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WBB • कक्षा XI • Political Science • अध्याय 5
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

संविधान निर्माण एवं दर्शन

भारतीय संविधान का निर्माण आधुनिक विश्व के लोकतांत्रिक इतिहास की सर्वाधिक युगांतरकारी एवं प्रेरणादायी उपलब्धियों में से एक है। वर्ष 1946 की कैबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत गठित संविधान सभा देश के मूर्धन्य स्वतंत्रता सेनानियों, समाज सुधारकों और प्रख्यात विधिवेत्ताओं का एक ऐतिहासिक संगम थी। दो वर्ष, ग्यारह माह और अठारह दिनों के गहन विचार-विमर्श, बौद्धिक विमर्श और आम सहमति के द्वारा डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता तथा प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. बी. आर. अम्बेडकर के असाधारण नेतृत्व में स्वतंत्र भारत का यह सर्वोच्च विधान तैयार हुआ। इस संवैधानिक ढांचे के शीर्ष पर प्रस्तावना सुशोभित है—जो भारतीय गणतंत्र की आत्मा और नैतिक पथप्रदर्शक है। जनता की संप्रभुता, समाजवाद, पंथनिरपेक्षता, लोकतंत्र, गणराज्य, न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता के उच्चादर्शों से अनुप्राणित यह प्रस्तावना एक समतामूलक, न्यायप्रिय एवं कल्याणकारी राष्ट्र निर्माण का संकल्प घोषित करती है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

भारत की राष्ट्रीय अस्मिता, लोकतांत्रिक शासन प्रणाली और पंथनिरपेक्ष मूल्यों की जड़ों को समझने के लिए संविधान निर्माण एवं उसके दर्शन का ज्ञान अनिवार्य है। राजनीति विज्ञान के अध्येताओं के लिए यह स्पष्ट करता है कि संविधान के अनुच्छेद कोई औपचारिक नियम मात्र नहीं हैं, बल्कि वे सांप्रदायिक विभाजन, जातिगत उत्पीड़न, आर्थिक विषमता और बहुसांस्कृतिक विविधताओं के समाधान हेतु खोजी गई व्यावहारिक एवं दूरदर्शी व्यवस्थाएं थीं। पंडित नेहरू के 'उद्देश्य प्रस्ताव' से लेकर 1973 के केशवानंद भारती वाद में प्रस्तावना को संविधान का अभिन्न अंग मानने तक की न्यायिक यात्रा यह सिखाती है कि किस प्रकार न्याय, स्वतंत्रता और समानता के बुनियादी सिद्धांत लोकतांत्रिक संविधानवाद के स्थायी संरक्षक बने हुए हैं।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. संविधान सभा की मांग एवं ऐतिहासिक...
2 2. संविधान सभा का गठन, संरचना एवं ऐ...
3 3. उद्देश्य प्रस्ताव (Objectives Re...
4 4. प्रारूप समिति एवं संविधान निर्मा...
5 5. प्रस्तावना का दर्शन: संप्रभु, सम...
6 6. संवैधानिक लक्ष्य एवं प्रस्तावना...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. संविधान सभा की मांग एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

संविधान सभा के गठन का ऐतिहासिक विकासक्रम

भारतीयों द्वारा अपने भाग्य का निर्णय स्वयं करने और बिना किसी विदेशी हस्तक्षेप के एक प्रतिनिधि संविधान सभा द्वारा संविधान निर्माण की मांग भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का एक प्रमुख लक्ष्य थी। इसका क्रमिक विकास निम्न चरणों में हुआ:

वर्षप्रस्तावक / मिशनऐतिहासिक महत्व एवं योगदान
1934एम. एन. रॉय (M.N. Roy)वामपंथी विचारक मानवेंद्र नाथ रॉय ने भारत में सर्वप्रथम एक संविधान सभा के गठन का औपचारिक विचार प्रस्तुत किया।
1935भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसकांग्रेस ने आधिकारिक रूप से स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण हेतु संविधान सभा की मांग रखी।
1938जवाहरलाल नेहरूकांग्रेस की ओर से घोषणा की कि स्वतंत्र भारत का संविधान बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के वयस्क मताधिकार द्वारा चुनी गई संविधान सभा द्वारा बनेगा।
1940अगस्त प्रस्ताव (August Offer)ब्रिटिश सरकार ने पहली बार सैद्धांतिक रूप से स्वीकार किया कि संविधान निर्माण मुख्यतः भारतीयों का अपना दायित्व है।
1942क्रिप्स मिशन (Cripps Mission)सर स्टेफोर्ड क्रिप्स ने युद्धोपरांत संविधान सभा का प्रारूप पेश किया, जिसे कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने ठुकरा दिया।
1946कैबिनेट मिशन योजनालॉर्ड पेथिक-लॉरेंस, सर स्टेफोर्ड क्रिप्स व ए. वी. अलेक्जेंडर के तीन सदस्यीय दल ने संविधान सभा के गठन की व्यावहारिक योजना बनाई।

2. संविधान सभा का गठन, संरचना एवं ऐतिहासिक बैठकें

संविधान सभा की संरचना एवं आरंभिक कार्यप्रणाली

कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार अविभाजित भारत की संविधान सभा में कुल 389 सीटें निर्धारित की गई थीं (296 ब्रिटिश भारतीय प्रांतों से तथा 93 सीटें देशी रियासतों से)। सीटों का आवंटन प्रत्येक प्रांत की जनसंख्या के अनुपात में (लगभग 10 लाख की आबादी पर 1 सीट) किया गया। जुलाई-अगस्त 1946 में प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व से यह चुनाव संपन्न हुआ।

महत्वपूर्ण पदाधिकारी एवं ऐतिहासिक सत्र:
  • प्रथम ऐतिहासिक बैठक (9 दिसंबर 1946): नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन हॉल (वर्तमान संसद का केंद्रीय कक्ष) में पहली बैठक हुई। मुस्लिम लीग ने इसका बहिष्कार किया। फ्रांसीसी परंपरा के अनुसार सभा के सबसे वरिष्ठ सदस्य डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को अस्थायी अध्यक्ष चुना गया।
  • स्थायी अध्यक्ष का निर्वाचन (11 दिसंबर 1946): डॉ. राजेंद्र प्रसाद सर्वसम्मति से स्थायी अध्यक्ष निर्वाचित हुए। एच. सी. मुखर्जी एवं वी. टी. कृष्णामचारी उपाध्यक्ष चुने गए।
  • संवैधानिक सलाहकार: प्रख्यात विधिवेत्ता सर बी. एन. राव (Sir B.N. Rau) को संविधान सभा का संवैधानिक सलाहकार नियुक्त किया गया, जिन्होंने विभिन्न देशों के संविधानों का अध्ययन कर प्रारंभिक प्रारूप तैयार किया।
  • विभाजन का प्रभाव (माउंटबेटन योजना, 3 जून 1947): भारत के विभाजन के पश्चात मुस्लिम लीग के सदस्यों के अलग हो जाने से भारतीय संविधान सभा की सदस्य संख्या घटकर 299 रह गई (प्रांतों से 229 और देशी रियासतों से 70 सदस्य)।

3. उद्देश्य प्रस्ताव (Objectives Resolution): संविधान का वैचारिक आधार

पंडित जवाहरलाल नेहरू का ऐतिहासिक प्रस्ताव (13 दिसंबर 1946)

13 दिसंबर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में युगांतरकारी 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objectives Resolution) प्रस्तुत किया। 22 जनवरी 1947 को इसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया। इस प्रस्ताव ने भावी संविधान के दार्शनिक सिद्धांतों और मूलभूत लक्ष्यों की रूपरेखा तय की, जो आगे चलकर वर्तमान संविधान की प्रस्तावना (Preamble) का मूल आधार बना।

उद्देश्य प्रस्ताव की प्रमुख घोषणाएं:
  • संप्रभु गणराज्य की घोषणा: भारत को एक स्वतंत्र, संप्रभु एवं लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करना।
  • जनता में संप्रभुता: संप्रभु व स्वतंत्र भारत की समस्त शक्तियों एवं प्राधिकारों का मूल स्रोत भारत की जनता होगी।
  • समग्र न्याय की गारंटी: सभी नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय की सुनिश्चित व्यवस्था।
  • स्वतंत्रता एवं समता: विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना, व्यवसाय व संगठन की स्वतंत्रता तथा विधि के समक्ष प्रतिष्ठा व अवसर की समानता।
  • अल्पसंख्यकों व वंचितों की सुरक्षा: अल्पसंख्यकों, पिछड़े एवं जनजातीय क्षेत्रों तथा शोषित व पिछड़े वर्गों के लिए पर्याप्त संवैधानिक रक्षोपाय।
  • विश्व शांति का संवर्धन: अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और मानव कल्याण की अभिवृद्धि हेतु योगदान।

4. प्रारूप समिति एवं संविधान निर्माण का अंतिम चरण

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर की ऐतिहासिक भूमिका एवं प्रारूप समिति

संविधान सभा की विभिन्न समितियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रारूप समिति (Drafting Committee) थी, जिसका गठन 29 अगस्त 1947 को किया गया था। इस समिति के अध्यक्ष महान विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री एवं समाज सुधारक डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर थे। उन्हें 'भारतीय संविधान का जनक' और 'आधुनिक मनु' कहा जाता है।

क्र.सं.सदस्य का नामविशिष्ट भूमिका एवं योगदान
1डॉ. बी. आर. अम्बेडकरअध्यक्ष; संविधान के मुख्य वास्तुकार एवं सामाजिक लोकतंत्र के प्रणेता।
2एन. गोपालस्वामी अय्यंगारप्रसिद्ध प्रशासक एवं कश्मीर मामलों के संवैधानिक विशेषज्ञ।
3अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यरमद्रास के पूर्व एडवोकेट जनरल एवं प्रकांड संवैधानिक वकील।
4डॉ. के. एम. मुंशीविशिष्ट राजनेता, साहित्यकार एवं संविधान विशेषज्ञ।
5सैयद मोहम्मद सादुल्लाअसम के पूर्व प्रधानमंत्री एवं अनुभवी सांसद।
6एन. माधव रावबी. एल. मित्तर के स्वास्थ्य कारणों से त्यागपत्र देने के बाद नियुक्त।
7टी. टी. कृष्णामचारी1948 में डी. पी. खेतान के निधन के पश्चात सदस्य बनाए गए।
अंगीकरण एवं प्रवर्तन की ऐतिहासिक तिथियां:

संविधान निर्माण में संविधान सभा को कुल 2 वर्ष, 11 माह और 18 दिन का समय लगा। इस अवधि में कुल 11 सत्र और 165 बैठकें आयोजित की गईं। 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा संविधान को विधिवत अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया गया (यह दिन 'संविधान दिवस' के रूप में मनाया जाता है)। उपस्थित 284 सदस्यों ने इस पर हस्ताक्षर किए। नागरिकता व चुनाव संबंधी कुछ अनुच्छेद तुरंत प्रभावी हुए, तथा संपूर्ण संविधान 26 जनवरी 1950 को पूर्णतः लागू हुआ (1930 के लाहौर कांग्रेस के ऐतिहासिक पूर्ण स्वराज दिवस की स्मृति में इस दिन को गणतंत्र दिवस चुना गया)।

5. प्रस्तावना का दर्शन: संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य

प्रस्तावना में घोषित भारतीय राज्य का स्वरूप

प्रसिद्ध न्यायविद एन. ए. पालकीवाला ने प्रस्तावना को 'संविधान का परिचय पत्र' (Identity Card of the Constitution) कहा है। प्रस्तावना का आरंभिक वाक्य है: 'हम भारत के लोग...' (We, The People of India), जो इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि संविधान की संप्रभु सत्ता का अंतिम स्रोत भारत की जनता है।

भारतीय राज्य व्यवस्था के पांच मूल स्तंभ:
  1. संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न / संप्रभु (Sovereign): भारत न तो किसी विदेशी सत्ता का डोमिनियन है और न ही किसी बाह्य शक्ति के अधीन है। भारत अपने आंतरिक और बाह्य मामलों में पूर्णतः स्वतंत्र और सर्वोच्च है।
  2. समाजवादी (Socialist): 42वें संविधान संशोधन 1976 द्वारा जोड़ा गया। भारतीय समाजवाद 'लोकतांत्रिक समाजवाद' है—मिश्रित अर्थव्यवस्था के माध्यम से निर्धनता, अज्ञानता व अवसर की विषमता को समाप्त करना (सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार यह मार्क्सवाद और गांधीवाद का ऐसा समन्वय है जो गांधीवाद की ओर अत्यधिक झुका हुआ है)।
  3. पंथनिरपेक्ष (Secular): 42वें संशोधन 1976 द्वारा शामिल किया गया। इसका अर्थ 'सर्वधर्म समभाव' है—राज्य का कोई अपना धर्म नहीं होगा; राज्य सभी धर्मों को समान आदर और संरक्षण देगा (अनुच्छेद 25-28)।
  4. लोकतंत्रात्मक (Democratic): जनता द्वारा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (अनुच्छेद 326) से निर्वाचित प्रतिनिधियों की सरकार, जो संसद और जनता के प्रति उत्तरदायी होती है।
  5. गणराज्य (Republic): भारत का राष्ट्राध्यक्ष (राष्ट्रपति) वंशानुगत राजा नहीं होता, बल्कि वह जनता द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से एक निश्चित अवधि (5 वर्ष) के लिए निर्वाचित होता है।

6. संवैधानिक लक्ष्य एवं प्रस्तावना की विधिक स्थिति

संवैधानिक लक्ष्य एवं प्रस्तावना पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय

प्रस्तावना में नागरिकों को उपलब्ध कराने हेतु चार महान लक्ष्यों की प्रतिज्ञा की गई है:

संवैधानिक लक्ष्यविशिष्ट आयामसंवैधानिक क्रियान्वयन
न्याय (Justice)सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिकअस्पृश्यता उन्मूलन (अनुच्छेद 17), समान कार्य हेतु समान वेतन (अनुच्छेद 39d), वयस्क मताधिकार (अनुच्छेद 326)। 1917 की रूसी क्रांति से प्रेरित।
स्वतंत्रता (Liberty)विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म एवं उपासनाअनुच्छेद 19 की 6 लोकतांत्रिक स्वतंत्रताएं तथा अनुच्छेद 25-28 की धार्मिक स्वतंत्रता। 1789 की फ्रांसीसी क्रांति से प्रेरित।
समता (Equality)प्रतिष्ठा और अवसर की समानताविधि के समक्ष समानता (अनुच्छेद 14), भेदभाव का निषेध (अनुच्छेद 15), सार्वजनिक नियोजन में अवसर की समानता (अनुच्छेद 16)।
बंधुता (Fraternity)व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता और अखंडताएकल नागरिकता तथा अनुच्छेद 51A के मूल कर्तव्य। 1976 में 42वें संशोधन द्वारा 'अखंडता' (Integrity) शब्द जोड़ा गया।
क्या प्रस्तावना संविधान का भाग है? सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण:
  • बेरूबाड़ी संघ वाद (1960): सर्वोच्च न्यायालय ने मत व्यक्त किया कि प्रस्तावना निर्माताओं के मस्तिष्क की कुंजी है, किंतु यह संविधान का भाग नहीं है और न ही यह विधायिका को कोई स्वतंत्र शक्ति प्रदान करती है।
  • केशवानंद भारती वाद (1973): बेरूबाड़ी निर्णय को निरस्त करते हुए 13 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है। अनुच्छेद 368 के अंतर्गत इसमें संशोधन किया जा सकता है, बशर्ते इसके 'मूल ढांचे' को नष्ट न किया जाए।
  • एलआईसी ऑफ इंडिया वाद (1995): न्यायालय ने पुनः पुष्टि की कि प्रस्तावना संविधान का एक आंतरिक व अविभाज्य अंग है।
  • न्यायालय में प्रवर्तनीयता: प्रस्तावना गैर-न्यायोचित (non-justiciable) है, अर्थात इसके उल्लंघन पर सीधे न्यायालय में वाद दायर नहीं किया जा सकता, किंतु अस्पष्ट संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या में यह सर्वोच्च मार्गदर्शक है।

महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक सिद्धांत एवं कालक्रम

प्रस्तावना सत्ता स्रोत सूत्र
संप्रभुता का स्रोत = हम भारत के लोग (लोकप्रिय संप्रभुता)
प्रस्तावना राज्य स्वरूप समीकरण (1976 उपरांत)
राज्य का स्वरूप = संप्रभु + समाजवादी + पंथनिरपेक्ष + लोकतंत्रात्मक + गणराज्य
संवैधानिक चतुर्दिक लक्ष्य
मूल लक्ष्य = न्याय (3 प्रकार) + स्वतंत्रता (5 प्रकार) + समता (2 प्रकार) + बंधुता (गरिमा एवं अखंडता)

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
भारतीय संविधान सभा के निर्माण में 1946 की कैबिनेट मिशन योजना का क्या योगदान था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

1946 की कैबिनेट मिशन योजना ने संविधान सभा के गठन में निर्णायक भूमिका निभाई:

  1. दो पृथक संविधान सभाओं की मांग का खंडन: मुस्लिम लीग की दो अलग संविधान सभाओं की मांग को खारिज कर संयुक्त भारत हेतु एकल संविधान सभा का मार्ग प्रशस्त किया।
  2. सीटों का आवंटन: कुल 389 सीटें तय कीं (296 ब्रिटिश प्रांतों से, 93 देशी रियासतों से), जो लगभग 10 लाख की आबादी पर एक सीट के अनुपात में बांटी गईं।
  3. निर्वाचन पद्धति: प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा एकल संक्रमणीय मत से आनुपातिक प्रतिनिधित्व द्वारा अप्रत्यक्ष निर्वाचन की लोकतांत्रिक व्यवस्था की, जिसके आधार पर 9 दिसंबर 1946 को संविधान सभा का पहला ऐतिहासिक सत्र आयोजित हुआ।
उदाहरण 2
उद्देश्य प्रस्ताव (Objectives Resolution) क्या था? इसे किसने प्रस्तुत किया और इसका क्या महत्व है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. प्रस्तुति: पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव पेश किया, जिसे 22 जनवरी 1947 को सर्वसम्मति से पारित किया गया।
  2. अंतर्वस्तु: इसने भारत को एक स्वतंत्र संप्रभु गणराज्य घोषित किया तथा सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय, स्वतंत्रता और समता के मूल सिद्धांतों को प्रतिपादित किया।
  3. महत्व: यह प्रस्ताव भारतीय संविधान का वैचारिक व नैतिक घोषणापत्र था। यही प्रस्ताव संशोधित होकर वर्तमान संविधान की प्रस्तावना बना।
उदाहरण 3
प्रारूप समिति के अध्यक्ष कौन थे? संविधान निर्माण में उनके विशिष्ट योगदान का उल्लेख कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर (Dr. B.R. Ambedkar) थे।

उन्हें 'भारतीय संविधान का जनक' कहा जाता है क्योंकि:

  1. उन्होंने विश्व के प्रमुख संविधानों और बी. एन. राव द्वारा तैयार प्रारंभिक प्रारूप का अत्यंत सूक्ष्मता से परीक्षण कर 395 अनुच्छेदों व 8 अनुसूचियों का व्यापक प्रारूप तैयार किया।
  2. संविधान सभा के प्रत्येक वाद-विवाद में अपने तर्कों और विधिक पांडित्य से जटिल संवैधानिक धाराओं को पारित कराया।
  3. दलितों, महिलाओं, शोषितों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए ठोस संवैधानिक रक्षोपाय बनाकर सामाजिक लोकतंत्र की नींव रखी।
उदाहरण 4
42वें संविधान संशोधन 1976 द्वारा प्रस्तावना में कौन-से शब्द जोड़े गए? उनका अर्थ स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

42वें संशोधन द्वारा प्रस्तावना में तीन नए शब्द जोड़े गए:

  1. समाजवादी (Socialist): इसका आशय लोकतांत्रिक समाजवाद से है, जहां मिश्रित अर्थव्यवस्था के जरिए गरीबी, अज्ञानता और आय की विषमता को समाप्त करने का लक्ष्य है।
  2. पंथनिरपेक्ष (Secular): इसका अर्थ 'सर्वधर्म समभाव' है—राज्य का कोई आधिकारिक राजधर्म नहीं होगा और सभी धर्मों को राज्य की ओर से समान आदर व संरक्षण मिलेगा।
  3. अखंडता (and Integrity): राष्ट्रीय एकता के साथ 'अखंडता' शब्द जोड़कर भारत की भौगोलिक एवं भावनात्मक अक्षुण्णता को सुदृढ़ किया गया।
उदाहरण 5
क्या प्रस्तावना संविधान का भाग है? बेरूबाड़ी वाद और केशवानंद भारती वाद के संदर्भ में समझाइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. बेरूबाड़ी संघ वाद (1960): सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि प्रस्तावना निर्माताओं के विचारों को समझने की कुंजी मात्र है, किंतु यह संविधान का भाग नहीं है।
  2. केशवानंद भारती वाद (1973): 13 न्यायाधीशों की पीठ ने बेरूबाड़ी मत को खारिज करते हुए ऐतिहासिक निर्णय दिया कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग (Integral Part) है।
  3. संशोधन क्षमता: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 368 के अंतर्गत प्रस्तावना में संशोधन हो सकता है, किंतु इसके मूल ढांचे (Basic Structure) को नष्ट नहीं किया जा सकता।
उदाहरण 6
प्रस्तावना के आरंभिक शब्द 'हम भारत के लोग...' का क्या संवैधानिक अभिप्राय है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

प्रस्तावना के प्रथम शब्द 'हम भारत के लोग...' (We, The People of India) निम्न गंभीर संवैधानिक अर्थ प्रकट करते हैं:

  1. लोकप्रिय संप्रभुता: भारत में संप्रभुता का वास्तविक एवं अंतिम स्रोत भारत की जनता है, न कि कोई विदेशी सत्ता या वंशानुगत शासक।
  2. लोकतांत्रिक वैधता: संविधान का निर्माण और अंगीकरण जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा जनहित में किया गया है।
  3. राष्ट्रीय एकता: जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र की सीमाओं से परे संपूर्ण भारतवासी एक अविभाज्य राष्ट्र के रूप में संगठित हैं।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्द मूल 1949 की प्रस्तावना में थे।

सही वैज्ञानिक तथ्य

ये शब्द मूल संविधान में नहीं थे; इन्हें 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

प्रस्तावना को मौलिक अधिकारों की भांति न्यायालय में सीधे प्रवर्तनीय मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

प्रस्तावना गैर-न्यायोचित (non-justiciable) है; केवल प्रस्तावना के उल्लंघन के आधार पर सीधे रिट याचिका दायर नहीं की जा सकती।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

26 नवंबर 1949 और 26 जनवरी 1950 में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

26 नवंबर 1949 संविधान अंगीकृत करने का दिन है (संविधान दिवस); 26 जनवरी 1950 संविधान लागू होने का दिन है (गणतंत्र दिवस)।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

संविधान निर्माण एवं दर्शन: संविधान सभा एवं प्रस्तावना WBCHSE कक्षा 11 राजनीति विज्ञान • कैबिनेट मिशन • प्रारूप समिति • प्रस्तावना एवं मूल आदर्श संविधान सभा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि कैबिनेट मिशन 1946 • ऐतिहासिक यात्रा • प्रथम बैठक: 9 दिसंबर 1946 (अस्थायी अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा) • स्थायी अध्यक्ष: डॉ. राजेंद्र प्रसाद (11 दिसंबर 1946) • उद्देश्य प्रस्ताव (Objectives Resolution): नेहरू (13 दिसं 1946) • निर्माण काल: 2 वर्ष 11 माह 18 दिन (11 सत्र, 165 दिन) प्रारूप समिति व संविधान निर्माता डॉ. बी. आर. अम्बेडकर एवं 7 सदस्य • अध्यक्ष: डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (संविधान के मुख्य शिल्पकार) • संवैधानिक सलाहकार: सर बी. एन. राव (B.N. Rau) • अंगीकृत: 26 नवंबर 1949 (संविधान दिवस / Samvidhan Divas) • लागू: 26 जनवरी 1950 (1930 के पूर्ण स्वराज दिवस का स्मारक) प्रस्तावना: राज्य का स्वरूप जनता की संप्रभु सर्वोच्च सत्ता ★ 'हम भारत के लोग'—संप्रभु शक्ति का स्रोत भारत की जनता • संप्रभु (Sovereign): आंतरिक व बाह्य नियंत्रण से पूर्ण मुक्त • समाजवादी (Socialist) व पंथनिरपेक्ष (Secular) [42वां संशोधन 1976] • लोकतंत्रात्मक (Democratic) व गणराज्य (Republic): निर्वाचित शासन संवैधानिक लक्ष्य एवं विधिक स्थिति न्याय, स्वतंत्रता, समता एवं बंधुता 1. न्याय: सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक 2. स्वतंत्रता: विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म व उपासना 3. समता: प्रतिष्ठा व अवसर की समानता • 4. बंधुता व अखंडता ⚖ केशवानंद भारती (1973): प्रस्तावना संविधान का अभिन्न अंग है

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
भारतीय संविधान सभा का गठन 1946 की कैबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत 389 सीटों के साथ हुआ था।
मुख्य बिंदु 2
संविधान सभा की प्रथम बैठक 9 दिसंबर 1946 को डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा की अस्थायी अध्यक्षता में हुई।
मुख्य बिंदु 3
11 दिसंबर 1946 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्थायी अध्यक्ष और सर बी. एन. राव संवैधानिक सलाहकार चुने गए।
मुख्य बिंदु 4
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को उद्देश्य प्रस्ताव पेश किया, जो 22 जनवरी 1947 को स्वीकृत हुआ।
मुख्य बिंदु 5
29 अगस्त 1947 को डॉ. बी. आर. अम्बेडकर की अध्यक्षता में 7 सदस्यीय प्रारूप समिति का गठन किया गया।
मुख्य बिंदु 6
संविधान निर्माण में कुल 2 वर्ष 11 माह 18 दिन लगे और 26 नवंबर 1949 को इसे अंगीकृत किया गया (संविधान दिवस)।
मुख्य बिंदु 7
1930 के पूर्ण स्वराज दिवस की स्मृति में 26 जनवरी 1950 को संविधान पूर्णतः लागू हुआ (गणतंत्र दिवस)।
मुख्य बिंदु 8
प्रस्तावना भारत को संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य घोषित करती है।
मुख्य बिंदु 9
42वें संशोधन 1976 द्वारा प्रस्तावना में 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्द जोड़े गए।
मुख्य बिंदु 10
1973 के केशवानंद भारती वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रस्तावना को संविधान का अभिन्न अंग घोषित किया।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

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