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WBB • कक्षा XI • Geography • अध्याय 16
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

भारत की जलवायु

भारत की जलवायु को व्यापक रूप से उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु (Tropical Monsoon Climate) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। उत्तर में हिमालय पर्वतमाला की अभेद्य प्राचीर तथा दक्षिण में हिंद महासागर की उपस्थिति के कारण भारतीय उपमहाद्वीप एक अद्वितीय जलवायु प्रदेश का निर्माण करता है। मानसूनी पवनों के मौसमी उत्क्रमण (Seasonal Reversal) के कारण देश में अत्यंत तीव्र तापमान व वर्षा की विषमताएं पाई जाती हैं। एक ओर राजस्थान के थार मरुस्थल (फलोदी ও बाड़मेर) में ग्रीष्मकालीन तापमान 50 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता है, वहीं दूसरी ओर लद्दाख के द्रास क्षेत्र में शीतकालीन तापमान शून्य से नीचे -45 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। इसी प्रकार मेघालय के मौसिनराम व चेरापूंजी में वार्षिक वर्षा 1,187 सेंटीमीटर से अधिक होकर विश्व रिकॉर्ड बनाती है, जबकि पश्चिमी राजस्थान के जैसलमेर में वार्षिक वर्षा 10 सेंटीमीटर से भी कम रहती है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने वर्ष को चार प्रमुख ऋतुओं में विभाजित किया है: शीत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, दक्षिण-पश्चिम मानसूनी वर्षा ऋतु तथा शरद ऋतु या मानसून का निवर्तन काल। आधुनिक मौसम विज्ञान के अनुसार मानसून की उत्पत्ति केवल जल व स्थल के तापीय अंतर पर निर्भर नहीं करती, बल्कि अंतःउष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) के विस्थापन, तिब्बत के पठार के तापीय इंजन, उपोष्ण पश्चिमी जेट स्ट्रीम तथा उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम और एल नीनो व हिंद महासागरीय द्विध्रुव (IOD) जैसी वैश्विक परिघटनाओं से संचालित होती है। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में कालवैशाखी, तराई-डुआर्स की मूसलाधार वर्षा और बंगाल की खाड़ी के उष्णकटिबंधीय चक्रवात जलवायु के मुख्य अंग हैं।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

भारत की जलवायु का अध्ययन देश की कृषि अर्थव्यवस्था, जल सुरक्षा और प्राकृतिक आपदा प्रबंधन के लिए आधारशिला है। भारतीय कृषि को ऐतिहासिक रूप से 'मानसून का जुआ' कहा जाता है, क्योंकि देश की आधी से अधिक आबादी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है और खरीफ की फसलें पूर्णतः दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा पर टिकी हैं। शीतकाल में पश्चिमी विक्षोभों से होने वाली वर्षा उत्तर भारत में रबी गेहूं की फसल के लिए जीवनदायिनी सिद्ध होती है। मानसून की परिवर्तनशीलता, अल नीनो के प्रभाव और बाढ़-सूखा प्रबंधन के लिए जलवायु तंत्र को समझना अनिवार्य है। वर्तमान में वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण मानसूनी अनिश्चितताएं बढ़ रही हैं, हिमालय में बादल फटने (Cloudbursts) की घटनाएं तेज हुई हैं और बंगाल की खाड़ी में सुपर साइक्लोन की तीव्रता बढ़ी है। अतः इस अध्याय का ज्ञान पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रीय सतत विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 भारतीय जलवायु के नियंत्रक कारक एवं...
2 भारतीय मानसून की क्रियाविधि एवं प्र...
3 भारत की चार प्रमुख ऋतुएं (IMD वर्गी...
4 भारत में वर्षा का स्थानिक वितरण एवं...
5 कोपेन का भारतीय जलवायु वर्गीकरण
6 पश्चिम बंगाल की जलवायु, स्थानीय विष...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

भारतीय जलवायु के नियंत्रक कारक एवं प्रमुख विशेषताएं

1. भारतीय जलवायु को नियंत्रित करने वाले प्रमुख भौगोलिक कारक

भारत की जलवायु को नियंत्रित करने वाले कारक ग्रहीय, क्षेत्रीय एवं स्थानीय स्तर पर कार्य करते हैं:

  • अक्षांशीय विस्तार: कर्क रेखा (23°30' उ.) देश के मध्य से आठ राज्यों से होकर गुजरती है। इसका दक्षिणी भाग उष्णकटिबंध में स्थित है जहां वर्षभर उच्च तापमान और कम वार्षिक तापांतर पाया जाता है। उत्तरी भाग उपोष्ण एवं शीतोष्ण कटिबंध में होने के कारण महाद्वीपीय चरम जलवायु (कड़ाके की ठंड एवं भीषण गर्मी) का अनुभव करता है।
  • हिमालय पर्वत की जलवायुविक भूमिका:
    • हिमालय मध्य एशिया और साइबेरिया से आने वाली जमा देने वाली ठंडी ध्रुवीय पवनों को रोककर भारत को अत्यधिक शीत लहर से बचाता है।
    • यह दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनों को रोककर संपूर्ण उत्तरी भारत और पूर्वोत्तर में भारी पर्वतीय वर्षा कराने के लिए बाध्य करता है।
  • उच्चावच एवं धरातलीय बनावट: पश्चिमी घाट का तीव्र पश्चिमी ढाल मानसूनी पवनों के सम्मुख होने के कारण 250-400 सेमी भारी वर्षा प्राप्त करता है, जबकि पूर्वी ढाल पवन-विमुख होने के कारण वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain-shadow region) बन जाता है। अरावली पर्वतमाला मानसूनी पवनों के समानांतर होने के कारण वर्षा कराने में असमर्थ रहती है, जिससे राजस्थान शुष्क रह जाता है।
  • समुद्र से दूरी (समकारिता प्रभाव): प्रायद्वीपीय तटीय क्षेत्रों में समुद्र के प्रभाव से समकारी जलवायु पाई जाती है (जैसे मुंबई, कोलकाता, चेन्नई)। इसके विपरीत समुद्र से दूर आंतरिक भागों में चरम महाद्वीपीय जलवायु मिलती है (जैसे दिल्ली, अमृतसर)।
  • ऊंचाई (तापमान ह्रास दर): क्षोभमंडल में प्रति 1,000 मीटर की ऊंचाई पर तापमान 6.5° से. की दर से घटता है। इसी कारण एक ही अक्षांश पर होने के बावजूद सिलीगुड़ी की तुलना में दार्जिलिंग (2,042 मी) अत्यंत ठंडा रहता है।
2. उच्च वायुमंडलीय परिसंचरण एवं महासागरीय टेलीकनेक्शन (Teleconnections)
वायुमंडलीय / महासागरीय प्रक्रिया स्वरूप एवं स्थिति भारतीय जलवायु पर प्रभाव
उपोष्ण पश्चिमी जेट स्ट्रीम (Subtropical Westerly Jet) ऊपरी क्षोभमंडल में 9-12 किमी की ऊंचाई पर पश्चिम से पूर्व बहने वाली संकीर्ण तीव्र पवन। शीतकाल में हिमालय द्वारा दो शाखाओं में विभाजित होती है; दक्षिणी शाखा पश्चिमी विक्षोभों को भारत लाती है। जून में इसका अचानक उत्तर की ओर खिसकना मानसून का प्रस्फोट करता है।
उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम (Tropical Easterly Jet) ग्रीष्मकाल में तिब्बत के अत्यधिक तापन के कारण प्रायद्वीपीय भारत (14° उ. अक्षांश) के ऊपर विकसित होती है। यह ऊपरी स्तर पर वायु का अपसरण कराकर धरातलीय निम्न दाब को गहरा करती है और दक्षिण-पश्चिम मानसून को तीव्र गति से खींचती है।
अल नीनो (El Niño) प्रशांत महासागर के पूर्वी व मध्य भाग (पेरू तट) में सतही जल का असामान्य रूप से गर्म होना। वाकर परिसंचरण को कमजोर कर भारतीय मानसून को शिथिल करता है, जिससे भारत में प्रायः भीषण सूखा पड़ता है।
ला नीना (La Niña) प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय जल का असामान्य शीतलन। भारतीय मानसून को अत्यंत सुदृढ़ करता है और देश में अत्यधिक वर्षा व बाढ़ लाता है।
हिंद महासागरीय द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole - IOD) पश्चिमी हिंद महासागर (अरब सागर) और पूर्वी हिंद महासागर के समुद्री तापमान का अंतर। सकारात्मक IOD: अरब सागर का जल गर्म रहता है, जो मानसून को मजबूत कर अल नीनो के प्रतिकूल प्रभाव को समाप्त कर सकता है।

भारतीय मानसून की क्रियाविधि एवं प्रमुख सिद्धांत

1. मानसून की अवधारणा एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

मानसून शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के शब्द 'मौसिम' से हुई है, जिसका तात्पर्य ऋतु के अनुसार पवनों की दिशा में पूर्ण 180 डिग्री के उत्क्रमण से है। इसके उद्भव की व्याख्या हेतु प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं:

2. परंपरागत तापीय सिद्धांत (हैली का सिद्धांत - 1686)

सर एडमंड हैली के अनुसार मानसून वृहत पैमाने पर चलने वाला स्थल और जल समीर है:

  • ग्रीष्मकालीन तंत्र: जल की अपेक्षा स्थलखंड तेजी से गर्म होता है। मई-जून में उत्तर-पश्चिम भारत (थार मरुस्थल व पंजाब) में गहरा तापीय निम्न दाब (995 मिलीबार) बन जाता है, जबकि हिंद महासागर पर उच्च दाब रहता है। फलतः आर्द्र पवनें समुद्र से स्थल की ओर दक्षिण-पश्चिम मानसून के रूप में चलती हैं।
  • शीतकालीन तंत्र: स्थलखंड तेजी से ठंडा होकर उच्च दाब का केंद्र बन जाता है, जबकि समुद्र अपेक्षाकृत गर्म रहता है। फलतः शुष्क पवनें स्थल से समुद्र की ओर उत्तर-पूर्वी मानसून के रूप में बहती हैं।
  • कमियां: यह सिद्धांत मानसून के अचानक प्रस्फोट, मानसून विराम और ऊपरी वायुमंडल के जेट स्ट्रीम को स्पष्ट नहीं कर पाता।
3. गतिक सिद्धांत (फ्लोन का वायुराशि सिद्धांत - 1951)

हर्मन फ्लोन के अनुसार मानसून कोई स्थानीय पवन नहीं है, बल्कि सूर्य की उत्तरायण व दक्षिणायन स्थिति के साथ ग्रहीय दाब पेटियों और पवन पेटियों के मौसमी खिसकाव का परिणाम है:

  • ITCZ का विस्थापन: ग्रीष्मकाल में सूर्य के कर्क रेखा पर लंबवत चमकने पर अंतःउष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) उत्तर की ओर खिसककर 20°-25° उत्तरी अक्षांश पर गंगा मैदान के ऊपर स्थित हो जाता है। इसे मानसून द्रोणी (Monsoon Trough) कहते हैं।
  • दक्षिणी गोलार्ध की दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें भूमध्य रेखा को पार कर कोरिओलिस बल के कारण दाहिनी ओर मुड़ जाती हैं (फेरेल के नियम अनुसार) और दक्षिण-पश्चिम मानसून के रूप में भारत में प्रवेश करती हैं।
4. जेट स्ट्रीम एवं तिब्बत का पठार सिद्धांत (आधुनिक दृष्टिकोण)

पी. कोटेश्वरम तथा आधुनिक मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार तिब्बत का पठार और ऊपरी क्षोभमंडलीय जेट स्ट्रीम भारतीय मानसून के मुख्य संचालक हैं:

  1. तिब्बत का ऊष्मीय इंजन (Tibetan Heat Engine): समुद्र तल से औसतन 4,500 मीटर ऊंचा और 25 लाख वर्ग किमी में फैला तिब्बत का पठार ग्रीष्मकाल में अत्यधिक सौर विकिरण पाकर गर्म हो जाता है। यह एक विशाल हीटर की भांति कार्य करता है। यहां से गर्म वायु ऊपर उठकर ऊपरी क्षोभमंडल में एक विशाल प्रतिचक्रवात (Tibetan High) बनाती है।
  2. उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम का उद्भव: तिब्बत के ऊपर से अपसरित होने वाली वायु दक्षिण की ओर बहती है और प्रायद्वीपीय भारत (14° उ. अक्षांश) के ऊपर पूर्वी जेट स्ट्रीम के रूप में हिंद महासागर के मेडागास्कर स्थित मस्कारेन उच्च दाब पर अवतलित होती है। यह वायु को सतह से भारत की ओर खींचने वाले वैक्यूम पंप की भांति कार्य करती है।
  3. पश्चिमी जेट स्ट्रीम का उत्तर की ओर खिसकना: शीतकाल में हिमालय के दक्षिण में बहने वाली पश्चिमी जेट स्ट्रीम मई के अंत में अचानक हिमालय के उत्तर में विस्थापित हो जाती है। इसके हटते ही उत्तर भारत में सतह पर दाब एकाएक गिर जाता है और केरल तट पर भीषण गर्जना के साथ 'मानसून का प्रस्फोट' (Burst of Monsoon) होता है।

भारत की चार प्रमुख ऋतुएं (IMD वर्गीकरण)

1. शीत ऋतु (दिसंबर से फरवरी)
  • मौसमी दशाएं: स्वच्छ आकाश, सुहावना मौसम, कम आर्द्रता, मंद उत्तरी-पूर्वी पवनें और दैनिक तापांतर में वृद्धि। उत्तर भारत में जनवरी का औसत तापमान 10°-15° से. रहता है, जबकि दक्षिण में यह 25° से. से अधिक बना रहता है।
  • पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances): भूमध्य सागर, कैस्पियन सागर और फारस की खाड़ी से उत्पन्न होने वाले शीतोष्ण चक्रवात, जिन्हें उपोष्ण पश्चिमी जेट स्ट्रीम भारत लाती है:
    • पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हल्की से मध्यम वर्षा (15-50 मिमी) कराते हैं।
    • पश्चिमी हिमालय (जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड) में भारी हिमपात कराते हैं, जिससे नदियां ग्रीष्मकाल में भी सदानीरा बनी रहती हैं।
    • कृषिगत महत्व: यह वर्षा उत्तर भारत में रबी फसलों (गेहूं, चना, सरसों) के लिए अमृत तुल्य होती है।
    • विक्षोभ के गुजरने के बाद कड़ाके की शीत लहर (Cold Wave) और घना कोहरा पड़ता है।
2. ग्रीष्म ऋतु (मानसून-पूर्व काल: मार्च से मई)
  • तापमान में वृद्धि: मार्च में दक्कन (38° से.), अप्रैल में मध्य प्रदेश (42° से.) और मई में उत्तर-पश्चिम भारत (45°-48° से.) में भीषण गर्मी पड़ती है।
  • लू (Loo): मई और जून के महीनों में दोपहर के समय उत्तर एवं उत्तर-पश्चिम भारत के मैदानों में चलने वाली अत्यंत गर्म, शुष्क व धूल भरी पश्चिमी पवनों को 'लू' कहते हैं। इनका तापमान 45°-50° से. तक पहुंच जाता है, जिससे लू लगना (Heatstroke) आम बात है।
  • स्थानीय संवहनीय तूफान:
    • कालवैशाखी (Nor'westers): अप्रैल-मई में पश्चिम बंगाल, ओडिशा व बिहार में दोपहर बाद उत्तर-पश्चिम दिशा से आने वाले भीषण तड़ित-झंझावात व ओलावृष्टि। छोटानागपुर के निम्न दाब के कारण उत्पन्न होते हैं। यद्यपि ये विनाशकारी होते हैं, परंतु आउस व बोरो धान, पटसन (जूट) और चाय की फसलों के लिए अत्यधिक लाभदायक होते हैं (असम में इन्हें बारदोईछिला कहते हैं)।
    • आम्र वर्षा (Mango Showers): केरल व कर्नाटक में मानसून पूर्व की वर्षा जो आमों को जल्दी पकाने में सहायता करती है।
    • फूलों की बौछार (Cherry Blossom): कर्नाटक में कॉफी के फूलों को खिलाने वाली वर्षा।
3. वर्षा ऋतु या दक्षिण-पश्चिम मानसून काल (जून से सितंबर)

भारत की कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 75-80% भाग इसी ऋतु में प्राप्त होता है। 1 जून को केरल में प्रवेश के बाद यह दो शाखाओं में बंट जाता है:

  1. अरब सागर शाखा: यह अधिक शक्तिशाली शाखा है (बंगाल की खाड़ी की तुलना में 3 गुना अधिक आर्द्रता):
    • प्रथम उपशाखा: पश्चिमी घाट से टकराकर पश्चिमी ढाल पर 250-400 सेमी पर्वतीय वर्षा कराती है (महाबलेश्वर में >600 सेमी)। पूर्वी ढाल पर नीचे उतरते ही वृष्टि-छाया क्षेत्र बन जाता है (पुणे में मात्र 70 सेमी)।
    • द्वितीय उपशाखा: नर्मदा और ताप्ती की भ्रंश घाटियों से होकर मध्य भारत व छोटानागपुर तक वर्षा कराती है।
    • तृतीय उपशाखा: अरावली के समानांतर बहने के कारण बिना किसी अवरोध के राजस्थान को सूखा छोड़कर सीधे पंजाब पहुंचती है।
  2. बंगाल की खाड़ी शाखा:
    • म्यांमार की अराकान योमा पहाड़ियों से टकराकर मुड़ती है और गंगा मैदान व असम में प्रवेश करती है।
    • मेघालय के खासी पहाड़ियों के कीप के आकार (Funnel-shaped) के कारण मेघालय में तीव्र पर्वतीय उत्थान होता है और मौसिनराम (1,187 सेमी) तथा चेरापूंजी में विश्व की सर्वाधिक वर्षा होती है।
    • गंगा मैदान में पूर्व से पश्चिम की ओर जाते हुए वर्षा की मात्रा घटती जाती है (कोलकाता 145 सेमी → पटना 105 सेमी → इलाहाबाद 90 सेमी → दिल्ली 65 सेमी)।
  3. मानसून विराम (Monsoon Break): वर्षा ऋतु में कई दिनों या हफ्तों तक वर्षा का एकाएक रुक जाना। जब मानसून द्रोणी हिमालय की तलहटी में खिसक जाती है, तब मैदानों में सूखा और पहाड़ों में प्रलयंकारी बाढ़ आ जाती है।
4. शरद ऋतु या लौटते मानसून का काल (अक्टूबर से नवंबर)
  • मानसून का निवर्तन: सूर्य के दक्षिणायन होने से उत्तर भारत का निम्न दाब कमजोर हो जाता है और मानसूनी पवनें पीछे हटना शुरू कर देती हैं।
  • अक्टूबर हीट (October Heat): मानसून विदाई के बाद आकाश स्वच्छ हो जाता है और धूप तेज होती है। भूमि में अत्यधिक नमी होने के कारण वातावरण में भारी उमस व गर्मी हो जाती है। इस असह्य व चिपचिपे मौसम को 'अक्टूबर हीट' कहते हैं।
  • बंगाल की खाड़ी के उष्णकटिबंधीय चक्रवात: लौटती मानसून द्रोणी के कारण बंगाल की खाड़ी में अत्यंत विनाशकारी चक्रवात बनते हैं जो ओडिशा, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के तटों पर भारी तबाही मचाते हैं।
  • कोरोमंडल तट पर वर्षा: लौटती हुई उत्तर-पूर्वी मानसूनी पवनें बंगाल की खाड़ी से नमी ग्रहण कर तमिलनाडु के कोरोमंडल तट पर शीतकालीन भारी वर्षा कराती हैं।

भारत में वर्षा का स्थानिक वितरण एवं परिवर्तनशीलता

1. वर्षा का क्षेत्रीय वितरण प्रतिरूप

भारत में औसत वार्षिक वर्षा लगभग 118 सेमी है, परंतु उच्चावच और भौगोलिक स्थिति के कारण इसका वितरण अत्यंत असमान है:

वर्षा का क्षेत्र वार्षिक वर्षा की मात्रा सम्मिलित भौगोलिक क्षेत्र कृषि एवं वनस्पति का स्वरूप
अत्यधिक वर्षा का क्षेत्र 200 सेमी से अधिक (1,200 सेमी तक) पश्चिमी घाट का पश्चिमी ढाल; पूर्वोत्तर भारत (मेघालय, असम, अरुणाचल); पश्चिम बंगाल का उत्तरी तराई-डुआर्स; अंडमान एवं निकोबार। सदाबहार वर्षा वन; चावल, चाय, रबड़, जूट व मसालों की खेती; बाढ़ प्रवण क्षेत्र।
मध्यम वर्षा का क्षेत्र 100 सेमी से 200 सेमी मध्य व निचला गंगा मैदान (बिहार, पश्चिम बंगाल); तटीय ओडिशा व आंध्र प्रदेश; पूर्वी मध्य प्रदेश; पश्चिमी घाट का पूर्वी ढाल। आर्द्र पर्णपाती वन; देश का मुख्य अन्न भंडार (चावल, गेहूं, दलहन, गन्ना)।
न्यून वर्षा का क्षेत्र 50 सेमी से 100 सेमी ऊपरी गंगा मैदान (पश्चिमी यूपी, हरियाणा, पंजाब); गुजरात; पूर्वी राजस्थान; दक्कन का आंतरिक वृष्टि-छाया क्षेत्र (महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना)। शुष्क पर्णपाती वन व झाड़ियां; मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा), कपास, मूंगफली; नहरी सिंचाई पर निर्भर।
अत्यल्प वर्षा / मरुस्थलीय क्षेत्र 50 सेमी से कम (प्रायः < 15 सेमी) पश्चिमी राजस्थान (थार मरुस्थल, जैसलमेर); दक्षिणी पंजाब व हरियाणा सीमांत; लद्दाख का शीत मरुस्थल; कच्छ क्षेत्र। कटीली झाड़ियां, कैक्टस, रेत के टीले; शुष्क कृषि व खानाबदोश पशुचारण; इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र।
2. वर्षा की परिवर्तनशीलता (Variability of Rainfall)

भारतीय वर्षा का एक मुख्य लक्षण उसकी अत्यधिक परिवर्तनशीलता है। जिस क्षेत्र में वर्षा जितनी कम होती है, वहां वर्षा की परिवर्तनशीलता का गुणांक (Coefficient of Variation) उतना ही अधिक होता है:

$$ ext{CV} = rac{\sigma}{ar{X}} imes 100$$

  • अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों (पूर्वोत्तर, केरल) में परिवर्तनशीलता 15-20% से कम होती है, अतः यहां वर्षा की निश्चितता बनी रहती है।
  • न्यून वर्षा वाले क्षेत्रों (पश्चिमी राजस्थान, आंतरिक दक्कन) में परिवर्तनशीलता 50-80% से अधिक होती है, जिससे ये क्षेत्र बारंबार सूखे की चपेट में आते हैं।

कोपेन का भारतीय जलवायु वर्गीकरण

1. व्लादिमीर कोपेन का जलवायु वर्गीकरण सिद्धांत

व्लादिमीर कोपेन (1936) ने तापमान और वर्षा के मासिक व वार्षिक मानों के आधार पर तथा प्राकृतिक वनस्पति के वितरण को आधार मानकर अंग्रेजी अक्षरों के संयोजन से जलवायु प्रदेशों का निर्धारण किया। भारत में कोपेन के अनुसार 8 प्रमुख जलवायु प्रदेश हैं:

कोपेन संकेत जलवायु का प्रकार भारत में भौगोलिक विस्तार मौसम संबंधी विशेषताएं
Amw लघु शुष्क शीत ऋतु वाली उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु गोवा के दक्षिण में पश्चिमी तटीय मैदान (कोंकण व मालाबार तट) तथा अंडमान निकोबार। वार्षिक वर्षा 250-300 सेमी से अधिक (जून-सितंबर); सबसे ठंडे महीने का तापमान 18° से. से अधिक; संक्षिप्त शुष्क शीतकाल।
As शुष्क ग्रीष्म ऋतु वाली उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु तमिलनाडु का कोरोमंडल तट एवं समीपवर्ती तटीय आंध्र प्रदेश। ग्रीष्मकाल शुष्क; कुल वर्षा का 75% भाग शरद एवं शीत ऋतु (अक्टूबर-दिसंबर) में लौटते उत्तर-पूर्वी मानसून से मिलता है।
Aw उष्णकटिबंधीय सवाना जलवायु कर्क रेखा के दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार का अधिकांश भाग। आर्द्र ग्रीष्मकाल व शुष्क शीतकाल; वार्षिक वर्षा 75-150 सेमी; सवाना घास व पर्णपाती वनों की उपस्थिति।
BShw अर्ध-शुष्क स्टेपी जलवायु पश्चिमी घाट का वृष्टि-छाया क्षेत्र (महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना), पश्चिमी हरियाणा व दक्षिण-पश्चिम राजस्थान। न्यून वर्षा (35-75 सेमी); वाष्पीकरण वर्षा से अधिक; छोटी घास व कटीली झाड़ियां।
BWhw उष्ण मरुस्थलीय जलवायु पश्चिमी राजस्थान का थार मरुस्थल (जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर) व कच्छ। अत्यल्प वर्षा (<25 सेमी); ग्रीष्म में भीषण ताप (>48° से.); उच्च दैनिक तापांतर; मरुद्भिद वनस्पति।
Cwg शुष्क शीत ऋतु वाली उपोष्ण मानसूनी जलवायु (गंगा तुल्य तापीय वक्र) उत्तरी भारत के गंगा मैदान (पंजाब, हरियाणा, यूपी, बिहार), पश्चिम बंगाल एवं असम की ब्रह्मपुत्र घाटी। ग्रीष्म ऋतु की वर्षा से पूर्व मई-जून में वर्ष का उच्चतम तापमान ('g' गंगा तापीय वक्र दर्शाता है); शुष्क शीतकाल।
Dfc लघु शीतल ग्रीष्म ऋतु वाली ठंडी आर्द्र जलवायु सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश एवं पूर्वी हिमालय। शीतकाल लंबा व हिमपात युक्त; ग्रीष्मकाल छोटा व शीतल; भारी वार्षिक वर्षा (>200 सेमी)।
E / ET ध्रुवीय या टुंड्रा तुल्य पर्वतीय जलवायु जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल व उत्तराखंड के उच्च पर्वतीय क्षेत्र (>3,500 मी)। उष्णतम महीने का औसत तापमान 0° से 10° से. के मध्य; भीषण व लंबा शीतकाल; हिमपात की प्रधानता।

पश्चिम बंगाल की जलवायु, स्थानीय विषमताएं एवं जलवायु परिवर्तन

1. पश्चिम बंगाल की जलवायु की प्रमुख विशेषताएं

पश्चिम बंगाल मुख्यतः उष्णकटिबंधीय आर्द्र मानसूनी जलवायु के अंतर्गत आता है। उत्तर में दार्जिलिंग हिमालय से दक्षिण में बंगाल की खाड़ी तक धरातलीय भिन्नता के कारण राज्य में तीन उप-जलवायु क्षेत्र पाए जाते हैं:

पश्चिम बंगाल के तीन प्रमुख जलवायु क्षेत्र:
1. उत्तरी उप-हिमालयी आर्द्र क्षेत्र (दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार, कूचबिहार): शीतल व सुहावना ग्रीष्मकाल, कड़ाके की ठंड और मूसलाधार मानसूनी वर्षा (>300-400 सेमी), जिससे डुआर्स में बाढ़ आती है।
2. पश्चिमी राढ़ एवं पठारी उप-आर्द्र क्षेत्र (पुरुलिया, बांकुरा, बीरभूम, पश्चिम बर्धमान, झाड़ग्राम): विषम जलवायु, भीषण गर्मी (>44° से.), कम वर्षा (100-125 सेमी) और बारंबार सूखे की स्थिति।
3. दक्षिणी डेल्टाई एवं तटीय समकारी क्षेत्र (कोलकाता, 24 परगना, हावड़ा, हुगली, पूर्व मेदिनीपुर): समकारी समुद्री तापमान, वर्षभर उच्च आर्द्रता, मध्यम से भारी वर्षा और चक्रवातों का जोखिम।
2. कालवैशाखी (Nor'westers) की क्रियाविधि एवं कृषिगत प्रभाव

अप्रैल-मई (चैत्र-वैशाख) में छोटानागपुर पठार के अत्यधिक गर्म होने से स्थानीय निम्न दाब बनता है। बंगाल की खाड़ी की आर्द्र वायु और उत्तर-पश्चिम की ठंडी ऊपरी वायु के मिलने से भीषण संवहन उत्पन्न होता है:

  • आकाश में 12-15 किमी ऊंचे काले कपासी-वर्षी मेघ (Cumulonimbus clouds) बनते हैं।
  • उत्तर-पश्चिम दिशा से 60-100 किमी/घंटा की तीव्र आंधी, बिजली की गड़गड़ाहट और भारी ओलावृष्टि होती है।
  • तापमान में 5° से 10° से. की तीव्र गिरावट से भीषण गर्मी से भारी राहत मिलती है।
  • कृषिगत लाभ: यह वर्षा आउस व बोरो धान की बुवाई व सिंचाई, जूट की फसल की वृद्धि तथा दार्जिलिंग व डुआर्स के चाय बागानों में नई पत्तियों (First Flush) के विकास के लिए अत्यंत मूल्यवान है।
3. सुंदरबन एवं पश्चिम बंगाल में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां

पश्चिम बंगाल जलवायु परिवर्तन के प्रति भारत के सर्वाधिक संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है:

  • बंगाल की खाड़ी में तीव्र चक्रवात: समुद्री तापमान बढ़ने से चक्रवातों की तीव्रता बढ़ी है, जैसे आईला (2009), अम्फान (2020), यास (2021) एवं रेमल (2024)। समुद्री तूफान के खारे पानी से सुंदरबन की कृषि भूमि बंजर हो रही है।
  • समुद्र तल में वृद्धि एवं द्वीप विसर्जन: सुंदरबन में समुद्र का जलस्तर वैश्विक औसत से अधिक (3.14 मिमी/वर्ष) बढ़ रहा है, जिससे घोड़ापारा और लोहाचरा जैसे कई द्वीप जलमग्न हो रहे हैं।
  • अनियमित वर्षा एवं भूस्खलन: मूसलाधार बादल फटने की घटनाओं से कोलकाता में जलभराव तथा दार्जिलिंग व कलिम्पोंग में राष्ट्रीय राजमार्ग 10 (NH-10) पर गंभीर भूस्खलन हो रहे हैं।

महत्वपूर्ण भौगोलिक अवधारणाएँ, नियम एवं निर्देशांक

सामान्य तापमान ह्रास दर सूत्र (Normal Lapse Rate)
$$\Gamma = -\frac{\Delta T}{\Delta z} \approx 6.5^\circ\text{C} / 1000\text{ m}$$
आपेक्षिक आर्द्रता का सूत्र (Relative Humidity)
$$RH = \left( \frac{e}{e_s} \right) \times 100\%$$
कोपेन का शुष्क जलवायु सीमा सूचकांक (ग्रीष्मकालीन वर्षा प्रदेश)
r = 2t + 28

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
भारतीय दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन एवं सक्रियता में उपोष्ण पश्चिमी जेट स्ट्रीम तथा उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम की भूमिका समझाइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

ऊपरी क्षोभमंडल में तीव्र गति से प्रवाहित होने वाली जेट स्ट्रीम भारतीय मानसून के आरंभ और सक्रियता को निर्णायक रूप से नियंत्रित करती हैं:

  1. उपोष्ण पश्चिमी जेट स्ट्रीम (SWJ) की भूमिका:

    • शीतकाल और प्रारंभिक ग्रीष्मकाल में यह जेट स्ट्रीम 9 से 12 किमी की ऊंचाई पर पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है।
    • तिब्बत का ऊंचा पठार इस वायुधारा के मार्ग में अवरोधक बनकर इसे दो भागों में बांट देता है: उत्तरी शाखा तिब्बत के उत्तर से और दक्षिणी शाखा हिमालय के दक्षिण से उत्तर भारत के ऊपर बहती है।
    • यह दक्षिणी शाखा उत्तर भारत के मैदानों पर ऊपरी स्तर पर वायु का अवतलन कराती है, जिससे धरातल पर उच्च दाब बना रहता है और मानसूनी पवनों का आगमन रुका रहता है।
    • मानसून प्रस्फोट का ट्रिगर: मई के अंत या जून के आरंभ में जब तिब्बत का पठार गर्म हो जाता है, तो यह दक्षिणी पश्चिमी जेट शाखा अचानक उत्तर की ओर तिब्बत के ऊपर खिसक जाती है। इसके हटते ही उत्तर भारत से वायुमंडलीय अवतलन समाप्त हो जाता है, धरातलीय दाब तुरंत गिर जाता है और केरल तट पर भीषण गर्जना के साथ 'मानसून का प्रस्फोट' (Burst of Monsoon) घटित होता है।
  2. उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम (TEJ) की भूमिका:

    • यह ग्रीष्मकालीन जेट स्ट्रीम जून माह में प्रायद्वीपीय भारत के ऊपर लगभग 14° उत्तरी अक्षांश पर स्थापित होती है।
    • इसका उद्गम तिब्बत के पठार के अत्यधिक तापन से होता है, जहां से वायु ऊपर उठकर क्षोभमंडल के ऊपरी स्तर पर एक विशाल प्रतिचक्रवात बनाती है।
    • यह अपसरित वायु प्रायद्वीपीय भारत के ऊपर से पूर्वी जेट के रूप में बहती हुई मस्कारेन उच्च दाब (मेडागास्कर के निकट) पर नीचे बैठती है।
    • यह जेट स्ट्रीम भारतीय भूभाग पर ऊपरी स्तर पर वायु को बाहर फेंकती है, जिससे धरातल से हिंद महासागर की नमी युक्त मानसूनी पवनें तीव्र गति से अंदर की ओर खिंचती हैं और मानसून सक्रिय बना रहता है।
उदाहरण 2
दक्षिण-पश्चिम मानसून की अरब सागर शाखा एवं बंगाल की खाड़ी शाखा की नमी, प्रवाह मार्ग तथा वर्षा प्रतिरूप के आधार पर तुलना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनें भारतीय प्रायद्वीप से टकराकर दो शाखाओं में बंट जाती हैं, जिनकी तुलना निम्नलिखित है:

  1. आर्द्रता एवं विस्तार:

    • अरब सागर शाखा: यह बंगाल की खाड़ी शाखा की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक विशाल एवं नमी युक्त होती है, क्योंकि यह खुले हिंद महासागर के विशाल जल विस्तार से सीधे भारत आती है।
    • बंगाल की खाड़ी शाखा: यह तुलनात्मक रूप से कम नमी लाती है, परंतु पहाड़ों से घिरी होने के कारण एक निश्चित दिशा में आगे बढ़ती है।
  2. प्रवाह मार्ग:

    • अरब सागर शाखा: पश्चिमी घाट के तीव्र ढाल से लंबवत टकराती है; इसकी दूसरी उपशाखा नर्मदा-ताप्ती भ्रंश से मध्य भारत जाती है; तीसरी उपशाखा अरावली के समानांतर राजस्थान से होकर पंजाब पहुंचती है।
    • बंगाल की खाड़ी शाखा: उत्तर की ओर बहकर म्यांमार की अराकान योमा पहाड़ियों से टकराकर मुड़ती है और गंगा मैदान तथा पूर्वोत्तर भारत में प्रवेश करती है।
  3. वर्षा प्रतिरूप:

    • अरब सागर शाखा: पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढाल पर 250-400 सेमी पर्वतीय वर्षा कराती है, किंतु पूर्वी ढाल पर नीचे उतरते ही गर्म होकर वृष्टि-छाया क्षेत्र (दक्कन का आंतरिक भाग) बनाती है। राजस्थान में अरावली के समानांतर होने से कोई वर्षा नहीं करा पाती।
    • बंगाल की खाड़ी शाखा: मेघालय के खासी पहाड़ियों के कीप आकार के कारण मौसिनराम में विश्व की सर्वाधिक वर्षा कराती है। इसके बाद यह गंगा मैदान में पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ती है, जिससे पूर्व से पश्चिम वर्षा घटती जाती है (कोलकाता 145 सेमी → पटना 105 सेमी → दिल्ली 65 सेमी)।
उदाहरण 3
पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) क्या है? इसके उद्गम, भारत में आगमन तथा उत्तर भारत की रबी फसलों पर प्रभाव की विवेचना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. परिभाषा एवं उद्गम: शीतकाल में भूमध्य सागर, कैस्पियन सागर अथवा फारस की खाड़ी में उत्पन्न होने वाले शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों को जो पश्चिम दिशा से भारत में प्रवेश करते हैं, पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) कहा जाता है।

  2. भारत में आगमन का मार्ग:

  • ऊपरी क्षोभमंडल में प्रवाहित होने वाली उपोष्ण पश्चिमी जेट स्ट्रीम की दक्षिणी शाखा इन चक्रवातों को इराक, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से होते हुए उत्तर-पश्चिम भारत में ले आती है।
  • दिसंबर से फरवरी के मध्य यह जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सक्रिय रहते हैं।
  1. मौसमी प्रभाव:
  • विक्षोभ के आने से पूर्व रात के तापमान में वृद्धि होती है और आकाश में बादल छा जाते हैं।
  • इसके पश्चात मैदानी क्षेत्रों में हल्की से मध्यम फुहारों वाली वर्षा (15-50 मिमी) और पश्चिमी हिमालय में भारी हिमपात होता है।
  • चक्रवात गुजर जाने के बाद उत्तर भारत में कड़ाके की शीत लहर और घना कोहरा छा जाता है।
  1. रबी फसलों के लिए कृषिगत महत्व:
  • यह हल्की शीतकालीन वर्षा उत्तर भारत की रबी फसलों (विशेष रूप से गेहूं, चना, जौ एवं सरसों) के लिए अमृत के समान होती है।
  • यह जल धीरे-धीरे रिसकर भूमिगत नमी बढ़ाता है, जिससे बिना नहरी सिंचाई के फसलों का उत्पादन बहुत बढ़ जाता है।
  • हिमालय में जमा हिम ग्रीष्मकाल में पिघलकर सिंधु, गंगा और यमुना नदियों में सदानीरा प्रवाह बनाए रखता है।
उदाहरण 4
पश्चिम बंगाल में कालवैशाखी (Nor'westers) की उत्पत्ति समझाइए तथा राज्य की कृषि पर इसके सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव बताइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. कालवैशाखी की उत्पत्ति:
  • ग्रीष्मकाल में अप्रैल-मई (चैत्र-वैशाख) के दौरान छोटानागपुर के पठार पर अत्यधिक गर्मी से एक गहरा स्थानीय निम्न दाब केंद्र बन जाता है।
  • बंगाल की खाड़ी से आने वाली गर्म व अत्यंत आर्द्र हवा और ऊपरी वायुमंडल से आने वाली ठंडी व शुष्क हवा के मिलने से तीव्र वायुमंडलीय अस्थिरता उत्पन्न होती है।
  • इससे तीव्र ऊर्ध्वाधर संवहन धाराएं बनती हैं और आकाश में 12 से 15 किमी ऊंचे काले कपासी-वर्षी मेघ (Cumulonimbus clouds) बन जाते हैं।
  • शाम के समय उत्तर-पश्चिम दिशा से 60 से 100 किमी/घंटे की प्रचंड आंधी, मूसलाधार वर्षा, बिजली की कड़क और ओलावृष्टि होती है। इसे कालवैशाखी या Nor'wester कहते हैं।
  1. कृषि पर सकारात्मक प्रभाव:
  • तापमान में 5° से 10° से. की भारी गिरावट लाकर असह्य गर्मी से राहत दिलाती है।
  • पश्चिम बंगाल में आउस धान बोने तथा बोरो धान की सिंचाई के लिए यह वर्षा अत्यंत लाभदायक है।
  • दक्षिण बंगाल में कच्चे पटसन (जूट) की बुवाई एवं प्रारंभिक विकास के लिए पर्याप्त नमी प्रदान करती है।
  • उत्तरी बंगाल के तराई-डुआर्स एवं दार्जिलिंग में चाय की नई कोमल पत्तियों (First Flush) के फूटने में सहायता करती है।
  1. कृषि पर नकारात्मक प्रभाव:
  • भारी ओलावृष्टि से पकी हुई फसलों, आम के बौर एवं फलों तथा सब्जी की क्यारियों को भारी क्षति पहुंचती है।
  • तीव्र आंधी से कच्चे मकान, बिजली के खंभे और पान के बरेजे नष्ट हो जाते हैं।
उदाहरण 5
कोपेन के जलवायु वर्गीकरण के अनुसार 'Amw' तथा 'As' जलवायु प्रदेशों की विशेषताएं एवं भौगोलिक विस्तार स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

व्लादिमीर कोपेन ने तापमान एवं वर्षा के आधार पर भारतीय जलवायु का सांकेतिक वर्गीकरण किया है:

  1. 'Amw' जलवायु प्रदेश (लघु शुष्क शीत ऋतु वाली उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु):

    • संकेतों का अर्थ: 'A' = उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु (शीतलतम महीने का तापमान >18° से.); 'm' = मानसूनी भारी वर्षा; 'w' = शुष्क शीतकाल।
    • भौगोलिक विस्तार: गोवा के दक्षिण में भारत का पश्चिमी तटीय मैदान (कोंकण एवं मालाबार तट) तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह।
    • प्रमुख लक्षण:
      • अत्यंत भारी वार्षिक वर्षा (250 से 400 सेमी), जो मुख्यतः जून से सितंबर के दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून की अरब सागर शाखा से प्राप्त होती है।
      • शीत ऋतु बहुत छोटी और शुष्क होती है (मासिक वर्षा 6 सेमी से कम)।
      • वर्षभर समकारी समुद्री जलवायु रहती है और वार्षिक तापांतर बहुत कम (24° से 30° से.) रहता है।
      • यहां सघन उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन तथा रबर व मसालों के बागान पाए जाते हैं।
  2. 'As' जलवायु प्रदेश (शुष्क ग्रीष्म ऋतु वाली उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु):

    • संकेतों का अर्थ: 'A' = उष्णकटिबंधीय जलवायु; 's' = शुष्क ग्रीष्म ऋतु (ग्रीष्मकाल में वर्षा न के बराबर)।
    • भौगोलिक विस्तार: तमिलनाडु का कोरोमंडल तट एवं दक्षिणी तटीय आंध्र प्रदेश।
    • प्रमुख लक्षण:
      • यह भारत के शेष भागों के विपरीत वर्षा का प्रतिरूप दर्शाता है; यहां ग्रीष्मकाल (जून-सितंबर) सूखा रहता है क्योंकि यह पश्चिमी घाट के वृष्टि-छाया क्षेत्र में आता है।
      • कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 75% भाग शरद एवं शीत ऋतु (अक्टूबर से दिसंबर) में लौटते हुए उत्तर-पूर्वी मानसून द्वारा प्राप्त होता है जो बंगाल की खाड़ी से नमी लाता है।
      • औसत वार्षिक वर्षा 100 से 150 सेमी होती है और इस दौरान भीषण चक्रवाती तूफान आते हैं।
उदाहरण 6
'मानसून विराम' (Monsoon Break) एवं 'अक्टूबर हीट' (October Heat) से क्या अभिप्राय है? इनके कारण व प्रभाव लिखिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
  1. मानसून विराम (Monsoon Break):
  • परिभाषा: वर्षा ऋतु (जुलाई-अगस्त) के दौरान जब देश के मैदानी भागों में कई दिनों या हफ्तों तक वर्षा पूरी तरह रुक जाती है, तो उसे मानसून विराम कहते हैं।
  • कारण: उत्तर भारत के मैदानों में स्थित मानसून द्रोणी (Monsoon Trough) अपनी सामान्य स्थिति से उत्तर की ओर खिसककर हिमालय की तलहटी में चली जाती है।
  • प्रभाव: मैदानी भागों में लंबे समय तक वर्षा न होने से खरीफ की फसलों (विशेषकर धान) में नमी की भारी कमी हो जाती है और फसलें सूखने लगती हैं। वहीं दूसरी ओर हिमालय के ढालों पर मूसलाधार वर्षा से गंगा, ब्रह्मपुत्र और उत्तरी बंगाल की नदियों में विनाशकारी बाढ़ आ जाती है।
  1. अक्टूबर हीट (October Heat):
  • परिभाषा: सितंबर के अंत और अक्टूबर माह में लौटते मानसून के समय उत्तर एवं पूर्वी भारत में अनुभव की जाने वाली असह्य, चिपचिपी और कष्टप्रद गर्मी को अक्टूबर हीट कहते हैं।
  • कारण: मानसून की विदाई के बाद आकाश स्वच्छ हो जाता है, जिससे तेज धूप निकलती है और दिन का तापमान 33°-36° से. तक बढ़ जाता है। परंतु पिछले महीनों की वर्षा के कारण भूमि पूरी तरह गीली रहती है और वायुमंडल में आपेक्षिक आर्द्रता 80-85% से अधिक बनी रहती है।
  • प्रभाव: पसीना वाष्पीकृत नहीं हो पाता, जिससे शरीर अत्यंत बेचैन और शिथिल हो जाता है। अक्टूबर के अंत में रात का तापमान गिरने पर ही इस उमस भरी गर्मी से राहत मिलती है और शीत ऋतु का आगमन होता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मान लेना कि पूरे भारत में ग्रीष्मकालीन दक्षिण-पश्चिम मानसून से ही वर्षा होती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

तमिलनाडु के कोरोमंडल तट पर अधिकांश वर्षा शरद एवं शीत ऋतु (अक्टूबर-दिसंबर) में लौटते हुए उत्तर-पूर्वी मानसून से होती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

'लू' और 'कालवैशाखी' को एक जैसा तूफान समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

'लू' उत्तर भारत में चलने वाली बिना वर्षा वाली अत्यंत गर्म व शुष्क हवा है, जबकि 'कालवैशाखी' पश्चिम बंगाल में आने वाला मूसलाधार वर्षा व ओलावृष्टि युक्त तड़ित-झंझावात है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

पश्चिमी विक्षोभ को बंगाल की खाड़ी का चक्रवात समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पश्चिमी विक्षोभ भूमध्यसागरीय शीतोष्ण चक्रवात हैं जो शीतकाल में उपोष्ण पश्चिमी जेट स्ट्रीम द्वारा पश्चिम से उत्तर भारत में आते हैं।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

भारत की जलवायु एवं मानसूनी प्रवाह तंत्र दक्षिण-पश्चिम व उत्तर-पूर्वी मानसून, जेट स्ट्रीम, ऋतु चक्र एवं कोपेन का जलवायु वर्गीकरण दक्षिण-पश्चिम मानसून तंत्र (ग्रीष्मकालीन वर्षा) अरब सागर शाखा (पश्चिमी घाट पर पर्वतीय वर्षा >300 सेमी) बंगाल की खाड़ी शाखा (मेघालय पठार एवं मौसिनराम >1187 सेमी) उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम एवं तिब्बत का ऊष्मीय इंजन ITCZ (अंतःउष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र) व मानसून द्रोणी भारत की चार प्रमुख ऋतुएं (IMD वर्गीकरण) शीत ऋतु (दिसंबर-फरवरी): पश्चिमी विक्षोभ व रबी फसलें ग्रीष्म ऋतु (मार्च-मई): लू (उत्तर भारत) एवं कालवैशाखी वर्षा ऋतु (जून-सितंबर): मानसून का प्रस्फोट एवं मानसून विराम शरद ऋतु (अक्टूबर-नवंबर): लौटता मानसून एवं अक्टूबर हीट कोपेन का भारतीय जलवायु वर्गीकरण (Köppen Zones) Amw: पश्चिमी तटीय लघु शुष्क ऋतु मानसूनी जलवायु Cwg: गंगा मैदान व असम की शुष्क शीत ऋतु मानसूनी जलवायु As: कोरोमंडल तट की शुष्क ग्रीष्म ऋतु मानसूनी जलवायु पश्चिम बंगाल की जलवायु की प्रमुख विशेषताएं कालवैशाखी: अप्रैल-मई में गरज-चमक के साथ विनाशकारी बौछारें उत्तरी तराई-डुआर्स में भारी वर्षा (>300 सेमी) बनाम पश्चिमी राढ़ शरद ऋतु में बंगाल की खाड़ी में उठने वाले तीव्र उष्णकटिबंधीय चक्रवात पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक कक्षा 11 भूगोल • भारतीय जलवायु एवं मानसूनी तंत्र

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
भारत की जलवायु उष्णकटिबंधीय मानसूनी है, जो मौसमी पवन उत्क्रमण, तापीय विषमताओं एवं विशिष्ट शुष्क-आर्द्र चक्र से पहचानी जाती है।
मुख्य बिंदु 2
प्रमुख नियंत्रकों में कर्क रेखा, हिमालय पर्वत (साइबेरियाई ठंड से रक्षा व मानसूनी वर्षा), उच्चावच, समुद्र से दूरी तथा जेट स्ट्रीम शामिल हैं।
मुख्य बिंदु 3
शीतकाल में उपोष्ण पश्चिमी जेट स्ट्रीम भूमध्यसागरीय पश्चिमी विक्षोभों को लाती है, जो रबी गेहूं की फसल के लिए अत्यधिक लाभकारी हैं।
मुख्य बिंदु 4
ग्रीष्मकाल में तिब्बत के पठार का तापन उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम को जन्म देता है, जो दक्षिण-पश्चिम मानसून को भारत की ओर खींचता है।
मुख्य बिंदु 5
दक्षिण-पश्चिम मानसून की दो शाखाएं हैं: अरब सागर शाखा (पश्चिमी घाट पर भारी वर्षा) तथा बंगाल की खाड़ी शाखा (गंगा मैदान व पूर्वोत्तर में वर्षा)।
मुख्य बिंदु 6
मेघालय के खासी पहाड़ियों के कीप-आकार स्वरूप के कारण मौसिनराम में विश्व की सर्वाधिक वार्षिक वर्षा (1,187 सेमी) होती है।
मुख्य बिंदु 7
ग्रीष्मकाल के स्थानीय तूफानों में उत्तर भारत की 'लू' तथा पश्चिम बंगाल की 'कालवैशाखी' प्रमुख हैं; कालवैशाखी धान व जूट के लिए वरदान है।
मुख्य बिंदु 8
कोपेन के वर्गीकरण के अनुसार भारत में Amw (पश्चिमी तट), As (कोरोमंडल तट), Aw (प्रायद्वीपीय पठार), Cwg (गंगा मैदान) व BWhw (मरुस्थल) मिलते हैं।
मुख्य बिंदु 9
मानसून समाप्ति के संक्रमण काल में स्वच्छ आकाश व नम मिट्टी के कारण उत्तर व पूर्वी भारत में दमघोंटू 'अक्टूबर हीट' पड़ती है।
मुख्य बिंदु 10
पश्चिम बंगाल में उत्तर का नम डुआर्स (>300 सेमी वर्षा), पश्चिम का सूखाग्रस्त राढ़ तथा दक्षिण का समकारी व चक्रवात प्रवण डेल्टा शामिल है।

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अध्याय 1: एक विषय के रूप में भूगोल अध्याय 2: पृथ्वी की उत्पत्ति एवं आंतरिक संरचना अध्याय 3: भू-आकृतिक प्रक्रियाएं अध्याय 4: मौसम एवं जलवायु अध्याय 5: समस्थिति की संकल्पना अध्याय 6: जलमंडल अध्याय 7: मानव भूगोल का क्षेत्र एवं विषय-वस्तु अध्याय 8: आर्थिक भूगोल अध्याय 9: Secondary Activities - Industry अध्याय 10: तृतीयक क्रियाकलाप अध्याय 11: चतुर्थक क्रियाकलाप अध्याय 12: पंचमक क्रियाकलाप अध्याय 13: एक देश के रूप में भारत अध्याय 14: भारत की संरचना एवं भू-आकृति अध्याय 15: भारत का अपवाह तंत्र अध्याय 16: भारत की जलवायु अध्याय 17: भारत के वन एवं प्राकृतिक वनस्पति अध्याय 18: भारत की प्राकृतिक आपदाएं एवं संकट

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