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WBB • कक्षा XI • Geography • अध्याय 4
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

मौसम एवं जलवायु

मौसम एवं जलवायु पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक ग्यारहवीं कक्षा के भौतिक भूगोल का एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं मूलभूत अध्याय है, जो पृथ्वी को आवेष्टित करने वाले विशाल गैसीय आवरण की ऊष्मागतिकी और भौतिक संरचना का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। वायुमंडल विभिन्न गैसों, जलवाष्प एवं निलंबित धूलिकणों का एक गतिशील यांत्रिक मिश्रण है, जो तापमान के ह्रास और विशेषताओं के आधार पर क्षोभमंडल (परिवर्तनमंडल), समतापमंडल (ओजोन परत युक्त), मध्यमंडल तथा तापमंडल/आयनमंडल जैसी संकेंद्री परतों में विभाजित है। वायुमंडलीय परिघटनाएं सूर्य से प्राप्त होने वाले लघुतरंग विकिरण से संचालित होती हैं, जिसकी तीव्रता सौर स्थिरांक द्वारा मापी जाती है। पृथ्वी का ऊष्मा बजट पार्थिव दीर्घतरंग विकिरण और ग्रहीय एल्बिडो के माध्यम से वैश्विक तापीय संतुलन बनाए रखता है। विषुवत रेखा से ध्रुवों तक तापमान के अंतर के कारण धरातल पर सात स्थायी वायुदाब पेटियां और हैडली, फेरेल व ध्रुवीय कोशिकाओं से युक्त त्रिकोशिकीय परिसंचरण विकसित होता है। यह परिसंचरण कोरिओलिस बल और ऊपरी वायुमंडल की जेट स्ट्रीम के साथ मिलकर वायुराशियों, वाताग्रों, उष्णकटिबंधीय व शीतोष्ण चक्रवातों तथा व्लादिमीर कोपेन के वैश्विक जलवायु क्षेत्रों का निर्धारण करता है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

मौसम एवं जलवायु की गहन वैज्ञानिक समझ कृषि अर्थव्यवस्था, प्राकृतिक आपदा प्रबंधन, विमानन तथा सतत पर्यावरणीय विकास के लिए अत्यंत अनिवार्य है। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में, राज्य की संपूर्ण कृषि व्यवस्था और करोड़ों कृषकों की आजीविका दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनों के आगमन, वितरण और वर्षा की अनिश्चितता पर निर्भर करती है। इसके अलावा, बंगाल की खाड़ी के गर्म जल पर उत्पन्न होने वाले प्रचंड उष्णकटिबंधीय चक्रवात (जैसे अम्फान, यास, आइला) और उनसे उत्पन्न विनाशकारी समुद्री ज्वारीय तरंगें (Storm Surges) दक्षिण 24 परगना और पूर्व मेदिनीपुर के तटीय सुंदरवन क्षेत्र में भारी तबाही मचाती हैं। वर्तमान में मानवजनित वैश्विक तापन के कारण सुंदरवन के द्वीपों का जलमग्न होना, हवा के पैटर्न में अस्थिरता तथा तीस्ता नदी के उद्गम वाले हिमालयी ग्लेशियरों का तीव्र गति से पिघलना जैसी गंभीर जलवायु आपदाओं के समाधान हेतु वायुमंडलीय प्रक्रियाओं का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. वायुमंडल का संघटन, गुणधर्म एवं ऊ...
2 2. सूर्यातप, पृथ्वी का ऊष्मा बजट एव...
3 3. वायुदाब पेटियां, ग्रहीय पवन प्रण...
4 4. वायुमंडलीय आर्द्रता, संघनन एवं व...
5 5. वायुराशियां, वाताग्र, चक्रवात एव...
6 6. व्लादिमीर कोपेन का जलवायु वर्गीक...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. वायुमंडल का संघटन, गुणधर्म एवं ऊर्ध्वाधर तापीय संरचना

वायुमंडल का रासायनिक संघटन: स्थायी गैसें, परिवर्तनशील घटक एवं एरोसोल

पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा धरातल से बंधे हुए विशाल रंगहीन, गंधहीन व स्वादहीन गैसीय आवरण को वायुमंडल (Atmosphere) कहते हैं। समुद्र तल पर शुद्ध शुष्क वायु का रासायनिक संघटन इस प्रकार है:

वायुमंडलीय घटक आयतन प्रतिशत (%) भौगोलिक एवं पर्यावरणीय महत्व
नाइट्रोजन ($N_2$) 78.08% रासायनिक रूप से निष्क्रिय गैस जो ऑक्सीजन की दहनशीलता को नियंत्रित करती है; मृदा में जीवाणुओं द्वारा स्थिर होकर पादप प्रोटीन बनाती है।
ऑक्सीजन ($O_2$) 20.95% समस्त जीवों के श्वसन हेतु प्राणवायु और दहन की पोषक; चट्टानों के रासायनिक ऑक्सीकरण अपक्षय में प्रमुख भूमिका निभाती है।
ऑर्गन ($Ar$) 0.93% प्रमुख अक्रिय नोबल गैस, जो भू-पर्पटी में पोटाशियम-40 के रेडियोधर्मी क्षय से उत्पन्न होती है।
कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) 0.041% (~420 ppm) पादपों के प्रकाश-संश्लेषण का आधार; प्रमुख ग्रीनहाउस गैस जो सौर लघुतरंगों के लिए पारदर्शी है किंतु पार्थिव दीर्घतरंगों को सोखकर ऊष्मा बनाए रखती है।
जलवाष्प ($H_2O$) 0.02% से 4% तक अत्यधिक परिवर्तनशील घटक; निचले क्षोभमंडल में सीमित; समस्त बादलों, वर्षा, कोहरे और तूफानों का मूल स्रोत तथा गुप्त ऊष्मा का भंडार।
धूलिकण एवं एरोसोल (Aerosols) परिवर्तनशील मात्रा समुद्री नमक, राख और धुएं के कण आर्द्रताग्राही नाभिक (Hygroscopic Nuclei) का कार्य करते हैं जिन पर जलवाष्प संघनित होकर बादल बनाती है; प्रकाश प्रकीर्णन से आकाश नीला दिखता है।
तापमान के आधार पर वायुमंडल का ऊर्ध्वाधर स्तरीकरण

तापमान की प्रवृत्ति और भौतिक विशेषताओं के आधार पर वायुमंडल को पांच संकेंद्री परतों में विभाजित किया जाता है:

  • 1. क्षोभमंडल (Troposphere): वायुमंडल की सबसे निचली एवं सघन परत। भूमध्य रेखा पर इसकी ऊंचाई लगभग 18 किमी तथा ध्रुवों पर लगभग 8 किमी होती है (औसत ऊंचाई 12 किमी)। संपूर्ण वायुमंडलीय द्रव्यमान का 75% और लगभग 99% जलवाष्प इसी में स्थित है। इसमें ऊंचाई के साथ तापमान घटता है, जिसे सामान्य ताप ह्रास दर (Normal Lapse Rate) कहते हैं; इसका मान प्रति 1,000 मीटर ऊंचाई पर 6.5°C (अथवा 165 मीटर पर 1°C) होता है। बादल, वर्षा, आंधी, तूफान, कोहरा आदि समस्त मौसमी घटनाएं इसी में घटित होती हैं। इसकी ऊपरी सीमा को क्षोभसीमा (Tropopause) कहते हैं (तापमान -80°C विषुवत पर)।
  • 2. समतापमंडल (Stratosphere): क्षोभसीमा से 50 किमी की ऊंचाई तक विस्तृत। इसके निचले भाग में तापमान स्थिर (-56°C) रहता है, किंतु ऊपरी भाग में बढ़कर समतापसीमा पर 0°C हो जाता है। इस परत में 15 से 35 किमी के मध्य ओजोन परत (Ozonosphere) स्थित है, जो सूर्य की घातक पराबैंगनी किरणों (UV-B, UV-C) को अवशोषित कर जीवन की रक्षा करती है। मौसमी हलचलों और बादलों से मुक्त शांत वातावरण के कारण यह परत जेट विमानों के उड़ने के लिए आदर्श है।
  • 3. मध्यमंडल (Mesosphere): समतापसीमा के ऊपर 50 से 80 किमी तक फैला है। ऊंचाई के साथ तापमान तेजी से गिरता है और मध्यसीमा (Mesopause) पर वायुमंडल का न्यूनतम तापमान -100°C दर्ज किया जाता है। अंतरिक्ष से आने वाले उल्कापिंड घर्षण के कारण इसी परत में जलकर भस्म हो जाते हैं।
  • 4. तापमंडल या आयनमंडल (Thermosphere / Ionosphere): 80 किमी से 400 किमी तक विस्तृत। तीव्र सौर एक्स-रे और पराबैंगनी किरणों के कारण गैसें आयनों में टूट जाती हैं। तापमान तेजी से बढ़कर 1,500°C से ऊपर चला जाता है। इसके आयनित संस्तर (D, E व F या एपलटन परत) धरातल से भेजी गई रेडियो तरंगों को परावर्तित करके संचार संभव बनाते हैं। यहां चुंबकीय तूफानों से उत्पन्न चमकीली ध्रुवीय ज्योति (उत्तरी ज्योति/अरोरा बोरियालिस व दक्षिणी ज्योति/अरोरा ऑस्ट्रेलिस) दिखाई देती है।
  • 5. बहिर्मंडल (Exosphere): 400 किमी से 10,000 किमी तक विस्तृत वायुमंडल की सबसे बाहरी विरल परत, जहां हाइड्रोजन व हीलियम गैसें पाई जाती हैं और अणु अंतरिक्ष में विलीन हो जाते हैं। इसके ऊपर वैन एलन विकिरण मेखला युक्त चुंबकीय मंडल स्थित है।

2. सूर्यातप, पृथ्वी का ऊष्मा बजट एवं तापमान का वितरण

सूर्यातप (Insolation) एवं सौर स्थिरांक (Solar Constant)

पृथ्वी को प्राप्त होने वाले कुल सौर ऊर्जा प्रवाह को सूर्यातप (Incoming Solar Radiation) कहते हैं, जो विद्युत-चुंबकीय लघुतरंगों के रूप में 3 लाख किमी/सेकंड के वेग से पृथ्वी तक पहुंचता है। सूर्य से पृथ्वी की औसत दूरी पर वायुमंडल की बाहरी सीमा पर प्रति मिनट प्रति वर्ग सेंटीमीटर लंबवत सतह पर प्राप्त होने वाली ऊर्जा की मात्रा को सौर स्थिरांक (Solar Constant) कहा जाता है। इसका मान लगभग 1.94 से 2.0 कैलोरी/वर्ग सेमी/मिनट (1361 वाट/वर्ग मीटर) होता है।

सूर्यातप के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक
  • 1. सूर्य की किरणों का आपतन कोण (Angle of Incidence): भूमध्य रेखा पर किरणें लंबवत (90°) पड़ती हैं, जिससे कम क्षेत्रफल पर अधिक सघन ऊष्मा मिलती है ($ ext{ऊष्मा} \propto \sin heta$); ध्रुवों की ओर किरणें तिरछी पड़ती हैं, जिससे ऊर्जा विस्तृत क्षेत्र में फैल जाती है और वायुमंडल के लंबे मार्ग से गुजरने के कारण प्रकीर्णन व अवशोषण से क्षीण हो जाती है।
  • 2. दिन की अवधि (Photoperiod): पृथ्वी के 23.5° अक्षीय झुकाव के कारण ग्रीष्म ऋतु में दिन बड़े होते हैं, जिससे धरातल अधिक समय तक सूर्यातप प्राप्त करता है।
  • 3. सूर्य एवं पृथ्वी के बीच की दूरी: 3 जनवरी को उपसौर (14.7 करोड़ किमी) में पृथ्वी अपसौर (4 जुलाई, 15.2 करोड़ किमी) की तुलना में लगभग 7% अधिक सूर्यातप प्राप्त करती है।
  • 4. वायुमंडल की पारदर्शिता: बादल, धूल और जलवाष्प सौर किरणों का परावर्तन और अवशोषण करते हैं।
पृथ्वी का ऊष्मा बजट (Earth's Heat Budget)

पृथ्वी का औसत तापमान वर्ष-दर-वर्ष स्थिर रहता है, क्योंकि आने वाली सौर ऊर्जा और जाने वाली पार्थिव ऊर्जा का संतुलन बना रहता है। यदि आने वाली कुल सौर ऊर्जा को 100 इकाइयां माना जाए:

ऊष्मा बजट का भाग इकाइयों की संख्या भौतिक प्रक्रिया एवं संतुलन
एल्बिडो (Planetary Albedo) 35 इकाइयां पृथ्वी व वायुमंडल को गर्म किए बिना सीधे अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाती हैं: 27 इकाइयां बादलों के शीर्ष से, 6 इकाइयां वायु के अणुओं द्वारा प्रकीर्णन से और 2 इकाइयां हिमाच्छादित धरातल से।
वायुमंडल द्वारा प्रत्यक्ष अवशोषण 14 इकाइयां जलवाष्प, ओजोन, कार्बन डाइऑक्साइड तथा धूलिकणों द्वारा सीधे अवशोषित।
धरातल द्वारा अवशोषण 51 इकाइयां स्थल व जल द्वारा अवशोषित: 17 इकाइयां प्रत्यक्ष सौर किरणों से + 34 इकाइयां आकाश के विसरित प्रकाश से। कुल अवशोषित इकाइयां = 14 + 51 = 65 इकाइयां।
पार्थिव दीर्घतरंग विकिरण (अंतरिक्ष में वापसी) 65 इकाइयां वापस 17 इकाइयां धरातल से सीधे वायुमंडलीय खिड़की द्वारा अंतरिक्ष में चली जाती हैं; 48 इकाइयां वायुमंडल को मिलती हैं (9 संवहन/विक्षोभ द्वारा, 19 संघनन की गुप्त ऊष्मा द्वारा, 20 प्रत्यक्ष विकिरण द्वारा)। वायुमंडल अपनी 14 और धरातल की 48 मिलकर कुल 62 इकाइयां अंतरिक्ष में विकिरित करता है। कुल बहिर्गमन = 17 + 48 = 65 इकाइयां।
मौसम विज्ञान परिघटना: तापमान का व्युत्क्रमण (Inversion of Temperature)
सामान्य नियम के विपरीत जब ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान घटने के स्थान पर बढ़ने लगता है, तो इसे तापमान का व्युत्क्रमण कहते हैं। इसकी आदर्श दशाएं हैं: (1) लंबी शीतकालीन रातें, (2) स्वच्छ मेघहीन आकाश, (3) शांत पवन, (4) शुष्क वायु एवं हिमाच्छादित धरातल। पर्वतीय घाटियों में रात के समय तीव्र विकिरण से पहाड़ों की ढालों की हवा ठंडी व भारी होकर गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से घाटी के तल में उतरती है, जिसे काटाबैटिक पवन (Katabatic Wind) कहते हैं। इससे घाटी के तल में अत्यधिक ठंड और पाला पड़ता है, जबकि मध्यवर्ती ढाल गर्म रहते हैं। इसी कारण दार्जिलिंग और हिमाचल की घाटियों में बस्तियां व चाय-सेब के बागान घाटी के निचले तल पर न बसाकर मध्य ढालों पर बसाए जाते हैं।

3. वायुदाब पेटियां, ग्रहीय पवन प्रणालियां एवं उच्च-स्तरीय जेट स्ट्रीम

वायुदाब एवं पवनों को संचालित करने वाले बल

धरातल के प्रति इकाई क्षेत्रफल पर पड़ने वाले संपूर्ण वायुमंडलीय भार को वायुदाब (Atmospheric Pressure) कहते हैं। समुद्र तल पर मानक वायुदाब 1013.25 मिलीबार या हेक्टोपास्कल (760 मिमी पारद स्तंभ) होता है। पवनों की दिशा व गति चार प्रमुख बलों से निर्धारित होती है:

  • 1. दाब प्रवणता बल (Pressure Gradient Force): दो स्थानों के बीच वायुदाब के अंतर के कारण समदाब रेखाओं के समकोण पर उच्च दाब से निम्न दाब की ओर उत्पन्न बल।
  • 2. कोरिओलिस बल (Coriolis Force) एवं फेरेल का नियम: पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न विक्षेपक बल ($F_c = 2\Omega v \sin\phi$)। फेरेल के नियमानुसार, पवने उत्तरी गोलार्ध में अपनी दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में अपनी बाईं ओर मुड़ जाती हैं। विषुवत रेखा पर यह बल शून्य तथा ध्रुवों पर अधिकतम होता है।
  • 3. घर्षण बल: धरातलीय अवरोधों से वायु की गति मंद पड़ जाती है।
  • 4. भू-विक्षेपी पवन (Geostrophic Wind): ऊपरी घर्षणहीन वायुमंडल में जब दाब प्रवणता बल और कोरिओलिस बल परस्पर संतुलित हो जाते हैं, तो पवन समदाब रेखाओं के समानांतर बहने लगती है।
विश्व की सात स्थायी वायुदाब पेटियां (Global Pressure Belts)
वायुदाब पेटी अक्षांशीय विस्तार एवं उत्पत्ति पवन गतिकी एवं प्रमुख लक्षण
भूमध्यरेखीय निम्न दाब (Doldrums / ITCZ) 5° उत्तर से 5° दक्षिण (तापजन्य पेटी) वर्ष भर लंबवत सूर्य किरणों से हवा अत्यधिक गर्म होकर ऊपर उठती है; क्षैतिज पवनें शांत रहती हैं इसलिए इसे शांत मंडल (Doldrums) कहते हैं; दोनों गोलार्धों की व्यापारिक पवनें मिलकर अंतः-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) बनाती हैं।
उपोष्ण उच्च दाब (Horse Latitudes) दोनों गोलार्धों में 25° से 35° (गतिजन्य पेटी) विषुवत रेखा से ऊपर उठी हवा ठंडी होकर कोरिओलिस बल के कारण 30°-35° अक्षांशों पर नीचे बैठती है। शांत व मेघहीन मौसम रहता है; इसे अश्व अक्षांश (Horse Latitudes) कहते हैं। विश्व के प्रमुख गर्म मरुस्थल इसी पेटी में स्थित हैं।
उपध्रुवीय निम्न दाब दोनों गोलार्धों में 60° से 65° (गतिजन्य पेटी) पृथ्वी के घूर्णन से हवा बाहर की ओर अपसरित होती है तथा गर्म पछुआ एवं ठंडी ध्रुवीय पवनों के टकराव से ध्रुवीय वाताग्र बनता है।
ध्रुवीय उच्च दाब दोनों ध्रुवों पर 80° से 90° (तापजन्य पेटी) अत्यधिक ठंड के कारण भारी, घनी हवा स्थायी रूप से नीचे बैठती है।
ग्रहीय पवनें एवं जेट स्ट्रीम (Planetary Winds & Jet Streams)
  • सन्मार्गी या व्यापारिक पवनें (Trade Winds): उपोष्ण उच्च दाब से भूमध्यरेखीय निम्न दाब की ओर निरंतर चलती हैं (उत्तरी गोलार्ध में उत्तर-पूर्व तथा दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण-पूर्व दिशा से)। प्राचीन काल में पालदार जहाजों से व्यापार में अत्यधिक सहायक होने से इन्हें ट्रेड विंड्स कहा गया।
  • पछुआ पवनें (Westerlies): उपोष्ण उच्च दाब से उपध्रुवीय निम्न दाब की ओर चलती हैं (उत्तरी गोलार्ध में दक्षिण-पश्चिम तथा दक्षिणी गोलार्ध में उत्तर-पश्चिम से)। दक्षिणी गोलार्ध के विस्तृत महासागरों में ये अत्यंत प्रचंड वेग से बहती हैं, जिन्हें नाविकों ने गरजती चालीसा (40°S), प्रचंड पचासा (50°S) एवं चीखती साठा (60°S) नाम दिया है।
  • ध्रुवीय पवनें (Polar Easterlies): ध्रुवीय उच्च दाब से उपध्रुवीय निम्न दाब की ओर चलने वाली अत्यधिक ठंडी एवं बर्फीली पवनें।
  • जेट स्ट्रीम (Jet Streams): ऊपरी क्षोभमंडल में (9 से 14 किमी की ऊंचाई पर) पश्चिम से पूर्व दिशा में संकीर्ण व तीव्र गति ($150-400 ext{ किमी/घंटा}$) से बहने वाली सर्पिलाकार वायुधाराओं को जेट स्ट्रीम कहते हैं। उपोष्ण पछुआ जेट का ग्रीष्मकाल में हिमालय के उत्तर में विस्थापित होना ही भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून के प्रस्फोट (Burst of Monsoon) का मुख्य कारण बनता है।

4. वायुमंडलीय आर्द्रता, संघनन एवं वर्षण की गतिकी

वायुमंडलीय आर्द्रता एवं उसके प्रकार

वायुमंडल में उपस्थित अदृश्य जलवाष्प को आर्द्रता कहते हैं। इसे तीन प्रकार से मापा जाता है:

  • 1. निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute Humidity): वायु के प्रति इकाई आयतन में जलवाष्प का वास्तविक भार ($ ext{ग्राम/घनमीटर}$)।
  • 2. विशिष्ट आर्द्रता (Specific Humidity): वायु के प्रति इकाई भार में जलवाष्प का भार ($ ext{ग्राम/किलोग्राम}$)। ऊंचाई बदलने पर भी यह अपरिवर्तित रहती है।
  • 3. सापेक्ष आर्द्रता (Relative Humidity / RH): किसी निश्चित तापमान पर वायु में उपस्थित वास्तविक जलवाष्प की मात्रा तथा उसी तापमान पर उस वायु को संतृप्त करने हेतु आवश्यक अधिकतम जलवाष्प की मात्रा का प्रतिशत अनुपात: $$RH = rac{ ext{वास्तविक वाष्प दाब}}{ ext{संतृप्त वाष्प दाब}} imes 100\%$$ जब सापेक्ष आर्द्रता 100% हो जाती है, तो वायु संतृप्त हो जाती है और उस तापमान को ओसांक (Dew Point) कहते हैं।
रुद्धोष्म प्रक्रिया (Adiabatic Process) एवं मेघ वर्गीकरण

जब कोई वायुराशि बिना किसी बाह्य ऊष्मा के आदान-प्रदान के केवल फैलने से ठंडी या सिकुड़ने से गर्म होती है, तो उसे रुद्धोष्म प्रक्रिया कहते हैं:

  • शुष्क रुद्धोष्म ह्रास दर (DALR): असंतृप्त वायु के ऊपर उठने पर प्रति 1,000 मीटर पर 9.8°C (लगभग 10°C) की दर से शीतलन होता है।
  • आर्द्र रुद्धोष्म ह्रास दर (SALR): संघनन आरंभ होने पर गुप्त ऊष्मा मुक्त होती है, जिससे शीतलन दर घटकर 5°C से 6°C प्रति 1,000 मीटर रह जाती है।
  • मेघों के प्रमुख प्रकार (Luke Howard, 1803):
    • उच्च मेघ (>6,000 मी): पक्षाभ (Cirrus - रेशमी पंख जैसे), पक्षाभ-स्तरी (सूर्य/चंद्रमा के चारों ओर प्रभामंडल बनाते हैं), पक्षाभ-कपासी।
    • मध्यम मेघ (2,000-6,000 मी): मध्य-स्तरी, मध्य-कपासी।
    • निम्न मेघ (0-2,000 मी): स्तरी-कपासी, स्तरी, वर्षा-स्तरी (लगातार वर्षा करने वाले घने काले मेघ)।
    • ऊर्ध्वाधर विकास वाले मेघ: कपासी एवं कपासी-वर्षी (Cumulonimbus)। कपासी-वर्षी पर्वतनुमा विशाल मेघ होते हैं जिनके शीर्ष पर निहाई (Anvil) जैसी संरचना होती है; इनसे मूसलाधार वर्षा, तड़ित-झंझा, आंधी और ओलावृष्टि होती है।
वर्षा के प्रमुख प्रकार (Types of Rainfall)
  • 1. संवहनीय वर्षा (Convectional Rainfall): तीव्र धूप से गर्म होकर आर्द्र वायु सीधे ऊपर उठती है और ठंडी होकर कपासी-वर्षी मेघ बनाकर दोपहर बाद 4 बजे के आसपास तीव्र गरज-चमक के साथ वर्षा करती है (विषुवतीय प्रदेश की 4 o'clock rain)।
  • 2. पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall): जलवाष्पयुक्त पवनें जब पर्वत से टकराकर पवनाभिमुख ढाल (Windward Slope) पर ऊपर चढ़ती हैं, तो ठंडी होकर मूसलाधार वर्षा करती हैं (जैसे पश्चिमी घाट का पश्चिमी ढाल व चेरापूंजी-मौसिनराम)। पर्वत पार कर जब पवनें पवनाविमुख ढाल (Leeward Slope) पर नीचे उतरती हैं, तो गर्म होकर शुष्क हो जाती हैं, जिससे वर्षा नहीं होती; इस क्षेत्र को वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain-Shadow Area) कहते हैं (जैसे—पुणे एवं शिलांग)।
  • 3. चक्रवातीय वर्षा (Cyclonic Rainfall): चक्रवात के निम्न दाब केंद्र में चारों ओर से आने वाली विपरीत स्वभाव की वायुराशियों के मिलने से गर्म व हल्की वायु के ऊपर उठने से होने वाली व्यापक वर्षा।

5. वायुराशियां, वाताग्र, चक्रवात एवं प्रतिचक्रवात

वायुराशियां (Air Masses) एवं वाताग्र (Fronts)

विस्तृत क्षेत्र पर फैली वायु की वह विशाल संहति जिसके किसी क्षैतिज तल पर तापमान व आर्द्रता में समानता होती है, वायुराशि कहलाती है। मुख्य प्रकार: महाद्वीपीय ध्रुवीय ($cP$), सागरीय ध्रुवीय ($mP$), महाद्वीपीय उष्णकटिबंधीय ($cT$), तथा सागरीय उष्णकटिबंधीय ($mT$)।

जब दो विपरीत भौतिक गुणों वाली वायुराशियां मिलती हैं, तो उनके बीच की ढलुआ संक्रमण सीमा को वाताग्र (Front) कहते हैं। वाताग्र चार प्रकार के होते हैं: शीत वाताग्र (ठंडी वायु आक्रामक होकर गर्म वायु को तेजी से ऊपर धकेलती है), उष्ण वाताग्र (गर्म वायु मंद ढाल पर ठंडी वायु पर धीरे-धीरे चढ़ती है), अधिविष्ट वाताग्र (जब तीव्र शीत वाताग्र उष्ण वाताग्र को पकड़कर गर्म वायु को धरातल से पूरी तरह ऊपर उठा देता है), तथा स्थिर वाताग्र।

उष्णकटिबंधीय चक्रवात बनाम शीतोष्ण चक्रवात
तुलना का आधार उष्णकटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclone) शीतोष्ण चक्रवात (Temperate Cyclone)
उत्पत्ति क्षेत्र एवं कारण उष्णकटिबंधीय महासागरों पर ($5^\circ ext{ से }20^\circ ext{ N & S}$) जहां समुद्री सतह का तापमान 27°C से अधिक हो। कोरिओलिस बल के अभाव में विषुवत रेखा ($0^\circ-5^\circ$) पर नहीं बनते। मध्य अक्षांशों ($35^\circ ext{ से }65^\circ ext{ N & S}$) में ध्रुवीय वाताग्र पर दो विपरीत वायुराशियों के मिलने से गतिक रूप से उत्पन्न होते हैं।
ऊर्जा का मुख्य स्रोत समुद्र से मिलने वाली संघनन की गुप्त ऊष्मा। स्थल पर प्रवेश (Landfall) करते ही वाष्प आपूर्ति रुकने से ये शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। तापमान के अंतर के कारण स्थितिज ऊर्जा का गतिज ऊर्जा में रूपांतरण। स्थल व जल दोनों पर जीवित रहते हैं।
आंतरिक संरचना वृत्ताकार समदाब रेखाएं; कोई वाताग्र नहीं होता; केंद्र में 10-30 किमी व्यास की शांत व मेघहीन चक्रवात की आंख (Eye) होती है, जिसके चारों ओर आंख की दीवार में 150-250 किमी/घंटा का प्रचंड तूफान होता है। 'V' आकार की समदाब रेखाएं; शीत व उष्ण वाताग्र स्पष्ट होते हैं; केंद्र में आंख नहीं होती; विशाल विस्तार ($1000-2000 ext{ किमी}$).
क्षेत्रीय नाम हिंद महासागर में चक्रवात, कैरेबियन सागर में हरीकेन, चीन सागर में टाइफून, ऑस्ट्रेलिया में विली-विली। पश्चिमी विक्षोभ (उत्तर-पश्चिम भारत में शीतकालीन वर्षा लाते हैं)।
प्रतिचक्रवात (Anticyclone)

जब किसी उच्च दाब केंद्र के चारों ओर वायुदाब बाहर की ओर घटता जाता है और केंद्र से पवनें घड़ी की सुई की दिशा में (उत्तरी गोलार्ध में) बाहर की ओर अपसरित होती हैं, तो उसे प्रतिचक्रवात कहते हैं। केंद्र में हवा ऊपर से नीचे बैठती है, जिससे कोई बादल नहीं बनते और मौसम पूर्णतः शांत, शुष्क व धूपयुक्त रहता है।

6. व्लादिमीर कोपेन का जलवायु वर्गीकरण एवं वैश्विक जलवायु परिवर्तन

व्लादिमीर कोपेन का जलवायु वर्गीकरण (1884, 1918, 1936)

रूसी-जर्मन जलवायुवेत्ता व्लादिमीर कोपेन ने वनस्पति विज्ञानी कैंडोले के वनस्पति मंडलों के आधार पर मासिक व वार्षिक औसत तापमान और वर्षा के आंकड़ों का प्रयोग करके विश्व जलवायु का परिमाणात्मक एवं अनुभवजन्य वर्गीकरण प्रस्तुत किया। उन्होंने विश्व को पांच मुख्य अंग्रेजी बड़े अक्षरों (A, B, C, D, E) के समूहों में बांटा:

जलवायु समूह निर्धारक तापमान एवं वर्षा के लक्षण प्रमुख उप-प्रकार एवं विश्व के क्षेत्र
A: उष्णकटिबंधीय आर्द्र (Megathermal) सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान $\ge 18^\circ ext{C}$। कोई शीतकाल नहीं; वर्ष भर गर्म व वर्षा युक्त। • Af (विषुवतीय वर्षावन): वर्ष भर वर्षा; शुष्कतम महीने में वर्षा $\ge 60 ext{ मिमी}$ (अमेजन, कांगो)।
• Am (उष्णकटिबंधीय मानसूनी): लघु शुष्क ऋतु और ग्रीष्म में भारी मानसूनी वर्षा (भारत, तटीय पश्चिम बंगाल)।
• Aw (सवाना जलवायु): शीत ऋतु शुष्क ($w = ext{winter dry}$) (सूडान, दक्कन का पठार)।
B: शुष्क जलवायु (Xerophytic) वर्षा की तुलना में संभावित वाष्पीकरण अधिक ($PET > P$)। मरुस्थल व अर्ध-शुष्क स्टेपी। • BWh (उष्ण मरुस्थलीय): औसत वार्षिक तापमान $\ge 18^\circ ext{C}$ (सहारा, थार)।
• BWk (शीत मरुस्थलीय): गोबी, पेटागोनिया मरुस्थल।
• BSh (अर्ध-शुष्क स्टेपी): छोटी घास वाले घास के मैदान।
C: मध्य-अक्षांशीय गर्म जलवायु (Mesothermal) सबसे ठंडे महीने का तापमान $-3^\circ ext{C}$ से $18^\circ ext{C}$ के बीच; सबसे गर्म महीना $> 10^\circ ext{C}$। चार स्पष्ट ऋतुएं। • Cs (भूमध्यसागरीय जलवायु): ग्रीष्मकाल शुष्क, शीतकाल में वर्षा ($s = ext{summer dry}$) (भूमध्यसागरीय तट, कैलिफोर्निया)।
• Cwa (आर्द्र उपोष्ण / चीन तुल्य): शुष्क शीतकाल व आर्द्र ग्रीष्मकाल (गंगा का मैदान, उत्तर बंगाल)।
• Cfb (पश्चिमी यूरोपीय तुल्य): वर्ष भर नियमित वर्षा व मंद ग्रीष्म।
D: शीत हिम-वन जलवायु (Microthermal) सबसे ठंडे महीने का तापमान $< -3^\circ ext{C}$; सबसे गर्म महीना $> 10^\circ ext{C}$। अत्यंत कठोर बर्फिली सर्दियां। केवल उत्तरी गोलार्ध में। • Df (टैगा या कोणधारी वन): साइबेरिया व कनाडा के विस्तृत शंकुधारी वन।
E: ध्रुवीय जलवायु (Hekistothermal) सबसे गर्म महीने का तापमान भी $< 10^\circ ext{C}$। वृक्षविहीन बर्फिली जलवायु। • ET (टुंड्रा जलवायु): सबसे गर्म महीना 0° से 10°C; काई, लाइकेन, पर्माफ्रॉस्ट।
• EF (सतत हिमटोपी / आइसकैप): वर्ष भर हिमांक से नीचे (ग्रीनलैंड, अंटार्कटिका)।
H: उच्च पर्वतीय जलवायु (Highland) ऊंचाई के साथ तीव्र गति से बदलते सूक्ष्म-जलवायु कटिबंध (हिमालय, आल्प्स, एंडीज)। ऊर्ध्वाधर जलवायु कटिबंध।
वैश्विक जलवायु परिवर्तन एवं पश्चिम बंगाल की संवेदनशीलता

मानव द्वारा जीवाश्म ईंधनों के दहन और वनों की कटाई से वायुमंडल में $CO_2$ की सांद्रता औद्योगिक क्रांति के 280 ppm से बढ़कर 420 ppm से अधिक हो गई है। बढ़े हुए ग्रीनहाउस प्रभाव के कारण 1880 के बाद से पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 1.1°C बढ़ चुका है।

पश्चिम बंगाल पर इसके गंभीर प्रभाव:

  • 1. सुंदरवन डेल्टा में समुद्र तल वृद्धि: बंगाल की खाड़ी का जलस्तर लगभग 3.7 मिमी/वर्ष की दर से बढ़ रहा है। सुंदरवन के घोरामारा, मौसुनी व सागर द्वीपों का तेजी से कटाव हो रहा है, जिससे मैंग्रोव वन नष्ट हो रहे हैं और कृषि भूमियों में खारा पानी भर रहा है।
  • 2. चक्रवातों की आवृत्ति व तीव्रता में वृद्धि: समुद्री तापमान 29°-30°C से अधिक रहने के कारण अत्यंत तीव्र सुपर साइक्लोन (आइला 2009, अम्फान 2020, यास 2021) उत्पन्न हो रहे हैं जो सुंदरवन के मिट्टी के तटबंधों को तोड़कर भारी तबाही मचाते हैं।
  • 3. हिमालयी ग्लेशियरों का पिघलना व अचानक बाढ़: तीस्ता नदी को जल देने वाले जेमू जैसे उत्तरी बंगाल-सिक्किम के हिमनद तेजी से पीछे हट रहे हैं, जिससे हिमानी झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) और दार्जिलिंग-जलपाईगुड़ी में बादल फटने की घटनाएं बढ़ रही हैं।

महत्वपूर्ण भौगोलिक अवधारणाएँ, नियम एवं निर्देशांक

सापेक्ष आर्द्रता सूत्र
RH = (वास्तविक वाष्प दाब / संतृप्त वाष्प दाब) * 100%
कोरिओलिस बल समीकरण
$$F_c = 2 * Ω * v * sin(φ)$$
भू-विक्षेपी पवन संतुलन
$$v_g = (1 / (2 * ρ * Ω * sin(φ))) * (ΔP / Δn)$$

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
वायुमंडल की ऊर्ध्वाधर तापीय संरचना का वर्णन कीजिए। क्षोभमंडल को परिवर्तनमंडल और समतापमंडल को शांतमंडल क्यों कहा जाता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

वायुमंडल को तापमान में परिवर्तन के आधार पर मुख्य रूप से पांच परतों में विभाजित किया जाता है:

  1. क्षोभमंडल (Troposphere): वायुमंडल की सबसे निचली परत (औसत ऊंचाई 12 किमी)। संपूर्ण वायुमंडलीय द्रव्यमान का 75% और जलवाष्प का 99% इसी में पाया जाता है। इसमें ऊंचाई के साथ प्रति 1,000 मीटर पर 6.5°C की दर से तापमान घटता है (सामान्य ह्रास दर)। समस्त बादल, वर्षा, आंधी, तूफान, कोहरा आदि मौसमी हलचलें इसी में होने के कारण इसे 'परिवर्तनमंडल' या 'क्षोभमंडल' कहते हैं। इसकी ऊपरी सीमा क्षोभसीमा कहलाती है।

  2. समतापमंडल (Stratosphere): क्षोभसीमा से 50 किमी तक विस्तृत। इसके निचले भाग में तापमान -56°C पर स्थिर रहता है, किंतु ऊपरी भाग में बढ़कर 0°C हो जाता है। इसमें धूलिकण, जलवाष्प और मौसमी विक्षोभों के अभाव के कारण मौसम शांत रहता है; इसलिए इसे 'शांतमंडल' कहते हैं। इसी कारण जेट विमान इस परत में उड़ते हैं। इस परत में 15 से 35 किमी के मध्य स्थित ओजोन परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों को सोख लेती है।

  3. मध्यमंडल (Mesosphere): 50 से 80 किमी तक फैला है। यहां तापमान गिरकर -100°C हो जाता है जो वायुमंडल का न्यूनतम तापमान है। उल्काएं यहीं जलकर नष्ट होती हैं।

उदाहरण 2
सौर स्थिरांक (Solar Constant) किसे कहते हैं? सूर्य की किरणों का आपतन कोण तापमान को किस प्रकार प्रभावित करता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

सूर्य से पृथ्वी की औसत दूरी पर वायुमंडल की बाहरी सीमा पर प्रति मिनट प्रति वर्ग सेंटीमीटर लंबवत सतह पर प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा की मात्रा को सौर स्थिरांक कहते हैं। इसका मान लगभग 1.94 से 2.0 कैलोरी/वर्ग सेमी/मिनट (1361 वाट/वर्ग मीटर) होता है।

आपतन कोण का प्रभाव:

  1. क्षेत्रफल का विस्तार: विषुवत रेखा पर किरणें लंबवत (90°) पड़ती हैं, जिससे सौर ऊर्जा कम क्षेत्रफल पर केंद्रित होकर तीव्र ऊष्मा देती है। ध्रुवों पर किरणें तिरछी पड़ती हैं, जिससे समान ऊर्जा विशाल क्षेत्रफल में फैलकर मंद पड़ जाती है।
  2. वायुमंडलीय मार्ग: तिरछी किरणों को वायुमंडल की अधिक मोटी परत से गुजरना पड़ता है, जिससे धूलिकणों व गैसों द्वारा प्रकीर्णन व अवशोषण अधिक होने से धरातल कम गर्म होता है।
उदाहरण 3
पृथ्वी के ऊष्मा बजट से क्या तात्पर्य है? आने वाली 100 इकाइयां सौर ऊर्जा किस प्रकार अंतरिक्ष में लौटकर संतुलन बनाती हैं, समझाइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

पृथ्वी द्वारा प्राप्त की गई कुल सौर ऊर्जा और धरातल व वायुमंडल द्वारा अंतरिक्ष में लौटाई गई कुल पार्थिव ऊर्जा के बीच का संतुलन पृथ्वी का ऊष्मा बजट कहलाता है, जिससे पृथ्वी का औसत तापमान स्थिर रहता है।

आने वाली 100 इकाइयों का संतुलन:

  1. एल्बिडो (35 इकाइयां व्यर्थ वापसी): धरातल को गर्म किए बिना सीधे अंतरिक्ष में लौट जाती हैं—27 बादलों के शीर्ष से, 6 वायुमंडलीय प्रकीर्णन से और 2 धरातल से।

  2. अवशोषण (65 इकाइयां): वायुमंडल सीधे 14 इकाइयां सोखता है और धरातल 51 इकाइयां सोखता है (17 प्रत्यक्ष धूप + 34 विसरित प्रकाश)।

  3. पार्थिव विकिरण द्वारा 65 इकाइयों की वापसी: • धरातल अपनी 51 इकाइयों में से 17 इकाइयां सीधे वायुमंडलीय खिड़की से अंतरिक्ष में विकिरित करता है। • शेष 34 इकाइयां वायुमंडल को सौंपता है (9 संवहन द्वारा, 19 संघनन की गुप्त ऊष्मा द्वारा और 6 प्रत्यक्ष विकिरण द्वारा)। • वायुमंडल अपनी 14 और धरातल से मिली 48 इकाइयों को मिलाकर कुल 62 इकाइयां अंतरिक्ष में विकिरित करता है। कुल वापसी = 17 (धरातल) + 48 (वायुमंडल) = 65 इकाइयां। अतः आने वाली 65 इकाइयां = जाने वाली 65 इकाइयां, जिससे पूर्ण ऊष्मा संतुलन स्थापित रहता है।

उदाहरण 4
फेरेल का नियम लिखिए। व्यापारिक पवनों एवं पछुआ पवनों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

फेरेल का नियम: पृथ्वी के घूर्णन जनित कोरिओलिस बल के प्रभाव से उत्तरी गोलार्ध में गतिमान पवनें अपनी दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में अपनी बाईं ओर मुड़ जाती हैं।

व्यापारिक एवं पछुआ पवनों में अंतर:

  1. प्रवाह क्षेत्र: व्यापारिक पवनें उपोष्ण उच्च दाब (30°-35°) से भूमध्यरेखीय निम्न दाब (0°-5°) की ओर चलती हैं; जबकि पछुआ पवनें उपोष्ण उच्च दाब से उपध्रुवीय निम्न दाब (60°-65°) की ओर चलती हैं।
  2. गति व स्वभाव: व्यापारिक पवनें अपेक्षाकृत नियमित व शांत गति से बहती हैं; जबकि पछुआ पवनें (विशेषकर दक्षिणी गोलार्ध के जलभाग में—गरजती चालीसा व प्रचंड पचासा) अत्यंत तूफानी व प्रचंड वेग से चलती हैं।
उदाहरण 5
एक आदर्श उष्णकटिबंधीय चक्रवात की संरचना समझाइए। पश्चिम बंगाल का तटीय क्षेत्र चक्रवातों से अत्यधिक क्यों प्रभावित होता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उष्णकटिबंधीय चक्रवात गर्म महासागरों (तापमान > 27°C) पर उत्पन्न तीव्र निम्न दाब का भंवर होता है। इसके प्रमुख अंग हैं:

  1. चक्रवात की आंख (Eye): चक्रवात के केंद्र में 10 से 30 किमी व्यास का शांत, वृत्ताकार क्षेत्र जहां निम्नतम वायुदाब होता है, हवा ऊपर से नीचे बैठती है तथा आकाश स्वच्छ व मेघहीन रहता है।
  2. आंख की दीवार (Eyewall): आंख को घेरे हुए कपासी-वर्षी मेघों की सघन दीवार। यह चक्रवात का सबसे हिंसक भाग है जहां 150 से 250 किमी/घंटा की हवाएं और मूसलाधार वर्षा होती है।
  3. कुंडलाकार वर्षा पट्टियां (Spiral Rainbands): आंख की दीवार से बाहर की ओर फैली सर्पिलाकार बादल पट्टियां जो दूर-दूर तक तूफानी वर्षा करती हैं।

पश्चिम बंगाल की संवेदनशीलता के कारण:

  1. कीप के आकार की बंगाल की खाड़ी: उत्तर की ओर संकरी होती खाड़ी तूफानी लहरों को रोककर 3 से 7 मीटर ऊंची विनाशकारी समुद्री ज्वारीय तरंगें (Storm Surge) उत्पन्न करती है।
  2. सुंदरवन का निचला डेल्टा: दक्षिण 24 परगना और पूर्व मेदिनीपुर के तटीय द्वीप समुद्र तल से मात्र 1-2 मीटर ऊंचे हैं, जो आसानी से जलमग्न हो जाते हैं।
  3. मिट्टी के कच्चे तटबंध: भयानक लहरों से कच्चे बांध टूट जाते हैं और खारा जल खेतों में भरकर फसल व बस्तियों को नष्ट कर देता है (उदा. अम्फान व यास)।
उदाहरण 6
व्लादिमीर कोपेन के जलवायु वर्गीकरण का आधार क्या है? उनके द्वारा निर्धारित पांच प्रमुख जलवायु समूहों के नाम लिखिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

कोपेन का जलवायु वर्गीकरण मासिक व वार्षिक औसत तापमान और वर्षा के आंकड़ों तथा वनस्पति विज्ञानी कैंडोले के वनस्पति कटिबंधों के अंतर्संबंध पर आधारित एक अनुभवजन्य प्रणाली है।

पांच प्रमुख समूह हैं:

  1. समूह A (उष्णकटिबंधीय आर्द्र / Megathermal): सबसे ठंडे महीने का तापमान 18°C या अधिक; शीतकाल रहित (Af, Am, Aw)।
  2. समूह B (शुष्क जलवायु / Xerophytic): वर्षा की तुलना में वाष्पीकरण अधिक; मरुस्थल (BW) व स्टेपी (BS)।
  3. समूह C (मध्य-अक्षांशीय गर्म जलवायु / Mesothermal): सबसे ठंडे महीने का तापमान -3°C से 18°C के बीच (भूमध्यसागरीय Cs, चीन तुल्य Cwa)।
  4. समूह D (शीत हिम-वन जलवायु / Microthermal): सबसे ठंडे महीने का तापमान -3°C से नीचे (टैगा Df)।
  5. समूह E (ध्रुवीय जलवायु / Hekistothermal): सबसे गर्म महीने का तापमान भी 10°C से कम; टुंड्रा (ET) व सतत हिमटोपी (EF)।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सामान्य ताप ह्रास दर और रुद्धोष्म ह्रास दर को एक ही समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

ग्रीनहाउस प्रभाव को पूर्णतः हानिकारक मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

चक्रवात और टॉरनेडो को एक ही मौसमी आपदा समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

मौसम, जलवायु एवं वायुमंडलीय परिसंचरण वायुमंडल की ऊर्ध्वाधर संरचना, ऊष्मा बजट, ग्रहीय पवन पेटियां एवं उष्णकटिबंधीय चक्रवात 1. वायुमंडल का ऊर्ध्वाधर स्तरीकरण (Thermal Layers) पृथ्वी का ऊष्मा बजट: 100 इकाइयां = 35 एल्बिडो + 65 अवशोषण व विकिरण Ionosphere / Thermosphere [80 - 400 km] Aurora Borealis & Australis • D, E, F Kennelly-Heaviside Radio Layers +1500°C Mesopause Mesosphere [50 - 80 km] (মেসোস্ফিয়ার) Coldest Layer (-100°C) • Meteoroids Burn Up / Ablation • Noctilucent Clouds -100°C Stratopause Stratosphere [12 - 50 km] (শান্তমণ্ডল) Ozonosphere (15-35 km): Absorbs Lethal UV-B & UV-C 0°C Supersonic Jets Tropopause (-56°C) Troposphere [0 - 12 km] (ক্ষুব্ধমণ্ডল) 75% Mass • All Weather (Clouds, Rain, Storms) • Normal Lapse Rate 6.5°C/km +15°C EARTH'S HEAT BUDGET (100 SOLAR SHORTWAVE UNITS) 35 Units Lost (Albedo) • 27 from Clouds • 6 Scattered by Air • 2 Surface Reflection 14 Units Absorbed • Ozone absorption • Water vapor & dust • Clouds direct heat 51 Units Absorbed • 17 Direct Sun • 34 Diffuse Sky Reradiated = 65 Units 2. वायुदाब पेटियां एवं ग्रहीय पवनें (Pressure Belts & Cells) हैडली सेल • फेरेल सेल • ध्रुवीय सेल • जेट स्ट्रीम 90° N: North Polar High (উত্তর মেরু উচ্চচাপ বলয়) Polar Cell Polar Easterlies (মেরু পূর্বালী বায়ু) 60°-65° N: Sub-Polar Low (উপমেরু নিম্নচাপ বলয়) Polar Front / Jet South-Westerlies (দক্ষিণ-পশ্চিম পশ্চিমা বায়ু) • Ferrel Cell 30°-35° N: Sub-Tropical High (Horse Latitudes / অশ্ব অক্ষাংশ) Hadley Cell NE Trade Winds (উত্তর-পূর্ব আয়ন বায়ু) 0°-5°: EQUATORIAL LOW (Doldrums / ITCZ নিরক্ষীয় শান্তবলয়) Thermal Low Southern Hemisphere: SE Trades • Roaring Forties (40°S) • Furious Fifties (50°S) Ferrel's Law: Winds deflect Right in North, Left in South (Coriolis Effect) TROPICAL CYCLONE ARCHITECTURE (ক্রান্তীয় ঘূর্ণবাতের গঠন) EYE Calm EYEWALL • Ocean SST > 27°C • Latent heat engine • Bay of Bengal Surges • Clockwise in S / Anti in N कोपेन: A (उष्णकटिबंधीय), B (शुष्क), C (मध्य-अक्षांशीय), D (शीत), E (ध्रुवीय) A: Tropical Humid (ক্রান্তীয়) Af (Rainforest), Am (Monsoon), Aw B: Dry Arid (শুষ্ক জলবায়ু) BWh (Desert), BSh (Steppe) C: Warm Temperate (উষ্ণ) Cs (Mediterranean), Cwa, Cfa D: Cold Snow Forest Df (Taiga / Boreal Coniferous) E: Polar Climate (মেরু) ET (Tundra), EF (Ice Cap)

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. वायुमंडल मुख्यतः नाइट्रोजन (78.08%), ऑक्सीजन (20.95%), ऑर्गन (0.93%), ग्रीनहाउस गैस कार्बन डाइऑक्साइड (0.04%) और जलवाष्प से निर्मित है।
मुख्य बिंदु 2
  1. तापीय संरचना के अनुसार वायुमंडल क्षोभमंडल, समतापमंडल (ओजोन युक्त), मध्यमंडल, आयनमंडल और बहिर्मंडल में स्तरीकृत है।
मुख्य बिंदु 3
  1. क्षोभमंडल में सामान्य ताप ह्रास दर के अनुसार प्रति 1,000 मीटर पर 6.5°C (165 मीटर पर 1°C) तापमान घटता है।
मुख्य बिंदु 4
  1. वायुमंडल के शीर्ष पर प्राप्त सौर ऊर्जा प्रवाह सौर स्थिरांक कहलाता है, जिसका मान 1.94 से 2.0 कैलोरी/वर्ग सेमी/मिनट (1361 W/m²) है।
मुख्य बिंदु 5
  1. पृथ्वी के ऊष्मा बजट में 100 आने वाली इकाइयों में से 35 एल्बिडो के रूप में लौट जाती हैं और 65 इकाइयां अवशोषित व पुनः विकिरित होकर संतुलन बनाती हैं।
मुख्य बिंदु 6
  1. पृथ्वी पर सात स्थायी वायुदाब पेटियां पाई जाती हैं जो हैडली, फेरेल व ध्रुवीय कोशिकाओं द्वारा त्रिकोशिकीय परिसंचरण संचालित करती हैं।
मुख्य बिंदु 7
  1. ग्रहीय पवनें (व्यापारिक, पछुआ, ध्रुवीय) कोरिओलिस बल के प्रभाव से फेरेल के नियम के अनुसार दोनों गोलार्धों में विक्षेपित होती हैं।
मुख्य बिंदु 8
  1. ऊपरी क्षोभमंडल की तेज गति वाली जेट स्ट्रीम वायुधाराएं भारतीय दक्षिण-पश्चिम मानसून के प्रस्फोट को प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित करती हैं।
मुख्य बिंदु 9
  1. उष्णकटिबंधीय चक्रवात गर्म सागरों (>27°C) पर संघनन की गुप्त ऊष्मा से ऊर्जा प्राप्त करते हैं और शांत आंख व हिंसक आंख की दीवार से युक्त होते हैं।
मुख्य बिंदु 10
  1. व्लादिमीर कोपेन ने तापमान, वर्षा और वनस्पति के आधार पर विश्व जलवायु को पांच प्रमुख समूहों (A, B, C, D, E) में वर्गीकृत किया।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
समतापमंडल में ऊंचाई के साथ तापमान क्यों बढ़ता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि समतापमंडल में स्थित ओजोन परत सूर्य की उच्च ऊर्जा वाली पराबैंगनी किरणों को सोखकर ऊष्मा में बदल देती है।
2
मौसम और जलवायु में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मौसम किसी निश्चित स्थान के वायुमंडल की अल्पकालिक या क्षणिक अवस्था है; जबकि जलवायु किसी बड़े क्षेत्र के कम से कम 30-35 वर्षों के मौसम की औसत दशा होती है।
3
उपोष्ण उच्च दाब पेटी को 'अश्व अक्षांश' क्यों कहते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: प्राचीन काल में पालदार जहाजों में घोड़े ले जाते समय इस शांत हवा विहीन पेटी में जहाज फंस जाने पर पीने का पानी बचाने हेतु घोड़ों को समुद्र में फेंक दिया जाता था।
4
पर्वतीय घाटियों में तापमान का व्युत्क्रमण कैसे होता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: शीत की रात में पहाड़ों की ढालों की ठंडी व भारी हवा काटाबैटिक पवन बनकर घाटी के तल में जमा हो जाती है और गर्म हवा को ऊपर उठा देती है, जिससे नीचे अत्यधिक ठंड पड़ती है।
5
स्थल पर प्रवेश करते ही उष्णकटिबंधीय चक्रवात क्यों नष्ट हो जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि स्थल पर पहुंचते ही समुद्र से मिलने वाली आर्द्रता की आपूर्ति कट जाती है, जिससे चक्रवात के मुख्य इंजन यानी संघनन की गुप्त ऊष्मा का निकलना बंद हो जाता है और धरातलीय घर्षण बढ़ जाता है।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
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अध्याय 1: एक विषय के रूप में भूगोल अध्याय 2: पृथ्वी की उत्पत्ति एवं आंतरिक संरचना अध्याय 3: भू-आकृतिक प्रक्रियाएं अध्याय 4: मौसम एवं जलवायु अध्याय 5: समस्थिति की संकल्पना अध्याय 6: जलमंडल अध्याय 7: मानव भूगोल का क्षेत्र एवं विषय-वस्तु अध्याय 8: आर्थिक भूगोल अध्याय 9: Secondary Activities - Industry अध्याय 10: तृतीयक क्रियाकलाप अध्याय 11: चतुर्थक क्रियाकलाप अध्याय 12: पंचमक क्रियाकलाप अध्याय 13: एक देश के रूप में भारत अध्याय 14: भारत की संरचना एवं भू-आकृति अध्याय 15: भारत का अपवाह तंत्र अध्याय 16: भारत की जलवायु अध्याय 17: भारत के वन एवं प्राकृतिक वनस्पति अध्याय 18: भारत की प्राकृतिक आपदाएं एवं संकट

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