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WBB • कक्षा XI • Geography • अध्याय 17
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

भारत के वन एवं प्राकृतिक वनस्पति

भारत की प्राकृतिक वनस्पति और वन संपदा देश के पारिस्थितिक संतुलन, जलवायु नियमन और समृद्ध जैव विविधता की आधारशिला हैं। मनुष्य के किसी प्रत्यक्ष या परोक्ष हस्तक्षेप के बिना प्राकृतिक रूप से उगने और दीर्घकाल तक अक्षुण्ण रहने वाले पादप समुदाय को प्राकृतिक अथवा अक्षत वनस्पति (Virgin Vegetation) कहा जाता है। प्रख्यात वनस्पति वैज्ञानिक हैरी चैंपियन और एस. के. सेठ (1968) के मानक वैज्ञानिक वर्गीकरण के अनुसार भारत के वनों को पांच प्रमुख पारिस्थितिक समूहों में बांटा गया है: अत्यधिक वर्षा वाले पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर के उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन; देश में सर्वाधिक विस्तृत मानसूनी पर्णपाती वन (साल और सागौन बाहुल्य आर्द्र व शुष्क पर्णपाती); उत्तर-पश्चिम के शुष्क भागों के उष्णकटिबंधीय कंटीले वन व मरुस्थलीय झाड़ियां; हिमालय की तुंगता-आधारित पर्वतीय वनस्पति (ओक, चीड़, देवदार और अल्पाइन चरागाह); तथा तटीय ज्वारभाटा-प्लावित डेल्टाई क्षेत्रों के ज्वारीय अथवा मैंग्रोव वन (सुंदरबन)। भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI, देहरादून) की द्विवार्षिक रिपोर्ट (ISFR) के अनुसार देश का कुल वनावरण 21.71% (वृक्षावरण सहित 24.62%) है, जो राष्ट्रीय वन नीति (1988) के 33% के मानक लक्ष्य से कम है। पश्चिम बंगाल में उत्तरी डूआर्स के साल वन, पश्चिमी राढ़ पठार के शुष्क पर्णपाती वन तथा दक्षिण के विश्वप्रसिद्ध सुंदरबन मैंग्रोव विशिष्ट हैं। वर्ष 1971 में मेदिनीपुर के अराबाड़ी में डॉ. ए. के. बनर्जी द्वारा शुरू किया गया संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) तथा चिपको व अप्पिको जैसे जन आंदोलन आधुनिक समुदाय-आधारित वन संरक्षण के वैश्विक मार्गदर्शक हैं।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

भारत की समग्र पर्यावरणीय सुरक्षा, जल चक्र के नियमन, मृदा अपरदन की रोकथाम और जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों को कम करने में वन पारिस्थितिकी तंत्र का योगदान अद्वितीय है। भारतीय वन 7.2 अरब टन से अधिक कार्बन संचित (Carbon Stock) कर वैश्विक तापन को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण सिंक का कार्य करते हैं। आर्थिक दृष्टि से करोड़ों आदिवासी और वनवासी समुदाय अपनी आजीविका के लिए गैर-काष्ठ वनोत्पाद या NTFP (जैसे तेंदू पत्ता, साल पत्ता, महुआ के फूल, लाख, राल, जड़ी-बूटियां और शहद) के संग्रह पर निर्भर हैं। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में बंगाल की खाड़ी के विनाशकारी चक्रवातों (अम्फान, यास, रेमल) से तटीय आबादी की रक्षा करने में सुंदरबन के मैंग्रोव प्राकृतिक रक्षा दीवार का काम करते हैं, जो समुद्री लहरों की 60-70% ऊर्जा को अवशोषित कर लेते हैं। वनों का संरक्षण और सतत प्रबंधन संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDG 13 और 15) की प्राप्ति के लिए अत्यंत आवश्यक है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 प्राकृतिक वनस्पति की संकल्पना, नियं...
2 भारत के प्रमुख वन प्रकार: चैंपियन ए...
3 विशिष्ट बायोम: पर्वतीय वनस्पति एवं...
4 वनावरण, वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) एव...
5 पश्चिम बंगाल का वन भूगोल: डूआर्स, र...
6 वन संरक्षण, जन आंदोलन एवं अराबाड़ी...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

प्राकृतिक वनस्पति की संकल्पना, नियंत्रक कारक एवं वर्गीकरण

१. प्राकृतिक वनस्पति की आधारभूत संकल्पना एवं शब्दावली

पादप भूगोल और पर्यावरण विज्ञान में पादप जगत से जुड़े प्रमुख शब्दों में स्पष्ट वैज्ञानिक अंतर किया जाता है:

  • फ्लोरा या पादपजात (Flora): किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र अथवा भूगर्भीय कालखंड में पाई जाने वाली कुल पादप प्रजातियों की समग्र सूची या समुच्चय। भारत में लगभग ४७,००० से अधिक पादप प्रजातियां पाई जाती हैं (वैश्विक विविधता का लगभग ७%)।
  • वनस्पति (Vegetation): किसी विस्तृत भूभाग पर सामूहिक रूप से आच्छादित पेड़-पौधों, वितान (कैनोपी) की संरचना और उनके बाह्य स्वरूप को वनस्पति कहते हैं (जैसे—वन, घास का मैदान, झाड़ियां)।
  • प्राकृतिक अथवा अक्षत वनस्पति (Natural / Virgin Vegetation): वह पादप समुदाय जो मानव की प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सहायता के बिना स्वतः प्राकृतिक रूप से उगता है और लंबे समय तक मानवीय हस्तक्षेप से मुक्त रहता है।
    • स्थानिक अथवा देशज प्रजातियां (Endemic / Indigenous): वे पौधे जो मूल रूप से केवल भारतीय उपमहाद्वीप में ही प्राकृतिक रूप से उत्पन्न और सीमित हैं (जैसे—साल, चंदन)।
    • विदेशज प्रजातियां (Exotic / Alien): वे पौधे जो बाहर के देशों से भारत में लाए गए हैं (जैसे—ऑस्ट्रेलिया से यूकेलिप्टस, लेंटाना कमारा, जलकुंभी)।
२. वनों के वितरण को नियंत्रित करने वाले प्रमुख पर्यावरणीय कारक

भारत में वनों के स्थानिक वितरण, घनत्व और वितान की ऊंचाई को मुख्य रूप से तीन प्रमुख कारक नियंत्रित करते हैं:

नियंत्रक कारक भौगोलिक कार्यप्रणाली भारत में पारिस्थितिक स्वरूप
वर्षा (Precipitation) वार्षिक वर्षा की कुल मात्रा, मानसूनी अवधि और शुष्क महीनों की संख्या पत्तों की संरचना, वृक्षों की ऊंचाई और पर्णपात का समय निर्धारित करती है। २०० सेमी से अधिक वर्षा में सघन सदाबहार वन; १००-२०० सेमी में आर्द्र पर्णपाती; ७०-१०० सेमी में शुष्क पर्णपाती; ७० सेमी से कम वर्षा में कंटीली मरुस्थलीय वनस्पति।
तापमान (Temperature Regimes) औसत वार्षिक तापमान, शीतकालीन न्यूनतम तापमान और पाले की उपस्थिति पादपों की जैविक वृद्धि दर को नियंत्रित करती है। उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (>२४°C) में वर्षभर सतत वृद्धि; उपोष्ण (१७°-२४°C); शीतोष्ण (७°-१७°C) में शंकुधारी वन; अल्पाइन (<७°C) में बौनी झाड़ियां और काई।
स्थलाकृति, तुंगता एवं मृदा (Topography & Soil) ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान में ह्रास (Lapse Rate), ढाल का अभिमुखन (धूप वाले दक्षिणी ढाल बनाम छायादार उत्तरी ढाल) तथा मिट्टी की लवणता व जल निकास। हिमालय में तुंगता-आधारित पादप अनुक्रमण; सुंदरबन की ऑक्सीजन-विहीन दलदली लवणीय मिट्टी में मैंग्रोव का विशिष्ट अनुकूलन।

भारत के प्रमुख वन प्रकार: चैंपियन एवं सेठ का वर्गीकरण

१. चैंपियन एवं सेठ का वैज्ञानिक वर्गीकरण (Champion & Seth, 1968)

सर हैरी चैंपियन और एस. के. सेठ ने जलवायु, पादप आकारिकी और प्रजातियों के संयोजन के आधार पर भारत के वनों को १६ मुख्य प्रकारों और ५ प्राथमिक बायोम में वर्गीकृत किया है:

२. उष्णकटिबंधीय आर्द्र सदाबहार एवं अर्ध-सदाबहार वन (Tropical Wet Evergreen & Semi-Evergreen)
  • जलवायु दशाएं: वार्षिक वर्षा २०० से २५० सेमी या अधिक, औसत सापेक्षिक आर्द्रता >७०-८०%, तथा औसत वार्षिक तापमान २५° से २७°C। शुष्क ऋतु अत्यंत संक्षिप्त होती है।
  • संरचनात्मक विशेषताएं: अत्यंत सघन, बहुस्तरीय (Multi-layered) वितान; सबसे ऊंचे वृक्ष ४५ से ६० मीटर तक ऊंचे होते हैं। अलग-अलग प्रजातियों के पत्ते झड़ने का समय अलग-अलग होने के कारण पूरा वन वर्षभर हरा-भरा दिखाई देता है। धरातल पर लताएं (Lianas), आर्किड और फर्न बहुतायत में होते हैं, जिससे सूर्य का प्रकाश जमीन तक नहीं पहुंच पाता।
  • प्रमुख पादप प्रजातियां: रोजवुड (शीशम), महोगनी, आबनूस (Ebony), चापलाश, गुर्जन, तेलसूर, आइनी, जामुन और बांस।
  • भौगोलिक वितरण: पश्चिमी घाट का पश्चिमी ढाल (महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल); पूर्वोत्तर भारत की पहाड़ियां (असम, मेघालय, त्रिपुरा, नगालैंड); तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह।
  • अर्ध-सदाबहार वन: सदाबहार और आर्द्र पर्णपाती के मध्य का संक्रमण क्षेत्र (वर्षा २००-२५० सेमी); इसमें कदम, हल्दू और आम के वृक्ष पाए जाते हैं।
३. उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन (Tropical Moist Deciduous Forests)
  • जलवायु दशाएं: वार्षिक वर्षा १०० से २०० सेमी; ग्रीष्मकाल के प्रारंभ में ३-४ माह की स्पष्ट शुष्क ऋतु।
  • संरचनात्मक विशेषताएं: इन्हें भारत के वास्तविक 'मानसूनी वन' (Monsoon Forests) कहा जाता है। शुष्क ग्रीष्मकाल में वाष्पोत्सर्जन को कम करने के लिए वृक्ष मार्च-अप्रैल (फाल्गुन-चैत्र) में ६ से ८ सप्ताह के लिए सामूहिक रूप से अपने पत्ते गिरा देते हैं। वितान की औसत ऊंचाई २५ से ३५ मीटर होती है।
  • प्रमुख पादप प्रजातियां:
    • साल (Shorea robusta): पूर्वी और मध्य भारत की प्रमुख मजबूत व टिकाऊ इमारती लकड़ी।
    • सागौन (Tectona grandis): प्रायद्वीपीय और मध्य भारत की उच्च कोटि की फर्नीचर की लकड़ी।
    • अन्य प्रजातियां: चंदन, शीशम, महुआ, हरड़, बहेड़ा, आंवला, सेमल, कुसुम और बांस।
  • भौगोलिक वितरण: हिमालय की तलहटी का तराई-डूआर्स क्षेत्र; पश्चिमी घाट का पूर्वी ढाल; ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, बिहार तथा पूर्वी मध्य प्रदेश।
४. उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन (Tropical Dry Deciduous Forests)
  • जलवायु दशाएं: वार्षिक वर्षा ७० से १०० सेमी; शुष्क ऋतु ५ से ६ माह लंबी होती है।
  • संरचनात्मक विशेषताएं: वृक्षों की ऊंचाई कम (१५-२० मीटर) और वितान खुला हुआ होता है (पार्कभूमि वितान)। ग्रीष्म ऋतु में संपूर्ण पत्ते झड़ जाने से वन पूरी तरह पर्णविहीन और कंकालवत प्रतीत होता है। वनों के फर्श पर घास बहुतायत में उगती है।
  • प्रमुख पादप प्रजातियां: सागौन, तेंदू (पत्ते बीड़ी उद्योग में प्रयुक्त), पलाश ('जंगल की ज्वाला'), बेल, खैर, धौड़ा, अमलतास।
  • भौगोलिक वितरण: उत्तर प्रदेश और बिहार के मैदानी भाग, मालवा पठार, बुंदेलखंड, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना तथा पूर्वी राजस्थान।
५. उष्णकटिबंधीय कंटीले वन एवं झाड़ियां (Tropical Thorn Forests & Scrubs)
  • जलवायु दशाएं: अत्यंत न्यून वर्षा (७० सेमी से कम, अधिकांशतः <५० सेमी), ग्रीष्मकाल में अत्यधिक तापमान (>४५°C) और निम्न आर्द्रता।
  • मरुद्भिद अनुकूलन (Xerophytic Adaptations):
    • वृक्षों की ऊंचाई कम (६-१० मीटर) और पेड़ दूर-दूर छितरे हुए होते हैं।
    • भूमिगत जल तक पहुंचने के लिए गहरी और लंबी जड़ प्रणाली।
    • वाष्पोत्सर्जन को रोकने के लिए पत्तियां छोटी अथवा कांटों में रूपांतरित; तना गूदेदार व मांसाल (जल संचय हेतु)।
    • पत्तियों पर मोटी मोमी परत (Cuticle)।
  • प्रमुख पादप प्रजातियां: बबूल (Acacia), कीकर, बेर, खजूर, कैक्टस, नीम और खेजड़ी (Prosopis cineraria - राजस्थान का राज्य वृक्ष तथा बिश्नोई समाज द्वारा पूज्य)।
  • भौगोलिक वितरण: उत्तर-पश्चिम भारत के शुष्क क्षेत्र: पश्चिमी राजस्थान (थार मरुस्थल), गुजरात का कच्छ व सौराष्ट्र, दक्षिण-पश्चिम पंजाब, दक्षिण हरियाणा तथा दक्कन का वृष्टि छाया प्रदेश।

विशिष्ट बायोम: पर्वतीय वनस्पति एवं मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र

१. पर्वतीय वनस्पति (Montane Forests) एवं हिमालयी तुंगता अनुक्रमण

पर्वतीय क्षेत्रों में ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान में तीव्र गिरावट आने से हिमालय में उष्णकटिबंधीय से लेकर टुंड्रा जैसी वनस्पति का एक स्पष्ट ऊर्ध्वाधर अनुक्रमण देखने को मिलता है:

हिमालय की तुंगता-आधारित वनस्पति पेटियां:
• १,००० मीटर तक (पाददेशीय आर्द्र पर्णपाती): शिवालिक, भाबर और तराई-डूआर्स में सघन साल (Sal), सेमल, खैर और शीशम के वन।
• १,००० से २,००० मीटर (आर्द्र शीतोष्ण चौड़ी पत्ती वाले वन): ओक (Oak) और चेस्टनट (Chestnut) के सदाबहार चौड़ी पत्ती वाले वृक्ष।
• १,५०० से ३,००० मीटर (आर्द्र शीतोष्ण शंकुधारी वन): मुलायम लकड़ी वाले कोनिफर वन—देवदार (Cedrus deodara - अत्यंत टिकाऊ इमारती लकड़ी), चीड़ (Chir Pine), कैल (Blue Pine), सिल्वर फर और स्प्रूस।
• ३,००० से ४,००० मीटर (उप-अल्पाइन एवं अल्पाइन झाड़ियां): सिल्वर फर, जुनिपर, भोजपत्र (Birch) और रोडोडेंड्रॉन (Rhododendron - बुरांश)।
• ४,००० मीटर से ऊपर (अल्पाइन चरागाह): छोटी घास वाले चरागाह (उत्तराखंड में 'बुग्याल' और कश्मीर में 'मर्ग'), जहां गद्दी और बकरवाल चरवाहे पशु चराते हैं; इसके ऊपर केवल काई, लाइकेन और हिमरेखा होती है।

दक्षिण भारत के शीतोष्ण पर्वतीय वन (शोला वन - Sholas): नीलगिरि, अन्नामलाई और पलनी पहाड़ियों में १,५०० मीटर से अधिक ऊंचाई पर पाई जाने वाली शीतोष्ण सदाबहार बौनी वनस्पति को 'शोला वन' कहते हैं। इसमें मैग्नोलिया, लॉरेल और रोडोडेंड्रॉन मिलते हैं तथा प्रति १२ वर्ष में प्रसिद्ध नीलकुरिंजी (Neelakurinji) फूल खिलते हैं।

२. तटीय एवं मैंग्रोव वन (Mangrove / Littoral & Swamp Forests)

समुद्र तटीय अंतर-ज्वारीय क्षेत्रों, नदी मुहानों और डेल्टाओं में जहां खारा समुद्री जल और मीठा नदी जल आपस में मिलता है, वहां दलदली व लवणीय मिट्टी में मैंग्रोव वनस्पति पनपती है:

  • लवणमृद्भिद (Halophyte) पौधों के अद्वितीय अनुकूलन:
    • श्वसन जड़ें (न्यूमेटोफोर - Pneumatophores): दलदली मिट्टी में ऑक्सीजन की अत्यधिक कमी की पूर्ति के लिए भूमिगत जड़ों से पेंसिल जैसी नुकीली शाखाएं गुरुत्वाकर्षण के विपरीत धरातल से ऊपर निकल आती हैं। इन पर मौजूद सूक्ष्म छिद्रों (लेंटिसेल) से पौधा वायुमंडल से सीधे ऑक्सीजन प्राप्त करता है।
    • जटा मूल या प्रॉप जड़ें (Stilt Roots): तीव्र ज्वारीय तरंगों और बहाव से वृक्षों को कीचड़ में स्थिर सहारा देने के लिए तने के निचले हिस्से से तिरछी जड़ें निकलकर मिट्टी में धंस जाती हैं।
    • जरायुज अंकुरण (Viviparous Germination): खारी व ऑक्सीजन-रहित मिट्टी में बीज के नष्ट होने अथवा ज्वार में बह जाने से बचाने के लिए फल के पेड़ पर लगे रहने के दौरान ही बीज अंकुरित हो जाता है। भ्रूणमूल भारी व नुकीला होकर कीचड़ में सीधे तीर की तरह धंस जाता है।
    • लवण निष्कासक पत्तियां: मोटी, गूदेदार पत्तियां अतिरिक्त लवण को बाहर निकालने वाली ग्रंथियों से युक्त होती हैं।
  • प्रमुख प्रजातियां: सुंदरी (Heritiera fomes), गरान (Ceriops), गेवा (Excoecaria), कांकड़ा, धुंदुल, पसुर और गोलपत्ता।
  • प्रमुख क्षेत्र:
    • गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा (सुंदरबन): विश्व का सबसे बड़ा एकल मैंग्रोव डेल्टा (लगभग १०,००० वर्ग किमी, जिसमें से लगभग ४,२६० वर्ग किमी पश्चिम बंगाल में है)। यह यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, बायोस्फीयर रिजर्व और रामसर स्थल है।
    • अन्य डेल्टा: महानदी डेल्टा (भितरकनिका, ओडिशा), गोदावरी-कृष्णा डेल्टा (कोरिंगा, आंध्र प्रदेश), कावेरी डेल्टा (पिचावरम, तमिलनाडु) और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह।

वनावरण, वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) एवं वनोन्मूलन

१. भारतीय वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) के प्रमुख तथ्य

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI, देहरादून) उपग्रह चित्रों के आधार पर प्रत्येक दो वर्ष में द्विवार्षिक रिपोर्ट जारी करता है:

  • अभिलेखित वन क्षेत्र (RFA) बनाम वास्तविक वनावरण (Forest Cover):
    • अभिलेखित वन क्षेत्र (Recorded Forest Area - RFA): सरकारी राजस्व अभिलेखों में विधिक रूप से 'वन' दर्ज भूमि (आरक्षित वन, संरक्षित वन, अवर्गीकृत वन), भले ही उस पर पेड़ मौजूद हों या न हों।
    • वास्तविक वनावरण (Forest Cover): उपग्रह चित्रों द्वारा पहचानी गई कम से कम एक हेक्टेयर क्षेत्र पर १०% या अधिक वितान घनत्व वाली सभी भूमियां (स्वामित्व चाहे जो भी हो)।
  • वितान घनत्व (Canopy Density) का वर्गीकरण:
    1. अति सघन वन (Very Dense Forest - VDF): ७०% या अधिक वितान घनत्व (देश के क्षेत्रफल का लगभग ३.०४%)।
    2. मध्यम सघन वन (Moderately Dense Forest - MDF): ४०% से ७०% वितान घनत्व (क्षेत्रफल का लगभग ९.३३%)।
    3. खुले वन (Open Forest - OF): १०% से ४०% वितान घनत्व (क्षेत्रफल का लगभग ९.३४%)।
    4. झाड़ियां (Scrub): १०% से कम वितान घनत्व (वनावरण में सम्मिलित नहीं)।
  • राष्ट्रीय स्थिति: देश का कुल वनावरण ७,१३,७८९ वर्ग किमी (कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का २१.७१%) है। वनों के बाहर स्थित वृक्षावरण (९५,७४३ वर्ग किमी या २.९१%) जोड़ने पर कुल हरित आवरण २४.६२% हो जाता है।
  • राज्यों की स्थिति:
    • सर्वाधिक क्षेत्रफल वाला राज्य: मध्य प्रदेश (७७,४९३ वर्ग किमी), इसके बाद अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और महाराष्ट्र हैं।
    • सर्वाधिक प्रतिशत वाला राज्य: मिजोरम (८४.५३%), इसके बाद अरुणाचल प्रदेश (७९.३३%), मेघालय (७६.००%) और मणिपुर (७४.३४%) हैं।
२. भारत में वनोन्मूलन के कारण एवं उसके गंभीर प्रभाव

जनसंख्या वृद्धि, नगरीकरण और औद्योगिक विकास के कारण भारत के वनों पर भारी दबाव पड़ा है:

  • वन विनाश के प्रमुख कारण:
    • कृषि विस्तार एवं झूम खेती: पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में स्थानांतरणशील झूम कृषि के लिए प्राथमिक वनों को जलाया जाना।
    • नदी घाटी बहुउद्देशीय परियोजनाएं: सरदार सरोवर, टिहरी जैसे विशाल बांधों के निर्माण से लाखों हेक्टेयर सघन वन जलमग्न हो गए।
    • खुले खनन एवं औद्योगीकरण: झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के खनिज क्षेत्रों में कोयला व लौह अयस्क खनन के कारण साल वनों की अंधाधुंध कटाई।
    • दावानल एवं अनियंत्रित पशुचारण: ग्रीष्मकालीन जंगलों की आग और अत्यधिक चराई से छोटे पौधे नष्ट हो जाते हैं।
  • पर्यावरणीय एवं सामाजिक-आर्थिक प्रभाव:
    • तीव्र मृदा अपरदन, भूस्खलन और मैदानी भागों में विनाशकारी बाढ़ की बारंबारता में वृद्धि।
    • वन्यजीवों के आवासों का विखंडन और मानव-वन्यजीव संघर्ष (जैसे—डूआर्स व बांकुड़ा में हाथियों का हमला, सुंदरबन में बाघों का संघर्ष)।
    • स्थानीय सूक्ष्म जलवायु में असंतुलन और कार्बन सिंक क्षमता में गिरावट।

पश्चिम बंगाल का वन भूगोल: डूआर्स, राढ़ एवं सुंदरबन

१. पश्चिम बंगाल के तीन प्रमुख वन क्षेत्र

पश्चिम बंगाल का कुल अभिलेखित वन क्षेत्र लगभग ११,८७९ वर्ग किमी है (राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग १३.३८%)। उच्चावच की विविधता के आधार पर राज्य में तीन विशिष्ट वन क्षेत्र पाए जाते हैं:

वन क्षेत्र भौगोलिक जिले प्रमुख वनस्पति प्रकार एवं प्रजातियां संरक्षित क्षेत्र एवं वन्यजीव
१. उत्तरी पर्वतीय एवं डूआर्स-तराई क्षेत्र दार्जिलिंग, कालिम्पोंग, जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार जिले। तलहटी में उप-हिमालयी आर्द्र साल वन (भाबर साल), चंपा, चिकरासी, सेमल, खैर, शीशम; ऊंचाई पर ओक, चेस्टनट, मैग्नोलिया और सिल्वर फर। जल्दापाड़ा राष्ट्रीय उद्यान (एक सींग वाला गैंडा), गोरुमारा, बक्सा टाइगर रिजर्व, सिंगालीला (रेड पांडा), नेओरा वैली राष्ट्रीय उद्यान।
२. पश्चिमी पठारी एवं राढ़ क्षेत्र पुरुलिया, बांकुड़ा, झाड़ग्राम, पश्चिम मेदिनीपुर, बीरभूम, पश्चिम बर्धमान। उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन; प्रमुख प्रजातियां: साल (Sal), पलाश, महुआ, तेंदू, कुसुम, नीम, बहेड़ा। अराबाड़ी वन (JFM की जन्मस्थली), अयोध्या पहाड़, शुशुनिया पहाड़, जयपुर जंगल (बांकुड़ा)।
३. दक्षिणी डेल्टाई मैंग्रोव (सुंदरबन) दक्षिण २४ परगना और उत्तर २४ परगना के तटीय प्रखंड (हिंगलगंज, गोसाबा, बासंती, कुलतली)। तटीय लवणीय मैंग्रोव; प्रमुख प्रजातियां: सुंदरी, गरान, गेवा, कांकड़ा, धुंदुल, पसुर, गोलपत्ता। सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान (रॉयल बंगाल टाइगर), सजनखाली वन्यजीव अभयारण्य, लोथियन द्वीप अभयारण्य, भगतपुर मगरमच्छ परियोजना।
२. सुंदरबन मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र: वैश्विक महत्व एवं चुनौतियां
  • सुंदरी वृक्ष (Heritiera fomes) की बहुलता के कारण इसका नाम 'सुंदरबन' पड़ा। यह विश्व का सबसे बड़ा सतत मैंग्रोव डेल्टा है।
  • वैश्विक मान्यताएं: यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल (१९८७), बायोस्फीयर रिजर्व (१९८९) तथा रामसर आर्द्रभूमि (२०१९)।
  • पारिस्थितिक लाभ: समुद्री मछलियों और झींगों की प्राकृतिक नर्सरी; विशाल मात्रा में 'ब्लू कार्बन' का अवशोषण; चक्रवाती तूफानों की तीव्रता को कम करने वाली प्राकृतिक दीवार।
  • वर्तमान चुनौतियां: फरक्का बांध के कारण मीठे पानी के प्रवाह में कमी जिससे लवणता में भारी वृद्धि; झींगा पालन (प्रॉन सीड कलेक्शन) से मिट्टी का क्षरण; समुद्र के जलस्तर में वृद्धि से निचले द्वीपों का डूबना।

वन संरक्षण, जन आंदोलन एवं अराबाड़ी संयुक्त वन प्रबंधन

१. राष्ट्रीय वन नीति (National Forest Policy, 1988)

१९८८ की संशोधित राष्ट्रीय वन नीति ने वनों को राजस्व कमाने के साधन के स्थान पर पारिस्थितिक संतुलन और पर्यावरण स्थिरता के प्राथमिक घटक के रूप में मान्यता दी:

  • प्रमुख लक्ष्य: देश के कुल भूभाग के न्यूनतम ३३% भाग पर वन अथवा वृक्षावरण स्थापित करना (पहाड़ी व ढालू क्षेत्रों में ६०%)।
  • अन्य उद्देश्य: जैव विविधता का संरक्षण, नदी घाटियों में अपरदन की रोकथाम, सामाजिक वानिकी के माध्यम से ग्रामीण जनता की जलावन और चारे की मांग पूरी करना।
२. संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) एवं ऐतिहासिक अराबाड़ी मॉडल

संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management - JFM) राज्य वन विभाग और स्थानीय ग्रामीण समुदायों के बीच एक संस्थागत साझेदारी है, जिसका उद्देश्य वनों की संयुक्त सुरक्षा और लाभांश का साझा वितरण है:

मेदिनीपुर का ऐतिहासिक अराबाड़ी प्रयोग (१९७१):
• प्रणेता: दूरदर्शी वन अधिकारी डॉ. अजीत कुमार बनर्जी (Dr. A.K. Banerjee) ने वर्ष १९७१ में पश्चिम मेदिनीपुर के अराबाड़ी रेंज में यह अनूठा प्रयोग शुरू किया।
• मॉडल: घोर निर्धनता के कारण ग्रामीण अवैध रूप से साल के जंगल काट रहे थे। डॉ. बनर्जी ने ११ सीमावर्ती गांवों के १,१८० परिवारों को संगठित कर वन सुरक्षा समितियां (FPC) बनाईं।
• दायित्व एवं अधिकार: ग्रामीणों ने १,२७२ हेक्टेयर उजड़े हुए साल वन को मवेशियों की चराई और अवैध कटाई से बचाने की शपथ ली। बदले में वन विभाग ने उन्हें वानिकी कार्यों में मजदूरी रोजगार दिया, गैर-काष्ठ वनोत्पाद (साल पत्ता, सूखी टहनियां, महुआ) मुफ्त बीनने का अधिकार दिया, तथा लकड़ी की बिक्री से प्राप्त कुल शुद्ध लाभ का २५% सीधा लाभांश ग्रामीणों को देने का अनुबंध किया।
• परिणाम: मात्र १० वर्षों में बंजर झाड़ियां करोड़ों रुपये के सघन साल वन में तब्दील हो गईं। इस भारी सफलता के कारण भारत सरकार ने वर्ष १९९० में राष्ट्रीय स्तर पर JFM नीति को पूरे देश में लागू कर दिया।
३. भारत के प्रमुख जन आंदोलन एवं पारंपरिक संरक्षण
  • चिपको आंदोलन (उत्तराखंड, १९७३): गढ़वाल हिमालय के चमोली जिले के रेणी गांव में व्यावसायिक ठेकेदारों द्वारा पेड़ों की कटाई के विरोध में ग्रामीण महिलाओं ने गौरा देवी के नेतृत्व में और पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा व चंडी प्रसाद भट्ट की प्रेरणा से पेड़ों से चिपक कर सत्याग्रह किया। प्रसिद्ध नारा था: "पारिस्थितिकी ही स्थायी अर्थव्यवस्था है"।
  • अप्पिको आंदोलन (कर्नाटक, १९८३): चिपको से प्रेरित होकर उत्तर कन्नड़ जिले के सिरसी में पांडुरंग हेगड़े के नेतृत्व में ग्रामीणों ने पश्चिमी घाट के वर्षावनों को कटने से बचाने के लिए पेड़ों को गले लगाया। कन्नड़ भाषा में 'अप्पिको' का अर्थ 'चिपकना' होता है।
  • पवित्र उपवन (Sacred Groves / देववन): प्राचीन जनजातीय परंपरा जिसमें किसी वन खंड को स्थानीय देवी-देवता का निवास मानकर वहां वृक्ष काटना और शिकार करना पूरी तरह वर्जित रखा जाता है (जैसे—पश्चिम बंगाल में संथालों का जाहेरथान, मेघालय में लॉ किंतांग, केरल में कावु)।

महत्वपूर्ण भौगोलिक अवधारणाएँ, नियम एवं निर्देशांक

फॉरेस्ट कैनोपी डेंसिटी इंडेक्स (FCD)
FCD\% = {वृक्ष वितान आच्छादित क्षेत्र}{कुल भूमि क्षेत्रफल} × 100
वनावरण अनुपात सूत्र (FCR)
FCR = ≤ft( {कुल वनावरण क्षेत्रफल (वर्ग किमी)}{कुल भौगोलिक क्षेत्रफल (वर्ग किमी)} ) × 100
शैनन-वीनर जैव विविधता सूचकांक
$$H' = - \sum_{i=1}^{S} p_i \ln(p_i)$$

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन और उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन के मध्य जलवायु परिस्थितियों, वितान संरचना, पर्णपात के स्वभाव तथा प्रमुख प्रजातियों के आधार पर तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन और उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन के मध्य प्रमुख तुलनात्मक अंतर निम्नलिखित हैं:

१. जलवायु दशाएं:

  • सदाबहार वन: वार्षिक वर्षा २०० से २५० सेमी या अधिक, उच्च सापेक्षिक आर्द्रता (>७५%) तथा औसत वार्षिक तापमान २५° से २७°C। कोई लंबी शुष्क ऋतु नहीं होती।
  • आर्द्र पर्णपाती वन: वार्षिक वर्षा १०० से २०० सेमी, औसत तापमान २४° से २७°C तथा ग्रीष्मकाल के प्रारंभ में ३ से ४ माह की स्पष्ट शुष्क ऋतु होती है।

२. वितान की संरचना (Canopy Structure):

  • सदाबहार वन: बहुस्तरीय (Multi-storeyed) अत्यंत सघन वितान। वृक्षों की ऊंचाई ४५ से ६० मीटर तक होती है। धरातल पर सूर्य का प्रकाश नहीं पहुंचता; लताएं, फर्न और आर्किड प्रचुर मात्रा में होते हैं।
  • आर्द्र पर्णपाती वन: वितान अपेक्षाकृत खुला और एकसमान होता है। वृक्षों की औसत ऊंचाई २५ से ३५ मीटर होती है। धरातल पर पर्याप्त प्रकाश पहुंचने के कारण झाड़ियां और बांस उगते हैं।

३. पर्णपात का स्वभाव (Phenology):

  • सदाबहार वन: विभिन्न प्रजातियों के पत्ते गिरने और नए पत्ते आने का समय अलग-अलग होता है, जिससे संपूर्ण वन वर्षभर हरा-भरा दिखाई देता है (कोई सामूहिक पर्णपात नहीं)।
  • आर्द्र पर्णपाती वन: अत्यधिक वाष्पोत्सर्जन से बचने के लिए वृक्ष फाल्गुन-चैत्र (मार्च-अप्रैल) में ६ से ८ सप्ताह के लिए सामूहिक रूप से अपने सभी पत्ते गिरा देते हैं।

४. प्रमुख प्रजातियां एवं भौगोलिक क्षेत्र:

  • सदाबहार वन: रोजवुड, महोगनी, आबनूस, गुर्जन, चापलाश। क्षेत्र: पश्चिमी घाट का पश्चिमी ढाल, पूर्वोत्तर भारत और अंडमान-निकोबार।
  • आर्द्र पर्णपाती वन: साल (पूर्वी भारत की प्रमुख लकड़ी), सागौन (प्रायद्वीपीय भारत की मुख्य लकड़ी), चंदन, शीशम, महुआ। क्षेत्र: डूआर्स, ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल।
उदाहरण 2
लवणमृद्भिद (Halophytes) किसे कहते हैं? सुंदरबन के मैंग्रोव वनों में पाए जाने वाले न्यूमेटोफोर (श्वसन जड़ें), स्टिल्ट जड़ें तथा जरायुजता (Vivipary) के अनुकूलन को स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. लवणमृद्भिद (Halophytes) की परिभाषा: समुद्र तटीय अंतर-ज्वारीय क्षेत्रों और नदी डेल्टाओं की दलदली, खारी तथा ऑक्सीजन-रहित (Anaerobic) मिट्टी में उगने वाले विशेष अनुकूलन संपन्न पौधों को लवणमृद्भिद अथवा मैंग्रोव पादप कहते हैं।

२. सुंदरबन के मैंग्रोव में प्रमुख अनुकूलन:

  • श्वसन जड़ें (न्यूमेटोफोर - Pneumatophores):

    • सुंदरबन की मिट्टी लगातार जलमग्न रहने के कारण वायु विहीन और ऑक्सीजन-रहित होती है।
    • इस अभाव की पूर्ति के लिए सुंदरी और गरान जैसे वृक्षों की जड़ों से खूंटी या पेंसिल जैसी शाखाएं गुरुत्वाकर्षण के विपरीत धरातल से ऊपर निकल आती हैं।
    • इन जड़ों पर सूक्ष्म छिद्र (लेंटिसेल) होते हैं, जिनके माध्यम से पौधे निम्न ज्वार के समय सीधे वायुमंडल से ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं।
  • स्टिल्ट अथवा प्रॉप जड़ें (Stilt Roots):

    • सुंदरबन की मिट्टी अत्यधिक चिकनी, दलदली और अस्थिर होती है तथा दिन में दो बार तेज ज्वारीय लहरों का थपेड़ा लगता है।
    • वृक्षों को दलदल में मजबूती से खड़ा रखने और लहरों से उखड़ने से बचाने के लिए तने के निचले हिस्से से तिरछी जड़ें निकलकर मिट्टी में खंभे की तरह धंस जाती हैं (जैसे—राइजोफोरा में)।
  • जरायुज अंकुरण (Viviparous Germination):

    • खारी व ऑक्सीजन-विहीन मिट्टी में साधारण बीज गिरते ही सड़ जाते हैं या ज्वार के पानी में बह जाते हैं।
    • अतः कांकड़ा और गरान जैसे पौधों में फल के मातृ वृक्ष पर लगे रहने के दौरान ही बीज अंकुरित हो जाता है। इसका भ्रूणमूल भारी, लंबा और भाले जैसा नुकीला हो जाता है। परिपक्व होने पर जब यह नीचे गिरता है, तो दलदल में सीधा धंस जाता है और कुछ ही घंटों में जड़ें जमा लेता है।
उदाहरण 3
हिमालय पर्वतमाला में तलहटी से लेकर हिमरेखा तक प्राकृतिक वनस्पति के तुंगता-आधारित ऊर्ध्वाधर अनुक्रमण का सविस्तार वर्णन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

हिमालय पर्वतमाला में ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान में होने वाली गिरावट (Lapse Rate) के कारण तलहटी से हिमरेखा तक ४,००० मीटर के दायरे में वनस्पति का एक सुस्पष्ट अनुक्रमण पाया जाता है:

१. पाददेशीय उपोष्ण कटिबंधीय पेटी (१,००० मीटर से नीचे):

  • शिवालिक पहाड़ियां, भाबर और तराई-डूआर्स इसके अंतर्गत आते हैं।
  • यहां सघन आर्द्र पर्णपाती वन पाए जाते हैं, जिनमें अत्यंत मूल्यवान कठोर लकड़ी वाले साल (Shorea robusta), सेमल, खैर और शीशम प्रमुख हैं।

२. आर्द्र शीतोष्ण चौड़ी पत्ती वाली पेटी (१,००० से २,००० मीटर):

  • मध्यम तापमान और उच्च आर्द्रता के कारण सदाबहार चौड़ी पत्ती वाले वृक्ष मिलते हैं।
  • प्रमुख प्रजातियां: ओक (Oak), चेस्टनट (Chestnut), मैग्नोलिया और जंगली बांस।

३. हिमालयी आर्द्र शीतोष्ण शंकुधारी पेटी (१,५०० से ३,००० मीटर):

  • शीतकाल में हिमपात होता है। यहां मुलायम लकड़ी वाले कोणधारी (कोनिफर) वन विस्तृत हैं।
  • प्रमुख प्रजातियां: देवदार (Cedrus deodara - अत्यंत टिकाऊ व सुगंधित लकड़ी), चीड़ (Chir Pine), कैल (Blue Pine), सिल्वर फर और स्प्रूस।

४. उप-अल्पाइन एवं अल्पाइन झाड़ी पेटी (३,००० से ४,००० मीटर):

  • भीषण ठंड और बर्फबारी के कारण वृक्षों का आकार बौना हो जाता है।
  • प्रमुख प्रजातियां: सिल्वर फर, जुनिपर, भोजपत्र (Birch - जिस पर प्राचीन काल में पांडुलिपियां लिखी जाती थीं) और बुरांश (Rhododendron)।

५. अल्पाइन चरागाह एवं हिम पेटी (४,००० मीटर से ऊपर हिमरेखा तक):

  • ग्रीष्मकाल में बर्फ पिघलने पर छोटी घासों और रंग-बिरंगे फूलों के सुंदर मैदान बनते हैं (उत्तराखंड में 'बुग्याल' और कश्मीर में 'मर्ग')। गद्दी और बकरवाल चरवाहे यहां मवेशी चराते हैं।
  • ४,५०० मीटर से ऊपर वनस्पति काई और लाइकेन तक सीमित हो जाती है और स्थायी बर्फ में विलीन हो जाती है।
उदाहरण 4
पश्चिम बंगाल के ऐतिहासिक अराबाड़ी प्रयोग का विश्लेषण कीजिए। इसने भारत में संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) को किस प्रकार जन्म दिया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. संकट की पृष्ठभूमि (१९७० का दशक): पश्चिम मेदिनीपुर जिले के अराबाड़ी वन रेंज में लगभग १,२७० हेक्टेयर का साल वन स्थानीय निर्धन ग्रामीणों द्वारा अत्यधिक कटाई, चराई और लकड़ी चोरी के कारण पूरी तरह उजड़कर बंजर कंटीली भूमि बन चुका था। वन रक्षकों और ग्रामीणों के बीच निरंतर हिंसक टकराव होते थे, और पुलिस बल द्वारा जंगल बचाना असंभव सिद्ध हो रहा था।

२. डॉ. अजीत कुमार बनर्जी का ऐतिहासिक समाधान (१९७१-७२): वर्ष १९७१ में तत्कालीन प्रभागीय वन अधिकारी (DFO) डॉ. अजीत कुमार बनर्जी ने समझा कि स्थानीय ग्रामीणों को आजीविका और लाभ में साझीदार बनाए बिना वनों की रक्षा नहीं हो सकती। उन्होंने एक ऐतिहासिक समझौता किया:

  • ११ सीमावर्ती गांवों के १,१८० परिवारों को संगठित कर भारत की पहली वन सुरक्षा समिति (FPC) गठित की।
  • दायित्व: ग्रामीणों ने संकल्प लिया कि वे स्वयं वनों की अवैध कटाई, चराई और आग से रक्षा करेंगे और वन रक्षकों का सहयोग करेंगे।
  • अधिकार व सुविधाएं: वन विभाग ने ग्रामीणों को पौधारोपण कार्यों में मजदूरी दी, साल पत्ता, महुआ, तेंदू पत्ता और सूखी टहनियां मुफ्त बीनने का अधिकार दिया।
  • लाभांश का क्रांतिकारी सूत्र: सबसे क्रांतिकारी प्रावधान यह था कि जब साल का वन बड़ा होकर काटा जाएगा, तो लकड़ी की बिक्री से प्राप्त कुल शुद्ध लाभ का २५% सीधे ग्रामीणों को प्रदान किया जाएगा।

३. परिणाम एवं राष्ट्रीय प्रभाव:

  • मात्र १० वर्षों में वीरान जंगल करोड़ों रुपये मूल्य के घने साल वन में बदल गया और ग्रामीणों व प्रशासन के बीच अटूट विश्वास स्थापित हुआ।
  • अराबाड़ी की इस सफलता के आधार पर भारत सरकार ने जून १९९० में औपचारिक राष्ट्रीय दिशा-निर्देश जारी कर पूरे देश में संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) कार्यक्रम लागू किया। आज देश के १ लाख से अधिक गांवों में करोड़ों हेक्टेयर वन इसी व्यवस्था के तहत संरक्षित हैं।
उदाहरण 5
अभिलेखित वन क्षेत्र (RFA) और वास्तविक वनावरण (Forest Cover) में क्या अंतर है? भारत की राष्ट्रीय वन नीति के लक्ष्य और उपलब्धियों की विवेचना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. अभिलेखित वन क्षेत्र (RFA) बनाम वास्तविक वनावरण (Forest Cover):

  • अभिलेखित वन क्षेत्र (Recorded Forest Area - RFA):
    • यह एक विधिक व प्रशासनिक अवधारणा है। सरकारी राजस्व या वन विभाग के रिकॉर्ड में जिस भूमि को कानूनी रूप से 'वन' घोषित किया गया है, उसे RFA कहते हैं।
    • भारतीय वन अधिनियम के तहत इसे आरक्षित वन, संरक्षित वन और अवर्गीकृत वन में विभाजित किया गया है।
    • इस भूमि पर वास्तव में घने पेड़ हों अथवा वह पथरीली व बंजर हो, कानूनी तौर पर वह वन क्षेत्र ही मानी जाती है।
  • वास्तविक वनावरण (Forest Cover):
    • यह एक भौतिक और वैज्ञानिक माप है जो उपग्रह (IRS Satellite) रिमोट सेंसिंग चित्रों द्वारा निर्धारित किया जाता है।
    • भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के अनुसार, स्वामित्व या विधिक स्थिति चाहे जो भी हो, कम से कम १ हेक्टेयर भूमि पर १०% या अधिक वितान घनत्व वाले वृक्षों के आवरण को वनावरण कहा जाता है (इसमें निजी बागान व चाय बागान भी सम्मिलित हैं)।

२. राष्ट्रीय वन नीति (१९८८) के लक्ष्य बनाम वर्तमान स्थिति:

  • नीतिगत लक्ष्य: १९८८ की राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का कम से कम ३३% भाग वनाच्छादित होना चाहिए (पहाड़ी क्षेत्रों में ६०%)।
  • वर्तमान स्थिति (ISFR आंकड़े):
    • भारत का कुल वनावरण ७,१३,७८९ वर्ग किमी या २१.७१% है।
    • वनों के बाहर स्थित वृक्षावरण (९५,७४३ वर्ग किमी या २.९१%) जोड़ने पर कुल हरित आवरण २४.६२% होता है।
    • यद्यपि पिछले वर्षों में वनावरण में निरंतर वृद्धि हुई है, फिर भी यह ३३% के लक्ष्य से काफी दूर है, जिसके लिए सामाजिक वानिकी और कृषि वानिकी को तीव्र गति देने की आवश्यकता है।
उदाहरण 6
पश्चिम बंगाल की वन संपदा को तीन प्रमुख प्राकृतिक क्षेत्रों में विभाजित कर उनके भौगोलिक विस्तार, वनस्पति प्रकार तथा पारिस्थितिक महत्व का परीक्षण कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

पश्चिम बंगाल में हिमालय के हिमाच्छादित शिखरों से लेकर बंगाल की खाड़ी के डेल्टा तक वनों की अद्भुत विविधता पाई जाती है। इसे तीन प्रमुख क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है:

१. उत्तरी पर्वतीय एवं डूआर्स-तराई वन क्षेत्र:

  • भौगोलिक विस्तार: दार्जिलिंग, कालिम्पोंग, जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार जिले।
  • वनस्पति प्रकार: तलहटी के मैदानी भाग में आर्द्र पर्णपाती भाबर व तराई साल वन, साथ ही चंपा, चिकरासी, सेमल, खैर व शीशम। पर्वतीय भागों में शीतोष्ण ओक, चेस्टनट, मैग्नोलिया और सिल्वर फर।
  • पारिस्थितिक महत्व: तीव्र पहाड़ी ढालों पर भूस्खलन रोकता है; जल्दापाड़ा व गोरुमारा में विलुप्तप्राय एक सींग वाले गैंडे, हाथियों और बक्सा में बाघों का प्रमुख प्राकृतिक पर्यावास।

२. पश्चिमी पठारी एवं राढ़ शुष्क पर्णपाती वन क्षेत्र:

  • भौगोलिक विस्तार: पुरुलिया, बांकुड़ा, झाड़ग्राम, पश्चिम मेदिनीपुर, बीरभूम और पश्चिम बर्धमान का लेटराइट भूभाग।
  • वनस्पति प्रकार: उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती साल वन। साल के अतिरिक्त पलाश, महुआ, तेंदू, नीम और कुसुम।
  • पारिस्थितिक महत्व: लेटराइट मिट्टी के अपरदन को रोकता है; स्थानीय जनजातियों (संथाल, मुंडा) को साल पत्ता और महुआ के माध्यम से आजीविका प्रदान करता है; यहीं ऐतिहासिक अराबाड़ी JFM आंदोलन का जन्म हुआ।

३. दक्षिणी डेल्टाई लवणीय मैंग्रोव वन (सुंदरबन):

  • भौगोलिक विस्तार: दक्षिण २४ परगना और उत्तर २४ परगना के तटीय डेल्टा का लगभग ४,२६० वर्ग किमी क्षेत्र।
  • वनस्पति प्रकार: अद्वितीय अनुकूलनों (श्वसन जड़ें, स्टिल्ट जड़ें, जरायुजता) से युक्त लवणमृद्भिद (मैंग्रोव) वन। प्रमुख वृक्ष: सुंदरी, गरान, गेवा, कांकड़ा और गोलपत्ता।
  • पारिस्थितिक महत्व: यूनेस्को विश्व धरोहर व रामसर स्थल; रॉयल बंगाल टाइगर का विश्व प्रसिद्ध निवास; समुद्री मत्स्य संपदा की नर्सरी; और खाड़ी के चक्रवातों से कोलकाता व दक्षिण बंगाल की रक्षा करने वाला प्राकृतिक बायो-शील्ड।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

अभिलेखित वन क्षेत्र (RFA) और वास्तविक वनावरण (Forest Cover) को एक ही समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

RFA सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज भूमि का कानूनी दर्जा है, जिस पर पेड़ न भी हों; जबकि Forest Cover उपग्रह द्वारा पहचानी गई वास्तविक वृक्ष आच्छादित भूमि है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि सदाबहार वनों के पेड़ कभी पत्ते नहीं गिराते।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सदाबहार वृक्ष भी पत्ते गिराते हैं, किंतु अलग-अलग प्रजातियां अलग-अलग समय पर पत्ते गिराती हैं, जिससे पूरा जंगल एक साथ कभी पत्ताविहीन नहीं होता।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

चिपको आंदोलन और अप्पिको आंदोलन को एक ही समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

चिपको आंदोलन 1973 में उत्तराखंड के हिमालय में शुरू हुआ था, जबकि अप्पिको आंदोलन 1983 में कर्नाटक के पश्चिमी घाट में चिपको की तर्ज पर शुरू हुआ था।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

भारत के वन एवं प्राकृतिक वनस्पति संसाधन चैंपियन एवं सेठ का वर्गीकरण, पादप कटिबंध, मैंग्रोव एवं अराबाड़ी संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) प्रमुख वन प्रकार (वर्षा एवं जलवायु आधारित) उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन (वर्षा >200 सेमी) महोगनी, रोजवुड, आबनूस, बांस | पश्चिमी घाट एवं पूर्वोत्तर उष्णकटिबंधीय पर्णपाती / मानसूनी वन (वर्षा 70-200 सेमी) साल, सागौन, चंदन, महुआ, पलाश | भारत में सर्वाधिक विस्तृत वन कटीले वन एवं मरुद्भिद झाड़ियां (वर्षा <70 सेमी) बबूल, कीकर, खेजड़ी, कैक्टस | राजस्थान एवं वृष्टि-छाया क्षेत्र विशिष्ट वन पारिस्थितिक तंत्र पर्वतीय वन (ऊंचाई आधारित संस्तरण) ओक/चेस्टनट (1000-2000 मी) → देवदार/चीड़ → अल्पाइन रोडोडेन्ड्रॉन मैंग्रोव अथवा अनूप वन (ज्वारीय क्षेत्र) सुंदरी, गरान, केवड़ा | न्यूमेटोफोर (श्वसनमूल) एवं जरायुजता (सुंदरबन) वन संरक्षण, राष्ट्रीय नीति एवं सामाजिक वानिकी राष्ट्रीय वन नीति (1988): कुल भूभाग का 33% वनाच्छादित करने का लक्ष्य (वर्तमान 24.62%) अराबाड़ी मॉडल (पश्चिम बंगाल, 1971): संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) का पथप्रदर्शक चिपको आंदोलन (उत्तराखंड), अप्पिको आंदोलन (कर्नाटक) एवं पवित्र उपवन पश्चिम बंगाल के वन संसाधन एवं वितरण उत्तरी बंगाल: डुआर्स-तराई के साल वन एवं दार्जिलिंग के ओक/पाइन वन राढ़ पठार: पुरुलिया-बांकुरा के शुष्क पर्णपाती साल, पलाश एवं महुआ वन सुंदरबन: विश्व का विशालतम सक्रिय मैंग्रोव वन एवं जैव विविधता क्षेत्र पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक कक्षा 11 भूगोल • भारतीय प्राकृतिक वनस्पति संरचना

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
प्राकृतिक वनस्पति बिना मानवीय हस्तक्षेप के स्वतः उगने वाला पादप समुदाय है, जिसे चैंपियन और सेठ ने 5 प्रमुख बायोम में वर्गीकृत किया है।
मुख्य बिंदु 2
वर्षा, तापमान, तुंगता और मिट्टी भारत के वनों के प्रकार, वितान घनत्व और पर्णपात को नियंत्रित करने वाले मुख्य कारक हैं।
मुख्य बिंदु 3
200 सेमी से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों (पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर) में ऊंचे बहुस्तरीय उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन पाए जाते हैं।
मुख्य बिंदु 4
भारत में सर्वाधिक विस्तृत वन उष्णकटिबंधीय पर्णपाती (मानसूनी वन) हैं; ये ग्रीष्मकाल में पत्ते गिरा देते हैं और साल व सागौन इनके मुख्य वृक्ष हैं।
मुख्य बिंदु 5
70 सेमी से कम वर्षा वाले उत्तर-पश्चिम भारत में कंटीले वन व मरुद्भिद झाड़ियां पाई जाती हैं जो कांटों और गहरी जड़ों से जीवित रहती हैं।
मुख्य बिंदु 6
हिमालय में तुंगता बढ़ने के साथ साल वनों से लेकर ओक, देवदार-चीड़ के शंकुधारी वन और अल्पाइन चरागाहों का स्पष्ट अनुक्रमण दिखता है।
मुख्य बिंदु 7
सुंदरबन के मैंग्रोव वन दलदली व ऑक्सीजन-रहित खारी मिट्टी में श्वसन जड़ों (न्यूमेटोफोर), स्टिल्ट जड़ों और जरायुज अंकुरण द्वारा अनुकूलित हैं।
मुख्य बिंदु 8
द्विवार्षिक ISFR के अनुसार भारत का वनावरण 21.71% (वृक्षावरण सहित 24.62%) है, जो राष्ट्रीय वन नीति के 33% के लक्ष्य से कम है।
मुख्य बिंदु 9
पश्चिम बंगाल के तीन प्रमुख वन क्षेत्र हैं: उत्तर में डूआर्स के साल वन, पश्चिम में राढ़ के शुष्क पर्णपाती वन तथा दक्षिण में सुंदरबन मैंग्रोव।
मुख्य बिंदु 10
वर्ष 1971 में मेदिनीपुर के अराबाड़ी में डॉ. ए. के. बनर्जी द्वारा शुरू किए गए संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) ने समुदाय-आधारित संरक्षण का विश्वस्तरीय मॉडल प्रस्तुत किया।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

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अध्याय 1: एक विषय के रूप में भूगोल अध्याय 2: पृथ्वी की उत्पत्ति एवं आंतरिक संरचना अध्याय 3: भू-आकृतिक प्रक्रियाएं अध्याय 4: मौसम एवं जलवायु अध्याय 5: समस्थिति की संकल्पना अध्याय 6: जलमंडल अध्याय 7: मानव भूगोल का क्षेत्र एवं विषय-वस्तु अध्याय 8: आर्थिक भूगोल अध्याय 9: Secondary Activities - Industry अध्याय 10: तृतीयक क्रियाकलाप अध्याय 11: चतुर्थक क्रियाकलाप अध्याय 12: पंचमक क्रियाकलाप अध्याय 13: एक देश के रूप में भारत अध्याय 14: भारत की संरचना एवं भू-आकृति अध्याय 15: भारत का अपवाह तंत्र अध्याय 16: भारत की जलवायु अध्याय 17: भारत के वन एवं प्राकृतिक वनस्पति अध्याय 18: भारत की प्राकृतिक आपदाएं एवं संकट

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