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WBB • कक्षा XI • Geography • अध्याय 6
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

जलमंडल

जलमंडल (Hydrosphere) पृथ्वी पर उपस्थित समस्त जलराशियों का समग्र प्राकृतिक तंत्र है, जो भू-पृष्ठ के लगभग 71 प्रतिशत क्षेत्र पर विस्तृत होकर भूमंडलीय पर्यावरण, जलवायु तथा जैवमंडल के संचालन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद (WBCHSE) कक्षा 11 भौतिक भूगोल के पाठ्यक्रम के अंतर्गत यह अध्याय समुद्र विज्ञान (Oceanography) के आधारभूत सिद्धांतों की विस्तृत विवेचना प्रस्तुत करता है। पृथ्वी के कुल जल का लगभग 97.2 प्रतिशत भाग खारे जल के रूप में महासागरों में संचित है, जो महाद्वीपीय मग्नतट, तीव्र मग्नढाल, जलमग्न कैनियन, अगाध सागरीय मैदान, मध्य-महासागरीय कटक तथा 11 किलोमीटर से भी गहरे समुद्री गर्तों के रूप में विभाजित है। महासागरीय जल के तापमान एवं लवणता का स्तरीकरण थर्मोक्लाइन तथा हेलोक्लाइन जैसे महत्वपूर्ण संक्रमण क्षेत्रों का निर्माण करता है। इसके अतिरिक्त, प्रचलित पवनों एवं कोरिओलिस बल द्वारा गल्फ स्ट्रीम तथा हिंद महासागर के मानसूनी उत्क्रमण जैसी विशाल धाराएं संचालित होती हैं। सूर्य व चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण से उत्पन्न ज्वार-भाटा तथा पश्चिम बंगाल की हुगली नदी में आने वाली ऐतिहासिक 'सांड की बाण' (Tidal Bore) इस जलमंडल की प्रमुख गतिक विशेषताएं हैं।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पश्चिम बंगाल के विद्यार्थियों के लिए जलमंडल का वैज्ञानिक अध्ययन केवल सैद्धांतिक नहीं, अपितु राज्य के आर्थिक, पर्यावरणीय तथा सुरक्षात्मक दृष्टिकोण से अनिवार्य है। महासागर पृथ्वी के प्राथमिक ऊष्मा नियामक हैं, जो उष्णकटिबंध से ध्रुवों की ओर ऊष्मा का पुनर्वितरण करके वैश्विक जलवायु को संतुलित रखते हैं। राज्य के दक्षिणी छोर पर स्थित बंगाल की खाड़ी पश्चिम बंगाल की मानसूनी वर्षा का मुख्य स्रोत होने के साथ-साथ भयंकर उष्णकटिबंधीय चक्रवातों एवं ज्वारीय आपदाओं की जन्मस्थली भी है। गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा के मुहाने पर स्थित विश्व प्रसिद्ध सुंदरवन का मैंग्रोव वन तथा 'स्वैच ऑफ नो ग्राउंड' नामक जलमग्न कैनियन इस सागरीय पारिस्थितिकी के अटूट अंग हैं। समुद्री मत्स्य संपदा, अपतटीय खनिज तेल, सुंदरवन के दुर्गादुआनी क्रीक की ज्वारीय ऊर्जा क्षमता, तथा जलवायु परिवर्तन के कारण सुंदरवन के द्वीपों के जलमग्न होने जैसी समकालीन चुनौतियों का समाधान करने हेतु जलमंडल का गहन ज्ञान आवश्यक है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. जल चक्र एवं महासागरीय नितल के उच...
2 2. महासागरीय जल के भौतिक एवं रासायन...
3 3. महासागरीय जल संचलन: धाराएं एवं ग...
4 4. ज्वार-भाटा: उत्पत्ति के कारक, प्...
5 5. महासागरीय निक्षेप: स्थलजात, जैवि...
6 6. समुद्री संसाधन, नीली अर्थव्यवस्थ...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. जल चक्र एवं महासागरीय नितल के उच्चावच (Ocean Floor Morphology)

वैश्विक जल बजट एवं जल चक्र

जलमंडल एक खुला तथा गतिशील तंत्र है, जो सौर ऊर्जा चालित जल चक्र (Hydrological Cycle) के माध्यम से वायुमंडल, स्थलमंडल तथा जैवमंडल से जुड़ा हुआ है। पृथ्वी पर कुल जल की मात्रा लगभग 138 करोड़ 60 लाख घन किलोमीटर ($1.386 \times 10^9 \text{ km}^3$) आकलित है:

जल भंडार का स्रोत कुल आयतन (घन किमी) कुल जल का प्रतिशत (%) मीठे जल का प्रतिशत (%)
विश्व के महासागर (लवणीय) $1,338,000,000$ $96.54\%$ —
हिमनद एवं ध्रुवीय बर्फ $24,064,000$ $1.74\%$ $68.7\%$
भूमिगत जल (मीठा व लवणीय) $23,400,000$ $1.69\%$ $30.1\%$
झीलें, नदियां व वायुमंडलीय वाष्प $180,000$ $0.03\%$ $1.2\%$
महासागरीय नितल के चार प्रमुख उच्चावच विभाग

महासागरों का नितल कोई समतल गड्ढा नहीं है, अपितु यह स्थलमंडल से भी अधिक विषम एवं विहंगम स्थलरूपों से युक्त है। इसे चार प्रमुख भागों में बांटा गया है:

  1. महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf):
    • तट से लगा हुआ महाद्वीप का अत्यंत मंद ढाल वाला जलमग्न सीमांत भाग।
    • औसत ढाल अत्यंत मंद—लगभग 1° (प्रति किलोमीटर पर मात्र 1 से 2 मीटर की गिरावट)।
    • मग्नतट की समाप्ति सीमा (Shelf-Break) की औसत गहराई लगभग 130 से 200 मीटर होती है।
    • इसकी चौड़ाई में भारी भिन्नता पाई जाती है: प्रशांत तट (चिली) पर केवल कुछ किमी, जबकि साइबेरियाई आर्कटिक तट पर 1500 किमी। सुंदरवन के समीप बंगाल की खाड़ी का मग्नतट लगभग 160 किमी चौड़ा है।
    • आर्थिक महत्व: सूर्य का प्रकाश तल तक पहुंचने के कारण यह 'प्रकाशमान क्षेत्र' (Photic Zone) है; यहां विश्व के प्रसिद्ध मत्स्य बैंक (डोगर बैंक, ग्रैंड बैंक), खनिज तेल एवं गैस भंडार (बॉम्बे हाई) तथा तटीय रेत में भारी खनिज पाए जाते हैं।
  2. महाद्वीपीय मग्नढाल (Continental Slope):
    • मग्नतट की सीमा से प्रारंभ होकर गहरे सागर तक जाने वाला अत्यंत तीव्र ढालू भाग।
    • औसत ढाल तीव्र—लगभग 2° से 5° (विवर्तनिक क्षेत्रों में 20° से अधिक)।
    • गहराई 200 मीटर से प्रारंभ होकर 3,000 मीटर तक विस्तृत होती है।
    • यह महाद्वीपीय सियाल (SIAL) तथा महासागरीय बेसाल्टिक सिमा (SIMA) के मध्य की वास्तविक भूवैज्ञानिक सीमा है।
    • जलमग्न कैनियन (Submarine Canyons): मग्नढाल पर तीखे V-आकार की गहरी घाटियां पाई जाती हैं, जिनका निर्माण भारी पंकिल धाराओं (Turbidity Currents) के तीव्र अपरदन से हुआ है। सुंदरवन के दक्षिण में स्थित 'स्वैच ऑफ नो ग्राउंड' (Swatch of No Ground) बंगाल की खाड़ी का सुप्रसिद्ध जलमग्न कैनियन है, जो गंगा-ब्रह्मपुत्र की गाद को गहरे सागर में पहुंचाकर विश्व का सबसे बड़ा 'बंगाल पंखा' (Bengal Fan) बनाता है।
  3. महाद्वीपीय उत्थान (Continental Rise):
    • मग्नढाल के आधार पर टर्बिडाइट तलछट के जमाव से बना मंद ढालू ($0.5^\circ - 1^\circ$) मलबा क्षेत्र, जो 3,000 से 4,000 मीटर की गहराई पर गहरे मैदान से मिलता है।
  4. अगाध सागरीय मैदान (Abyssal Plain):
    • 3,000 से 6,000 मीटर गहराई पर स्थित अत्यंत विस्तृत एवं चौरस मैदान, जो महासागरीय नितल के लगभग 40 प्रतिशत भाग को घेरे हुए है।
    • यहां महीन जैविक ऊज़ (Ooze) तथा लाल मृत्तिका की मोटी परतें बेसाल्टिक ज्वालामुखीय चट्टानों को ढक लेती हैं।
कटक, गर्त एवं गुयोट
  • मध्य-महासागरीय कटक (Mid-Oceanic Ridge): अपसारी प्लेट सीमाओं पर मैग्मा के बाहर निकलने से निर्मित 65,000 किमी लंबी अंतःसागरीय पर्वतमाला। अटलांटिक महासागर में स्थित S-आकार का मध्य-अटलांटिक कटक 16,000 किमी लंबा है, जिसके मध्य में भ्रंश घाटी एवं तप्त जल के स्रोत (Hydrothermal Vents) पाए जाते हैं।
  • महासागरीय गर्त (Ocean Trenches): अभिसारी प्लेट सीमाओं पर जब एक भारी प्लेट नीचे धंसती है, तो अत्यंत गहरे V-आकार के गर्त बनते हैं। प्रशांत महासागर में स्थित मेरियाना गर्त का चैलेंजर दीप (11,022 मीटर) पृथ्वी का सबसे गहरा स्थान है। हिंद महासागर का सबसे गहरा गर्त सुंडा या जावा गर्त (7,450 मीटर) है।
  • गुयोट (Guyot): सागर के भीतर स्थित ऐसे सपाट शिखर वाले ज्वालामुखीय पर्वत, जिनका शीर्ष कभी समुद्री लहरों द्वारा समतल कर दिया गया था और बाद में वे भू-धंसाव के कारण गहरे जल में डूब गए।

2. महासागरीय जल के भौतिक एवं रासायनिक गुण: तापमान, लवणता एवं घनत्व स्तरीकरण

महासागरीय जल का तापमान वितरण

महासागरीय जल का तापमान सौर विकिरण, अक्षांश, समुद्री धाराओं तथा संवहनीय मिश्रण पर निर्भर करता है। इसका विश्लेषण क्षैतिज तथा ऊर्ध्वाधर दोनों रूपों में किया जाता है:

1. क्षैतिज तापमान वितरण:

  • भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर सतह के जल का तापमान घटता जाता है: विषुवत रेखा पर लगभग $26^\circ - 28^\circ\text{C}$ से लेकर ध्रुवीय क्षेत्रों में $0^\circ\text{C}$ या उससे भी नीचे पहुंच जाता है।
  • चारों ओर से स्थल से घिरे उष्णकटिबंधीय सागरों में ग्रीष्म ऋतु में तापमान अत्यधिक बढ़ जाता है: फारस की खाड़ी में $38^\circ\text{C}$ तथा लाल सागर में $32^\circ\text{C}$ तक पहुंच जाता है।
  • समताप रेखाएं (Isotherms) गर्म धाराओं के प्रभाव से ध्रुवों की ओर तथा ठंडी धाराओं के प्रभाव से विषुवत रेखा की ओर झुक जाती हैं।

2. ऊर्ध्वाधर तापमान स्तरीकरण (The Three-Tier Ocean):

  • सतही मिश्रित परत (Surface Mixed Layer) ($0 - 200 \text{ मीटर}$): सूर्य के प्रकाश से गर्म तथा तरंगों द्वारा निरंतर मिश्रित होने वाली परत ($20^\circ - 25^\circ\text{C}$)।
  • थर्मोक्लाइन परत (Thermocline) ($200 - 1,000 \text{ मीटर}$): यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण संक्रमण परत है, जहां गहराई के साथ तापमान में अत्यंत तीव्र गिरावट दर्ज की जाती है। मात्र 800 मीटर की गहराई में तापमान $20^\circ\text{C}$ से गिरकर $4^\circ\text{C}$ रह जाता है। यह परत ऊपर के हल्के गर्म जल और नीचे के भारी ठंडे जल के मध्य प्राकृतिक अवरोध का कार्य करती है।
  • गहरी समतापीय महासागरीय परत (Deep Ocean Layer) ($>1,000 \text{ मीटर}$ से नितल तक): महासागर का लगभग 80% जल इसी परत में होता है। ध्रुवों से आने वाले ठंडे जल के कारण इसका तापमान वर्ष भर 1°C से 3°C के बीच लगभग स्थिर रहता है।
महासागरीय लवणता एवं डिटमार का नियम

लवणता (Salinity) 1,000 ग्राम (1 किग्रा) समुद्री जल में घुले हुए कुल ठोस खनिजों की मात्रा (ग्राम में) है, जिसे प्रति हजार या Parts Per Thousand (‰) में व्यक्त किया जाता है। विश्व के महासागरों की औसत लवणता 35‰ (35 ग्राम प्रति किग्रा) है।

1884 में स्कॉटिश वैज्ञानिक विलियम डिटमार (William Dittmar) ने एचएमएस चैलेंजर अभियान के 77 नमूनों का विश्लेषण करके स्थिर अनुपात नियम (Dittmar's Principle of Constant Proportions) प्रतिपादित किया: "यद्यपि विभिन्न महासागरों में कुल लवणता की मात्रा भिन्न-भिन्न हो सकती है, किंतु उसमें घुले हुए मुख्य लवणों का पारस्परिक प्रतिशत अनुपात विश्व भर में सदैव स्थिर रहता है।"

घुला हुआ रासायनिक लवण मात्रा (ग्राम प्रति किग्रा जल) कुल लवणता का प्रतिशत (%)
सोडियम क्लोराइड ($NaCl$) $27.213$ $77.7\%$
मैग्नीशियम क्लोराइड ($MgCl_2$) $3.807$ $10.9\%$
मैग्नीशियम सल्फेट ($MgSO_4$) $1.658$ $4.7\%$
कैल्शियम सल्फेट ($CaSO_4$) $1.260$ $3.6\%$
पोटेशियम सल्फेट ($K_2SO_4$) $0.863$ $2.5\%$
कैल्शियम कार्बोनेट ($CaCO_3$) $0.123$ $0.3\%$
मैग्नीशियम ब्रोमाइड ($MgBr_2$) $0.076$ $0.2\%$
प्रादेशिक भिन्नता: बंगाल की खाड़ी बनाम अरब सागर
  • उत्तरी हिंद महासागर में लवणता का अंतर:
    • बंगाल की खाड़ी (30‰ से 32‰): यहां लवणता असामान्य रूप से कम है (सुंदरवन के पास 28‰ से भी कम)। इसका कारण गंगा, ब्रह्मपुत्र, मेघना, गोदावरी तथा महानदी जैसी विशाल नदियों द्वारा भारी मात्रा में मीठे जल का विसर्जन एवं मानसूनी वर्षा का वाष्पीकरण से अधिक होना ($P > E$) है।
    • अरब सागर (36‰ से 37‰): थार एवं अरब मरुस्थल की शुष्क गर्म हवाओं से तीव्र वाष्पीकरण होता है, वर्षा कम होती है तथा नर्मदा, ताप्ती व सिंधु के अतिरिक्त कोई बड़ी नदी न होने से मीठे जल की आपूर्ति अत्यंत सीमित है ($E > P$), जिससे लवणता बहुत बढ़ जाती है।
  • सर्वाधिक लवणीय झीलें: तुर्की की वैन झील (Lake Van - 330‰), मृत सागर (Dead Sea - 238‰) एवं संयुक्त राज्य अमेरिका की ग्रेट साल्ट लेक (220‰)।
  • हेलोक्लाइन एवं पिक्नोक्लाइन:
    • हेलोक्लाइन (Halocline): 300 से 1,000 मीटर गहराई की परत, जहां गहराई के साथ लवणता में तीव्र परिवर्तन आता है।
    • पिक्नोक्लाइन (Pycnocline): तापमान में कमी एवं लवणता के प्रभाव से गहराई के साथ जल के घनत्व में तीव्र वृद्धि की परत।

3. महासागरीय जल संचलन: धाराएं एवं गायर (Gyres)

महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति के कारक

महासागर के जल का एक निश्चित दिशा में नियमित एवं सतत क्षैतिज प्रवाह महासागरीय धारा (Ocean Current) कहलाता है। इनकी उत्पत्ति चार मुख्य कारणों से होती है:

  1. प्रचलित पवनों का घर्षण: व्यापारिक पवनें जल को पश्चिम की ओर तथा पछुआ पवनें पूर्व की ओर बहा ले जाती हैं।
  2. कोरिओलिस बल एवं फेरेल का नियम: पृथ्वी के घूर्णन से धाराएं उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर मुड़ जाती हैं।
  3. घनत्व एवं तापमान भिन्नता: विषुवत रेखा का हल्का गर्म जल ऊपरी धारा के रूप में ध्रुवों की ओर तथा ध्रुवों का भारी ठंडा जल अंतःधारा के रूप में विषुवत रेखा की ओर बहता है।
  4. तटरेखा का आकार: महाद्वीपीय किनारे धाराओं को मोड़कर विशाल वृत्ताकार चक्र या गायर (Gyre) बनाते हैं।
प्रमुख महासागरीय धाराएं

तापमान के आधार पर धाराएं दो प्रकार की होती हैं: गर्म धाराएं (विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर) तथा ठंडी धाराएं (ध्रुवों से विषुवत रेखा की ओर):

महासागर प्रमुख गर्म धाराएं प्रमुख ठंडी धाराएं विशिष्ट भौगोलिक घटनाएं
अटलांटिक महासागर उत्तर व दक्षिण विषुवतीय धारा, गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream), उत्तरी अटलांटिक प्रवाह, ब्राजील धारा। लैब्राडोर धारा, कैनरी धारा, बेंगुएला धारा, फ़ॉकलैंड धारा। सारगासो सागर (Sargasso Sea): उत्तरी अटलांटिक गायर के मध्य में स्थित शांत व गतिहीन जलक्षेत्र, जहां 'सारगासम' नामक समुद्री घास तैरती है।
ग्रैंड बैंक्स: गर्म गल्फ स्ट्रीम एवं ठंडी लैब्राडोर के मिलने से घना कोहरा व समृद्ध कॉड मछली क्षेत्र।
प्रशांत महासागर क्यूरोशियो (जापान) धारा, उत्तरी प्रशांत प्रवाह, पूर्वी ऑस्ट्रेलियाई धारा। ओयाशियो (कुरील) धारा, कैलिफ़ोर्निया धारा, पेरू या हम्बोल्ट धारा। एल नीनो (El Niño): पेरू तट पर गर्म जल के आगमन से हम्बोल्ट धारा का कमजोर पड़ना, जिससे वैश्विक मौसम चक्र प्रभावित होता है।
हिंद महासागर दक्षिण विषुवतीय धारा, मोजांबिक धारा, अगुलहास धारा। पश्चिम ऑस्ट्रेलियाई धारा, पश्चिमी पवन प्रवाह। मानसूनी धाराओं का द्विवार्षिक उत्क्रमण: ग्रीष्म एवं शीत ऋतु में मानसूनी पवनों के साथ धाराओं की दिशा 180° पलट जाती है!
हिंद महासागर में मानसूनी उत्क्रमण एवं एकमैन उपवेलिंग
  • मानसूनी धाराओं का दिशा परिवर्तन: ग्रीष्म ऋतु में दक्षिण-पश्चिम मानसून के प्रभाव से उत्तरी हिंद महासागर में जल घड़ी की सुई की दिशा में (पूर्व की ओर) बहता है और सोमाली धारा अत्यंत तीव्र हो जाती है। शीत ऋतु में उत्तर-पूर्व मानसून के कारण यह प्रवाह विपरीत होकर घड़ी की सुई के विपरीत (पश्चिम की ओर) बहने लगता है।
  • एकमैन परिवहन एवं उपवेलिंग (Upwelling): जब पवन एवं कोरिओलिस बल के प्रभाव से सतह का जल तट से दूर खिसक जाता है (Ekman Transport), तो उसकी जगह लेने हेतु नीचे का ठंडा, पोषक तत्वों से भरपूर जल ऊपर उठता है (उपवेलिंग)। पेरू एवं कैलिफ़ोर्निया तटों पर यह प्रक्रिया समृद्ध मत्स्य पालन का आधार बनती है, किंतु तटीय मरुस्थलों (अटाकामा) को शुष्क भी बनाती है।

4. ज्वार-भाटा: उत्पत्ति के कारक, प्रकार एवं हुगली नदी में सांड की बाण

ज्वार-भाटा की उत्पत्ति के वैज्ञानिक कारण

चंद्रमा एवं सूर्य के गुरुत्वाकर्षण आकर्षण बल तथा पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न अपकेंद्रीय बल के कारण महासागरीय जल का नियमित रूप से ऊपर उठना ज्वार (Tide) तथा नीचे गिरना भाटा (Ebb) कहलाता है।

चंद्रमा व सूर्य के ज्वारोत्पादक बल की तुलना:

$$\text{ज्वारोत्पादक बल (TGF)} \propto \frac{\text{पिंड का द्रव्यमान}}{(\text{दूरी})^3}$$
  • ज्वारोत्पादक बल दूरी के घनफल (Cube of Distance) का व्युत्क्रमानुपाती होता है।
  • सूर्य का द्रव्यमान चंद्रमा से 2 करोड़ 70 लाख गुना अधिक है, किंतु पृथ्वी से सूर्य की दूरी (15 करोड़ किमी) चंद्रमा की दूरी (3 लाख 84 हजार किमी) से लगभग 390 गुना अधिक है।
  • गणितीय अनुपात: $$\frac{TGF_{Moon}}{TGF_{Sun}} = \frac{1}{2,70,00,000} \times (390)^3 \approx 2.17$$
  • अतः पृथ्वी पर ज्वार उत्पन्न करने में चंद्रमा का प्रभाव सूर्य की तुलना में लगभग 2.17 गुना (दोगुने से भी अधिक) शक्तिशाली है!
दीर्घ ज्वार बनाम लघु ज्वार: सिजिगी स्थिति
ज्वार का प्रकार खगोलीय संरेखण विशेषताएं एवं ज्वारीय परिसर
दीर्घ या वृहत् ज्वार (Spring Tide) सिजिगी (Syzygy): सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी जब एक सीधी रेखा ($180^\circ$) में होते हैं। माह में दो बार:
  • युति (Conjunction / अमावस्या): चंद्रमा सूर्य व पृथ्वी के बीच में होता है।
  • वियुति (Opposition / पूर्णिमा): पृथ्वी सूर्य व चंद्रमा के बीच में होती है।
अधिकतम ज्वारीय परिसर: सूर्य व चंद्रमा के संयुक्त आकर्षण से ज्वार का जल सामान्य से 20% अधिक ऊंचा उठता है और भाटा अधिक नीचे गिरता है।
लघु ज्वार (Neap Tide) समकोणिक स्थिति (Quadrature): शुक्ल व कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा परस्पर समकोण ($90^\circ$) पर होते हैं। न्यूनतम ज्वारीय परिसर: सूर्य का आकर्षण चंद्रमा के आकर्षण को आंशिक रूप से निष्प्रभावी कर देता है, जिससे ज्वार सामान्य से 20% नीचा रहता है।
दैनिक 50 मिनट का विलंब एवं हुगली नदी में सांड की बाण
  • दैनिक 50 मिनट की देरी का कारण: एक मुख्य ज्वार के बाद अगला मुख्य ज्वार 24 घंटे 50 मिनट बाद आता है (तथा दो क्रमिक ज्वारों में 12 घंटे 26 मिनट का अंतर होता है)। पृथ्वी के 24 घंटे में एक चक्कर लगाने के दौरान चंद्रमा अपनी कक्षा में लगभग 12.2° आगे बढ़ जाता है। चंद्रमा के ठीक सामने आने हेतु पृथ्वी को 50 मिनट अतिरिक्त घूमना पड़ता है।
  • ज्वारीय भित्ति या बाण (Tidal Bore):
    • जब समुद्री ज्वार का जल नदी के संकीर्ण मुहाने में प्रवेश करके एक खड़ी, फेनयुक्त जलदीवार बनाकर तेज गर्जना के साथ नदी के प्रवाह के विपरीत ऊपर की ओर दौड़ता है, तो उसे ज्वारीय भित्ति या बाण कहते हैं।
    • अनिवार्य दशाएं: (1) नदी का मुहाना कीपाकार होना चाहिए, (2) मुहाने पर ज्वार का विस्तार अत्यधिक होना चाहिए, और (3) नदी का तल उथला एवं विपरीत जलप्रवाह तीव्र होना चाहिए।
    • विश्व का सर्वाधिक ज्वारीय परिसर कनाडा की फंडी की खाड़ी (Bay of Fundy - 16 मीटर) में मिलता है।
    • हुगली नदी की 'सांड की बाण': पश्चिम बंगाल की हुगली नदी का मुहाना कीपाकार होने तथा उथले बालूचरों के कारण आश्विन-कार्तिक तथा फाल्गुन-चैत्र मास के दीर्घ ज्वार में बंगाल की खाड़ी से जल अत्यंत तीव्र वेग से प्रवेश करता है। यह जल 2 से 3 मीटर ऊंची फेनदार दीवार बनकर कोलकाता की ओर दहाड़ता हुआ दौड़ता है (जिसे स्थानीय रूप से 'सांड की बाण' कहते हैं), जो नौकाओं के लिए अत्यंत घातक होता है।

5. महासागरीय निक्षेप: स्थलजात, जैविक ऊज़ एवं लाल मृत्तिका

महासागरीय तलछटों का वर्गीकरण

स्रोत तथा निक्षेपण क्षेत्र के आधार पर महासागरीय नितल के अवसादों को चार मुख्य वर्गों में विभाजित किया जाता है:

  1. स्थलजात निक्षेप (Terrigenous Deposits):
    • स्थलभाग से अपरदित चट्टानी मलबा नदियों, वायु तथा लहरों द्वारा बहकर मग्नतट एवं मग्नढाल पर जमा होता है।
    • तट से गहरे सागर की ओर इनके कणों का आकार घटता जाता है (बजरी $\to$ बालू $\to$ गाद $\to$ मृत्तिका)।
    • रंगीन पंक के प्रकार:
      • नीली मृत्तिका (Blue Mud): कार्बनिक पदार्थों एवं आयरन सल्फाइड ($FeS$) की उपस्थिति में ऑक्सीजन रहित दशा में बनती है।
      • लाल मृत्तिका (Red Mud): फेरिक ऑक्साइड के ऑक्सीकरण से लाल रंग की होती है (उष्णकटिबंधीय नदियों के मुहाने पर)।
      • हरी मृत्तिका (Green Mud): पोटेशियम-आयरन युक्त खनिज ग्लूकोनाइट (Glauconite) के कारण हरी दिखाई देती है।
  2. जैविक ऊज़ या पंक (Biogenous Pelagic Oozes):
    • समुद्री सूक्ष्म जीवों एवं प्लवक (Plankton) के अस्थिपंजरों व खोलों के कम से कम 30 प्रतिशत संचय से बने महीन अवसाद।
    • रासायनिक संघटन के आधार पर यह दो प्रकार का होता है:
      ऊज़ का नाम स्रोत जीव रासायनिक आधार एवं गहराई
      ग्लोबीजेरिना ऊज़ फोरामिनीफेरा प्रोटोजोआ के खोल चूना-प्रधान ($CaCO_3$); 2,000 से 4,000 मीटर गहराई पर उष्ण व शीतोष्ण सागरों में सर्वाधिक।
      टेरोपोड ऊज़ मोलस्का वर्ग की समुद्री तितलियां चूना-प्रधान ($CaCO_3$); उथले उष्णकटिबंधीय जल (1,000-2,000 मीटर) में।
      डायटम ऊज़ एककोशिकीय सूक्ष्म शैवाल सिलिका-प्रधान ($SiO_2$); ठंडे ध्रुवीय एवं उपध्रुवीय महासागरों में विस्तृत।
      रेडियोलेरियन ऊज़ रेडियोलेरिया प्रोटोजोआ सिलिका-प्रधान ($SiO_2$); उष्णकटिबंधीय गहरे तल (>4,500 मीटर) पर।
    • कार्बोनेट क्षतिपूर्ति गहराई (Carbonate Compensation Depth - CCD): 4,000 से 4,500 मीटर गहराई पर अत्यधिक दाब तथा शीतल जल के कारण कार्बनिक अम्ल चूने के खोलों को पूर्णतः घोल देता है। अतः CCD के नीचे चूना-प्रधान ऊज़ जमा नहीं हो पाते, वहां केवल सिलिका-प्रधान ऊज़ तथा लाल मृत्तिका ही मिलती है।
  3. अकार्बनिक लाल मृत्तिका (Red Clay):
    • 4,500 मीटर से अधिक गहरे अगाध मैदानों पर विस्तृत, जो गहरे सागर के कुल निक्षेपों का लगभग 38% भाग है।
    • ज्वालामुखीय राख, मरुस्थलीय धूल तथा उल्कापिंडीय धूल के लोहे द्वारा ऑक्सीकरण से निर्मित। इसका जमाव अत्यंत धीमा होता है (प्रति 1,000 वर्ष में मात्र 1 मिमी)।
  4. बहुधात्विक मैंगनीज पिंड (Polymetallic Manganese Nodules):
    • अगाध लाल मृत्तिका के ऊपर आलू के आकार के रासायनिक पिंड, जिनमें मैंगनीज (24%), लोहा (14%), निकेल, तांबा एवं कोबाल्ट पाया जाता है। हिंद महासागर के केंद्रीय बेसिन में भारत को इनके अन्वेषण का एकाधिकार प्राप्त है।

6. समुद्री संसाधन, नीली अर्थव्यवस्था (Blue Economy) एवं सुंदरवन पारिस्थितिकी

समुद्री संसाधनों का वर्गीकरण एवं नीली अर्थव्यवस्था

महासागरों के विशाल संसाधनों का सतत एवं पर्यावरण-अनुकूल दोहन नीली अर्थव्यवस्था (Blue Economy) कहलाता है:

  • जैविक एवं खाद्य संसाधन:
    • वाणिज्यिक मत्स्य पालन (इलिश, टूना, सार्डिन, पॉम्फ्रेट, झींगा)। न्यूफाउंडलैंड के ग्रैंड बैंक्स क्षेत्र में गल्फ स्ट्रीम एवं लैब्राडोर के मिलन से उत्पन्न प्लवक प्रचुरता विश्व प्रसिद्ध मत्स्य उद्योग का आधार है।
    • मैरीकल्चर तथा समुद्री शैवाल की खेती (फार्मास्युटिकल्स में उपयोगी एल्गिनेट्स)।
  • खनिज एवं ऊर्जा संसाधन:
    • अपतटीय खनिज तेल एवं प्राकृतिक गैस (भारत का बॉम्बे हाई तथा कृष्णा-गोदावरी बेसिन)।
    • तटीय भारी खनिज बालू (केरल व ओडिशा तटों पर मोनाजाइट—परमाणु ऊर्जा का थोरियम स्रोत, इल्मेनाइट व जिरकॉन)।
    • गैर-पारंपरिक समुद्री ऊर्जा: ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy), तरंग ऊर्जा तथा समुद्री तापीय ऊर्जा रूपांतरण (OTEC)। पश्चिम बंगाल के सुंदरवन का दुर्गादुआनी क्रीक ज्वारीय ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण प्रायोगिक केंद्र है।
पश्चिम बंगाल की तटीय पारिस्थितिकी: सुंदरवन मैंग्रोव बायोम

पश्चिम बंगाल के दक्षिण में गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा पर स्थित सुंदरवन विश्व का सबसे बड़ा निरंतर ज्वारीय मैंग्रोव वन है (भारत में 4,260 वर्ग किमी):

  • पादप अनुकूलन: सुंदरी (Heritiera fomes), गरान, गेवां तथा बाएन वृक्षों में अद्वितीय विशेषताएं पाई जाती हैं:
    • श्वसन मूल (Pneumatophores): ऑक्सीजन रहित दलदली मिट्टी से बाहर निकलकर वायुमंडलीय ऑक्सीजन खींचने वाली ऊर्ध्वाधर जड़ें।
    • जटा मूल (Stilt Roots): तीव्र ज्वारीय थपेड़ों में वृक्ष को स्थिर रखने वाली धनुषाकार मजबूत जड़ें।
    • जरायुज अंकुरण (Vivipary): वृक्ष पर फल लगे रहने के दौरान ही बीज का अंकुरित हो जाना, ताकि खारे जल में नष्ट होने से पहले वह सीधे कीचड़ में गड़ सके।
  • प्राकृतिक आपदा सुरक्षा कवच: सुंदरवन का सघन मैंग्रोव तंत्र बंगाल की खाड़ी से उठने वाले सुपर-चक्रवातों (अम्फान, यास, रेमल) की ज्वारीय तरंगों की 60 प्रतिशत ऊर्जा को सोखकर कोलकाता तथा दक्षिणी बंगाल को विनाश से बचाता है।
पर्यावरणीय खतरे एवं समुद्री संरक्षण
  • प्रवाल विरंजन एवं अम्लीकरण: जल का तापमान बढ़ने से प्रवाल से जूजैंथेली शैवाल अलग हो जाते हैं, जिससे प्रवाल श्वेत होकर मर जाते हैं (Coral Bleaching)। कार्बन डाइऑक्साइड के अवशोषण से समुद्री जल अम्लीय हो रहा है, जिससे समुद्री जीवों के कवच कमजोर हो रहे हैं।
  • सुंदरवन के द्वीपों का डूबना: बंगाल की खाड़ी में समुद्र स्तर वृद्धि की दर (3.9 मिमी/वर्ष) वैश्विक औसत से अधिक है। इसके कारण लोहाचरा द्वीप पूरी तरह जलमग्न हो चुका है तथा घोड़ामारा व मौसुनी द्वीप तेजी से कट रहे हैं।
  • माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण: समुद्र में फेंका गया प्लास्टिक विखंडित होकर 5 मिमी से छोटे कणों में बदलकर समुद्री खाद्य श्रृंखला तथा मानव भोजन में प्रवेश कर रहा है।

महत्वपूर्ण भौगोलिक अवधारणाएँ, नियम एवं निर्देशांक

डिटमार का लवणता सूत्र
$$S (\text{‰}) = 1.80655 \times Cl (\text{‰})$$
ज्वारोत्पादक बल समीकरण
$$TGF \propto \frac{G \cdot M \cdot r}{d^3}$$
महासागरीय जल बजट एवं लवणता
$$\Delta S \propto (E - P) - R$$
उथले जल में ज्वारीय तरंग का वेग
$$c = \sqrt{g \cdot h}$$

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
ढाल, गहराई तथा आर्थिक महत्व के आधार पर महाद्वीपीय मग्नतट एवं महाद्वीपीय मग्नढाल में अंतर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

महाद्वीपीय मग्नतट तथा मग्नढाल में प्रमुख अंतर निम्न हैं:

  1. ढाल (Gradient):
    • महाद्वीपीय मग्नतट: अत्यंत मंद ढाल वाला भाग है, जिसका औसत ढाल लगभग 1° (1:500 या 1-2 मीटर प्रति किमी) होता है।
    • महाद्वीपीय मग्नढाल: तीव्र ढालू भाग है, जिसका औसत ढाल 2° से 5° (विवर्तनिक क्षेत्रों में 20° तक) होता है।
  2. गहराई एवं सीमाएं:
    • महाद्वीपीय मग्नतट: तटरेखा से मग्नतट सीमा (Shelf-Break) तक 130 से 200 मीटर गहराई तक विस्तृत होता है। यह महाद्वीपीय सियाल का भाग है।
    • महाद्वीपीय मग्नढाल: 200 मीटर से लेकर 3,000 मीटर गहराई तक विस्तृत होता है, जो महाद्वीपीय सियाल और महासागरीय सिमा के मिलन की वास्तविक सीमा है।
  3. आर्थिक महत्व:
    • महाद्वीपीय मग्नतट: सूर्य का प्रकाश पहुंचने के कारण यह प्रकाशमान क्षेत्र है; यहां विश्व के प्रसिद्ध मत्स्य क्षेत्र (ग्रैंड बैंक्स), अपतटीय खनिज तेल (बॉम्बे हाई) तथा तटीय रेत में भारी खनिज पाए जाते हैं।
    • महाद्वीपीय मग्नढाल: सूर्य के प्रकाश से वंचित है; यहां 'स्वैच ऑफ नो ग्राउंड' जैसे गहरे जलमग्न कैनियन पाए जाते हैं जो नदियों की गाद को गहरे सागर तक पहुंचाते हैं।
उदाहरण 2
सूर्य का द्रव्यमान चंद्रमा से 2 करोड़ 70 लाख गुना अधिक होने के बावजूद पृथ्वी पर चंद्रमा का ज्वारोत्पादक बल सूर्य से 2.17 गुना अधिक क्यों है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

ज्वारोत्पादक बल (Tide-Generating Force या TGF) सामान्य गुरुत्वाकर्षण की भांति दूरी के वर्ग पर नहीं, अपितु दूरी के घनफल (Cube of Distance) पर निर्भर करता है:

$$TGF \propto \frac{M}{d^3}$$

दिए गए तथ्य:

  • सूर्य का द्रव्यमान ($M_S$) चंद्रमा के द्रव्यमान ($M_M$) का लगभग 2,70,00,000 गुना है।
  • पृथ्वी से सूर्य की दूरी ($d_S = 15,00,00,000\text{ किमी}$) चंद्रमा की दूरी ($d_M = 3,84,400\text{ किमी}$) से लगभग 390 गुना अधिक है।

दोनों के ज्वारोत्पादक बलों का अनुपात:

$$\frac{TGF_{Moon}}{TGF_{Sun}} = \frac{M_M}{M_S} \times \left(\frac{d_S}{d_M}\right)^3 = \frac{1}{2,70,00,000} \times (390)^3 = \frac{5,93,19,000}{2,70,00,000} \approx 2.17$$

दूरी के घनफल का प्रभाव द्रव्यमान के प्रभाव से कहीं अधिक प्रभावी सिद्ध होता है। चंद्रमा पृथ्वी के अत्यंत निकट होने के कारण सूर्य की तुलना में 2.17 गुना अधिक शक्तिशाली ज्वारीय उभार उत्पन्न करता है।

उदाहरण 3
थर्मोक्लाइन (Thermocline) परत क्या है और यह महासागरीय जल के ऊर्ध्वाधर मिश्रण को किस प्रकार रोकती है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

थर्मोक्लाइन महासागर की सतही मिश्रित परत के नीचे 200 मीटर से 1,000 मीटर गहराई के मध्य स्थित एक संक्रमण परत है, जहां गहराई बढ़ने के साथ तापमान में अत्यंत तीव्र गिरावट (लगभग 20°C से गिरकर 4°C) आती है। ऊर्ध्वाधर मिश्रण रोकने का कारण: ठंडा जल गर्म जल की तुलना में बहुत अधिक सघन और भारी होता है। थर्मोक्लाइन में तापमान के तेजी से गिरने के कारण जल के घनत्व में भी अत्यंत तीव्र वृद्धि होती है (जिसे पिक्नोक्लाइन कहते हैं)। नीचे स्थित यह भारी, सघन जल एक मजबूत गुरुत्वीय अवरोध का कार्य करता है। परिणामस्वरूप, सतही लहरें या पवनें ऊपर के ऑक्सीजन युक्त हल्के जल को नीचे नहीं भेज पातीं और नीचे का पोषक तत्वों से भरपूर भारी जल ऊपर नहीं आ पाता।

उदाहरण 4
एक ही अक्षांश पर स्थित होने के बावजूद बंगाल की खाड़ी (30‰-32‰) तथा अरब सागर (36‰-37‰) की सतही लवणता में भारी अंतर क्यों है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

दोनों के लवणता अंतर का मुख्य कारण मीठे जल के आगमन तथा वाष्पीकरण का संतुलन है:

  1. बंगाल की खाड़ी की कम लवणता ($30‰ - 32‰$):
    • गंगा, ब्रह्मपुत्र, मेघना, गोदावरी, कृष्णा और महानदी जैसी विशाल बारहमासी नदियां प्रतिवर्ष भारी मात्रा में मीठा जल विसर्जित करती हैं।
    • मानसूनी वर्षा की मात्रा वाष्पीकरण से कहीं अधिक होती है ($P > E$), जिससे सतही जल तनु हो जाता है (सुंदरवन के पास 28‰ से भी कम)।
  2. अरब सागर की उच्च लवणता ($36‰ - 37‰$):
    • थार तथा अरब के मरुस्थलों की गर्म, शुष्क हवाओं से तीव्र वाष्पीकरण होता है।
    • वर्षा बहुत कम होती है तथा सिंधु और नर्मदा के अलावा कोई बड़ी नदी मीठे जल की आपूर्ति नहीं करती, जिससे वाष्पीकरण वर्षा से अधिक ($E > P$) होकर लवणों को सांद्रित कर देता है।
उदाहरण 5
ज्वारीय भित्ति (Tidal Bore) क्या है? पश्चिम बंगाल की हुगली नदी में 'सांड की बाण' आने की अनुकूल भौगोलिक दशाएं बताइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

जब ज्वार का जल नदी के संकीर्ण मुहाने में प्रवेश करके खड़ी, फेनदार जलदीवार के रूप में तेज गर्जना के साथ नदी के प्रवाह के विपरीत ऊपर की ओर दौड़ता है, तो उसे ज्वारीय भित्ति (Tidal Bore) कहते हैं। हुगली नदी में बाण आने की अनुकूल दशाएं:

  1. कीपाकार मुहाना: हुगली नदी का मुहाना बंगाल की खाड़ी की ओर अत्यंत चौड़ा है किंतु कोलकाता की ओर तेजी से संकरा हो जाता है, जिससे ज्वार की ऊर्जा संकुचित होकर ऊपर उठ जाती है।
  2. उच्च ज्वारीय परिसर: आश्विन-कार्तिक तथा फाल्गुन-चैत्र मास की अमावस्या व पूर्णिमा (दीर्घ ज्वार) में मुहाने पर ज्वार का उभार 4 से 5 मीटर से अधिक हो जाता है।
  3. उथला नदी तल एवं विपरीत बहाव: नदी तल उथला होने के कारण घर्षण से लहर का आधार रुकता है और शीर्ष आगे बढ़कर 2 से 3 मीटर ऊंची जलदीवार ('सांड की बाण') बनकर 20-25 किमी/घंटा की गति से कोलकाता की ओर दौड़ता है।
उदाहरण 6
कार्बोनेट क्षतिपूर्ति गहराई (CCD) क्या है और 4,500 मीटर से अधिक गहराई पर चूना-प्रधान ऊज़ क्यों अनुपस्थित होते हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

कार्बोनेट क्षतिपूर्ति गहराई या CCD (Carbonate Compensation Depth) महासागर की लगभग 4,000 से 4,500 मीटर की वह गहराई है, जहां ऊपर से गिरने वाले कैल्शियम कार्बोनेट के जमाव की दर उसके घुलने की दर के बराबर हो जाती है। 4,500 मीटर से नीचे अनुपस्थिति का कारण: 4,500 मीटर से अधिक गहराई पर महासागरीय जल अत्यंत शीतल (1°-2°C) होता है तथा जल पर सैकड़ों वायुमंडलीय दाब कार्य करता है। इन दशाओं में जल में कार्बन डाइऑक्साइड की घुलनशीलता अत्यधिक बढ़ जाती है, जिससे जल में कार्बोनिक अम्ल ($H_2CO_3$) बनता है। यह अम्लीय जल मृत जीवों के कैल्शियम कार्बोनेट ($CaCO_3$) के खोलों को पूरी तरह घोल देता है। अतः चूने वाले ग्लोबीजेरिना या टेरोपोड ऊज़ तल पर पहुंचने से पहले ही नष्ट हो जाते हैं। इसलिए इस गहराई पर केवल अघुलनशील सिलिका ऊज़ तथा लाल मृत्तिका (Red Clay) ही संचित होती है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

समुद्री तरंगों (Waves) और समुद्री धाराओं (Currents) को एक ही समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि दीर्घ ज्वार (Spring Tide) केवल वसंत ऋतु में आता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि चंद्रमा के पास होने से सूर्य का ज्वार में कोई योगदान नहीं है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

जलमंडलीय भू-संरचना एवं समुद्र विज्ञान मॉडल WBCHSE कक्षा 11 भूगोल • महासागरीय नितल के उच्चावच, थर्मोक्लाइन, लवणता एवं ज्वार-भाटा महासागरीय नितल के उच्चावच (Ocean Floor Morphology) महाद्वीपीय मग्नतट • मग्नढाल • अगाध मैदान • मध्य-महासागरीय कटक • महासागरीय गर्त Sea Level (০ মি / 0 m) भ्रंश घाटी एवं मैग्मा महाद्वीपीय मग्नतट (0-200 m) महाद्वीपीय मग्नढाल (200-3000 m) जलमग्न कैनियन (स्वैच ऑफ नो ग्राउंड) महाद्वीपीय उत्थान अगाध सागरीय मैदान (3000-6000 m) Pelagic Oozes & Red Clay मध्य-महासागरीय कटक गुयोट (Guyot) महासागरीय गर्त (मेरियाना / सुंडा) ऊर्ध्वाधर जलीय स्तरीकरण (Thermocline & Halocline) तापमान, लवणता एवं घनत्व का गहराई के साथ परिवर्तन 0 m 200 m 1000 m 4000 m 0°C 10°C 25°C सतही मिश्रित परत (0-200 m: 20°-25°C) थर्मोक्लाइन परत (200-1000 m: तीव्र ताप ह्रास) Rapid Drop ~ 20°C → 4°C गहरी महासागरीय परत (>1000 m: 1°-3°C) कार्बोनेट क्षतिपूर्ति गहराई (CCD ~ 4500 m) Calcareous oozes dissolve below CCD ↺ Planetary Ocean Currents गल्फ स्ट्रीम एवं सारगासो सागर Gulf Stream (warm) + Labrador (cold) → Grand Banks Indian Ocean semi-annual Monsoon Drift reversal ☽ Tidal Generating Mechanics दीर्घ ज्वार (सिजिगी) बनाम लघु ज्वार Moon's gravitational attraction = 2.17 × Sun's tidal pull Tidal interval: 12 hrs 26 mins (daily lag: 50 mins) 🌊 Estuarine Dynamics & Bores हुगली नदी में सांड की बाण (Tidal Bore) Funnel estuary + shallow riverbed → roaring tidal wall Equinoctial spring tides (আশ্বিন-কার্তিক / फालगुन-चैत्र)

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. जल वितरण: जलमंडल में 138.6 करोड़ घन किमी जल है; 97.2% जल महासागरों में लवणीय है तथा मीठा जल मात्र 2.8% है (जिसका 68.7% बर्फ के रूप में संचित है)।
मुख्य बिंदु 2
  1. नितल के उच्चावच: महाद्वीपीय मग्नतट (मंद 1° ढाल, प्रकाशमान क्षेत्र, मत्स्य व खनिज तेल), मग्नढाल (तीव्र 2°-5° ढाल, सियाल-सिमा सीमा), महाद्वीपीय उत्थान तथा अगाध मैदान (3,000-6,000 मीटर)।
मुख्य बिंदु 3
  1. विशिष्ट स्थलरूप: मध्य-अटलांटिक कटक (16,000 किमी), मेरियाना गर्त का चैलेंजर दीप (11,022 मीटर) तथा तरंगों द्वारा समतल शीर्ष वाले जलमग्न गुयोट पर्वत।
मुख्य बिंदु 4
  1. ऊर्ध्वाधर तापमान: सतही मिश्रित परत (0-200 मीटर: 20°-25°C), थर्मोक्लाइन परत (200-1,000 मीटर: तीव्र ताप ह्रास 20°C से 4°C) तथा अगाध समतापीय जल (1°-3°C)।
मुख्य बिंदु 5
  1. लवणता के नियम: औसत लवणता 35‰ है; डिटमार के नियम के अनुसार लवणों का प्रतिशत अनुपात सदैव स्थिर रहता है (NaCl 77.7%)। बंगाल की खाड़ी में नदियों के कारण लवणता कम (30-32‰) तथा अरब सागर में वाष्पीकरण से अधिक (36-37‰) है।
मुख्य बिंदु 6
  1. महासागरीय धाराएं: पवन, कोरिओलिस बल और घनत्व से धाराओं के चक्र (Gyres) बनते हैं; उत्तरी अटलांटिक चक्र के मध्य में शांत सारगासो सागर स्थित है।
मुख्य बिंदु 7
  1. हिंद महासागर में मानसूनी उत्क्रमण: मानसूनी पवनों के साथ ग्रीष्म ऋतु में धाराएं घड़ी की सुई की दिशा में और शीत ऋतु में विपरीत दिशा में बहती हैं।
मुख्य बिंदु 8
  1. ज्वार-भाटा बलविज्ञान: दूरी के घनफल नियम से चंद्रमा का ज्वार बल सूर्य से 2.17 गुना अधिक है। सिजिगी में दीर्घ ज्वार तथा समकोण पर लघु ज्वार आता है; दैनिक ज्वार 50 मिनट विलंब से होता है।
मुख्य बिंदु 9
  1. हुगली नदी में सांड की बाण: कीपाकार मुहाने व उच्च ज्वार के कारण आश्विन-कार्तिक तथा फाल्गुन-चैत्र मास में हुगली नदी में 2-3 मीटर ऊंची जलदीवार गर्जना के साथ ऊपर चढ़ती है।
मुख्य बिंदु 10
  1. महासागरीय तलछट: मग्नतट पर स्थलजात पंक; 2,000-4,000 मीटर पर चूना ऊज़ (ग्लोबीजेरिना), जो CCD (4,500 मीटर) के नीचे घुल जाता है और गहरे नितल पर लाल मृत्तिका व मैंगनीज पिंड मिलते हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
भूवैज्ञानिक सीमा के रूप में महाद्वीपीय मग्नढाल का क्या महत्व है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: यह वह स्पष्ट भूवैज्ञानिक सीमा है जहां महाद्वीपों की हल्की ग्रेनाइटिक सियाल चट्टानें समाप्त होती हैं और महासागरों की भारी बेसाल्टिक सिमा चट्टानें प्रारंभ होती हैं।
2
विलियम डिटमार के स्थिर अनुपात नियम का मूल निष्कर्ष क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: यद्यपि विभिन्न सागरों में कुल लवणता भिन्न हो सकती है, किंतु उसमें घुले प्रमुख लवणों (जैसे NaCl 77.7% व MgCl2 10.9%) का पारस्परिक प्रतिशत अनुपात विश्व भर में सदैव एक समान रहता है।
3
हिंद महासागर में समुद्री धाराओं के मौसमी दिशा परिवर्तन का क्या कारण है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: हिंद महासागर में मानसूनी पवनों का द्विवार्षिक उत्क्रमण—ग्रीष्मकालीन दक्षिण-पश्चिम मानसून जल को घड़ी की दिशा में और शीतकालीन उत्तर-पूर्व मानसून जल को विपरीत दिशा में बहाता है।
4
दीर्घ ज्वार के समय ज्वारीय उभार सर्वाधिक क्यों होता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि सिजिगी स्थिति (अमावस्या पर युति व पूर्णिमा पर वियुति) में सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी 180° सीधी रेखा में होते हैं, जिससे सूर्य और चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल आपस में जुड़ जाते हैं।
5
कार्बोनेट क्षतिपूर्ति गहराई (CCD) क्या है और इसके नीचे कौन-सा निक्षेप मिलता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: CCD वह 4,000-4,500 मीटर की गहराई है जहां चूने के घुलने की दर उसके जमाव के बराबर हो जाती है; इसके नीचे केवल अघुलनशील लाल मृत्तिका और सिलिका डायटम ऊज़ मिलता है।
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कक्षा 11 Geography के सभी अध्याय

अध्याय 1: एक विषय के रूप में भूगोल अध्याय 2: पृथ्वी की उत्पत्ति एवं आंतरिक संरचना अध्याय 3: भू-आकृतिक प्रक्रियाएं अध्याय 4: मौसम एवं जलवायु अध्याय 5: समस्थिति की संकल्पना अध्याय 6: जलमंडल अध्याय 7: मानव भूगोल का क्षेत्र एवं विषय-वस्तु अध्याय 8: आर्थिक भूगोल अध्याय 9: Secondary Activities - Industry अध्याय 10: तृतीयक क्रियाकलाप अध्याय 11: चतुर्थक क्रियाकलाप अध्याय 12: पंचमक क्रियाकलाप अध्याय 13: एक देश के रूप में भारत अध्याय 14: भारत की संरचना एवं भू-आकृति अध्याय 15: भारत का अपवाह तंत्र अध्याय 16: भारत की जलवायु अध्याय 17: भारत के वन एवं प्राकृतिक वनस्पति अध्याय 18: भारत की प्राकृतिक आपदाएं एवं संकट

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