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WBB • कक्षा XI • Geography • अध्याय 15
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

भारत का अपवाह तंत्र

भारत का अपवाह तंत्र उपमहाद्वीप के भू-आकृतिक विकास, विवर्तनिक संरचना एवं मानसूनी जलवायु द्वारा निर्धारित एक अत्यंत जटिल एवं समृद्ध जलविज्ञान नेटवर्क है। नदी प्रधान देश होने के नाते भारत की नदियां न केवल कृषि के लिए सिंचाई का जल उपलब्ध कराती हैं और उपजाऊ जलोढ़ मैदानों का निर्माण करती हैं, बल्कि जलविद्युत उत्पादन, अंतर्देशीय जलमार्ग, औद्योगिक व घरेलू जलापूर्ति तथा अद्वितीय पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं। भौगोलिक उत्पत्ति, जलप्रवाह की प्रकृति तथा आयु के आधार पर भारतीय अपवाह तंत्र को दो प्रमुख संवर्गों में विभाजित किया जाता है: हिमालयी अपवाह तंत्र (सिंधु, गंगा एवं ब्रह्मपुत्र) जो वर्षपर्यंत हिमनदों के पिघलने तथा मानसूनी वर्षा से पोषित होने के कारण सदानीरा (Perennial) हैं, तथा प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र (गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी, नर्मदा एवं ताप्ती) जो मुख्य रूप से वर्षा-पोषित एवं अनित्यवाही हैं। हिमालयी नदियां भूगर्भीय रूप से युवा हैं और गहरी वी-आकार की घाटियों, गहरे महाखड्डों (Gorges), पूर्ववर्ती जलप्रवाह तथा बंगाल में विश्व के सबसे बड़े डेल्टा का निर्माण करती हैं। इसके विपरीत, प्रायद्वीपीय नदियां प्राचीन गोंडवाना भूखंड पर बहते हुए अपनी क्षरण की अंतिम अवस्था में पहुंच चुकी हैं और चौड़ी व उथली घाटियों में प्रवाहित होती हैं। साथ ही, पश्चिम बंगाल का विशिष्ट क्षेत्रीय अपवाह—जैसे उत्तरी बंगाल की तीस्ता, तोर्सा व जलढाका, राढ़ क्षेत्र की दामोदर (DVC) तथा सुंदरबन की ज्वारीय खाड़ियां—इस अध्याय के प्रमुख अध्ययन बिंदु हैं।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

भारत के अपवाह तंत्र का अध्ययन देश की खाद्य सुरक्षा, बाढ़ एवं सूखा प्रबंधन तथा सतत पर्यावरणीय संतुलन के लिए अपरिहार्य है। भारत में मानसूनी वर्षा वर्ष के केवल तीन से चार महीनों में केंद्रित होती है, जिससे एक ओर गंगा और ब्रह्मपुत्र की घाटियों में विनाशकारी बाढ़ आती है, वहीं दूसरी ओर दक्कन के वर्षा-छाया क्षेत्रों में गंभीर सूखे का संकट उत्पन्न होता है। जल-विभाजक, नदी बेसिन और हाइड्रोग्राफ का वैज्ञानिक ज्ञान बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं, बाढ़ नियंत्रण तटबंधों और राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना के क्रियान्वयन के लिए अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त, नगरीय अपशिष्ट व औद्योगिक प्रदूषण से गंगा और यमुना जैसी नदियों की रक्षा करना तथा न्यूनतम पारिस्थितिक प्रवाह (E-Flow) बनाए रखना राष्ट्रीय जल सुरक्षा का सर्वोपरि लक्ष्य है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 अपवाह तंत्र की अवधारणा, जल-विभाजक ए...
2 हिमालयी अपवाह तंत्र: सिंधु एवं ब्रह...
3 गंगा नदी तंत्र: पंचप्रयाग, द्रोणी स...
4 प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र: पूर्ववाहि...
5 पश्चिम बंगाल का अपवाह तंत्र: क्षेत्...
6 नदी व्यवस्था, जल प्रबंधन, नदी जोड़ो...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

अपवाह तंत्र की अवधारणा, जल-विभाजक एवं अपवाह प्रतिरूप

1. मौलिक जलविज्ञानीय शब्दावली एवं अवधारणाएं

धरातलीय ढाल, शैल संरचना और विवर्तनिक इतिहास के अनुसार निश्चित जलमार्गों या वाहिकाओं के माध्यम से जल के प्राकृतिक प्रवाह को अपवाह तंत्र (Drainage System) कहा जाता है।

  • नदी द्रोणी या बेसिन (Drainage Basin / River Catchment): एक मुख्य नदी और उसकी समस्त सहायक नदियों द्वारा अपवाहित समग्र भौगोलिक क्षेत्र को उस नदी का बेसिन या द्रोणी कहते हैं। भारत का सबसे बड़ा नदी बेसिन गंगा नदी बेसिन है (भारत में इसका क्षेत्रफल लगभग 8,60,000 वर्ग किमी है)।
  • जल-विभाजक (Water Divide / Watershed): दो निकटवर्ती नदी द्रोणियों को एक-दूसरे से अलग करने वाली कोई भी पर्वत श्रेणी, उच्चभूमि अथवा कटक जल-विभाजक कहलाता है।
    • दिल्ली कटक एवं अरावली पर्वत: पश्चिम में सिंधु नदी तंत्र तथा पूर्व में गंगा नदी तंत्र के मध्य मुख्य जल-विभाजक का कार्य करता है।
    • विंध्य एवं सतपुड़ा पर्वतमाला: उत्तर भारत के गंगा अपवाह तंत्र तथा दक्षिण भारत के प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र को विभाजित करती है।
    • पश्चिमी घाट (सह्याद्रि): प्रायद्वीपीय भारत का मुख्य निरंतर जल-विभाजक है, जो अरब सागर में गिरने वाली छोटी व तीव्रगामी नदियों तथा बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली लंबी नदियों के मध्य स्थित है।
  • पूर्ववर्ती नदी बनाम अध्यारोपित नदी:
    • पूर्ववर्ती नदी (Antecedent River): वे नदियां जिनका अस्तित्व किसी पर्वतमाला के उत्थान से पूर्व था और जिन्होंने पर्वत के उत्थान की दर से अधिक या समान गति से लंबवत अपरदन (Downcutting) करते हुए अपने मूल प्रवाह मार्ग को अक्षुण्ण बनाए रखा। उदाहरण: सिंधु, सतलुज, ब्रह्मपुत्र, सुबनसिरी, अरुण (कोसी की सहायक)।
    • अध्यारोपित नदी (Superimposed River): ऐसी नदी जो मूल रूप से एक ऊपरी आवरण शैल पर विकसित हुई और बाद में अपरदन द्वारा नीचे की विषम प्राचीन संरचना पर अपना मार्ग आरोपित कर दिया। उदाहरण: सुवर्णरेखा, चंबल, दामोदर, बनास।
2. अपवाह प्रतिरूप (Drainage Patterns) का वर्गीकरण
अपवाह प्रतिरूप भू-आकृतिक विशेषताएं एवं शैल संरचना भारतीय उदाहरण
द्रुमाकृतिक या वृक्षाकार (Dendritic) पेड़ की शाखाओं जैसी संरचना; सहायक नदियां मुख्य नदी से न्यूनकोण पर मिलती हैं। समरूप एवं क्षैतिज शैल संस्तरों पर विकसित। उत्तर भारत के विशाल मैदान, गंगा, गोदावरी, कृष्णा एवं महानदी बेसिन।
जालीनुमा (Trellis) समानांतर मुख्य अनुवर्ती नदियां और उनसे समकोण पर मिलने वाली परवर्ती नदियां; कठोर एवं कोमल चट्टानों के एकांतर वलन क्षेत्रों में विकसित। शिवालिक पर्वतमाला, छोटानागपुर पठार के सीमांत भाग एवं सिंहभूम क्षेत्र।
अरीय प्रतिरूप (Radial) किसी केंद्रीय गुंबदाकार उच्चभूमि या ज्वालामुखी पर्वत से नदियां पहिए की तीलियों की भांति सभी दिशाओं में बाहर की ओर प्रवाहित होती हैं। अमरकंटक पठार (नर्मदा पश्चिम में, सोन उत्तर में तथा जोहिला), गिरनार पहाड़ियां (गुजरात)।
अभिकेंद्री (Centripetal) चारों ओर की उच्चभूमियों से नदियां बहकर किसी केंद्रीय गर्त, झील या आंतरिक बेसिन में विसर्जित होती हैं। मणिपुर की लोकटक झील, राजस्थान की सांभर लवण झील बेसिन।
आयताकार (Rectangular) नदियां समकोण पर मुड़ती हैं; शैल संधियों (Joints) और भ्रंश रेखाओं (Faults) द्वारा नियंत्रित होती हैं। विंध्य के बलुआ पत्थर क्षेत्र तथा बुंदेलखंड के ग्रेनाइट शैल संधियां।
समानांतर (Parallel) तीव्र ढाल वाले संकीर्ण धरातल पर नदियां परस्पर समानांतर बहती हैं। पश्चिमी घाट के तीव्र पश्चिमी ढाल से बहकर अरब सागर में गिरने वाली नदियां (शरावती, नेत्रावती, पेरियार)।

हिमालयी अपवाह तंत्र: सिंधु एवं ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

1. हिमालयी नदियों की प्रमुख विशेषताएं

हिमालयी नदियां ट्रांस-हिमालय एवं वृहत हिमालय के उच्च हिमाच्छादित शिखरों से निकलती हैं। इनकी मुख्य विशेषताएं हैं:

  • सदानीरा स्वरूप (Perennial Nature): ये नदियां ग्रीष्मकाल में हिमनदों के पिघले जल से तथा वर्षाकाल में मानसूनी वर्षा से पोषित होती हैं, जिससे वर्षभर इनमें जल बना रहता है।
  • युवावस्था का आधिक्य: पर्वतीय भागों में तीव्र गति से लंबवत अपरदन कर गहरी 'वी' आकार की घाटियां, विशाल महाखड्ड (जैसे गिलगित के पास सिंधु गॉर्ज), जलप्रपात एवं क्षिप्रिकाएं (Rapids) बनाती हैं।
  • भारी अवसादन एवं विसर्पण: मैदानों में प्रवेश करते ही ढाल मंद होने से विशाल जलोढ़ निक्षेप, गुंफित जलमार्ग (Braided channels), गोखुर झीलें और विनाशकारी मार्ग परिवर्तन देखने को मिलता है।
2. सिंधु नदी तंत्र (Indus River System)

सिंधु विश्व की विशालतम नदी प्रणालियों में से एक है। इसकी कुल लंबाई लगभग 2,880 किमी (भारत में 1,114 किमी) और कुल बेसिन क्षेत्रफल 11,65,000 वर्ग किमी (भारत में 3,21,289 वर्ग किमी) है।

  • उद्गम: तिब्बत में मानसरोवर झील के निकट कैलाश पर्वतमाला के बोखर चू (Bokhar Chu) हिमनद से (~4,164 मीटर ऊंचाई पर)। तिब्बत में इसे सिंगी खंबान ('शेर का मुख') कहते हैं।
  • भारत में प्रवाह: लद्दाख एवं जास्कर श्रेणियों के बीच उत्तर-पश्चिम दिशा में बहती हुई लेह से गुजरती है और गिलगित के पास 5,180 मीटर गहरा महाखड्ड बनाकर पाकिस्तान में प्रवेश करती है।
  • दाएं तट की सहायक नदियां: श्योक, गिलगित, हुंजा, शिगार, द्रास, काबुल, कुर्रम और गोमल।
  • बाएं तट का पंचनद (The Panjnad):
    • झेलम (Jhelum / वितस्ता): कश्मीर में पीरपंजाल की तलहटी में वेरीनाग झरने से उद्गम; श्रीनगर तथा वूलर झील से होकर बहती है।
    • चेनाब (Chenab / अस्किनी): सिंधु की सबसे बड़ी सहायक नदी; हिमाचल प्रदेश के केलांग के निकट चंद्रा और भागा नामक दो नदियों के मिलने से बनती है।
    • रावी (Ravi / परुष्णी): हिमाचल प्रदेश में कुल्लू पहाड़ियों के रोहतांग दर्रे से उद्गम।
    • ब्यास (Beas / विपाशा): रोहतांग दर्रे के ब्यास कुंड से उद्गम; पूर्णतः भारत में प्रवाहित होकर पंजाब के हरिके में सतलुज से मिलती है।
    • सतलुज (Satluj / शतद्रु): एक पूर्ववर्ती नदी; तिब्बत में मानसरोवर के निकट राक्षसताल (Rakas Lake) से निकलती है; शिपकी ला दर्रे से भारत में प्रवेश करती है; भाखड़ा-नांगल बांध इसी नदी पर स्थित है।
  • सिंधु जल समझौता (Indus Waters Treaty, 1960): विश्व बैंक की मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान के बीच संपन्न हुआ। इसके अंतर्गत तीन पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास, सतलुज) का अनन्य अधिकार भारत को तथा तीन पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चेनाब) का जल पाकिस्तान को आवंटित किया गया।
3. ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र (Brahmaputra River System)

तिब्बत में मानसरोवर झील के दक्षिण-पूर्व में कैलाश श्रेणी के चेमायुंगदुंग हिमनद से लगभग 5,150 मीटर की ऊंचाई से निकलती है:

  • तिब्बत में प्रवाह: तिब्बत में इसे त्सांगपो (Tsangpo) कहा जाता है, जिसका अर्थ है 'पवित्र करने वाली'। यह हिमालय के समानांतर पूर्व दिशा में लगभग 1,200 किमी तक प्रवाहित होती है।
  • ग्रेट यू-टर्न एवं नामचा बारवा: नामचा बारवा शिखर (7,757 मीटर) के पास नदी अचानक अंग्रेजी के 'U' आकार में मुड़कर विश्व का सबसे गहरा महाखड्ड (यारलुंग त्सांगपो ग्रैंड कैनियन) बनाती है और अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है, जहां इसे सिआंग और बाद में दिहांग कहा जाता है।
  • असम घाटी एवं ब्रह्मपुत्र नामकरण: सादिया के निकट दिहांग नदी में पूर्व से आने वाली दो विशाल सहायक नदियां—दिबांग एवं लोहित मिलती हैं। इस त्रिवेणी संगम के पश्चात ही नदी को आधिकारिक रूप से ब्रह्मपुत्र कहा जाता है।
  • प्रमुख विशेषताएं:
    • गुंफित नदी एवं माजुली द्वीप: अत्यधिक अवसाद एवं मंद ढाल के कारण असम में नदी गुंफित (Braided) हो जाती है। इसके मध्य स्थित माजुली द्वीप विश्व का सबसे बड़ा आबाद नदी द्वीप तथा भारत का पहला नदी द्वीप जिला है।
    • प्रमुख सहायक नदियां: दाएं तट की: सुबनसिरी (पूर्ववर्ती), कामेंग, मानस, संकोश और तीस्ता। बाएं तट की: बूढ़ी दिहिंग, धनसिरी और कोपिली।
    • बांग्लादेश में प्रवेश: धुबरी के निकट बांग्लादेश में प्रवेश करते ही इसे जमुना कहा जाता है। यह पद्मा (गंगा) से मिलती है और अंततः मेघना बनकर बंगाल की खाड़ी में विसर्जित होती है।

गंगा नदी तंत्र: पंचप्रयाग, द्रोणी संरचना एवं डेल्टा

1. गंगा का उद्गम एवं गढ़वाल हिमालय के पंचप्रयाग

गंगा भारत की राष्ट्रीय एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण नदी है (लंबाई 2,525 किमी)। इसका उद्गम उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में गंगोत्री हिमनद के गोमुख हिमगुहा से (3,892 मीटर ऊंचाई) भागीरथी के रूप में होता है। बद्रीनाथ के ऊपर सतोपंथ हिमनद से अलकनंदा निकलती है।

अलकनंदा नदी के मार्ग में पांच पवित्र संगम स्थित हैं, जिन्हें पंचप्रयाग कहा जाता है:

प्रयाग (संगम) मुख्य नदी मिलने वाली सहायक नदी भौगोलिक एवं धार्मिक महत्व
1. विष्णुप्रयाग (Vishnuprayag) अलकनंदा धौलीगंगा जोशीमठ के निकट पहला संगम।
2. नंदप्रयाग (Nandaprayag) अलकनंदा नंदाकिनी नंदा देवी पर्वत के पश्चिमी ढाल से निकलने वाली नदी।
3. कर्णप्रयाग (Karnaprayag) अलकनंदा पिंडर नदी कुमाऊं के पिंडारी हिमनद से आने वाली नदी।
4. रुद्रप्रयाग (Rudraprayag) अलकनंदा मंदाकिनी (कालीगंगा) केदारनाथ के निकट चोराबाड़ी हिमनद से निकलने वाली नदी।
5. देवप्रयाग (Devprayag) अलकनंदा भागीरथी ऐतिहासिक संगम; यहां से दोनों नदियों की संयुक्त धारा आधिकारिक रूप से 'गंगा' कहलाती है।
2. गंगा का प्रवाह मार्ग एवं प्रमुख सहायक नदियां

हरिद्वार के निकट गंगा शिवालिक पहाड़ियों को पार कर उत्तरी मैदानों में प्रवेश करती है। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार तथा पश्चिम बंगाल में बहते हुए यह अनेक विशाल सहायक नदियों का जल ग्रहण करती है:

  • दाएं तट की सहायक नदियां:
    • यमुना: गंगा की सबसे लंबी एवं सबसे पश्चिमी सहायक नदी (लंबाई 1,376 किमी)। बंदरपूंछ चोटी के यमुनोत्री हिमनद से निकलती है। प्रयागराज में त्रिवेणी संगम पर गंगा में मिलती है। इसकी मुख्य सहायक नदियां चंबल (उत्खात भूमि/बीहड़ के लिए प्रसिद्ध), सिंध, बेतवा और केन हैं।
    • सोन: अमरकंटक पठार से निकलकर पटना के निकट गंगा में मिलती है।
    • दामोदर: छोटानागपुर से निकलकर पश्चिम बंगाल में हुगली में मिलती है।
  • बाएं तट की सहायक नदियां:
    • रामगंगा: कुमाऊं हिमालय से निकलकर कन्नौज के पास गंगा से मिलती है।
    • गोमती: पीलीभीत की फुलहर झील से निकलने वाली मैदानी नदी; लखनऊ इसके तट पर स्थित है।
    • घाघरा (करनाली): तिब्बत के मापचाचुंगो हिमनद से उद्गम; जल की मात्रा की दृष्टि से गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी; छपरा के पास मिलती है।
    • गंडक: नेपाल में धौलागिरि एवं एवरेस्ट के मध्य से निकलकर पटना के निकट सोनपुर में मिलती है।
    • कोसी: सात धाराओं (सप्तकोसी) से मिलकर बनी; मुख्य धारा अरुण तिब्बत से आने वाली पूर्ववर्ती नदी है; बार-बार मार्ग बदलने तथा भीषण बाढ़ के कारण इसे 'बिहार का शोक' कहा जाता है।
    • महानंदा: दार्जिलिंग की पहाड़ियों से निकलकर पश्चिम बंगाल व बिहार होते हुए गंगा से मिलती है; भारत में गंगा के बाएं तट की अंतिम सहायक नदी है।
3. फरक्का में विभाजन एवं गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के फरक्का के निकट गंगा दो मुख्य वितरिकाओं में विभाजित हो जाती है:

  1. भागीरथी-हुगली: मुख्य शाखा पश्चिम बंगाल के राढ़ और डेल्टाई मैदानों से होकर दक्षिण में बहती हुई कोलकाता और हल्दिया से गुजरकर गंगासागर (बंगाल की खाड़ी) में विसर्जित होती है।
  2. पद्मा: मुख्य जलप्रवाह बांग्लादेश में प्रवेश करता है, जहां यह जमुना (ब्रह्मपुत्र) और बाद में मेघना से मिलकर विश्व के सबसे बड़े सक्रिय डेल्टा—गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा (सुंदरबन डेल्टा) का निर्माण करता है।

प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र: पूर्ववाहिनी एवं पश्चिमवाहिनी नदियां

1. प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र की उत्पत्ति एवं भू-आकृतिक लक्षण

प्रायद्वीपीय नदियां हिमालयी नदियों की तुलना में भूगर्भीय दृष्टि से अत्यंत प्राचीन हैं। ये नदियां चौड़ी, उथली तथा प्रौढ़ घाटियों में प्रवाहित होती हैं और अपने अपरदन के आधार तल को प्राप्त कर क्रमबद्ध ढाल (Graded profile) बना चुकी हैं।

  • पश्चिमी किनारे का निमज्जन: टर्शियरी काल में प्रायद्वीप के पश्चिमी भाग के समुद्र में धंसने से पश्चिमी घाट की तीव्र भ्रंश कगार का निर्माण हुआ।
  • प्रायद्वीप का सामान्य ढाल: प्रायद्वीपीय भूखंड का सामान्य झुकाव उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर होने के कारण अधिकांश प्रमुख नदियां बंगाल की खाड़ी की ओर प्रवाहित होती हैं।
  • भ्रंश घाटियां (Rift Valleys): विंध्य और सतपुड़ा के मध्य स्थित भ्रंश द्रोणियों के कारण नर्मदा और ताप्ती नदियां सामान्य ढाल के विपरीत पश्चिम दिशा में अरब सागर की ओर बहती हैं।
2. पूर्ववाहिनी प्रायद्वीपीय नदियां (बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली)
नदी का नाम लंबाई एवं बेसिन क्षेत्र उद्गम स्थल प्रमुख सहायक नदियां महत्वपूर्ण परियोजनाएं एवं डेल्टा
महानदी (Mahanadi) 851 किमी
1,41,600 वर्ग किमी
छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले में सिहावा पहाड़ियां बाएं: शिवनाथ, हसदेव, मांड, इब।
दाएं: ओंग, जोंक, तेल।
ओडिशा के संबलपुर में हीराकुंड बांध (विश्व का सबसे लंबा मिट्टी का बांध)। पारादीप में विशाल डेल्टा।
गोदावरी (Godavari)
'दक्षिण गंगा'
1,465 किमी (प्रायद्वीप की सबसे लंबी नदी)
3,12,812 वर्ग किमी
महाराष्ट्र के नासिक जिले में त्र्यंबकेश्वर (पश्चिमी घाट) बाएं: पेनगंगा, वर्धा, वेनगंगा (संयुक्त रूप से प्राणहिता), इंद्रावती, सबरी।
दाएं: मंजरा।
पोलावरम परियोजना, श्रीराम सागर। राजमुंदरी के पास विशाल चापाकार डेल्टा बनाती है।
कृष्णा (Krishna) 1,401 किमी
2,58,948 वर्ग किमी
महाराष्ट्र में महाबलेश्वर के निकट पश्चिमी घाट (~1,338 मी) दाएं: कोयना, पंचगंगा, घाटप्रभा, मालप्रभा, तुंगभद्रा।
बाएं: भीमा, मूसी, मुन्नेरू।
नागार्जुन सागर बांध, श्रीशैलम बांध, अलमत्ती बांध। विजयवाड़ा में विस्तृत डेल्टा बनाती है।
कावेरी (Kaveri)
'दक्षिण की गंगा'
800 किमी
81,155 वर्ग किमी
कर्नाटक के कोडागु (कूर्ग) जिले में ब्रह्मगिरि पहाड़ियों का तालाकावेरी बाएं: हेमावती, शिमशा, अर्कावती।
दाएं: लक्ष्मणतीर्थ, काबिनी, भवानी, अमरावती।
सदानीरा स्वरूप: ऊपरी बेसिन दक्षिण-पश्चिम मानसून से तथा निचला बेसिन उत्तर-पूर्वी लौटते मानसून से वर्षा प्राप्त करता है। शिवसमुद्रम जलप्रपात एवं मेट्टूर बांध।
3. पश्चिमवाहिनी प्रायद्वीपीय नदियां (अरब सागर में गिरने वाली)

पश्चिमवाहिनी नदियां मुहाने पर कोई डेल्टा नहीं बनातीं; इसके स्थान पर वे गहरे ज्वारनदमुख (Estuary) का निर्माण करती हैं:

  • नर्मदा: पश्चिमवाहिनी नदियों में सबसे लंबी (1,312 किमी)। मध्य प्रदेश के अमरकंटक पठार से उद्गम। उत्तर में विंध्य तथा दक्षिण में सतपुड़ा के मध्य स्थित संकीर्ण भ्रंश घाटी में बहती है। जबलपुर के निकट भेड़ाघाट में संगमरमर की चट्टानों पर भव्य धुंआधार जलप्रपात बनाती है। मुख्य बांध: सरदार सरोवर बांध (गुजरात)। खंभात की खाड़ी में 27 किमी लंबा ज्वारनदमुख बनाती है।
  • ताप्ती (Tapi / Tapti): दूसरी प्रमुख पश्चिमवाहिनी नदी (724 किमी)। मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में मुलताई के सतपुड़ा पठार से निकलती है। सतपुड़ा के दक्षिण में समानांतर भ्रंश घाटी से बहती हुई सूरत के पास खंभात की खाड़ी में गिरती है। प्रमुख परियोजनाएं: उकाई बांध एवं काकरापार परियोजना।
  • अन्य महत्वपूर्ण पश्चिमवाहिनी नदियां:
    • साबरमती: राजस्थान के अरावली से निकलकर अहमदाबाद से होते हुए खंभात की खाड़ी में गिरती है।
    • माही: विंध्य से निकलती है; कर्क रेखा को दो बार पार करती है।
    • लूनी (Luni): थार मरुस्थल की प्रमुख अंतःस्थलीय अपवाह नदी। अजमेर के पास अरावली से निकलकर कच्छ के रण में विलीन हो जाती है। बालोतरा तक इसका जल मीठा तथा आगे खारा हो जाता है।
    • गोवा की नदियां: मांडवी एवं जुआरी (मारमुगाओ बंदरगाह जुआरी के मुहाने पर स्थित है)।
    • कर्नाटक की नदियां: शरावती (इस पर भारत का प्रसिद्ध जोग या गरसोप्पा जलप्रपात स्थित है, ऊंचाई 253 मी) एवं काली।
    • केरल की नदियां: पेरियार (केरल की सबसे लंबी नदी, 244 किमी; इडुक्की चाप बांध) एवं भरतपुझा।

पश्चिम बंगाल का अपवाह तंत्र: क्षेत्रीय जलविज्ञान एवं प्रबंधन

1. पश्चिम बंगाल के अपवाह तंत्र का भू-आकृतिक विभाजन

पश्चिम बंगाल की नदी प्रणाली को उसकी भौगोलिक अवस्थिति तथा प्रवाह की दिशा के आधार पर तीन प्रमुख संवर्गों में विभाजित किया जाता है:

पश्चिम बंगाल के तीन नदी क्षेत्र:
1. उत्तरी बंगाल की हिमालयी तीव्रगामी नदियां
2. पश्चिमी पठार एवं राढ़ क्षेत्र की नदियां
3. सुंदरबन डेल्टा की ज्वारीय नदियां व खाड़ियां
2. उत्तरी बंगाल की नदियां (हिमालय से उद्गमित)

ये नदियां वर्षभर हिमनद के पिघले जल से पोषित सदानीरा हैं, अत्यंत तीव्रगामी हैं और वर्षाकाल में तराई व डुआर्स में गंभीर बाढ़ उत्पन्न करती हैं:

  • तीस्ता (Teesta - उत्तरी बंगाल की जीवनरेखा): उत्तरी सिक्किम में पौहुनरी हिमनद की त्सो ल्हामो झील से निकलती है (~7,068 मीटर ऊंचाई पर)। दार्जिलिंग हिमालय में गहरा महाखड्ड बनाती हुई तीस्ता बाजार में रंगीत नदी से मिलती है। सिलीगुड़ी के निकट सेवोक से मैदान में उतरकर जलपाईगुड़ी होते हुए बांग्लादेश में जमुना से मिलती है। ऐतिहासिक पहलू: 1787 की भीषण बाढ़ से पूर्व तीस्ता गंगा की सहायक नदी थी, परंतु बाढ़ के बाद इसका मार्ग पूर्व की ओर ब्रह्मपुत्र में परिवर्तित हो गया।
  • तोर्सा (Torsa): तिब्बत की चुंबी घाटी में अमो चू के नाम से निकलकर भूटान तथा अलीपुरद्वार के जलदापाड़ा अभयारण्य से होकर बहती है।
  • जलढाका (Jaldhaka): सिक्किम की बिदांग झील से निकलकर भूटान, कलिम्पोंग, जलपाईगुड़ी एवं कूचबिहार होते हुए बांग्लादेश में जमुना में मिलती है। झालोंग में जलविद्युत केंद्र है।
  • महानंदा (Mahananda): दार्जिलिंग के कुर्सेओंग के निकट महालदीराम पहाड़ियों से निकलकर सिलीगुड़ी व मालदा होते हुए बांग्लादेश सीमा पर गंगा से मिलती है। प्रमुख सहायक नदियां बालासन व मेची हैं।
  • अन्य नदियां: कालजानी, रायडाक, संकोश (पश्चिम बंगाल और असम की सीमा बनाती है)।
3. पश्चिमी पठार एवं राढ़ क्षेत्र की नदियां (छोटानागपुर पठार से उद्गमित)

ये नदियां वर्षा-पोषित अनित्यवाही हैं; मानसून में अचानक भीषण बाढ़ लाती हैं और ग्रीष्मकाल में सूख जाती हैं:

  • दामोदर (Damodar - 'बंगाल का शोक'): झारखंड के पलामू जिले में छोटानागपुर पठार की खमारपात पहाड़ी से उद्गम। पुरुलिया, बांकुरा, बर्धमान एवं हुगली से होकर उलुबेड़िया के निकट हुगली नदी में मिलती है। ऐतिहासिक रूप से भीषण बाढ़ लाने के कारण इसे 'बंगाल का शोक' कहा जाता था। 1948 में अमेरिका की टेनेसी वैली अथॉरिटी (TVA) की तर्ज पर दामोदर घाटी निगम (DVC) की स्थापना की गई। प्रमुख बांध: तिलैया, मैथन, कोनार, पंचेत तथा दुर्गापुर बैराज।
  • रूपनारायण (Rupnarayan): पश्चिम मेदिनीपुर के घाटल के निकट द्वारकेश्वर एवं सिलाबती (सिलाई) के संगम से बनती है और गेओंखाली में हुगली से मिलती है।
  • कंसाई या कंगासाबती (Kangsabati): पुरुलिया के छोटानागपुर पठार से उद्गम; मुकुटमणिपुर में कुमारी नदी के संगम पर भारत का दूसरा सबसे बड़ा मिट्टी का बांध बना है।
  • मयूराक्षी (Mayurakshi): झारखंड के देवघर की त्रिकूट पहाड़ियों से उद्गम; इस पर प्रसिद्ध मसानजोर बांध (कनाडा बांध) स्थित है।
  • सुवर्णरेखा (Subarnarekha): रांची पठार से निकलकर पुरुलिया, झारखंड और ओडिशा होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है; हुंडरू जलप्रपात इसी पर स्थित है; रेत में सोने के कण पाए जाने के कारण यह नाम पड़ा।
4. सुंदरबन की ज्वारीय नदियां एवं खाड़ियां

दक्षिण एवं उत्तर 24 परगना के सुंदरबन क्षेत्र में नदियां वस्तुतः समुद्र के ज्वारभाटे के जल से पोषित खारे पानी की खाड़ियां हैं। प्रमुख नदियों में मातला, गोसाबा, बिद्याधरी, रायमंगल, सप्तमुखी, ठाकुरान, कालंदी एवं पियाली शामिल हैं। गंगा से संपर्क कट जाने के कारण ये स्थानीय प्रवाह बन गई हैं।

हुगली नदी का बाण (Tidal Bore): वर्षाकाल में पूर्णिमा या अमावस्या के समय समुद्र का तीव्र ज्वार जब हुगली नदी के संकीर्ण एवं उथले मुहाने में प्रवेश करता है, तो नदी के प्रवाह से टकराकर 5-6 मीटर ऊंची जल-दीवार के रूप में गर्जना करते हुए ऊपर की ओर दौड़ता है। इसे बाण आना (বাণ ডাকা) कहते हैं।

नदी व्यवस्था, जल प्रबंधन, नदी जोड़ो परियोजना एवं प्रदूषण नियंत्रण

1. नदी जलप्रवाह की प्रकृति या रिवर रेजीम (River Regime)

वर्ष के विभिन्न महीनों में नदी के जल प्रवाह (Discharge) की मात्रा में होने वाले उतार-चढ़ाव के वार्षिक प्रतिरूप को रिवर रेजीम कहते हैं, जिसे वार्षिक हाइड्रोग्राफ द्वारा दर्शाया जाता है:

  • उत्तर भारतीय हिमालयी रेजीम (द्वि-शिखर हाइड्रोग्राफ): वर्ष में दो बार जल प्रवाह का शिखर प्राप्त होता है—पहला मई-जून में ग्रीष्मकालीन हिमनद पिघलने से, और दूसरा जुलाई-सितंबर में मानसूनी वर्षा से। सर्दियों में प्रवाह न्यूनतम रहता है।
  • दक्षिण भारतीय प्रायद्वीपीय रेजीम (एकल-शिखर हाइड्रोग्राफ): हिमनदों का अभाव होने से प्रवाह पूर्णतः वर्षा पर निर्भर है। जुलाई-अगस्त में तीक्ष्ण शिखर बनता है और ग्रीष्मकाल में नदियां सूख जाती हैं। (अपवाद: कावेरी नदी, जो वर्ष में दो बार वर्षा प्राप्त करती है)।
2. राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना (National River Interlinking Project)

भारत के पूर्वी क्षेत्रों के अधिशेष जल को पश्चिमी व दक्षिणी सूखाग्रस्त क्षेत्रों में स्थानांतरित करने के लिए राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (NWDA) ने इस योजना को दो भागों में तैयार किया है:

  1. हिमालयी घटक (14 संपर्क): गंगा और ब्रह्मपुत्र के अतिरिक्त बाढ़ के जल को पश्चिम में सिंधु तथा दक्षिण में महानदी बेसिन में भेजना।
  2. प्रायद्वीपीय घटक (16 संपर्क): दक्षिण भारत की नदियों को परस्पर जोड़ना। इसमें केन-बेतवा लिंक परियोजना (KBLP) भारत की पहली स्वीकृत नदी जोड़ो परियोजना है, जिससे मध्य प्रदेश की केन नदी का अधिशेष जल उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र की बेतवा नदी में भेजा जा रहा है।
3. नदी प्रदूषण, नमामि गंगे एवं पर्यावरणीय प्रवाह (E-Flow)

अनियंत्रित सीवेज, रासायनिक उर्वरक तथा औद्योगिक कचरे के कारण भारत की प्रमुख नदियां भीषण प्रदूषण से ग्रस्त हैं:

  • नमामि गंगे कार्यक्रम (Namami Gange Programme): 2014 में केंद्र सरकार द्वारा गंगा नदी के प्रदूषण उन्मूलन एवं पुनरुद्धार के लिए आरंभ किया गया एकीकृत मिशन। इसके मुख्य स्तंभ हैं:
    • आधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) स्थापित कर नालों के गंदे पानी का सीधे नदी में गिरना रोकना।
    • घाटों एवं श्मशान घाटों का आधुनिकीकरण (वाराणसी, हरिद्वार, कानपुर)।
    • गांगेय डॉल्फिन एवं जलीय जैवविविधता का संरक्षण।
    • नदी के तटों पर व्यापक वनीकरण एवं जैविक कृषि को प्रोत्साहन।
  • पर्यावरणीय प्रवाह (Environmental Flow / E-Flow): बांधों और बैराजों के नीचे जलीय पारिस्थितिकी, मत्स्य पालन एवं जल की प्राकृतिक सफाई क्षमता बनाए रखने के लिए नदी में छोड़ा जाने वाला न्यूनतम अनिवार्य जलप्रवाह ई-फ्लो कहलाता है।

महत्वपूर्ण भौगोलिक अवधारणाएँ, नियम एवं निर्देशांक

हार्टन का द्विभाजन अनुपात सूत्र (Bifurcation Ratio)
$$R_b = N_u / N_{u+1}$$
नदी जल विसर्जन समीकरण (Discharge Continuity Equation)
$$Q = A \times V$$
अपवाह घनत्व सूत्र (Drainage Density)
$$D_d = \sum L / A$$

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
उद्गम, जलप्रवाह की प्रकृति, अपरदन चक्र तथा डेल्टा निर्माण के आधार पर हिमालयी एवं प्रायद्वीपीय नदी तंत्र की तुलना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

हिमालयी तथा प्रायद्वीपीय नदी तंत्रों के मध्य मुख्य भू-आकृतिक एवं जलविज्ञानीय अंतर निम्नलिखित हैं:

  1. उद्गम एवं जल का स्रोत:

    • हिमालयी नदियां: हिमालय एवं ट्रांस-हिमालय के विशाल हिमनदों से निकलती हैं (जैसे गंगोत्री, बोखर चू, चेमायुंगदुंग)। ये हिमनद पिघलने एवं वर्षा दोनों से पोषित होकर वर्षभर सदानीरा (Perennial) रहती हैं।
    • प्रायद्वीपीय नदियां: पश्चिमी घाट, विंध्य या सतपुड़ा की कम ऊंची पहाड़ियों से निकलती हैं (जैसे त्र्यंबकेश्वर, महाबलेश्वर, अमरकंटक)। ये केवल वर्षा पर निर्भर होकर अनित्यवाही होती हैं।
  2. अपरदन चक्र की अवस्था एवं घाटी स्वरूप:

    • हिमालयी नदियां: भूगर्भीय रूप से युवावस्था में हैं। तीव्र ढाल पर बहते हुए गहरी 'वी' आकार की घाटियां, गहरे महाखड्ड (गॉर्ज) तथा जलप्रपात बनाती हैं।
    • प्रायद्वीपीय नदियां: अत्यंत प्राचीन गोंडवाना शैल पर प्रवाहित होकर अपनी प्रौढ़ या जीर्णावस्था में पहुंच चुकी हैं। घाटियां चौड़ी, उथली तथा क्रमबद्ध ढाल (Graded profile) वाली हैं।
  3. मार्ग परिवर्तन एवं अवसाद भार:

    • हिमालयी नदियां: भारी मात्रा में रेत एवं अवसाद ढोती हैं, जिससे मैदानी भागों में मार्ग परिवर्तन तथा भयंकर बाढ़ आती है (जैसे कोसी एवं ब्रह्मपुत्र)।
    • प्रायद्वीपीय नदियां: कठोर शैलों पर बहने से अवसाद कम होता है और इनके प्रवाह मार्ग स्थिर व अपरिवर्तनीय रहते हैं।
  4. डेल्टा बनाम ज्वारनदमुख (Estuary):

    • हिमालयी नदियां: मुहाने पर विशाल चापाकार डेल्टा बनाती हैं (जैसे गंगा-ब्रह्मपुत्र सुंदरबन डेल्टा)।
    • प्रायद्वीपीय नदियां: पूर्ववाहिनी नदियां (गोदावरी, कृष्णा) डेल्टा बनाती हैं, किंतु पश्चिमवाहिनी नदियां (नर्मदा, ताप्ती) भ्रंश घाटी से बहने के कारण मुहाने पर डेल्टा के स्थान पर ज्वारनदमुख (Estuary) बनाती हैं।
उदाहरण 2
पूर्ववर्ती नदी (Antecedent River) किसे कहते हैं? भारतीय हिमालय की नदियों के संदर्भ में इसकी व्याख्या कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. पूर्ववर्ती नदी की परिभाषा: ऐसी नदी जिसका विकास किसी पर्वत श्रेणी या स्थलरूप के उत्थान से पहले हो चुका था और जिसने अपने मार्ग में आने वाले पर्वत के उत्थान के बावजूद, उत्थान की दर के बराबर लंबवत अपरदन (Downcutting) जारी रखकर अपने मूल प्रवाह मार्ग को बनाए रखा, उसे पूर्ववर्ती नदी (Antecedent River) कहते हैं।

  2. महाखड्ड (Gorge) निर्माण की प्रक्रिया: जैसे-जैसे पर्वत धीरे-धीरे ऊपर उठता गया, नदी ने अपनी घाटी को और अधिक गहरा काटना जारी रखा। इसके परिणामस्वरूप अत्यंत खड़े ढाल वाले गहरे और संकीर्ण महाखड्ड (Gorges या Canyons) बने।

  3. भारतीय उदाहरण:

  • सिंधु नदी: लद्दाख और काराकोरम श्रेणियों के उत्थान को काटकर गिलगित के निकट 5,180 मीटर गहरा सिंधु महाखड्ड बनाया है।
  • ब्रह्मपुत्र नदी: पूर्वी हिमालय में नामचा बारवा पर्वत को काटकर विश्व का सबसे गहरा यारलुंग त्सांगपो महाखड्ड बनाकर भारत में प्रवेश करती है।
  • सतलुज नदी: जास्कर एवं वृहत हिमालय को काटकर शिपकी ला के पास गहरा महाखड्ड बनाती है।
  • अरुण एवं सुबनसिरी: हिमालय के उत्थान से पूर्व की नदियां हैं जो मुख्य हिमालयी अक्ष को काटकर बहती हैं।
उदाहरण 3
अलकनंदा नदी के प्रवाह मार्ग में स्थित पंचप्रयागों के नाम क्रमबद्ध लिखिए तथा प्रत्येक प्रयाग में मिलने वाली नदियों का उल्लेख कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में अलकनंदा नदी पर उत्तर से दक्षिण (उद्गम से मुहाने की ओर) स्थित पांच पवित्र संगम या पंचप्रयाग निम्नलिखित हैं:

  1. विष्णुप्रयाग (Vishnuprayag):

    • अलकनंदा एवं धौलीगंगा का संगम।
    • जोशीमठ के निकट लगभग 1,372 मीटर की ऊंचाई पर स्थित।
  2. नंदप्रयाग (Nandaprayag):

    • अलकनंदा एवं नंदाकिनी का संगम।
    • नंदा देवी पर्वत के पश्चिमी ढाल से आने वाली नंदाकिनी यहां मिलती है।
  3. कर्णप्रयाग (Karnaprayag):

    • अलकनंदा एवं पिंडर नदी का संगम।
    • पिंडारी हिमनद से निकलने वाली पिंडर नदी यहां अलकनंदा से मिलती है।
  4. रुद्रप्रयाग (Rudraprayag):

    • अलकनंदा एवं मंदाकिनी (कालीगंगा) का संगम।
    • केदारनाथ के निकट चोराबाड़ी हिमनद से निकलने वाली मंदाकिनी यहां मिलती है।
  5. देवप्रयाग (Devprayag):

    • अलकनंदा एवं भागीरथी का ऐतिहासिक संगम।
    • महत्वपूर्ण बिंदु: देवप्रयाग के बाद ही इन दोनों नदियों की संयुक्त धारा आधिकारिक रूप से 'गंगा' कहलाती है।
उदाहरण 4
नर्मदा और ताप्ती नदियां पश्चिम दिशा में क्यों बहती हैं और वे अपने मुहाने पर डेल्टा क्यों नहीं बनातीं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

नर्मदा और ताप्ती नदियों के पश्चिम प्रवाह और डेल्टा न बनाने के निश्चित भूगर्भीय कारण हैं:

  1. भ्रंश घाटी (Rift Valley) में पश्चिम प्रवाह:

    • यद्यपि प्रायद्वीपीय भारत का सामान्य ढाल उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर है, जिसके कारण गोदावरी और कृष्णा बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं।
    • परंतु दक्कन ज्वालामुखी एवं विवर्तनिक हलचलों के दौरान विंध्य और सतपुड़ा के मध्य संकीर्ण धंसाव वाली भ्रंश घाटियां (Grabens) बनीं।
    • नर्मदा नदी विंध्य व सतपुड़ा के मध्य तथा ताप्ती नदी सतपुड़ा के दक्षिण की भ्रंश घाटी से होकर बहती है। इस संरचनात्मक दरार के कारण ये सामान्य ढाल के विपरीत पश्चिम में अरब सागर की ओर बहती हैं।
  2. डेल्टा न बनाने के प्रमुख कारण:

    • अवसाद की कमी: ये नदियां कठोर बेसाल्ट व ग्रेनाइट चट्टानों से होकर बहती हैं, जिससे जल में गाद और अवसाद की मात्रा अत्यंत कम होती है।
    • संकीर्ण घाटी एवं तीव्र वेग: संकीर्ण पथरीले खड्डों में बहने के कारण नदी का वेग मुहाने तक तेज बना रहता है, जिससे निक्षेपण नहीं हो पाता।
    • खंभात की खाड़ी का तीव्र ज्वारभाटा: खंभात की खाड़ी में भारत का सबसे शक्तिशाली ज्वारभाटा (8-10 मीटर ऊंचा) आता है। यह तीव्र ज्वारीय धारा मुहाने पर आने वाले थोड़े-बहुत मलबे को बहाकर गहरे समुद्र में ले जाती है, जिससे मुहाने पर डेल्टा के स्थान पर ज्वारनदमुख (Estuary) का निर्माण होता है।
उदाहरण 5
उत्तरी बंगाल की नदियों में बार-बार विनाशकारी बाढ़ आने के क्या कारण हैं? इसके निवारण के उपाय बताइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तरी बंगाल की नदियों (तीस्ता, तोर्सा, जलढाका, कालजानी) में प्रतिवर्ष आने वाली भयंकर बाढ़ के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  1. बाढ़ के प्रमुख कारण:

    • अत्यधिक मानसूनी वर्षा: पूर्वी हिमालय के दक्षिणी ढालों पर वर्षाकाल में 3,000 से 5,000 मिमी तक मूसलाधार वर्षा होती है, जिससे अत्यधिक सतही जल एकत्रित होता है।
    • ढाल में आकस्मिक परिवर्तन: नदियां खड़ी पर्वतीय ढालों से तीव्र वेग से उतरकर अचानक तराई एवं डुआर्स के समतल मैदानों में प्रवेश करती हैं, जिससे जल का वेग मंद पड़कर किनारों को तोड़ देता है।
    • नदी तल का उथला होना: सिक्किम और भूटान की पहाड़ियों में भूस्खलन और वनों की कटाई से भारी मात्रा में पत्थर, रेत और गाद नदी तल में जमा हो जाती है, जिससे नदी की जलधारण क्षमता घट जाती है।
    • गुंफित मार्ग एवं किनारों का कटना: तल उथला होने से नदियां अनेक धाराओं में बंट जाती हैं और किनारों को काटकर बस्तियों को जलमग्न कर देती हैं।
  2. निवारण एवं प्रबंधन के उपाय:

    • ऊपरी बेसिन में सघन वनीकरण: सिक्किम और भूटान के पर्वतीय ढालों पर व्यापक वृक्षारोपण कर मृदा अपरदन और भूस्खलन को रोकना।
    • नदी तल की गाद निकालना (Dredging): नदी के उथले स्थानों से गाद और पत्थरों को हटाकर प्रवाह क्षमता को बढ़ाना।
    • चेक डैम और जलाशय निर्माण: तलहटी में छोटे-छोटे जलाशय बनाकर वर्षा के अतिरिक्त जल को नियंत्रित करना।
    • सीमापार पूर्व-चेतावनी प्रणाली: भूटान और भारत के मध्य जलस्तर के त्वरित आंकड़ों के आदान-प्रदान का तंत्र मजबूत करना।
उदाहरण 6
दामोदर घाटी निगम (DVC) की स्थापना के उद्देश्य एवं उपलब्धियों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

दामोदर घाटी निगम (DVC) की स्थापना 7 जुलाई 1948 को स्वतंत्र भारत की पहली बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना के रूप में की गई थी। यह अमेरिका की टेनेसी वैली अथॉरिटी (TVA) के मॉडल पर आधारित थी।

  1. DVC के प्रमुख उद्देश्य:

    • बाढ़ नियंत्रण: दामोदर नदी की विनाशकारी बाढ़ को नियंत्रित करना, जिसे ऐतिहासिक रूप से 'बंगाल का शोक' कहा जाता था।
    • सिंचाई का विस्तार: पश्चिम बंगाल और झारखंड के लाखों हेक्टेयर कृषि क्षेत्र को बारहमासी नहर सिंचाई उपलब्ध कराना।
    • विद्युत उत्पादन: पनबिजली एवं तापविद्युत केंद्रों का निर्माण कर पूर्वी भारत के उद्योगों को ऊर्जा आपूर्ति करना।
    • मृदा संरक्षण एवं वनीकरण: छोटानागपुर पठार के कटावग्रस्त क्षेत्रों में मृदा अपरदन रोकना।
  2. निर्मित प्रमुख बांध एवं बैराज:

    • बराकर नदी पर तिलैया बांध तथा मैथन बांध (मैथन में भूमिगत जलविद्युत केंद्र है)।
    • दामोदर नदी पर पंचेत बांध तथा कोनार नदी पर कोनार बांध।
    • पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में दुर्गापुर बैराज, जिससे लगभग 2,496 किमी लंबी सिंचाई नहरें निकाली गई हैं।
  3. महत्वपूर्ण उपलब्धियां:

    • दामोदर की विनाशकारी बाढ़ पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित हुआ और बर्धमान जिला पश्चिम बंगाल का समृद्ध 'अन्न भंडार' बन गया।
    • दुर्गापुर-आसनसोल-रानीगंज औद्योगिक पेटी को जल और विद्युत प्रदान कर इसे 'भारत का रूर' बनाने में निर्णायक योगदान दिया।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

'दक्षिण गंगा' (गोदावरी) और 'दक्षिण की गंगा' (कावेरी) में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

लंबाई और विशालता के कारण गोदावरी को 'दक्षिण गंगा' या 'वृद्ध गंगा' कहा जाता है। पवित्रता और सदानीरा प्रवाह के कारण कावेरी को 'दक्षिण की गंगा' कहा जाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मान लेना कि प्रायद्वीप की सभी नदियां पूर्व की ओर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

अधिकांश नदियां बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं, परंतु नर्मदा और ताप्ती भ्रंश घाटी के कारण पश्चिम की ओर बहकर अरब सागर में गिरती हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह लिखना कि गंगोत्री से सीधे 'गंगा' नदी निकलती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

गंगोत्री के गोमुख से निकलने वाली धारा भागीरथी है। देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलने के बाद ही इसे 'गंगा' कहा जाता है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

भारत का अपवाह तंत्र एवं प्रमुख नदी द्रोणियां हिमालयी एवं प्रायद्वीपीय नदियों का तुलनात्मक विश्लेषण, जल-विभाजक व पंचप्रयाग हिमालयी अपवाह तंत्र (सदानीरा एवं हिमनद जनित) सिंधु तंत्र (झेलम, चेनाब, रावी, ब्यास, सतलुज) गंगा तंत्र (लंबाई: 2525 किमी | अलकनंदा + भागीरथी) पंचप्रयाग: देव, रुद्र, कर्ण, नंद एवं विष्णुप्रयाग ब्रह्मपुत्र (तिब्बत में त्सांगपो, दिहांग, माजुली द्वीप) प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र (वर्षा-पोषित एवं प्रौढ़) पूर्ववाहिनी नदियां (बंगाल की खाड़ी - डेल्टा निर्माता) महानदी, गोदावरी (दक्षिण गंगा), कृष्णा, कावेरी पश्चिमवाहिनी नदियां (अरब सागर - ज्वारनदमुख / एश्चुअरी) नर्मदा एवं ताप्ती (भ्रंश घाटी), साबरमती, लूनी प्रमुख जल विभाजक एवं अपवाह प्रतिरूप दिल्ली कटक एवं अरावली: सिंधु व गंगा तंत्र का जल-विभाजक विंध्य एवं सतपुड़ा पर्वत: उत्तर व दक्षिण भारतीय अपवाह का विभाजन पश्चिमी घाट: अरब सागर व बंगाल की खाड़ी अपवाह का मुख्य विभाजक पश्चिम बंगाल का अपवाह तंत्र एवं प्रबंधन उत्तरी बंगाल: तीस्ता (जीवनरेखा), तोर्सा, जलढाका राढ़ क्षेत्र: दामोदर (DVC बहुउद्देशीय परियोजना), रूपनारायण सुंदरबन: मातला, गोसाबा, बिद्याधरी (ज्वारीय खाड़ियां) पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक कक्षा 11 भूगोल • भारतीय अपवाह तंत्र व्यापक मानचित्र

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
भारतीय अपवाह तंत्र को दो प्रमुख भागों में बांटा गया है: हिमालयी अपवाह तंत्र (सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र) तथा प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र (गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी, नर्मदा, ताप्ती)।
मुख्य बिंदु 2
प्रमुख जल-विभाजकों में दिल्ली कटक-अरावली (सिंधु व गंगा के बीच), विंध्य-सतपुड़ा (उत्तर व दक्षिण भारत के बीच) तथा पश्चिमी घाट (अरब सागर व बंगाल की खाड़ी के बीच) शामिल हैं।
मुख्य बिंदु 3
सिंधु, सतलुज और ब्रह्मपुत्र पूर्ववर्ती नदियां हैं, जो हिमालय के उत्थान से पूर्व विद्यमान थीं और गहरे महाखड्ड काटकर अपना मार्ग बनाए हुए हैं।
मुख्य बिंदु 4
सिंधु नदी तिब्बत के बोखर चू हिमनद से निकलती है और पंचनद (झेलम, चेनाब, रावी, ब्यास, सतलुज) के साथ पाकिस्तान होते हुए अरब सागर में गिरती है।
मुख्य बिंदु 5
गंगा नदी गंगोत्री के गोमुख से भागीरथी के रूप में निकलकर देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलकर गंगा बनती है और फरक्का में भागीरथी-हुगली तथा पद्मा में विभाजित होती है।
मुख्य बिंदु 6
अलकनंदा के पंचप्रयाग हैं: विष्णुप्रयाग (धौलीगंगा), नंदप्रयाग (नंदाकिनी), कर्णप्रयाग (पिंडर), रुद्रप्रयाग (मंदाकिनी) तथा देवप्रयाग (भागीरथी)।
मुख्य बिंदु 7
ब्रह्मपुत्र तिब्बत में त्सांगपो कहलाती है; नामचा बारवा से यू-टर्न लेकर असम में दिहांग, दिबांग व लोहित के मिलने से ब्रह्मपुत्र बनती है और माजुली द्वीप बनाती है।
मुख्य बिंदु 8
प्रायद्वीपीय नदियां प्रौढ़ावस्था में हैं; पूर्ववाहिनी नदियां (गोदावरी, कृष्णा, कावेरी) बंगाल की खाड़ी में विस्तृत डेल्टा बनाती हैं।
मुख्य बिंदु 9
नर्मदा और ताप्ती नदियां भ्रंश घाटियों में पश्चिम की ओर बहकर खंभात की खाड़ी में ज्वारनदमुख (Estuary) बनाती हैं और डेल्टा नहीं बनातीं।
मुख्य बिंदु 10
पश्चिम बंगाल का अपवाह तंत्र उत्तरी बंगाल की हिमनद-पोषित नदियों (तीस्ता, तोर्सा), पश्चिमी राढ़ की वर्षा-पोषित नदियों (दामोदर DVC) तथा सुंदरबन की ज्वारीय खाड़ियों से मिलकर बना है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

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अध्याय 1: एक विषय के रूप में भूगोल अध्याय 2: पृथ्वी की उत्पत्ति एवं आंतरिक संरचना अध्याय 3: भू-आकृतिक प्रक्रियाएं अध्याय 4: मौसम एवं जलवायु अध्याय 5: समस्थिति की संकल्पना अध्याय 6: जलमंडल अध्याय 7: मानव भूगोल का क्षेत्र एवं विषय-वस्तु अध्याय 8: आर्थिक भूगोल अध्याय 9: Secondary Activities - Industry अध्याय 10: तृतीयक क्रियाकलाप अध्याय 11: चतुर्थक क्रियाकलाप अध्याय 12: पंचमक क्रियाकलाप अध्याय 13: एक देश के रूप में भारत अध्याय 14: भारत की संरचना एवं भू-आकृति अध्याय 15: भारत का अपवाह तंत्र अध्याय 16: भारत की जलवायु अध्याय 17: भारत के वन एवं प्राकृतिक वनस्पति अध्याय 18: भारत की प्राकृतिक आपदाएं एवं संकट

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