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WBB • कक्षा XI • Geography • अध्याय 5
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

समस्थिति की संकल्पना

समस्थिति की संकल्पना (Concept of Isostasy) भू-भौतिकी एवं भौतिक भूगोल का एक अत्यंत आधारभूत और सर्वमान्य सिद्धांत है, जो यह वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करता है कि पृथ्वी के धरातल पर स्थित विशाल पर्वतमालाएं, विस्तृत पठार, उपजाऊ मैदान और गहरे महासागरीय गर्त किस प्रकार अपने नीचे स्थित अधिक सघन, अर्ध-तरल एस्थेनोस्फीयर (ऊपरी मैंटल) पर यांत्रिक एवं गुरुत्वाकर्षणिक संतुलन बनाए रखते हैं। समस्थिति या 'आइसोस्टैसी' शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के 'Isostasios' शब्द से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ 'समान संतुलन' अथवा 'समान स्थिति' होता है। 1889 ईस्वी में अमेरिकी भूवैज्ञानिक क्लेरेंस एडवर्ड डटन ने भूवैज्ञानिक साहित्य में इस पारिभाषिक शब्द का औपचारिक प्रतिपादन किया था। इस संकल्पना की ऐतिहासिक नींव 1859 में भारत के 'महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण' (Great Trigonometrical Survey of India) के दौरान पड़ी, जब सर जॉर्ज एवरेस्ट और एंड्रयू वॉ के नेतृत्व में हिमालय की तलहटी में स्थित कल्याना तथा मध्य भारत के कल्यानपुर स्टेशनों के मध्य साहुल सूत्र (Plumb-line) के विचलन में एक अप्रत्याशित गणितीय अंतर दर्ज किया गया। इस भू-भौतिकीय पहेली को सुलझाने हेतु सर जॉर्ज बिडेल एयरी ने उत्प्लावन नियम पर आधारित 'जड़ संकल्पना' (समान घनत्व एवं विभिन्न गहराई) तथा आर्चडीकन जॉन हेनरी प्रैट ने 'क्षतिपूर्ति तल संकल्पना' (विभिन्न घनत्व एवं समान गहराई) प्रस्तुत की। आधुनिक युग में हेफोर्ड-बोवी, वेनिंग मीनिज तथा आर्थर होम्स के वैज्ञानिक संशोधनों और स्कैंडिनेविया के हिमानी पुनरुत्थान तथा बंगाल डेल्टा के भू-धंसाव द्वारा समस्थिति का गतिक स्वरूप भली-भांति सिद्ध हो चुका है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद (WBCHSE) कक्षा 11 भूगोल के विद्यार्थियों के लिए समस्थिति की संकल्पना अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सिद्धांत पृथ्वी के विवर्तनिक इतिहास, पर्वतों की दीर्घकालिक स्थिरता तथा प्लेट संचलन के पीछे कार्य कर रहे गुरुत्वाकर्षणिक संतुलन को स्पष्ट करता है। भारतीय उपमहाद्वीप के संदर्भ में, यह संकल्पना समझाती है कि करोड़ों वर्षों के अनवरत अपरदन के बावजूद हिमालय पर्वत आज भी इतनी महान ऊंचाई पर क्यों स्थित है और उसकी गहरी सियालिक जड़ें किस प्रकार अत्यधिक ऋणात्मक बूगे गुरुत्व विसंगति उत्पन्न करती हैं। इसके अतिरिक्त, पश्चिम बंगाल के गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा एवं सुंदरवन क्षेत्र का भू-धंसाव समस्थिति के गतिक संतुलन का प्रत्यक्ष प्रमाण है, जहां नदियों द्वारा प्रतिवर्ष जमा की जाने वाली 100 करोड़ टन से अधिक गाद के विशाल भार से धरातल प्रतिवर्ष 1 से 4 मिमी धंसता रहता है, फिर भी अवसादन एवं धंसाव के सामंजस्य के कारण यह विशाल मैंग्रोव डेल्टा कभी समुद्र में पूर्णतः जलमग्न नहीं होता।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. समस्थिति शब्द की व्युत्पत्ति, पर...
2 2. सर जॉर्ज बिडेल एयरी की समस्थिति...
3 3. आर्चडीकन जॉन हेनरी प्रैट का सिद्...
4 4. समस्थिति सिद्धांत के आधुनिक संशो...
5 5. गतिक समस्थितिक समायोजन: हिमानी प...
6 6. गुरुत्व विसंगति एवं समस्थिति के...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. समस्थिति शब्द की व्युत्पत्ति, परिभाषा एवं भारत का महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण (1859)

व्युत्पत्ति एवं शास्त्रीय परिभाषा

आइसोस्टैसी (Isostasy) या समस्थिति शब्द का निर्माण ग्रीक भाषा के दो शब्दों—'Iso' (समान) तथा 'Stasis' (संतुलन अथवा समस्थिति)—से मिलकर हुआ है। 1889 ईस्वी में प्रसिद्ध अमेरिकी भूवैज्ञानिक क्लेरेंस एडवर्ड डटन (Clarence Edward Dutton) ने पृथ्वी के क्रस्ट और मैंटल के मध्य पाए जाने वाले गुरुत्वाकर्षणिक संतुलन को व्यक्त करने हेतु इस शब्द का प्रतिपादन किया था।

डटन के अनुसार: "पृथ्वी के उच्चावच के विभिन्न स्वरूपों (पर्वत, पठार, मैदान एवं महासागरीय बेसिन) का भू-गर्भ में स्थित भारी तथा प्लास्टिक मैग्मा या एस्थेनोस्फीयर के ऊपर संतुलित अवस्था में तैरते रहने की प्रक्रिया को ही समस्थिति कहते हैं।"

भारत का महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण एवं कल्याना-कल्यानपुर का विचलन विवाद

समस्थिति की वैज्ञानिक अवधारणा का उद्भव ब्रिटिश भारत में किए गए भू-मापन सर्वेक्षण से हुआ। 1859 में भारत के तत्कालीन सर्वेयर जनरल सर जॉर्ज एवरेस्ट (Sir George Everest) और उनके उत्तराधिकारी एंड्रयू वॉ (Andrew Waugh) के निर्देशन में भारत के उत्तर-दक्षिण देशांतरीय वृत्तचाप (Arc of the Meridian) को नापने का महान कार्य प्रारंभ हुआ। इस सर्वेक्षण के अंतर्गत दो प्रमुख स्टेशन स्थापित किए गए:

  • कल्याना (Kaliana): अक्षांश $29^\circ 30' 48'' \text{ N}$—हिमालय की शिवालिक तलहटी (देहरादून के समीप) से मात्र 60 मील (96 किमी) दक्षिण में स्थित।
  • कल्यानपुर (Kalianpur): अक्षांश $24^\circ 07' 11'' \text{ N}$—कल्याना से लगभग 370 मील (595 किमी) दक्षिण में मध्य भारत के मैदानी भाग में स्थित।

इन दोनों स्टेशनों के बीच की अक्षांशीय दूरी को दो पूर्णतः भिन्न और स्वतंत्र वैज्ञानिक विधियों द्वारा मापा गया:

  1. त्रिकोणीय सर्वेक्षण विधि (Geodetic Triangulation Method): थियोडोलाइट तथा इनवार टेप द्वारा धरातल पर सीधी रेखा में वास्तविक स्थलीय दूरी का ज्यामितीय मापन।
  2. खगोलीय प्रेक्षण विधि (Astronomical Method): जेनिथ दूरबीन तथा साहुल सूत्र (Plumb-line) द्वारा तारों की स्थिति देखकर अक्षांश का निर्धारण।
मापन की वैज्ञानिक विधि अक्षांशीय चाप का मान भौतिक एवं ज्यामितीय तात्पर्य
त्रिकोणीय सर्वेक्षण (Triangulation) $5^\circ 23' 42.294''$ पृथ्वी के भू-आभ (Geoid) पर वास्तविक वक्राकार स्थलीय दूरी।
खगोलीय प्रेक्षण (Astronomical) $5^\circ 23' 37.058''$ साहुल सूत्र के ऊर्ध्वाधर खिंचाव पर आधारित तारों का कोणीय प्रेक्षण।
प्राप्त अंतर / विसंगति $5.236'' \text{ (चाप-सेकंड)}$ धरातल पर लगभग 524 फीट अथवा 160 मीटर का रैखिक अंतर।
आर्चडीकन जॉन हेनरी प्रैट की गणना एवं हिमालयी आकर्षण पहेली

कलकत्ता के तत्कालीन आर्चडीकन और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ख्यातिप्राप्त गणितज्ञ जॉन हेनरी प्रैट (Archdeacon John Henry Pratt) को इस गणितीय अंतर की जांच सौंपी गई। प्रैट ने हिमालय के विशाल दृश्यमान द्रव्यमान तथा शैलों के औसत घनत्व ($2.75 \text{ g/cm}^3$) के आधार पर गुरुत्वाकर्षण की गणना की। प्रैट के अनुसार हिमालय के विशाल पर्वतभार के कारण कल्याना स्टेशन पर साहुल सूत्र उत्तर दिशा की ओर $15.885''$ आकर्षित होना चाहिए था।

किंतु धरातल पर वास्तविक मापा गया विचलन मात्र $5.236''$ निकला! इसका अर्थ था:

$$\text{सैद्धांतिक अनुमानित विचलन} = 15.885''$$
$$\text{वास्तविक मापा गया विचलन} = 5.236''$$
$$\text{आकर्षण में कमी / द्रव्यमान न्यूनता} = 15.885'' - 5.236'' = 10.649''$$

प्रैट यह देखकर चकित रह गए कि हिमालय अपने दृश्यमान भार की तुलना में साहुल सूत्र को एक-तिहाई से भी कम बल से आकर्षित कर रहा था। इस पहेली ने यह अकाट्य तथ्य प्रमाणित कर दिया कि धरातल पर दिखाई देने वाले ऊंचे हिमालय के गर्भ में कोई अदृश्य कम घनत्व वाला पदार्थ या द्रव्यमान की न्यूनता (Mass Deficiency) उपस्थित है। इसी पहेली ने एयरी तथा प्रैट के ऐतिहासिक सिद्धांतों को जन्म दिया।

2. सर जॉर्ज बिडेल एयरी की समस्थिति संकल्पना: जड़ संकल्पना एवं उत्प्लावन नियम

एयरी के सिद्धांत के मूलभूत सिद्धांत (1855)

इंग्लैंड के शाही खगोलशास्त्री सर जॉर्ज बिडेल एयरी (Sir George Biddell Airy) ने 1855 में रॉयल सोसाइटी की पत्रिका में अपनी व्याख्या प्रकाशित की। उनके सिद्धांत को 'जड़ संकल्पना' (Root Theory) अथवा 'उत्प्लावन नियम' (Law of Flotation) कहा जाता है।

एयरी का सिद्धांत आर्किमिडीज के उत्प्लावन के भौतिक नियम पर आधारित है। उनकी तीन प्रमुख अभिधारणाएं निम्न हैं:

  • क्रस्ट का समान घनत्व (Uniform Density): पर्वत, पठार, मैदान आदि सभी भू-आकृतिक स्तंभ एक समान हल्के सियालिक (SIAL / ग्रेनाइट) पदार्थों से निर्मित हैं, जिनका औसत घनत्व सर्वत्र समान और लगभग $2.67 \text{ g/cm}^3$ है।
  • सघन अधःस्तर या एस्थेनोस्फीयर: यह हल्का क्रस्ट अपने नीचे स्थित अधिक सघन, भारी एवं प्लास्टिक सिमा (SIMA) अथवा एस्थेनोस्फीयर पर तैर रहा है, जिसका औसत घनत्व लगभग $3.0 \text{ से } 3.3 \text{ g/cm}^3$ है।
  • विभिन्न गहराई एवं जड़ों की उपस्थिति (Varying Depth of Roots): धरातल के विभिन्न स्तंभ समान गहराई तक नहीं जाते। जिस प्रकार जल में तैरते हुए हिमशैल (Iceberg) या लकड़ी के लट्ठे का अधिकांश भाग जल के नीचे डूबा रहता है, उसी प्रकार जो भू-भाग जितना अधिक ऊंचा होगा, भू-गर्भ में उसकी जड़ (Crustal Root) उतनी ही अधिक गहराई तक धंसी होगी।
हिमशैल की उपमा एवं गणितीय उत्प्लावन अनुपात

एयरी ने अपने सिद्धांत को जल में तैरती बर्फ की उपमा से समझाया। यदि बर्फ का घनत्व $0.9$ और जल का घनत्व $1.0$ हो, तो बर्फ का $9$ में से $8$ भाग जल में डूबा रहता है और केवल $1$ भाग ऊपर तैरता है। इसी प्रकार क्रस्ट और अधःस्तर के संतुलन में:

$$\text{क्रस्टल स्तंभ का कुल भार} = \text{विस्थापित अधःस्तर का भार}$$ $$R = \frac{\rho_c}{\rho_m - \rho_c} \times h$$

जहां $h$ पर्वत की समुद्र तल से ऊंचाई है, $R$ भू-गर्भ में जड़ की गहराई है, $\rho_c$ क्रस्ट का घनत्व ($2.67$) तथा $\rho_m$ मैंटल का घनत्व ($3.00$) है:

$$R = \frac{2.67}{3.00 - 2.67} \times h = \frac{2.67}{0.33} \times h \approx 8.09 \times h$$

अर्थात धरातल पर यदि पर्वत 1 किमी ऊंचा है, तो भू-गर्भ में उसकी लगभग 8 से 9 किमी गहरी जड़ एस्थेनोस्फीयर में प्रविष्ट होगी!

माउंट एवरेस्ट ($h = 8.848 \text{ किमी}$) के उदाहरण पर:

$$\text{एवरेस्ट की जड़ की गहराई } (R) = 8.848 \times 8.09 \approx 71.59 \text{ किमी}$$ $$\text{एवरेस्ट के नीचे क्रस्ट की कुल मोटाई} = 8.85 + 30 (\text{सामान्य क्रस्ट}) + 71.6 \approx 101+ \text{ किमी}$$
एयरी के सिद्धांत के गुण एवं प्रमुख आलोचनाएं
सिद्धांत की वैज्ञानिक वैधता (Merits) प्रमुख आपत्तियां एवं सीमाएं (Demerits)
भूकंपीय साक्ष्यों द्वारा पुष्टि: आधुनिक भूकंपीय तरंगों (मोहोरारोविकिक असांतत्य) के अध्ययन से यह प्रमाणित हो चुका है कि नवीन वलित पर्वतों (हिमालय व एंडीज) के नीचे क्रस्ट वास्तव में अत्यंत मोटा (~70 किमी) है, जो एयरी की जड़ संकल्पना का समर्थन करता है। भूतापीय प्रवणता की बाधा: पृथ्वी में प्रति 32 मीटर गहराई पर तापमान 1°C बढ़ जाता है। इस दर से 70 से 100 किमी की गहराई पर तापमान 1200°C से 1500°C से अधिक हो जाएगा, जहां ग्रेनाइट की ठोस जड़ें पिघलकर मैग्मा बन जाएंगी। अतः इतनी गहरी ठोस जड़ का अस्तित्व असंभव है।
ऋणात्मक बूगे विसंगति का सटीक कारण: पर्वतों पर पाई जाने वाली तीव्र ऋणात्मक बूगे गुरुत्व विसंगति यह सिद्ध करती है कि नीचे कम घनत्व वाली जड़ उपस्थित है। समान घनत्व की त्रुटिपूर्ण धारणा: क्रस्ट के सभी भागों का घनत्व एक समान नहीं होता; दक्कन का बेसाल्टिक पठार तथा समुद्री क्रस्ट ग्रेनाइट की तुलना में कहीं अधिक सघन होते हैं।

3. आर्चडीकन जॉन हेनरी प्रैट का सिद्धांत: क्षतिपूर्ति तल संकल्पना

प्रैट की क्षतिपूर्ति तल संकल्पना के मुख्य बिंदु (1859)

आर्चडीकन जॉन हेनरी प्रैट ने एयरी की जड़ संकल्पना का खंडन किया। उनके अनुसार अत्यधिक भू-गर्भिक तापमान के कारण क्रस्ट की ठोस जड़ों का बने रहना संभव नहीं है। अतः उन्होंने 'क्षतिपूर्ति तल संकल्पना' (Compensation Theory) अथवा 'विभिन्न घनत्व एवं समान गहराई' का सिद्धांत प्रस्तुत किया।

प्रैट के सिद्धांत की मुख्य अभिधारणाएं निम्न हैं:

  • स्तंभों का विभिन्न घनत्व (Variable Density): धरातल के विभिन्न उच्चावचों का घनत्व एक समान नहीं होता। स्तंभ की ऊंचाई और उसके घनत्व में व्युत्क्रमानुपाती संबंध होता है:
    $$\text{पर्वतों का घनत्व} < \text{पठारों का घनत्व} < \text{मैदानों का घनत्व} < \text{महासागरीय तलहटी का घनत्व}$$
  • समान क्षतिपूर्ति तल (Line of Compensation): भू-गर्भ में एक निश्चित काल्पनिक समतल रेखा (धरातल से लगभग 100 किमी गहराई पर) पाई जाती है, जिसे क्षतिपूर्ति तल कहते हैं। इस रेखा पर सभी स्तंभों की गहराई एक समान क्षैतिज रेखा पर समाप्त होती है।
  • क्षतिपूर्ति तल पर समान दबाव: क्षतिपूर्ति तल के ऊपर स्थित प्रत्येक इकाई अनुप्रस्थ-काट वाले स्तंभ का कुल भार सर्वत्र एक समान होता है:
    $$\text{ऊंचाई} \times \text{घनत्व} = \text{स्थिरांक} \quad \implies \quad H_1 \cdot \rho_1 = H_2 \cdot \rho_2 = H_3 \cdot \rho_3 = C$$
पारे के टब में तैरते विभिन्न धातुओं के स्तंभों का प्रयोग

प्रैट ने अपने सिद्धांत की पुष्टि हेतु पारे के टब का अत्यंत प्रसिद्ध उदाहरण प्रस्तुत किया:

  • उन्होंने समान भार तथा समान अनुप्रस्थ-काट वाले किंतु विभिन्न घनत्व की धातुओं के टुकड़े लिए—जैसे सीसा ($ ho = 11.34$), लोहा ($ ho = 7.87$), जस्ता ($ ho = 7.14$), सुरमा/एंटीमनी ($ ho = 6.68$) और टिन ($ ho = 7.31$)।
  • इन धातु स्तंभों को जब पारे ($ ho = 13.6$) से भरे टब में रखा गया, तो सबसे कम घनत्व वाला सुरमा पारे से सबसे ऊंचा उठा रहा, जबकि सबसे अधिक घनत्व वाला सीसा सबसे नीचा रहा।
  • किंतु सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि सभी टुकड़ों का भार समान होने के कारण पारे के भीतर उनके निचले तल एक ही समान क्षैतिज रेखा (क्षतिपूर्ति तल) पर स्थित रहे। नीचे कोई अलग-अलग जड़ें नहीं बनीं!
एयरी बनाम प्रैट के सिद्धांतों का तुलनात्मक विश्लेषण
तुलना का आधार सर जॉर्ज एयरी का मॉडल (1855) आर्चडीकन जॉन प्रैट का मॉडल (1859)
आधारभूत सिद्धांत उत्प्लावन का नियम / जड़ संकल्पना (Root Theory)। द्रव्यमान संतुलन / क्षतिपूर्ति तल संकल्पना (Compensation Theory)।
क्रस्ट का घनत्व सर्वत्र समान ($2.67 \text{ g/cm}^3$)। ऊंचाई के साथ परिवर्तनशील (ऊंचाई बढ़ने पर घनत्व घटता है)।
क्रस्ट का निचला तल विभिन्न गहराई; पर्वतों के नीचे गहरी जड़ें, मैदानों के नीचे उथली। समान गहराई; 100 किमी गहराई पर सपाट क्षतिपूर्ति तल।
भौतिक उपमा जल में तैरते हिमशैल या लकड़ी के लट्ठे। पारे के टब में तैरते विभिन्न धातु स्तंभ (सीसा, लोहा, सुरमा)।
वर्तमान भू-वैज्ञानिक सत्यता वलित पर्वतों के नीचे सत्य प्रमाणित (हिमालय में 70 किमी क्रस्ट)। महाद्वीप-महासागर सीमा पर सत्य प्रमाणित (महासागरीय क्रस्ट अधिक सघन)।

4. समस्थिति सिद्धांत के आधुनिक संशोधन: हेफोर्ड-बोवी, वेनिंग मीनिज एवं आर्थर होम्स

1. हेफोर्ड एवं बोवी का गणितीय परिष्करण (1912)

अमेरिकी भू-गणितज्ञ जे. एफ. हेफोर्ड (J.F. Hayford) तथा विलियम बोवी (William Bowie) ने प्रैट के सिद्धांत को गणितीय रूप से सुदृढ़ बनाया:

  • हेफोर्ड ने 1909 में संयुक्त राज्य अमेरिका के गुरुत्वीय आंकड़ों का विश्लेषण करके क्षतिपूर्ति तल की गहराई 113.7 किमी और बाद में 96 किमी निर्धारित की।
  • 1912 में विलियम बोवी ने अंतरराष्ट्रीय मानक के रूप में क्षतिपूर्ति तल की गहराई 112.7 किमी (लगभग 70 मील) स्थापित की।
  • बोवी के अनुसार 112.7 किमी की गहराई पर धरातल के प्रत्येक इकाई स्तंभ का भार लगभग 3000 किग्रा प्रति वर्ग सेमी होता है, जिससे सर्वत्र संतुलन बना रहता है।
2. वेनिंग मीनिज की प्रादेशिक / प्रत्यास्थ पटल समस्थिति (1931)

डच भू-भौतिकविद् एफ. ए. वेनिंग मीनिज (F.A. Vening Meinesz) ने पनडुब्बियों में विशेष पेंडुलम यंत्र द्वारा समुद्री गुरुत्वाकर्षण का मापन किया। उन्होंने पाया कि न तो एयरी और न ही प्रैट का स्थानीय ब्लॉक मॉडल महासागरीय गर्तों और ज्वालामुखीय द्वीपों के गुरुत्वीय विचलन को पूर्णतः समझा पाता है।

उन्होंने प्रादेशिक समस्थिति (Regional / Flexural Isostasy) का सिद्धांत दिया:

  • भू-पर्पटी अलग-अलग स्वतंत्र ऊर्ध्वाधर स्तंभों में विभाजित नहीं है।
  • बल्कि लिथोस्फीयर एक सतत, दृढ़ एवं प्रत्यास्थ पटल (Elastic Plate) की भांति व्यवहार करता है, जो नीचे स्थित प्लास्टिक एस्थेनोस्फीयर पर फैला है।
  • जब क्रस्ट पर कोई भारी पर्वत या ज्वालामुखीय भार पड़ता है, तो यह प्रत्यास्थ पटल विस्तृत क्षेत्र में नीचे झुक जाता है (Flexural Downwarping), जिससे भार केवल एक बिंदु पर न रहकर सैकड़ों किलोमीटर के प्रादेशिक क्षेत्र में वितरित हो जाता है।
3. आर्थर होम्स का आधुनिक भू-विवर्तनिक समन्वय (1965)

प्रसिद्ध ब्रिटिश भूवैज्ञानिक आर्थर होम्स (Arthur Holmes) ने अपनी पुस्तक Principles of Physical Geology में इस विवाद का सुंदर समाधान प्रस्तुत किया:

  • प्रकृति में दोनों प्रक्रम सक्रिय हैं: एयरी और प्रैट दोनों के विचार आंशिक रूप से सत्य हैं।
  • पर्वतीय भागों में एयरी का मॉडल मान्य: नवीन वलित पर्वतों (हिमालय, एंडीज, रॉकीज) के नीचे भूकंपीय तरंगों ने स्पष्ट कर दिया है कि वहां 70 किमी तक गहरी सियालिक जड़ें पाई जाती हैं (एयरी का विचार 80% सत्य)।
  • महाद्वीप-महासागर सीमा पर प्रैट का मॉडल मान्य: महाद्वीपीय क्रस्ट ($2.7$) और महासागरीय बेसाल्टिक क्रस्ट ($3.0$) के घनत्व का अंतर यह सिद्ध करता है कि समुद्री बेसिनों की गहराई प्रैट के घनत्व संतुलन नियम द्वारा नियंत्रित होती है।

5. गतिक समस्थितिक समायोजन: हिमानी पुनरुत्थान एवं बंगाल डेल्टा का धंसाव

समस्थिति एक गतिक संतुलन है, कोई जड़ या स्थिर अवस्था नहीं

समस्थिति कोई स्थाई या अपरिवर्तनीय स्थिर स्थिति नहीं है। धरातल पर अपरदन तथा निक्षेपण जैसे बहिर्जात प्रक्रमों द्वारा जब पदार्थों का स्थानांतरण होता है, तो गुरुत्वाकर्षणिक संतुलन बिगड़ जाता है। इस संतुलन को पुनः स्थापित करने के लिए क्रस्ट जो ऊर्ध्वाधर हलचल करता है, उसे समस्थितिक समायोजन (Isostatic Adjustment) कहते हैं।

1. हिमानी समस्थितिक पुनरुत्थान (Glacio-Isostatic Rebound)

हिमयुग के बाद क्रस्ट का पुनः ऊपर उठना समस्थिति का सबसे प्रत्यक्ष एवं अकाट्य प्रमाण है:

  • हिमानी भार एवं अवतलन: पिछले प्लीस्टोसीन हिमयुग में स्कैंडिनेविया (बाल्टिक शील्ड) और कनाडा (हडसन की खाड़ी) पर 2 से 3 किमी मोटी बर्फ की विशाल चादरें जमा हो गई थीं। बर्फ के भारी दबाव से लिथोस्फीयर सैकड़ों मीटर नीचे धंस गया और नीचे का प्लास्टिक मैंटल किनारों की ओर विस्थापित हो गया।
  • हिम पिघलना एवं भू-उत्थान: लगभग 10,000 वर्ष पूर्व जब जलवायु गर्म हुई और बर्फ पिघल गई, तो क्रस्ट से भारी बोझ हट गया। परिणामस्वरूप धंसा हुआ क्रस्ट पुनः स्प्रिंग की भांति ऊपर उठने लगा, जिसे पोस्ट-ग्लेशियर रीबाउंड कहते हैं।
  • प्रत्यक्ष प्रमाण:
    • स्कैंडिनेविया एवं बाल्टिक सागर: बोथनिया की खाड़ी में क्रस्ट प्रतिवर्ष लगभग 10 मिमी (शताब्दी में 1 मीटर) की दर से ऊपर उठ रहा है। 18वीं शताब्दी में वैज्ञानिक आंद्रे सेल्शियस द्वारा तटीय चट्टानों पर बनाए गए जल-चिह्न आज समुद्र तल से काफी ऊपर आ चुके हैं। स्वीडन तट पर उत्थित समुद्री तट (Raised Beaches) स्पष्ट दिखाई देते हैं।
    • हडसन की खाड़ी, कनाडा: बर्फ हटने के बाद से क्रस्ट 300 मीटर से अधिक ऊपर उठ चुका है और पूर्ण संतुलन प्राप्त करने हेतु लगभग 100 मीटर का उत्थान अभी शेष है।
2. नदीय समस्थिति एवं सुंदरवन-बंगाल डेल्टा का धंसाव (Fluvio-Isostasy)

नदियों के अपरदन और अवसादन से भी समस्थितिक संतुलन लगातार पुनर्संयोजित होता रहता है:

  • हिमालयी शिखरों का उत्थान (Denudation Rebound): गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र नदियां हिमालय के शिखरों को अपरदित करके करोड़ों टन मलबा हटाती हैं। इससे पर्वत हल्के हो जाते हैं और नीचे के मैंटल के उत्प्लावन बल के कारण हिमालयी शिखर समस्थितिक रूप से पुनः ऊपर उठते रहते हैं।
  • बंगाल डेल्टा एवं सुंदरवन का भू-धंसाव (Sediment Loading): हिमालय से अपरदित यह गाद गंगा-ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा बंगाल बेसिन और सुंदरवन में निक्षेपित की जाती है। प्रतिवर्ष लगभग 100 करोड़ टन से अधिक गाद यहां जमा होती है।
  • धंसाव की प्रक्रिया: इस विशाल तलछट के भार से बंगाल बेसिन की पर्पटी प्रतिवर्ष 1 से 4 मिमी की दर से निरंतर धंसती रहती है। किंतु गाद जमा होने की दर और धंसाव की दर लगभग समान होने के कारण, करोड़ों वर्षों में यहां 10 से 15 किमी मोटा उथले जल का अवसादी स्तर जमा हो गया है, फिर भी सुंदरवन कभी समुद्र में विलीन नहीं हुआ!

6. गुरुत्व विसंगति एवं समस्थिति के भू-भौतिकीय साक्ष्य

गुरुत्व विसंगति (Gravity Anomaly) क्या है?

धरातल के किसी निश्चित बिंदु पर ग्रेविमीटर द्वारा मापे गए वास्तविक गुरुत्व बल ($g_{obs}$) तथा मानक भू-आभ संदर्भ उपवृत्तक पर गणितीय रूप से आकलित सैद्धांतिक गुरुत्व बल ($g_{theor}$) के अंतर को गुरुत्व विसंगति कहते हैं:

$$\Delta g = g_{obs} - g_{theor}$$
प्रमुख भू-गणितीय गुरुत्व संशोधन

धरातल की ऊंचाई तथा शैलों के द्रव्यमान के प्रभाव को संतुलित करने के लिए तीन प्रमुख संशोधन किए जाते हैं:

संशोधन का प्रकार सूत्र एवं संशोधन की दर भू-भौतिकीय तात्पर्य
मुक्त-वायु संशोधन (Free-Air Correction) $$\delta g_{FA} = +0.3086 \times h \text{ mgal/m}$$ केवल समुद्र तल से स्टेशन की ऊंचाई ($h$) की दूरी का संशोधन करता है (बीच के शैल द्रव्यमान को शून्य माना जाता है)। इससे मुक्त-वायु विसंगति ($g_{FAA}$) प्राप्त होती है, जो उच्चावच के तात्कालिक असंतुलन को दर्शाती है।
बूगे संशोधन (Bouguer Correction) $$\delta g_{B} = -2\pi G \rho h = -0.1119 \times h \text{ mgal/m}$$ स्टेशन तथा समुद्र तल के मध्य स्थित चट्टानी स्लैब ($2.67 \text{ घनत्व}$) के दृश्यमान आकर्षण को घटाता है। इससे बूगे विसंगति ($g_{BA}$) प्राप्त होती है, जो भू-गर्भ में द्रव्यमान की वास्तविक कमी या अधिकता को प्रकट करती है।
समस्थितिक संशोधन (Isostatic Correction) भू-गर्भ में स्थित जड़ों (एयरी) अथवा घनत्व भिन्नता (प्रैट) के सैद्धांतिक प्रभाव को जोड़ता है। यदि समस्थितिक विसंगति शून्य हो, तो वह क्षेत्र पूर्ण समस्थितिक संतुलन में होता है।
बूगे विसंगति की व्याख्या: समस्थिति का अंतिम साक्ष्य
  • पर्वतों पर तीव्र ऋणात्मक बूगे विसंगति:
    • हिमालय तथा तिब्बत के पठार पर बूगे विसंगति अत्यधिक ऋणात्मक, लगभग $-250 \text{ से } -500 \text{ mgal}$ पाई जाती है।
    • कारण: जब बूगे संशोधन द्वारा धरातल पर स्थित पर्वत के दृश्यमान भार को घटा दिया जाता है, तो ग्रेविमीटर भू-गर्भ में भारी द्रव्यमान की कमी दर्ज करता है। यह कमी इसलिए है क्योंकि पर्वत के नीचे भारी मैंटल के स्थान पर 70 किमी गहरी हल्की ग्रेनाइटिक जड़ें ($2.67$) धंसी हुई हैं, जो एयरी की जड़ संकल्पना को प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध करती हैं।
  • महासागरों पर धनात्मक बूगे विसंगति:
    • गहरे महासागरीय बेसिनों पर बूगे विसंगति अत्यधिक धनात्मक, लगभग $+200 \text{ से } +400 \text{ mgal}$ होती है।
    • कारण: महासागरीय क्रस्ट बहुत पतला (~6 किमी) होने के कारण भारी मैंटल पदार्थ सतह के निकट आ जाता है, जो प्रैट के घनत्व सिद्धांत का समर्थन करता है।
  • भारत-गंगा के अग्रगर्त की विसंगति:
    • हिमालय के ठीक दक्षिण में उत्तर बंगाल एवं गंगा के मैदान में ऋणात्मक विसंगति पाई जाती है, जो हिमालय के भार से झुकी हुई भारतीय प्लेट तथा उसमें भरे हल्के जलोढ़ को दर्शाती है।

महत्वपूर्ण भौगोलिक अवधारणाएँ, नियम एवं निर्देशांक

एयरी का जड़ गहराई सूत्र (Flotation Ratio)
$$R = h \times \frac{\rho_c}{\rho_m - \rho_c}$$
प्रैट का क्षतिपूर्ति समीकरण
H_1 · _1 = H_2 · _2 = H_n · _n = स्थिरांक
मुक्त-वायु गुरुत्व विसंगति
$$\Delta g_{FA} = g_{obs} - g_{theor} + (0.3086 \times h) \text{ mgal}$$
बूगे गुरुत्व विसंगति
$$\Delta g_{B} = g_{obs} - g_{theor} + (0.3086 \times h) - (0.1119 \times h) \text{ mgal}$$

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
भारत के महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण के दौरान कल्याना तथा कल्यानपुर के मध्य साहुल सूत्र के विचलन में आए अंतर ने समस्थिति सिद्धांत को कैसे जन्म दिया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
1859 में सर जॉर्ज एवरेस्ट तथा एंड्रयू वॉ द्वारा कल्याना और कल्यानपुर के बीच देशांतरीय चाप का मापन किया गया। त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण ($5^\circ 23' 42.294''$) और खगोलीय प्रेक्षण ($5^\circ 23' 37.058''$) के मध्य 5.236 चाप-सेकंड का अंतर आया। आर्चडीकन जॉन हेनरी प्रैट ने हिमालय के दृश्यमान द्रव्यमान एवं घनत्व ($2.75$) के आधार पर गणना की कि कल्याना पर साहुल सूत्र को 15.885'' उत्तर की ओर झुकना चाहिए था। किंतु वास्तविक विचलन मात्र 5.236'' पाया गया, जिससे 10.649'' के आकर्षण की कमी दर्ज हुई। इस 10.649'' की कमी ने यह सिद्ध कर दिया कि हिमालय के गर्भ में कम घनत्व वाले हल्के पदार्थ विद्यमान हैं अथवा द्रव्यमान की भारी कमी है। इसी पहेली ने एयरी की जड़ संकल्पना और प्रैट की क्षतिपूर्ति तल संकल्पना को जन्म दिया।
उदाहरण 2
एयरी के उत्प्लावन नियम के आधार पर 8,848 मीटर ऊंचे माउंट एवरेस्ट के संतुलन हेतु भू-गर्भ में कितनी गहरी जड़ की आवश्यकता होगी? (क्रस्ट का घनत्व 2.67 एवं मैंटल का घनत्व 3.0 g/cm³)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

एयरी के उत्प्लावन नियम के अनुसार भू-गर्भिक जड़ की गहराई का सूत्र है:

$$R = h \times \frac{\rho_c}{\rho_m - \rho_c}$$

दिए गए मान:

  • पर्वत की ऊंचाई $h = 8.848 \text{ किमी}$
  • क्रस्ट का घनत्व $\rho_c = 2.67 \text{ g/cm}^3$
  • मैंटल का घनत्व $\rho_m = 3.00 \text{ g/cm}^3$

मान रखने पर:

$$R = 8.848 \times \frac{2.67}{3.00 - 2.67} = 8.848 \times \frac{2.67}{0.33} = 8.848 \times 8.0909 \approx 71.59 \text{ किमी}$$

अतः माउंट एवरेस्ट के नीचे लगभग 71.6 किमी गहरी सियालिक जड़ की आवश्यकता होगी। सामान्य महाद्वीपीय क्रस्ट की 30 किमी मोटाई जोड़ने पर एवरेस्ट के नीचे क्रस्ट की कुल मोटाई लगभग 101.6 किमी हो जाती है।

उदाहरण 3
क्रस्ट के घनत्व तथा क्षतिपूर्ति तल की गहराई के संदर्भ में एयरी और प्रैट के सिद्धांतों में मुख्य अंतर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

एयरी और प्रैट के सिद्धांतों में प्रमुख अंतर निम्न हैं:

  1. क्रस्ट का घनत्व:
    • एयरी का सिद्धांत: क्रस्ट का घनत्व सभी भागों (पर्वत, पठार, मैदान) में एक समान और लगभग $2.67 \text{ g/cm}^3$ होता है।
    • प्रैट का सिद्धांत: क्रस्ट का घनत्व ऊंचाई के साथ बदलता है ($H \times \rho = \text{स्थिरांक}$)। ऊंचे पर्वतों का घनत्व सबसे कम और गहरे महासागरों का घनत्व सबसे अधिक होता है।
  2. क्रस्ट की गहराई / क्षतिपूर्ति तल:
    • एयरी का सिद्धांत: क्रस्ट की गहराई असमान होती है। ऊंचे पर्वतों के नीचे गहरी जड़ें और मैदानों के नीचे उथली जड़ें मैंटल में धंसी होती हैं।
    • प्रैट का सिद्धांत: सभी भू-आकृतिक स्तंभ भू-गर्भ में लगभग 100 किमी गहराई पर स्थित एक ही सपाट, क्षैतिज क्षतिपूर्ति तल पर समाप्त होते हैं।
उदाहरण 4
हिमानी समस्थितिक पुनरुत्थान (Glacio-Isostatic Rebound) क्या है? स्कैंडिनेविया के संदर्भ में व्याख्या कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

प्लीस्टोसीन हिमयुग के दौरान बर्फ की विशाल चादरों के भारी बोझ से धंसे हुए भू-पटल का बर्फ पिघलने के उपरांत पुनः ऊपर उठने की प्रक्रिया को हिमानी समस्थितिक पुनरुत्थान कहते हैं। स्कैंडिनेविया का साक्ष्य: पिछले हिमयुग में बाल्टिक शील्ड पर 3 किमी मोटी बर्फ की चादर थी। लगभग 10,000 वर्ष पूर्व जब बर्फ पिघली, तो क्रस्ट से बोझ हट गया और भू-पटल वर्तमान में लगभग 10 मिमी प्रतिवर्ष (शताब्दी में 1 मीटर) की दर से ऊपर उठ रहा है। 18वीं सदी में आंद्रे सेल्शियस द्वारा चट्टानों पर उकेरे गए जल-स्तर चिह्न आज समुद्र तल से काफी ऊपर उठ चुके हैं और तट पर कई उत्थित समुद्री तट देखे जा सकते हैं।

उदाहरण 5
फ्लूवियो-आइसोस्टैसी के अंतर्गत बंगाल बेसिन तथा सुंदरवन का भू-धंसाव किस प्रकार नियंत्रित होता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियां हिमालय से करोड़ों टन मलबा अपरदित करके प्रतिवर्ष 100 करोड़ टन से अधिक गाद बंगाल डेल्टा तथा सुंदरवन में जमा करती हैं। इस विशाल गाद के भार से भू-पर्पटी प्रतिवर्ष 1 से 4 मिमी की दर से नीचे धंसती है। चूंकि गाद जमा होने की दर और भू-धंसाव की दर में एक संतुलन बना रहता है, इसलिए यहां करोड़ों वर्षों में 10 से 15 किमी मोटा उथले जल का अवसाद जमा हो गया है, फिर भी सुंदरवन डेल्टा कभी समुद्र में पूर्ण रूप से नहीं डूबा।
उदाहरण 6
हिमालय जैसे विशाल पर्वतों पर अत्यधिक ऋणात्मक बूगे विसंगति क्यों पाई जाती है और यह समस्थिति के किस सिद्धांत को प्रमाणित करती है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
बूगे विसंगति निकालते समय समुद्र तल और स्टेशन के बीच स्थित पर्वत के दृश्यमान चट्टानी भार ($0.1119 \text{ mgal/m}$) को घटा दिया जाता है। हिमालय पर यह दृश्यमान भार हटाने पर ग्रेविमीटर में अत्यधिक ऋणात्मक बूगे विसंगति ($-250$ से $-500$ mgal) प्राप्त होती है। इसका कारण यह है कि पर्वत के नीचे भारी मैंटल के स्थान पर लगभग 70 किमी गहरी हल्की ग्रेनाइटिक सियाल जड़ ($2.67$) उपस्थित है, जिससे द्रव्यमान की भारी कमी हो जाती है। यह ऋणात्मक बूगे विसंगति सीधे तौर पर सिद्ध करती है कि पर्वतों के नीचे हल्की जड़ें होती हैं, जो सर जॉर्ज एयरी की जड़ संकल्पना (Root Theory) का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

एयरी की जड़ संकल्पना और प्रैट की क्षतिपूर्ति तल संकल्पना में भ्रम होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

समस्थिति को एक पूर्णतः स्थिर या जड़ अवस्था समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

ऋणात्मक बूगे विसंगति का अर्थ यह समझना कि वहां गुरुत्वाकर्षण समाप्त हो गया है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

भू-संरचनात्मक समस्थिति मॉडल: एयरी बनाम प्रैट का सिद्धांत WBCHSE कक्षा 11 भूगोल • समस्थितिक संतुलन, जड़ संकल्पना एवं क्षतिपूर्ति तल सर जॉर्ज एयरी का सिद्धांत (1855): जड़ संकल्पना / उत्प्लावन नियम समान घनत्व (2.67 g/cm³) एवं विभिन्न गहराई (गहरी जड़ें) Sea Level (০ মি) एस्थेनोस्फीयर / सिमा अधःस्तर (घनत्व 3.0 - 3.3 g/cm³) पर्वत (हिमालय) ρ = 2.67 Height +h Root: -8h गहरी क्रस्टल जड़ें (Crustal Roots) पठार ρ = 2.67 Root: -4h मैदान ρ = 2.67 उथली जड़ Ocean Water महासागरीय क्रस्ट ρ = 3.0 उत्प्लावन अनुपात 1 : 8 (1 km ऊंचाई = 8 km जड़) आर्चडीकन प्रैट का सिद्धांत (1859): क्षतिपूर्ति तल संकल्पना विभिन्न घनत्व (ऊंचाई × घनत्व = स्थिरांक) एवं समान गहराई (100 km तल) Sea Level (০ মি) पर्वत (हिमालय) निम्न घनत्व (2.5) H₁ = High H₁ × ρ₁ पठार मध्यम घनत्व (2.67) H₂ × ρ₂ मैदान उच्च घनत्व (2.8) H₃ × ρ₃ Ocean Water महासागरीय क्रस्ट उच्चतम घनत्व (3.0) क्षतिपूर्ति तल (Line of Compensation ~ 100 km) इस तल पर सभी स्तंभों का भार/दबाव समान (P₁ = P₂ = P₃ = P₄) ↑ Glacio-Isostatic Uplift हिमानी पिघलन एवं भू-उत्थान (स्कैंडिनेविया) Pleistocene ice melt → mantle return (+1 cm/yr) Raised beaches & marine terrace exposure ↓ Fluvio-Deltaic Subsidence तलछट निक्षेप एवं भू-धंसाव (सुंदरवन/बंगाल डेल्टा) Ganga-Brahmaputra silt loading → crustal depression Continuous shallow-water mangrove accumulation Δg Geophysical Gravity Anomaly बूगे विसंगति: पर्वतों पर ऋणात्मक (-) • सागरों पर धनात्मक (+) Free-Air Anomaly (0.3086 mgal/m) & Bouguer (0.112 mgal/m) Himalayas show strong negative Bouguer anomaly (-250 mgal)

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. व्युत्पत्ति एवं अर्थ: ग्रीक शब्द 'Isostasios' (समान संतुलन) से 1889 में अमेरिकी भूवैज्ञानिक क्लेरेंस एडवर्ड डटन ने 'समस्थिति' (Isostasy) शब्द का प्रतिपादन किया।
मुख्य बिंदु 2
  1. भारत का महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण (1859): सर जॉर्ज एवरेस्ट और एंड्रयू वॉ ने कल्याना और कल्यानपुर के बीच अक्षांशीय चाप में 5.236 चाप-सेकंड का अंतर दर्ज किया।
मुख्य बिंदु 3
  1. प्रैट की पहेली: आर्चडीकन जॉन हेनरी प्रैट ने गणना की कि हिमालय को 15.885'' का आकर्षण लगाना चाहिए था, किंतु वास्तविक विचलन मात्र 5.236'' था; 10.649'' की कमी ने पर्वत के नीचे द्रव्यमान न्यूनता सिद्ध की।
मुख्य बिंदु 4
  1. सर जॉर्ज एयरी का सिद्धांत (1855): समान घनत्व एवं विभिन्न गहराई (जड़ संकल्पना)। क्रस्ट का घनत्व सर्वत्र समान (2.67) होता है और पर्वतों के नीचे 1:8 या 1:9 के अनुपात में गहरी जड़ें मैंटल में धंसी होती हैं।
मुख्य बिंदु 5
  1. आर्चडीकन जॉन प्रैट का सिद्धांत (1859): विभिन्न घनत्व एवं समान गहराई (क्षतिपूर्ति तल संकल्पना)। ऊंचाई व घनत्व का व्युत्क्रमानुपाती संबंध (ऊंचाई × घनत्व = स्थिरांक) होता है और 100 किमी गहराई पर क्षतिपूर्ति तल पाया जाता है।
मुख्य बिंदु 6
  1. हेफोर्ड एवं बोवी का संशोधन (1912): प्रैट के मॉडल का गणितीय परिष्करण करके क्रमशः 96 किमी और 112.7 किमी गहराई को मानक क्षतिपूर्ति तल निर्धारित किया।
मुख्य बिंदु 7
  1. वेनिंग मीनिज की प्रादेशिक समस्थिति (1931): प्रमाणित किया कि क्रस्ट पृथक स्तंभों में न होकर एक दृढ़ प्रत्यास्थ पटल है जो भार पड़ने पर विस्तृत क्षेत्र में झुककर संतुलन बनाता है।
मुख्य बिंदु 8
  1. आर्थर होम्स का समन्वय: आधुनिक भू-विज्ञान ने सिद्ध किया कि वलित पर्वतों पर एयरी की जड़ संकल्पना (70 किमी क्रस्ट) और महाद्वीप-महासागर सीमा पर प्रैट का घनत्व अंतर मॉडल दोनों लागू होते हैं।
मुख्य बिंदु 9
  1. गतिक समस्थितिक समायोजन: प्लीस्टोसीन बर्फ पिघलने से स्कैंडिनेविया में प्रतिवर्ष 10 मिमी भू-उत्थान तथा सुंदरवन-बंगाल डेल्टा में 100 करोड़ टन गाद निक्षेप से 1-4 मिमी धंसाव समस्थिति की सक्रियता के अकाट्य साक्ष्य हैं।
मुख्य बिंदु 10
  1. गुरुत्वीय प्रमाण: हिमालय पर तीव्र ऋणात्मक बूगे विसंगति (-250 से -500 mgal) हल्की जड़ों की पुष्टि करती है तथा महासागरों पर धनात्मक विसंगति प्रैट के मॉडल का समर्थन करती है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण में प्राप्त 10.649 चाप-सेकंड की आकर्षण कमी का भू-भौतिकीय अर्थ क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: इसका अर्थ यह है कि हिमालय पर्वत का वास्तविक गुरुत्वाकर्षण खिंचाव उसके दृश्यमान भार की तुलना में बहुत कम है, जिससे यह सिद्ध हुआ कि पर्वत के नीचे हल्के पदार्थों की जड़ उपस्थित है।
2
सामान्य भूतापीय प्रवणता के अंतर्गत एयरी की 70 किमी गहरी ग्रेनाइटिक जड़ के सम्मुख क्या कठिनाई उत्पन्न होती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: प्रति 32 मीटर पर 1°C तापमान बढ़ने से 70 किमी गहराई पर तापमान 1200°C से अधिक हो जाएगा, जहां ग्रेनाइट पिघलकर मैग्मा बन जाएगा और ठोस जड़ का अस्तित्व असंभव हो जाएगा।
3
प्रैट ने पारे में तैरते विभिन्न धातु स्तंभों द्वारा समस्थिति को कैसे समझाया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: उन्होंने दिखाया कि समान भार वाले विभिन्न घनत्व के धातु स्तंभ (सीसा, लोहा, सुरमा) पारे में अलग-अलग ऊंचाई पर तैरते हैं, किंतु उनके निचले तल पारे में एक ही समान क्षैतिज तल पर समाप्त होते हैं।
4
मुक्त-वायु विसंगति और बूगे विसंगति में क्या मूल अंतर है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मुक्त-वायु संशोधन केवल समुद्र तल से दूरी का समायोजन करता है; जबकि बूगे संशोधन बीच में स्थित पर्वत के दृश्यमान चट्टानी भार को घटाकर भू-गर्भ के वास्तविक द्रव्यमान की कमी या अधिकता को दर्शाता है।
5
प्रतिवर्ष 100 करोड़ टन गाद जमा होने के बावजूद सुंदरवन समुद्र में क्यों नहीं डूबता?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि गाद के भार से जिस दर पर क्रस्ट का धंसाव (1-4 मिमी/वर्ष) होता है, नदियों द्वारा निक्षेपण की दर भी लगभग उतनी ही होती है, जिससे गतिक फ्लूवियो-आइसोस्टैटिक संतुलन बना रहता है।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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अध्याय 1: एक विषय के रूप में भूगोल अध्याय 2: पृथ्वी की उत्पत्ति एवं आंतरिक संरचना अध्याय 3: भू-आकृतिक प्रक्रियाएं अध्याय 4: मौसम एवं जलवायु अध्याय 5: समस्थिति की संकल्पना अध्याय 6: जलमंडल अध्याय 7: मानव भूगोल का क्षेत्र एवं विषय-वस्तु अध्याय 8: आर्थिक भूगोल अध्याय 9: Secondary Activities - Industry अध्याय 10: तृतीयक क्रियाकलाप अध्याय 11: चतुर्थक क्रियाकलाप अध्याय 12: पंचमक क्रियाकलाप अध्याय 13: एक देश के रूप में भारत अध्याय 14: भारत की संरचना एवं भू-आकृति अध्याय 15: भारत का अपवाह तंत्र अध्याय 16: भारत की जलवायु अध्याय 17: भारत के वन एवं प्राकृतिक वनस्पति अध्याय 18: भारत की प्राकृतिक आपदाएं एवं संकट

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