पृथ्वी एवं सौरमंडल की उत्पत्ति की व्याख्या के लिए विद्वानों ने कई परिकल्पनाएं प्रस्तुत की हैं, जिन्हें मुख्य रूप से एकातारक (Monistic), द्वैतारक (Dualistic) तथा आधुनिक खगोलीय सिद्धांतों में वर्गीकृत किया गया है:
दार्शनिक आधार: न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम पर आधारित। जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट ने माना कि ब्रह्मांड में प्रारंभ में शीतल, गतिहीन और ठोस 'आद्य पदार्थ' (Primordial Matter / Urstoff) बिखरा हुआ था। गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण ये कण परस्पर टकराने लगे। कांट के अनुसार आपसी घर्षण और टक्करों से ताप तथा घूर्णन गति उत्पन्न हुई और यह शीतल कण-मेघ एक विशाल, तप्त और घूमती हुई गैसीय निहारिका में बदल गया, जिससे छल्लों के रूप में ग्रहों की उत्पत्ति हुई।
वैज्ञानिक त्रुटि: यह परिकल्पना भौतिकी के कोणीय संवेग संरक्षण के नियम (Law of Conservation of Angular Momentum) का उल्लंघन करती है। स्थिर कणों के आपसी गुरुत्वीय टकराव से स्वतः घूर्णन गति उत्पन्न नहीं हो सकती।
सिद्धांत: फ्रांसीसी गणितज्ञ पियरे-साइमन लाप्लास ने कांट की कमी को सुधारते हुए माना कि अंतरिक्ष में पहले से ही एक अत्यंत तप्त और धीरे-धीरे घूमती हुई गैसीय निहारिका (Nebula) विद्यमान थी। अंतरिक्ष में ऊष्मा के निरंतर विकिरण से निहारिका ठंडी होकर सिकुड़ने लगी। कोणीय संवेग संरक्षण ($L = I\omega = ext{स्थिरांक}$) के कारण जैसे-जैसे इसका आकार छोटा हुआ, इसके घूर्णन की गति अत्यधिक तेज हो गई। घूर्णन बढ़ने से भूमध्यरेखीय भाग में अपकेंद्री बल (Centrifugal Force) गुरुत्वाकर्षण से अधिक हो गया और क्रमशः गैसीय छल्ले बाहर निकलते गए। ये छल्ले ठंडे और घनीभूत होकर ग्रहों में बदल गए और केंद्रीय शेष भाग सूर्य बन गया।
द्वैतारक सिद्धांत: ब्रिटिश वैज्ञानिक सर जेम्स जींस और हेरोल्ड जेफ्रीज ने माना कि हमारे आदि-सूर्य के निकट से अंतरिक्ष में एक विशालकाय 'आगंतुक तारा' (Intruding Star) गुजरा। उस विशाल तारे के प्रचंड गुरुत्वाकर्षण के कारण सूर्य की सतह पर एक विशाल ज्वार उठा। जैसे-जैसे वह तारा सूर्य के अत्यंत निकट आया, सूर्य से एक विशाल सिगार या तर्कु आकार (Spindle-shaped / Cigar-shaped) का गैसीय फिलामेंट खिंचकर अलग हो गया। यह फिलामेंट बीच में मोटा और दोनों किनारों पर पतला था। तारे के दूर चले जाने पर यह फिलामेंट टूटकर घनीभूत हो गया, जिससे बीच में विशाल ग्रह (बृहस्पति और शनि) तथा किनारों पर छोटे ग्रह (बुध, मंगल, यूरेनस, नेपच्यून) बने।
बेल्जियम के खगोलशास्त्री जॉर्ज लेमैत्रे (1927) द्वारा प्रतिपादित तथा एडविन हबल (1929) द्वारा ब्रह्मांड के विस्तार (Red Shift) के प्रमाणों से समर्थित। लगभग 13.8 अरब वर्ष पूर्व ब्रह्मांड का सारा पदार्थ और ऊर्जा एक अत्यधिक सघन और सूक्ष्म एकाकी परमाणु (Singularity) में केंद्रित थी। एक महाविस्फोट के साथ ब्रह्मांड का तीव्र विस्तार शुरू हुआ। लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व सौर निहारिका के गुरुत्वीय संकुचन से हमारे सूर्य और पृथ्वी का जन्म हुआ।