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WBB • कक्षा XI • Political Science • अध्याय 6
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएं

भारत का संविधान विश्व के संवैधानिक इतिहास का एक अद्वितीय और युगांतरकारी दस्तावेज है, जो विश्व के श्रेष्ठ लोकतांत्रिक आदर्शों तथा भारतीय उपमहाद्वीप की ऐतिहासिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक जटिलताओं का उत्कृष्ट समन्वय प्रस्तुत करता है। 1949 में अंगीकृत यह संविधान विश्व का सबसे विस्तृत और वृहद् लिखित संविधान है। पाश्चात्य मॉडलों की अंधी नकल होने के बजाय, भारतीय संविधान वैश्विक अनुभवों का एक सुविचारित संश्लिष्ट रूप है जिसे भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल ढाला गया है। यह एक ऐसी अर्ध-संघीय व्यवस्था की स्थापना करता है जिसमें एकात्मकता की ओर सुस्पष्ट झुकाव है, ब्रिटिश वेस्टमिंस्टर संसदीय प्रणाली तथा अमेरिकी न्यायिक समीक्षा का अनूठा संश्लेषण है, एक एकीकृत व स्वतंत्र न्यायपालिका है, तथा न्यायोचित मौलिक अधिकारों, गैर-न्यायोचित राज्य के नीति निदेशक तत्वों एवं मौलिक कर्तव्यों का संतुलित त्रिकोण समाहित है। यह अध्याय भारतीय संविधान के आधारभूत स्तंभों, वैश्विक स्रोतों, संघीय-एकात्मक संतुलन तथा उन सभी नवोन्मेषी विशेषताओं का सांगोपांग विश्लेषण प्रस्तुत करता है जो इसे एक जीवंत लोकतांत्रिक विधान बनाते हैं।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं का अनुशीलन राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों को यह समझने की गहन अंतर्दृष्टि प्रदान करता है कि कैसे विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र अपनी अपार भाषाई, धार्मिक और क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद राष्ट्रीय एकता, स्थायित्व और नागरिक स्वतंत्रता को सुरक्षित रखता है। यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि संविधान निर्माताओं ने ब्रिटिश संसदीय संप्रभुता और अमेरिकी न्यायिक सर्वोच्चता के मध्य ऐतिहासिक संतुलन कैसे साधा, अनुच्छेद 368 के अधीन लचीलेपन व कठोरता का ऐसा समन्वय कैसे निर्मित किया जिससे संविधान की मूल संरचना अक्षुण्ण रहे, तथा निर्वाचन आयोग व नियंत्रक-महालेखापरीक्षक जैसे स्वायत्त पहरेदारों के माध्यम से विधि के शासन की रक्षा कैसे सुनिश्चित की।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संवि...
2 2. वैश्विक स्रोतों का अद्वितीय समन्...
3 3. रूप में संघीय, आत्मा में एकात्मक...
4 4. संसदीय लोकतंत्र: संसदीय संप्रभुत...
5 5. एकीकृत एवं स्वतंत्र न्यायपालिका,...
6 6. धर्मनिरपेक्षता, सार्वभौमिक वयस्क...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान: संरचनात्मक ढाँचा एवं इसके कारण

भारतीय संविधान का अभूतपूर्व आकार एवं विस्तार

भारत का संविधान विश्व का सबसे वृहद् और विस्तृत लिखित संविधान है। मूल रूप से 1949 में अंगीकृत होने के समय इसमें एक प्रस्तावना, 395 अनुच्छेद (Articles) जो 22 भागों (Parts) में विभक्त थे, तथा 8 अनुसूचियाँ (Schedules) थीं। विभिन्न संवैधानिक संशोधनों के उपरांत वर्तमान में इसमें 470 से अधिक अनुच्छेद, 25 भाग तथा 12 अनुसूचियाँ समाहित हैं।

संविधान के अत्यधिक विस्तृत आकार के चार प्रमुख कारण:
  1. भौगोलिक विस्तार एवं अपार विविधता: भारतीय उपमहाद्वीप का विशाल आकार तथा सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषाई, धार्मिक और जनजातीय विविधता के कारण सभी वर्गों व क्षेत्रों के संरक्षण हेतु विस्तृत कानूनी प्रावधान आवश्यक थे।
  2. भारत शासन अधिनियम, 1935 का ऐतिहासिक प्रभाव: 1935 का अधिनियम स्वयं अत्यंत विस्तृत और जटिल दस्तावेज था। संविधान निर्माताओं ने इसके प्रशासनिक ढाँचे और संस्थागत तंत्र को व्यापक रूप से अंगीकार किया।
  3. केन्द्र तथा राज्यों के लिए एकल संविधान: संयुक्त राज्य अमेरिका के विपरीत, जहाँ संघ और प्रत्येक राज्य के अलग-अलग संविधान होते हैं, भारत में केन्द्र और सभी राज्यों के लिए केवल एक ही व्यापक संविधान है।
  4. कानूनी दिग्गजों का प्रभुत्व: संविधान सभा में डॉ. बी.आर. अंबेडकर, अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर, के.एम. मुंशी जैसे प्रख्यात विधि विशेषज्ञों का वर्चस्व था, जिन्होंने भविष्य की किसी भी कानूनी अस्पष्टता को समाप्त करने हेतु प्रत्येक प्रशासनिक विवरण को संहिताबद्ध किया।

2. वैश्विक स्रोतों का अद्वितीय समन्वय एवं रचनात्मक रूपांतरण

विभिन्न देशों के श्रेष्ठ संवैधानिक तत्वों का भारतीयकरण

डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने गर्वपूर्वक घोषणा की थी कि भारत के संविधान का निर्माण 'विश्व के ज्ञात सभी संविधानों को छानने के उपरांत' किया गया है। यह अंधानुकरण नहीं था, अपितु विदेशी दोषों को दूर कर भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप किया गया एक उत्कृष्ट सृजन था:

स्रोत देश / अधिनियमगृहीत प्रमुख संवैधानिक विशेषताएं
भारत शासन अधिनियम, 1935संघीय योजना, राज्यपाल का पद, न्यायपालिका का ढाँचा, लोक सेवा आयोग, आपातकालीन उपबंध तथा प्रशासनिक विवरण (संविधान का लगभग 50% से अधिक भाग इसी से प्रेरित है)।
ब्रिटिश संविधान (यूके)संसदीय शासन प्रणाली, विधि का शासन (Rule of Law), विधायी प्रक्रिया, एकल नागरिकता, मंत्रिमंडलीय प्रणाली, विशेषाधिकार रिटें, संसदीय विशेषाधिकार तथा द्विसदनीय व्यवस्था।
संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए)मौलिक अधिकार (Bill of Rights), न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायिक समीक्षा (Judicial Review), राष्ट्रपति पर महाभियोग, सर्वोच्च व उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को पदमुक्त करना, तथा उपराष्ट्रपति का पद।
आयरलैंड का संविधानराज्य के नीति निदेशक तत्व (भाग IV), राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा में 12 सदस्यों का मनोनयन, तथा राष्ट्रपति के निर्वाचन की पद्धति।
कनाडा का संविधानसशक्त केन्द्र के साथ संघीय व्यवस्था, अवशिष्ट शक्तियों का केन्द्र में निहित होना, केन्द्र द्वारा राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति, तथा सर्वोच्च न्यायालय का परामर्शदायी क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 143)।
ऑस्ट्रेलिया का संविधानसमवर्ती सूची (7वीं अनुसूची), अंतरराज्यीय व्यापार व वाणिज्य की स्वतंत्रता, तथा संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (अनुच्छेद 108)।
जर्मनी का वाइमर संविधानराष्ट्रीय आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों का निलंबन (अनुच्छेद 358 व 359)।
सोवियत संघ (पूर्व यूएसएसआर)मौलिक कर्तव्य (अनुच्छेद 51क, भाग IVक) तथा प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय के आदर्श।
फ्रांस का संविधानगणतंत्रात्मक ढाँचा तथा प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्श।
दक्षिण अफ्रीका का संविधानसंविधान संशोधन की प्रक्रिया (अनुच्छेद 368) तथा राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन।

3. रूप में संघीय, आत्मा में एकात्मक: भारत का अर्ध-संघीय ढाँचा

सशक्त केन्द्र के साथ सहकारी संघवाद (Co-operative Federalism)

संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत को 'फेडरेशन' (संघ) न कहकर 'राज्यों का संघ' (Union of States) कहा गया है। इसके दो स्पष्ट अर्थ हैं: भारतीय संघ राज्यों के मध्य किसी समझौते का परिणाम नहीं है, तथा किसी भी राज्य को संघ से अलग होने का अधिकार नहीं है। भारतीय राजव्यवस्था में संघीय और एकात्मक लक्षणों का अद्भुत मिश्रण है:

संघीय लक्षण (Federal Features)एकात्मक लक्षण (Unitary Features)
1. द्वैध शासन प्रणाली (केन्द्र एवं राज्य सरकारें)।1. अत्यधिक वित्तीय व विधायी शक्तियों वाला सशक्त केन्द्र।
2. लिखित एवं सर्वोच्च संविधान।2. केन्द्र और राज्यों दोनों के लिए एकल संविधान।
3. 7वीं अनुसूची की 3 सूचियों द्वारा स्पष्ट शक्ति विभाजन।3. सम्पूर्ण देश के लिए एकल नागरिकता (राज्यों की अलग नागरिकता नहीं)।
4. संघीय उपबंधों के संशोधन हेतु कठोरता (अनुच्छेद 368)।4. एकीकृत न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय शीर्ष पर)।
5. स्वतंत्र न्यायपालिका जो विवादों का निपटारा करती है।5. राष्ट्रपति द्वारा राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति।
6. द्विसदनीय विधायिका (लोकसभा एवं राज्यसभा)।6. अखिल भारतीय सेवाएं (IAS, IPS) जिन पर केन्द्र का अंतिम नियंत्रण।
7. साधारण कानूनों पर संविधान की सर्वोच्चता।7. आपातकालीन प्रावधान (अनुच्छेद 352, 356, 360) जो व्यवस्था को एकात्मक बना देते हैं।
प्रमुख विचारकों का दृष्टिकोण:
  • के.सी. व्हीयर (K.C. Wheare): भारतीय संविधान को 'अर्ध-संघीय' (Quasi-Federal) की संज्ञा दी, अर्थात् यह सहायक संघीय विशेषताओं वाला एकात्मक राज्य है न कि सहायक एकात्मक विशेषताओं वाला संघीय राज्य।
  • ग्रैनविले ऑस्टिन (Granville Austin): इसे 'सहकारी संघवाद' (Co-operative Federalism) कहा, जो प्रान्तीय सरकारों को कमजोर किए बिना एक सशक्त राष्ट्रीय सरकार बनाता है।
  • डॉ. बी.आर. अंबेडकर: उन्होंने स्पष्ट किया कि सामान्य काल में संविधान संघीय रहता है, किंतु संकटकाल में यह पूर्णतः एकात्मक प्रणाली की भाँति कार्य करने में सक्षम है।

4. संसदीय लोकतंत्र: संसदीय संप्रभुता एवं न्यायिक सर्वोच्चता का संश्लेषण

वेस्टमिंस्टर मॉडल एवं न्यायिक संतुलन की स्थापना

संविधान निर्माताओं ने अमेरिकी अध्यक्षात्मक प्रणाली के स्थान पर ब्रिटिश संसदीय प्रणाली (वेस्टमिंस्टर मॉडल) को प्राथमिकता दी, क्योंकि इसमें कार्यपालिका विधायिका के प्रति अधिक उत्तरदायी होती है तथा गतिरोध की संभावना न्यूनतम रहती है। इसके मुख्य लक्षण हैं:

संसदीय व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएं:
  • नाममात्र एवं वास्तविक कार्यपालिका: भारत का राष्ट्रपति राज्य का नाममात्र (संवैधानिक) प्रमुख है, जबकि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाला मंत्रिपरिषद वास्तविक कार्यपालिका है।
  • सामूहिक उत्तरदायित्व: अनुच्छेद 75(3) के अंतर्गत मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर संपूर्ण मंत्रिमंडल को त्यागपत्र देना पड़ता है।
  • मंत्रियों की विधायिका में सदस्यता: मंत्रियों का संसद का सदस्य होना अनिवार्य है (या अनुच्छेद 75(5) के तहत 6 माह के भीतर निर्वाचित होना आवश्यक है)।
  • निचले सदन का विघटन: प्रधानमंत्री की अनुशंसा पर राष्ट्रपति कार्यकाल (5 वर्ष) पूर्ण होने से पूर्व लोकसभा को भंग कर सकते हैं।
संसदीय संप्रभुता एवं न्यायिक सर्वोच्चता का समन्वय:

भारतीय संविधान ने ब्रिटिश संसदीय संप्रभुता तथा अमेरिकी न्यायिक सर्वोच्चता के सिद्धांतों का अभूतपूर्व समन्वय किया है। जहाँ एक ओर सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक समीक्षा (अनुच्छेद 13, 32, 226) के माध्यम से संसद द्वारा पारित असंवैधानिक कानूनों को निरस्त कर सकता है, वहीं दूसरी ओर संसद अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान के बड़े हिस्से में संशोधन कर सकती है, बशर्ते कि वह संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का उल्लंघन न करे।

5. एकीकृत एवं स्वतंत्र न्यायपालिका, मौलिक अधिकार तथा कर्तव्य

एकल न्यायिक पिरामिड तथा संविधान की अंतरात्मा

अमेरिका के विपरीत, जहाँ संघीय व राज्य कानूनों के लिए दोहरी न्यायपालिका है, भारत में एक एकल एवं एकीकृत न्यायिक व्यवस्था स्थापित की गई है। शीर्ष पर सर्वोच्च न्यायालय, राज्यों में उच्च न्यायालय तथा उनके अधीनस्थ न्यायालय समान रूप से केन्द्रीय और राज्य विधियों को लागू करते हैं।

संवैधानिक आयामसंवैधानिक तंत्र एवं सुरक्षा उपाय
न्यायपालिका की स्वतंत्रतान्यायाधीशों के कार्यकाल की सुरक्षा, केवल संसद के विशेष बहुमत द्वारा महाभियोग द्वारा निष्कासन, भारत की संचित निधि से वेतन, सेवानिवृत्ति के पश्चात वकालत पर प्रतिबंध, तथा न्यायालय की अवमानना पर दंड देने की शक्ति।
मौलिक अधिकार (भाग III)नागरिक एवं राजनीतिक स्वतंत्रताएं (अनुच्छेद 12-35) जो वादयोग्य (Justiciable) हैं। हनन की स्थिति में अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की जा सकती है (डॉ. अंबेडकर ने इसे संविधान का 'हृदय और आत्मा' कहा)।
नीति निदेशक तत्व (भाग IV)सामाजिक-आर्थिक न्याय के आदर्श (अनुच्छेद 36-51) जो गैर-वादयोग्य हैं किंतु देश के शासन में मूलभूत हैं और कल्याणकारी राज्य की स्थापना का लक्ष्य रखते हैं। ग्रैनविले ऑस्टिन ने इन्हें मौलिक अधिकारों सहित 'संविधान की अंतरात्मा' कहा।
मौलिक कर्तव्य (भाग IVक)स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर 42वें संशोधन (1976) द्वारा अनुच्छेद 51क के तहत 10 कर्तव्य जोड़े गए (86वें संशोधन 2002 द्वारा 11वां कर्तव्य शामिल किया गया)।

6. धर्मनिरपेक्षता, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, स्वतंत्र संवैधानिक निकाय एवं त्रिस्तरीय शासन

भारतीय राजव्यवस्था के आधुनिक लोकतांत्रिक नवोन्मेष

भारतीय संविधान ने अनेक ऐसी संस्थागत व्यवस्थाएं विकसित कीं जिन्होंने देश में लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर सुदृढ़ किया:

प्रमुख संस्थागत विशेषताएं:
  • धर्मनिरपेक्ष राज्य: राज्य का कोई अधिकृत धर्म नहीं है। अनुच्छेद 25 से 28 सभी नागरिकों को अंतःकरण की तथा धर्म को अबाध रूप से मानने व आचरण करने की स्वतंत्रता प्रदान करते हैं। 42वें संशोधन द्वारा प्रस्तावना में 'पंथनिरपेक्ष' शब्द जोड़ा गया।
  • सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (अनुच्छेद 326): बिना किसी संपत्ति, जाति या शिक्षा की शर्त के प्रत्येक वयस्क को मतदान का अधिकार। 61वें संविधान संशोधन अधिनियम (1988) द्वारा मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई।
  • स्वतंत्र संवैधानिक निकाय: लोकतांत्रिक मर्यादा की रक्षा हेतु स्वतंत्र निकायों की स्थापना: भारत का निर्वाचन आयोग (अनुच्छेद 324), नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (अनुच्छेद 148), संघ एवं राज्य लोक सेवा आयोग (अनुच्छेद 315-323), तथा वित्त आयोग (अनुच्छेद 280)।
  • त्रिस्तरीय शासन प्रणाली: 73वें और 74वें संविधान संशोधन अधिनियम (1992) द्वारा स्थानीय स्वशासन को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई, जिसके तहत पंचायती राज (ग्रामीण) और नगरपालिकाओं (शहरी) के रूप में शासन का तीसरा स्तर स्थापित हुआ।
  • आपातकालीन उपबंध: राष्ट्रीय संकट के समय सम्प्रभुता व अखंडता की रक्षा हेतु त्रिस्तरीय आपातकाल: राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352), राज्यों में राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356), तथा वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360)।

महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक सिद्धांत एवं कालक्रम

भारतीय राजव्यवस्था समीकरण
राजव्यवस्था = संघीय ढाँचा (सामान्य काल) + एकात्मक शक्ति (आपातकाल) = अर्ध-संघीय व्यवस्था
संविधान की अंतरात्मा का सूत्र
संविधान की अंतरात्मा = मौलिक अधिकार (भाग III) + नीति निदेशक तत्व (भाग IV)
संस्थागत संतुलन समीकरण
संवैधानिक संतुलन = ब्रिटिश संसदीय संप्रभुता ⇄ अमेरिकी न्यायिक समीक्षा

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
भारतीय संविधान को विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान क्यों कहा जाता है? इसके विशाल आकार के लिए उत्तरदायी चार कारण लिखिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

मूल संविधान में 395 अनुच्छेद, 22 भाग तथा 8 अनुसूचियां थीं, जिसने इसे विश्व इतिहास का सबसे लंबा लिखित संविधान बना दिया।

विशाल आकार के चार प्रमुख कारण:

  1. विशाल भौगोलिक विस्तार और विविधता: भारत की अपार भाषाई, धार्मिक, सांस्कृतिक और जनजातीय विविधता को संतुलित करने हेतु विस्तृत प्रावधान आवश्यक थे।
  2. भारत शासन अधिनियम, 1935 का प्रभाव: इस विस्तृत प्रशासनिक अधिनियम के अधिकांश तकनीकी एवं संस्थागत अनुच्छेदों को सीधे संविधान में समाहित किया गया।
  3. केन्द्र एवं राज्यों के लिए एकल संविधान: अमेरिका के विपरीत भारत में संघ और राज्यों दोनों के प्रशासनिक तंत्र को एक ही संविधान में संहिताबद्ध किया गया।
  4. कानूनी विशेषज्ञों का प्रभुत्व: संविधान सभा के प्रमुख विधि वेत्ताओं ने भविष्य के गतिरोधों को रोकने हेतु प्रत्येक प्रशासनिक बारीकी को लिपिबद्ध किया।
उदाहरण 2
के.सी. व्हीयर ने भारतीय संविधान को 'अर्ध-संघीय' (Quasi-Federal) क्यों कहा? इसके दो संघीय और दो एकात्मक लक्षण बताइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

के.सी. व्हीयर ने भारतीय संविधान को 'अर्ध-संघीय' कहा क्योंकि यह मूलतः एकात्मक राज्य है जिसमें कुछ गौण संघीय लक्षण हैं, न कि विशुद्ध संघीय राज्य।

दो संघीय लक्षण:

  1. शक्तियों का विभाजन: 7वीं अनुसूची की संघ, राज्य व समवर्ती सूचियों द्वारा केन्द्र और राज्यों में सत्ता का स्पष्ट विभाजन।
  2. लिखित एवं सर्वोच्च संविधान: संविधान दोनों स्तरों की सरकारों के लिए सर्वोच्च कानून है।

दो एकात्मक लक्षण:

  1. संकटकालीन एकात्मकता: राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) के दौरान संघ स्वतः एकात्मक स्वरूप धारण कर लेता है।
  2. एकल नागरिकता एवं एकीकृत न्यायपालिका: संपूर्ण देश के लिए केवल एक भारतीय नागरिकता है तथा एक ही शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) है।
उदाहरण 3
भारतीय संविधान में ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधानों से ग्रहण की गई चार-चार प्रमुख विशेषताएं लिखिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

ब्रिटिश संविधान (UK) से गृहीत विशेषताएं:

  1. संसदीय (मंत्रिमंडलीय) शासन प्रणाली।
  2. विधि का शासन (Rule of Law)।
  3. एकल नागरिकता तथा विधायी प्रक्रिया।
  4. द्विसदनीय व्यवस्था तथा विशेषाधिकार रिटें।

अमेरिकी संविधान (USA) से गृहीत विशेषताएं:

  1. मौलिक अधिकार (Bill of Rights)।
  2. स्वतंत्र न्यायपालिका एवं न्यायिक समीक्षा की शक्ति।
  3. राष्ट्रपति पर महाभियोग तथा न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया।
  4. उपराष्ट्रपति का पद।
उदाहरण 4
भारतीय संविधान ब्रिटिश संसदीय संप्रभुता और अमेरिकी न्यायिक सर्वोच्चता का संश्लेषण कैसे करता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

भारतीय संविधान ने दोनों प्रणालियों की अतिवादिता से बचते हुए एक अनूठा समन्वय स्थापित किया है:

  1. ब्रिटेन में संसद सर्वोच्च है और न्यायालय उसके कानूनों को अवैध घोषित नहीं कर सकते, जबकि भारत में सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक समीक्षा (अनुच्छेद 13, 32) द्वारा संसद के असंवैधानिक कानूनों को रद्द कर सकता है।
  2. अमेरिका में संविधान अत्यंत कठोर है और न्यायिक सर्वोच्चता अत्यधिक प्रबल है, जबकि भारतीय संसद अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के अधिकांश भाग में संशोधन करने की शक्ति रखती है।
  3. केशवानंद भारती मामले (1973) के 'मूल ढाँचे के सिद्धांत' (Basic Structure Doctrine) ने यह संतुलन साधा कि संसद संशोधन कर सकती है किंतु संविधान के बुनियादी लोकतांत्रिक स्वरूप को नष्ट नहीं कर सकती।
उदाहरण 5
भारतीय संविधान में 'एकीकृत एवं स्वतंत्र न्यायपालिका' से क्या आशय है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. एकीकृत न्यायपालिका: अमेरिका की दोहरी अदालत प्रणाली के विपरीत, भारत में एक एकल पिरामिडनुमा न्यायिक व्यवस्था है (सर्वोच्च न्यायालय -> उच्च न्यायालय -> अधीनस्थ न्यायालय), जो केन्द्र और राज्यों दोनों के कानूनों को समान रूप से लागू करती है।
  2. स्वतंत्र न्यायपालिका: न्यायपालिका को विधायिका और कार्यपालिका के अनुचित प्रभाव से मुक्त रखने हेतु विशेष प्रबंध किए गए हैं: न्यायाधीशों के कार्यकाल की सुरक्षा, महाभियोग की अत्यंत कठिन प्रक्रिया, संचित निधि से वेतन भुगतान, तथा अवमानना के लिए दंडित करने की स्वायत्त शक्ति।
उदाहरण 6
भारत में त्रिस्तरीय शासन व्यवस्था स्थापित करने में 73वें और 74वें संविधान संशोधनों (1992) का क्या महत्व है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

मूल संविधान में केवल दो स्तरों (केन्द्र और राज्य) का प्रावधान था। 73वें और 74वें संशोधनों का ऐतिहासिक महत्व:

  1. स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा: संविधान में भाग IX (पंचायतें) और भाग IXक (नगरपालिकाएं) जोड़कर स्थानीय स्वशासन को शासन का तीसरा अनिवार्य स्तर बनाया गया।
  2. जमीनी स्तर पर लोकतंत्र: राज्य निर्वाचन आयोगों के अधीन प्रत्येक 5 वर्ष में नियमित चुनाव अनिवार्य किए गए तथा महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई (33%) सीटें आरक्षित की गईं।
  3. शक्तियों का विकेंद्रीकरण: 11वीं अनुसूची (पंचायतों के लिए 29 कार्य) और 12वीं अनुसूची (नगरपालिकाओं के लिए 18 कार्य) जोड़कर विकास की योजनाएं जमीनी स्तर पर हस्तांतरित की गईं।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि भारत में अमेरिका की तरह दोहरी न्यायपालिका प्रणाली है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

भारत में एकल और एकीकृत न्यायिक व्यवस्था है; उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय केन्द्र व राज्य दोनों के कानूनों को लागू करते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि भारत के राष्ट्रपति वास्तविक कार्यपालिका शक्तियों का प्रयोग करते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

राष्ट्रपति नाममात्र के संवैधानिक प्रमुख हैं; वास्तविक कार्यपालिका शक्ति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद में निहित है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि नीति निदेशक तत्वों के उल्लंघन पर अदालत द्वारा रिट जारी की जा सकती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

नीति निदेशक तत्व (भाग IV) गैर-न्यायोचित हैं; ये सरकार का मार्गदर्शन करते हैं किंतु इन्हें न्यायालय द्वारा सीधे लागू नहीं कराया जा सकता।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएं: अनूठा लोकतांत्रिक ढांचा WBCHSE कक्षा 11 राजनीति विज्ञान • वृहत्तम लिखित विधान • वैश्विक स्रोतों का संगम • अर्ध-संघीय व्यवस्था विश्व का सबसे विस्तृत संविधान व स्रोत 395 अनुच्छेद, 8 अनुसूचियां (मूलतः) • वैश्विक अनुभवों का सार • भारत शासन अधिनियम 1935: संघीय ढांचा, न्यायपालिका व आपात उपबंध • ब्रिटेन: संसदीय शासन प्रणाली, विधि का शासन व एकल नागरिकता • सं.रा. अमेरिका: मौलिक अधिकार, स्वतंत्र न्यायपालिका व न्यायिक समीक्षा • आयरलैंड: नीति निदेशक तत्व • ऑस्ट्रेलिया: समवर्ती सूची संघीय एवं एकात्मक समन्वय के. सी. व्हेयर: अर्ध-संघीय (Quasi-Federal) • संघीय लक्षण: केंद्र-राज्य द्वैध शासन, शक्तियों का त्रि-सूचियों में विभाजन • एकात्मक झुकाव: सशक्त केंद्र, एकीकृत न्यायपालिका, एकल संविधान • अखिल भारतीय सेवाएं (IAS/IPS), राज्यपाल की नियुक्ति, आपातकाल • ग्रैनविले ऑस्टिन: सहकारी संघवाद (Co-operative Federalism) संसदीय शासन प्रणाली संसदीय संप्रभुता एवं न्यायिक सर्वोच्चता का समन्वय • नाममात्र की कार्यपालिका (राष्ट्रपति) बनाम वास्तविक (प्रधानमंत्री) • कार्यपालिका का विधायिका (लोकसभा) के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व • ब्रिटिश संसदीय संप्रभुता व अमेरिकी न्यायिक सर्वोच्चता का संश्लेषण • सर्वोच्च न्यायालय: संविधान का संरक्षक एवं मौलिक अधिकारों का सजग प्रहरी अधिकार, कर्तव्य एवं पंथनिरपेक्षता कल्याणकारी लोकतांत्रिक राज्य दर्शन 1. मौलिक अधिकार (भाग 3 - न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय) 2. राज्य के नीति निदेशक तत्व (भाग 4 - सामाजिक न्याय का आधार) 3. मौलिक कर्तव्य (अनुच्छेद 51A) • 4. सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार ★ पंथनिरपेक्ष राज्य: सर्वधर्म समभाव (अनुच्छेद 25-28), कोई राजधर्म नहीं

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
भारत का संविधान विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान है, जिसमें मूल रूप से 395 अनुच्छेद, 22 भाग और 8 अनुसूचियां थीं।
मुख्य बिंदु 2
यह एक वैश्विक संश्लिष्ट दस्तावेज है जिसमें भारत शासन अधिनियम 1935, ब्रिटिश, अमेरिकी, आयरिश और अन्य संविधानों का सम्मिश्रण है।
मुख्य बिंदु 3
अनुच्छेद 1 में भारत को 'राज्यों का संघ' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि राज्य अलग नहीं हो सकते और यह किसी समझौते की उपज नहीं है।
मुख्य बिंदु 4
के.सी. व्हीयर ने भारतीय संविधान को 'अर्ध-संघीय' कहा, क्योंकि इसमें एकात्मक लक्षणों की ओर सुस्पष्ट झुकाव है।
मुख्य बिंदु 5
भारत ने ब्रिटिश वेस्टमिंस्टर संसदीय प्रणाली को अपनाया, जिसमें मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है (अनुच्छेद 75(3))।
मुख्य बिंदु 6
यह ब्रिटिश संसदीय संप्रभुता तथा अमेरिकी न्यायिक समीक्षा का अनूठा समन्वय प्रस्तुत करता है।
मुख्य बिंदु 7
भारत में एक एकीकृत व स्वतंत्र न्यायपालिका है, जिसके शीर्ष पर सर्वोच्च न्यायालय स्थित है और जो एकल विधि संहिता का पालन कराती है।
मुख्य बिंदु 8
संविधान न्यायोचित मौलिक अधिकारों (भाग III) तथा गैर-न्यायोचित राज्य के नीति निदेशक तत्वों (भाग IV) का संतुलन स्थापित करता है।
मुख्य बिंदु 9
निर्वाचन आयोग, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) तथा संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) जैसे निकाय लोकतंत्र के स्वतंत्र रक्षक हैं।
मुख्य बिंदु 10
73वें और 74वें संशोधनों (1992) ने पंचायती राज और नगरपालिकाओं को संवैधानिक मान्यता देकर त्रिस्तरीय शासन स्थापित किया।

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