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WBB • कक्षा XI • Geography • अध्याय 3
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

भू-आकृतिक प्रक्रियाएं

भू-आकृतिक प्रक्रियाएं उन समस्त भौतिक एवं रासायनिक बलों और प्रक्रियाओं का समुच्चय हैं जो भू-गर्भिक समय पैमाने पर पृथ्वी के धरातलीय स्वरूप, उच्चावच और स्थलरूपों का निरंतर निर्माण, संपादन और रूपांतरण करती हैं। धरातल का वर्तमान भौगोलिक परिदृश्य दो मूलभूत विपरीत बलों के गतिशील संतुलन का परिणाम है: अंतर्जात बल और बहिर्जात बल। अंतर्जात प्रक्रियाएं पृथ्वी के आंतरिक भाग से उत्पन्न होती हैं, जो रेडियोधर्मी तत्वों के विखंडन जनित ऊष्मा, अवशिष्ट आदिम ताप और दुर्बलतामण्डल (एस्थेनोस्फीयर) में प्रवाहित संवहन धाराओं से ऊर्जा प्राप्त करती हैं। ये संचलन दीर्घकालिक पटल विरूपण (महादेशीय ऊर्ध्वाधर संचलन तथा पर्वत निर्माणकारी क्षैतिज संपीड़न-तनाव संचलन) तथा आकस्मिक घटनाओं (भूकंप एवं ज्वालामुखी) के रूप में अभिव्यक्त होकर महाद्वीपों, वलित पर्वतों, भ्रंश घाटियों और पठारों का निर्माण करते हैं। इसके विपरीत, बहिर्जात प्रक्रियाएं सौर ऊर्जा तथा गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा संचालित होकर अपक्षय, वृहत् संचलन, अपरदन एवं निक्षेपण के माध्यम से तलसंतुलन (ग्रेडेशन) का कार्य करती हैं, जिसमें निम्नीकरण द्वारा उच्च भूभागों को काटकर समुद्र तल या अपरदन के आधार तल तक नीचा किया जाता है और अभिवृद्धि द्वारा निचले गर्तों को अवसादों से भरकर समतल बनाया जाता है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

भू-आकृतिक प्रक्रियाओं की गहन वैज्ञानिक समझ पर्यावरणीय भूविज्ञान, आपदा प्रबंधन, सिविल इंजीनियरिंग तथा प्राकृतिक संसाधन सर्वेक्षण के लिए नितांत अनिवार्य है। विवर्तनिक प्लेट सीमाओं और भ्रंश कटिबंधों का अध्ययन करके भूकंपीय संवेदनशीलता का सटीक आकलन और ज्वालामुखी आपदाओं की पूर्व चेतावनी संभव होती है। पश्चिम बंगाल के उत्तरी पर्वतीय भाग (दार्जिलिंग एवं कलिम्पोंग) जैसे नवीन वलित हिमालयी क्षेत्रों में चट्टानों के अपक्षय, ढाल अस्थिरता और वृहत् संचलन का ज्ञान राष्ट्रीय राजमार्गों और रेलमार्गों की सुरक्षा तथा विनाशकारी मानसूनी भूस्खलनों की रोकथाम के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त, अपक्षय की रासायनिक एवं भौतिक प्रक्रियाओं द्वारा ही कृषि योग्य उपजाऊ मृदा परिच्छेदिका (मृदा जनन) का निर्माण होता है, बॉक्साइट व लेटराइट जैसे मूल्यवान खनिजों का संकेंद्रण होता है तथा भूजल भंडारण हेतु रेगोलिथ परत विकसित होती है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. भू-आकृतिक प्रक्रियाओं का स्वरूप...
2 2. पटल विरूपण: महादेशीय एवं पर्वत न...
3 3. महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत एवं...
4 4. ज्वालामुखी एवं भूकंप: आकस्मिक अं...
5 5. बहिर्जात प्रक्रियाएं: भौतिक, रास...
6 6. वृहत् संचलन एवं ढाल विस्थापन: दा...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. भू-आकृतिक प्रक्रियाओं का स्वरूप एवं तलसंतुलन की संकल्पना

भू-आकृतिक बलों का वर्गीकरण

धरातल के स्थलरूपों में परिवर्तन लाने वाले समस्त भू-गर्भिक बलों को उनकी ऊर्जा के स्रोत और कार्यप्रणाली के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:

तुलना का आधार अंतर्जात प्रक्रियाएं (Endogenic Processes) बहिर्जात प्रक्रियाएं (Exogenic Processes)
ऊर्जा का स्रोत पृथ्वी के आंतरिक भाग का रेडियोधर्मी ताप, आदिम अवशिष्ट ऊष्मा तथा मैंटल के संवहन प्रवाह। सूर्य का विकिरण ताप (सौर ऊर्जा) तथा पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल।
क्रिया की दिशा भू-गर्भ से धरातल की ओर ऊर्ध्वाधर (त्रिज्या के समानांतर) अथवा क्षैतिज (स्पर्शरेखीय)। धरातल की खुली चट्टानों पर सीधे वायुमंडलीय संपर्क द्वारा अधोमुखी एवं पार्श्वगामी।
स्थलरूप निर्माण में भूमिका रचनात्मक / विषमता उत्पादक: महाद्वीप, वलित पर्वत, भ्रंशोत्थ पर्वत एवं लावा पठार जैसी प्राथमिक विषमताएं उत्पन्न करते हैं। विनाशात्मक / समतलकारी: तलसंतुलन द्वारा उच्च भूभागों को काटकर और गड्ढों को भरकर समतल धरातल बनाते हैं।
कार्य की गति अधिकांशतः अत्यंत धीमी पटल विरूपणी गति (लाखों वर्ष), कभी-कभी आकस्मिक तीव्र घटनाएं (भूकंप, ज्वालामुखी)। निरंतर धीमी गति से अनाच्छादन एवं ऋतुपरक तीव्र अपरदन व बाढ़ संचयन।
तलसंतुलन की त्रिपक्षीय संकल्पना (Concept of Gradation)

वर्ष 1904 में भूवैज्ञानिक चैम्बरलिन एवं सैलिसबरी ने धरातल की विषमताओं को एक समान तल पर लाने की प्रक्रिया को तलसंतुलन (Gradation) नाम दिया। तलसंतुलन दो विपरीत भू-आकृतिक प्रक्रियाओं का संयुक्त परिणाम है:

  • 1. निम्नीकरण (Degradation): अपक्षय (चट्टानों का स्वस्थान पर टूटना), वृहत् संचलन (गुरुत्व जनित ढाल विस्थापन) तथा गतिशील कारकों (नदी, हिमानी, पवन, सागरीय तरंगें) द्वारा उच्च भूभागों को काटकर नीचा करने की क्रिया। निम्नीकरण को अनाच्छादन (Denudation) भी कहते हैं।
  • 2. अभिवृद्धि (Aggradation): अपरदित मलबे और अवसादों के निचले गड्ढों, नदी घाटियों, झीलों और समुद्री द्रोणियों में जमा होकर भूभाग को ऊपर उठाने की क्रिया को अभिवृद्धि या निक्षेपण कहते हैं।
  • तलसंतुलन सूत्र: $ ext{तलसंतुलन} = ext{निम्नीकरण} + ext{अभिवृद्धि}$।
भू-वैज्ञानिक संकल्पना: अपरदन का आधार तल (Base Level of Erosion)
वर्ष 1875 में अमेरिकी भूवैज्ञानिक जॉन वेस्ली पॉवेल (J.W. Powell) ने ग्रैंड कैनियन के अध्ययन के दौरान 'अपरदन के आधार तल' की संकल्पना प्रस्तुत की। वह निम्नतम तल जिसकी नीचे बहता हुआ जल धरातल को और अधिक लंबवत नहीं काट सकता, अपरदन का आधार तल कहलाता है। समुद्र तल (Mean Sea Level) अपरदन का मुख्य या परम आधार तल (Grand Base Level) है। कोई झील या कठोर चट्टानी संस्तर स्थानीय या अस्थायी आधार तल का कार्य कर सकते हैं।

2. पटल विरूपण: महादेशीय एवं पर्वत निर्माणकारी संचलन, वलन एवं भ्रंशन

पटल विरूपणी संचलन (Diastrophism)

पृथ्वी के आंतरिक भागों से उत्पन्न होने वाले उन समस्त मंद संचलनों को पटल विरूपण (Diastrophism) कहा जाता है, जिनके द्वारा भूपर्पटी की चट्टानों में विरूपण, झुकाव, वलन, उत्थान या विस्थापन होता है। गति की दिशा के आधार पर इन्हें दो वर्गों में बांटा जाता है:

क. महादेशीय संचलन (Epeirogenic Forces — महाद्वीप निर्माणकारी)

ग्रीक शब्द 'Epeiros' (महाद्वीप) से बना है। यह संचलन पृथ्वी की त्रिज्या के समानांतर ऊर्ध्वाधर दिशा (Vertical) में कार्य करता है। इसके प्रभाव से बिना तीव्र विरूपण के विस्तृत महाद्वीपीय भूभाग का संचलन होता है:

  • उत्थान (Upliftment / Emergence): किसी महाद्वीपीय भाग अथवा तटीय भूभाग का समुद्र तल से ऊपर उठ जाना (जैसे—अंडमान-निकोबार एवं सौराष्ट्र तट पर उठी हुई प्रवाल भित्तियां)।
  • निमज्जन (Subsidence / Submergence): तटीय स्थलखंड या महाद्वीपीय सीमा का समुद्र जल में डूब जाना (जैसे—गुजरात के द्वारका तट का जलमग्न प्राचीन नगर एवं सुंदरवन का निमज्जित वन क्षेत्र)।
ख. पर्वत निर्माणकारी संचलन (Orogenic Forces)

ग्रीक शब्द 'Oros' (पर्वत) से बना है। यह संचलन भूपर्पटी के स्पर्शक के समानांतर क्षैतिज दिशा (Horizontal / Tangential) में कार्य करता है। यह दो प्रकार के तनाव बल उत्पन्न करता है:

  • संपीड़न बल (Compressional Force): जब दो आमने-सामने के क्षैतिज बल चट्टानों को दबाते हैं, तो धरातल मुड़कर लहरदार वलित पर्वतों (जैसे—हिमालय, आल्प्स, एंडीज, रॉकी) में बदल जाता है।
  • तनाव बल (Tensional Force): जब दो क्षैतिज बल विपरीत दिशाओं में खिंचाव उत्पन्न करते हैं, तो चट्टानों में दरारें और भ्रंश (Faults) उत्पन्न होते हैं।
ग. वलन की संरचना एवं प्रमुख प्रकार (Folding)

पार्श्विक संपीड़न के प्रभाव से अवसादी चट्टानी संस्तरों में उत्पन्न लहरदार मोड़ों को वलन (Fold) कहते हैं। वलन के प्रमुख अंग:

  • अपनति (Anticline): वलन का उत्तल उठा हुआ भाग जिसकी दोनों भुजाएं केंद्रीय अक्ष से बाहर की ओर ढालू होती हैं। इसके केंद्र में प्राचीनतम चट्टानें होती हैं।
  • अभिनति (Syncline): वलन का अवतल गर्त या द्रोणीनुमा भाग जिसकी भुजाएं केंद्र की ओर ढालू होती हैं। इसके केंद्र में नवीनतम चट्टानें पाई जाती हैं।
  • भुजाएं (Limbs): अपनति के शिखर और अभिनति के गर्त के मध्य स्थित झुके हुए चट्टानी स्तर।
  • अक्षीय तल (Axial Plane): वह काल्पनिक तल जो वलन को दो भागों में विभाजित करता है।
वलन का प्रकार संरचनात्मक विशेषताएं संपीड़न की तीव्रता
सममित वलन (Symmetrical) दोनों भुजाओं का झुकाव कोण समान होता है तथा अक्षीय तल पूर्णतः ऊर्ध्वाधर ($90^\circ$) होता है। दोनों ओर से समान व संतुलित संपीड़न बल।
असममित वलन (Asymmetrical) एक भुजा का ढाल मंद तथा दूसरी भुजा का ढाल तीव्र होता है; अक्षीय तल झुका हुआ होता है। एक दिशा से संपीड़न बल अपेक्षाकृत अधिक प्रबल होता है।
समनत वलन (Isoclinal) दोनों भुजाएं एक ही दिशा में समान कोण पर झुककर लगभग समानांतर हो जाती हैं। अत्यधिक तीव्र व दीर्घकालिक संपीड़न।
परिवलित / शायित वलन (Recumbent) वलन इतना अधिक मुड़ जाता है कि उसका अक्षीय तल क्षैतिज सतह के समानांतर लेट जाता है। चरम एकतरफा पार्श्वगामी धक्का।
नापे / क्षेप-वलन (Nappe) अत्यधिक संपीड़न से शायित वलन की निचली भुजा टूट जाती है और थ्रस्ट तल के सहारे कई किलोमीटर दूर नवीन चट्टानों पर फिसल जाती है। आल्प्स एवं हिमालय जैसे पर्वतों में चरम पर्वत निर्माणकारी हलचल (उदा. गढ़वाल का क्रोल नापे)।
घ. भ्रंशन एवं संबंधित स्थलरूप (Faulting)

जब तनाव या संपीड़न बलों के कारण भूपर्पटीय चट्टानों में दरार पड़ती है और दरार के दोनों ओर की चट्टानें एक-दूसरे के सापेक्ष विस्थापित हो जाती हैं, तो उसे भ्रंश (Fault) कहते हैं। इसके प्रमुख अंग: भ्रंश तल (Fault Plane), लटकती भित्ति (Hanging Wall), पाद भित्ति (Footwall), लंबवत विक्षेप (Throw) तथा क्षैतिज विक्षेप (Heave)।

  • सामान्य भ्रंश (Normal Fault): तनाव बल के कारण बनता है; इसमें लटकती भित्ति पाद भित्ति के सापेक्ष नीचे खिसक जाती है।
  • उत्क्रम भ्रंश (Reverse / Thrust Fault): संपीड़न बल के कारण बनता है; इसमें लटकती भित्ति पाद भित्ति के ऊपर चढ़ जाती है। जब भ्रंश कोण ४५° से कम होता है तो इसे क्षेप भ्रंश (Thrust Fault) कहते हैं।
  • भ्रंशोत्थ पर्वत या ब्लॉक पर्वत (Horst): जब दो समानांतर सामान्य भ्रंशों के बीच का भूभाग ऊपर उठ जाता है या अगल-बगल के भाग नीचे धंस जाते हैं, तो खड़े ढाल वाला उभरा भूभाग हॉर्स्ट कहलाता है (जैसे—भारत की सतपुड़ा श्रेणी, जर्मनी का ब्लैक फॉरेस्ट एवं फ्रांस का वॉसजेस पर्वत)।
  • रिफ्ट घाटी या ग्राबेन (Graben / Rift Valley): जब दो समानांतर भ्रंशों के बीच का केंद्रीय भूभाग तनाव के कारण नीचे धंस जाता है, तो एक लंबी संकीर्ण खड़ी दीवारों वाली घाटी बनती है (जैसे—अफ्रीका की महान भ्रंश घाटी, यूरोप की राइन नदी घाटी तथा भारत की नर्मदा एवं ताप्ती नदी घाटियां)।

3. महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत एवं आधुनिक प्लेट विवर्तनिकी

अल्फ्रेड वेगनर का महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (1912)

जर्मन मौसमविद् एवं भू-भौतिकविद् अल्फ्रेड लोथार वेगनर (Alfred Wegener) ने अपनी पुस्तक Die Entstehung der Kontinente und Ozeane में प्रतिपादित किया कि लगभग 20 करोड़ वर्ष पूर्व (मेसोजोइक महाकल्प) पृथ्वी के समस्त महाद्वीप परस्पर जुड़े हुए थे और उन्होंने एक विशाल आदिम महाद्वीप बनाया था, जिसे पैंजिया (Pangaea) नाम दिया गया। पैंजिया चारों ओर से पैंथालासा (Panthalassa) नामक विशाल महासागर से घिरा हुआ था। कालांतर में पैंजिया दो बड़े भूखंडों में टूट गया:

  • लॉरेशिया (अंगारालैंड): उत्तरी गोलार्ध में उत्तरी अमेरिका, यूरोप एवं एशिया।
  • गोंडवानालैंड: दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, मेडागास्कर, प्रायद्वीपीय भारत, ऑस्ट्रेलिया एवं अंटार्कटिका।
  • दोनों के मध्य एक संकरा पूर्व-पश्चिम विस्तृत उथला सागर था, जिसे टेथिस सागर (Tethys Sea) कहा गया।
वेगनर के सिद्धांत के प्रमुख भू-वैज्ञानिक साक्ष्य
  • 1. तटरेखाओं की साम्यता (Jig-saw Fit): दक्षिण अमेरिका का पूर्वी अटलांटिक उभार (ब्राजील) और अफ्रीका का पश्चिमी तट (गिनी की खाड़ी) एक-दूसरे से पहेली के टुकड़ों की भांति सटीक रूप से मिल जाते हैं। 1965 में एडवर्ड बुलार्ड ने 500 फैदम की गहराई पर कंप्यूटर द्वारा इसकी पुष्टि की।
  • 2. जीवाश्म प्रमाण (Paleontological Evidence):
    • ग्लोसोप्टेरिस (Glossopteris): जीभ के आकार की प्राचीन फर्न वनस्पति के जीवाश्म भारत, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका और अंटार्कटिका में व्यापक रूप से मिलते हैं।
    • मेसोसॉरस (Mesosaurus): मीठे जल के छोटे तैरने वाले सरीसृप के जीवाश्म केवल पूर्वी दक्षिण अमेरिका और दक्षिण-पश्चिमी अफ्रीका की समकालीन शैलों में पाए जाते हैं, जो खारे महासागर को तैरकर पार नहीं कर सकते थे।
    • लिस्ट्रोसॉरस (Lystrosaurus): स्थलीय शाकाहारी सरीसृप के जीवाश्म भारत, अफ्रीका और अंटार्कटिका में मिले हैं।
  • 3. हिमानी टिलाइट निक्षेप: कार्बोनिफेरस युग के हिमानी शिलाखंडों के निक्षेप (तलचिर टिलाइट) उष्णकटिबंधीय भारत, दक्षिण अफ्रीका, मेडागास्कर और ऑस्ट्रेलिया में पाए जाते हैं, जो सिद्ध करते हैं कि ये स्थल कभी दक्षिणी ध्रुव के निकट एक साथ स्थित थे।
  • 4. संरचनात्मक शैल समानता: उत्तरी अमेरिका के अप्लेशियन पर्वत और यूरोप के कैलेडोनियन पर्वतों की चट्टानों की आयु एवं दिशा परस्पर मेल खाती हैं।
आधुनिक प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत (Plate Tectonics Theory)

1960 के दशक में डैन मैकेंजी, रॉबर्ट पार्कर, डब्ल्यू. जेसन मॉर्गन एवं जेवियर ली पिचोन द्वारा विकसित प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत ने वेगनर की परिकल्पना को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। इस सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी का संपूर्ण स्थलमंडल (Lithosphere) लगभग 100-150 किमी मोटे कई दृढ़ खंडों में विभाजित है, जिन्हें प्लेटें कहा जाता है। ये प्लेटें नीचे स्थित अर्ध-पिघले दुर्बलतामण्डल (Asthenosphere) पर तैर रही हैं।

संचलन की चालक शक्ति: वर्ष 1928 में आर्थर होम्स द्वारा प्रतिपादित मैंटल की संवहन धाराएं (Mantle Convection Currents) प्लेटों के विस्थापन की मुख्य चालक शक्ति हैं। रेडियोधर्मी ऊष्मा से चलने वाली ये धाराएं प्लेटों को प्रति वर्ष 1 से 10 सेमी की दर से खिसकाती हैं।

प्लेट सीमा का प्रकार सापेक्ष गति एवं भू-गर्भिक क्रिया निर्मित स्थलरूप एवं उदाहरण
अपसारी / रचनात्मक सीमा (Divergent) दो प्लेटें एक-दूसरे से विपरीत दिशा में दूर जाती हैं। रिक्त स्थान में नीचे से मैग्मा आकर नई महासागरीय पर्पटी का निर्माण करता है (समुद्र अधस्तल विस्तार)। मध्य-अटलांटिक कटक, पूर्वी प्रशांत कटक, महान अफ्रीकी रिफ्ट घाटी। उथले भूकंप एवं दरारी ज्वालामुखी।
अभिसारी / विनाशात्मक सीमा (Convergent) दो प्लेटें परस्पर टकराती हैं। भारी प्लेट निमज्जन क्षेत्र (Subduction Zone) में हल्की प्लेट के नीचे एस्थेनोस्फीयर में धंसकर पिघल जाती है। • महासागरीय-महाद्वीपीय: पेरू-चिली गर्त एवं एंडीज वलित पर्वतমালা।
• महाद्वीपीय-महाद्वीपीय: भारतीय एवं यूरेशियाई प्लेट की टक्कर से हिमालय का निर्माण (कोई निमज्जन या ज्वालामुखी नहीं)।
रूपांतर / संरक्षी सीमा (Transform) दो प्लेटें एक-दूसरे के अगल-बगल क्षैतिज रूप से फिसलती हैं। यहां न तो नई पर्पटी बनती है और न ही विनाश होता है। कैलिफोर्निया का सैन एंड्रियास भ्रंश (San Andreas Fault)। तीव्र विनाशकारी भूकंप उत्पन्न होते हैं किंतु ज्वालामुखी नहीं होते।

4. ज्वालामुखी एवं भूकंप: आकस्मिक अंतर्जात संचलन

ज्वालामुखी क्रिया (Volcanism): अंतर्वेधी एवं बहिर्वेधी स्थलरूप

भू-गर्भ में स्थित पिघली हुई तरल चट्टान को मैग्मा (Magma) कहते हैं, जो अत्यधिक गैस व वाष्प दाब के कारण जब धरातल के किसी छिद्र या दरार से बाहर निकलती है, तो उसे लावा (Lava) कहा जाता है। लावा के जमने से दो प्रकार के स्थलरूप बनते हैं:

क. अंतर्वेधी प्लूटोनिक आग्नेय स्थलरूप (Intrusive Landforms)
  • बैथोलिथ (Batholith): भूपर्पटी की अत्यधिक गहराई में स्थित ग्रेनाइट चट्टानों का विशाल गुंबदाकार मैग्मा पिंड, जो पर्वतों की जड़ों का आधार बनता है (जैसे—रांची का ग्रेनाइट बैथोलिथ)।
  • लैकोलिथ (Laccolith): उत्तल छतरीनुमा या उत्तल लेंस के आकार का मैग्मा संचयन जिसका तल समतल तथा शीर्ष उभरा हुआ होता है।
  • लोपोलिथ (Lopolith): ऊपर के भार के कारण तश्तरी या उथले कटोरे के आकार में अवतल रूप में धंसा हुआ मैग्मा भंडार।
  • फैकोलिथ (Phacolith): वलित चट्टानों की अपनति के शिखर अथवा अभिनति के गर्त में जमा लेंस के आकार का मैग्मा पिंड।
  • सिल (Sill): अवसादी चट्टानों के संस्तर तलों के समानांतर क्षैतिज रूप से जमी मैग्मा की चादर।
  • डाइक (Dyke): अवसादी चट्टानों के स्तरों को काटकर लगभग लंबवत दीवार की भांति जमा मैग्मा का स्तंभ (महाराष्ट्र के दक्कन ट्रैप में बहुतायत से मिलता है)।
ख. बहिर्वेधी आग्नेय स्थलरूप (Extrusive Landforms)
  • शील्ड ज्वालामुखी (Shield Volcano): अत्यधिक तरल क्षारीय बेसाल्ट लावा के शांत रूप से फैलने से बने मंद ढाल वाले विशाल गुंबद (जैसे—हवाई द्वीप का मौना लोआ)।
  • मिश्रित ज्वालामुखी (Composite Volcano / Stratovolcano): अत्यधिक गाढ़े अम्लीय लावा तथा राख व अंगारों की एकांतर परतों से बने ऊंचे शंक्वाकार पर्वत (जैसे—जापान का माउंट फ्यूजी, इटली का विसुवियस)।
  • काल्डेरा (Caldera): भयंकर विस्फोट से ज्वालामुखी शंकु के उड़ जाने अथवा मैग्मा कोष्ठ के खाली होकर धंस जाने से बना विशाल कुंड (जैसे—इंडोनेशिया का क्राकाटोआ, अमेरिका की क्रेटर लेक)।
  • लावा पठार (Lava Plateau): शांत दरारी उद्भेदन से निकले बेसाल्ट लावा के लाखों वर्ग किलोमीटर में फैलने से बने सीढ़ीदार पठार (जैसे—भारत का दक्कन ट्रैप)।
भूकंप (Earthquakes): केंद्र, अधिकेंद्र एवं तरंगें

भूपर्पटीय चट्टानों में तनाव के कारण अचानक ऊर्जा मुक्त होने से उत्पन्न धरातलीय कंपन को भूकंप कहते हैं। भू-गर्भ में जहां से ऊर्जा निकलती है, उसे भूकंप मूल या केंद्र (Focus / Hypocenter) कहते हैं। केंद्र के ठीक ऊपर धरातल पर स्थित निकटतम बिंदु को अधिकेंद्र (Epicenter) कहा जाता है, जहां सबसे पहले तरंगें पहुंचती हैं और सर्वाधिक क्षति होती है।

  • भूकंपीय तरंगों का वर्गीकरण:
    • 1. P-तरंगें (प्राथमिक / अनुदैर्घ्य तरंगें): कणों का कंपन तरंग की दिशा के समानांतर होता है। सर्वाधिक तीव्र गति ($6–13 ext{ किमी/सेकंड}$)। ये ठोस, द्रव एवं गैस तीनों माध्यमों में चल सकती हैं।
    • 2. S-तरंगें (द्वितीयक / अनुप्रस्थ तरंगें): कणों का कंपन तरंग दिशा के समकोण पर होता है। गति मध्यम ($3.5–7 ext{ किमी/सेकंड}$)। ये केवल ठोस माध्यम में संचरित हो सकती हैं और द्रव में लुप्त हो जाती हैं।
    • 3. L-तरंगें (धरातलीय तरंगें): लव एवं रेले तरंगें। केवल धरातल के सहारे चलती हैं। गति सबसे कम होती है किंतु इनका आयाम सबसे बड़ा होता है, जिससे सर्वाधिक भौतिक विनाश होता है।
  • मापन पैमाने:
    • रिक्टर पैमाना (1935): भूकंप द्वारा मुक्त कुल ऊर्जा का लघुगणकीय (Logarithmic) मापक। प्रत्येक पूर्ण इकाई वृद्धि पर ऊर्जा लगभग 31.6 गुना बढ़ जाती है।
    • मर्केली पैमाना (MMI): धरातल पर हुए प्रत्यक्ष विनाश व तीव्रता का गुणात्मक मापक (रोमन अंक I से XII तक)।

5. बहिर्जात प्रक्रियाएं: भौतिक, रासायनिक एवं जैविक अपक्षय

अपक्षय की संकल्पना (Weathering)

मौसम एवं जलवायु के विभिन्न कारकों (तापमान, वर्षा, पाला, वायुमंडलीय गैसें) के प्रभाव से धरातल की चट्टानों का अपने ही स्थान पर (In-situ) भौतिक रूप से टूटना और रासायनिक रूप से सड़ना अपक्षय (Weathering) कहलाता है। अपक्षय में टूटी हुई चट्टानों का कोई परिवहन नहीं होता; इससे धरातल पर शिथिल चट्टानी चूर्ण का आवरण बनता है, जिसे रेगोलिथ (Regolith) कहते हैं।

क. भौतिक या यांत्रिक अपक्षय (Physical / Mechanical Weathering)

शुष्क मरुस्थलों तथा उच्च अक्षांशीय व तुषार क्षेत्रों में भौतिक अपक्षय की प्रधानता होती है:

  • 1. अपशल्कन (Exfoliation / प्याज के छिलके की भांति उतरना): ग्रेनाइट जैसी समरूप चट्टानें ऊष्मा की कुचालक होती हैं। दिन में अत्यधिक धूप से बाहरी परत फैलती है और रात में तेजी से सिकुड़ती है, जबकि आंतरिक भाग अप्रभावित रहता है। इस दैनिक तापांतर के कारण चट्टान की बाहरी परतें प्याज के छिलकों की तरह गोलाकार परतों में उखड़ जाती हैं और चिकने अपशल्कन गुंबद बनते हैं (जैसे—रांची और छोटानागपुर के ग्रेनाइट गुंबद)।
  • 2. पिंडी विखंडन (Block Disintegration): समकोणीय जोड़ों वाली चट्टानों में तापीय प्रसार व संकुचन से चट्टानें बड़े-बड़े चौकोर ब्लॉकों में टूट जाती हैं।
  • 3. कणिकीय विखंडन (Granular Disintegration): बहु-खनिजीय चट्टानों (जैसे ग्रेनाइट में क्वार्ट्ज, फेल्डस्पार, अभ्रक) के खनिजों की प्रसार दर भिन्न होने से चट्टानें टूटकर बालू के कणों में बिखर जाती हैं।
  • 4. तुषार विखंडन (Frost Wedging / Gelifraction): उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में दिन के समय चट्टानी दरारों में पानी भर जाता है। रात में तापमान $0^\circ ext{C}$ से नीचे जाने पर पानी बर्फ में बदल जाता है। बर्फ बनने पर आयतन लगभग 9% बढ़ जाता है, जिससे दरारों पर 2000 किग्रा/वर्ग सेमी से अधिक का पार्श्वगामी दबाव पड़ता है। इससे चट्टानें नुकीले कोणीय टुकड़ों में टूटकर घाटी के आधार पर जमा हो जाती हैं, जिन्हें टैलस (Talus) या स्क्री (Scree) कहते हैं।
ख. रासायनिक अपक्षय (Chemical Weathering)

उष्ण एवं आर्द्र मानसूनी और विषुवतीय क्षेत्रों में जल और उच्च तापमान के कारण रासायनिक अभिक्रियाएं तीव्र होती हैं:

  • 1. कार्बोनेटीकरण (Carbonation): वर्षा के जल में वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड घुलकर हल्का कार्बोनिक अम्ल बनाती है: $$H_2O + CO_2 ightleftharpoons H_2CO_3$$ यह कार्बोनिक अम्ल चूना पत्थर के अघुलनशील कैल्शियम कार्बोनेट को अत्यधिक घुलनशील कैल्शियम बाइकार्बोनेट में बदल देता है: $$CaCO_3 + H_2CO_3 o Ca(HCO_3)_2$$ यह क्रिया चूना पत्थर की कन्दराओं और कार्स्ट स्थलरूपों के निर्माण का मुख्य कारण है।
  • 2. ऑक्सीकरण (Oxidation): जल में घुली ऑक्सीजन चट्टानों के लौह खनिजों के साथ क्रिया करके जंग (आयरन ऑक्साइड) बनाती है: $$4Fe + 3O_2 + 6H_2O o 2Fe_2O_3 \cdot 3H_2O \quad ext{(पीला-भूरा लिमोनाइट)}$$ इससे चट्टानें भुरभुरी होकर शीघ्र नष्ट हो जाती हैं।
  • 3. जलयोजन (Hydration): जब खनिजों के जालक में जल के अणु रासायनिक रूप से समाहित हो जाते हैं, तो उनका आयतन 30% से अधिक बढ़ जाता है (जैसे—एनहाइड्राइट का जिप्सम में बदलना: $CaSO_4 + 2H_2O o CaSO_4 \cdot 2H_2O$), जिससे आंतरिक तनाव से चट्टानें चटक जाती हैं।
  • 4. जल-अपघटन (Hydrolysis): जल के $H^+$ एवं $OH^-$ आयनों की खनिजों के साथ क्रिया। फेल्डस्पार का अपघटन होकर केओलिन मिट्टी बनती है।
ग. जैविक अपक्षय (Biological Weathering)
  • भौतिक: वृक्षों की जड़ें चट्टानी जोड़ों में घुसकर मोटी होती हैं और कई वायुमंडलीय दाब उत्पन्न करके चट्टानों को फाड़ देती हैं। केंचुए, चूहे व चींटियां बिल बनाकर चट्टानों को शिथिल करते हैं।
  • रासायनिक: काई (Moss) और लाइकेन चट्टानों पर उगकर ऑक्जेलिक व साइट्रिक अम्ल छोड़ते हैं, जो खनिजों का रासायनिक विघटन करते हैं।

6. वृहत् संचलन एवं ढाल विस्थापन: दार्जिलिंग एवं कलिम्पोंग में भूस्खलन आपदा

वृहत् संचलन की क्रियाविधि (Mass Wasting)

अपक्षयित चट्टानी मलबे और मृदा का किसी बहते हुए माध्यम (जैसे नदी या वायु) के बिना केवल गुरुत्वाकर्षण बल (Gravity) के सीधे प्रभाव से ढाल के सहारे नीचे खिसकना वृहत् संचलन (Mass Wasting) कहलाता है। जब ढाल का अपरूपण प्रतिबल ($ au = ho g h \sin heta$) चट्टानी मलबे के घर्षण प्रतिरोध से अधिक हो जाता है, तो ढाल संचलन आरंभ होता है।

संचलन का प्रकार गति एवं जल की मात्रा प्रमुख विशेषताएं एवं प्रमाण
मृदा विसर्पण (Soil Creep) अत्यंत मंद ($mm ext{ से }cm/ ext{वर्ष}$); शुष्क या नम। ढाल पर मृदा का अत्यंत धीमा अदृश्य विस्थापन। लक्षण: झुके हुए टेलीफोन के खंभे, मुड़े हुए पेड़ों के तने, विस्थापित बाड़।
मृदा सर्पण (Solifluction) मंद ($cm ext{ से }m/ ext{वर्ष}$); जल से संतृप्त। टुंड्रा क्षेत्रों में ग्रीष्मकाल में परमाफ्रॉस्ट (स्थायी रूप से जमी सतह) के ऊपर की संतृप्त मृदा का नीचे की ओर रेंगना।
अवसर्पण या स्लम्प (Slump) मध्यम से तीव्र; चिपचिपी मिट्टी। अवतल घुमावदार तल के सहारे मलबे का घूर्णी रूप में नीचे खिसकना, जिसमें ऊपर अर्धचंद्राकार कगार बनता है।
पंक प्रवाह (Mudflow) अत्यधिक तीव्र ($km/ ext{घंटा}$); जल-मिश्रित गाढ़ा कीचड़। मूसलाधार वर्षा से मिट्टी व बारीक अवसाद गाढ़े घोल में बदलकर पर्वतीय घाटियों से तीव्र गति से बहकर भारी तबाही मचाते हैं।
शैलपात (Rockfall) क्षण भर में स्वतंत्र पतन ($>100 ext{ किमी/घंटा}$)। खड़ी चट्टान से शिलाखंड टूटकर सीधे हवा में गिरते हैं और तलहटी पर टैलस का ढेर बनाते हैं।
पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग एवं कलिम्पोंग में भूस्खलन के कारण एवं निवारण

पश्चिम बंगाल के उत्तरी उप-हिमालयी जिलों—विशेष रूप से दार्जिलिंग एवं कलिम्पोंग—में प्रत्येक मानसून में भीषण भूस्खलन (Landslides) की घटनाएं घटित होती हैं। इसके प्रमुख कारण हैं:

  • 1. विवर्तनिक रूप से कमजोर चट्टानें: यह क्षेत्र नवीन वलित हिमालय का अंग है, जहां डैलिंग एवं दार्जिलिंग नीस शैलें अत्यधिक वलित, चूर्णित और भ्रंशयुक्त हैं।
  • 2. अत्यधिक मानसूनी वर्षा: पर्वतीय अवरोध के कारण यहां प्रति वर्ष 3000 से 4000 मिमी तक भारी वर्षा होती है। अत्यधिक जल रिसाव से चट्टानों के रंध्रों में जल-दाब बढ़ जाता है और घर्षण बल समाप्त हो जाता है।
  • 3. मानवीय हस्तक्षेप: राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-10) के विस्तार हेतु ढाल के आधार को काटना (Toe-cutting), अनियंत्रित बहुमंजिला भवन निर्माण, चाय बागानों के लिए वनों की कटाई और जल निकासी की समुचित व्यवस्था न होना।
  • अभियांत्रिकी समाधान: ढालों पर उचित जल निकासी नालियां बनाना, जल निकास छिद्रों (Weep holes) युक्त कंक्रीट की सुरक्षा दीवारें (Retaining walls) बनाना, पत्थरों से भरे तार के गैबियन बक्से स्थापित करना तथा वेटिवर घास व गहरी जड़ों वाले बांस का रोपण करना।

महत्वपूर्ण भौगोलिक अवधारणाएँ, नियम एवं निर्देशांक

तलसंतुलन समीकरण
तलसंतुलन = निम्नीकरण (अपक्षय + वृहत् संचलन + अपरदन) + अभिवृद्धि (निक्षेपण)
कूलॉम्ब ढाल सामर्थ्य समीकरण
s = c + σ * tan(φ)
कार्बोनेटीकरण अभिक्रिया
CaCO3 + H2O + CO2 ⇌ Ca(HCO3)2

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
अंतर्जात एवं बहिर्जात प्रक्रियाओं में ऊर्जा के स्रोत, कार्य की दिशा एवं स्थलरूप निर्माण के आधार पर अंतर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

अंतर्जात एवं बहिर्जात प्रक्रियाएं धरातल के स्थलरूपों के विकास में दो परस्पर विरोधी किंतु पूरक शक्तियां हैं:

  1. ऊर्जा के स्रोत: अंतर्जात प्रक्रियाएं पृथ्वी के आंतरिक भाग से ऊर्जा प्राप्त करती हैं—मुख्य रूप से रेडियोधर्मी तत्वों (यूरेनियम, थोरियम आदि) का विखंडन जनित ताप, पृथ्वी का आदिम ताप तथा दुर्बलतामण्डल (एस्थेनोस्फीयर) की संवहन धाराएं। इसके विपरीत, बहिर्जात प्रक्रियाएं बाह्य ऊर्जा से संचालित होती हैं—जिनका प्राथमिक स्रोत सूर्य का विकिरण ताप और पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल है।

  2. कार्य की दिशा: अंतर्जात बल भू-गर्भ से ऊपर धरातल की ओर कार्य करते हैं। ये ऊर्ध्वाधर (महादेशीय संचलन द्वारा उत्थान या निमज्जन) अथवा क्षैतिज (पर्वत निर्माणकारी संचलन द्वारा संपीड़न या तनाव) रूप में क्रियाशील होते हैं। बहिर्जात बल सीधे धरातल की खुली चट्टानों पर क्षैतिज व नीचे की ओर कार्य करते हैं।

  3. स्थलरूप निर्माण में भूमिका: अंतर्जात प्रक्रियाएं रचनात्मक और विषमता उत्पन्न करने वाली होती हैं—ये वलित पर्वत (हिमालय), भ्रंशोत्थ पर्वत (सतपुड़ा), रिफ्ट घाटी (नर्मदा) तथा लावा पठार (दक्कन) जैसे प्राथमिक उच्चावचों का निर्माण करती हैं। इसके विपरीत, बहिर्जात प्रक्रियाएं विनाशात्मक व समतलकारी होती हैं—ये निम्नीकरण द्वारा उच्च भूभागों को काटकर और अभिवृद्धि द्वारा गड्ढों को भरकर अपरदन के आधार तल (समुद्र तल) तक समतल बनाने का प्रयास करती हैं।

उदाहरण 2
'अपरदन का आधार तल' (Base Level of Erosion) किसे कहते हैं? इसके प्रतिपादक कौन थे तथा अपरदन का परम आधार तल कौन सा है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
अपरदन का आधार तल वह निम्नतम सीमा या तल है, जिसके नीचे कोई भी बहती हुई नदी या जलधारा धरातल का लंबवत अपरदन नहीं कर सकती। वर्ष 1875 में प्रसिद्ध अमेरिकी भूवैज्ञानिक जॉन वेस्ली पॉवेल (J.W. Powell) ने कोलोराडो नदी एवं ग्रैंड कैनियन के अध्ययन के दौरान इस संकल्पना का प्रतिपादन किया था। समुद्र तल (Mean Sea Level) को अपरदन का परम या मुख्य आधार तल (Grand Base Level) माना जाता है, क्योंकि सभी नदियां अंततः समुद्र में गिरती हैं और समुद्र तल से नीचे घाटी को गहरा नहीं कर सकतीं।
उदाहरण 3
वलन के प्रमुख अंगों का उल्लेख कीजिए। सममित वलन, असममित वलन एवं परिवलित (शायित) वलन में तुलनात्मक अंतर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

पार्श्विक संपीड़न बल के कारण अवसादी चट्टानों में पड़ने वाले मोड़ों को वलन कहते हैं। वलन के प्रमुख अंग हैं: • अपनति (Anticline): उत्तल रूप में उठा हुआ भाग जिसकी भुजाएं बाहर की ओर ढालू होती हैं। • अभिनति (Syncline): अवतल रूप में धंसा हुआ गर्त जिसकी भुजाएं अंदर केंद्र की ओर ढालू होती हैं। • भुजाएं (Limbs): अपनति के शिखर और अभिनति के गर्त के बीच के ढालू चट्टानी संस्तर। • अक्षीय तल (Axial Plane): वह काल्पनिक समतल जो वलन को दो भागों में विभाजित करता है।

तुलनात्मक अंतर:

  1. सममित वलन (Symmetrical Fold): जब दोनों ओर से समान संपीड़न बल लगता है, तो दोनों भुजाओं का ढाल कोण बिल्कुल बराबर होता है और अक्षीय तल पूर्णतः ऊर्ध्वाधर (90°) होता है।
  2. असममित वलन (Asymmetrical Fold): जब एक दिशा से संपीड़न बल अधिक प्रबल होता है, तो एक भुजा का ढाल मंद तथा दूसरी भुजा का ढाल तीव्र होता है और अक्षीय तल झुका हुआ होता है।
  3. परिवलित या शायित वलन (Recumbent Fold): जब एक दिशा से अत्यधिक तीव्र पार्श्वगामी धक्का लगता है, तो वलन इतना झुक जाता है कि उसका अक्षीय तल और दोनों भुजाएं क्षैतिज सतह के समानांतर लेट जाती हैं।
उदाहरण 4
भ्रंशोत्थ पर्वत (हॉर्स्ट) एवं रिफ्ट घाटी (ग्राबेन) की उत्पत्ति कैसे होती है? भारत से प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
तनावमूलक भू-संचलन के कारण उत्पन्न समानांतर सामान्य भ्रंशों से भ्रंशोत्थ पर्वत और रिफ्ट घाटी का निर्माण होता है: • भ्रंशोत्थ पर्वत (Horst / Block Mountain): जब दो समानांतर भ्रंशों के मध्य का भूभाग आंतरिक दबाव से ऊपर उठ जाता है अथवा दोनों किनारों के भूभाग नीचे धंस जाते हैं, तो बीच का खड़ा ऊंचा भाग ब्लॉक पर्वत कहलाता है। उदाहरण: भारत की सतपुड़ा पर्वतमाला। • रिफ्ट घाटी (Graben / Rift Valley): जब दो समानांतर भ्रंशों के मध्य का संकरा भूभाग तनाव के कारण नीचे धंस जाता है, तो खड़ी ढाल वाली लंबी घाटी बनती है। उदाहरण: विंध्याचल और सतपुड़ा के बीच स्थित नर्मदा नदी की घाटी तथा ताप्ती नदी घाटी।
उदाहरण 5
अल्फ्रेड वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत को संक्षेप में समझाइए तथा इसके पक्ष में दिए गए किन्हीं तीन प्रमुख साक्ष्यों का वर्णन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

वर्ष 1912 में जर्मन वैज्ञानिक अल्फ्रेड वेगनर ने प्रतिपादित किया कि कार्बोनिफेरस युग में सभी वर्तमान महाद्वीप आपस में जुड़े हुए थे और उन्होंने 'पैंजिया' नामक एक विशाल भूखंड बनाया था, जो चारों ओर 'पैंथालासा' महासागर से घिरा था। मेसोजोइक युग में पैंजिया टूटकर उत्तर में लॉरेशिया और दक्षिण में गोंडवानालैंड में विभाजित हुआ, जिनके बीच टेथिस सागर बना। कालांतर में ये टुकड़े विस्थापित होकर वर्तमान महाद्वीपों के रूप में स्थापित हुए।

प्रमुख साक्ष्य:

  1. तटरेखाओं की साम्यता (Jig-saw Fit): दक्षिण अमेरिका का पूर्वी अटलांटिक तट और अफ्रीका का पश्चिमी तट एक-दूसरे में पहेली के टुकड़ों की भांति सटीक बैठ जाते हैं।
  2. जीवाश्म साक्ष्य: 'ग्लोसोप्टेरिस' नामक प्राचीन फर्न वनस्पति और मीठे जल के सरीसृप 'मेसोसॉरस' के समकालीन जीवाश्म दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, भारत, ऑस्ट्रेलिया एवं अंटार्कटिका में पाए गए हैं, जो इनके पूर्व जुड़ाव को प्रमाणित करते हैं।
  3. हिमानी टिलाइट निक्षेप: प्राचीन कार्बोनिफेरस हिमानी बोल्डर क्ले (तलचिर टिलाइट) उष्णकटिबंधीय भारत, दक्षिण अफ्रीका, मेडागास्कर एवं ऑस्ट्रेलिया में मिलते हैं, जो सिद्ध करते हैं कि ये भूभाग कभी दक्षिणी ध्रुव पर एक साथ स्थित थे।
उदाहरण 6
अपशल्कन (Exfoliation) क्या है? ग्रेनाइट चट्टानों में यह भौतिक अपक्षय किस प्रकार घटित होता है, व्याख्या कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

अपशल्कन (Exfoliation या प्याज के छिलके की भांति उतरना) एक भौतिक अपक्षय प्रक्रिया है, जिसमें तापीय प्रसार और संकुचन के कारण समरूप चट्टानों की बाहरी परतें प्याज के छिलकों की तरह गोलाकार परतों में उखड़कर अलग हो जाती हैं और चट्टान गुंबदाकार हो जाती है।

कार्यप्रणाली:

  1. ऊष्मा की कुचालकता: ग्रेनाइट एक सघन आग्नेय शैल है जो ताप की अत्यधिक कुचालक होती है। शुष्क मरुस्थलीय या पठारी क्षेत्रों में दिन के समय सूर्य के तीव्र ताप से चट्टान की केवल बाहरी सतह अत्यधिक गर्म होकर फैलती है, जबकि भीतरी भाग ठंडा ही रहता है।
  2. दैनिक संकुचन-प्रसार: रात के समय खुले आकाश में तेजी से ताप विकिरण होने से बाहरी परत सिकुड़ जाती है किंतु भीतरी भाग अप्रभावित रहता है। प्रतिदिन के इस चक्र से बाहरी और भीतरी परतों के बीच भयंकर तनाव बल उत्पन्न होता है।
  3. दरारें एवं गुंबद निर्माण: चट्टान की सहनशीलता समाप्त होने पर धरातल के समानांतर वक्राकार दरारें बन जाती हैं और चट्टान की ऊपरी परतें छिलकों की भांति अलग हो जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप चिकने गोलाकार 'अपशल्कन गुंबद' (Exfoliation Domes) का निर्माण होता है, जो छोटानागपुर और रांची के पठार पर प्रचुरता से देखे जा सकते हैं।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

अपक्षय और अपरदन को एक ही प्रक्रिया समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि सामान्य भ्रंश संपीड़न बल से बनते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

वेगनर के विस्थापन सिद्धांत और प्लेट विवर्तनिकी को एक ही मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

भू-आकृतिक प्रक्रियाएं एवं तलसंतुलन अंतर्जात संचलन (विवर्तनिकी, वलन एवं भ्रंशन) तथा बहिर्जात अपक्षय व वृहत् संचलन 1. अंतर्जात प्रक्रियाएं (Endogenic Forces) महादेशीय (ऊर्ध्वाधर) • पर्वत निर्माणकारी (क्षैतिज) • आकस्मिक (भूकंप व ज्वालामुखी) A. FOLDING (পীড়নজনিত ভঙ্গিল গঠন) अपनति (Anticline) अभिनति (Syncline) Horizontal Compression (পার্শ্বীয় সংনমন) B. FAULTING (টানজনিত চ্যুতি ও স্তূপ) भ्रंशोत्थ पर्वत (Horst) रिफ्ट घाटी / ग्राबेन (Graben) Normal Fault / Horst & Graben Tensional Stress (টান ও চ্যুতি ভৃগু) C. PLATE TECTONICS & CONVECTION (পাত সংস্থান ও পরিচলন) Continental Lithosphere (SIAL) Fold Mountain Volcano Oceanic Crust (SIMA) Subduction Zone (Trench) Mantle Asthenosphere (পরিচলন স্রোত) 2. बहिर्जात प्रक्रियाएं एवं तलसंतुलन (Gradation) निम्नीकरण (अपक्षय व अपरदन) + अभिवृद्धि (निक्षेपण) = अपरदन आधार तल Sea Level (সমুদ্রপৃষ্ঠ) Base Level of Erosion DEGRADATION (অবরোহণ) Weathering + Mass Wasting + Erosion AGGRADATION (আরোহণ) Deposition of Sediments Gradation = Dynamic Equilibrium between degradation of highs and aggradation of lows Mechanical • Thermal Expansion • Exfoliation (শল্কমোচন) • Frost Wedging (তুহিন) • Block Disintegration Produces Scree / Talus Chemical • Oxidation (জারণ/মরিচা) • Carbonation (অঙ্গারযোজন) • Hydration (জলযোজন) • Hydrolysis (আর্দ্র বিশ্লেষণ) Active in Humid Tropics Mass Wasting • Soil Creep (মৃত্তিকা সরন) • Solifluction (সলিফ্লাকশন) • Landslide (ভূমিধস) • Mudflow & Rockfall Driven by Gravity प्रमुख भू-गर्भिक संकल्पनाएं एवं सिद्धांत Isostasy (সমস্থিতি) Airy (Roots) vs Pratt (Density) Continental Drift (মহীসঞ্চরণ) Wegener (1912) Pangaea & Tethys Base Level (ক্ষয়ের শেষ সীমা) J.W. Powell (1875) Sea Level Limit Plate Tectonics (পাত সংস্থান) Convection Cells & Lithosphere

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. भू-आकृतिक प्रक्रियाएं अंतर्जात (पृथ्वी के आंतरिक ताप) एवं बहिर्जात (सौर ऊर्जा व गुरुत्व) शक्तियों द्वारा धरातलीय स्थलरूपों का निरंतर निर्माण एवं संपादन करती हैं।
मुख्य बिंदु 2
  1. अंतर्जात बल रेडियोधर्मी ताप व एस्थेनोस्फीयर की संवहन धाराओं से ऊर्जा प्राप्त कर मंद पटल विरूपण तथा आकस्मिक भूकंप व ज्वालामुखी उत्पन्न करते हैं।
मुख्य बिंदु 3
  1. बहिर्जात प्रक्रियाएं सौर ऊर्जा व गुरुत्वाकर्षण द्वारा अपक्षय, वृहत् संचलन तथा नदी-हिमानी-पवन द्वारा तलसंतुलन का कार्य संपन्न करती हैं।
मुख्य बिंदु 4
  1. तलसंतुलन एक द्विपक्षीय प्रक्रिया है: निम्नीकरण द्वारा उच्च भूभागों को काटा जाता है और अभिवृद्धि द्वारा निचले गड्ढों को अवसादों से भरा जाता है।
मुख्य बिंदु 5
  1. वर्ष 1875 में जॉन वेस्ली पॉवेल ने अपरदन के आधार तल की संकल्पना दी, जिसमें समुद्र तल को अपरदन की परम अधोमुखी सीमा माना गया।
मुख्य बिंदु 6
  1. पटल विरूपण को ऊर्ध्वाधर महादेशीय संचलन (उत्थान व निमज्जन) तथा क्षैतिज पर्वत निर्माणकारी संचलन (संपीड़न व तनाव) में वर्गीकृत किया जाता है।
मुख्य बिंदु 7
  1. संपीड़न बल से वलित पर्वत (अपनति, अभिनति, शायित वलन, नापे) तथा तनाव बल से सामान्य भ्रंश, हॉर्स्ट (सतपुड़ा) व रिफ्ट घाटी (नर्मदा) का निर्माण होता है।
मुख्य बिंदु 8
  1. अल्फ्रेड वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (पैंजिया, टेथिस) प्रस्तुत किया, जिसे आधुनिक प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत द्वारा संवहन तरंगों के आधार पर पुष्ट किया गया।
मुख्य बिंदु 9
  1. अपक्षय चट्टानों का स्वस्थान पर विघटन व अपघटन है, जिसे भौतिक (अपशल्कन, तुषार), रासायनिक (कार्बोनेटीकरण, ऑक्सीकरण) एवं जैविक वर्गों में बांटा गया है।
मुख्य बिंदु 10
  1. वृहत् संचलन गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा ढाल के सहारे होता है (मृदा विसर्पण, सोलिफ्लक्शन, भूस्खलन), जो उत्तर बंगाल के दार्जिलिंग एवं कलिम्पोंग हिमालय में गंभीर मानसूनी आपदा है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
अपक्षय और अपरदन में मूलभूत अंतर क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अपक्षय एक स्थैतिक (In-situ) प्रक्रिया है जिसमें चट्टानें अपने स्थान पर टूटती हैं और कोई परिवहन नहीं होता; जबकि अपरदन में गतिशील कारक (जल, वायु, हिमानी) मलबे को बहाकर ले जाते हैं।
2
नदियां अपरदन के आधार तल से नीचे घाटी को क्यों नहीं काट सकतीं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि समुद्र तल पर पहुंचने के बाद नदी का ढाल और गतिज ऊर्जा शून्य हो जाती है, जिससे जलधारा में लंबवत कटाव करने की क्षमता समाप्त हो जाती है।
3
अपनति एवं अभिनति में क्या अंतर है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अपनति उत्तल उठा हुआ वलन है जिसकी भुजाएं बाहर की ओर ढालू होती हैं और केंद्र में प्राचीन शैलें होती हैं; अभिनति अवतल द्रोणी है जिसकी भुजाएं अंदर की ओर ढालू होती हैं और केंद्र में नवीन शैलें होती हैं।
4
विश्व एवं भारत की दो प्रमुख रिफ्ट घाटियों के नाम बताइए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: विश्व: पूर्वी अफ्रीका की महान भ्रंश घाटी एवं यूरोप की राइन नदी घाटी। भारत: नर्मदा नदी घाटी एवं ताप्ती नदी घाटी।
5
पर्वतों पर तुषार विखंडन चट्टानों को कैसे तोड़ता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: दरारों में जमा जल रात में जमकर बर्फ बनने पर आयतन में 9% फैलता है, जिससे 2000 किग्रा/वर्ग सेमी का दबाव पड़ता है और चट्टानें टूटकर टैलस का ढेर बनाती हैं।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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कक्षा 11 Geography के सभी अध्याय

अध्याय 1: एक विषय के रूप में भूगोल अध्याय 2: पृथ्वी की उत्पत्ति एवं आंतरिक संरचना अध्याय 3: भू-आकृतिक प्रक्रियाएं अध्याय 4: मौसम एवं जलवायु अध्याय 5: समस्थिति की संकल्पना अध्याय 6: जलमंडल अध्याय 7: मानव भूगोल का क्षेत्र एवं विषय-वस्तु अध्याय 8: आर्थिक भूगोल अध्याय 9: Secondary Activities - Industry अध्याय 10: तृतीयक क्रियाकलाप अध्याय 11: चतुर्थक क्रियाकलाप अध्याय 12: पंचमक क्रियाकलाप अध्याय 13: एक देश के रूप में भारत अध्याय 14: भारत की संरचना एवं भू-आकृति अध्याय 15: भारत का अपवाह तंत्र अध्याय 16: भारत की जलवायु अध्याय 17: भारत के वन एवं प्राकृतिक वनस्पति अध्याय 18: भारत की प्राकृतिक आपदाएं एवं संकट

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