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WBB • कक्षा XI • Geography • अध्याय 14
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

भारत की संरचना एवं भू-आकृति

भारत की भूगर्भीय संरचना एवं भू-आकृतिक स्वरूप लगभग तीन सौ करोड़ वर्षों के सतत एवं गतिशील विवर्तनिक विकास और भू-आकृतिक प्रक्रमों का अनुपम परिणाम है। शैल संरचना, विवर्तनिक स्थिरता और भूगर्भीय कालों के आधार पर भारत को तीन प्रमुख भूवैज्ञानिक खंडों में विभाजित किया जाता है: प्राचीन एवं अत्यधिक सुदृढ़ प्रायद्वीपीय खंड (जो प्राचीन गोंडवाना लैंड का अभिन्न अंग है और आर्कियन नीस व ग्रेनाइट से बना है), नवीन टर्शियरी वलित हिमालय पर्वतमाला (जो भारतीय प्लेट और यूरेशियाई प्लेट के अभिसरण से टेथिस सागर के अवसादों के वलन एवं उत्थान से निर्मित हुई है) तथा मध्यवर्ती विशाल सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान (जो हिमालय के उत्थान से निर्मित एक वृहद् द्रोणी या गर्त में नदियों द्वारा लाई गई गहरी जलोढ़ गाद के जमाव से बना है)। उच्चावच एवं भौतिक लक्षणों के आधार पर भारत को पांच प्रमुख भौतिक विभागों में वर्गीकृत किया जाता है: उत्तरी पर्वतीय प्रदेश (हिमाद्रि, हिमाचल और शिवालिक पर्वतमालाएं), उत्तर भारत का विशाल मैदान (भाबर, तराई, भांगर और खादर कटिबंध), प्रायद्वीपीय पठार (मध्यवर्ती उच्चभूमि, छोटानागपुर पठार, दक्कन ट्रैप लावा पठार, तथा पश्चिमी व पूर्वी घाट), तटीय मैदान (कयाल युक्त संकरा पश्चिमी तट एवं उर्वर डेल्टाओं युक्त पूर्वी तट) तथा द्वीप समूह (ज्वालामुखीय अंडमान-निकोबार एवं प्रवाल निर्मित लक्षद्वीप)। पश्चिम बंगाल में यह विविधता उत्तर में दार्जिलिंग सिंगालीला श्रेणी के सन्दकफू (3,636 मीटर) शिखर से लेकर पश्चिम के रार पठारी ढाल और दक्षिण में सुंदरबन के सक्रिय मैंग्रोव डेल्टा तक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

भारत की संरचना एवं भू-आकृति का गहन अध्ययन देश के प्राकृतिक संसाधनों के वितरण, जलवायु तंत्र, कृषि उत्पादन, मृदा प्रारूप तथा भू-गर्भीय आपदाओं के प्रबंधन को समझने का मूलाधार है। हिमालय की अभेद्य दीवार भारतीय उपमहाद्वीप को मध्य एशिया की बर्फीली हवाओं से बचाती है तथा दक्षिण-पश्चिम मानसून को रोककर संपूर्ण देश में जीवनदायी वर्षा कराती है। सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का उपजाऊ मैदान देश का प्रमुख खाद्यान्न भंडार है, जबकि प्रायद्वीपीय पठार की प्राचीन चट्टानें कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट और तांबे जैसे औद्योगिक खनिजों का प्रमुख स्रोत हैं। पश्चिम बंगाल के विद्यार्थियों के लिए इस अध्याय का क्षेत्रीय अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उत्तर बंगाल के पर्वतीय ढालों पर चाय बागानों की उपस्थिति, तीस्ता के संकरे गिरि-खड्ड, पश्चिम के पुरुलिया जिले में अवशिष्ट अयोध्या व सुशुनिया पहाड़ियों तथा दक्षिण के विश्वप्रसिद्ध सुंदरबन ज्वारीय वनों की भौतिक संरचना को वैज्ञानिक रूप से उजागर करता है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. भारत की भूगर्भीय संरचना एवं तीन...
2 2. उत्तरी पर्वतीय प्रदेश: हिमालयी च...
3 3. उत्तर भारत का विशाल मैदान: भू-आक...
4 4. प्रायद्वीपीय पठार: मध्यवर्ती उच्...
5 5. तटीय मैदान, थार मरुस्थल एवं भारत...
6 6. पश्चिम बंगाल की भू-आकृति: उत्तरी...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. भारत की भूगर्भीय संरचना एवं तीन प्रमुख भूवैज्ञानिक खंड

भारत का भूगर्भीय विकास एवं संरचनात्मक आधार

भारत का वर्तमान भौतिक स्वरूप करोड़ों वर्षों के अंतर्जात विवर्तनिक संचलनों और बहिर्जात अपरदन प्रक्रमों का सम्मिलित प्रतिफल है। चट्टानों के प्रकार, आयु और विवर्तनिक स्थिरता के आधार पर भारत को तीन प्रमुख भूवैज्ञानिक खंडों में विभाजित किया गया है:

1. प्रायद्वीपीय खंड (The Peninsular Block):

प्रायद्वीपीय भारत प्राचीन गोंडवाना लैंड का एक अत्यंत सुदृढ़ एवं अवशिष्ट भूखंड (Shield) है:

  • आर्कियन चट्टानें: यह मुख्य रूप से प्राचीन आर्कियन नीस, ग्रेनाइट और रूपांतरित धारवाड़ शिस्ट शैलों से बना है (आयु 250 से 350 करोड़ वर्ष)।
  • संरचनात्मक स्थिरता: कैम्ब्रियन कल्प से ही यह एक दृढ़ और स्थिर भूखंड बना हुआ है। यहां क्षैतिज वलन की घटनाएं नहीं हुईं, बल्कि ऊर्ध्वाधर भ्रंशन के कारण नर्मदा, ताप्ती और दामोदर जैसी भ्रंश घाटियों (Rift Valleys) का निर्माण हुआ।
  • दक्कन ट्रैप (Deccan Traps): मेसोज़ोइक कल्प के अंत (क्रिटेशियस युग) में दरारी ज्वालामुखी उद्भेदन के कारण लगभग 5 लाख वर्ग किमी क्षेत्र बेसाल्ट लावा की क्षैतिज परतों से ढक गया। इसके अपक्षय से काली कपास मृदा (रेगुर) का निर्माण हुआ।
  • प्रायद्वीप के बाह्य विस्तार: उत्तर-पूर्व में मेघालय (शिलांग) पठार व कार्बी आंगलोंग तथा पश्चिम में राजस्थान इसी प्रायद्वीपीय भूखंड के भाग हैं, जो मालदा गैप (गारो-राजमहल भ्रंश) द्वारा अलग हुए हैं।
2. हिमालय एवं अतिरिक्त प्रायद्वीपीय पर्वतमालाएं (The Extra-Peninsular Belt):

प्रायद्वीपीय खंड के सर्वथा विपरीत हिमालय एक नवीन, लचीली और अत्यधिक विवर्तनिक रूप से सक्रिय वलित पर्वतमाला है:

  • टेथिस सागर का उत्थान: टर्शियरी कल्प में लगभग 5-6 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय प्लेट के यूरेशियाई प्लेट से टकराने के फलस्वरूप मध्यवर्ती टेथिस भूसन्नति के अवसाद वलित होकर ऊपर उठे।
  • सक्रिय भूकंपीयता: तीव्र वलन, प्रतिवलन, भ्रंश तथा नैपे (Nappe) संरचनाओं की प्रधानता है। प्लेटों का दबाव आज भी जारी होने के कारण हिमालय की ऊंचाई बढ़ रही है और यह क्षेत्र अत्यधिक भूकंप-प्रवण है।
3. सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान (Indo-Gangetic Foredeep):

उत्थानशील हिमालय और दक्षिण के स्थिर प्रायद्वीपीय खंड के मध्य निर्मित एक विशाल गर्त या अवनमन (Foredeep) था। प्लाइस्टोसीन और होलोसीन युगों में हिमालय और प्रायद्वीप से निकलने वाली नदियों द्वारा लाई गई गाद से 1,000 से 2,000 मीटर गहरा यह उपजाऊ मैदान निर्मित हुआ।

2. उत्तरी पर्वतीय प्रदेश: हिमालयी चाप एवं अनुदैर्ध्य पर्वत श्रेणियां

हिमालय पर्वतमाला का विस्तार एवं स्वरूप

उत्तरी पर्वतमाला पश्चिम में नंगा पर्वत (8,126 मी) से लेकर पूर्व में नामचा बरवा (7,782 मी) तक लगभग 2,400 किमी की लंबाई में एक धनुषाकार चाप के रूप में फैली है। इसकी चौड़ाई कश्मीर में 400 किमी तथा अरुणाचल प्रदेश में लगभग 150 किमी है।

हिमालय की चार प्रमुख अनुदैर्ध्य श्रेणियां (उत्तर से दक्षिण)
पर्वत श्रेणी औसत ऊंचाई भूगर्भीय एवं भू-आकृतिक लक्षण प्रमुख शिखर एवं दर्रे
1. ट्रांस या तिब्बत हिमालय 3,000 से 6,000 मी हिमाद्रि के उत्तर में स्थित; टेथिस अवसादी जीवाश्मयुक्त चट्टानों से निर्मित; काराकोरम, लद्दाख व जास्कर श्रेणियां। के-2 / गॉडविन ऑस्टिन (8,611 मी - विश्व की दूसरी सर्वोच्च चोटी); सियाचिन हिमनद (76 किमी)।
2. वृहद् या आंतरिक हिमालय (हिमाद्रि) औसत ऊंचाई 6,100 मी सर्वोच्च, हिमाच्छादित एवं अविरल श्रेणी; केंद्रीय क्रोड प्राचीन ग्रेनाइट एवं नीस चट्टानों से निर्मित। माउंट एवरेस्ट (8,848.86 मी), कंचनजंघा (8,586 मी), नंदा देवी; ज़ोजी ला, शिपकी ला, नाथू ला दर्रे।
3. मध्य या लघु हिमालय (हिमाचल) 3,700 से 4,500 मी अत्यंत विच्छेदित एवं बीहड़ श्रेणियां; पीर पंजाल (सबसे लंबी श्रेणी), धौलाधर, नागटिब्बा, महाभारत लेख। प्रसिद्ध हिल स्टेशन: शिमला, मसूरी, नैनीताल, दार्जिलिंग; कश्मीर घाटी एवं कांगड़ा घाटी।
4. बाह्य हिमालय या उप-हिमालय (शिवालिक) 900 से 1,100 मी सबसे नवीन गिरिपाद श्रेणी; असंगठित बालू, कंकड़ और गोलाश्म के जमावों से निर्मित। सपाट तल वाली अनुदैर्ध्य संरचनात्मक घाटियां: पश्चिम में दून (देहरादून) तथा पूर्व में दुआर (जलपाईगुड़ी/असम)।
पूर्वांचल (पूर्वी पहाड़ियां)

अरुणाचल प्रदेश में दिहांग गॉर्ज के बाद हिमालय दक्षिण की ओर तीव्र अक्षीय मोड़ (Syntaxial Bend) लेकर म्यांमार सीमा के समानांतर फैला है: पटकाई बूम, नागा पहाड़ियां (सर्वोच्च शिखर सारामती, 3,826 मी), मणिपुर पहाड़ियां तथा मिजो पहाड़ियां (ब्लू माउंटेन, 2,157 मी)।

3. उत्तर भारत का विशाल मैदान: भू-आकृतिक कटिबंध एवं प्रादेशिक विभाजन

मैदान की उत्पत्ति एवं विस्तार

सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी प्रणालियों द्वारा निरंतर निक्षेपण से निर्मित यह मैदान पश्चिम में सिंधु डेल्टा से पूर्व में ब्रह्मपुत्र मुहाने तक लगभग 3,200 किमी लंबा और 150 से 300 किमी चौड़ा है। लगभग 7.8 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में फैला यह मैदान विश्व के सबसे सघन बसे और उर्वर क्षेत्रों में से एक है।

उत्तर से दक्षिण भू-आकृतिक कटिबंध (Morphogenetic Zones)
  • 1. भाबर (Bhabar):
    शिवालिक के गिरिपाद के समानांतर 8 से 10 किमी चौड़ी संकरी पट्टी। तीव्र ढाल से उतरती नदियां यहां भारी कंकड़, पत्थर और बजरी जमा करती हैं। अत्यधिक सरंध्रता (Porosity) के कारण छोटी नदियां भूमिगत होकर विलुप्त हो जाती हैं।
  • 2. तराई (Tarai):
    भाबर के दक्षिण में स्थित 10 से 20 किमी चौड़ी पट्टी। भाबर में लुप्त हुई नदियां यहां पुनः धरातल पर प्रकट होती हैं, जिससे यह क्षेत्र दलदली, नम तथा सघन वनों से आच्छादित रहता है। पूर्व में यह मलेरिया-ग्रस्त था, किंतु अब वनों को काटकर उपजाऊ कृषि भूमि में बदला गया है।
  • 3. भांगर (Bhangar):
    बाढ़ की पहुंच से ऊपर स्थित पुरातन जलोढ़ मृदा से निर्मित उच्च नदी मंच। इसमें चूनायुक्त कैल्शियम कार्बोनेट की ग्रंथियां पाई जाती हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में कंकड़ (Kankar) कहते हैं।
  • 4. खादर (Khadar):
    नदियों के निचले बाढ़ मैदानों में प्रतिवर्ष बाढ़ के जल द्वारा बिछाई जाने वाली नवीन उर्वर जलोढ़ मृदा की परत। यह अत्यधिक उपजाऊ और महीन कणों वाली होती है; पंजाब में इसे बेट (Bet) कहा जाता है।
विशाल मैदान का प्रादेशिक विभाजन
  1. पंजाब-हरियाणा का मैदान: सिंधु की पांच सहायक नदियों के बीच स्थित उर्वर दोआब क्षेत्र (बारी दोआब, रचना दोआब आदि)।
  2. गंगा का मैदान: सर्वाधिक विस्तृत भाग (~3.75 लाख वर्ग किमी); ऊपरी गंगा मैदान, मध्य गंगा मैदान तथा निम्न गंगा मैदान (पश्चिम बंगाल व सुंदरबन डेल्टा)।
  3. ब्रह्मपुत्र का मैदान (असम घाटी): हिमालय और मेघालय पठार के बीच स्थित संकरा मैदान; गुंफित जलमार्ग तथा विश्व का सबसे बड़ा नदी द्वीप माजुली (Majuli) यहीं स्थित है।

4. प्रायद्वीपीय पठार: मध्यवर्ती उच्चभूमि, दक्कन ट्रैप एवं घाट पर्वतमालाएं

प्रायद्वीपीय पठार की भू-आकृतिक रूपरेखा

औसत 600 से 900 मीटर ऊंचाई वाला प्रायद्वीपीय पठार एक विशाल प्राचीन त्रिभुजाकार भूखंड है। इसके उत्तर-पश्चिम में अरावली, उत्तर-पूर्व में राजमहल पहाड़ियां, पश्चिम में पश्चिमी घाट (सह्याद्रि) और पूर्व में पूर्वी घाट स्थित हैं।

पठार के प्रमुख उप-विभाग
  • मध्यवर्ती उच्चभूमि (The Central Highlands):
    • मालवा का पठार: बेसाल्ट लावा से निर्मित मंद ढालू पठार, जो चंबल और काली सिंध नदियों द्वारा बीहड़ों (Ravines) में काटा गया है।
    • बुंदेलखंड एवं बघेलखंड: प्राचीन ग्रेनाइट और नीस चट्टानों से निर्मित असमतल उच्चभूमि।
    • छोटा नागपुर का पठार: झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में विस्तृत भारत का खनिज भंडार (कोयला, लोहा, अभ्रक); दामोदर नदी इसकी भ्रंश घाटी से बहती है; सर्वोच्च शिखर पारसनाथ पहाड़ी (1,365 मी) है।
  • दक्कन का पठार (Deccan Plateau):
    • महाराष्ट्र का दक्कन ट्रैप: क्रिटेशियस युग में ज्वालामुखी लावा के प्रवाह से निर्मित सीढ़ीदार पठार; कपास की काली रेगुर मृदा का प्रमुख क्षेत्र।
    • कर्नाटक पठार: दो भागों में विभक्त: पश्चिमी वनाच्छादित पहाड़ी भाग मलनाड (Malnad) तथा पूर्वी खुला सपाट मैदान मैदान (Maidan); बाबा बूदन पहाड़ियों में मुल्लायनगिरि (1,930 मी) सर्वोच्च चोटी है।
    • तेलंगाना पठार: प्राचीन आर्कियन शैलों से बना संप्राय पठार।
पश्चिमी घाट (सह्याद्रि) और पूर्वी घाट की तुलना
तुलनात्मक मापदंड पश्चिमी घाट (सह्याद्रि) पूर्वी घाट
निरंतरता अविरल एवं खड़ा कगार; केवल दर्रों के माध्यम से ही पार किया जा सकता है। खंडित एवं अत्यंत विच्छेदित; पूर्व वाहिनी नदियों द्वारा काटा गया है।
औसत ऊंचाई काफी अधिक: 1,000 से 1,500 मीटर। कम: लगभग 600 मीटर।
सर्वोच्च शिखर अनाइमुडी (2,695 मी) (अन्नामलाई पहाड़ियां, दक्षिण भारत की सर्वोच्च चोटी); दोदाबेट्टा (2,637 मी, नीलगिरि)। अरमाकोंडा / जिंदागड़ा (1,690 मी) (आंध्र प्रदेश); महेंद्रगिरि (1,501 मी, ओडिशा)।
प्रमुख दर्रे थाल घाट (मुंबई-नासिक), भोर घाट (मुंबई-पुणे), पालघाट (केरल-तमिलनाडु)। नदियों द्वारा कटे होने के कारण कोई प्रमुख अविरल दर्रा नहीं है।
मिलन बिंदु पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट दक्षिण में नीलगिरि पहाड़ियों पर मिलते हैं।

5. तटीय मैदान, थार मरुस्थल एवं भारत के द्वीप समूह

भारत के तटीय मैदान

प्रायद्वीपीय पठार के दोनों ओर संकरे तटीय मैदान स्थित हैं जो अपनी उत्पत्ति में भिन्न हैं:

  • पश्चिमी तटीय मैदान (निमज्जित तट):
    पश्चिमी घाट और अरब सागर के बीच स्थित संकरा (10 से 50 किमी) मैदान। तीव्र ढाल व तेज लहरों के कारण यहां डेल्टा नहीं बनते, नदियां ज्वारनदमुख (Estuary) बनाती हैं:
    • कच्छ एवं काठियावाड़ तट: दलदली रन और गिर पहाड़ियां।
    • कोंकण तट: महाराष्ट्र और गोवा का पथरीला तट।
    • कन्नड़ तट: कर्नाटक का तटीय भाग।
    • मालाबार तट: केरल का तटीय मैदान; यहां बालूका भित्तियों द्वारा घिरे पश्चजल या लैगून पाए जाते हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में कयाल (Kayal) कहते हैं (उदा. वेम्बनाड झील और अष्टमुदी झील)।
  • पूर्वी तटीय मैदान (उन्मज्जित तट):
    पूर्वी घाट और बंगाल की खाड़ी के बीच स्थित 80 से 150 किमी चौड़ा मैदान। महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों ने यहां विशाल उपजाऊ डेल्टा बनाए हैं। इसके दो भाग हैं: उत्तर में उत्तरी सरकार तट तथा दक्षिण में कोरोमंडल तट। प्रमुख लैगून: ओडिशा की चिल्का झील (भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की लैगून) तथा पुलिकट झील।
थार का मरुस्थल (मरुस्थली)

अरावली के उत्तर-पश्चिम में राजस्थान और गुजरात में फैला शुष्क क्षेत्र:

  • मरुस्थलीय स्थलरूप: पवन द्वारा निर्मित अर्धचंद्राकार गतिशील बालू के टीले जिन्हें बरखान (Barchan) कहते हैं।
  • आंतरिक अपवाह एवं प्लाया: प्रमुख मौसमी नदी लूनी है जो कच्छ के रन में समाप्त होती है। खारी झीलों को धांद (Dhand) कहते हैं (उदा. सांभर झील)।
भारत के प्रमुख द्वीप समूह
द्वीप समूह भूगर्भीय उत्पत्ति प्रमुख द्वीप एवं विशेषताएं प्रमुख जल चैनल
अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह (बंगाल की खाड़ी) टर्शियरी अराकान योमा पर्वत के जलमग्न शिखर; ज्वालामुखीय उत्पत्ति। लगभग 572 द्वीप; बैरन द्वीप (दक्षिण एशिया का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी); नारकोंडम (सुप्त ज्वालामुखी); सैडल पीक (732 मी)। 10° चैनल लिटिल अंडमान को कार निकोबार से अलग करता है; डंकन मार्ग।
लक्षद्वीप (अरब सागर) पूर्णतः मूंगा जीवों द्वारा निर्मित प्रवाल भित्ति एवं एटोल (Atolls)। 36 छोटे द्वीप (क्षेत्रफल 32 वर्ग किमी); कवरत्ती प्रशासनिक राजधानी; मिनिकॉय सबसे बड़ा व दक्षिणतम द्वीप। 8° चैनल मिनिकॉय को मालदीव से तथा 9° चैनल मिनिकॉय को मुख्य लक्षद्वीप से अलग करता है।

6. पश्चिम बंगाल की भू-आकृति: उत्तरी पर्वतीय प्रदेश, पश्चिमी पठार एवं मैदानी भाग

पश्चिम बंगाल का त्रिविध भू-आकृतिक स्वरूप

पश्चिम बंगाल की भू-आकृति अत्यंत विविधतापूर्ण है। राज्य को तीन प्रमुख भौतिक प्रदेशों में बांटा गया है:

1. उत्तरी पर्वतीय प्रदेश (दार्जिलिंग हिमालय)

दार्जिलिंग और कालिम्पोंग जिलों में विस्तृत पूर्वी हिमालय का भाग। गहरी तीस्ता नदी घाटी इसे दो भागों में बांटती है:

  • तीस्ता का पश्चिमी भाग: यहां सिंगालीला श्रेणी और दार्जिलिंग श्रेणी स्थित हैं:
    • सन्दकफू (3,636 मी): पश्चिम बंगाल का सर्वोच्च पर्वत शिखर, जहां से एवरेस्ट और कंचनजंघा का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।
    • फालूट (3,600 मी): नेपाल, सिक्किम और पश्चिम बंगाल का मिलन बिंदु।
    • सबरग्राम (3,543 मी) एवं टोंग्लू (3,036 मी)।
    • टाइगर हिल (2,573 मी) एवं भारत का सबसे ऊंचा रेलवे स्टेशन घूम (2,258 मी)।
  • तीस्ता का पूर्वी भाग: कालिम्पोंग की पहाड़ियां (देओलो चोटी - 1,704 मी) तथा अलीपुरद्वार की बक्सा-जयंती पहाड़ियां।
2. पश्चिमी पठारी ढाल क्षेत्र

छोटा नागपुर पठार का पूर्वी ढालू भाग पुरुलिया जिले तथा बांकुड़ा, पश्चिम मेदिनीपुर, झाड़ग्राम व बीरभूम के पश्चिमी भागों में फैला है:

  • अवशिष्ट पहाड़ियां एवं मोनाडनॉक:
    • अयोध्या पहाड़ (पुरुलिया): सर्वोच्च शिखर गोरगाबुरु (677 मी), जो पश्चिम बंगाल के पठारी भाग की सबसे ऊंची चोटी है।
    • पंचेत पहाड़ एवं बाघमुंडी पहाड़ियां (पुरुलिया)।
    • बिहारीनाथ (452 मी) एवं सुशुनिया (442 मी) पहाड़ियां (बांकुड़ा जिला)।
    • मामा-भांजे पहाड़ (बीरभूम जिला)।
3. मैदानी प्रदेश

पश्चिम बंगाल का 80% भाग मैदान है, जो पांच उप-विभागों में बंटा है:

  1. तराई एवं डुआर्स मैदान: तीस्ता, तोर्सा और जलढाका द्वारा निर्मित गिरिपाद जलोढ़ मैदान (चाय बागानों के लिए प्रसिद्ध)।
  2. उत्तर बंगाल का मैदान: मालदा और दक्षिण दिनाजपुर का प्राचीन जलोढ़ बरिंद (Barind) तथा ताल क्षेत्र।
  3. राढ़ का मैदान (Rarh Plain): पठार के पूर्व में स्थित लेटराइट युक्त लाल मृदा का मंद ढालू तरंगित मैदान।
  4. तटीय बालूका स्तूप मैदान: पूर्व मेदिनीपुर में दीघा और कांथी का समुद्री बालू तट।
  5. डेल्टाई मैदान: मृतप्राय डेल्टा (नदिया/मुर्शिदाबाद), परिपक्व डेल्टा तथा सक्रिय डेल्टा (दक्षिण का सुंदरबन, जो ज्वारीय लवणीय मैंग्रोव वनों से आच्छादित है)।

महत्वपूर्ण भौगोलिक अवधारणाएँ, नियम एवं निर्देशांक

ट्रांस हिमालय (के-2, 8,611 मी) > हिमाद्रि (एवरेस्ट, 8,848.86 मी) > हिमाचल (3,700-4,500 मी) > शिवालिक (900-1,100 मी)
शिवालिक आधार → भाबर (8-10 किमी) → तराई (10-20 किमी) → भांगर (उच्च भूमि) → खादर (बाढ़ मैदान)
एवरेस्ट (8,848.86 मी) > के-2 (8,611 मी) > कंचनजंघा (8,586 मी) • सन्दकफू (पं. बंगाल, 3,636 मी) • अनाइमुडी (द. भारत, 2,695 मी)

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
भूगर्भीय संरचना के आधार पर भारत के प्रायद्वीपीय खंड और हिमालय पर्वतमाला में अंतर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
मापदंड प्रायद्वीपीय खंड हिमालय पर्वतमाला
उत्पत्ति एवं आयु प्राचीन प्री-कैम्ब्रियन गोंडवाना लैंड का भाग (आयु 250-350 करोड़ वर्ष)। नवीन टर्शियरी कल्प में प्लेट विवर्तनिकी से निर्मित (आयु 5-6 करोड़ वर्ष)।
संरचनात्मक स्थिरता अत्यंत दृढ़ एवं स्थिर; केवल ऊर्ध्वाधर भ्रंश व भ्रंश घाटियां (नर्मदा) बनीं। अत्यधिक लचीली एवं अस्थिर; तीव्र वलन और अत्यधिक भूकंपीयता।
शैल संरचना आर्कियन नीस, ग्रेनाइट और क्रिटेशियस बेसाल्ट लावा (दक्कन ट्रैप)। टेथिस सागर की अवसादी शैलें और केंद्रीय ग्रेनाइट।
उदाहरण 2
उत्तर भारत के विशाल मैदान के भाबर, तराई, भांगर और खादर क्षेत्रों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
  • भाबर: शिवालिक के गिरिपाद में 8-10 किमी चौड़ा कंकड़-पत्थरों का पारगम्य क्षेत्र; यहां नदियां भूमिगत होकर विलुप्त हो जाती हैं।
  • तराई: भाबर के दक्षिण में 10-20 किमी चौड़ा दलदली व वनाच्छादित क्षेत्र; यहां नदियां पुनः धरातल पर प्रकट होती हैं।
  • भांगर: बाढ़ के स्तर से ऊपर स्थित पुरातन जलोढ़ मृदा का उच्च क्षेत्र; इसमें चूने की ग्रंथियां या कंकड़ पाए जाते हैं।
  • खादर: नदी की निचली बाढ़ भूमि जहां प्रतिवर्ष नवीन उपजाऊ जलोढ़ मृदा बिछती है; यह सघन कृषि हेतु सर्वोत्तम है।
उदाहरण 3
निरंतरता, औसत ऊंचाई और अपवाह के आधार पर पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट की तुलना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
1. निरंतरता:
पश्चिमी घाट (सह्याद्रि) एक अविरल खड़ी दीवार के समान है जिसे केवल थाल घाट, भोर घाट या पालघाट जैसे दर्रों से पार किया जा सकता है। पूर्वी घाट अत्यंत विच्छेदित और नदियों द्वारा कटा हुआ है।

2. औसत ऊंचाई:
पश्चिमी घाट की औसत ऊंचाई अधिक है (1,000-1,500 मी; सर्वोच्च शिखर अनाइमुडी, 2,695 मी)। पूर्वी घाट की ऊंचाई कम है (औसत 600 मी; सर्वोच्च शिखर अरमाकोंडा, 1,690 मी)।

3. अपवाह तंत्र:
पश्चिमी घाट मुख्य जल विभाजक है; यहां से गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियां निकलकर पूर्व की ओर बहती हुई पूर्वी घाट को काटकर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं।
उदाहरण 4
पश्चिमी और पूर्वी तटीय मैदानों में अंतर बताइए। 'कयाल' क्या हैं और इनका क्या महत्व है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
1. तटीय मैदानों में अंतर:
• पश्चिमी तटीय मैदान: संकरा (10-50 किमी), निमज्जित तट; नदियां तीव्र गति से बहती हैं और डेल्टा न बनाकर ज्वारनदमुख (Estuary) बनाती हैं।
• पूर्वी तटीय मैदान: चौड़ा (80-150 किमी), उन्मज्जित तट; महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों द्वारा बड़े उपजाऊ डेल्टा निर्मित हैं।

2. कयाल (Kayal):
केरल के मालाबार तट पर बालूका भित्तियों द्वारा घिरे पश्चजल या लैगून झीलों को 'कयाल' कहते हैं (उदा. वेम्बनाड झील)।
महत्व: ये अंतर्देशीय जल परिवहन, मत्स्य पालन, नारियल जटा उद्योग और प्रसिद्ध नौका दौड़ (वल्लमकाली) पर्यटन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
उदाहरण 5
सन्दकफू और सिंगालीला श्रेणी का उल्लेख करते हुए पश्चिम बंगाल के उत्तरी पर्वतीय प्रदेश का वर्णन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
1. अवस्थिति:
दार्जिलिंग और कालिम्पोंग जिलों में फैला यह क्षेत्र पूर्वी हिमालय का भाग है, जिसे तीस्ता नदी की गहरी घाटी दो भागों में बांटती है।

2. सिंगालीला श्रेणी एवं सन्दकफू:
• तीस्ता के पश्चिम में नेपाल सीमा पर सिंगालीला पर्वत श्रेणी उत्तर से दक्षिण फैली है।
• इस श्रेणी पर स्थित सन्दकफू (3,636 मी) पश्चिम बंगाल का सर्वोच्च पर्वत शिखर है, जहां से माउंट एवरेस्ट और कंचनजंघा का विहंगम दृश्य दिखता है।
• अन्य प्रमुख शिखरों में फालूट (3,600 मी), सबरग्राम और टोंग्लू शामिल हैं। समीपस्थ दार्जिलिंग कटक पर टाइगर हिल (2,573 मी) और घूम (2,258 मी - भारत का सबसे ऊंचा स्टेशन) स्थित हैं।
उदाहरण 6
दक्कन के लावा पठार (दक्कन ट्रैप) की उत्पत्ति, भू-आकृतिक लक्षण एवं आर्थिक महत्व की विवेचना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
1. भूगर्भीय उत्पत्ति:
क्रिटेशियस युग में (लगभग 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व) दरारी ज्वालामुखी उद्भेदन से तरल बेसाल्ट लावा बाहर निकला और महाराष्ट्र तथा आसपास के 5 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में क्षैतिज परतों के रूप में जम गया।

2. भू-आकृतिक लक्षण:
• लावा की परतें एक के ऊपर एक जमने से सीढ़ीदार स्थलरूप बना है (स्वीडिश भाषा में 'ट्रैप' का अर्थ सीढ़ी होता है)।
• पठार की सतह सपाट मेजनुमा है और इसकी ऊंचाई 400 से 1,000 मीटर के बीच है।

3. आर्थिक महत्व:
• रेगुर मृदा: बेसाल्ट चट्टानों के अपक्षय से काली कपास मृदा बनी है, जो कपास, गन्ना और सोयाबीन की खेती हेतु अत्यंत उर्वर है।
• खनिज संसाधन: अपक्षय से उच्च स्थानों पर मूल्यवान बॉक्साइट के भंडार मिलते हैं (कोल्हापुर)।
• जलविद्युत उत्पादन: पश्चिमी ढालों के तीव्र प्रपातों पर कोयना जैसी प्रमुख जलविद्युत परियोजनाएं स्थापित हैं।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भांगर और खादर को विपरीत रूप से समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

भांगर पुरातन जलोढ़ से बनी कंकड़युक्त उच्च भूमि है; जबकि खादर प्रतिवर्ष बाढ़ से बनने वाली अत्यधिक उपजाऊ नवीन जलोढ़ मृदा है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

मेघालय पठार को हिमालय पर्वत का भाग मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मेघालय (शिलांग) पठार भूगर्भीय रूप से प्राचीन प्रायद्वीपीय शील्ड का भाग है, जो मालदा गैप द्वारा छोटा नागपुर से अलग हुआ है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

दोदाबेट्टा को दक्षिण भारत की सबसे ऊंची चोटी समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

दोदाबेट्टा (2,637 मी) नीलगिरि की सबसे ऊंची चोटी है, लेकिन संपूर्ण दक्षिण भारत की सबसे ऊंची चोटी अनाइमुडी (2,695 मी) है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

उच्च माध्यमिक भूगोल कक्षा 11 • भारत का प्रादेशिक भूगोल भारत की भूगर्भीय संरचना एवं प्रमुख भौतिक विभाग प्रायद्वीपीय शील्ड • नवीन वलित हिमालय • सिंधु-गंगा का मैदान • तटीय मैदान एवं द्वीप समूह 1. भारत के तीन वृहद् भूगर्भीय खंड प्रायद्वीपीय खंड (Peninsular Shield) • गोंडवाना लैंड का भाग • आर्कियन नीस व ग्रेनाइट & दृढ़ व स्थिर भूखंड • दक्कन ट्रैप लावा पठार हिमालय पर्वतमाला (Young Folded Belt) • नवीन टर्शियरी वलित पर्वत • टेथिस सागर का उत्थान • तीव्र वलन, भ्रंश एवं अत्यधिक भूकंपीयता सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान (Indo-Gangetic Basin) • प्लािस्टोसीन गर्त अववाह • 1,000-2,000 मीटर गहरी जलोढ़ गाद • विश्व का सर्वाधिक उपजाऊ मैदान WB पश्चिम बंगाल का भू-आकृतिक परिदृश्य • सन्दकफू (3636 मी - प. बंगाल का सर्वोच्च शिखर) • सिंगालीला श्रेणी • अयोध्या पहाड़ (गोरगाबुरु 677 मी) 2. भारत के प्रमुख भौतिक भू-आकृतिक लक्षण [A] The Northern Mountain Complex (Himalayas) • हिमालय के अनुदैर्ध्य भाग: हिमाद्रि (6100 मी) > हिमाचल (3700-4500 मी) > शिवालिक (900-1100 मी) • घाटी स्थलरूप: दून (देहरादून) • दुआर (जलपाईगुड़ी/असम) • भाबर व तराई क्षेत्र [B] Northern Great Plains Geomorphology • मैदानी कटिबंध: भाबर (कंकड़-पत्थर) > तराई (दलदल) > भांगर (पुरातन जलोढ़) > खादर (नवीन जलोढ़) • Punjab (Doabs) • Ganga Plains (Upper, Middle, Lower/Sundarbans) • Assam Valley [C] Peninsular Plateau & Ghats Architecture • प्रायद्वीपीय पठार: पश्चिमी घाट (अनाइमुडी 2695 मी) • पूर्वी घाट (अरमाकोंडा 1690 मी) • नीलगिरि मिलन • Western Ghats: Continuous scarp, Thal Ghat, Bhor Ghat, Palghat Gap • Eastern Ghats: Dissected, Mahendragiri (1,501 m), Arma Konda (1,690 m) [D] Coastal Plains & Island Archipelagos • West Coast: Narrow, submerged, Kayals / Backwaters (Vembanad Lake) • East Coast: Broad, emergent, Deltas (Mahanadi, Godavari, Krishna, Kaveri), Chilika Lake • द्वीप समूह: अंडमान-निकोबार (ज्वालामुखीय उद्भव, बैरन द्वीप) • लक्षद्वीप (प्रवाल भित्ति/एटोल) • Channels: 10° Channel (Andaman-Nicobar) • 8° Channel (Minicoy-Maldives)

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
भारत की संरचना तीन प्रमुख भूवैज्ञानिक खंडों में बंटी है: प्राचीन प्रायद्वीपीय शील्ड, नवीन वलित हिमालय और सिंधु-गंगा का मैदान।
मुख्य बिंदु 2
प्रायद्वीपीय भूखंड प्राचीन गोंडवाना लैंड का भाग है, जो आर्कियन शैलों और क्रिटेशियस बेसाल्ट दक्कन ट्रैप लावा से निर्मित है।
मुख्य बिंदु 3
टर्शियरी कल्प में भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों की टक्कर से टेथिस सागर के अवसादों में वलन पड़ने से हिमालय का निर्माण हुआ।
मुख्य बिंदु 4
हिमालय चार अनुदैर्ध्य श्रेणियों में विभक्त है: ट्रांस हिमालय (के-2), हिमाद्रि (एवरेस्ट, कंचनजंघा), हिमाचल और शिवालिक।
मुख्य बिंदु 5
उत्तर भारत का मैदान उत्तर से दक्षिण भाबर (कंकड़ पट्टी), तराई (दलदली क्षेत्र), भांगर (पुरातन जलोढ़) और खादर (नवीन बाढ़ जलोढ़) में बंटा है।
मुख्य बिंदु 6
प्रायद्वीपीय पठार पश्चिमी घाट (अविरल, अनाइमुडी 2,695 मी) और पूर्वी घाट (विच्छेदित, अरमाकोंडा 1,690 मी) से घिरा है, जो नीलगिरि में मिलते हैं।
मुख्य बिंदु 7
पश्चिमी तटीय मैदान संकरा व निमज्जित है (मालाबार कयाल युक्त), जबकि पूर्वी तटीय मैदान चौड़ा व उन्मज्जित है (डेल्टा व चिल्का झील युक्त)।
मुख्य बिंदु 8
भारतीय द्वीपों में अंडमान-निकोबार ज्वालामुखीय व जलमग्न पर्वत शिखर हैं (बैरन सक्रिय ज्वालामुखी), जबकि लक्षद्वीप प्रवाल एटोल हैं।
मुख्य बिंदु 9
पश्चिम बंगाल का सर्वोच्च शिखर सन्दकफू (3,636 मी) सिंगालीला श्रेणी में तथा पश्चिमी पठार का सर्वोच्च शिखर गोरगाबुरु (677 मी) है।
मुख्य बिंदु 10
पश्चिम बंगाल का मैदानी भाग डुआर्स, बरिंद, लेटराइट राढ़ मैदान, दीघा के बालूका स्तूप तथा दक्षिण के सुंदरबन डेल्टा में फैला है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

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अध्याय 1: एक विषय के रूप में भूगोल अध्याय 2: पृथ्वी की उत्पत्ति एवं आंतरिक संरचना अध्याय 3: भू-आकृतिक प्रक्रियाएं अध्याय 4: मौसम एवं जलवायु अध्याय 5: समस्थिति की संकल्पना अध्याय 6: जलमंडल अध्याय 7: मानव भूगोल का क्षेत्र एवं विषय-वस्तु अध्याय 8: आर्थिक भूगोल अध्याय 9: Secondary Activities - Industry अध्याय 10: तृतीयक क्रियाकलाप अध्याय 11: चतुर्थक क्रियाकलाप अध्याय 12: पंचमक क्रियाकलाप अध्याय 13: एक देश के रूप में भारत अध्याय 14: भारत की संरचना एवं भू-आकृति अध्याय 15: भारत का अपवाह तंत्र अध्याय 16: भारत की जलवायु अध्याय 17: भारत के वन एवं प्राकृतिक वनस्पति अध्याय 18: भारत की प्राकृतिक आपदाएं एवं संकट

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