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WBB • कक्षा XI • Geography • अध्याय 8
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

आर्थिक भूगोल

आर्थिक भूगोल मानव भूगोल की वह प्रमुख एवं व्यावहारिक शाखा है जो पृथ्वी तल पर प्राकृतिक संसाधनों के निष्कर्षण, उत्पादन, वितरण, विनिमय तथा उपभोग से संबंधित मानव की समग्र आर्थिक क्रियाओं के स्थानिक प्रतिरूप का वैज्ञानिक अध्ययन करती है। इस विषय का दार्शनिक आधार एरिक वाल्टर जिम्मरमैन के गतिशील संसाधन सिद्धांत पर टिका है, जिसके अनुसार संसाधन कोई स्थिर भौतिक वस्तु नहीं बल्कि मानव की तकनीकी दक्षता, ज्ञान और संस्कृति द्वारा निर्मित एक कार्यात्मक उपयोगिता है। मानवीय आजीविका को पांच स्तरों में विभाजित किया जाता है: प्राथमिक लाल कॉलर, द्वितीयक विनिर्माण नीला कॉलर, तृतीयक सेवा प्रदाता गुलाबी कॉलर, चतुर्थक ज्ञान आधारित श्वेत कॉलर तथा पंचमक शीर्ष नीति निर्धारक स्वर्ण कॉलर। टैगा कोणधारी काष्ठ उद्योग, उथले महाद्वीपीय मग्नतटों पर स्थित ग्रैंड बैंक तथा डोगर बैंक जैसे विश्वप्रसिद्ध मत्स्य क्षेत्र, गहन व विस्तृत कृषि प्रणालियां तथा खनिज-ऊर्जा गलियारे इसके केंद्रीय स्तंभ हैं। समकालीन संसाधन ह्रास एवं जलवायु संकट के दौर में वहन क्षमता, संयुक्त वन प्रबंधन, 3R चक्र तथा सतत विकास के सिद्धांतों को लागू करना इसका सर्वोच्च ध्येय है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

आर्थिक भूगोल का अध्ययन पृथ्वी पर प्राकृतिक संपदा के असमान वितरण, औद्योगीकरण के संकेंद्रण, अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों और प्रादेशिक आर्थिक विषमताओं को समझने के लिए नितांत आवश्यक है। यह स्पष्ट करता है कि कुछ क्षेत्र खनिज संपदा से परिपूर्ण होकर भी पिछड़े क्यों रह जाते हैं और प्रौद्योगिकी व पूंजी के समन्वय से अन्य क्षेत्र समृद्धि के शिखर पर कैसे पहुंचते हैं। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में यह विषय राज्य की संपूर्ण अर्थव्यवस्था का भूगोल प्रस्तुत करता है: उर्वर गांगेय मैदान में धान (अमन, आउश, बोरो) एवं जूट की गहन त्रिफसली कृषि, रानीगंज-आसनसोल-दुर्गापुर दामोदर घाटी में कोयला खनन व भारी धातु उद्योग, हुगली नदी के दोनों तटों पर जूट मिलों का संकेंद्रण, दार्जिलिंग हिमालय में विश्वप्रसिद्ध ऑर्थोडॉक्स चाय बागान, पश्चिम मेदिनीपुर के अराबाड़ी में भारत का पहला सफल संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) प्रयोग तथा तटीय सुंदरबन में भेड़ियों के माध्यम से वाणिज्यिक झींगा व मत्स्य पालन।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. संसाधनों की संकल्पना एवं जिम्मरम...
2 2. आर्थिक क्रियाकलापों का पदानुक्रम...
3 3. विश्व के वन संसाधन एवं काष्ठ उद्...
4 4. समुद्री संसाधन एवं विश्व के प्रम...
5 5. विश्व की प्रमुख कृषि प्रणालियां:...
6 6. संसाधन संरक्षण, वहन क्षमता एवं स...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. संसाधनों की संकल्पना एवं जिम्मरमैन का कार्यात्मक सिद्धांत

संसाधनों की गतिशील अवधारणा: "संसाधन होते नहीं, बनते हैं"

पारंपरिक अर्थशास्त्र में कोयला, लोहा या लकड़ी को मात्र एक अचल प्राकृतिक वस्तु माना जाता था। 1933 में (संशोधित 1951) अमेरिकी संसाधन अर्थशास्त्री एरिक वाल्टर जिम्मरमैन (Erich Walter Zimmermann) ने अपनी पुस्तक World Resources and Industries में संसाधनों की क्रांतिकारी कार्यात्मक परिभाषा दी:

जिम्मरमैन के आधारभूत सिद्धांत:

"संसाधन शब्द किसी वस्तु या पदार्थ का परिचायक नहीं है, बल्कि उस कार्य का परिचायक है जो वह पदार्थ मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करता है... संसाधन होते नहीं, वे मानवीय ज्ञान से बनते हैं (Resources are not, they become)।"

  • कार्यात्मकता (Functionality): किसी पदार्थ द्वारा उपयोगी कार्य करने तथा मानवीय इच्छाओं को संतुष्ट करने की सक्रिय क्षमता।
  • उपयोगिता (Operability / Utility): तत्कालीन प्रौद्योगिकी और पूंजी की सहायता से पदार्थ को व्यवहार में लाने की व्यावहारिक योग्यता।
संसाधन निर्माण की त्रिमूर्ति: प्रकृति, मानव एवं संस्कृति

जिम्मरमैन के अनुसार संसाधन तीन तत्वों की अंतःक्रिया से जन्म लेते हैं:

  1. प्रकति (Nature): कच्चा माल और भौतिक आधार उपलब्ध कराती है—मृदा, जल, खनिज, सौर ऊर्जा एवं प्राकृतिक वनस्पति।
  2. मानव (Man): निर्माता और उपभोक्ता दोनों है; मानवीय आवश्यकताएं, श्रम और बुद्धि ही संसाधन निर्माण की प्रेरक शक्ति हैं।
  3. संस्कृति (Culture): विज्ञान, प्रौद्योगिकी, औजार, संगठित श्रम, कानून और पूंजी, जो प्रकृति के कच्चे माल को उपयोगी साधन में बदलती है।
उदासीन तत्व एवं पर्यावरणीय प्रतिरोध
  • उदासीन तत्व (Neutral Stuff): प्रकृति के वे तत्व जो न तो मानव को लाभ पहुंचाते हैं और न ही हानि, क्योंकि वर्तमान प्रौद्योगिकी में उनकी उपयोगिता अभी अज्ञात है (जैसे विखंडन की खोज से पूर्व यूरेनियम, आंतरिक दहन इंजन से पूर्व खनिज तेल)।
  • पर्यावरणीय प्रतिरोध (Resistance): प्रकृति की वे प्रतिकूल दशाएं जो संसाधन निर्माण में बाधा डालती हैं तथा मानव का विनाश करती हैं (जैसे सूखा, बाढ़, मलेरियाग्रस्त दलदल, अत्यधिक ठंड, भूकंपीय भ्रंश)। संस्कृति का लक्ष्य प्रतिरोध को पराजित कर उसे संसाधन में बदलना है।
  • माया स्तूप (Phantom Pile): संसाधनों को एक सीमित, स्थिर ढेर मान लेना जिम्मरमैन के अनुसार 'माया स्तूप' है। प्रौद्योगिकी के विकास के साथ संसाधन निरंतर पुनर्जीवित व विस्तारित होते रहते हैं।
संसाधनों का वैज्ञानिक वर्गीकरण
वर्गीकरण का आधार संसाधन के प्रकार मुख्य लक्षण महत्वपूर्ण उदाहरण
नवीकरणीयता / स्थायित्व प्रवाही (नवीकरणीय) बनाम संचित (अनवीकरणीय) प्रवाही संसाधन प्राकृतिक चक्र द्वारा निरंतर बनते हैं; संचित संसाधन उपयोग के साथ समाप्त हो जाते हैं। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा बनाम रानीगंज का कोयला, पेट्रोलियम
स्थानिक वितरण सर्वसुलभ बनाम स्थानिक संसाधन सर्वसुलभ सर्वत्र मिलते हैं; स्थानिक केवल सीमित भूवैज्ञानिक क्षेत्रों में पाए जाते हैं। वायु, सूर्य का प्रकाश बनाम क्रायोलाइट (ग्रीनलैंड), तांबा, बॉक्साइट
उत्पत्ति का आधार जैव बनाम अजैव संसाधन जैव सजीव जैवमंडल से प्राप्त होते हैं; अजैव निर्जीव पदार्थों से निर्मित होते हैं। वन, मत्स्य, पशुधन बनाम चट्टानें, धातुएं, भूमिगत जल

2. आर्थिक क्रियाकलापों का पदानुक्रम एवं कॉलर वर्गीकरण

पांच स्तरीय आर्थिक क्रियाएं एवं श्रमिकों का कॉलर वर्गीकरण

मानव द्वारा धनोपार्जन एवं आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संपादित क्रियाओं को पांच प्रमुख श्रेणियों में बांटा गया है:

1. प्राथमिक क्रियाकलाप — लाल कॉलर श्रमिक (Red Collar Workers)

प्राकृतिक पर्यावरण से सीधे कच्चे माल का निष्कर्षण व संग्रहण। इसमें कृषि, पशुचारण, काष्ठ कर्तन, मत्स्य पालन, आखेट एवं खनन शामिल हैं। खुले आसमान के नीचे कठोर भौतिक श्रम करने के कारण इन श्रमिकों को 'लाल कॉलर श्रमिक' कहा जाता है।

2. द्वितीयक क्रियाकलाप — नीला कॉलर श्रमिक (Blue Collar Workers)

प्राथमिक उत्पादों का प्रसंस्करण एवं रूप परिवर्तन कर अधिक मूल्यवान निर्मित वस्तुओं में बदलना। जैसे लौह-अयस्क से इस्पात, कपास से सूती वस्त्र, तेल शोधन एवं भवन निर्माण। कारखानों में नीले रंग की कार्य-पोशाक पहनने के कारण इन्हें 'नीला कॉलर श्रमिक' कहा जाता है।

3. तृतीयक क्रियाकलाप — गुलाबी कॉलर श्रमिक (Pink Collar Workers)

प्रत्यक्ष वस्तु निर्माण के बजाय अमूर्त सेवाओं तथा वस्तुओं के वितरण का कार्य। इसमें थोक व खुदरा व्यापार, परिवहन तंत्र, बैंकिंग, बीमा, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं पर्यटन सेवाएं सम्मिलित हैं। पारंपरिक सेवा कर्मियों को 'गुलाबी कॉलर' कहा जाता है।

4. चतुर्थक क्रियाकलाप — श्वेत कॉलर श्रमिक (White Collar Workers)

सूचना, बौद्धिक चिंतन तथा शोध पर आधारित विशिष्ट सेवाएं। इसमें सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग, डेटा विश्लेषण, वित्तीय परामर्श, वैज्ञानिक अनुसंधान एवं सांख्यिकीय प्रबंधन शामिल हैं। वातानुकूलित कार्यालयों में कार्य करने वाले उच्च शिक्षित पेशेवरों को 'श्वेत कॉलर' कहा जाता है।

5. पंचमक क्रियाकलाप — स्वर्ण कॉलर श्रमिक (Gold Collar Workers)

समाज और अर्थव्यवस्था के सर्वोच्च नीति-निर्धारक एवं रणनीतिक मार्गदर्शक। इसमें कैबिनेट मंत्री, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) तथा वैज्ञानिक थिंक-टैंक शामिल हैं।

3. विश्व के वन संसाधन एवं काष्ठ उद्योग

विश्व के प्रमुख वन बायोम

पृथ्वी का लगभग 31% भूभाग (लगभग 4.06 अरब हेक्टेयर) वनों से आच्छादित है, जो वैश्विक जलवायु संतुलन, लकड़ी उत्पादन एवं जैव विविधता संरक्षण में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।

वन बायोम भौगोलिक विस्तार प्रमुख वृक्ष प्रजातियां लकड़ी की विशेषताएं व्यावसायिक दोहन की स्थिति
भूमध्यरेखीय सदाबहार वर्षावन (सेल्वा) अमेजन बेसिन, कांगो बेसिन, इंडोनेशिया ($0^\circ-10^\circ$ उत्तर व दक्षिण) महोगनी, आबनूस (एबोनी), रोजवुड, सिनकोना, ग्रीनहार्ट अत्यधिक कठोर, भारी एवं टिकाऊ; पानी में तैरती नहीं (डूब जाती है) दोहन अत्यंत कठिन: अनेक प्रजातियों का मिश्रित फैलाव, दलदली भूमि, सघन बहुस्तरीय वितान एवं विषैले कीट।
टैगा कोणधारी वन (Taiga) कनाडा, स्कैंडिनेविया (स्वीडन, फिनलैंड) एवं रूसी साइबेरिया ($50^\circ-70^\circ$ उत्तर) चीड़ (पाइन), फर, स्प्रूस, लर्च, देवदार (सीडार) मुलायम, हल्की, रेशेदार कोणधारी लकड़ी; पानी में सुगमता से तैरती है विश्व का प्रमुख काष्ठ उद्योग क्षेत्र: सजातीय वनों का विस्तार, हिमीकृत धरातल पर परिवहन आसान, वसंत में नदियों में बहाकर मिलों तक लकड़ी पहुंचाना सुगम।
शीतोष्ण पर्णपाती वन पश्चिमी यूरोप, पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, उत्तरी चीन, जापान ओक, बीच, मेपल, एल्म, बर्च, चेस्टनट मध्यम से भारी कठोर लकड़ी कृषि एवं अधिवास हेतु व्यापक कटाई; शेष वनों से उच्च कोटि की फर्नीचर लकड़ी प्राप्त होती है।
टैगा कोणधारी वनों में काष्ठ उद्योग के विकास के कारण
  1. समजात वनों का विस्तार: सैकड़ों किमी तक एक ही प्रजाति (पाइन या स्प्रूस) के वृक्ष मिलते हैं, जिससे मशीनों द्वारा बड़े पैमाने पर कटाई संभव होती है।
  2. मुलायम लकड़ी की उपयोगिता: कोमल व रेशेदार लकड़ी कागज, अखबारी कागज, लुगदी, रेयान और माचिस बनाने का आदर्श कच्चा माल है।
  3. हिमानी एवं नदी परिवहन का लाभ: शीत ऋतु में बर्फ पर लकड़ी के लट्ठों को खींचकर नदी तल में जमा किया जाता है; वसंत में बर्फ पिघलते ही वे तैरकर आरा मिलों तक पहुंच जाते हैं।
  4. सस्ती जलविद्युत: हिमानीकृत नदियों व झरनों से प्राप्त प्रचुर जलविद्युत कागज व लुगदी मिलों को ऊर्जा प्रदान करती है।
पश्चिम बंगाल का ऐतिहासिक अराबाड़ी संयुक्त वन प्रबंधन (JFM - 1971)
अराबाड़ी मॉडल: भारत में सामुदायिक वन संरक्षण का मील का पत्थर

1971 में पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले के अराबाड़ी (Arabari) में प्रभागीय वन अधिकारी डॉ. ए.के. बनर्जी के नेतृत्व में संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management) का शुभारंभ हुआ। उजड़ते साल (Shorea robusta) वनों के संरक्षण हेतु उन्होंने 11 गांवों के 612 निर्धन परिवारों को वन सुरक्षा समितियों में संगठित किया। ग्रामीणों को साल के पत्ते, जलावन लकड़ी एकत्र करने का अधिकार तथा अंतिम इमारती लकड़ी की नीलामी से प्राप्त लाभ का 25% हिस्सा दिया गया। इस नवाचार से 1,272 हेक्टेयर का नष्ट वन पुनर्जीवित हो गया और यह मॉडल भारत की राष्ट्रीय वन नीति का आधार बना।

4. समुद्री संसाधन एवं विश्व के प्रमुख व्यावसायिक मत्स्य क्षेत्र

व्यावसायिक मत्स्य पालन हेतु अनुकूल भौगोलिक दशाएं

विश्व के सभी प्रमुख मत्स्य क्षेत्र उत्तरी गोलार्ध के शीतोष्ण अक्षांशों में स्थित हैं, जिसके मुख्य कारण हैं:

  • विस्तृत एवं उथले महाद्वीपीय मग्नतट (<200 मीटर गहराई): सूर्य की किरणें समुद्र तल तक पहुंचती हैं, जिससे प्रकाश-संश्लेषण द्वारा पादप प्लवक (Phytoplankton) और प्राणि प्लवक का अत्यधिक संवर्धन होता है, जो मछलियों का प्राथमिक भोजन है।
  • उष्ण एवं शीतल धाराओं का संगम: धाराओं के मिलने से गहरा सागरीय जल ऊपर उठता है (अपवेलिंग), जिससे नाइट्रेट व फॉस्फेट जैसे पोषक तत्व सतह पर आ जाते हैं। जल का अनुकूल तापमान ($10^\circ-15^\circ$ से.) मछलियों के प्रजनन हेतु आदर्श होता है।
  • शीतल शीतोष्ण जलवायु: मछलियां जल्दी सड़ती नहीं हैं; सुखाने, नमक लगाने व प्रशीतन की सुविधा रहती है।
  • दंतुरित तटरेखा एवं प्राकृतिक पोताश्रय: फियोर्ड व रिया तट मछली पकड़ने वाली नौकाओं और ट्रॉलरों को सुरक्षित लंगरगाह प्रदान करते हैं।
  • विशाल बाजार मांग: जापान, ब्रिटेन तथा तटीय यूरोप के सघन जनसंख्या वाले देशों में मछली की भारी पारंपरिक मांग है।
विश्व के चार प्रमुख व्यावसायिक मत्स्य क्षेत्र
प्रमुख मत्स्य क्षेत्र भौगोलिक अवस्थिति धाराओं का संगम एवं विशेषताएं प्रमुख पकड़ी जाने वाली मछलियां
1. उत्तर-पश्चिम प्रशांत महासागर बेरिंग सागर, ओखोटस्क सागर, जापान सागर से पूर्वी चीन सागर शीतल ओयाशियो धारा एवं उष्ण कुराशियो धारा का संगम; होक्काइडो तट; विश्व का सर्वाधिक मत्स्य उत्पादन क्षेत्र। सैल्मन, हेरिंग, कॉड, मैकेरल, सार्डिन, टूना, स्क्विड
2. उत्तर-पूर्व अटलांटिक महासागर उत्तरी सागर, नॉर्वेजियन सागर, बाल्टिक सागर एवं आइसलैंड तट उष्ण उत्तरी अटलांटिक प्रवाह बंदरगाहों को हिममुक्त रखता है; उथला मग्नतट डोगर बैंक (Dogger Bank) व ग्रेट फिशर बैंक। हेरिंग, कॉड, हैडॉक, मैकेरल, सोल, प्लैस, हैलिबट
3. उत्तर-पश्चिम अटलांटिक महासागर न्यूफाउंडलैंड, नोवा स्कोशिया व सेंट लॉरेंस की खाड़ी उष्ण गल्फ स्ट्रीम तथा शीतल लैब्राडोर धारा का मिलन; प्रसिद्ध ग्रैंड बैंक (Grand Banks); सघन कुहासा एवं प्रचुर प्लवक। अटलांटिक कॉड, हैडॉक, फ्लाउंडर, लॉबस्टर, हेरिंग
4. उत्तर-पूर्व प्रशांत महासागर अलास्का की खाड़ी से कैलिफोर्निया तट अलास्का का चौड़ा मग्नतट व कैलिफोर्निया में शीतल अपवेलिंग; नदियों में सैल्मन मछली का विपरीत दिशा में प्रवासन। सैल्मन (सॉकआई, चिनूक), हैलिबट, हेरिंग, टूना
पेलाजिक बनाम डेमर्सल मछलियां
  • पेलाजिक मछलियां (सतही मछलियां): खुले समुद्र की सतह पर विशाल झुंडों में तैरती हैं; जैसे हेरिंग, सार्डिन, मैकेरल तथा टूना।
  • डेमर्सल मछलियां (तलस्थ मछलियां): महाद्वीपीय मग्नतटों के तल के निकट निवास करती हैं और तलछट के जीवों को खाती हैं; जैसे कॉड, हैडॉक, हैलिबट और सोल।
भारत का EEZ एवं पश्चिम बंगाल में मत्स्य पालन

समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCLOS) के तहत भारत को तटरेखा से 200 समुद्री मील (लगभग 370.4 किमी) तक अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) प्राप्त है। पश्चिम बंगाल में समुद्री मत्स्यन के अतिरिक्त पूर्व मेदिनीपुर और दक्षिण 24 परगना में खारे पानी की पारंपरिक भेड़ियों (Bheris) में टाइगर प्रॉन (झींगा) का व्यावसायिक संवर्धन बड़े पैमाने पर किया जाता है।

5. विश्व की प्रमुख कृषि प्रणालियां: निर्वाह बनाम वाणिज्यिक कृषि

विश्व कृषि का भौगोलिक वर्गीकरण

जलवायु, मिट्टी, जनसंख्या के दबाव एवं तकनीकी विकास के आधार पर विश्व में विभिन्न कृषि प्रणालियों का विकास हुआ है:

1. स्थानांतरित कृषि (Shifting Cultivation / कर्तन एवं दहन कृषि)

उष्णकटिबंधीय वर्षावनों की जनजातियों की आदिम कृषि पद्धति। जंगल को काटकर और जलाकर राख से खेत तैयार किए जाते हैं (Slash-and-Burn / झूम कृषि)। 2-3 वर्षों में मिट्टी की उर्वरता घटने पर खेत छोड़कर नए जंगल को साफ किया जाता है। भारत में झूम, मध्य अमेरिका में मिल्पा, मलेशिया में लदांग तथा ब्राजील में रोका कहा जाता है। यह अत्यंत अनुत्पादक है और इससे भारी वन विनाश होता है।

2. गहन जीविकोपार्जन कृषि (Intensive Subsistence Agriculture)

मानसूनी एशिया (भारत, चीन, बांग्लादेश) के सघन जनसंख्या वाले भागों में प्रचलित। छोटी एवं विखंडित जोतें, पारिवारिक श्रम, बैलों का प्रयोग तथा सघन सिंचाई इसके मुख्य लक्षण हैं। आर्द्र धान प्रधान कृषि: पश्चिम बंगाल के निम्न गांगेय मैदान में वर्ष में तीन बार धान (अमन, आउश, बोरो) उपजाया जाता है। इसका मुख्य लक्षण है: भूमि की प्रति हेक्टेयर उपज बहुत अधिक, परंतु कृषि श्रमिक की प्रति व्यक्ति उत्पादकता कम।

3. विस्तृत वाणिज्यिक अनाज कृषि (Commercial Extensive Grain Farming)

शीतोष्ण कटिबंधीय विशाल घास के मैदानों में प्रचलित: उत्तरी अमेरिका के प्रेयरी, अर्जेंटीना के पंपास, यूरेशिया के स्टेपी तथा ऑस्ट्रेलिया के डाउन्स। फार्मों का आकार अत्यंत विशाल (हजारों हेक्टेयर), विरल जनसंख्या तथा ट्रैक्टर व कंबाइन हार्वेस्टर द्वारा शत-प्रतिशत यंत्रीकृत गेहूं कृषि। इसका लक्षण: प्रति हेक्टेयर उपज कम, परंतु प्रति श्रमिक उत्पादकता अत्यधिक उच्च।

4. वाणिज्यिक रोपण / बागानी कृषि (Plantation Agriculture)

यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में प्रारंभ की गई वाणिज्यिक कृषि। विशाल एस्टेट, भारी पूंजी, वैज्ञानिक प्रबंधन, एकल नकदी फसल तथा प्रसंस्करण कारखानों से सीधा संबंध। मुख्य फसलें: चाय (दार्जिलिंग व असम, भारत; श्रीलंका), कॉफी (ब्राजील के फजेंडा), रबर (मलेशिया), ताड़ का तेल व गन्ना।

5. उद्यान कृषि / बाजार आधारित कृषि (Truck Farming / Horticulture)

महानगरों के निकटवर्ती क्षेत्रों में फल, फूल एवं सब्जियों की सघन खेती (जैसे कोलकाता के आसपास उत्तर 24 परगना व नदिया में सब्जी उत्पादन)। रात्रि में ट्रकों में भरकर प्रातःकाल नगर की मंडियों में ताजा माल पहुंचाने के कारण इसे 'ट्रक फार्मिंग' कहा जाता है।

6. संसाधन संरक्षण, वहन क्षमता एवं सतत विकास

माल्थस का जनसंख्या सिद्धांत बनाम क्लब ऑफ रोम ("वृद्धि की सीमाएं")

संसाधनों के ह्रास और भावी संकट पर दो ऐतिहासिक विचार प्रस्तुत किए गए हैं:

  • माल्थस का सिद्धांत (Thomas Malthus, 1798): जनसंख्या ज्यामितीय दर ($1, 2, 4, 8, 16...$) से बढ़ती है, जबकि खाद्य उत्पादन अंकगणितीय दर ($1, 2, 3, 4, 5...$) से बढ़ता है। इसके परिणामस्वरूप अकाल, युद्ध और महामारी के रूप में प्राकृतिक अवरोध संतुलन बनाते हैं।
  • वृद्धि की सीमाएं (The Limits to Growth - Club of Rome, 1972): डोनेला मीडोज एवं साथियों ने एमआईटी के कंप्यूटर मॉडल (World3) के आधार पर सिद्ध किया कि यदि अनियंत्रित दोहन जारी रहा तो 21वीं सदी के मध्य तक वैश्विक औद्योगिक व पारिस्थितिक पतन निश्चित है।
ब्रंटलैंड आयोग एवं सतत विकास (Sustainable Development)
सतत विकास की सर्वमान्य परिभाषा (1987):

संयुक्त राष्ट्र के विश्व पर्यावरण एवं विकास आयोग की अध्यक्षा ग्रो हार्लेम ब्रंटलैंड द्वारा प्रस्तुत ऐतिहासिक रिपोर्ट Our Common Future में कहा गया:

"सतत विकास वह विकास है जो भावी पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता से समझौता किए बिना वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करता है।"

3R संकल्पना एवं चक्रीय अर्थव्यवस्था

संसाधनों के अंधाधुंध विनाश को रोकने हेतु रैखिक अर्थव्यवस्था के स्थान पर चक्रीय अर्थव्यवस्था अपनाई जा रही है:

  1. उपयोग में कमी (Reduce): उत्पादन प्रक्रिया में दक्षता बढ़ाकर कच्चे माल एवं ऊर्जा की खपत को न्यूनतम करना।
  2. पुनः उपयोग (Reuse): वस्तुओं को कचरा बनने से पूर्व कई बार उपयोग में लाना (जैसे कांच की बोतलें)।
  3. पुनर्चक्रण (Recycle): अवशिष्ट पदार्थों (लोहे का कबाड़, प्लास्टिक, रद्दी कागज) को प्रसंस्कृत कर पुनः नए उपयोगी सामान में ढालना।
पश्चिम बंगाल में संसाधन मूल्यांकन एवं संधारणीय योजनाएं
  • कोल बेड मीथेन (CBM): रानीगंज कोयला क्षेत्र की परतों में फंसी मीथेन गैस का व्यावसायिक निष्कर्षण कर पर्यावरण अनुकूल ईंधन प्रदान किया जा रहा है।
  • अक्षय ऊर्जा का विस्तार: सागरदीघी जलाशय पर फ्लोटिंग सोलर पैनल, दार्जिलिंग में लघु पनबिजली परियोजनाएं तथा सुंदरबन में ज्वारीय ऊर्जा के शोध कार्य।
  • कृषि-जलवायु प्रादेशीकरण: पश्चिम बंगाल को 6 विशिष्ट कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बांटकर मृदा संरक्षण और विवेकपूर्ण फसल चक्र को बढ़ावा दिया जा रहा है।

महत्वपूर्ण भौगोलिक अवधारणाएँ, नियम एवं निर्देशांक

जिम्मरमैन का संसाधन समीकरण
संसाधन = प्रकृति + मानव + संस्कृति - प्रतिरोध
प्रति श्रमिक कृषि उत्पादकता
श्रमिक उत्पादकता = {कुल कृषि उत्पादन (मीट्रिक टन)}{कुल कृषि कार्यबल}
प्रति हेक्टेयर भूमि उत्पादकता
भूमि उत्पादकता = {कुल फसल उपज (किग्रा)}{कुल शुद्ध बोया गया क्षेत्रफल (हेक्टेयर)}
चक्रीय अर्थव्यवस्था 3R चक्र
रैखिक अर्थव्यवस्था चक्रीय अर्थव्यवस्था (कमी → पुनः उपयोग → पुनर्चक्रण)

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
एरिक वाल्टर जिम्मरमैन के अनुसार संसाधन की परिभाषा लिखिए तथा 'उदासीन तत्व' की संकल्पना स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. जिम्मरमैन की संसाधन परिभाषा: 1933 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'World Resources and Industries' में जिम्मरमैन ने कहा: 'संसाधन होते नहीं, बनते हैं (Resources are not, they become)।' उनके अनुसार संसाधन किसी वस्तु का नाम नहीं है, बल्कि वह कार्य या क्रिया है जिससे मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।
  2. उदासीन तत्व (Neutral Stuff): प्रकृति के वे पदार्थ जिनकी उपयोगिता या हानिकारकता अभी तक अज्ञात है, उदासीन तत्व कहलाते हैं। उदाहरणार्थ, परमाणु विखंडन की खोज से पूर्व यूरेनियम एक उदासीन तत्व था।
  3. रूपांतरण: जब मानवीय ज्ञान, विज्ञान और तकनीक का विकास होता है, तब वही उदासीन तत्व बहुमूल्य संसाधन में बदल जाता है।
उदाहरण 2
प्राथमिक और द्वितीयक आर्थिक क्रियाकलापों में तीन अंतर स्पष्ट कीजिए तथा इनके श्रमिकों के कॉलर का रंग बताइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

प्राथमिक और द्वितीयक आर्थिक क्रियाओं में अंतर:

  1. क्रिया का स्वरूप:
  • प्राथमिक: प्रकृति से सीधे जुड़े रहकर कच्चे माल का निष्कर्षण व संग्रहण (जैसे कृषि, खनन, मत्स्यन)।
  • द्वितीयक: कारखानों में कच्चे माल का प्रसंस्करण कर नए व उपयोगी उत्पाद तैयार करना (जैसे इस्पात निर्माण, वस्त्र उद्योग)।
  1. कार्य की दशाएं:
  • प्राथमिक: धूप, वर्षा व धूल के बीच खुले आसमान के नीचे कठोर भौतिक श्रम।
  • द्वितीयक: कारखानों, मिलों या भवनों के भीतर नियंत्रित यंत्रीकृत वातावरण में कार्य।
  1. मूल्य संवर्धन:
  • प्राथमिक: उत्पाद का प्रति इकाई मूल्य संवर्धन अपेक्षाकृत कम होता है।
  • द्वितीयक: रूप परिवर्तन और निर्माण के कारण उत्पाद का आर्थिक मूल्य बहुत अधिक बढ़ जाता है।
  1. श्रमिकों का कॉलर:
  • प्राथमिक क्रियाकलाप: लाल कॉलर श्रमिक (Red Collar Workers)।
  • द्वितीयक क्रियाकलाप: नीला कॉलर श्रमिक (Blue Collar Workers)।
उदाहरण 3
टैगा कोणधारी वनों में व्यावसायिक काष्ठ उद्योग अत्यधिक विकसित क्यों है? पांच भौगोलिक कारण लिखिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

टैगा कोणधारी वनों में काष्ठ उद्योग के अत्यधिक विकास के पांच प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

  1. समजात वनों का विस्तार: टैगा वनों में एक ही प्रजाति (चीड़, फर, स्प्रूस) के वृक्ष मीलों दूर तक शुद्ध रूप से फैले होते हैं, जिससे मशीनों द्वारा बड़े पैमाने पर कटाई अत्यंत सरल हो जाती है।

  2. मुलायम लकड़ी की उपयोगिता: कोणधारी वृक्षों की लकड़ी हल्की, मुलायम व रेशेदार होती है, जो कागज, अखबारी कागज, लुगदी और रेयान उद्योग का सर्वोत्तम कच्चा माल है।

  3. हिमानी व नदीय परिवहन का लाभ: शीतकाल में जमी हुई बर्फ पर लट्ठों को सरकाकर नदी तट पर एकत्र किया जाता है। वसंत में बर्फ पिघलते ही नदियां इन लट्ठों को बहाकर बिना किसी खर्च के मीलों दूर मिलों तक पहुंचा देती हैं।

  4. स्वास्थ्यप्रद शीतल जलवायु: ठंडी जलवायु के कारण श्रमिक बिना थके काम करते हैं तथा उष्णकटिबंधीय वनों की भांति विषैले कीड़े-मकोड़ों या मलेरिया का कोई भय नहीं होता।

  5. प्रचुर जलविद्युत एवं समीपवर्ती विशाल बाजार: हिमानीकृत जलप्रपातों से सस्ती जलविद्युत प्राप्त होती है तथा समीपवर्ती यूरोप व उत्तरी अमेरिका के विकसित देशों में कागज की भारी मांग है।

उदाहरण 4
न्यूफाउंडलैंड का ग्रैंड बैंक मत्स्य क्षेत्र व्यावसायिक दृष्टि से इतना समृद्ध क्यों है? तीन कारण स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

ग्रैंड बैंक के विश्वप्रसिद्ध मत्स्य क्षेत्र बनने के तीन मुख्य कारण हैं:

  1. उष्ण व शीतल धाराओं का संगम: गर्म गल्फ स्ट्रीम और ठंडी लैब्राडोर धारा का यहां मिलन होता है। इससे जल में तीव्र मंथन होता है और पोषक तत्व (नाइट्रेट व फॉस्फेट) सतह पर आ जाते हैं।
  2. प्लवक (Plankton) की प्रचुरता: पोषक तत्वों और अनुकूल तापमान के कारण पादप व प्राणि प्लवक का भारी संवर्धन होता है, जो कॉड और हैडॉक मछलियों का प्रमुख भोजन है।
  3. उथला महाद्वीपीय मग्नतट: यहां सागर की गहराई 100 मीटर से कम है, जिससे सूर्य का प्रकाश तल तक पहुंचता है और मछलियों के प्रजनन हेतु आदर्श वातावरण बनता है।
उदाहरण 5
संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) क्या है? पश्चिम बंगाल के अराबाड़ी में इसका ऐतिहासिक शुभारंभ कैसे हुआ?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. JFM का अर्थ: सरकारी वन विभाग और स्थानीय ग्रामीण समुदायों की संयुक्त भागीदारी से नष्ट वनों के संरक्षण, पुनरुद्धार और लाभ-साझाकरण की लोकतांत्रिक प्रणाली को संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) कहते हैं।
  2. अराबाड़ी में शुरुआत: 1971 में पश्चिम मेदिनीपुर जिले के अराबाड़ी में प्रभागीय वन अधिकारी डॉ. ए.के. बनर्जी ने नष्ट होते साल वनों को बचाने हेतु 11 गांवों के 612 निर्धन परिवारों को संगठित कर वन सुरक्षा समितियां (FPC) बनाईं।
  3. परिणाम: ग्रामीणों को साल पत्ता, जलावन लकड़ी एकत्र करने का निशुल्क अधिकार तथा इमारती लकड़ी की अंतिम नीलामी के लाभ का 25% हिस्सा दिया गया। इससे वनों की कटाई रुकी और 1,272 हेक्टेयर साल वन पुनर्जीवित हुआ, जो पूरे भारत का राष्ट्रीय मॉडल बना।
उदाहरण 6
गहन जीविकोपार्जन कृषि और विस्तृत वाणिज्यिक अनाज कृषि में अंतर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

दोनों कृषि प्रणालियों में प्रमुख अंतर:

  1. भौगोलिक क्षेत्र एवं जनघनत्व:
  • गहन कृषि: मानसूनी एशिया के अत्यधिक सघन जनसंख्या वाले जलोढ़ मैदान (भारत, बांग्लादेश, चीन)।
  • विस्तृत कृषि: शीतोष्ण कटिबंधीय विरल जनसंख्या वाले विशाल घास के मैदान (प्रेयरी, स्टेपी, पंपास)।
  1. जोत का आकार एवं यंत्रीकरण:
  • गहन कृषि: जोतें अत्यंत छोटी व विखंडित; पारिवारिक श्रम व बैलों की प्रधानता; यंत्रीकरण सीमित।
  • विस्तृत कृषि: फार्म अत्यंत विशाल (सैकड़ों हेक्टेयर); ट्रैक्टर व हार्वेस्टर द्वारा शत-प्रतिशत यंत्रीकृत कृषि।
  1. उत्पादकता का तुलनात्मक विश्लेषण (मुख्य अंतर):
  • गहन कृषि: प्रति हेक्टेयर भूमि की उत्पादकता बहुत उच्च, परंतु प्रति श्रमिक उत्पादकता कम।
  • विस्तृत कृषि: प्रति हेक्टेयर भूमि की उत्पादकता मध्यम या कम, परंतु प्रति श्रमिक उत्पादकता अत्यधिक उच्च।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

संसाधन को केवल मिट्टी, पानी या पत्थर जैसी स्थिर वस्तु समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

तृतीयक और चतुर्थक क्रियाकलापों को एक ही मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि भूमध्यरेखीय वनों में तेजी से पेड़ बढ़ने के कारण लकड़ी काटना बहुत आसान है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

आर्थिक भूगोल एवं संसाधन संकल्पना कक्षा 11 भूगोल • जिम्मरमैन का संसाधन सिद्धांत, 5-स्तरीय आर्थिक पिरामिड एवं वैश्विक उत्पादन WBCHSE CLASS 11 जिम्मरमैन का गतिशील संसाधन सिद्धांत कार्यात्मक अवधारणा: "संसाधन होते नहीं, बनते हैं" उदासीन तत्व (Neutral Stuff)
प्रकृति के वे तत्व जिनकी उपयोगिता अज्ञात अथवा अप्रयुक्त है
मानवीय ज्ञान एवं संस्कृति
विज्ञान, तकनीकी दक्षता, पूंजी एवं संगठित श्रम
गतिशील संसाधन (Resource) +
कार्यात्मकता एवं उपयोगिता द्वारा मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति
पर्यावरणीय प्रतिरोध (Resistance) −
प्राकृतिक आपदाएं, विषम उच्चावच एवं प्रतिकूल जलवायु
आर्थिक क्रियाकलापों का पदानुक्रम पांच प्रमुख व्यावसायिक वर्ग एवं कॉलर वर्गीकरण पंचमक क्रियाएं (स्वर्ण कॉलर)
शीर्ष नीति-निर्माता, मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं वरिष्ठ सलाहकार
चतुर्थक क्रियाएं (श्वेत कॉलर)
सूचना प्रौद्योगिकी, डेटा विश्लेषण, सॉफ्टवेयर एवं अनुसंधान
तृतीयक क्रियाएं (गुलाबी कॉलर)
व्यापार, परिवहन, संचार, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं पर्यटन
द्वितीयक क्रियाएं (नीला कॉलर)
विनिर्माण उद्योग, प्रसंस्करण, धातु शोधन एवं निर्माण
प्राथमिक क्रियाएं (लाल कॉलर)
कृषि, वानिकी, मत्स्य पालन, पशुचारण एवं खनन
वैश्विक प्रमुख संसाधन बायोम व्यावसायिक दोहन एवं संधारणीय संरक्षण टैगा कोणधारी वन एवं काष्ठ उद्योग
चीड़, फर, स्प्रूस के समजात वन; कनाडा एवं रूस में लुगदी व कागज उद्योग
व्यावसायिक महाद्वीपीय मग्नतट मत्स्य क्षेत्र
ग्रैंड बैंक एवं डोगर बैंक; उष्ण व शीतल धाराओं के संगम से प्लवक संवर्धन
संधारणीय संसाधन प्रबंधन
संयुक्त वन प्रबंधन (जेएफएम अराबाड़ी), 3R सिद्धांत, ईईजेड एवं सतत विकास

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. आर्थिक भूगोल पृथ्वी तल पर प्राकृतिक संसाधनों के निष्कर्षण, उत्पादन, वितरण, विनिमय एवं उपभोग का स्थानिक अध्ययन करता है।
मुख्य बिंदु 2
  1. एरिक वाल्टर जिम्मरमैन के अनुसार संसाधन कोई जड़ पदार्थ नहीं है, बल्कि मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने की कार्यात्मक उपयोगिता है ('संसाधन बनते हैं')।
मुख्य बिंदु 3
  1. संसाधन निर्माण प्रकृति (कच्चा माल), मानव (मांग व श्रम) तथा संस्कृति (प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान) के त्रिपक्षीय समन्वय से संभव होता है।
मुख्य बिंदु 4
  1. अज्ञात उपयोगिता वाले पदार्थों को उदासीन तत्व (Neutral Stuff) तथा विकास में अवरोधक प्राकृतिक विपदाओं को प्रतिरोध (Resistance) कहते हैं।
मुख्य बिंदु 5
  1. आर्थिक क्रियाएं 5 स्तरों में विभाजित हैं: प्राथमिक (लाल कॉलर), द्वितीयक (नीला कॉलर), तृतीयक (गुलाबी कॉलर), चतुर्थक (श्वेत कॉलर) एवं पंचमक (स्वर्ण कॉलर)।
मुख्य बिंदु 6
  1. टैगा कोणधारी वन समजात वृक्षों, मुलायम लकड़ी एवं हिमानी नदी परिवहन के कारण विश्व के सबसे बड़े काष्ठ एवं कागज उद्योग केंद्र हैं।
मुख्य बिंदु 7
  1. उथले मग्नतटों तथा उष्ण व शीतल धाराओं के संगम से प्लवक वृद्धि के कारण ग्रैंड बैंक तथा डोगर बैंक जैसे प्रमुख मत्स्य क्षेत्र विकसित हुए हैं।
मुख्य बिंदु 8
  1. मछलियां सतही (पेलाजिक) और तलस्थ (डेमर्सल) श्रेणियों में बांटी जाती हैं; तटीय देशों को 200 नॉटिकल मील का EEZ अधिकार प्राप्त है।
मुख्य बिंदु 9
  1. कृषि के प्रमुख स्वरूप: आदिम स्थानांतरित कृषि (झूम/मिल्पा), मानसूनी एशिया की सघन गहन निर्वाह कृषि तथा शीतोष्ण मैदानों की विस्तृत वाणिज्यिक कृषि।
मुख्य बिंदु 10
  1. सतत विकास की अवधारणा 1987 के ब्रंटलैंड आयोग द्वारा स्थापित हुई; पश्चिम बंगाल का 1971 का अराबाड़ी संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) इसका ऐतिहासिक उदाहरण है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

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अध्याय 1: एक विषय के रूप में भूगोल अध्याय 2: पृथ्वी की उत्पत्ति एवं आंतरिक संरचना अध्याय 3: भू-आकृतिक प्रक्रियाएं अध्याय 4: मौसम एवं जलवायु अध्याय 5: समस्थिति की संकल्पना अध्याय 6: जलमंडल अध्याय 7: मानव भूगोल का क्षेत्र एवं विषय-वस्तु अध्याय 8: आर्थिक भूगोल अध्याय 9: Secondary Activities - Industry अध्याय 10: तृतीयक क्रियाकलाप अध्याय 11: चतुर्थक क्रियाकलाप अध्याय 12: पंचमक क्रियाकलाप अध्याय 13: एक देश के रूप में भारत अध्याय 14: भारत की संरचना एवं भू-आकृति अध्याय 15: भारत का अपवाह तंत्र अध्याय 16: भारत की जलवायु अध्याय 17: भारत के वन एवं प्राकृतिक वनस्पति अध्याय 18: भारत की प्राकृतिक आपदाएं एवं संकट

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