Follow Us
माध्यम चुनें / Select Medium:
Eng (English) Beng (বাংলা) Hindi (हिन्दी)
WBB • कक्षा XI • Political Science • अध्याय 11
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

मौলিক अधिकार

भारतीय संविधान के भाग III (अनुच्छेद 12 से 35) में समाविष्ट मौलिक अधिकार भारतीय संवैधानिक लोकतंत्र की आधारशिला हैं तथा इन्हें यथोचित रूप से 'भारत का मैग्ना कार्टा' (Magna Carta of India) कहा जाता है। अमेरिकी संविधान के बिल ऑफ राइट्स तथा भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान आदर्शों से प्रेरित ये अधिकार राज्य की किसी भी मनमानी या निरंकुश कार्यवाही के विरुद्ध प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मानवीय गरिमा और सामाजिक समानता की संवैधानिक गारंटी प्रदान करते हैं। मूल संविधान में कुल सात मौलिक अधिकार थे, किंतु 1978 के 44वें संविधान संशोधन द्वारा संपत्ति के अधिकार को हटा दिए जाने के उपरांत अब भारतीय नागरिकों को छह वर्गों में मौलिक अधिकार प्राप्त हैं: समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी अधिकार, तथा संवैधानिक उपचारों का अधिकार। संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत, जिसे डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने 'संविधान की आत्मा और उसका हृदय' कहा था, ये अधिकार न्यायालय द्वारा प्रत्यक्ष रूप से प्रवर्तनीय हैं तथा सर्वोच्च न्यायालय इनके उल्लंघन पर पांच संवैधानिक रिट जारी करता है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

मौलिक अधिकारों का विस्तृत अध्ययन राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए अत्यंत अनिवार्य है क्योंकि यह लोकतंत्र में नागरिक स्वाधीनता, मानवाधिकारों और विधि के शासन के संस्थागत स्वरूप को स्पष्ट करता है। इससे विद्यार्थी यह समझ पाते हैं कि किस प्रकार संविधान केवल बहुमत के शासन तक सीमित न रहकर अल्पसंख्यकों, वंचित वर्गों और प्रत्येक व्यक्ति की अंतर्निहित गरिमा का संरक्षण करता है। मेनका गांधी मामले (1978) के बाद अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का व्यापक विस्तार, निजता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार तथा अनु. 32 व 226 के अंतर्गत न्यायिक उपचारों की समझ नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति सजग व निर्भीक बनाती है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. मौलिक अधिकारों की दार्शनिक पृष्ठ...
2 2. समानता का अधिकार: अनुच्छेद 14 से...
3 3. स्वतंत्रता का अधिकार: अनुच्छेद 1...
4 4. शोषण के विरुद्ध अधिकार एवं धार्म...
5 5. संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी अधिका...
6 6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार: अनु...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. मौलिक अधिकारों की दार्शनिक पृष्ठभूमि एवं 'राज्य' की परिभाषा (अनुच्छेद 12-13)

मैग्ना कार्टा से भारतीय संविधान: अधिकारों का उद्भव एवं न्यायिक संरक्षण

भारतीय संविधान के भाग III (अनुच्छेद 12–35) में मौलिक अधिकारों का समावेश इंग्लैंड के मैग्ना कार्टा (1215), फ्रांसीसी क्रांति के मानव एवं नागरिक अधिकारों के घोषणापत्र (1789), अमेरिकी संविधान के बिल ऑफ राइट्स (1791) तथा संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (UDHR, 1948) से प्रेरित है। भारत में 1928 की नेहरू रिपोर्ट तथा 1931 के कराची कांग्रेस अधिवेशन में मौलिक अधिकारों को स्वतंत्र भारत के संविधान में शामिल करने का दृढ़ संकल्प लिया गया था।

अनुच्छेद 12 एवं 13 का संवैधानिक महत्व:
  • अनुच्छेद 12 ('राज्य' की परिभाषा): यह निर्धारित करता है कि मौलिक अधिकार किसके विरुद्ध लागू होंगे। इसमें शामिल हैं: (1) भारत सरकार एवं संसद, (2) राज्य सरकारें एवं राज्य विधानमंडल, (3) सभी स्थानीय प्राधिकारी (नगरपालिकाएं, पंचायतें, जिला बोर्ड), तथा (4) भारत के नियंत्रण में अन्य सभी वैधानिक निकाय (जैसे LIC, ONGC, SAIL आदि)।
  • अनुच्छेद 13 (मूल अधिकारों से असंगत विधियां शून्य): यह न्यायपालिका के न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) का मुख्य आधार है। अनुच्छेद 13(1) के तहत संविधान पूर्व की वे सभी विधियां उस मात्रा तक शून्य होंगी जिस तक वे मूल अधिकारों का उल्लंघन करती हैं (आच्छादन का सिद्धांत - Doctrine of Eclipse)। अनुच्छेद 13(2) राज्य को ऐसा कोई कानून बनाने से रोकता है जो मूल अधिकारों को छीनता या कम करता है (पृथक्करणीयता का सिद्धांत - Doctrine of Severability)।
  • मूल संरचना का सिद्धांत (केशवानंद भारती मामला, 1973): सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी कि संसद अनुच्छेद 368 के तहत मूल अधिकारों में संशोधन कर सकती है, परंतु वह संविधान के 'मूल ढांचे' (Basic Structure) को नष्ट नहीं कर सकती।

2. समानता का अधिकार: अनुच्छेद 14 से 18

विधि का शासन, सामाजिक समता एवं विशेषाधिकारों का अंत

समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14–18) लोकतांत्रिक गणराज्य की आत्मा है, जो किसी भी नागरिक के साथ जन्म, जाति या कुल के आधार पर भेदभाव को अस्वीकार करता है।

अनुच्छेदसंवैधानिक प्रावधान एवं व्याख्या
अनुच्छेद 14विधि के समक्ष समता एवं विधियों का समान संरक्षण: ब्रिटेन से ली गई 'विधि के समक्ष समता' एक नकारात्मक अवधारणा है (किसी को विशेषाधिकार नहीं)। अमेरिका से लिया गया 'विधियों का समान संरक्षण' एक सकारात्मक अवधारणा है (समान परिस्थितियों में समान व्यवहार)। इसमें सुबोध वर्गीकरण (Reasonable Classification) की अनुमति है।
अनुच्छेद 15धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध: राज्य केवल इन पांच आधारों पर किसी नागरिक से भेदभाव नहीं करेगा। तथापि, महिलाओं, बच्चों, अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST) एवं पिछड़े वर्गों के उत्थान हेतु विशेष प्रावधान बनाने की छूट है।
अनुच्छेद 16लोक नियोजन में अवसर की समता: राज्य के अधीन पदों पर नियुक्ति में सभी नागरिकों को समान अवसर प्राप्त होंगे। पिछड़े वर्गों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व हेतु आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान इसी अनुच्छेद के तहत अनुमन्य है।
अनुच्छेद 17अस्पृश्यता का अंत: अस्पृश्यता (छुआछूत) का किसी भी रूप में आचरण पूर्णतः निषिद्ध एवं दंडनीय अपराध घोषित किया गया है। यह एक निरपेक्ष अधिकार है जिसे नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम (1955) के तहत दंडनीय बनाया गया है।
अनुच्छेद 18उपाधियों का अंत: सेना एवं विद्या संबंधी सम्मान को छोड़कर राज्य किसी भी व्यक्ति को कोई सामंती उपाधि (जैसे रायबहादुर, सर) प्रदान नहीं करेगा। भारत रत्न या पद्म पुरस्कार उपाधि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अलंकरण हैं।

3. स्वतंत्रता का अधिकार: अनुच्छेद 19 से 22

छह बुनियादी नागरिक स्वतंत्रताएं, जीवन का अधिकार एवं स्वर्णिम त्रिभुज

स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19–22) स्वतंत्र नागरिक समाज की संजीवनी है। अनुच्छेद 19(1) भारतीय नागरिकों को छह आधारभूत स्वतंत्रताएं प्रदान करता है:

  • 19(1)(क): वाक्-स्वतंत्रता एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (प्रेस की स्वतंत्रता एवं सूचना का अधिकार इसी में अंतर्निहित)।
  • 19(1)(ख): शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के सम्मेलन की स्वतंत्रता।
  • 19(1)(ग): संगम, संघ या सहकारी समितियां बनाने की स्वतंत्रता (97वां संशोधन 2011)।
  • 19(1)(घ): भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण (घूमने) की स्वतंत्रता।
  • 19(1)(ङ): भारत के किसी भी भाग में निवास करने और बस जाने की स्वतंत्रता।
  • 19(1)(छ): कोई भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता। [19(1)(च) संपत्ति की स्वतंत्रता समाप्त]।
अनुच्छेद 20, 21, 21क एवं 22 का सुरक्षा कवच:
  • अनुच्छेद 20: अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में तीन प्रकार का संरक्षण: (1) कार्योत्तर विधियों से संरक्षण (No ex-post facto law), (2) दोहरे दंड से संरक्षण (Double Jeopardy), (3) अपने विरुद्ध गवाही देने के लिए बाध्य करने से संरक्षण (Self-Incrimination)।
  • अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता): 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा।' ऐतिहासिक मेनका गांधी मामले (1978) में न्यायालय ने निर्णय दिया कि प्रक्रिया 'न्यायपूर्ण, निष्पक्ष और उचित' (Just, fair, and reasonable) होनी चाहिए। अनु. 14, 19 व 21 मिलकर अधिकारों का 'स्वर्णिम त्रिभुज' (Golden Triangle) बनाते हैं। अनु. 21 में निजता का अधिकार, स्वच्छ पर्यावरण, आजीविका और गरिमापूर्ण जीवन शामिल हैं।
  • अनुच्छेद 21क (शिक्षा का अधिकार): 86वें संविधान संशोधन अधिनियम (2002) द्वारा 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों हेतु निःशुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया।
  • अनुच्छेद 22: गिरफ्तारी के कारणों को जानने, वकील से परामर्श करने और 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने का अधिकार। इसके अतिरिक्त निवारक निरोध (Preventive Detention) के तहत बिना मुकदमे अधिकतम 3 माह तक हिरासत के नियम तय किए गए हैं।

4. शोषण के विरुद्ध अधिकार एवं धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 23-28)

मानवीय गरिमा की रक्षा एवं भारतीय पंथनिरपेक्षता के आधार स्तंभ

शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23–24): असहाय और कमजोर वर्गों के शारीरिक एवं आर्थिक शोषण पर पूर्ण रोक लगाता है:

  • अनुच्छेद 23: मानव दुर्व्यापार (मनुष्यों की खरीद-बिक्री), बेगार (बिना पारिश्रमिक के जबरन काम) तथा बंधुआ मजदूरी को दंडनीय अपराध घोषित करता है।
  • अनुच्छेद 24: 14 वर्ष से कम आयु के किसी भी बालक को कारखानों, खानों या अन्य जोखिम भरे कार्यों में नियोजित करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है।

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25–28): भारत को एक सच्चा पंथनिरपेक्ष राष्ट्र बनाता है, जहां राज्य का कोई राजधर्म नहीं है और सभी धर्मों को समान सम्मान प्राप्त है:

अनुच्छेदधार्मिक स्वाधीनता का दायरा एवं नियम
अनुच्छेद 25अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा किसी भी धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता। जबरन धर्मांतरण निषिद्ध है तथा यह लोक-व्यवस्था, सदाचार एवं स्वास्थ्य के अधीन है।
अनुच्छेद 26धार्मिक संप्रदायों को धार्मिक एवं परोपकारी संस्थाओं की स्थापना, अपने धार्मिक कार्यों का प्रबंधन तथा संपत्ति अर्जन व प्रशासन का अधिकार।
अनुच्छेद 27किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि हेतु कर संदाय की स्वतंत्रता। राज्य जनता से एकत्र करों के धन का उपयोग किसी विशेष धर्म के पोषण में नहीं कर सकता।
अनुच्छेद 28पूर्णतः राज्य-निधि से पोषित शिक्षण संस्थानों में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी। राज्य से सहायता प्राप्त संस्थानों में धार्मिक शिक्षा में उपस्थिति स्वैच्छिक होगी।

5. संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी अधिकार तथा संपत्ति के अधिकार का विलोपन

अल्पसंख्यक अधिकारों का संरक्षण एवं 44वां संविधान संशोधन

भारत की समृद्ध बहुलतावादी संस्कृति में भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करने हेतु अनुच्छेद 29 एवं 30 विशेष अधिकार देते हैं:

अल्पसंख्यक हितों का संरक्षण:
  • अनुच्छेद 29 (अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण): भारत के किसी भी भाग में रहने वाले नागरिकों को अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार है। राज्य द्वारा वित्तपोषित शिक्षण संस्थानों में केवल धर्म, मूलवंश, जाति या भाषा के आधार पर प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता।
  • अनुच्छेद 30 (शिक्षण संस्थाओं की स्थापना एवं प्रशासन का अधिकार): सभी धार्मिक एवं भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी रुचि की शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का मौलिक अधिकार है। सहायता देते समय राज्य अल्पसंख्यक प्रबंधन के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।

संपत्ति के अधिकार की स्थिति: मूल संविधान में अनुच्छेद 19(1)(च) एवं अनुच्छेद 31 के तहत संपत्ति का अधिकार एक मौलिक अधिकार था। किंतु जमींदारी उन्मूलन, भूमि सुधार और समाजवादी कल्याणकारी नीतियों के क्रियान्वयन में संपत्ति का अधिकार बार-बार रुकावट बनता रहा। अतः 1978 में 44वें संविधान संशोधन द्वारा संपत्ति के अधिकार को भाग III से समाप्त कर दिया गया और संविधान के भाग XII में अनुच्छेद 300क (Article 300A) के तहत एक साधारण विधिक (कानूनी) अधिकार बना दिया गया। अब विधि के प्राधिकार के बिना किसी को संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता, परंतु इसके लिए अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सर्वोच्च न्यायालय में रिट दायर नहीं की जा सकती।

6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार: अनुच्छेद 32 एवं पांच रिट

संविधान का हृदय एवं आत्मा: न्यायपालिका द्वारा जारी की जाने वाली पांच रिट

बिना न्यायिक उपचारों के अधिकार केवल कागजी घोषणा बनकर रह जाते हैं। अनुच्छेद 32 मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है। संविधान सभा में डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने कहा था: 'यदि मुझसे कोई पूछे कि संविधान का कौन सा अनुच्छेद सर्वाधिक महत्वपूर्ण है जिसके बिना यह संविधान शून्य हो जाएगा, तो मैं इस अनुच्छेद 32 के अतिरिक्त किसी अन्य अनुच्छेद का नाम नहीं ले सकता। यह संविधान की आत्मा और उसका हृदय है।'

रिट (Writ) का नामशाब्दिक अर्थ एवं कानूनी उपयोग
1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)'शरीर को प्रस्तुत किया जाए': अवैध रूप से बंदी बनाए गए व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष पेश करने का आदेश। यदि हिरासत गैर-कानूनी पाई जाती है तो न्यायालय तुरंत रिहाई का आदेश देता है।
2. परमादेश (Mandamus)'हम आदेश देते हैं': किसी लोक प्राधिकारी या संस्था को अपने विधिक सार्वजनिक कर्तव्य का पालन करने का न्यायिक आदेश, जिसे उसने करने से मना कर दिया हो।
3. प्रतिषेध (Prohibition)'मना करना या रोकना': उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालय को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्यवाही करने से रोकने के लिए जारी किया गया स्थगनादेश।
4. उत्प्रेषण (Certiorari)'पूर्णतया सूचित होना': अधीनस्थ न्यायालय या अधिकरण द्वारा अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन कर दिए गए निर्णय को निरस्त (Quash) करने तथा वाद को अपने पास मंगाने हेतु जारी आदेश।
5. अधिकार पृच्छा (Quo-Warranto)'किस अधिकार से': किसी व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक पद को अवैध रूप से धारण करने पर उसके दावे की वैधता की जांच हेतु जारी रिट। अपात्र पाए जाने पर उसे पदमुक्त किया जाता है।

क्षेत्राधिकार की तुलना: सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 32 के तहत केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु रिट जारी कर सकता है; जबकि अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के साथ-साथ अन्य कानूनी अधिकारों के उल्लंघन पर भी रिट जारी कर सकता है।

महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक सिद्धांत एवं कालक्रम

विधि के शासन का समीकरण (अनुच्छेद 14)
समानता का अधिकार = विधि के समक्ष समता (ब्रिटिश नकारात्मक) + विधियों का समान संरक्षण (अमेरिकी सकारात्मक)
स्वर्णिम त्रिभुज का सूत्र (Golden Triangle)
दैहिक स्वाधीनता = अनुच्छेद 14 (समता) + अनुच्छेद 19 (स्वतंत्रता) + अनुच्छेद 21 (न्यायसंगत जीवन का अधिकार)
संवैधानिक उपचारों का सूत्र (अनुच्छेद 32)
अधिकारों का प्रवर्तन = सीधे उच्चतम न्यायालय का द्वार + 5 संवैधानिक रिट (बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण, अधिकार पृच्छा)

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी की जाने वाली पांच प्रमुख रिटों का वर्णन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु निम्नलिखित पांच रिट जारी कर सकता है:

  1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus): इसका शाब्दिक अर्थ है 'शरीर को प्रस्तुत किया जाए'। यह रिट किसी व्यक्ति को गैर-कानूनी या अनुचित रूप से बंदी बनाए जाने पर जारी की जाती है। यदि हिरासत अवैध पाई जाती है तो न्यायालय बंदी को तत्काल रिहा करने का आदेश देता है।

  2. परमादेश (Mandamus): इसका शाब्दिक अर्थ है 'हम आदेश देते हैं'। यह रिट किसी लोक अधिकारी, अधीनस्थ न्यायालय या निगम को उसके वैधानिक सार्वजनिक कर्तव्य का पालन करने के लिए बाध्य करने हेतु जारी की जाती है।

  3. प्रतिषेध (Prohibition): इसका शाब्दिक अर्थ है 'रोकना'। यह उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किसी अधीनस्थ न्यायालय या अर्ध-न्यायिक अधिकरण को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर सुनवाई करने से रोकने हेतु जारी किया जाने वाला स्थगनादेश है।

  4. उत्प्रेषण (Certiorari): इसका शाब्दिक अर्थ है 'पूर्णतया प्रमाणित होना'। यह रिट अधीनस्थ न्यायालय द्वारा अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन कर दिए गए त्रुटिपूर्ण निर्णय को निरस्त करने तथा मामले को उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने हेतु जारी की जाती है।

  5. अधिकार पृच्छा (Quo-Warranto): इसका शाब्दिक अर्थ है 'किस अधिकार से'। यह रिट किसी व्यक्ति द्वारा किसी सार्वजनिक पद को अवैध रूप से धारण करने पर उसके दावे की वैधानिकता की जांच करने हेतु जारी की जाती है।

उदाहरण 2
प्रश्न 2: मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) वाद का अनुच्छेद 21 के संदर्भ में क्या महत्व है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

मेनका गांधी मामला (1978) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 की न्यायिक व्याख्या में एक युगांतकारी मोड़ था:

  1. विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया से विधि की उचित प्रक्रिया की ओर: 1950 के ए.के. गोपालन मामले में न्यायालय का मानना था कि संसद द्वारा बनाया गया कोई भी कानून चाहे कितना भी कठोर हो, जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता छीन सकता है। मेनका गांधी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इस संकीर्ण दृष्टिकोण को पलटते हुए निर्णय दिया कि प्रक्रिया केवल कानूनी नहीं, बल्कि 'न्यायपूर्ण, निष्पक्ष और तार्किक' (Just, fair, and reasonable) होनी चाहिए, जो अमेरिकी 'Due Process of Law' के समतुल्य है।

  2. स्वर्णिम त्रिभुज का सिद्धांत: न्यायालय ने प्रतिपादित किया कि अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 19 (स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन) परस्पर जुड़े हुए हैं। व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित करने वाले किसी भी कानून को अनुच्छेद 14 और 19 की कसौटी पर भी खरा उतरना होगा।

  3. अधिकारों का व्यापक विस्तार: इस निर्णय ने अनुच्छेद 21 को मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार, निजता का अधिकार, स्वच्छ पर्यावरण, त्वरित विचारण तथा निःशुल्क कानूनी सहायता का सुरक्षा कवच बना दिया।

उदाहरण 3
प्रश्न 3: अनुच्छेद 14 में उल्लिखित 'विधि के समक्ष समता' तथा 'विधियों के समान संरक्षण' में क्या अंतर है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

अनुच्छेद 14 में प्रयुक्त दोनों अवधारणाओं में बुनियादी अंतर निम्नलिखित है:

  1. विधि के समक्ष समता (Equality before the Law):
  • स्रोत: यह ब्रिटिश सामान्य विधि (डायसी के विधि के शासन) से प्रेरित है।
  • प्रकृति: यह एक नकारात्मक अवधारणा है। इसका अर्थ है कि किसी भी व्यक्ति को जन्म, धन या पद के आधार पर कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं होगा तथा सभी व्यक्ति देश के सामान्य न्यायालयों के सामान्य कानून के अधीन होंगे।
  1. विधियों का समान संरक्षण (Equal Protection of the Laws):
  • स्रोत: यह अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन से लिया गया है।
  • प्रकृति: यह एक सकारात्मक अवधारणा है। इसका तात्पर्य है कि समान परिस्थितियों वाले व्यक्तियों के साथ विधि द्वारा समान व्यवहार किया जाएगा। असमान व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार करना अन्याय होगा, अतः राज्य वंचित वर्गों के उत्थान हेतु 'युक्तियुक्त वर्गीकरण' (Reasonable Classification) कर सकता है।
उदाहरण 4
प्रश्न 4: भारत में संपत्ति के अधिकार की वर्तमान संवैधानिक स्थिति की विवेचना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

संपत्ति के अधिकार की संवैधानिक स्थिति में ऐतिहासिक परिवर्तन आया है:

  1. मूल संवैधानिक स्थिति (1950-1978): मूल संविधान में अनुच्छेद 19(1)(च) (संपत्ति अर्जन, धारण व व्ययन की स्वतंत्रता) तथा अनुच्छेद 31 (राज्य द्वारा अनिवार्य अधिग्रहण पर क्षतिपूर्ति) के तहत संपत्ति का अधिकार एक मौलिक अधिकार था।

  2. विकास में बाधा: स्वतंत्रता के बाद जमींदारी उन्मूलन, भूमि सुधार और बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसे समाजवादी कदमों को भूस्वामियों ने संपत्ति के मौलिक अधिकार की आड़ में न्यायालय में चुनौती दी, जिससे संसद और न्यायपालिका में टकराव हुआ।

  3. 44वां संविधान संशोधन, 1978: जनता पार्टी सरकार द्वारा 44वें संशोधन के जरिए संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों (भाग III) से पूर्णतः समाप्त कर दिया गया।

  4. वर्तमान स्थिति: संपत्ति का अधिकार अब संविधान के भाग XII में अनुच्छेद 300क (Article 300A) के अंतर्गत केवल एक सामान्य विधिक (कानूनी) अधिकार है। राज्य किसी व्यक्ति की संपत्ति विधि के प्राधिकार से ही ले सकता है, परंतु नागरिक इसके लिए अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल नहीं कर सकते।

उदाहरण 5
प्रश्न 5: अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा तथा इसके युक्तियुक्त निर्बंधन क्या हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

अनुच्छेद 19(1)(क) प्रत्येक नागरिक को विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता देता है:

  1. दायरा: इसमें शब्दों, लेख, मुद्रण, चित्रों अथवा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से विचारों को अभिव्यक्त करने का अधिकार शामिल है। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार प्रेस की स्वतंत्रता, सूचना का अधिकार (RTI), चुप रहने का अधिकार और प्रसारण का अधिकार इसी में अंतर्निहित हैं।

  2. अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत युक्तियुक्त निर्बंधन: यह अधिकार असीमित नहीं है। संसद निम्नलिखित 8 आधारों पर इस पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकती है: (क) भारत की संप्रभुता और अखंडता, (ख) राज्य की सुरक्षा, (ग) विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, (घ) लोक-व्यवस्था (शांति), (ङ) शिष्टाचार या सदाचार, (च) न्यायालय का अवमान, (छ) मानहानि, (ज) किसी अपराध के लिए उकसाना।

उदाहरण 6
प्रश्न 6: मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 32) तथा उच्च न्यायालय (अनुच्छेद 226) के रिट क्षेत्राधिकार की तुलना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के रिट क्षेत्राधिकार की तुलना निम्नलिखित है:

  1. अधिकारों का दायरा: सर्वोच्च न्यायालय केवल भाग III में दिए गए मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु अनुच्छेद 32 के तहत रिट जारी कर सकता है। जबकि उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के तहत मौलिक अधिकारों के साथ-साथ 'किसी अन्य प्रयोजन' (सामान्य कानूनी अधिकारों) के लिए भी रिट जारी कर सकता है। अतः उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार अधिक व्यापक है।

  2. क्षेत्रीय सीमाएं: सर्वोच्च न्यायालय पूरे भारत के राज्यक्षेत्र में रिट जारी कर सकता है। उच्च न्यायालय केवल अपने संबंधित राज्य के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र में ही रिट जारी कर सकता है।

  3. उपचार की प्रकृति: अनुच्छेद 32 स्वयं एक मौलिक अधिकार है, अतः सर्वोच्च न्यायालय याचिका पर सुनवाई से मना नहीं कर सकता। अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालय की विवेकाधीन शक्ति है; यदि कोई उपयुक्त वैकल्पिक विधिक उपाय उपलब्ध है तो उच्च न्यायालय रिट देने से इनकार कर सकता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि मौलिक अधिकार निरपेक्ष (Absolute) हैं और राज्य इन पर कभी रोक नहीं लगा सकता।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मौलिक अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं। संविधान स्वयं देश की सुरक्षा, संप्रभुता, लोक-व्यवस्था और नैतिकता के हित में इन पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगाने की शक्ति राज्य को देता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि संपत्ति का अधिकार अभी भी एक मौलिक अधिकार है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

संपत्ति का अधिकार 1978 में 44वें संविधान संशोधन द्वारा मौलिक अधिकारों से हटा दिया गया और अब यह अनुच्छेद 300क के तहत मात्र एक विधिक (कानूनी) अधिकार है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि सर्वोच्च न्यायालय की रिट जारी करने की शक्ति उच्च न्यायालयों से अधिक व्यापक है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वास्तव में रिट क्षेत्राधिकार के मामले में उच्च न्यायालय (अनुच्छेद 226) का दायरा सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 32) से बड़ा है, क्योंकि उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के अलावा सामान्य विधिक अधिकारों के लिए भी रिट जारी कर सकता है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

भाग III • अनुच्छेद 12-35 भारतीय संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकार नागरिक स्वाधीनता के 6 आधारभूत स्तंभ एवं संवैधानिक उपचारों की छत्रछाया = 1. समानता का अधिकार अनुच्छेद 14 - 18 विधि के समक्ष समता, भेदभाव का निषेध एव ं उपाधियों का अंत ★ 2. स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 19 - 22 6 लोकतांत्रिक स्वतंत्रताएं, प्राण व दैहिक स्वतंत्रता (अनु. 21) 🛡 3. शोषण के विरुद्ध अधिकार अनुच्छेद 23 - 24 मानव दुर्व्यापार, बेगार एवं बाल श्रम का पूर्ण प्रतिषेध ☸ 4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 25 - 28 अंतःकरण की स्वतंत्रता, धर्म आचरण, प् रचार व पंथनिरपेक्षता 📖 5. संस्कृति व शिक्षा का अधिकार अनुच्छेद 29 - 30 अल्पसंख्यकों की भाषा, लिपि तथा शिक्ष ण संस्थान स्थापना ⚖ 6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार अनुच्छेद 32 (संविधान की आत्मा) सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मूल अधिकारो ं की रक्षा हेतु 5 रिट अनुच्छेद 32 एवं 226 के अंतर्गत 5 प्रमुख संवैधानिक रिट (Writs): बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) परमादेश (Mandamus) प्रतिषेध (Prohibition) उत्प्रेषण (Certiorari) अधिकार पृच्छा (Quo-Warranto)

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. भारतीय संविधान के भाग III (अनुच्छेद 12 से 35) में मौलिक अधिकार वर्णित हैं, जिसे भारत का मैग्ना कार्टा कहा जाता है।
मुख्य बिंदु 2
  1. अनुच्छेद 12 'राज्य' की विस्तृत परिभाषा देता है, जिसके विरुद्ध मौलिक अधिकार न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय हैं।
मुख्य बिंदु 3
  1. अनुच्छेद 13 न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति देता है और मूल अधिकारों के विरुद्ध बनाए गए किसी भी कानून को अवैध घोषित करता है।
मुख्य बिंदु 4
  1. समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14–18) विधि के समक्ष समता, भेदभाव का निषेध, लोक नियोजन में अवसर की समता, अस्पृश्यता का अंत तथा उपाधियों का उन्मूलन करता है।
मुख्य बिंदु 5
  1. अनुच्छेद 19(1) नागरिकों को वाक्-स्वातंत्र्य, शांतिपूर्ण सम्मेलन, संघ निर्माण, संचरण, निवास तथा व्यापार की 6 स्वतंत्रताएं प्रदान करता है।
मुख्य बिंदु 6
  1. अनुच्छेद 21 प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है; मेनका गांधी मामले (1978) में इसे निष्पक्ष, उचित व न्यायसंगत कानूनी प्रक्रिया से जोड़ा गया।
मुख्य बिंदु 7
  1. 86वें संशोधन (2002) द्वारा अनुच्छेद 21क जोड़कर 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया।
मुख्य बिंदु 8
  1. अनुच्छेद 23 एवं 24 मानव दुर्व्यापार, बंधुआ मजदूरी तथा 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के जोखिम भरे कार्यों में नियोजन पर पूर्ण रोक लगाते हैं।
मुख्य बिंदु 9
  1. 44वें संशोधन (1978) द्वारा संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटाकर अनुच्छेद 300क के तहत विधिक अधिकार बना दिया गया।
मुख्य बिंदु 10
  1. अनुच्छेद 32 संविधान की 'आत्मा और हृदय' है, जिसके तहत सर्वोच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों की रक्षा हेतु 5 रिट (बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण, अधिकार पृच्छा) जारी करता है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
2
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
5
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

ऑनलाइन CBT टेस्ट देकर तैयारी का मूल्यांकन करें

झारखण्ड बोर्ड परीक्षा पैटर्न पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्नों का ऑनलाइन टेस्ट दें। तुरंत परिणाम, समय विश्लेषण और प्रत्येक प्रश्न का विस्तृत हल प्राप्त करें।

AI अध्ययन मित्र

त्वरित शंका समाधान

मौলিক अधिकार में कोई संदेह या प्रश्न है? हमारे AI अध्ययन मित्र से तुरंत समझें।