Follow Us
माध्यम चुनें / Select Medium:
Eng (English) Beng (বাংলা) Hindi (हिन्दी)
WBB • कक्षा XI • Political Science • अध्याय 9
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

सरकार के विभिन्न रूप

सरकार के विभिन्न रूप उस संगठनात्मक एवं संस्थागत संरचना को निरूपित करते हैं जिसके माध्यम से राज्य की संप्रभु सत्ता संगठित, विभाजित और क्रियान्वित की जाती है। अरस्तू के प्राचीन यूनानी वर्गीकरण से लेकर आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्रों तक, राजनीति विज्ञानियों ने सरकारों को तीन बुनियादी संस्थागत आधारों पर वर्गीकृत किया है: सत्ता का स्रोत एवं वितरण (लोकतांत्रिक बनाम अधिनायकवादी), क्षेत्रीय स्तर पर सत्ता का विभाजन (एकात्मक बनाम संघात्मक), तथा कार्यपालिका एवं विधायिका के पारस्परिक संबंध (संसदीय बनाम अध्यक्षात्मक)। इस अध्याय में इन सभी शासन प्रणालियों की कार्यपद्धति, उनके तुलनात्मक गुण-दोष तथा संवैधानिक संतुलन का गंभीर परीक्षण किया गया है। इसके साथ ही, इस ऐतिहासिक सत्य का विश्लेषण भी शामिल है कि भारतीय संविधान निर्माताओं ने केवल कार्यकारी स्थायित्व के स्थान पर निरंतर लोकतांत्रिक जवाबदेही को वरीयता देते हुए अर्ध-संघीय ढांचे वाली संसदीय प्रणाली को क्यों चुना।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

सरकार के विभिन्न रूपों का तुलनात्मक अध्ययन राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यह आधुनिक विश्व में शासन व्यवस्था, राजनीतिक स्थिरता और नागरिक स्वतंत्रताओं के संस्थागत स्वरूप को समझने का आधार प्रदान करता है। इससे विद्यार्थी यह समझ पाते हैं कि अमेरिकी अध्यक्षात्मक प्रणाली में राष्ट्रपति और कांग्रेस के बीच गतिरोध क्यों उत्पन्न होता है, ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था किस प्रकार त्वरित नीतिगत निर्णय लेती है, और भारत जैसी विशाल बहुलतावादी व्यवस्था में संघीय ढांचा किस तरह क्षेत्रीय विविधताओं का संरक्षण करते हुए राष्ट्रीय एकता को अक्षुण्ण रखता है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. शासन प्रणालियों का वर्गीकरण: शास...
2 2. संसदीय अथवा मंत्रिमंडलीय शासन प्...
3 3. अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली
4 4. एकात्मक शासन प्रणाली: स्वरूप एवं...
5 5. संघात्मक शासन प्रणाली: आधारभूत स...
6 6. भारतीय शासन प्रणाली: संसदीय लोकत...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. शासन प्रणालियों का वर्गीकरण: शास्त्रीय एवं आधुनिक दृष्टिकोण

शास्त्रीय एवं आधुनिक शासन प्रणालियों का वर्गीकरण

सरकारों के वैज्ञानिक वर्गीकरण का प्रवर्तन यूनानी दार्शनिक अरस्तू (Aristotle) ने अपनी कालजयी पुस्तक पॉलिटिक्स (Politics) में किया। अरस्तू ने सरकारों के वर्गीकरण के लिए दोहरे मानदंड अपनाए: (1) शासकों की संख्या (एक व्यक्ति का शासन, कुछ व्यक्तियों का शासन, या अनेक का शासन), तथा (2) शासन का उद्देश्य (सामान्य जनकल्याण हेतु संचालित 'शुद्ध/सामान्य रूप' बनाम शासकों के व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु संचालित 'विकृत/भ्रष्ट रूप'):

शासकों की संख्यासामान्य/शुद्ध रूप (जनकल्याणकारी)विकृत/भ्रष्ट रूप (स्वार्थी)
एक का शासनराजतंत्र (Monarchy): एक प्रबुद्ध एवं न्यायप्रिय राजा का शासन।निरंकुशतंत्र (Tyranny): एक अत्याचारी व क्रूर शासक का स्वेच्छाचारी शासन।
कुछ का शासनकुलीनतंत्र (Aristocracy): समाज के श्रेष्ठ, प्रबुद्ध व निस्वार्थ व्यक्तियों का शासन।अल्पतंत्र/धनिकतंत्र (Oligarchy): मुट्ठी भर धनी व्यक्तियों का स्वार्थी शासन।
अनेकों का शासनसंवैधानिक मध्यमवर्गीय तंत्र (Polity): विधि सम्मत सर्वोत्तम व्यावहारिक शासन।भीड़तंत्र/प्रजातंत्र (Democracy): अरस्तू के अनुसार निर्धन व उग्र जनसमूह का अशांत शासन।

आधुनिक काल में स्टीफन लीकॉक (Stephen Leacock) और लॉर्ड ब्राइस (Lord Bryce) ने संस्थागत संबंधों के आधार पर सरकारों को वर्गीकृत किया: (क) प्रभुसत्ता के वितरण के आधार पर: लोकतांत्रिक बनाम अधिनायकवादी; (ख) केंद्र एवं राज्यों के मध्य सत्ता विभाजन के आधार पर: एकात्मक बनाम संघात्मक; तथा (ग) विधायिका एवं कार्यपालिका के संबंधों के आधार पर: संसदीय बनाम अध्यक्षात्मक।

2. संसदीय अथवा मंत्रिमंडलीय शासन प्रणाली

संसदीय शासन व्यवस्था के मूल सिद्धांत एवं संरचना

संसदीय शासन व्यवस्था (Parliamentary System), जिसे वेस्टमिंस्टर मॉडल (Westminster Model) अथवा मंत्रिमंडलीय व्यवस्था भी कहा जाता है, वह शासन प्रणाली है जिसमें वास्तविक कार्यपालिका विधायिका (संसद) के भीतर से चुनी जाती है और अपनी सभी नीतियों व कृत्यों के लिए संसद के प्रति प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी होती है।

संसदीय प्रणाली की प्रमुख विशेषताएं:
  • द्वैध कार्यपालिका (Dual Executive): एक नाममात्र अथवा संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष (जैसे भारत के राष्ट्रपति या ब्रिटेन के सम्राट) और एक वास्तविक कार्यकारी प्रमुख (प्रधानमंत्री एवं उनका मंत्रिमंडल)।
  • कार्यपालिका व विधायिका का घनिष्ठ समन्वय (Fusion of Powers): प्रधानमंत्री एवं सभी मंत्रियों का संसद सदस्य होना अनिवार्य है। यदि कोई गैर-सदस्य मंत्री बनता है, तो उसे छह माह के भीतर संसद का सदस्य निर्वाचित होना पड़ता है।
  • सामूहिक उत्तरदायित्व (Collective Responsibility): मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से संसद के लोकप्रिय सदन (जैसे लोकसभा) के प्रति उत्तरदायी होती है। अविश्वास प्रस्ताव पारित होते ही पूरी सरकार को त्यागपत्र देना पड़ता है। इसे 'साथ-साथ तैरना और साथ-साथ डूबना' कहा जाता है।
  • प्रधानमंत्री का नेतृत्व (Leadership of Prime Minister): प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल रूपी मेहराब की आधारशिला (Keystone of the Cabinet Arch) होते हैं।
  • संसद भंग करने का अधिकार: प्रधानमंत्री की सलाह पर संवैधानिक प्रमुख कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व भी संसद के निचले सदन को भंग कर मध्यावधि चुनाव की घोषणा कर सकते हैं।

गुण: विधायिका और कार्यपालिका के मध्य पूर्ण सामंजस्य रहता है जिससे विधि-निर्माण सुचारू रूप से चलता है; सरकार निरंतर जनहित के प्रति सजग रहती है; अविश्वास प्रस्ताव द्वारा निरंकुशता पर अंकुश लगाया जा सकता है।
दोष: गठबंधन सरकारों में राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है; दलीय सचेतक (Whip) के कारण सांसदों की अभिव्यक्ति सीमित होती है; बहुमत होने पर 'मंत्रिमंडलीय अधिनायकवाद' (Cabinet Dictatorship) का खतरा रहता है।

3. अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली

अध्यक्षात्मक व्यवस्था: शक्ति पृथक्करण एवं संतुलन

अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली (Presidential System) वह शासन व्यवस्था है जिसमें राष्ट्रपति ही राज्य का और सरकार का एकमात्र वास्तविक प्रमुख होता है, जो एक निश्चित अवधि के लिए जनता द्वारा प्रत्यक्ष या निर्वाचक मंडल के माध्यम से चुना जाता है और अपनी नीतियों के लिए व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होता।

अध्यक्षात्मक व्यवस्था की आधारभूत विशेषताएं (अमेरिकी मॉडल):
  • एकल कार्यपालिका (Single Executive): राष्ट्रपति राज्य और सरकार दोनों का प्रमुख होता है। कोई औपचारिक या नाममात्र का राष्ट्राध्यक्ष अलग से नहीं होता।
  • शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत (Separation of Powers): मोंटेस्क्यू के सिद्धांत के अनुसार शासन के तीनों अंग—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—एक-दूसरे से पूर्णतः स्वतंत्र और स्वायत्त होते हैं। राष्ट्रपति या उनके सचिव कांग्रेस (संसद) के सदस्य नहीं हो सकते।
  • नियंत्रण एवं संतुलन (Checks and Balances): कोई भी अंग निरंकुश न बन सके, इसके लिए एक-दूसरे पर संवैधानिक नियंत्रण रखा गया है। उदाहरण के लिए, अमेरिकी राष्ट्रपति कांग्रेस द्वारा पारित विधेयकों पर वीटो (Veto) लगा सकते हैं; जबकि राष्ट्रपति द्वारा की गई महत्वपूर्ण संधियों व नियुक्तियों को सीनेट की पुष्टि आवश्यक होती है।
  • निश्चित कार्यकाल (Fixed Tenure): राष्ट्रपति का कार्यकाल निश्चित (4 वर्ष) होता है। विधायिका साधारण अविश्वास प्रस्ताव से राष्ट्रपति को नहीं हटा सकती; उन्हें केवल अत्यंत दुर्लभ महाभियोग (Impeachment) द्वारा ही हटाया जा सकता है।

गुण: सरकार में पूर्ण स्थायित्व बना रहता है; राष्ट्रपति दलगत राजनीति से परे योग्यतम विशेषज्ञों को अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर सकते हैं; संकटकाल में त्वरित निर्णय लेने में सक्षम।
दोष: यदि राष्ट्रपति और कांग्रेस में अलग-अलग दलों का बहुमत हो, तो शासन में गतिरोध (Deadlock) उत्पन्न हो जाता है; कार्यपालिका के विधायिका के प्रति जवाबदेह न होने से तानाशाही की प्रवृत्ति पनपने का भय रहता है।

4. एकात्मक शासन प्रणाली: स्वरूप एवं कार्यप्रणाली

एकात्मक शासन की संरचनात्मक विशेषताएं

प्रोफेसर डायसी (A.V. Dicey) के अनुसार, एकात्मक शासन (Unitary Government) वह व्यवस्था है जिसमें संविधान द्वारा समस्त संप्रभु शक्ति एक केंद्रीय सरकार के हाथों में केंद्रीकृत कर दी जाती है। इस व्यवस्था में प्रांतीय या स्थानीय सरकारें स्वायत्त नहीं होतीं, बल्कि वे केंद्र द्वारा प्रत्यायोजित शक्तियों के अधीन कार्य करती हैं।

एकात्मक व्यवस्था के प्रमुख लक्षण:
  • एकल केंद्रीय सत्ता: पूरे राष्ट्र के लिए केवल एक सर्वोच्च केंद्रीय विधायिका और सरकार होती है (जैसे यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जापान)।
  • शक्तियों का प्रत्यायोजन: स्थानीय निकायों को संविधान से स्वतंत्र शक्ति प्राप्त नहीं होती; केंद्र जब चाहे उनकी शक्तियों को घटा, बढ़ा या समाप्त कर सकता है।
  • एकल नागरिकता एवं एकीकृत न्यायपालिका: संपूर्ण देश में एक ही संविधान, एक ही नागरिकता और एक समान विधि व्यवस्था लागू होती है।
  • लचीला संविधान: एकात्मक राज्यों में प्रायः संविधान लचीला या सुपरिवर्तनीय होता है (जैसे ब्रिटेन में), जहां संसद सामान्य बहुमत से किसी भी विधि में संशोधन कर सकती है।

लाभ: प्रशासनिक सुदृढ़ता, सुगठित राष्ट्रीय एकता, नीतियों के क्रियान्वयन में गति, तथा कम खर्चीली शासन व्यवस्था।
हानियां: स्थानीय आवश्यकताओं और क्षेत्रीय समस्याओं की उपेक्षा; केंद्रीय नौकरशाही के निरंकुश होने की आशंका; भारत जैसे विशाल भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता वाले देशों के लिए सर्वथा अनुपयुक्त।

5. संघात्मक शासन प्रणाली: आधारभूत स्तंभ एवं शर्तें

संघात्मक व्यवस्था के अनिवार्य घटक

संघात्मक प्रणाली (Federal System) लैटिन शब्द foedus से बना है, जिसका अर्थ है 'संधि' अथवा 'समझौता'। यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें एक लिखित एवं सर्वोच्च संविधान के माध्यम से राष्ट्रीय (केंद्रीय) सरकार और क्षेत्रीय (राज्य) सरकारों के मध्य शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया जाता है।

संघीय तत्वसंवैधानिक महत्व एवं भूमिका
1. द्वैध शासन प्रणाली (Dual Polity)केंद्र और राज्यों की दोहरी सरकारें संविधान द्वारा प्रदत्त अपने-अपने क्षेत्रों में संप्रभु सत्ता का प्रयोग करती हैं।
2. शक्तियों का स्पष्ट विभाजन (Division of Powers)राष्ट्रीय महत्व के विषय (रक्षा, विदेश, मुद्रा) केंद्र के पास तथा स्थानीय विषय (कानून-व्यवस्था, कृषि, स्वास्थ्य) राज्यों के पास सुनिश्चित होते हैं।
3. लिखित एवं सर्वोच्च संविधान (Written & Supreme Constitution)संविधान देश की सर्वोच्च विधि होता है। न केंद्र और न ही राज्य अपनी मर्जी से इसके मूल प्रावधानों का उल्लंघन कर सकते हैं।
4. कठोर संविधान (Rigid Constitution)संघीय ढांचे के संशोधन के लिए केंद्र और राज्यों दोनों की विशेष सहमति की जटिल प्रक्रिया आवश्यक होती है।
5. स्वतंत्र न्यायपालिका (Independent Judiciary)सर्वोच्च न्यायालय संविधान का संरक्षक एवं मध्यस्थ होता है, जो केंद्र-राज्य विवादों का निष्पक्ष निपटारा करता है।
6. द्विसदनीय विधायिका (Bicameral Legislature)संसद का उच्च सदन (जैसे अमेरिकी सीनेट या भारतीय राज्यसभा) संघ की इकाइयों (राज्यों) के अधिकारों का प्रतिनिधित्व करता है।

6. भारतीय शासन प्रणाली: संसदीय लोकतंत्र एवं अर्ध-संघीय मॉडल

भारतीय संवैधानिक दर्शन का अनूठा संस्थागत समन्वय

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत को 'राज्यों का संघ' (Union of States) घोषित किया गया है। संविधान सभा ने भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए संसदीय लोकतंत्र और एकात्मक झुकाव वाले मजबूत संघीय ढांचे का एक अनूठा समन्वय स्थापित किया।

डॉ. आंबेडकर का तर्क एवं संसदीय व्यवस्था का चयन:

संविधान सभा में प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने स्पष्ट किया कि एक लोकतांत्रिक सरकार को दो शर्तों को संतुष्ट करना होता है: स्थायित्व (Stability) तथा उत्तरदायित्व (Responsibility)। अमेरिकी अध्यक्षात्मक प्रणाली अधिक स्थायित्व प्रदान करती है परंतु दैनिक जवाबदेही कम रखती है; जबकि ब्रिटिश संसदीय प्रणाली दैनिक (प्रश्नोत्तरी, बहस, ध्यानाकर्षण) और आवधिक (चुनाव) दोनों स्तरों पर कार्यपालिका का कड़ा उत्तरदायित्व सुनिश्चित करती है। भारत जैसे नव-स्वतंत्र, बहुलतावादी और विकासशील देश में निरंकुशता को रोकने के लिए संविधान निर्माताओं ने स्थायित्व की तुलना में निरंतर लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को प्राथमिकता दी।

भारतीय संघवाद का स्वरूप (एकात्मक झुकाव):
प्रसिद्ध संविधान विशेषज्ञ के.सी. व्हीयर (K.C. Wheare) ने भारतीय संविधान को 'अर्ध-संघीय' (Quasi-Federal) कहा है, क्योंकि शांतिकाल में यह संघात्मक रहता है परंतु आपातकाल (अनुच्छेद 352, 356, 360) में स्वतः पूर्णतः एकात्मक राज्य में परिवर्तित हो जाता है। इसके अलावा केंद्र द्वारा राज्यपालों की नियुक्ति, एकल नागरिकता, एकीकृत न्यायपालिका, अखिल भारतीय सेवाएं (IAS, IPS), तथा समवर्ती सूची एवं अवशिष्ट शक्तियों पर संसद की सर्वोच्चता इसे एक सशक्त केंद्र वाला संघ बनाती है। वहीं प्रसिद्ध अमेरिकी विद्वान ग्रैनविल ऑस्टिन (Granville Austin) ने इसे 'सहकारी संघवाद' (Cooperative Federalism) की संज्ञा दी है, जिसमें केंद्र और राज्य परस्पर संघर्ष के बजाय राष्ट्रीय विकास में सहभागी बनते हैं।

महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक सिद्धांत एवं कालक्रम

संसदीय शासन का समीकरण
संसदीय प्रणाली = कार्यपालिका-विधायिका समन्वय + सामूहिक उत्तरदायित्व + द्वैध कार्यपालिका
अध्यक्षात्मक शासन का समीकरण
अध्यक्षात्मक प्रणाली = शक्ति पृथक्करण + नियंत्रण एवं संतुलन + एकल कार्यपालिका (निश्चित कार्यकाल)
संघीय संतुलन का समीकरण
संघात्मक व्यवस्था = सर्वोच्च लिखित संविधान + शक्तियों का द्वैध विभाजन + निष्पक्ष न्यायपालिका

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1: संसदीय एवं अध्यक्षात्मक शासन प्रणालियों में तीन बुनियादी अंतर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

संसदीय एवं अध्यक्षात्मक शासन प्रणालियों के तीन प्रमुख बुनियादी अंतर निम्नलिखित हैं:

  1. कार्यपालिका एवं विधायिका का संबंध: संसदीय व्यवस्था में कार्यपालिका का गठन विधायिका (संसद) के भीतर से होता है और दोनों में घनिष्ठ समन्वय पाया जाता है। इसके विपरीत, अध्यक्षात्मक व्यवस्था शक्ति पृथक्करण पर आधारित होती है, जहां कार्यपालिका और विधायिका एक-दूसरे से पूर्णतः स्वतंत्र होती हैं।

  2. उत्तरदायित्व एवं जवाबदेही: संसदीय प्रणाली में मंत्रिपरिषद अपनी नीतियों व कृत्यों के लिए संसद के प्रति निरंतर सामूहिक रूप से जवाबदेह होती है और संसद अविश्वास प्रस्ताव पारित कर सरकार को पदच्युत कर सकती है। अध्यक्षात्मक प्रणाली में राष्ट्रपति विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होते और न ही उन्हें अविश्वास प्रस्ताव से हटाया जा सकता है।

  3. कार्यपालिका का स्वरूप: संसदीय प्रणाली में द्वैध कार्यपालिका होती है (नाममात्र के संवैधानिक प्रमुख तथा वास्तविक शासक प्रधानमंत्री)। अध्यक्षात्मक प्रणाली में एकल कार्यपालिका होती है—राष्ट्रपति ही राज्य और सरकार दोनों का वास्तविक प्रमुख होता है।

उदाहरण 2
प्रश्न 2: अरस्तू द्वारा प्रस्तुत शासन प्रणालियों के वर्गीकरण के आधार क्या थे? उनके अनुसार 'पॉलिटी' एवं 'डेमोक्रेसी' में क्या अंतर है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
अरस्तू के शासन प्रणालियों के वर्गीकरण के दो मुख्य आधार थे: (क) सत्ता धारण करने वाले शासकों की संख्या (एक व्यक्ति का शासन, कुछ व्यक्तियों का शासन, अथवा अनेकों का शासन); तथा (ख) शासन का उद्देश्य (सामान्य जनकल्याण हेतु संचालित शुद्ध रूप बनाम शासकों के व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु संचालित विकृत रूप)। पॉलिटी (Polity) एवं डेमोक्रेसी (Democracy) में अंतर: अरस्तू के अनुसार, 'पॉलिटी' अनेकों व्यक्तियों का सामान्य व उत्कृष्ट शासन रूप है, जिसका संचालन समाज का सुशिक्षित एवं संतुलित मध्यम वर्ग करता है और जो विधि के शासन के तहत पूरे समाज के कल्याण के लिए कार्य करता है। अरस्तू इसे व्यावहारिक दृष्टि से सर्वोत्तम व सर्वाधिक स्थिर शासन मानते थे। इसके विपरीत, अरस्तू के समय में 'डेमोक्रेसी' को पॉलिटी का एक विकृत व भ्रष्ट रूप माना गया, जिसमें अशिक्षित व निर्धन जनसमूह केवल अपने संकीर्ण स्वार्थों व आवेगों के आधार पर अव्यवस्थित शासन चलाता है, जिससे समाज में अराजकता फैलती है।
उदाहरण 3
प्रश्न 3: संघात्मक शासन प्रणाली की तीन अनिवार्य विशेषताओं का विवेचन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

संघात्मक शासन प्रणाली की तीन प्रमुख अनिवार्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  1. लिखित एवं सर्वोच्च संविधान: संघ राज्य में संविधान देश की सर्वोच्च विधि होता है। केंद्र एवं राज्य दोनों की शक्तियां संविधान से ही उद्भूत होती हैं। कोई भी सरकार अकेले अपनी मर्जी से संविधान के संघीय प्रावधानों में संशोधन नहीं कर सकती।

  2. केंद्र एवं राज्यों के मध्य शक्तियों का स्पष्ट विभाजन: संविधान में स्पष्ट सूचियों द्वारा राष्ट्रीय महत्व के विषय (जैसे रक्षा, विदेश नीति, मुद्रा) केंद्र सरकार को और स्थानीय महत्व के विषय (जैसे कानून व्यवस्था, स्वास्थ्य, कृषि) राज्य सरकारों को सौंपे जाते हैं। दोनों अपने-अपने कार्यक्षेत्र में स्वायत्त होते हैं।

  3. स्वतंत्र एवं निष्पक्ष सर्वोच्च न्यायपालिका: संघ में एक निष्पक्ष व स्वतंत्र सर्वोच्च न्यायालय का होना अनिवार्य है जो संविधान का संरक्षक बनकर उसकी प्रामाणिक व्याख्या करे तथा केंद्र और राज्यों के बीच उठने वाले संवैधानिक विवादों का निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में समाधान करे।

उदाहरण 4
प्रश्न 4: के.सी. व्हीयर ने भारतीय संविधान को 'अर्ध-संघीय' (Quasi-Federal) क्यों कहा है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

प्रसिद्ध संविधान शास्त्री के.सी. व्हीयर ने भारतीय संविधान की कार्यप्रणाली का विश्लेषण करते हुए इसे 'अर्ध-संघीय' कहा है, क्योंकि बाह्य रूप से संघात्मक दिखने के बावजूद इसमें सशक्त एकात्मक प्रवृत्तियां अंतर्निहित हैं:

  1. आपातकालीन उपबंध: संविधान के अनुच्छेद 352, 356 और 360 के तहत आपातकाल लागू होते ही भारत का संपूर्ण संघीय ढांचा समाप्त हो जाता है और केंद्र सरकार एकात्मक रूप से समस्त राज्यों पर नियंत्रण कर लेती है।

  2. राज्यपाल की नियुक्ति: राज्यों के संवैधानिक प्रमुख (राज्यपाल) की नियुक्ति केंद्र द्वारा की जाती है और वे राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत अपने पद पर बने रहते हैं, जिससे राज्य स्वायत्तता सीमित होती है।

  3. एकल नागरिकता व एकीकृत न्यायपालिका: अमेरिका जैसे विशुद्ध संघों में दोहरी नागरिकता और राज्यों के पृथक न्यायालय होते हैं, परंतु भारत में संघात्मक संरचना के बावजूद केवल एकल नागरिकता तथा सर्वोच्च न्यायालय के अधीन एकीकृत न्याय व्यवस्था है।

अतः व्हीयर के अनुसार भारत मूल रूप से एक एकात्मक राज्य है जिसमें कुछ संघीय विशेषताएं जोड़ी गई हैं, न कि विशुद्ध संघ।

उदाहरण 5
प्रश्न 5: भारतीय संविधान निर्माताओं ने अध्यक्षात्मक व्यवस्था के स्थान पर संसदीय व्यवस्था को क्यों प्राथमिकता दी?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

भारतीय संविधान सभा में गंभीर विमर्श के उपरांत मुख्य रूप से निम्नलिखित कारणों से संसदीय व्यवस्था को चुना गया:

  1. पूर्व ऐतिहासिक अनुभव व परिचय: 1919 और 1935 के भारत शासन अधिनियमों के अंतर्गत भारतीय लंबे समय से ब्रिटिश संसदीय परंपराओं और प्रक्रियाओं से भली-भांति परिचित थे। एक सर्वथा नवीन व अपरिचित अध्यक्षात्मक प्रणाली को अपनाने की तुलना में परिचित व्यवस्था को जारी रखना सुरक्षित माना गया।

  2. स्थायित्व से अधिक उत्तरदायित्व को वरीयता: डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने तर्क दिया कि अध्यक्षात्मक प्रणाली स्थायित्व तो देती है परंतु दैनिक जवाबदेही नहीं। नव-स्वतंत्र भारत में सत्ता के निरंकुश होने के खतरे को टालने के लिए संसद के प्रति कार्यपालिका की दैनिक जवाबदेही (प्रश्नकाल, ध्यानाकर्षण, कामरोको प्रस्ताव) अनिवार्य थी।

  3. कार्यपालिका और विधायिका में टकराव की रोकथाम: अध्यक्षात्मक प्रणाली में राष्ट्रपति और संसद के बीच गतिरोध की संभावना निरंतर बनी रहती है। सामाजिक-आर्थिक पुनर्निर्माण और त्वरित विधि-निर्माण हेतु कार्यपालिका और विधायिका का पूर्ण सामंजस्य आवश्यक था।

उदाहरण 6
प्रश्न 6: एकात्मक एवं संघात्मक शासन प्रणाली की तुलना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

एकात्मक एवं संघात्मक शासन प्रणाली की तुलना निम्नलिखित बिंदुओं पर की जा सकती है:

  1. सत्ता का स्रोत एवं केंद्रीकरण: एकात्मक शासन में समस्त संप्रभु शक्ति एक केंद्रीय सत्ता में निहित होती है और प्रांतीय निकाय केवल केंद्र के आदेशों पर चलते हैं। संघात्मक शासन में संविधान द्वारा ही केंद्र और राज्यों में शक्तियों का स्वतंत्र व स्थायी विभाजन किया जाता है।

  2. संविधान का स्वरूप: एकात्मक राज्यों में संविधान लचीला हो सकता है (जैसे ब्रिटेन) जहां संसद सामान्य बहुमत से कानून बदल सकती है। संघात्मक राज्यों में संविधान अनिवार्य रूप से लिखित, सर्वोच्च तथा कठोर होता है ताकि कोई एक पक्ष शक्तियों का संतुलन न बिगाड़ सके।

  3. उपयुक्तता: एकात्मक प्रणाली छोटे और एकरूप आबादी वाले देशों (जैसे ब्रिटेन, जापान, फ्रांस) के लिए अत्यंत तीव्र और उपयुक्त है। इसके विपरीत, विशाल भू-भाग, भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता से परिपूर्ण देशों (जैसे भारत, अमेरिका, कनाडा) के लिए क्षेत्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति और एकता बनाए रखने हेतु संघात्मक व्यवस्था ही एकमात्र विकल्प है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि भारत के राष्ट्रपति की वास्तविक शक्तियां अमेरिकी राष्ट्रपति के समान हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

भारत के राष्ट्रपति केवल नाममात्र के औपचारिक प्रमुख हैं जो प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करते हैं, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति स्वयं वास्तविक कार्यकारी प्रमुख होते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

एकात्मक शासन व्यवस्था को तानाशाही या अधिनायकवाद का पर्याय मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

एकात्मक राज्य पूरी तरह लोकतांत्रिक हो सकते हैं (जैसे ब्रिटेन या फ्रांस); एकात्मकता केवल केंद्र में सत्ता के भौगोलिक केंद्रीकरण को दर्शाती है, निरंकुशता को नहीं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि कोई भी भारतीय राज्य अपनी इच्छा से भारतीय संघ से अलग हो सकता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

भारतीय संघ अमेरिकी संघ की तरह राज्यों के बीच किसी समझौते का परिणाम नहीं है; भारत में किसी भी राज्य को संघ से अलग होने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

सरकार के विभिन्न रूप: तुलनात्मक संस्थागत ढांचा लोकतांत्रिक बनाम अधिनायकवादी • एकात्मक बनाम संघीय • संसदीय बनाम अध्यक्षात्मक सरकारों का वर्गीकरण अरस्तू से आधुनिक वर्गीकरण
शासकों की संख्या व शासन के उद्देश्य पर आधारित प्राचीन मॉडल; लोकतंत्र बनाम सर्वाधिकारवाद।
एकात्मक बनाम संघीय व्यवस्था केन्द्र-राज्य शक्ति विभाजन
एकात्मक: समस्त शक्तियां केन्द्र में निहित (ब्रिटेन); संघीय: संविधान द्वारा शक्तियों का स्पष्ट विभाजन (अमेरिका)।
संसदीय प्रणाली (ब्रिटेन / भारत) विधायिका व कार्यपालिका का समन्वय
नाममात्र व वास्तविक कार्यपालिका, सामूहिक उत्तरदायित्व (अनुच्छेद 75(3)), प्रधानमंत्री का नेतृत्व व संसद विघटन।
अध्यक्षात्मक प्रणाली (अमेरिका) कठोर शक्ति पृथक्करण सिद्धांत
एकल कार्यपालिका प्रमुख, निश्चित कार्यकाल, विधायिका के प्रति अनुत्तरदायी मंत्रिमंडल तथा नियंत्रण व संतुलन (Checks & Balances)।
⚡ Comparative Diagnostic: Accountability vs Stability Parliamentary: Continuous Day-to-Day Accountability (Question Hour, No-Confidence) | Collective Responsibility | Flexible Presidential: Periodic Quadrennial Accountability (Fixed 4-Year Term) | Separation of Powers | Executive Stability ✦ भारतीय चयन: संसदीय एवं अर्ध-संघीय व्यवस्था ही क्यों? स्थायित्व की तुलना में दैनिक लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को वरीयता (डॉ. बी.आर. अंबेडकर) ब्रिटिश काल से चले आ रहे संसदीय अनुभव व संस्थागत कार्यप्रणाली से स्वाभाविक परिचय विशाल राष्ट्रीय विविधता के मध्य एकता बनाए रखने हेतु एकात्मक झुकाव वाला संघीय मॉडल

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. शासन व्यवस्था राज्य की संप्रभु सत्ता को संगठित, विभाजित और क्रियान्वित करने का संस्थागत तंत्र है।
मुख्य बिंदु 2
  1. अरस्तू ने शासकों की संख्या (एक, कुछ, अनेक) और शासन के उद्देश्य (सामान्य जनकल्याण बनाम भ्रष्ट स्वार्थ) के आधार पर सरकारों का प्रथम वैज्ञानिक वर्गीकरण किया।
मुख्य बिंदु 3
  1. संसदीय व्यवस्था में कार्यपालिका विधायिका के भीतर से बनती है और सामूहिक रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी होती है।
मुख्य बिंदु 4
  1. संसदीय प्रणाली में द्वैध कार्यपालिका पाई जाती है—एक नाममात्र का औपचारिक राष्ट्राध्यक्ष और वास्तविक प्रशासनिक प्रमुख के रूप में प्रधानमंत्री।
मुख्य बिंदु 5
  1. अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था मोंटेस्क्यू के शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत तथा नियंत्रण एवं संतुलन (Checks and Balances) पर आधारित है।
मुख्य बिंदु 6
  1. एकात्मक शासन में राज्य की संपूर्ण शक्ति एकल केंद्रीय सरकार के पास निहित होती है और प्रांतीय निकाय केवल केंद्र द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हैं।
मुख्य बिंदु 7
  1. संघात्मक शासन व्यवस्था के अनिवार्य तत्व हैं: लिखित एवं सर्वोच्च संविधान, केंद्र-राज्यों के मध्य स्पष्ट शक्तियों का विभाजन, तथा निष्पक्ष स्वतंत्र न्यायपालिका।
मुख्य बिंदु 8
  1. डॉ. बी.आर. आंबेडकर और संविधान सभा ने कार्यपालिका के केवल स्थायित्व की तुलना में संसद के प्रति निरंतर लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करने के लिए संसदीय प्रणाली को अपनाया।
मुख्य बिंदु 9
  1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत को 'राज्यों का संघ' (Union of States) कहा गया है; किसी भी राज्य को संघ से अलग होने का अधिकार नहीं है।
मुख्य बिंदु 10
  1. के.सी. व्हीयर ने भारतीय प्रणाली को 'अर्ध-संघीय' (Quasi-Federal) और ग्रैनविल ऑस्टिन ने इसे 'सहकारी संघवाद' (Cooperative Federalism) कहा है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
2
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
5
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

ऑनलाइन CBT टेस्ट देकर तैयारी का मूल्यांकन करें

झारखण्ड बोर्ड परीक्षा पैटर्न पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्नों का ऑनलाइन टेस्ट दें। तुरंत परिणाम, समय विश्लेषण और प्रत्येक प्रश्न का विस्तृत हल प्राप्त करें।

AI अध्ययन मित्र

त्वरित शंका समाधान

सरकार के विभिन्न रूप में कोई संदेह या प्रश्न है? हमारे AI अध्ययन मित्र से तुरंत समझें।