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WBB • कक्षा XI • Political Science • अध्याय 1
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

एक अनुशासन के रूप में राजनीति विज्ञान: प्रकृति और क्षेत्र

राजनीति विज्ञान सामाजिक विज्ञान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यवस्थित अनुशासन है जो राज्य, शासन व्यवस्था, राजनीतिक संस्थाओं, शक्ति संरचना और मानवीय राजनीतिक व्यवहार का वैज्ञानिक व तार्किक अध्ययन करता है। प्राचीन ग्रीस के नगर-राज्यों की 'पॉलिस' संकल्पना से आरंभ होकर यह विषय आधुनिक युग में केवल औपचारिक कानूनों तक सीमित न रहकर शक्ति के वितरण, राजनीतिक प्रणालियों, नागरिक अधिकारों और अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के व्यापक फलक तक विस्तृत हो चुका है। पश्चिम बंगाल उच्चतर माध्यमिक शिक्षा परिषद (WBCHSE) के कक्षा 11 के पाठ्यक्रम के अंतर्गत इस प्रथम अध्याय में राजनीति विज्ञान की ऐतिहासिक उत्पत्ति, पारंपरिक राज्य-केंद्रित उपागम, आधुनिक व्यवहारवादी क्रांति तथा मार्क्सवादी वर्ग दृष्टिकोण का गहन विश्लेषण किया गया है। इसके साथ ही यह अध्याय इस ऐतिहासिक विमर्श की पड़ताल करता है कि क्या राजनीति विज्ञान एक वास्तविक विज्ञान है, 1948 के यूनेस्को सम्मेलन द्वारा निर्धारित इसके चतुर्मुखी विषय-क्षेत्र को स्पष्ट करता है, तथा इतिहास, अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र के साथ इसके अंतर्संबंधों को रेखांकित करता है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के प्रबुद्ध, जागरूक और उत्तरदायी नागरिक बनने के लिए राजनीति विज्ञान की प्रकृति और विषय-क्षेत्र का ज्ञान अनिवार्य है। यह शास्त्र हमें यह समझने की विश्लेषणात्मक दृष्टि प्रदान करता है कि सत्ता किस प्रकार अर्जित की जाती है, सार्वजनिक नीतियां कैसे बनती हैं और राज्य के निर्णय जनजीवन को कैसे प्रभावित करते हैं। पश्चिम बंगाल बोर्ड (WBCHSE) की कक्षा 11 की वार्षिक परीक्षा में इस अध्याय से 8 अंकों के विस्तृत निबंधात्मक प्रश्न और 1 अंक के बहुविकल्पीय (MCQ) प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं। इसके अतिरिक्त, यह अध्याय संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), राज्य सिविल सेवा (WBCS), विधि (Law) और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए एक सुदृढ़ वैचारिक आधारशिला निर्मित करता है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. राजनीति विज्ञान की उत्पत्ति, शाब...
2 2. पारंपरिक या परंपरागत दृष्टिकोण (...
3 3. आधुनिक एवं व्यवहारवादी दृष्टिकोण...
4 4. मार्क्सवादी दृष्टिकोण: वर्ग संघर...
5 5. क्या राजनीति विज्ञान एक विज्ञान...
6 6. यूनेस्को द्वारा निर्धारित विषय-क...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. राजनीति विज्ञान की उत्पत्ति, शाब्दिक अर्थ एवं प्रारंभिक संकल्पनाएं

व्युत्पत्तिगत स्रोत एवं प्राचीन यूनानी विरासत

अंग्रेजी शब्द 'Politics' की व्युत्पत्ति प्राचीन ग्रीक (यूनानी) भाषा के शब्द 'Polis' (पॉलिस) से हुई है। प्राचीन यूनान में छोटे-छोटे स्वतंत्र जनपदों या 'नगर-राज्यों' (City-States) को 'पॉलिस' कहा जाता था (जैसे एथेंस और स्पार्टा)। इन नगर-राज्यों के नागरिकों को 'Polites' (पॉलिटेस), वहां के संविधान को 'Politeia' (पॉलिटिया), और नगर-राज्य के सामूहिक मामलों के प्रबंधन की कला को 'Politike' (पॉलिटिके) कहा जाता था।

अरस्तू — राजनीति विज्ञान के जनक:

महान यूनानी दार्शनिक अरस्तू (Aristotle) को सर्वसम्मति से 'राजनीति विज्ञान का जनक' (Father of Political Science) माना जाता है। उनके अमर ग्रंथ का नाम 'पॉलिटिक्स' (Politics) है। अरस्तू ने प्रसिद्ध घोषणा की थी: "मनुष्य स्वभाव से ही एक सामाजिक और राजनीतिक प्राणी है" (Man is by nature a political animal)। जो व्यक्ति राज्य के बिना रहता है, वह या तो पशु है या देवता। अरस्तू ने राजनीति विज्ञान को "सर्वोच्च विज्ञान" (Master Science) कहा, क्योंकि यह मानव जीवन के सर्वांगीण कल्याण और 'सद्जीवन' (Good Life) की प्राप्ति के नियमों का निर्धारण करता है।

राजनीति (Politics) और राजनीति विज्ञान (Political Science) में अंतर

सामान्य बोलचाल में यद्यपि इन दोनों का प्रयोग एक-दूसरे के स्थान पर कर दिया जाता है, किंतु शैक्षिक दृष्टि से इनमें गहरा अंतर है:

  • राजनीति (व्यावहारिक गतिविधि): यह सत्ता प्राप्ति की दैनिक प्रतिस्पर्धा, दलीय संघर्ष, चुनावी दांवपेच और सरकार संचालन की प्रत्यक्ष व व्यावहारिक प्रक्रिया है। यह अत्यंत गतिशील और परिवर्तनशील होती है।
  • राजनीति विज्ञान (सैद्धांतिक अनुशासन): यह राजनीतिक घटनाओं, राज्य, शासन प्रणालियों और राजनीतिक व्यवहार का व्यवस्थित, क्रमबद्ध और सैद्धांतिक अध्ययन है। आधुनिक युग में विलियम गॉडविन और मैरी वोल्सटोनक्राफ्ट के समय से इस विषय को एक पृथक अनुशासन के रूप में प्रतिष्ठा मिली।

2. पारंपरिक या परंपरागत दृष्टिकोण (राज्य एवं सरकार केंद्रित परिभाषाएं)

परंपरागत दृष्टिकोण की विशेषताएं

प्राचीन काल से लेकर द्वितीय विश्व युद्ध तक राजनीति विज्ञान के अध्ययन में जिस दृष्टिकोण का वर्चस्व रहा, उसे पारंपरिक या संस्थागत दृष्टिकोण (Traditional Approach) कहा जाता है। यह उपागम मुख्य रूप से आदर्शवादी (Normative), दार्शनिक, ऐतिहासिक और कानूनी-संस्थागत रहा। पारंपरिक विचारकों ने राजनीति विज्ञान को मुख्यतः दो आधारों पर परिभाषित किया: राज्य और सरकार।

परिभाषा का वर्गीकरण प्रमुख राजनीतिक विचारक प्रामाणिक परिभाषा एवं मूल विचार
1. राज्य-केंद्रित परिभाषाएं जे. डब्ल्यू. गार्नर, ब्लंटशली, पॉल जेनेट प्रोफेसर गार्नर (J.W. Garner): "राजनीति विज्ञान का आरंभ और अंत राज्य के साथ होता है।" (Political Science begins and ends with the State)
ब्लंटशली (Bluntschli): "राजनीति विज्ञान वह विज्ञान है जिसका संबंध राज्य से है और जो राज्य की आधारभूत स्थितियों, उसकी मूल प्रकृति तथा उसके विभिन्न रूपों को समझने का प्रयास करता है।"
2. सरकार-केंद्रित परिभाषाएं सर जॉन सीले, स्टीफन लीकॉक सीले (Seeley): "राजनीति विज्ञान सरकार के तत्वों की उसी प्रकार जांच करता है जैसे अर्थशास्त्र धन की, जीवविज्ञान जीवन की, बीजगणित अंकों की तथा रेखागणित स्थान और विस्तार की।"
लीकॉक (Leacock): "राजनीति विज्ञान सरकार से संबंधित अध्ययन है।"
3. राज्य एवं सरकार दोनों पर केंद्रित आर. एन. गिलक्राइस्ट, गेटेल, हेरोल्ड लास्की गिलक्राइस्ट (Gilchrist): "राजनीति विज्ञान राज्य और सरकार की सामान्य समस्याओं का अध्ययन करता है।"
लास्की (Laski): "राजनीति का अध्ययन संगठित राज्यों के संदर्भ में मानव जीवन के संबंधों से संबंधित है।"
परंपरागत दृष्टिकोण की प्रमुख कमियां
  • अति-संस्थागत एवं कानूनी पूर्वाग्रह: इसने संविधान, कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका जैसी औपचारिक संस्थाओं पर ही ध्यान केंद्रित किया और अनौपचारिक राजनीतिक शक्तियों (जैसे दबाव समूह, जनमत, जाति और वर्ग) की पूरी तरह अनदेखी की।
  • यथार्थ से विमुख और आदर्शवादी: राज्य वास्तव में कैसा कार्य कर रहा है, इसका अध्ययन करने के बजाय यह इस कल्पना में खोया रहा कि राज्य को कैसा होना चाहिए।

3. आधुनिक एवं व्यवहारवादी दृष्टिकोण (शक्ति, व्यवस्था एवं प्रक्रियापरक उपागम)

व्यवहारवादी क्रांति और आधुनिक उपागम का उदय

द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत अमेरिकी राजनीति विज्ञान (विशेषकर शिकागो संप्रदाय के चार्ल्स मेरियम और हेरोल्ड लासवेल) ने पारंपरिक दृष्टिकोण के विरुद्ध एक बौद्धिक आंदोलन का सूत्रपात किया, जिसे व्यवहारवादी क्रांति (Behavioural Revolution) कहा जाता है। आधुनिक विचारकों ने औपचारिक संस्थाओं के स्थान पर व्यक्ति के वास्तविक राजनीतिक व्यवहार, निर्णय प्रक्रिया और शक्ति (Power) को अध्ययन का केंद्र बिंदु बनाया।

आधुनिक दृष्टिकोण के प्रमुख सिद्धांत

क. हेरोल्ड लासवेल: शक्ति का सिद्धांत

1936 में प्रकाशित अपनी ऐतिहासिक पुस्तक 'Politics: Who Gets What, When, How' में लासवेल ने प्रतिपादित किया कि राजनीति अनिवार्य रूप से शक्ति के स्वरूप और उसके बंटवारे का अध्ययन है। समाज में दुर्लभ मूल्यों व संसाधनों पर किसका नियंत्रण है और निर्णय कौन लेता है—यही राजनीति विज्ञान का मूल विषय है। अब्राहम कपलान के साथ उन्होंने 'Power and Society' (1950) में राजनीति को 'शक्ति का विज्ञान' कहा।

ख. डेविड ईस्टन: राजनीतिक व्यवस्था सिद्धांत

1953 में प्रकाशित अपनी कृति 'The Political System' में डेविड ईस्टन ने राजनीति विज्ञान को "समाज के लिए मूल्यों का आधिकारिक आवंटन" (Authoritative Allocation of Values for a Society) के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने राजनीति को एक व्यवस्था (System) माना, जिसमें पर्यावरण से इनपुट (मांगें एवं समर्थन) आते हैं और रूपांतरण प्रक्रिया के उपरांत वे आउटपुट (नीतियां एवं निर्णय) में बदलते हैं।

रॉबर्ट डाहल का बहुलवादी शक्ति दृष्टिकोण

रॉबर्ट डाहल (Robert A. Dahl) ने स्पष्ट किया कि कोई भी मानवीय संबंध जिसमें महत्वपूर्ण रूप से शक्ति, नियंत्रण या सत्ता निहित हो, वह राजनीतिक व्यवस्था का अंग है। आधुनिक राजनीति विज्ञान अंतःविषयक दृष्टिकोण (समाजशास्त्र, मनोविज्ञान और अर्थशास्त्र के साथ समन्वय) तथा सांख्यिकीय पद्धतियों पर बल देता है।

उत्तर-व्यवहारवाद (Post-Behaviouralism - 1969):

अत्यधिक तकनीकी और मूल्य-निरपेक्ष शोध के कारण जब राजनीति विज्ञान वियतनाम युद्ध, नस्लवाद और गरीबी जैसे ज्वलंत सामाजिक संकटों का समाधान करने में असमर्थ रहा, तब डेविड ईस्टन ने "प्रासंगिकता और क्रिया का सिद्धांत" (Credo of Relevance and Action) प्रस्तुत करते हुए उत्तर-व्यवहारवाद की घोषणा की। इसका उद्देश्य वैज्ञानिक पद्धतियों के साथ सामाजिक मूल्यों और मानवीय समस्याओं के समाधान का समन्वय करना था।

4. मार्क्सवादी दृष्टिकोण: वर्ग संघर्ष, वर्ग शासन और राज्य का विलोपन

ऐतिहासिक भौतिकवाद के परिप्रेक्ष्य में राजनीति

पारंपरिक उदारवादी उपागम और आधुनिक व्यवहारवाद दोनों की तीखी आलोचना करते हुए कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने राजनीति विज्ञान में एक क्रांतिकारी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। मार्क्सवादी विश्लेषण ऐतिहासिक भौतिकवाद (Historical Materialism) पर आधारित है। मार्क्सवाद का मानना है कि राजनीतिक घटनाओं को समाज के आर्थिक ढांचे से अलग करके नहीं समझा जा सकता। समाज का आर्थिक आधार (उत्पादन की पद्धतियां व संबंध) ही राजनीतिक उपरि-संरचना (राज्य, कानून, सरकार) को निर्धारित करता है।

मार्क्सवादी राज्य सिद्धांत के प्रमुख स्तंभ
  • राज्य वर्ग शोषण का एक साधन है: उदारवादी विचारक राज्य को निष्पक्ष जनकल्याणकारी संस्था मानते हैं, किंतु मार्क्सवाद इसे नकारता है। कम्युनिस्ट घोषणापत्र (The Communist Manifesto - 1848) में मार्क्स और एंगेल्स ने लिखा: "आधुनिक राज्य की कार्यपालिका संपूर्ण बुर्जुआ (पूंजीपति) वर्ग के सामान्य मामलों का प्रबंधन करने वाली समिति मात्र है।" राज्य कोई शाश्वत संस्था नहीं है; इसका जन्म तब हुआ जब समाज में निजी संपत्ति का उदय हुआ और समाज शोषक तथा शोषित वर्गों में बंट गया।
  • वर्ग संघर्ष ही इतिहास की प्रेरक शक्ति है: मानव समाज का अब तक का सारा इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है (स्वामी-दास, सामंत-किसान, पूंजीपति-मजदूर)। कानून, पुलिस, सेना और न्यायपालिका वास्तव में शासक वर्ग के हितों की रक्षा और मजदूर वर्ग के दमन के लिए कार्य करते हैं।
  • सर्वहारा का अधिनायकत्व एवं राज्य का विलोपन: मार्क्सवाद के अनुसार सर्वहारा (मजदूर) वर्ग क्रांति के माध्यम से पूंजीवादी राज्य को नष्ट कर देगा और संक्रमणकालीन 'सर्वहारा की तानाशाही' (Dictatorship of the Proletariat) स्थापित करेगा। जब निजी संपत्ति समाप्त हो जाएगी और वर्गहीन साम्यवादी समाज (Communist Society) की स्थापना होगी, तब किसी वर्ग के दमन की आवश्यकता नहीं रहेगी। लेनिन के अनुसार, तब राज्य को समाप्त नहीं करना पड़ेगा, बल्कि राज्य स्वतः ही समाप्त (लुप्त) हो जाएगा (Withering Away of the State)।

5. क्या राजनीति विज्ञान एक विज्ञान है? — इस ऐतिहासिक विमर्श की समीक्षा

राजनीति विज्ञान के वैज्ञानिक स्वरूप पर विवाद

क्या राजनीति विज्ञान को भौतिकी, रसायन या गणित की भांति एक यथार्थ 'विज्ञान' माना जा सकता है? इस प्रश्न पर विचारकों में गंभीर मतभेद हैं और वे दो प्रमुख खेमों में विभाजित हैं:

क. विज्ञान न मानने के तर्क (संदेहवादी विचारक)

एफ. डब्ल्यू. मेटलैंड (F.W. Maitland), बकल (Buckle), ऑगस्ट कॉम्टे (Auguste Comte) और एडमंड बर्क जैसे विचारकों ने इसे विज्ञान मानने से स्पष्ट इनकार किया है। मेटलैंड का यह कथन अत्यंत प्रसिद्ध है:

"जब मैं परीक्षा के प्रश्नपत्रों पर 'राजनीति विज्ञान' जैसा शीर्षक देखता हूं, तो मुझे प्रश्नों पर नहीं, बल्कि उस शीर्षक पर दुख होता है।"
  • सार्वभौमिक नियमों का अभाव: गुरुत्वाकर्षण के नियम की तरह राजनीति विज्ञान में कोई सार्वभौमिक, अटल और सर्वमान्य नियम नहीं होते। एक देश में सफल व्यवस्था दूसरे देश में पूरी तरह विफल हो सकती है।
  • मानव व्यवहार की अस्थिरता एवं अप्रत्याशितता: इस विषय की मूल विषय-वस्तु मनुष्य का राजनीतिक व्यवहार है, जो भावनाओं, पूर्वाग्रहों और बदलती परिस्थितियों पर निर्भर करता है। यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि आगामी चुनाव में जनता किसे वोट देगी।
  • प्रयोगशाला का अभाव: संपूर्ण समाज कोई वैज्ञानिक प्रयोगशाला नहीं है जहां नागरिकों को नियंत्रित वातावरण में रखकर परीक्षण किए जा सकें।
  • शोधकर्ता का व्यक्तिगत पूर्वाग्रह: अध्ययनकर्ता स्वयं समाज का हिस्सा होता है और उसकी अपनी राजनीतिक विचारधारा या निष्ठाएं होती हैं, जिससे पूर्ण वस्तुनिष्ठता असंभव हो जाती है।
ख. विज्ञान मानने के तर्क (समर्थक विचारक)

अरस्तू, जीन बोदां, थॉमस हॉब्स, लॉर्ड ब्राइस, जे. डब्ल्यू. गार्नर और हेरोल्ड लास्की ने इसे निश्चित रूप से एक विज्ञान माना है:

  • क्रमबद्ध एवं व्यवस्थित ज्ञान: विज्ञान केवल टेस्ट-ट्यूब तक सीमित नहीं है; किसी भी विषय का व्यवस्थित, अवलोकित, वर्गीकृत और तर्कसंगत ज्ञान विज्ञान कहलाता है। राजनीति विज्ञान इस कसौटी पर खरा उतरता है।
  • अरस्तू द्वारा 'सर्वोच्च विज्ञान' की संज्ञा: अरस्तू ने राजनीति को Master Science कहा क्योंकि यह संपूर्ण समाज के सामूहिक उत्थान की दिशा तय करता है।
  • सामाजिक व नीतिगत प्रयोग: लॉर्ड ब्राइस के अनुसार शासन व्यवस्था का प्रत्येक नया कानून, संवैधानिक संशोधन या नीतिगत सुधार समाज में चलने वाला एक सजीव परीक्षण ही है।
  • प्रकृति: प्राकृतिक विज्ञान नहीं, बल्कि 'सामाजिक विज्ञान': राजनीति विज्ञान भौतिकी की तरह कोई जड़ यथार्थ विज्ञान नहीं है; यह अर्थशास्त्र या मौसम विज्ञान की भांति एक गतिशील सामाजिक विज्ञान (Social Science) है।

6. यूनेस्को द्वारा निर्धारित विषय-क्षेत्र (1948) एवं अन्य सामाजिक विज्ञानों से संबंध

पेरिस यूनेस्को सम्मेलन (1948) और विषय-क्षेत्र का चतुर्मुखी वर्गीकरण

राजनीति विज्ञान के अध्ययन की अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं को स्पष्ट करने हेतु सितंबर 1948 में फ्रांस के पेरिस नगर में यूनेस्को (UNESCO) के तत्वावधान में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति विज्ञान संघ का एक ऐतिहासिक सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में राजनीति विज्ञान के विषय-क्षेत्र को चार प्रमुख स्तंभों में विभाजित किया गया:

यूनेस्को द्वारा निर्धारित क्षेत्र प्रमुख अध्ययन बिंदु
1. राजनीतिक सिद्धांत (Political Theory) संप्रभुता, स्वतंत्रता, समानता, न्याय, अधिकार और कानून की अवधारणाएं; राजनीतिक चिंतन का इतिहास (प्लेटो व अरस्तू से लेकर मार्क्स तक)।
2. राजनीतिक संस्थाएं (Political Institutions) संविधान; केंद्रीय, क्षेत्रीय एवं स्थानीय शासन व्यवस्थाएं; सरकार के तीन अंग (कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका); तुलनात्मक शासन व लोक प्रशासन।
3. राजनीतिक दल, दबाव समूह एवं जनमत दलीय व्यवस्थाएं व चुनाव प्रणालियां; दबाव समूह व हित समूह; जनमत निर्माण की प्रक्रियाएं तथा जनसंचार माध्यमों की भूमिका।
4. अंतर्राष्ट्रीय संबंध (International Relations) अंतर्राष्ट्रीय राजनीति एवं विदेश नीतियां; अंतर्राष्ट्रीय संगठन (संयुक्त राष्ट्र संघ, क्षेत्रीय संगठन); अंतर्राष्ट्रीय कानून व वैश्विक शांति।
अन्य सामाजिक विज्ञानों के साथ अंतर्संबंध
  • इतिहास के साथ संबंध: इतिहास राजनीति विज्ञान को अतीत की राजनीतिक घटनाओं और संस्थागत विकास की कच्ची सामग्री प्रदान करता है। सर जॉन सीले का प्रसिद्ध कथन है: "इतिहास के बिना राजनीति विज्ञान निष्फल है, और राजनीति विज्ञान के बिना इतिहास निराधार है।" फ्रीमैन ने कहा था: "इतिहास बीती हुई राजनीति है, और राजनीति वर्तमान इतिहास है।"
  • अर्थशास्त्र के साथ संबंध: कराधान, बजट, वित्तीय संसाधन आवंटन और आर्थिक नीतियां अनिवार्य रूप से राजनीतिक निर्णयों द्वारा ही संचालित होती हैं। प्राचीन काल में इसे 'राजनीतिक अर्थव्यवस्था' (Political Economy) कहा जाता था।
  • समाजशास्त्र के साथ संबंध: समाजशास्त्र समस्त सामाजिक व्यवस्थाओं का मातृ-विज्ञान है, जबकि राजनीति विज्ञान उसके एक विशिष्ट अंग 'राज्य' का अध्ययन करता है। इन दोनों के मिलन से आधुनिक राजनीतिक समाजशास्त्र (Political Sociology) का जन्म हुआ है।

महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक सिद्धांत एवं कालक्रम

पारंपरिक राज्य-केंद्रित उपागम (गार्नर एवं ब्लंटशली)
राजनीति विज्ञान = राज्य का उद्भव + प्रकृति + रूप + वैधानिक ढांचा
आधुनिक व्यवस्था एवं शक्ति उपागम (ईस्टन एवं लासवेल)
राजनीतिक व्यवस्था = इनपुट (मांग + समर्थन) ➔ रूपांतरण ➔ आउटपुट (नीतियां) ➔ फीडबैक
मार्क्सवादी द्वंद्वात्मक उपागम (मार्क्स, एंगेल्स एवं लेनिन)
आर्थिक आधार (उत्पादन संबंध) ➔ राजनीतिक उपरि-संरचना (वर्ग शोषण का साधन राज्य)
यूनेस्को 1948 चतुर्मुखी विषय-क्षेत्र सूत्र
विषय-क्षेत्र = [1. राजनीतिक सिद्धांत] + [2. संस्थाएं] + [3. दल/समूह/जनमत] + [4. अंतर्राष्ट्रीय संबंध]

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
राजनीति विज्ञान की परिभाषा दीजिए। इसके अध्ययन के पारंपरिक और आधुनिक दृष्टिकोणों में अंतर स्पष्ट कीजिए। (अंक: 8)
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
1. राजनीति विज्ञान की परिभाषा: राजनीति विज्ञान सामाजिक विज्ञान का वह व्यवस्थित और गतिशील विषय है जो राज्य, शासन व्यवस्था, राजनीतिक संस्थाओं, सत्ता संरचना तथा मानव के राजनीतिक व्यवहार का तार्किक एवं आनुभविक अध्ययन करता है।

2. पारंपरिक और आधुनिक दृष्टिकोणों में तुलनात्मक अंतर:
तुलना का आधार पारंपरिक दृष्टिकोण (Traditional) आधुनिक दृष्टिकोण (Modern)
मूल अध्ययन विषय राज्य, सरकार और औपचारिक संस्थागत व संवैधानिक संरचनाएं। शक्ति, प्रभाव, सत्ता, निर्णय प्रक्रिया तथा मानव का राजनीतिक व्यवहार।
अध्ययन पद्धति दार्शनिक, ऐतिहासिक, कानूनी तथा नैतिक-आदर्शवादी। आनुभविक, व्यवहारवादी, सांख्यिकीय तथा अंतःविषयक।
प्रमुख विचारक गार्नर, ब्लंटशली, सीले, लीकॉक, लास्की। हेरोल्ड लासवेल, डेविड ईस्टन, रॉबर्ट डाहल, चार्ल्स मेरियम।
दृष्टिकोण का स्वरूप राज्य 'कैसा होना चाहिए' (आदर्शवादी)। राजनीति वास्तव में 'कैसी चल रही है' (यथार्थवादी)।

3. निष्कर्ष: पारंपरिक दृष्टिकोण ने राजनीति विज्ञान को संस्थागत आधार और दार्शनिक ऊंचाई प्रदान की, जबकि आधुनिक दृष्टिकोण ने इसे व्यावहारिक यथार्थ और वैज्ञानिक गतिशीलता से संपन्न किया। समकालीन युग में दोनों का समन्वय आवश्यक है।
उदाहरण 2
क्या राजनीति विज्ञान एक वास्तविक विज्ञान है? पक्ष और विपक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिए। (अंक: 8)
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: राजनीति विज्ञान को क्या भौतिकी या रसायन विज्ञान की भांति एक यथार्थ 'विज्ञान' कहा जा सकता है? यह प्रश्न राजनीतिक दर्शन का एक प्रमुख विवाद रहा है।

1. विज्ञान न मानने के तर्क (संदेहवादियों के विचार): मेटलैंड, बकल, ऑगस्ट कॉम्टे और बर्क ने इसे विज्ञान मानने से अस्वीकार किया है:
  • मेटलैंड का प्रसिद्ध आक्षेप: मेटलैंड ने लिखा था कि परीक्षा के प्रश्नपत्र पर 'राजनीति विज्ञान' शीर्षक देखकर उन्हें प्रश्नों पर नहीं, शीर्षक पर दुख होता है।
  • सार्वभौमिक नियमों की कमी: भौतिक विज्ञान की भांति राजनीति विज्ञान में कोई अटल और सार्वभौमिक नियम नहीं होते। जो नियम ब्रिटेन में सफल है, वह किसी अन्य देश में असफल हो सकता है।
  • मानव स्वभाव की अप्रत्याशितता: राजनीति का केंद्र मानव चेतना है, जो भावनाओं और परिस्थितियों से प्रेरित होती है। मनुष्य का व्यवहार कभी भी पूरी तरह पूर्वानुमानित नहीं किया जा सकता।
  • प्रयोगशाला का अभाव: किसी समाज या जनसमूह को प्रयोगशाला में बंद करके परीक्षण नहीं किया जा सकता।
  • शोधकर्ता का पूर्वाग्रह: अध्ययनकर्ता स्वयं समाज और किसी न किसी राजनीतिक विचारधारा का हिस्सा होता है, जिससे निष्पक्षता प्रभावित होती है।

2. विज्ञान मानने के तर्क (समर्थकों के विचार): अरस्तू, बोदां, हॉब्स, लॉर्ड ब्राइस और गार्नर ने इसे विज्ञान के रूप में स्थापित किया है:
  • क्रमबद्ध ज्ञान ही विज्ञान है: विज्ञान का अर्थ केवल भौतिक प्रयोगशाला नहीं, बल्कि व्यवस्थित, अवलोकित और तर्कसंगत ज्ञान है। राजनीति विज्ञान इस मानदंड को पूरा करता है।
  • अरस्तू का दृष्टिकोण: अरस्तू ने इसे 'सर्वोच्च विज्ञान' (Master Science) कहा क्योंकि यह समाज के नैतिक व सामूहिक उत्थान का पथ प्रशस्त करता है।
  • सजीव सामाजिक प्रयोग: लॉर्ड ब्राइस के अनुसार राज्य का प्रत्येक नया अधिनियम, कर प्रणाली या योजना समाज में चलने वाला एक व्यावहारिक प्रयोग ही है।
  • विश्वसनीय पूर्वानुमान: आधुनिक सांख्यिकी और चुनाव-विश्लेषण के माध्यम से मतदान व्यवहार और जनमत का काफी सटीक अनुमान लगाया जा सकता है।

3. निष्कर्ष: राजनीति विज्ञान भौतिकी की तरह कोई 'यथार्थ भौतिक विज्ञान' नहीं है; यह अर्थशास्त्र की भांति एक प्रगतिशील एवं गतिशील 'सामाजिक विज्ञान' (Social Science) है।
उदाहरण 3
राजनीति विज्ञान के अध्ययन में मार्क्सवादी दृष्टिकोण के प्रमुख तत्वों का विवेचन कीजिए। (अंक: 8)
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा प्रतिपादित मार्क्सवादी दृष्टिकोण पारंपरिक उदारवादी धारणाओं को अस्वीकार करते हुए राजनीति की भौतिकवादी व्याख्या करता है।

1. ऐतिहासिक भौतिकवाद और उपरि-संरचना: मार्क्सवाद के अनुसार समाज का आधार उसकी आर्थिक प्रणाली (उत्पादन के साधन व संबंध) है। राज्य, कानून, राजनीति और विचार इस आर्थिक आधार पर टिकी हुई उपरि-संरचना (Superstructure) मात्र हैं।

2. वर्ग शोषण के साधन के रूप में राज्य:
  • मार्क्सवाद इस बात का खंडन करता है कि राज्य सभी वर्गों के कल्याण की निष्पक्ष संस्था है। इसके अनुसार राज्य का जन्म समाज में निजी संपत्ति और वर्ग विभाजन के फलस्वरूप हुआ।
  • कम्युनिस्ट घोषणापत्र (1848) में स्पष्ट लिखा गया है: "आधुनिक राज्य की कार्यपालिका संपूर्ण पूंजीपति वर्ग के सामान्य मामलों का प्रबंधन करने वाली समिति मात्र है।"
  • राज्य की सेना, पुलिस, न्यायालय और जेल वास्तव में मजदूर वर्ग का दमन करने के संगठित अस्त्र हैं।

3. वर्ग संघर्ष की गतिशीलता: इतिहास में सदैव शोषक और शोषित वर्ग रहे हैं। पूंजीवाद में यह संघर्ष बुर्जुआ (पूंजीपति) और सर्वहारा (श्रमिक) के बीच चरम पर पहुंच जाता है, जो एक अपरिहार्य समाजवादी क्रांति को जन्म देता है।

4. सर्वहारा का अधिनायकत्व और राज्य का विलोपन: क्रांति के पश्चात सर्वहारा वर्ग पूंजीवाद के अवशेषों को समाप्त करने के लिए अस्थायी तानाशाही स्थापित करेगा। जब वर्गहीन साम्यवादी समाज बनेगा और निजी संपत्ति का अंत हो जाएगा, तब किसी वर्ग के दमन की जरूरत नहीं रहेगी। अंततः लेनिन के शब्दों में राज्य का स्वतः ही विलोपन (Withering Away of the State) हो जाएगा।
उदाहरण 4
1948 के यूनेस्को (UNESCO) सम्मेलन द्वारा निर्धारित राजनीति विज्ञान के विषय-क्षेत्र का वर्णन कीजिए। (अंक: 8)
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: सितंबर 1948 में पेरिस में यूनेस्को के तत्वावधान में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति विज्ञान संघ ने विषय-क्षेत्र की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए इसे चार प्रमुख भागों में विभाजित किया:

1. राजनीतिक सिद्धांत (Political Theory):
  • मूलभूत अवधारणाएं: संप्रभुता, स्वतंत्रता, समानता, न्याय, कानून, अधिकार और नागरिकता का दार्शनिक विश्लेषण।
  • राजनीतिक विचारों का इतिहास: प्लेटो, अरस्तू से लेकर मैकियावेली, हॉब्स, लॉक, रूसो, मिल तथा मार्क्स तक के राजनीतिक चिंतन का ऐतिहासिक विकास।

2. राजनीतिक संस्थाएं (Political Institutions):
  • संविधान एवं शासन प्रणालियां: लिखित व अलिखित संविधान, मौलिक अधिकार, एकात्मक व संघात्मक व्यवस्थाएं।
  • सरकार के अंग: कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका के कार्य तथा तुलनात्मक अध्ययन।
  • लोक प्रशासन: नौकरशाही, प्रशासनिक निर्णय और स्थानीय स्वशासन (पंचायत व नगरपालिका)।

3. राजनीतिक दल, समूह एवं जनमत:
  • दलीय व्यवस्था: एकदलीय, द्विदलीय और बहुदलीय प्रणालियां तथा चुनावी प्रक्रियाएं।
  • दबाव समूह: व्यापारिक संगठन, ट्रेड यूनियन, किसान सभाएं आदि जो नीतियों को प्रभावित करते हैं।
  • जनमत एवं मीडिया: समाचार पत्र, सोशल मीडिया और जनसंचार के माध्यम से जनमत निर्माण की प्रक्रिया।

4. अंतर्राष्ट्रीय संबंध (International Relations):
  • अंतर्राष्ट्रीय राजनीति: विदेश नीति का निर्माण, शक्ति संतुलन, कूटनीति और वैश्विक सुरक्षा।
  • अंतर्राष्ट्रीय संगठन एवं कानून: संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की भूमिका।
उदाहरण 5
राजनीति विज्ञान और इतिहास के पारस्परिक संबंधों का विश्लेषण कीजिए। (अंक: 8)
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: राजनीति विज्ञान और इतिहास के मध्य अत्यधिक घनिष्ठ और अन्योन्याश्रित संबंध है।

1. विचारकों के प्रसिद्ध कथन:
  • सर जॉन सीले का कथन: "इतिहास के बिना राजनीति विज्ञान निष्फल है, और राजनीति विज्ञान के बिना इतिहास निराधार है" (History without Political Science has no fruit; Political Science without History has no root)।
  • फ्रीमैन का कथन: "इतिहास बीती हुई राजनीति है, और राजनीति वर्तमान इतिहास है।"

2. राजनीति विज्ञान की इतिहास पर निर्भरता:
  • तथ्यों का भंडार: इतिहास राजनीति विज्ञान को अतीत की व्यवस्थाओं, क्रांतियों और संवैधानिक विकास की कच्ची सामग्री उपलब्ध कराता है।
  • संस्थाओं की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: भारत के संविधान या ब्रिटेन की संसदीय व्यवस्था को उनके ऐतिहासिक विकास के बिना नहीं समझा जा सकता।
  • काल्पनिक सिद्धांतों से बचाव: इतिहास राजनीति विज्ञान को कोरी और अव्यावहारिक कल्पनाओं में भटकने से रोकता है।

3. इतिहास की राजनीति विज्ञान पर निर्भरता: इतिहास केवल युद्धों और तिथियों का शुष्क विवरण बनकर रह जाएगा यदि उसमें राजनीतिक अंतर्दृष्टि न हो। फ्रांसीसी क्रांति या रूसी क्रांति का वास्तविक मूल्यांकन स्वतंत्रता, समानता और संप्रभुता जैसे राजनीतिक सिद्धांतों के माध्यम से ही संभव है।

4. दोनों में मुख्य अंतर: घनिष्ठता के बावजूद इतिहास मुख्य रूप से वर्णनात्मक और कालानुक्रमिक होता है, जबकि राजनीति विज्ञान विश्लेषणात्मक, तुलनात्मक और भविष्योन्मुखी आदर्शवादी शास्त्र है।
उदाहरण 6
डेविड ईस्टन के राजनीतिक व्यवस्था सिद्धांत और हेरोल्ड लासवेल के शक्ति दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिए। (अंक: 8)
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आधुनिक व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान को वैज्ञानिक धरातल पर प्रतिष्ठित करने में डेविड ईस्टन और हेरोल्ड लासवेल का योगदान अद्वितीय है।

1. डेविड ईस्टन का राजनीतिक व्यवस्था सिद्धांत (Systems Theory): 1953 में प्रकाशित पुस्तक 'The Political System' में डेविड ईस्टन ने राजनीति विज्ञान को "समाज के लिए मूल्यों का आधिकारिक आवंटन" (Authoritative Allocation of Values for a Society) के रूप में परिभाषित किया।
  • इनपुट (आगत): सामाजिक पर्यावरण से व्यवस्था में दो चीजें आती हैं—मांगें (जनता की आवश्यकताएं) तथा समर्थन (कानूनों का पालन, कर भुगतान)।
  • रूपांतरण प्रक्रिया (Conversion): शासन तंत्र (ब्लैक बॉक्स) इन मांगों और समर्थन पर विचार करके निर्णय लेता है।
  • आउटपुट (निर्गत): सरकार द्वारा बनाए गए कानून, नीतियां और आदेश आउटपुट कहलाते हैं।
  • पुनर्निवेश (Feedback): नीतियों के क्रियान्वयन से समाज में नए परिवर्तन आते हैं, जो पुनः नई मांगों को जन्म देकर व्यवस्था को गतिशील बनाए रखते हैं।

2. हेरोल्ड लासवेल का शक्ति सिद्धांत: 1936 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'Politics: Who Gets What, When, How' में लासवेल ने राजनीति को शक्ति और संसाधनों के वितरण का विज्ञान बताया।
  • राजनीति समाज में प्रतिष्ठा, सुरक्षा और संपत्ति के निर्धारण की प्रक्रिया है।
  • लासवेल और कपलान के अनुसार, शक्ति राजनीति की केंद्रीय धुरी है। समाज में शक्ति का निर्माण कैसे होता है और उसका प्रयोग कैसे किया जाता है—यही राजनीति विज्ञान की मूल खोज है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

'राजनीति' और 'राजनीति विज्ञान' को एक ही समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

'राजनीति' सत्ता के लिए व्यावहारिक चुनावी संघर्ष और नीति निर्माण की गतिविधि है; जबकि 'राजनीति विज्ञान' इन घटनाओं का क्रमबद्ध और वैज्ञानिक सैद्धांतिक अध्ययन है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि राजनीति विज्ञान या तो पूर्णतः भौतिक विज्ञान है या बिल्कुल भी विज्ञान नहीं है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

राजनीति विज्ञान कोई लैब-आधारित भौतिक विज्ञान नहीं है, किंतु वैज्ञानिक व तार्किक पद्धतियों के प्रयोग के कारण यह एक 'सामाजिक विज्ञान' (Social Science) है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

मार्क्सवादी सिद्धांत में राज्य को एक स्थायी संस्था मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मार्क्सवाद के अनुसार राज्य वर्ग विभाजन की उपज है और वर्गहीन साम्यवादी समाज में यह स्वतः ही समाप्त (लुप्त) हो जाएगा।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

डेविड ईस्टन के व्यवस्था सिद्धांत को पारंपरिक संविधान अध्ययन समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

ईस्टन का सिद्धांत औपचारिक कानूनी संस्थाओं से परे जाकर सामाजिक इनपुट (मांग व समर्थन) और फीडबैक का विश्लेषण करने वाला आधुनिक व्यवहारवादी मॉडल है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

एक अनुशासन के रूप में राजनीति विज्ञान: प्रकृति, क्षेत्र एवं दृष्टिकोण WBCHSE कक्षा 11 • राजनीति विज्ञान के पारंपरिक, आधुनिक एवं मार्क्सवादी दृष्टिकोण तथा वैज्ञानिक स्वरूप 1. उत्पत्ति एवं मूल परिभाषाएं • ग्रीक शब्द 'Polis' (नगर-राज्य) से Politics की उत्पत्ति • अरस्तू: राजनीति विज्ञान के जनक ('सर्वोच्च विज्ञान') • गार्नर: 'राजनीति विज्ञान का आरंभ और अंत राज्य से है' • लासवेल: शक्ति के स्वरूप और बंटवारे का अध्ययन 2. प्रमुख तीन दृष्टिकोण • पारंपरिक: राज्य और सरकार केंद्रित (गार्नर, सीले) • आधुनिक: शक्ति, प्रभाव व व्यवस्था (ईस्टन, डाहल) • मार्क्सवादी: वर्ग संघर्ष और शोषण का साधन (मार्क्स, एंगेल्स) • व्यवहारवाद: तथ्यपरक अध्ययन एवं मूल्य-निरपेक्षता 3. विषय-क्षेत्र (यूनेस्को 1948) • 1. राजनीतिक सिद्धांत एवं चिंतन का इतिहास • 2. राजनीतिक संस्थाएं (संविधान, सरकार, प्रशासन) • 3. राजनीतिक दल, दबाव समूह एवं जनमत • 4. अंतर्राष्ट्रीय संबंध, विदेश नीति एवं संगठन 4. क्या राजनीति विज्ञान एक विज्ञान है? — तार्किक विश्लेषण ★ विज्ञान न मानने के तर्क (मेटलैंड, बकल):

सार्वभौमिक नियमों का अभाव, मानव व्यवहार परिवर्तनशील, प्रयोगशाला में परीक्षण असंभव, शोधकर्ता के व्यक्तिगत पूर्वाग्रह।

★ विज्ञान मानने के तर्क (अरस्तू, हॉब्स, गार्नर):

क्रमबद्ध प्रेक्षण, तुलनात्मक विश्लेषण व व्यवस्थित ज्ञान; यह भौतिक विज्ञान नहीं बल्कि एक प्रगतिशील सामाजिक विज्ञान है।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
अंग्रेजी शब्द 'Politics' की व्युत्पत्ति प्राचीन यूनानी शब्द 'Polis' (नगर-राज्य) से हुई है।
मुख्य बिंदु 2
अरस्तू को राजनीति विज्ञान का जनक कहा जाता है, जिन्होंने इसे 'Master Science' की संज्ञा दी थी।
मुख्य बिंदु 3
प्रोफेसर गार्नर ने पारंपरिक परिभाषा दी: 'राजनीति विज्ञान का आरंभ और अंत राज्य के साथ होता है'।
मुख्य बिंदु 4
पारंपरिक दृष्टिकोण मुख्य रूप से ऐतिहासिक, दार्शनिक तथा औपचारिक राज्य व सरकार की संस्थाओं पर केंद्रित था।
मुख्य बिंदु 5
व्यवहारवादी क्रांति के बाद आधुनिक दृष्टिकोण ने शक्ति, प्रभाव, राजनीतिक व्यवस्था और मानवीय व्यवहार को केंद्र में रखा।
मुख्य बिंदु 6
डेविड ईस्टन ने राजनीति विज्ञान को 'समाज के लिए मूल्यों का आधिकारिक आवंटन' के रूप में परिभाषित किया।
मुख्य बिंदु 7
हेरोल्ड लासवेल के अनुसार राजनीति का अर्थ है 'किसे क्या, कब और कैसे मिलता है' तथा शक्ति का निर्माण व विभाजन।
मुख्य बिंदु 8
मार्क्सवादी दृष्टिकोण में राज्य वर्ग शोषण का एक यंत्र है, जो वर्गहीन साम्यवादी समाज में स्वतः लुप्त हो जाएगा।
मुख्य बिंदु 9
मेटलैंड जैसे विचारकों ने इसे विज्ञान नहीं माना, किंतु सुव्यवस्थित ज्ञान होने के कारण यह एक गतिशील सामाजिक विज्ञान है।
मुख्य बिंदु 10
1948 के पेरिस यूनेस्को सम्मेलन ने इसके विषय-क्षेत्र को सिद्धांत, संस्थाएं, दल/जनमत और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में बांटा।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
"मनुष्य स्वभाव से ही एक राजनीतिक प्राणी है" — यह प्रसिद्ध कथन किसका है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: प्राचीन यूनानी दार्शनिक अरस्तू का, उनकी अमर कृति 'पॉलिटिक्स' में।
2
डेविड ईस्टन के अनुसार राजनीतिक व्यवस्था का मुख्य कार्य क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: समाज के लिए मूल्यों का आधिकारिक आवंटन (Authoritative allocation of values) करना।
3
यूनेस्को द्वारा 1948 में राजनीति विज्ञान के कौन-से चार क्षेत्र तय किए गए थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
  1. राजनीतिक सिद्धांत; 2. राजनीतिक संस्थाएं; 3. दल, दबाव समूह व जनमत; 4. अंतर्राष्ट्रीय संबंध।

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