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WBB • कक्षा XI • Geography • अध्याय 2
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

पृथ्वी की उत्पत्ति एवं आंतरिक संरचना

पृथ्वी की उत्पत्ति एवं आंतरिक संरचना पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद (WBCHSE) कक्षा 11 भौतिक भूगोल का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और वैज्ञानिक आधारशिला वाला अध्याय है। सौरमंडल तथा पृथ्वी के उद्भव को स्पष्ट करने के लिए 18वीं सदी से लेकर आधुनिक काल तक इमैनुएल कांट की वायव्य राशि परिकल्पना, पियरे-साइमन लाप्लास की निहारिका परिकल्पना और जेम्स जींस तथा हेरोल्ड जेफ्रीज की ज्वारीय परिकल्पना से लेकर आधुनिक खगोलीय बिग बैंग सिद्धांत तक अनेक वैज्ञानिक सिद्धांतों का विकास हुआ है। धरातल के नीचे प्रत्यक्ष मानवीय प्रवेश अत्यंत सीमित होने के कारण पृथ्वी की आंतरिक परतों का अध्ययन मुख्यतः भूकंपीय तरंगों के व्यवहार पर निर्भर करता है। भूकंपीय अनुदैर्घ्य P-तरंगों तथा अनुप्रस्थ S-तरंगों की गति एवं उनके छाया क्षेत्रों के विश्लेषण से वैज्ञानिकों ने पृथ्वी को विभिन्न संकेंद्री परतों में विभाजित किया है—महाद्वीपीय सियाल और महासागरीय सिमा से युक्त भूपर्पटी, दुर्बलतामण्डल (एस्थेनोस्फीयर) युक्त मैंटल तथा तरल बाह्य क्रोड व अत्यधिक सघन ठोस आंतरिक क्रोड, जो कॉनराड, मोहो, रेपेटी, गुटेनबर्ग और लेहमैन असंबंधताओं द्वारा पृथक हैं।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पृथ्वी की उत्पत्ति और आंतरिक बनावट का ज्ञान संपूर्ण भू-गतिकीय, विवर्तनिक और स्थलरूप निर्माणकारी प्रक्रियाओं को समझने के लिए अपरिहार्य है। ऊपरी मैंटल के दुर्बलतामण्डल में उत्पन्न होने वाली संवहन धाराएं ही विशाल स्थलमंडलीय प्लेटों को गति प्रदान करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप महाद्वीपीय विस्थापन, पर्वतों का निर्माण, भूकंप और ज्वालामुखी जैसी घटनाएं घटित होती हैं। इसके अतिरिक्त बाह्य क्रोड में पिघले हुए लोहे और निकल के चक्रीय संवहन से उत्पन्न भू-डायनेमो पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र (मैग्नेटोस्फीयर) का निर्माण करता है, जो हानिकारक सौर पवनों और ब्रह्मांडीय विकिरणों को रोककर पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करता है। व्यावहारिक दृष्टि से भू-तापीय ऊर्जा, खनिज अन्वेषण और पेट्रोलियम भूविज्ञान के लिए आंतरिक संरचना का ज्ञान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. पृथ्वी की उत्पत्ति के प्रमुख प्र...
2 2. भू-वैज्ञानिक समय मापक्रम एवं पर्...
3 3. पृथ्वी की आंतरिक संरचना की जानका...
4 4. भूकंप विज्ञान (Seismology): भूगर...
5 5. पृथ्वी की संकेंद्री परतें: भूपर्...
6 6. पृथ्वी के आंतरिक भाग की असंबंधता...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. पृथ्वी की उत्पत्ति के प्रमुख प्राचीन एवं आधुनिक सिद्धांत

सौरमंडल का उद्भव: एकतारक, द्वितारक एवं आधुनिक ब्रह्मांडीय मॉडल

पृथ्वी एवं सौरमंडल की उत्पत्ति की व्याख्या के लिए विद्वानों ने कई परिकल्पनाएं प्रस्तुत की हैं, जिन्हें मुख्य रूप से एकातारक (Monistic), द्वैतारक (Dualistic) तथा आधुनिक खगोलीय सिद्धांतों में वर्गीकृत किया गया है:

क. इमैनुएल कांट की वायव्य राशि परिकल्पना (Kant's Gaseous Hypothesis, 1755)

दार्शनिक आधार: न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम पर आधारित। जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट ने माना कि ब्रह्मांड में प्रारंभ में शीतल, गतिहीन और ठोस 'आद्य पदार्थ' (Primordial Matter / Urstoff) बिखरा हुआ था। गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण ये कण परस्पर टकराने लगे। कांट के अनुसार आपसी घर्षण और टक्करों से ताप तथा घूर्णन गति उत्पन्न हुई और यह शीतल कण-मेघ एक विशाल, तप्त और घूमती हुई गैसीय निहारिका में बदल गया, जिससे छल्लों के रूप में ग्रहों की उत्पत्ति हुई।

वैज्ञानिक त्रुटि: यह परिकल्पना भौतिकी के कोणीय संवेग संरक्षण के नियम (Law of Conservation of Angular Momentum) का उल्लंघन करती है। स्थिर कणों के आपसी गुरुत्वीय टकराव से स्वतः घूर्णन गति उत्पन्न नहीं हो सकती।

ख. लाप्लास की निहारिका परिकल्पना (Laplace's Nebular Hypothesis, 1796)

सिद्धांत: फ्रांसीसी गणितज्ञ पियरे-साइमन लाप्लास ने कांट की कमी को सुधारते हुए माना कि अंतरिक्ष में पहले से ही एक अत्यंत तप्त और धीरे-धीरे घूमती हुई गैसीय निहारिका (Nebula) विद्यमान थी। अंतरिक्ष में ऊष्मा के निरंतर विकिरण से निहारिका ठंडी होकर सिकुड़ने लगी। कोणीय संवेग संरक्षण ($L = I\omega = ext{स्थिरांक}$) के कारण जैसे-जैसे इसका आकार छोटा हुआ, इसके घूर्णन की गति अत्यधिक तेज हो गई। घूर्णन बढ़ने से भूमध्यरेखीय भाग में अपकेंद्री बल (Centrifugal Force) गुरुत्वाकर्षण से अधिक हो गया और क्रमशः गैसीय छल्ले बाहर निकलते गए। ये छल्ले ठंडे और घनीभूत होकर ग्रहों में बदल गए और केंद्रीय शेष भाग सूर्य बन गया।

ग. जींस एवं जेफ्रीज की ज्वारीय परिकल्पना (Tidal Hypothesis, 1919/1929)

द्वैतारक सिद्धांत: ब्रिटिश वैज्ञानिक सर जेम्स जींस और हेरोल्ड जेफ्रीज ने माना कि हमारे आदि-सूर्य के निकट से अंतरिक्ष में एक विशालकाय 'आगंतुक तारा' (Intruding Star) गुजरा। उस विशाल तारे के प्रचंड गुरुत्वाकर्षण के कारण सूर्य की सतह पर एक विशाल ज्वार उठा। जैसे-जैसे वह तारा सूर्य के अत्यंत निकट आया, सूर्य से एक विशाल सिगार या तर्कु आकार (Spindle-shaped / Cigar-shaped) का गैसीय फिलामेंट खिंचकर अलग हो गया। यह फिलामेंट बीच में मोटा और दोनों किनारों पर पतला था। तारे के दूर चले जाने पर यह फिलामेंट टूटकर घनीभूत हो गया, जिससे बीच में विशाल ग्रह (बृहस्पति और शनि) तथा किनारों पर छोटे ग्रह (बुध, मंगल, यूरेनस, नेपच्यून) बने।

घ. आधुनिक सिद्धांत: बिग बैंग सिद्धांत (Big Bang Theory)

बेल्जियम के खगोलशास्त्री जॉर्ज लेमैत्रे (1927) द्वारा प्रतिपादित तथा एडविन हबल (1929) द्वारा ब्रह्मांड के विस्तार (Red Shift) के प्रमाणों से समर्थित। लगभग 13.8 अरब वर्ष पूर्व ब्रह्मांड का सारा पदार्थ और ऊर्जा एक अत्यधिक सघन और सूक्ष्म एकाकी परमाणु (Singularity) में केंद्रित थी। एक महाविस्फोट के साथ ब्रह्मांड का तीव्र विस्तार शुरू हुआ। लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व सौर निहारिका के गुरुत्वीय संकुचन से हमारे सूर्य और पृथ्वी का जन्म हुआ।

2. भू-वैज्ञानिक समय मापक्रम एवं पर्वत निर्माणकारी युग

पृथ्वी के 4.6 अरब वर्षों का भू-वैज्ञानिक कालक्रम

पृथ्वी के संपूर्ण 460 करोड़ वर्ष पुराने इतिहास को भू-वैज्ञानिक समय मापक्रम (Geological Time Scale) के अंतर्गत महाकल्प (Era), कल्प (Period) और युग (Epoch) में बांटा गया है:

महाकल्प (Era) कल्प (Period) एवं अवधि प्रमुख जैविक एवं विवर्तनिक घटनाएं
पूर्व-कैम्ब्रियन (Pre-Cambrian) 460 करोड़ से 54 करोड़ वर्ष पूर्व तक (पृथ्वी की आयु का 88%) पृथ्वी का शीतलन, प्राचीनतम आद्य चट्टानों का निर्माण, एककोशिकीय साइनोबैक्टीरिया; लॉरेशियन/चार्नियन पर्वत निर्माण।
पुराजीवी (Paleozoic) कैम्ब्रियन, ऑर्डोविशियन, सिल्यूरियन, डेवोनियन, कार्बोनिफेरस, पर्मियन (54 से 25 करोड़ वर्ष पूर्व) समुद्री अकशेरुकी जीवों का प्रसार, मत्स्य युग (डेवोनियन), विशाल कोयला दलदली वन (कार्बोनिफेरस); कैलेडोनियन एवं हर्सिनियन पर्वत निर्माण।
मध्यजीवी (Mesozoic) ट्रायसिक, जुरासिक, क्रिटेशियस (25 से 6.6 करोड़ वर्ष पूर्व) डायनासोर एवं सरीसृपों का स्वर्णकाल; पैंजिया का विखंडन; भारत में दक्कन ट्रैप लावा का उद्गार; उल्कापिंड के आघात से डायनासोरों का विलोपन।
नूतनजीवी (Cenozoic) तृतीयक (टर्शियरी) एवं चतुर्थक (क्वार्टरनरी) (6.6 करोड़ वर्ष पूर्व से वर्तमान) स्तनधारी जीवों एवं पुष्पीय पौधों का विकास; अल्पाइन पर्वत निर्माण (हिमालय, आल्प्स, एंडीज, रॉकी का उत्थान); हिमयुग एवं मानव सभ्यता का उद्भव।
चार प्रमुख पर्वत निर्माणकारी युग (Orogenies):
1. पूर्व-कैम्ब्रियन पर्वत निर्माण: प्राचीनतम घिसे हुए शील्ड क्षेत्र (भारत की अरावली पर्वतमाला, कनाडाई शील्ड)।
2. कैलेडोनियन पर्वत निर्माण: स्कॉटलैंड की उच्चभूमि एवं स्कैंडिनेवियाई पर्वतमाला।
3. हर्सिनियन पर्वत निर्माण: यूराल पर्वतमाला, तियानशान, वोसगेस एवं ब्लैक फॉरेस्ट पर्वत।
4. अल्पाइन पर्वत निर्माण: विश्व के नवीन मोड़दार पर्वत—हिमालय, आल्प्स, एंडीज, रॉकी।

3. पृथ्वी की आंतरिक संरचना की जानकारी के प्रमुख स्रोत

प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष भू-भौतिकीय प्रमाण

पृथ्वी की औसत त्रिज्या लगभग 6,371 किलोमीटर है। अत्यधिक उच्च तापमान और दाब के कारण मानव के लिए पृथ्वी के केंद्र तक पहुंचना असंभव है। इसलिए वैज्ञानिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष स्रोतों पर निर्भर हैं:

क. प्रत्यक्ष स्रोत (Direct Sources)
  • गहरी खदानें एवं वेधन परियोजनाएं: दक्षिण अफ्रीका की सबसे गहरी सोने की खदानें (एमपोनेंग एवं टाउटोना) लगभग 3.9 से 4.0 किमी गहरी हैं। रूस के कोला प्रायद्वीप में वैज्ञानिकों द्वारा खोदा गया कोला सुपरडीप बोरहोल (Kola Superdeep Borehole) अब तक का सबसे गहरा कृत्रिम छिद्र है, जिसकी गहराई 12,262 मीटर (12.26 किमी) है। यह पृथ्वी की कुल त्रिज्या का मात्र 0.2% है।
  • ज्वालामुखी उद्गार: लगभग 100 से 200 किमी की गहराई से निकलने वाला मैग्मा, लावा और मेंटल से आने वाली दुर्लभ चट्टानें (जैसे पेरिडोटाइट एवं किंबरलाइट) मेंटल के खनिज संघटन का सीधा प्रमाण देती हैं।
ख. अप्रत्यक्ष स्रोत (Indirect Sources)
  • भू-तापीय प्रवणता (Geothermal Gradient): ऊपरी धरातल में गहराई में जाने पर तापमान में औसतन प्रति 32 मीटर पर 1°C की वृद्धि होती है (लगभग 30°C प्रति किमी)।
  • दाब एवं घनत्व में भिन्नता: ऊपर की चट्टानों के अत्यधिक भार के कारण केंद्र में दाब 36 लाख वायुमंडलीय दाब तक पहुंच जाता है। भूपर्पटी की चट्टानों का घनत्व 2.7 से 3.0 ग्राम/घन सेमी है, जबकि पूरी पृथ्वी का औसत घनत्व 5.517 ग्राम/घन सेमी है। यह सिद्ध करता है कि केंद्र में 10 से 13 ग्राम/घन सेमी घनत्व वाला भारी धातु पिंड मौजूद है।
  • उल्कापिंडों का अध्ययन: अंतरिक्ष से गिरने वाले उल्कापिंड उसी आद्य सौर नेबुला से बने हैं जिससे पृथ्वी बनी थी। धात्विक उल्कापिंडों का लोहा-निकल संघटन पृथ्वी के क्रोड के धात्विक स्वरूप की पुष्टि करता है।
  • गुरुत्व विसंगति एवं भू-चुंबकत्व: गुरुत्वाकर्षण मान भूगर्भ के पदार्थों के द्रव्यमान वितरण को दर्शाता है। पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र आंतरिक भाग में सक्रिय तरल संवहन धारा का प्रमाण है।

4. भूकंप विज्ञान (Seismology): भूगर्भ का एक्स-रे

भूकंपीय तरंगों का संचरण एवं छाया क्षेत्र

भूकंपीय तरंगों का अध्ययन पृथ्वी के आंतरिक भागों की संरचना जानने का सबसे सटीक, वैज्ञानिक और निर्विवाद साधन है:

भूकंपीय तरंगों के प्रकार
  • भूगर्भिक तरंगें (Body Waves): उद्गम केंद्र से निकलकर पृथ्वी के आंतरिक भाग में सभी दिशाओं में गमन करती हैं।
    • प्राथमिक तरंगें (P-तरंगें / Primary Waves): ये अनुदैर्घ्य (ध्वनि तरंगों के समान) तरंगें हैं, जिनमें कण तरंग की गति की दिशा के समानांतर कंपन करते हैं। ये सर्वाधिक तीव्र ($V_p pprox 6 ext{ से }13.6 ext{ किमी/से}$) होती हैं। ये ठोस, द्रव एवं गैस तीनों माध्यमों में गमन कर सकती हैं।
    • द्वितीयक तरंगें (S-तरंगें / Secondary Waves): ये अनुप्रस्थ (प्रकाश तरंगों के समान) तरंगें हैं, जिनमें कण तरंग की गति के लंबवत कंपन करते हैं। इनकी गति कुछ धीमी ($V_s pprox 3.5 ext{ से }7.2 ext{ किमी/से}$) होती है। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि S-तरंगें केवल ठोस माध्यम में ही चल सकती हैं; द्रव अथवा गैसीय माध्यम में ये पूर्णतः लुप्त हो जाती हैं।
  • धरातलीय तरंगें (Surface Waves): केवल भू-सतह पर चलती हैं और सबसे अधिक विनाश करती हैं।
छाया क्षेत्र (Shadow Zones) एवं तरल बाह्य क्रोड की खोज
तरंग का प्रकार छाया क्षेत्र का विस्तार (उपकेंद्र से कोणीय दूरी) वैज्ञानिक कारण एवं भू-गर्भिक महत्व
P-तरंग छाया क्षेत्र उपकेंद्र से 105° से 142° (या 145°) तक। 2900 किमी की गहराई पर जब P-तरंगें ठोस मैंटल से तरल बाह्य क्रोड में प्रवेश करती हैं, तो उनकी गति 13.6 किमी/से से घटकर 8.1 किमी/से रह जाती है। इस वेग ह्रास के कारण तीव्र अपवर्तन होता है और 105° से 142° के बीच सीधी P-तरंगें नहीं पहुंच पातीं। 142° के बाद अपवर्तित तरंगें पुनः दर्ज होती हैं।
S-तरंग छाया क्षेत्र उपकेंद्र से 105° से 180° तक का संपूर्ण क्षेत्र। चूँकि S-तरंगें द्रव माध्यम में प्रवेश नहीं कर सकतीं, इसलिए 2900 किमी पर गुटेनबर्ग सीमा पर पहुंचते ही वे पूरी तरह रुक जाती हैं। 105° से 180° के विशाल छाया क्षेत्र की उपस्थिति इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि पृथ्वी का बाह्य क्रोड तरल अवस्था में है।

5. पृथ्वी की संकेंद्री परतें: भूपर्पटी, मैंटल एवं क्रोड

रासायनिक संघटन एवं घनत्व के आधार पर मुख्य परतें

भूवैज्ञानिकों ने रासायनिक विशेषताओं और घनत्व के आधार पर पृथ्वी को तीन प्रमुख संकेंद्री परतों में विभाजित किया है:

1. भूपर्पटी (Crust / स्थलमंडल) [0 से 30-50 किमी]
  • यह पृथ्वी के कुल आयतन का 1% से भी कम और कुल द्रव्यमान का मात्र 0.5% भाग है।
  • महाद्वीपीय भूपर्पटी (सियाल / SIAL): सिलिका ($SiO_2$) एवं एल्युमिनियम ($Al_2O_3$) की अधिकता के कारण इसे 'सियाल' कहा जाता है। यह मुख्यतः हल्के ग्रेनाइट शैल से बनी है। औसत घनत्व 2.7 ग्राम/घन सेमी है। इसकी औसत मोटाई 30 से 50 किमी तथा हिमालय जैसे ऊंचे पर्वतों के नीचे लगभग 70 से 75 किमी तक है।
  • महासागरीय भूपर्पटी (सिमा / SIMA): सिलिका ($SiO_2$) एवं मैग्नीशियम ($MgO$) की अधिकता के कारण इसे 'सिमा' कहा जाता है। यह भारी बेसाल्ट चट्टानों से निर्मित है। इसका औसत घनत्व 3.0 ग्राम/घन सेमी है। यह काफी पतली है और समुद्र नितल पर इसकी मोटाई मात्र 5 से 10 किमी है।
2. मैंटल (Mantle / मध्यमण्डल) [50 से 2,900 किमी]
  • यह पृथ्वी के कुल आयतन का लगभग 83–84% तथा कुल द्रव्यमान का लगभग 67–68% भाग घेरता है।
  • यह मुख्यतः लोहे और मैग्नीशियम से भरपूर पेरिडोटाइट जैसी अत्यधिक भारी सिलिकेट चट्टानों से बना है। घनत्व 3.3 से 5.7 ग्राम/घन सेमी तक बढ़ता है।
  • दुर्बलतामण्डल (Asthenosphere): ऊपरी मैंटल में 80 से 200 किमी (अधिकतम 400 किमी) की गहराई में स्थित एक अर्ध-पिघला हुआ, अत्यधिक लचीला और प्लास्टिक क्षेत्र। आंशिक रूप से पिघले होने के कारण यहाँ भूकंपीय तरंगों की गति थोड़ी धीमी हो जाती है, इसलिए इसे 'निम्न वेग क्षेत्र' (Low Velocity Zone) भी कहते हैं। इसी परत पर कठोर स्थलमंडलीय प्लेटें तैरती हैं। यह ज्वालामुखीय मैग्मा का मुख्य स्रोत है।
  • पारंपरिक रूप से इसे ऊपरी मैंटल क्रोफेसिमा (Crofesima) तथा निचले मैंटल निफेसिमा (Nifesima) में बांटा जाता है।
3. क्रोड (Core / गुरुमण्डल / NIFE) [2,900 से 6,371 किमी]
  • यह पृथ्वी के कुल आयतन का लगभग 16% तथा द्रव्यमान का लगभग 32–33% है। यह अत्यधिक सघन निकल और लोहे के मिश्रण (NIFE) से बना है।
  • बाह्य क्रोड (Outer Core) [2,900 से 5,150 किमी]: यह पूरी तरह से पिघली हुई अथवा तरल अवस्था में है। घनत्व 9.9 से 12.2 ग्राम/घन सेमी है। तापमान 4,000°C से 5,000°C रहता है। तरल लोहे के चक्रीय संवहन से भू-डायनेमो (Geodynamo) प्रक्रिया द्वारा पृथ्वी का शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है।
  • आंतरिक क्रोड (Inner Core) [5,150 से 6,371 किमी]: यह ठोस धात्विक क्रिस्टलीय अवस्था में है। यद्यपि यहाँ तापमान सूर्य की सतह के बराबर (लगभग 5,000°C से 6,000°C) है, फिर भी ऊपर की सभी परतों के अत्यधिक दाब (लगभग 36 लाख वायुमंडलीय दाब) के कारण गलनांक बढ़ जाता है और यह अत्यधिक ठोस अवस्था में बंधा रहता है। घनत्व 13.0 से 13.6 ग्राम/घन सेमी तक होता है।

6. पृथ्वी के आंतरिक भाग की असंबंधताएं (Seismic Discontinuities)

घनत्व एवं वेग में आकस्मिक परिवर्तन की सीमा रेखाएं

भूगर्भ में जिस तल पर चट्टानों के घनत्व अथवा भूकंपीय तरंगों के वेग में अचानक तीव्र परिवर्तन होता है, उसे असंबंधता (Discontinuity) कहते हैं:

असंबंधता का नाम विभाजित की जाने वाली परतें गहराई खोजकर्ता एवं प्रमुख लक्षण
1. कॉनराड असंबंधता (Conrad Discontinuity) ऊपरी महाद्वीपीय भूपर्पटी (सियाल) तथा निचली महासागरीय भूपर्पटी (सिमा) के बीच। 15 से 20 किमी विक्टर कॉनराड (1925)। P-तरंगों का वेग 6.0 से बढ़कर 6.5 किमी/सेकंड हो जाता है।
2. मोहोरोविसिक / मोहो असंबंधता (Moho Discontinuity) संपूर्ण भूपर्पटी और ऊपरी मैंटल के मध्य। 30 से 50 किमी (पर्वतों में 70 किमी, सागरों में 5 किमी) एंड्रिजा मोहोरोविसिक (1909)। P-तरंगों का वेग 6.8 से अचानक बढ़कर 8.1 किमी/सेकंड हो जाता है।
3. रेपेटी असंबंधता (Repetti Discontinuity) ऊपरी मैंटल (क्रॉफेसिमा) तथा निचले मैंटल (निफेसिमा) के मध्य। 700 से 1,000 किमी विलियम रेपेटी द्वारा खोजी गई घनत्व संक्रमण सीमा।
4. गुटेनबर्ग असंबंधता (Gutenberg Discontinuity / CMB) ठोस निचले मैंटल और तरल बाह्य क्रोड के मध्य। 2,900 किमी बेनो गुटेनबर्ग (1914)। यहाँ S-तरंगें पूरी तरह समाप्त हो जाती हैं और P-तरंगों का वेग 13.6 से घटकर 8.1 किमी/सेकंड रह जाता है।
5. लेहमैन असंबंधता (Lehmann Discontinuity) तरल बाह्य क्रोड और ठोस आंतरिक क्रोड के मध्य। 5,150 किमी डेनिश भूकंपविद् इंगे लेहमैन (1936)। द्रव से ठोस माध्यम में प्रवेश के कारण P-तरंगों का वेग पुनः बढ़कर 11.2 किमी/सेकंड हो जाता है।
याद रखने का सरल सूत्र:
ऊपर से नीचे पांचों असंबंधताओं का क्रम: कॉनराड → मोहो → रेपेटी → गुटेनबर्ग → लेहमैन (संक्षेप में: क - मो - रे - गु - ले)।

महत्वपूर्ण भौगोलिक अवधारणाएँ, नियम एवं निर्देशांक

भू-तापीय प्रवणता सूत्र
T_गहराई = T_सतह + (गहराई मीटर / 32) °C
प्राथमिक P-तरंग का वेग सूत्र
$$V_p = sqrt((K + (4/3)μ) / ρ)$$
द्वितीयक S-तरंग का वेग सूत्र
$$V_s = sqrt(μ / ρ)$$

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
1. लाप्लास की निहारिका परिकल्पना का संक्षिप्त मूल्यांकन कीजिए तथा इसकी मुख्य वैज्ञानिक कमियां बताइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: फ्रांसीसी गणितज्ञ पियरे-साइमन लाप्लास ने 1796 में अपनी पुस्तक 'Exposition du Système du Monde' में निहारिका परिकल्पना प्रस्तुत की। उन्होंने माना कि अंतरिक्ष में पहले से ही एक विशाल, तप्त और घूमती हुई गैसीय निहारिका मौजूद थी। अंतरिक्ष में शीतलन के कारण निहारिका सिकुड़ने लगी और कोणीय संवेग के संरक्षण नियम के अनुसार इसकी घूर्णन गति बहुत तेज हो गई। परिणामस्वरूप केंद्र अपसारी बल (Centrifugal force) गुरुत्वाकर्षण से अधिक हो गया और इसके भूमध्यरेखीय भाग से एक के बाद एक छल्ले अलग होते गए, जो ठंडे होकर ग्रहों में बदल गए और शेष केंद्रीय भाग सूर्य बन गया।

वैज्ञानिक कमियां:

  1. कोणीय संवेग का वितरण: सौरमंडल के कुल द्रव्यमान का 99.8% सूर्य में है, किंतु कुल कोणीय संवेग का केवल 1.5% सूर्य के पास है और 98.5% ग्रहों के पास है। लाप्लास का सिद्धांत इस भारी विषमता की व्याख्या करने में असमर्थ है।
  2. छल्ले का घनीभवन: गैसों के गतिज सिद्धांत के अनुसार अलग हुए गैसीय छल्ले अंतरिक्ष में बिखर जाते, वे स्वयं घनीभूत होकर एक ठोस पिंड नहीं बना सकते थे।
उदाहरण 2
2. जींस एवं जेफ्रीज की ज्वारीय परिकल्पना की व्याख्या कीजिए। यह सिद्धांत विभिन्न ग्रहों के आकारों के वितरण को कैसे स्पष्ट करता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: सर जेम्स जींस (1919) और हेरोल्ड जेफ्रीज (1929) द्वारा प्रतिपादित ज्वारीय परिकल्पना एक द्वैतारक सिद्धांत है। उन्होंने माना कि घूमते हुए आदि-सूर्य के पास से एक विशाल आगंतुक तारा गुजरा। उस तारे के प्रबल ज्वारीय खिंचाव से सूर्य की सतह से एक विशाल गैसीय फिलामेंट बाहर खिंच आया। ग्रहों के आकारों की व्याख्या: जब आगंतुक तारा सूर्य के सबसे निकटतम बिंदु पर था तब गुरुत्वीय ज्वार सर्वाधिक था; अतः निकला हुआ फिलामेंट सिगार या तर्कु आकार (Spindle-shaped) का था, जो बीच में सबसे मोटा तथा दोनों छोरों पर पतला था। तारे के दूर जाने पर यह फिलामेंट सूर्य से अलग होकर कई टुकड़ों में टूटकर घनीभूत हो गया। यही कारण है कि फिलामेंट के मोटे मध्य भाग से बनने वाले ग्रह (बृहस्पति और शनि) अत्यधिक विशालकाय हैं, जबकि दोनों पतले किनारों से बने ग्रह (बुध, मंगल तथा यूरेनस, नेपच्यून) आकार में छोटे हैं।
उदाहरण 3
3. भूकंप की P तथा S तरंगों के संचरण की तुलना कीजिए। इनके छाया क्षेत्र पृथ्वी के बाह्य क्रोड के तरल होने को कैसे सिद्ध करते हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: प्राथमिक तरंगें (P-तरंगें) अनुदैर्घ्य तरंगें हैं जो ठोस, द्रव और गैस तीनों माध्यमों में 6 से 13.6 किमी/से की गति से चल सकती हैं। द्वितीयक तरंगें (S-तरंगें) अनुप्रस्थ तरंगें हैं जो केवल ठोस माध्यम में 3.5 से 7.2 किमी/से की गति से चलती हैं; द्रवों में अपरूपण दृढ़ता (Shear Modulus) शून्य होने के कारण S-तरंगें द्रवों में पूरी तरह समाप्त हो जाती हैं।

तरल बाह्य क्रोड का प्रमाण:

  1. S-तरंग छाया क्षेत्र: भूकंप अधिकेंद्र से 105° से 180° तक पृथ्वी के पूरे विपरीत गोलार्ध में कोई भी प्रत्यक्ष S-तरंग दर्ज नहीं होती। 2900 किमी की गहराई पर मेंटल के नीचे S-तरंगों का यह अचानक लुप्त होना अकाट्य रूप से सिद्ध करता है कि बाह्य क्रोड पिघली हुई तरल अवस्था में है।
  2. P-तरंग छाया क्षेत्र: 2900 किमी पर तरल क्रोड में प्रवेश करते ही P-तरंगों का वेग 13.6 से घटकर 8.1 किमी/से रह जाता है, जिससे तीव्र अपवर्तन होता है और 105° से 142° के बीच कोई सीधी P-तरंग नहीं पहुंच पाती।
उदाहरण 4
4. महाद्वीपीय भूपर्पटी (सियाल) और महासागरीय भूपर्पटी (सिमा) की तुलना कीजिए। इन दोनों को अलग करने वाली असंबंधता का नाम लिखिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: भूपर्पटी की दो प्रमुख परतों की तुलना निम्नवत है:

  1. महाद्वीपीय भूपर्पटी (सियाल / SIAL):
    • संघटन: सिलिका ($SiO_2$) एवं एल्युमिनियम ($Al_2O_3$) की प्रधानता, मुख्यतः हल्के ग्रेनाइट शैल से निर्मित।
    • घनत्व: अपेक्षाकृत कम, औसत घनत्व लगभग 2.7 ग्राम/घन सेमी।
    • मोटाई: काफी मोटी, मैदानों में 30-50 किमी तथा हिमालय जैसे वलित पर्वतों के नीचे 70-75 किमी तक।
  2. महासागरीय भूपर्पटी (सिमा / SIMA):
    • संघटन: सिलिका ($SiO_2$) एवं मैग्नीशियम ($MgO$) की प्रधानता, मुख्यतः भारी बेसाल्ट शैल से निर्मित।
    • घनत्व: अधिक भारी, औसत घनत्व लगभग 3.0 ग्राम/घन सेमी।
    • मोटाई: अपेक्षाकृत पतली, महासागरों की तली पर मात्र 5 से 10 किमी। असंबंधता: ऊपरी सियाल परत तथा निचली सिमा परत के बीच 15 से 20 किमी की गहराई पर 'कॉनराड असंबंधता' (Conrad Discontinuity) पाई जाती है।
उदाहरण 5
5. दुर्बलतामण्डल (Asthenosphere) क्या है? प्लेट विवर्तनिकी और ज्वालामुखी क्रिया में इसकी भूमिका स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: दुर्बलतामण्डल (एस्थेनोस्फीयर) ऊपरी मैंटल में भूपर्पटी के नीचे लगभग 80 से 200 किमी (अधिकतम 400 किमी) की गहराई में स्थित एक आंशिक रूप से पिघला हुआ, लचीला और प्लास्टिक क्षेत्र है। यहाँ आंशिक पिघलन (1-5%) के कारण भूकंपीय तरंगों का वेग थोड़ा कम हो जाता है, इसलिए इसे 'निम्न वेग क्षेत्र' (LVZ) भी कहते हैं।

भू-गतिकीय भूमिका:

  1. प्लेट विवर्तनिकी: कठोर स्थलमंडलीय प्लेटें (भूपर्पटी + ठोस ऊपरी मैंटल) इसी अर्ध-तरल दुर्बलतामण्डल पर तैरती हैं। मैंटल में रेडियोधर्मी तत्वों के विघटन से उत्पन्न संवहन धाराएं दुर्बलतामण्डल में चक्राकार चलती हैं, जो ऊपर स्थित प्लेटों को खिसकाकर महाद्वीपीय विस्थापन और पर्वत निर्माण का कारण बनती हैं।
  2. ज्वालामुखी मैग्मा का स्रोत: यह धरातलीय ज्वालामुखियों से निकलने वाले बेसाल्टिक मैग्मा का मुख्य भंडार है।
उदाहरण 6
6. धरातल से पृथ्वी के केंद्र तक पाई जाने वाली पांचों प्रमुख असंबंधताओं के नाम, गहराई और विशेषताएं क्रमानुसार लिखिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: धरातल से केंद्र की ओर पांचों भूकंपीय असंबंधताएं निम्नलिखित हैं:

  1. कॉनराड असंबंधता (Conrad): गहराई 15-20 किमी; ऊपरी सियाल तथा निचली सिमा को अलग करती है। (खोजकर्ता: विक्टर कॉनराड, 1925)।
  2. मोहोरोविसिक / मोहो असंबंधता (Moho): औसत गहराई 30-50 किमी (पर्वतों में 70 किमी); संपूर्ण भूपर्पटी और मैंटल की सीमा। यहाँ P-तरंगों का वेग 6.8 से बढ़कर 8.1 किमी/सेकंड हो जाता है। (खोजकर्ता: ए. मोहोरोविसिक, 1909)।
  3. रेपेटी असंबंधता (Repetti): गहराई लगभग 700-1,000 किमी; ऊपरी मैंटल (क्रॉफेसिमा) तथा निचले मैंटल (निफेसिमा) के मध्य स्थित है। (खोजकर्ता: विलियम रेपेटी)।
  4. गुटेनबर्ग असंबंधता (Gutenberg / CMB): गहराई 2,900 किमी; ठोस निचले मैंटल तथा तरल बाह्य क्रोड की सीमा। यहाँ S-तरंगें पूरी तरह लुप्त हो जाती हैं। (खोजकर्ता: बेनो गुटेनबर्ग, 1914)।
  5. लेहमैन असंबंधता (Lehmann): गहराई लगभग 5,150 किमी; तरल बाह्य क्रोड तथा ठोस आंतरिक क्रोड की सीमा। (खोजकर्ता: इंगे लेहमैन, 1936)।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि पृथ्वी का पूरा मैंटल पिघला हुआ तरल मैग्मा है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गुटेनबर्ग असंबंधता और मोहो असंबंधता में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि अत्यधिक तापमान के कारण आंतरिक क्रोड भी तरल होना चाहिए।

सही वैज्ञानिक तथ्य

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

पृथ्वी की उत्पत्ति एवं आंतरिक संरचना भू-गर्भिक संकेंद्री परतें, असंबंधताएं एवं भूकंपीय तरंग छाया क्षेत्र 1. भूपर्पटी (Crust) [0-50 किमी] सियाल (SIAL) महाद्वीपीय • सिमा (SIMA) महासागरीय ★ कॉनराड असंबंधता (Conrad Discontinuity) • मोहो असंबंधता (Mohorovicic - Moho) ★ 2. मैंटल / मध्यमण्डल [50-2900 किमी] दुर्बलतामण्डल (Asthenosphere) • निचला मैंटल ★ रेपेटी असंबंधता (Repetti Discontinuity) ★ ▲ गुटेनबर्ग असंबंधता (Gutenberg Discontinuity - CMB) (2,900 km) ▲ 3. बाह्य क्रोड (Outer Core) [2900-5150 किमी] तरल निफे (NIFE) • भू-चुंबकीय क्षेत्र (Geodynamo) ★ लेहमैन असंबंधता (Lehmann Discontinuity) (5,150 km) ★ 4. आंतरिक क्रोड (Inner Core) [5150-6371 किमी] ठोस निफे (NIFE) • 36 लाख वायुमंडलीय दाब • 6000°C पृथ्वी की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांत • कांट की वायव्य राशि परिकल्पना (1755) • लाप्लास की निहारिका परिकल्पना (1796) • जींस एवं जेफ्रीज की ज्वारीय परिकल्पना (1919) • आधुनिक बिग बैंग सिद्धांत (लेमैत्रे एवं हबल) भूकंपीय तरंगें एवं छाया क्षेत्र • P-तरंगें: अनुदैर्घ्य, ठोस, द्रव एवं गैस तीनों में गतिशील • S-तरंगें: अनुप्रस्थ, केवल ठोस में गतिशील (द्रव में लुप्त) • P-तरंग छाया क्षेत्र: 105° से 142° तक • S-तरंग छाया क्षेत्र: 105° से 180° तक (बाह्य क्रोड द्रव सिद्ध) WBCHSE Class 11 Physical Geography • Seismological & Planetary Physics Knowledge Architecture

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. पृथ्वी की उत्पत्ति के सिद्धांतों को एकतारक (कांट, लाप्लास), द्वैतारक (जींस-जेफ्रीज) तथा आधुनिक ब्रह्मांडीय मॉडल (बिग बैंग) में बांटा जाता है।
मुख्य बिंदु 2
  1. कांट की वायव्य राशि परिकल्पना (1755) स्थिर कणों की टक्कर से घूर्णन उत्पन्न होने का दावा करने के कारण कोणीय संवेग नियम का उल्लंघन करती थी।
मुख्य बिंदु 3
  1. लाप्लास की निहारिका परिकल्पना (1796) शीतल होती घूमती निहारिका से क्रमशः छल्लों के अलग होने से ग्रहों की उत्पत्ति बताती है।
मुख्य बिंदु 4
  1. जींस-जेफ्रीज की ज्वारीय परिकल्पना (1919) आगंतुक तारे के गुरुत्व से निकले सिगार रूपी फिलामेंट से विशाल व छोटे ग्रहों के वितरण को समझाती है।
मुख्य बिंदु 5
  1. पृथ्वी के 460 करोड़ वर्ष पुराने इतिहास को 4 महाकल्पों (पूर्व-कैम्ब्रियन, पुराजीवी, मध्यजीवी, नूतनजीवी) तथा 4 पर्वत निर्माणकारी युगों में समझा जाता है।
मुख्य बिंदु 6
  1. कोला बोरहोल (12.26 किमी) प्रत्यक्ष नमूने देता है, किंतु प्रति 32 मीटर पर 1°C ताप वृद्धि तथा भूकंपीय तरंगें ही भूगर्भ का सबसे बड़ा स्रोत हैं।
मुख्य बिंदु 7
  1. P-तरंगें तीनों माध्यमों में चलती हैं, किंतु S-तरंगें द्रव में रुक जाती हैं, जिससे 2900 किमी गहराई पर तरल बाह्य क्रोड की उपस्थिति सिद्ध होती है।
मुख्य बिंदु 8
  1. भूकंप अधिकेंद्र से P-तरंग छाया क्षेत्र 105° से 142° (अपवर्तन) तथा S-तरंग छाया क्षेत्र 105° से 180° तक फैला है।
मुख्य बिंदु 9
  1. पृथ्वी तीन संकेंद्री परतों में बंटी है: भूपर्पटी (सियाल व सिमा), मैंटल (दुर्बलतामण्डल सहित), तथा क्रोड (तरल बाह्य व ठोस आंतरिक निफे)।
मुख्य बिंदु 10
  1. धरातल से केंद्र तक 5 प्रमुख असंबंधताएं हैं: कॉनराड, मोहो, रेपेटी, गुटेनबर्ग (2900 किमी) तथा लेहमैन (5150 किमी)।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
कांट की वायव्य राशि परिकल्पना की मुख्य वैज्ञानिक त्रुटि क्या थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: कांट ने दावा किया कि स्थिर कणों के आपसी आकर्षण और टकराव से घूर्णन गति पैदा हुई, जो भौतिकी के कोणीय संवेग संरक्षण नियम के अनुसार असंभव है।
2
तापमान 5000°C से 6000°C होने पर भी आंतरिक क्रोड ठोस क्यों रहता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: ऊपर की सभी परतों के लगभग 36 लाख वायुमंडलीय अत्यधिक लिथोस्टैटिक दाब के कारण लोहे-निकल का गलनांक बहुत बढ़ जाता है, जिससे वह ठोस क्रिस्टल रूप में रहता है।
3
भूपर्पटी में भू-तापीय प्रवणता (Geothermal Gradient) की औसत दर क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: ऊपरी धरातल में गहराई में जाने पर तापमान प्रति 32 मीटर पर औसतन लगभग 1°C की दर से बढ़ता है (लगभग 30°C प्रति किलोमीटर)।
4
भूकंप अधिकेंद्र से कितने डिग्री कोण के बीच P-तरंग छाया क्षेत्र बनता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: P-तरंग छाया क्षेत्र अधिकेंद्र से 105° से 142° (या 145°) के बीच बनता है क्योंकि तरल क्रोड में प्रवेश करते समय तरंगों का तीव्र अपवर्तन होता है।
5
क्रोड के प्रमुख घटक 'निफे' (NIFE) का क्या अर्थ है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: NIFE का अर्थ निकल (Ni) और फेरम यानी लोहा (Fe) है, जो पृथ्वी के अत्यधिक सघन धात्विक क्रोड का निर्माण करते हैं।
6
भू-वैज्ञानिक इतिहास के चार प्रमुख पर्वत निर्माणकारी युगों के नाम लिखिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: चार युग हैं: (1) पूर्व-कैम्ब्रियन पर्वत निर्माण, (2) कैलेडोनियन पर्वत निर्माण, (3) हर्सिनियन पर्वत निर्माण, तथा (4) अल्पाइन पर्वत निर्माण।
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कक्षा 11 Geography के सभी अध्याय

अध्याय 1: एक विषय के रूप में भूगोल अध्याय 2: पृथ्वी की उत्पत्ति एवं आंतरिक संरचना अध्याय 3: भू-आकृतिक प्रक्रियाएं अध्याय 4: मौसम एवं जलवायु अध्याय 5: समस्थिति की संकल्पना अध्याय 6: जलमंडल अध्याय 7: मानव भूगोल का क्षेत्र एवं विषय-वस्तु अध्याय 8: आर्थिक भूगोल अध्याय 9: Secondary Activities - Industry अध्याय 10: तृतीयक क्रियाकलाप अध्याय 11: चतुर्थक क्रियाकलाप अध्याय 12: पंचमक क्रियाकलाप अध्याय 13: एक देश के रूप में भारत अध्याय 14: भारत की संरचना एवं भू-आकृति अध्याय 15: भारत का अपवाह तंत्र अध्याय 16: भारत की जलवायु अध्याय 17: भारत के वन एवं प्राकृतिक वनस्पति अध्याय 18: भारत की प्राकृतिक आपदाएं एवं संकट

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