रवासी भारतीय कार्ड (OCI) की संवैधानिक स्थिति:

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 9 के अंतर्गत दोहरी नागरिकता पूर्णतः वर्जित है। कई लोग Overseas Citizen of India (OCI) कार्ड को दोहरी नागरिकता समझ लेते हैं, जो गलत है। ओसीआई कार्डधारक भारत के संवैधानिक नागरिक नहीं हैं; उन्हें भारत में मतदान का अधिकार नहीं है, वे चुनाव नहीं लड़ सकते, राष्ट्रपति या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश जैसे संवैधानिक पदों पर नियुक्त नहीं हो सकते और न ही भारत में कृषि भूमि खरीद सकते हैं। यह केवल आर्थिक और सांस्कृतिक जुड़ाव हेतु दिया गया एक आजीवन वीजा सुविधा कार्ड है।

महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक सिद्धांत एवं कालक्रम

टी. एच. मार्शल का नागरिकता सोपान
नागरिक अधिकार (18वीं सदी) + राजनीतिक अधिकार (19वीं सदी) + सामाजिक अधिकार (20वीं सदी) = आधुनिक नागरिकता
लॉर्ड ब्राइस का लोकतांत्रिक स्वास्थ्य समीकरण
लोकतांत्रिक उत्कृष्टता = (बुद्धि + आत्मसंयम + विवेक) - (उदासीनता + स्वार्थ + दलीय अंधभक्ति)
विशिष्ट भारतीय नागरिक अधिकार समुच्चय
केवल नागरिकों के अधिकार = {अनुच्छेद 15, अनुच्छेद 16, अनुच्छेद 19, अनुच्छेद 29, अनुच्छेद 30}

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
अरस्तू के अनुसार नागरिकता की परिभाषा दीजिए। उनकी संकल्पना को बहिष्करणकारी क्यों माना जाता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

अरस्तू ने अपनी पुस्तक 'पॉलिटिक्स' (Politics) में नागरिक को परिभाषित करते हुए लिखा है: 'नागरिक वह है जो राज्य के न्यायिक प्रशासन तथा विधि-निर्माण संबंधी शासन कार्यों में भाग लेने का अधिकार रखता है।'

उनकी यह संकल्पना बहिष्करणकारी (Exclusionary) थी क्योंकि:

  1. उन्होंने महिलाओं को घरेलू परिधि में सीमित मानकर नागरिक अधिकारों से वंचित किया।
  2. दासों को विवेकहीन उपकरण मानकर नागरिकता नहीं दी।
  3. शारीरिक श्रमिकों व कृषकों को यह कहकर बाहर रखा कि निरंतर शारीरिक श्रम करने के कारण उनके पास सद्गुणों के संवर्धन और राज्य चिंतन हेतु आवश्यक अवकाश (Leisure) नहीं होता।
उदाहरण 2
निष्ठा एवं राजनीतिक अधिकारों के आधार पर नागरिक और विदेशी में अंतर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. निष्ठा के आधार पर अंतर: नागरिक अपने राज्य के प्रति स्थायी, अटूट और मौलिक निष्ठा रखता है। जबकि विदेशी केवल मेजबान देश की सीमाओं में रहने तक वहां के कानूनों के प्रति अस्थायी निष्ठा रखता है; उसकी वास्तविक व मूल निष्ठा अपने स्वदेश के प्रति होती है।
  2. राजनीतिक अधिकारों के आधार पर अंतर: नागरिक को मताधिकार, चुनाव लड़ने और उच्च संवैधानिक पद धारण करने जैसे समस्त राजनीतिक अधिकार प्राप्त होते हैं। विदेशी को किसी भी प्रकार का राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं होता।
उदाहरण 3
रक्त के सिद्धांत (Jus Sanguinis) तथा जन्मस्थान के सिद्धांत (Jus Soli) में अंतर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. रक्त का सिद्धांत (Jus Sanguinis): इस सिद्धांत में बच्चे की नागरिकता उसके माता-पिता के रक्त अथवा नागरिकता से निर्धारित होती है, चाहे बच्चे का जन्म संसार के किसी भी देश में हुआ हो (जैसे जर्मनी व इटली की परंपरा)।
  2. जन्मस्थान का सिद्धांत (Jus Soli): इस सिद्धांत के तहत बच्चे की नागरिकता इस बात से तय होती है कि उसका जन्म किस राज्य के भौगोलिक क्षेत्र में हुआ है, भले ही उसके माता-पिता किसी भी देश के नागरिक हों (जैसे अमेरिकी संविधान का 14वां संशोधन)।
उदाहरण 4
लॉर्ड जेम्स ब्राइस के अनुसार एक आदर्श नागरिक के तीन प्रमुख गुण कौन से हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

लॉर्ड ब्राइस ने अपनी पुस्तक 'Modern Democracies' में आदर्श नागरिक के तीन मूलभूत गुण बताए हैं:

  1. बुद्धि (Intelligence): सार्वजनिक नीतियों को समझने, राजनीतिक दुष्प्रचार से सत्य को अलग करने और निष्पक्ष मताधिकार प्रयोग की बौद्धिक क्षमता।
  2. आत्मसंयम (Self-Control): संकीर्ण निजी स्वार्थों को जनहित के अधीन रखना, विधि के शासन का सम्मान करना और विरोधी विचारों के प्रति सहिष्णुता।
  3. विवेक एवं कर्तव्यनिष्ठा (Conscience): समाज के प्रति नैतिक दायित्व की भावना, ईमानदारी से कर भुगतान और भ्रष्टाचार व अन्याय के विरुद्ध सक्रिय भागीदारी।
उदाहरण 5
लोकतंत्र में अकर्मण्यता या उदासीनता (Indolence) किस प्रकार सबसे बड़ी बाधा सिद्ध होती है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

लॉर्ड ब्राइस ने अकर्मण्यता (उदासीनता) को लोकतंत्र की सबसे घातक व्याधि माना है क्योंकि:

  1. जब प्रबुद्ध व ईमानदार नागरिक मतदान करने नहीं जाते और शासन की अनदेखी करते हैं, तब भ्रष्ट, आपराधिक और स्वार्थी गुट आसानी से सत्ता हथिया लेते हैं।
  2. जनता की निरंतर सतर्कता के अभाव में नौकरशाही व सत्ता निरंकुश हो जाती है।
  3. 'शाश्वत सतर्कता ही स्वतंत्रता का मूल्य है'—इस सिद्धांत की उपेक्षा लोकतंत्र को नष्ट कर देती है।
उदाहरण 6
संघात्मक शासन होते हुए भी भारतीय संविधान में एकल नागरिकता को क्यों अपनाया गया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

भारत में संघीय व्यवस्था होने के बावजूद डॉ. बी. आर. अम्बेडकर और संविधान सभा ने एकल नागरिकता को निम्न प्रमुख कारणों से अपनाया:

  1. राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता: 1947 के विभाजन की त्रासदी के बाद प्रांतीय अलगाववाद और भाषावाद पर अंकुश लगाकर एक सुदृढ़ राष्ट्रीय पहचान स्थापित करने हेतु।
  2. सर्वत्र समानता: कश्मीर से कन्याकुमारी तक प्रत्येक नागरिक को पूरे देश में बिना किसी क्षेत्रीय भेदभाव के समान अधिकार और अवसर उपलब्ध कराने हेतु।
  3. संकीर्ण प्रांतीय वफादारी से ऊपर भारतीयता की भावना को प्रतिष्ठित करने हेतु।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि भारत में विदेशियों को कोई मौलिक अधिकार नहीं मिलते।

सही वैज्ञानिक तथ्य

विदेशियों को भी जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) तथा समानता (अनुच्छेद 14) जैसे मूलभूत अधिकार प्राप्त हैं। केवल राजनीतिक व विशिष्ट सांस्कृतिक अधिकार (15, 16, 19, 29, 30) नागरिकों तक सीमित हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया (OCI) कार्ड को भारत की दोहरी नागरिकता मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

भारत में अनुच्छेद 9 के तहत दोहरी नागरिकता पूरी तरह निषिद्ध है। ओसीआई केवल एक वीजा व आर्थिक सुविधा कार्ड है, इसमें मताधिकार या संवैधानिक पद पाने का अधिकार नहीं होता।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

जुस सैंग्विनिस और जुस सोली में भ्रम होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

जुस सैंग्विनिस रक्त संबंध या वंशानुगत नागरिकता है; जुस सोली जन्मस्थान या भूभाग पर आधारित नागरिकता है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

नागरिकता: अवधारणा, प्रकार एवं आदर्श नागरिकता WBCHSE कक्षा 11 राजनीति विज्ञान • नागरिक बनाम विदेशी • अर्जन एवं समाप्ति • आदर्श नागरिक के गुण नागरिकता की अवधारणा व विकास लैटिन 'Civitas' • लास्की व मार्शल 1. नागरिक अधिकार (18वीं सदी): व्यक्तिगत स्वतंत्रता व न्याय 2. राजनीतिक अधिकार (19वीं सदी): मताधिकार व सत्ता में भागीदारी 3. सामाजिक अधिकार (20वीं सदी): शिक्षा, स्वास्थ्य व सुरक्षा Civil (18th c.) → Political (19th c.) → Social Rights (20th c.) नागरिक बनाम विदेशी अधिकार एवं संवैधानिक स्थिति • स्थायी निष्ठा बनाम अस्थायी निष्ठा • राजनीतिक अधिकार केवल नागरिकों को (अनुच्छेद 15, 16, 19, 29, 30) • विदेशियों को मूलभूत मानवाधिकार प्राप्त (अनुच्छेद 14, 20, 21) • निष्कासन/प्रत्यर्पण केवल विदेशियों के लिए संभव नागरिकता: अर्जन एवं समाप्ति वैधानिक प्रक्रियाएं एवं सिद्धांत • अर्जन: रक्त का अधिकार (Jus Sanguinis) व जन्मस्थान (Jus Soli) • देशीयकरण, विवाह, सरकारी सेवा व नए भूभाग का विलय • समाप्ति: स्वेच्छा से त्याग (Renunciation), विदेशी नागरिकता अर्जन • राष्ट्रद्रोह व धोखे से नागरिकता लेने पर वंचना (Deprivation) सुनागरिकता व लॉर्ड ब्राइस 3 गुण एवं 3 प्रमुख बाधाएं ★ 3 सद्गुण: 1. बुद्धि 2. आत्मसंयम 3. कर्तव्यनिष्ठा व विवेक ⚠ 3 बाधाएं: 1. अकर्मण्यता/उदासीनता 2. स्वार्थ 3. अंध दलीय निष्ठा • एकल नागरिकता: भारतीय संघ में राष्ट्रीय एकता का मूल आधार Allegiance + Rights + Civic Duties = Constitutional Citizenship

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
नागरिकता संप्रभु राज्य और व्यक्ति के मध्य पूर्ण विधिक एवं राजनीतिक संबंध है, जो अधिकारों और कर्तव्यों का समुच्चय है।
मुख्य बिंदु 2
अरस्तू ने नागरिक को शासन व न्याय में सक्रिय भागीदार माना, किंतु महिलाओं व श्रमिकों को नागरिकता से बाहर रखा।
मुख्य बिंदु 3
हेरोल्ड लास्की के अनुसार नागरिकता लोककल्याण के लिए अपनी सुप्रशिक्षित निर्णयबुद्धि का नैतिक योगदान है।
मुख्य बिंदु 4
टी. एच. मार्शल के अनुसार नागरिकता 18वीं सदी में नागरिक, 19वीं सदी में राजनीतिक और 20वीं सदी में सामाजिक अधिकार के रूप में विकसित हुई।
मुख्य बिंदु 5
नागरिक राज्य के प्रति स्थायी निष्ठा रखता है और राजनीतिक अधिकार पाता है, जबकि विदेशी को मताधिकार नहीं होता।
मुख्य बिंदु 6
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15, 16, 19, 29 और 30 केवल नागरिकों के लिए हैं, जबकि 14 और 21 सभी व्यक्तियों पर लागू होते हैं।
मुख्य बिंदु 7
जन्मजात नागरिकता रक्त के सिद्धांत (Jus Sanguinis) और जन्मस्थान के सिद्धांत (Jus Soli) द्वारा प्राप्त होती है।
मुख्य बिंदु 8
नागरिकता की समाप्ति स्वेच्छा से त्याग (Renunciation), विदेशी नागरिकता लेने पर स्वतः समाप्ति, और राज्य द्वारा वंचना से होती है।
मुख्य बिंदु 9
लॉर्ड ब्राइस ने बुद्धि, आत्मसंयम और विवेक को गुण तथा उदासीनता, स्वार्थ और अंध दलीय निष्ठा को प्रमुख बाधा माना।
मुख्य बिंदु 10
भारतीय संविधान राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बनाए रखने हेतु प्रांतीय भेदभाव से मुक्त एकल नागरिकता प्रदान करता है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

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