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WBB • कक्षा XI • Political Science • अध्याय 8
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

राष्ट्र एवं राष्ट्रवाद

राष्ट्र एवं राष्ट्रवाद आधुनिक राजनीतिक इतिहास की सर्वाधिक शक्तिशाली और युगांतरकारी संकल्पनाओं में से हैं, जिन्होंने विश्व के भू-राजनीतिक मानचित्र को नया आकार दिया है और जो साम्राज्यविरोधी महान मुक्ति संग्रामों तथा विनाशकारी वैश्विक युद्धों दोनों के मूल प्रेरक रहे हैं। इस अध्याय में राष्ट्रीय जनसमुदाय (Nationality), राष्ट्र (Nation) तथा संप्रभु राज्य (State) के वैचारिक सोपान का गहन एवं व्यवस्थित विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। यह स्पष्ट करता है कि कैसे साझा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक तत्व एक जनसमुदाय का निर्माण करते हैं, राजनीतिक चेतना किस प्रकार उसे एक राष्ट्र में परिवर्तित करती है, तथा एक राष्ट्र कानूनी व क्षेत्रीय संप्रभु राज्य से किस प्रकार भिन्न है। इस अध्ययन सामग्री में राष्ट्रीय आत्मनिर्णय के अधिकार ('एक राष्ट्र, एक राज्य' सिद्धांत) के गुण-दोषों, नागरिक व सकारात्मक राष्ट्रवाद बनाम उग्र अंधराष्ट्रवाद (Chauvinism) के अंतर, तथा पश्चिमी संकीर्ण राष्ट्र-राज्य के विरुद्ध गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के वैश्विक मानवतावाद (Universal Humanism) के अमर दर्शन का सांगोपांग मूल्यांकन किया गया है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

राष्ट्र एवं राष्ट्रवाद का अध्ययन राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए आधुनिक राज्य-निर्माण, स्वतंत्रता आंदोलनों और समकालीन वैश्विक संघर्षों की प्रकृति को समझने हेतु अपरिहार्य है। यह समझाता है कि क्यों केवल समान भाषा या धर्म किसी समुदाय को हमेशा एकजुट नहीं रख सकते, भारत जैसा बहुलवादी लोकतंत्र अपनी अपार विविधताओं के बीच राष्ट्रीय एकता को कैसे अक्षुण्ण रखता है, तथा अनियंत्रित उग्र राष्ट्रवाद विश्व शांति के लिए किस प्रकार गंभीर संकट बन सकता है। इसके अतिरिक्त, पश्चिमी राष्ट्र-राज्य पर टैगोर का दार्शनिक दृष्टिकोण विद्यार्थियों को संकीर्ण राष्ट्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर सार्वभौमिक बंधुत्व, सांस्कृतिक समन्वय और विश्वनागरिकता के प्रति सजग करता है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. राष्ट्रीय जनसमुदाय (Nationality)...
2 2. राष्ट्र बनाम राष्ट्रीय जनसमुदाय...
3 3. राष्ट्रीय आत्मनिर्णय का अधिकार:...
4 4. राष्ट्रवाद: स्वरूप, दोहरा चरित्र...
5 5. रवीन्द्रनाथ टैगोर का राष्ट्रवाद...
6 6. अंतर्राष्ट्रीयतावाद एवं राष्ट्र-...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. राष्ट्रीय जनसमुदाय (Nationality) की अवधारणा: व्युत्पत्ति, वस्तुनिष्ठ तत्व एवं आध्यात्मिक मर्म

राष्ट्रीय जनसमुदाय का स्वरूप एवं उसके आधार

अंग्रेजी शब्द 'Nationality' लैटिन शब्द 'Natio' (मूल धातु Nasci, जिसका अर्थ है जन्म अथवा वंश) से व्युत्पन्न है। यद्यपि इसका शाब्दिक अर्थ साझा जैविक या वंशानुगत संबंध की ओर संकेत करता है, तथापि आधुनिक राजनीति विज्ञान में राष्ट्रीय जनसमुदाय मूलतः एक मनोवैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक एकता की गहन भावना है जो किसी जनसमूह को परस्पर जोड़ती है और उन्हें अन्य समूहों से भिन्न बनाती है:

राष्ट्रीय जनसमुदाय के निर्माण में सहायक वस्तुनिष्ठ तत्व:
  1. समान वंश या रक्त संबंध: एक ही पूर्वज की संतान होने की वास्तविक या काल्पनिक धारणा अपनत्व की भावना पैदा करती है; किंतु आधुनिक नृविज्ञान के अनुसार विश्व में कोई भी विशुद्ध नस्ल नहीं बची है।
  2. समान भाषा: भाषा विचारों, भावनाओं, लोककथाओं और साहित्य के आदान-प्रदान का सबसे सशक्त माध्यम है। तथापि, भाषा की भिन्नता होने पर भी राष्ट्रीयता बन सकती है; जैसे स्विट्जरलैंड में चार राजभाषाएं (जर्मन, फ्रेंच, इतालवी, रोमांश) होने के बावजूद अटूट राष्ट्रीय एकता है।
  3. समान धर्म: ऐतिहासिक रूप से धर्म ने कबीलों को संगठित करने में भूमिका निभाई; किंतु केवल धर्म राष्ट्रीयता की स्थायी गारंटी नहीं दे सकता। वर्ष 1971 में साझा इस्लाम धर्म होने के बावजूद सांस्कृतिक शोषण के विरुद्ध स्वतंत्र बांग्लादेश का उदय हुआ।
  4. भौगोलिक समीपता: एक निश्चित भूभाग में पीढ़ियों तक साथ रहने से मातृभूमि के प्रति भावनात्मक लगाव उत्पन्न होता है। इसके विपरीत, यहूदियों ने सहस्राब्दियों तक अपनी विशिष्ट राष्ट्रीय पहचान को मातृभूमि के अभाव में भी बनाए रखा।
  5. साझा इतिहास एवं ऐतिहासिक स्मृतियां: संयुक्त विजय, त्याग, बलिदान और ऐतिहासिक संघर्षों की स्मृतियां समुदाय को अंतर्मन से जोड़ती हैं।
  6. आर्थिक हित: एकीकृत व्यापार और बाजार क्षेत्रीय संकीर्णताओं को समाप्त कर राष्ट्रीय आर्थिक एकता को सुदृढ़ करते हैं।
अनिवार्य आत्मपरक (मनोवैज्ञानिक) तत्व:

सभी राजनीतिक विचारक इस बात पर सहमत हैं कि भौतिक तत्व केवल सहायक हैं; राष्ट्रीयता का सच्चा प्राणतत्व आंतरिक मनोवैज्ञानिक एकताबोध है। फ्रांसीसी विद्वान अर्नेस्ट रेनन ने अपने प्रसिद्ध व्याख्यान (1882) 'राष्ट्र क्या है?' में कहा था: 'राष्ट्र एक आत्मा है, एक आध्यात्मिक सिद्धांत है... यह एक दैनिक जनमत संग्रह (Daily Plebiscite) है।' अतीत के साझा गौरव और भविष्य में साथ रहने की प्रबल इच्छा ही राष्ट्रीयता की आत्मा है।

2. राष्ट्र बनाम राष्ट्रीय जनसमुदाय बनाम राज्य: सोपानिक अंतर

त्रयी का वैचारिक विश्लेषण एवं तुलना

सामान्य बोलचाल में 'राष्ट्र' (Nation), 'राष्ट्रीय जनसमुदाय' (Nationality) और 'राज्य' (State) को एक समान मान लिया जाता है, किंतु राजनीति विज्ञान में इनके मध्य अत्यंत स्पष्ट व तकनीकी अंतर है:

अवधारणापरिभाषा एवं स्वरूपअनिवार्य लक्षण एवं दृष्टांत
राष्ट्रीय जनसमुदाय (Nationality)सांस्कृतिक व मनोवैज्ञानिक रूप से एकजुट मानव समुदाय।संप्रभु राज्य या राजनीतिक संगठन का होना आवश्यक नहीं (उदा. कुर्द समुदाय या 1948 से पूर्व यहूदी समुदाय)।
राष्ट्र (Nation)राजनीतिक रूप से संगठित अथवा राज्य निर्माण की आकांक्षा रखने वाला जनसमुदाय।लॉर्ड ब्राइस: 'राष्ट्र एक ऐसा राष्ट्रीय जनसमुदाय है जो राजनीतिक संगठन में संगठित हो चुका है, जो या तो स्वतंत्र है अथवा स्वतंत्र होने की इच्छा रखता है।'
राज्य (State)कानूनी, क्षेत्रीय एवं बाध्यकारी संप्रभु राजनीतिक संस्था।चार अनिवार्य तत्व: निश्चित भूभाग, जनसंख्या, सरकार तथा सर्वोच्च संप्रभुता (आंतरिक एवं बाह्य)।
महत्वपूर्ण वैचारिक निष्कर्ष:
  • राज्य विहीन राष्ट्र: बिना संप्रभु राज्य के भी एक राष्ट्र का अस्तित्व हो सकता है (उदा. प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व तीन साम्राज्यों में बंटा पोलैंड या वर्तमान कुर्दिश राष्ट्र)।
  • बहुराष्ट्रीय राज्य (Multinational State): एक ही संप्रभु राज्य में कई भिन्न-भिन्न राष्ट्रीयताएं सह-अस्तित्व में रह सकती हैं (उदा. यूनाइटेड किंगडम—अंग्रेज, स्कॉट्स, वेल्श और उत्तरी आयरिश; अथवा कनाडा)।
  • राष्ट्र-राज्य (Nation-State): जब किसी एक राष्ट्र की सीमाएं और संप्रभु राज्य की भौगोलिक सीमाएं पूर्णतः एक हो जाती हैं (उदा. जापान)।

3. राष्ट्रीय आत्मनिर्णय का अधिकार: सिद्धांत, पक्ष एवं विपक्ष के तर्क

'एक राष्ट्र, एक राज्य' का सिद्धांत

राष्ट्रीय आत्मनिर्णय के अधिकार (Right of National Self-Determination) का आशय है कि प्रत्येक विशिष्ट राष्ट्रीय समुदाय को अपना राजनीतिक भविष्य तय करने तथा एक स्वतंत्र संप्रभु राज्य स्थापित करने का जन्मसिद्ध नैतिक व राजनीतिक अधिकार है ('एक राष्ट्र, एक राज्य')। इस सिद्धांत को अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने 'चौदह सूत्रीय कार्यक्रम' (1918) में तथा रूसी क्रांति के नायक लेनिन ने साम्राज्यवादी गुलामी के विरुद्ध विश्वव्यापी मान्यता दी।

पक्ष में प्रमुख तर्क:
  • लोकतांत्रिक वैधता: लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है कि शासन शासितों की सहमति पर आधारित हो; किसी भी जनसमूह को पराधीन नहीं रखा जाना चाहिए।
  • सांस्कृतिक विकास एवं स्वाभिमान: पराधीनता के कलंक को मिटाकर प्रत्येक राष्ट्र अपनी भाषा, कला और सांस्कृतिक विशिष्टताओं का स्वतंत्र विकास कर सकता है।
  • अंतरराष्ट्रीय शांति: जे.एस. मिल के अनुसार, जब राज्य की सीमाएं और राष्ट्र की सीमाएं एक होती हैं, तो आंतरिक विद्रोह और अंतरराष्ट्रीय तनाव घटते हैं।
विपक्ष में तर्क एवं गंभीर खतरे (लॉर्ड एक्टन एवं कॉबन):
  • राज्यों का अंतहीन विखंडन: दुनिया भर में हजारों भाषाई व जातीय समूह हैं; यदि सभी स्वतंत्र राज्य की मांग करें तो विश्व छोटे-छोटे अक्षम राज्यों में बंट जाएगा।
  • नए अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न एवं जातीय संहार: नवगठित प्रत्येक राज्य में आंतरिक अल्पसंख्यक होते हैं, जिनके विरुद्ध बहुसंख्यक वर्ग अमानवीय अत्याचार और निष्कासन शुरू कर देता है (उदा. 1990 के बाल्कन युद्ध)।
  • लॉर्ड एक्टन की प्रसिद्ध चेतावनी: लॉर्ड एक्टन ने लिखा: 'राष्ट्रीयता का सिद्धांत समाजवाद के सिद्धांत से भी अधिक मूर्खतापूर्ण और आपराधिक है... एक ही राज्य में कई जातियों का सह-अस्तित्व ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सबसे बड़ी गारंटी है।'

4. राष्ट्रवाद: स्वरूप, दोहरा चरित्र एवं वैश्विक भूमिका

राष्ट्रवाद के दो विपरीत चेहरे: मुक्तिदाता बनाम संहारक

राष्ट्रवाद राष्ट्रीय भावना की वैचारिक अभिव्यक्ति है—अपने राष्ट्र के प्रति अनन्य निष्ठा, प्रेम और समर्पण की सामूहिक चेतना। इतिहास में राष्ट्रवाद ने मुक्तिदाता और आक्रामक संहारक दोनों रूपों में भूमिका निभाई है:

उदारवादी व सकारात्मक राष्ट्रवादउग्र व आक्रामक राष्ट्रवाद (Chauvinism)
एशिया व अफ्रीका में उपनिवेशवाद विरोधी मुक्ति आंदोलनों की प्रेरक शक्ति बना (उदा. भारत का स्वाधीनता संग्राम)।दूसरे देशों को पराधीन बनाने और सैन्य आक्रामकता फैलाने वाले साम्राज्यवाद में परिवर्तित हो जाता है।
देश के भीतर लोकतंत्र, कानून का शासन, समानता और बंधुत्व की स्थापना करता है।तानाशाही, सैन्यीकरण, फासीवाद और नाजीवाद ('रक्त व मिट्टी की विचारधारा') को जन्म देता है।
त्याग, स्वाभिमान तथा अन्य संप्रभु राष्ट्रों के प्रति सम्मान और सह-अस्तित्व सिखाता है।अन्य जातियों से घृणा, संकीर्ण अंधराष्ट्रवाद (Jingoism) और विनाशकारी विश्व युद्धों का कारण बनता है।

5. रवीन्द्रनाथ टैगोर का राष्ट्रवाद दर्शन: विश्वमानवतावाद बनाम यांत्रिक राष्ट्र-राज्य

पश्चिमी राष्ट्र-राज्य की तीखी आलोचना एवं भारततीर्थ की साधना

प्रथम विश्व युद्ध के भयावह रक्तपात के समय गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जापान और संयुक्त राज्य अमेरिका में अपने युगांतरकारी व्याख्यान दिए, जो उनकी अमर कृति 'राष्ट्रवाद' (Nationalism, 1917) में संकलित हुए। अंधराष्ट्रवाद के उस दौर में टैगोर ने विश्वमानवतावाद (Universal Humanism) के धरातल पर खड़े होकर पश्चिमी राष्ट्र-राज्य की निर्मम आलोचना प्रस्तुत की:

टैगोर के राष्ट्रवाद चिंतन के प्रमुख आयाम:
  • राष्ट्र एक स्वार्थी यांत्रिक मशीन (Organized Machine of Self-interest): टैगोर के अनुसार पश्चिमी राष्ट्र कोई सजीव मानवीय समुदाय नहीं, बल्कि व्यावसायिक लालच और राजनीतिक शक्ति का एक 'निर्जीव यांत्रिक ढांचा' है जो कमजोर जातियों के दमन और दोहन हेतु संगठित किया गया है।
  • समाज (Samaj) बनाम राष्ट्र-राज्य (Rashtra): टैगोर ने स्पष्ट किया कि भारत का इतिहास राजनीतिक सत्ता के विस्तार का इतिहास नहीं, बल्कि सामाजिक समन्वय का इतिहास रहा है। भारत की आत्मा उसके आत्मनिर्भर, नैतिक और बहुलवादी 'समाज' में बसी थी, जहाँ राज्य गौण था; जबकि पश्चिम ने समाज को हिंसक राजनीतिक 'राष्ट्र-राज्य' का गुलाम बना दिया।
  • भारततीर्थ की साधना (Cultural Synthesis): भारत का ऐतिहासिक कर्तव्य सशस्त्र राष्ट्र-राज्य बनना नहीं, बल्कि मानवता का महामिलन स्थल बनना है। अपनी प्रसिद्ध कविता 'भारत-तीर्थ' में उन्होंने गाया: 'हेथाय आर्य, हेथा अनार्थ, हेथाय द्राविड़ चीन—शक-हून-दल पठान-मोगल एक देहे हलो लीन।'
  • देशप्रेम से ऊपर मानवता: टैगोर ने स्पष्ट शब्दों में उद्घोष किया: 'देशप्रेम हमारा अंतिम आध्यात्मिक आश्रय नहीं हो सकता; मेरा अंतिम आश्रय मानवता है। मैं कांच की खातिर हीरा नहीं गंवाऊंगा, और मानवता के ऊपर देशप्रेम को कभी विजयी नहीं होने दूंगा।'

6. अंतर्राष्ट्रीयतावाद एवं राष्ट्र-राज्य का भविष्य

संकीर्ण सीमाओं से परे वैश्विक बंधुत्व एवं विश्वनागरिकता

इक्कीसवीं सदी के वैश्वीकृत युग में दीवारों से घिरे संप्रभु राष्ट्र-राज्य की सीमाएं स्पष्ट हो चुकी हैं। अंतर्राष्ट्रीयतावाद का उद्देश्य राष्ट्रीय विशिष्टताओं को नष्ट करना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय विधि, मानवाधिकार और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के आधार पर विश्व परिवार का निर्माण करना है।

वैश्विक अंतरनिर्भरता के प्रमुख आधार:
  • साझा वैश्विक संकट: जलवायु परिवर्तन, महामारियां, परमाणु युद्ध का खतरा और आर्थिक संकट किसी राष्ट्रीय सीमा को नहीं मानते। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मंचों के माध्यम से ही मानवता की रक्षा संभव है।
  • महात्मा गांधी का समन्वय: गांधीजी ने राष्ट्रवाद और अंतर्राष्ट्रीयतावाद को एक-दूसरे का पूरक बताते हुए कहा: 'राष्ट्रवादी बने बिना अंतर्राष्ट्रीयतावादी होना असंभव है... मेरा राष्ट्रवाद ही प्रगाढ़ अंतर्राष्ट्रीयतावाद है। हम अपने देश की स्वाधीनता चाहते हैं, किंतु दूसरों के शोषण की कीमत पर नहीं।'
  • भारतीय संविधान का दृष्टिकोण (अनुच्छेद 51): राज्य के नीति निदेशक तत्वों में स्पष्ट रूप से निर्देश है कि राज्य अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा तथा राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण संबंधों को बढ़ावा देगा और अंतरराष्ट्रीय कानून का आदर करेगा।

महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक सिद्धांत एवं कालक्रम

राष्ट्र निर्माण समीकरण
राष्ट्रीय जनसमुदाय (आध्यात्मिक भावना) + संप्रभु राज्य निर्माण की आकांक्षा = राष्ट्र
राज्य के अनिवार्य तत्वों का सूत्र
संप्रभु राज्य = निश्चित भूभाग + जनसंख्या + सरकार + सर्वोच्च संप्रभुता
टैगोर का मानवतावादी संतुलन सूत्र
विश्वमानवतावाद = सांस्कृतिक समन्वय (मिलन-तीर्थ) + नैतिक चेतना > यांत्रिक राष्ट्र-राज्य

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
राष्ट्रीय जनसमुदाय (Nationality) एवं राष्ट्र (Nation) में अंतर स्पष्ट कीजिए। एक जनसमुदाय राष्ट्र में कैसे परिवर्तित होता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. राष्ट्रीय जनसमुदाय: समान इतिहास, भाषा, संस्कृति या भावनाओं से जुड़ा ऐसा मानव समूह जिसमें आंतरिक एकताबोध की आध्यात्मिक अनुभूति हो। यह मूलतः सामाजिक व मनोवैज्ञानिक अवधारणा है (उदा. कुर्द समुदाय)।
  2. राष्ट्र: वह राष्ट्रीय जनसमुदाय जो राजनीतिक रूप से जागरूक होकर एक संप्रभु राज्य में संगठित हो चुका है या स्वतंत्र राज्य प्राप्त करने की तीव्र आकांक्षा रखता है। लॉर्ड ब्राइस के अनुसार: 'राष्ट्र एक ऐसा जनसमुदाय है जो राजनीतिक संगठन में संगठित हो चुका है, जो या तो स्वतंत्र है या स्वतंत्र होने की इच्छा रखता है।'
  3. परिवर्तनकारी तत्व: राजनीतिक चेतना एवं स्वतंत्र राज्य की आकांक्षा। जब एक सांस्कृतिक जनसमुदाय संप्रभु राज्य स्थापित करने के संकल्प के साथ संगठित होता है, तो वह राष्ट्र बन जाता है।
उदाहरण 2
राष्ट्रीय आत्मनिर्णय के अधिकार का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इसके पक्ष एवं विपक्ष में दो-दो तर्क दीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. अवधारणा: 'एक राष्ट्र, एक राज्य' का सिद्धांत—प्रत्येक विशिष्ट राष्ट्रीय समुदाय को स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का नैतिक व राजनीतिक अधिकार है।
  2. पक्ष में तर्क: क) लोकतांत्रिक सिद्धांत: जनता की सहमति पर आधारित शासन सुनिश्चित होता है और विदेशी औपनिवेशिक दासता का अंत होता है। ख) सांस्कृतिक समृद्धि: प्रत्येक राष्ट्र अपनी भाषा, संस्कृति व साहित्य का बिना किसी हस्तक्षेप के पूर्ण विकास कर सकता है।
  3. विपक्ष में तर्क: क) अंतहीन विखंडन: विश्व के हजारों भाषाई व जातीय समूह यदि राज्य की मांग करें तो विश्व छोटे-छोटे कमजोर टुकड़ों में बंट जाएगा। ख) नए अल्पसंख्यकों का दमन: नवगठित राज्यों में रहने वाले अल्पसंख्यक समुदायों पर बहुसंख्यक वर्ग द्वारा जातीय हिंसा और अत्याचार का खतरा बढ़ जाता है (लॉर्ड एक्टन की चेतावनी)।
उदाहरण 3
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी पुस्तक 'नेशनलिज्म' (1917) में पश्चिमी राष्ट्र-राज्य की तीखी आलोचना क्यों की थी?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. राष्ट्र एक यांत्रिक मशीन: टैगोर ने पश्चिमी राष्ट्र-राज्य को व्यावसायिक लोभ और शक्ति विस्तार हेतु निर्मित एक 'निर्जीव यांत्रिक संगठन' (Organized Machine of Self-interest) माना जो कमजोर जातियों के शोषण पर टिका है।
  2. मानवीय संवेदनाओं का हनन: यह मनुष्य के आध्यात्मिक विवेक और बंधुत्व को कुचलकर उसे राज्य की अंध आज्ञाकारिता की मशीन बना देता है।
  3. भारत की समाजपरक साधना: टैगोर के अनुसार भारत की परंपरा राजनीतिक सत्ता विस्तार की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक व सामाजिक समन्वय की रही है (समाज बनाम राष्ट्र)। भारत एक महामिलन स्थल (मिलन-तीर्थ) है।
  4. मानवता की सर्वोच्चता: उन्होंने देशप्रेम से ऊपर मानवता को स्थान देते हुए कहा: 'मेरा अंतिम आश्रय मानवता है; मैं मानवता के ऊपर देशप्रेम को कभी विजयी नहीं होने दूंगा।'
उदाहरण 4
समान भाषा या समान धर्म को राष्ट्रीय जनसमुदाय का अनिवार्य तत्व क्यों नहीं माना जा सकता?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. भाषा अनिवार्य नहीं: अनेक भाषाएं होने पर भी राष्ट्रीय एकता बनी रह सकती है। जैसे स्विट्जरलैंड में चार राजभाषाएं (जर्मन, फ्रेंच, इतालवी, रोमांश) होने के बावजूद सुदृढ़ राष्ट्रीयता है। भारत में भी 22 अनुसूचित भाषाएं होते हुए भी अटूट राष्ट्रीय एकता है।
  2. धर्म अनिवार्य नहीं: समान धर्म राष्ट्रीय एकता की गारंटी नहीं है। 1971 में साझा इस्लाम धर्म होने के बावजूद भाषाई व सांस्कृतिक अंतर के कारण पाकिस्तान का विभाजन हुआ और बांग्लादेश बना। वहीं भारत और अमेरिका जैसे बहुधर्मी देशों में प्रगाढ़ राष्ट्रीयता पाई जाती है।
उदाहरण 5
उदारवादी व सकारात्मक राष्ट्रवाद तथा उग्र व आक्रामक राष्ट्रवाद (Chauvinism) में क्या अंतर है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. उदारवादी व सकारात्मक राष्ट्रवाद: यह लोकतंत्र, आत्मनिर्णय और औपनिवेशिक मुक्ति की भावना पर आधारित होता है। यह देश के भीतर समानता व विधि का शासन स्थापित करता है और दूसरे राष्ट्रों की संप्रभुता का आदर करता है (उदा. भारत का स्वाधीनता संग्राम)।
  2. उग्र व आक्रामक राष्ट्रवाद: यह अपने राष्ट्र को श्रेष्ठ तथा अन्य राष्ट्रों को हीन समझने की संकीर्ण मानसिकता है ('मेरा देश, चाहे सही हो या गलत')। यह सैन्यवाद, फासीवाद, नस्लीय घृणा और विनाशकारी युद्धों को जन्म देता है।
उदाहरण 6
महात्मा गांधी ने राष्ट्रवाद और अंतर्राष्ट्रीयतावाद का समन्वय किस प्रकार किया था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. परस्पर पूरकता: गांधीजी संकीर्ण राष्ट्रवाद के विरोधी थे; उन्होंने सिद्ध किया कि सच्चा राष्ट्रवाद ही अंतर्राष्ट्रीयतावाद का मार्ग प्रशस्त करता है: 'राष्ट्रवादी बने बिना अंतर्राष्ट्रीयतावादी होना असंभव है।'
  2. परहितकारी स्वाधीनता: भारत का स्वाधीनता संग्राम किसी अन्य देश के शोषण के लिए नहीं, बल्कि स्वतंत्र होकर विश्व समुदाय की सेवा करने हेतु था।
  3. नैतिक सार्वभौमिकता: जिस प्रकार व्यक्ति परिवार के लिए, परिवार गांव के लिए त्याग करता है, उसी प्रकार एक राष्ट्र को संपूर्ण मानवता के कल्याण हेतु अपने संकीर्ण स्वार्थों का त्याग करने को तत्पर रहना चाहिए।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

'राष्ट्र', 'राष्ट्रीय जनसमुदाय' और 'राज्य' को पूरी तरह एक ही मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

जनसमुदाय सांस्कृतिक व मनोवैज्ञानिक भावना है, राष्ट्र राजनीतिक रूप से जागरूक जनसमुदाय है, और राज्य कानूनी संप्रभु संस्था है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि रवीन्द्रनाथ टैगोर भारत के स्वतंत्रता संग्राम के विरोधी थे।

सही वैज्ञानिक तथ्य

टैगोर औपनिवेशिक शोषण के घोर विरोधी थे और जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में उन्होंने 'सर' (नाइटहुड) की उपाधि लौटा दी थी; वे केवल भारत को पश्चिम के आक्रामक व हिंसक अंधराष्ट्रवाद की नकल करने से रोकना चाहते थे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि बहुराष्ट्रीय राज्य अनिवार्य रूप से कमजोर व अलोकतांत्रिक होते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

भारत, स्विट्जरलैंड और कनाडा जैसे लोकतांत्रिक बहुराष्ट्रीय राज्य यह सिद्ध करते हैं कि जबरन एकीकरण की बजाय बहुलवादी संघीय ढांचे में स्वतंत्रता और एकता अधिक सुरक्षित रहती है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

राष्ट्र एवं राष्ट्रवाद: अवधारणात्मक सोपान एवं वैश्विक दृष्टिकोण राष्ट्रीय जनसमुदाय • राष्ट्र • राज्य • आत्मनिर्णय का अधिकार एवं टैगोर का विश्वमानवतावाद राष्ट्रीय जनसमुदाय (Nationality) मनोवैज्ञानिक व आध्यात्मिक एकता
भाषा, संस्कृति, इतिहास तथा समान भावनाओं से निर्मित एकजुटता की गहन आंतरिक व भावनात्मक अनुभूति।
राष्ट्र (Nation) राजनीतिक रूप से संगठित समुदाय
लॉर्ड ब्राइस: 'राजनीतिक रूप से संगठित या स्वतंत्र राज्य स्थापित करने की आकांक्षा रखने वाला जनसमुदाय'।
संप्रभु राज्य (State) कानूनी व प्रादेशिक संप्रभुता
निश्चित भूभाग, जनसंख्या, सरकार तथा आंतरिक व बाह्य संप्रभुता से संपन्न एक कानूनी व राजनीतिक संस्था।
राष्ट्रीय आत्मनिर्णय (Self-Determination) वुडरो विल्सन के चौदह सूत्र (1918)
'एक राष्ट्र, एक राज्य' का सिद्धांत; प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्रीय समुदाय का संप्रभु राज्य स्थापित करने का अधिकार।
🕊 रवीन्द्रनाथ टैगोर का राष्ट्रवाद दर्शन: विश्वमानवतावाद बनाम यांत्रिक राज्य
पश्चिमी संकीर्ण व आक्रामक राष्ट्र-राज्य को स्वार्थी राजनीतिक मशीन बताकर आलोचना की तथा सार्वभौमिक बंधुत्व व सांस्कृतिक समन्वय की पैरवी की।
✔ उदारवादी व सकारात्मक राष्ट्रवाद: स्वाधीनता, आत्मसम्मान व लोकतंत्र का पोषक
Fosters democratic solidarity, heroic self-sacrifice, liberation from colonial enslavement, and pluralist state-building.
✖ उग्र व अंध राष्ट्रवाद (Chauvinism): साम्राज्यवाद, युद्ध व वैश्विक शांति के लिए संकट
Degenerates into national egotism, xenophobia, suppression of domestic minorities, militarism, and world wars.

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
राष्ट्रीय जनसमुदाय (लैटिन 'Natio' से) मूलतः एक गहन मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक एकता की जीवंत अनुभूति है।
मुख्य बिंदु 2
वंश, भाषा, धर्म और भूगोल सहायक तत्व हैं; अर्नेस्ट रेनन के अनुसार राष्ट्रीयता एक आध्यात्मिक सिद्धांत और दैनिक जनमत संग्रह है।
मुख्य बिंदु 3
जब कोई राष्ट्रीय जनसमुदाय राजनीतिक रूप से संगठित होकर स्वतंत्र राज्य की स्थापना करता है या उसकी इच्छा रखता है, तो वह राष्ट्र बनता है (लॉर्ड ब्राइस)।
मुख्य बिंदु 4
राज्य एक कानूनी संप्रभु संस्था है जिसके चार अनिवार्य तत्व (भूभाग, जनसंख्या, सरकार और संप्रभुता) होते हैं; बिना राज्य के भी राष्ट्र संभव है।
मुख्य बिंदु 5
राष्ट्रीय आत्मनिर्णय का अधिकार ('एक राष्ट्र, एक राज्य') लोकतंत्र को बढ़ावा देता है किंतु इसके अत्यधिक प्रयोग से विखंडन का खतरा रहता है।
मुख्य बिंदु 6
लॉर्ड एक्टन के अनुसार एकल-जातीय राज्यों की तुलना में बहुराष्ट्रीय राज्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बेहतर गारंटी देते हैं।
मुख्य बिंदु 7
राष्ट्रवाद का दोहरा चरित्र है: एक ओर यह औपनिवेशिक मुक्ति का पावन संबल है, तो दूसरी ओर उग्र रूप लेने पर फासीवादी संहारक बन जाता है।
मुख्य बिंदु 8
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 'नेशनलिज्म' (1917) में पश्चिमी राष्ट्र-राज्य को व्यावसायिक स्वार्थ की यांत्रिक मशीन बताकर उसकी तीखी निंदा की।
मुख्य बिंदु 9
टैगोर ने विश्वमानवतावाद का संदेश दिया और उद्घोष किया कि संकीर्ण देशप्रेम को कभी मानवता के ऊपर विजयी नहीं होने देना चाहिए।
मुख्य बिंदु 10
वर्तमान वैश्वीकृत युग में जलवायु संकट और परमाणु खतरे से निपटने हेतु सजग नागरिक राष्ट्रवाद का अंतर्राष्ट्रीयतावाद से समन्वय अनिवार्य है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

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