Follow Us
माध्यम चुनें / Select Medium:
Eng (English) Beng (বাংলা) Hindi (हिन्दी)
WBB • कक्षा XI • Geography • अध्याय 18
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

भारत की प्राकृतिक आपदाएं एवं संकट

भारत का विशाल उपमहाद्वीप अपनी जटिल भू-आकृतिक संरचना और जलवायुगत विविधताओं के कारण विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक संकटों और आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। भौगोलिक विज्ञान में संकट (Hazard) और आपदा (Disaster) के मध्य एक मूलभूत अंतर किया जाता है: संकट एक ऐसी संभावित चरम भौतिक घटना या प्राकृतिक प्रक्रिया है जो जान-माल को क्षति पहुंचाने की क्षमता रखती है; जबकि आपदा तब घटित होती है जब यह संकट किसी असहाय मानव समाज पर कहर बनकर टूटता है और क्षति का स्तर स्थानीय समुदाय की आंतरिक क्षमता से बाहर हो जाता है। विवर्तनिक दृष्टि से भारतीय प्लेट प्रतिवर्ष लगभग 4 से 5 सेमी की दर से उत्तर की ओर यूरेशियन प्लेट के नीचे धंस रही है, जिसके फलस्वरूप देश का लगभग 59% भूभाग मध्यम से तीव्र भूकंपीय जोखिम वाला है, जिसे भारतीय मानक ब्यूरो (BIS IS 1893) द्वारा ज़ोन II से ज़ोन V में वर्गीकृत किया गया है। जलवायुगत दृष्टि से दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा की अनिश्चितता के कारण प्रतिवर्ष ब्रह्मपुत्र, गंगा, कोसी और निचले दामोदर मैदानों में 4 करोड़ हेक्टेयर से अधिक भूमि बाढ़ग्रस्त होती है; वहीं देश का लगभग 68% कृषि क्षेत्र मराठवाड़ा, रायलसीमा और पश्चिम बंगाल के पुरुलिया-बांकुड़ा जैसे वृष्टि-छाया क्षेत्रों में सूखे की मार झेलता है। लगभग 7,516 किमी लंबी तटरेखा पर कीपाकार बंगाल की खाड़ी विनाशकारी उष्णकटिबंधीय चक्रवातों (जैसे—अम्फान, यास, रेमल) और भीषण तूफानी लहरों (Storm Surge) की जननी है। उत्तरी पश्चिम बंगाल के हिमालयी क्षेत्र में दार्जिलिंग और कालिम्पोंग जिलों में भारी मानसूनी वर्षा से राष्ट्रीय राजमार्ग 10 (NH-10) पर बार-बार भीषण भूस्खलन होते हैं। वर्ष 2005 के आपदा प्रबंधन अधिनियम (DM Act) के बाद से भारत ने राहत-केंद्रित दृष्टिकोण के स्थान पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और वैश्विक सेंडाई फ्रेमवर्क (2015-2030) के अनुरूप बहुस्तरीय सक्रिय जोखिम न्यूनीकरण (DRR) प्रणाली अपनाई है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

प्राकृतिक संकटों और आपदाओं के कारणों, स्वरूप और स्थानिक वितरण को समझना मानव जीवन की रक्षा और आर्थिक सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है। जलवायु परिवर्तन के कारण आज चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता तेजी से बढ़ रही है—जैसे बंगाल की खाड़ी में सुपर चक्रवात, हिमालय में बादल फटने की घटनाएं और हिमनद झील विस्फोट से आने वाली आकस्मिक बाढ़ (GLOF)। समाज के गरीब और वंचित वर्ग जो कच्चे मकानों में अथवा संवेदनशील पहाड़ी ढलानों और नदी तटों पर रहते हैं, वे इन आपदाओं से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। पश्चिम बंगाल में सुंदरबन के तटीय द्वीप तूफानी लहरों और लवणीय जलभराव से ग्रस्त होते हैं, जबकि उत्तरी पहाड़ियों में भूस्खलन से सड़कें और संपर्क मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। उपग्रह मौसम विज्ञान, डॉपलर रडार, पूर्व चेतावनी प्रणालियों और स्थानीय समुदाय की भागीदारी के समन्वय से एक प्रभावी आपदा प्रबंधन तंत्र विकसित करना संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDG 11 और 13) की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 प्राकृतिक संकट एवं आपदा की संकल्पना...
2 भारत में भूकंप: प्लेट विवर्तनिकी, ब...
3 भारत में बाढ़ एवं सूखा: स्थानिक प्र...
4 उष्णकटिबंधीय चक्रवात एवं तूफानी लहर...
5 भूस्खलन एवं सुनामी: भू-आकृतिक कारक,...
6 आपदा प्रबंधन ढांचा: आपदा अधिनियम 20...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

प्राकृतिक संकट एवं आपदा की संकल्पना, सुभेद्यता और वर्गीकरण

१. संकट (Hazard), आपदा (Disaster) एवं सुभेद्यता (Vulnerability) की आधारभूत संकल्पना

आपदा भूगोल और पर्यावरण अध्ययन में तीन प्रमुख अवधारणाओं के मध्य स्पष्ट वैज्ञानिक अंतर स्थापित किया गया है:

  • प्राकृतिक संकट (Natural Hazard): कोई भी संभावित रूप से विनाशकारी भौतिक घटना, प्राकृतिक प्रक्रम अथवा मौसमी विक्षोभ जिसमें जन-धन की हानि, शारीरिक क्षति अथवा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की अंतर्निहित क्षमता हो (जैसे—खुले समुद्र में सक्रिय चक्रवात अथवा निर्जन मरुस्थल में आने वाला भूकंप)।
  • प्राकृतिक आपदा (Natural Disaster): किसी समाज अथवा समुदाय के सामान्य कामकाज में गंभीर व्यवधान उत्पन्न करने वाली वह विनाशकारी घटना जो व्यापक स्तर पर जन-धन, आजीविका और पर्यावरण की हानि करती है तथा जिससे उबरना प्रभावित समुदाय की अपनी आंतरिक क्षमताओं से बाहर हो जाता है। संकट केवल तभी आपदा बनता है जब वह किसी सुभेद्य मानव बस्ती से टकराता है।
  • सुभेद्यता या संवेदनशीलता (Vulnerability): किसी मानव समुदाय अथवा भौतिक संरचना की संकट के समक्ष असुरक्षा अथवा क्षति झेलने की प्रवृत्ति। इसके प्रमुख रूप:
    • भौतिक सुभेद्यता (Physical): नदी के बाढ़ के मैदान में बसना, अस्थिर ढलानों पर घर बनाना अथवा मिट्टी के कच्चे मकान।
    • सामाजिक-आर्थिक सुभेद्यता (Socio-Economic): निर्धनता, निरक्षरता, समय पर चेतावनी न मिल पाना और सामाजिक सुरक्षा का अभाव।
    • पर्यावरणीय सुभेद्यता (Environmental): मैंग्रोव वनों की कटाई, आद्रभूमियों का भराव और पर्वतीय वनों का विनाश।
आपदा जोखिम का आधारभूत समीकरण:
$$\text{आपदा जोखिम (Risk)} = \frac{\text{संकट (Hazard)} \times \text{सुभेद्यता (Vulnerability)}}{\text{सहन/मॉकबिला क्षमता (Capacity)}}$$ निहितार्थ: यदि स्थानीय समुदाय की सुभेद्यता को न्यूनतम कर दिया जाए और पूर्व चेतावनी व निपटने की प्रशासनिक क्षमता बढ़ा दी जाए, तो कोई भी प्राकृतिक संकट भीषण आपदा में परिवर्तित नहीं होगा।
२. भारत में प्राकृतिक आपदाओं का मुख्य वर्गीकरण
आपदा की श्रेणी भौतिक कार्यप्रणाली एवं प्रक्रियाएं भारत में प्रमुख उदाहरण
१. भू-विवर्तनिक / पार्थिव प्लेटों की परस्पर टक्कर, भ्रंश रेखाओं पर विस्थापन और भूकंपीय ऊर्जा का विमोचन। भूकंप (लातूर १९९३, भुज २००१, कश्मीर २००५), सुनामी (२६ दिसंबर २००४ हिंद महासागरीय सुनामी)।
२. जल-मौसम वैज्ञानिक मानसूनी वर्षा की अनियमितता, गहरे निम्न दाब तंत्र, समुद्री जल का तापन और आर्द्रता की कमी। उष्णकटिबंधीय चक्रवात (अम्फान २०२०, यास २०२१), बाढ़ (गंगा, ब्रह्मपुत्र, तीस्ता, दामोदर), सूखा (मराठवाड़ा, पुरुलिया), लू।
३. भू-आकृतिक / ढाल आपदाएं गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में पर्वतीय ढलानों से चट्टानों, मलबे और मिट्टी का तीव्र अधोमुखी संचलन। हिमालयी भूस्खलन (दार्जिलिंग-कालिम्पोंग NH-10), पश्चिमी घाट के मलबे का प्रवाह (वायनाड), पंकरुद्ध प्रवाह, हिमस्खलन।

भारत में भूकंप: प्लेट विवर्तनिकी, बीआईएस (BIS) भूकंपीय ज़ोन एवं ऐतिहासिक घटनाएं

१. भारत में भूकंपीयता के प्रमुख भू-विवर्तनिक कारण

भारत की उच्च भूकंपीय संवेदनशीलता का मूल कारण सक्रिय प्लेट विवर्तनिकी है:

  • भारतीय एवं यूरेशियन प्लेट की टक्कर: भारतीय टेक्टोनिक प्लेट प्रतिवर्ष ४ से ५ सेमी की गति से उत्तर की ओर अग्रसर होकर स्थिर यूरेशियन प्लेट के नीचे निरंतर धंस रही है।
  • हिमालयी भ्रंशों में प्रतिबल का संचय: लगभग २,५०० किमी लंबी हिमालयी चाप में स्थित प्रमुख भ्रंशों—जैसे मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT), मेन बाउंड्री थ्रस्ट (MBT) और मेन फ्रंटल थ्रस्ट (MFT)—में चट्टानों के मध्य अत्यधिक प्रत्यास्थ तनाव (Elastic Strain) संचित होता है, जो अचानक मुक्त होकर प्रलयकारी भूकंप उत्पन्न करता है।
  • अंतःप्लेट भूकंपीयता (Intra-plate Seismicity): प्रायद्वीपीय भारत के प्राचीन और स्थिर माने जाने वाले शील्ड में भी प्राचीन दबी हुई भ्रंश घाटियों (जैसे—नर्मदा-सोन भ्रंश तथा कुर्दुवादी भ्रंश) में संचित दबाव के कारण घातक उथले भूकंप आते हैं (उदा. १९९३ का लातूर और १९९७ का जबलपुर भूकंप)।
२. बीआईएस (BIS IS 1893: 2016) भूकंपीय ज़ोन मानचित्र

भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने भूकंपीय तीव्रता, ऐतिहासिक आंकड़ों और विवर्तनिक संरचना के आधार पर देश को चार मुख्य ज़ोन में विभाजित किया है (ज़ोन I को ज़ोन II में मिला दिया गया है):

भूकंपीय ज़ोन एमएसके (MSK) तीव्रता एवं जोखिम का स्तर ज़ोन कारक (Z) भारत के अंतर्गत आने वाले प्रमुख भौगोलिक क्षेत्र
ज़ोन V (Zone V) तीव्रता IX एवं अधिक
अति उच्च क्षति जोखिम
०.३६ संपूर्ण पूर्वोत्तर भारत, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात का कच्छ का रण, उत्तरी बिहार, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह।
ज़ोन IV (Zone IV) तीव्रता VIII
उच्च क्षति जोखिम
०.२४ उत्तरी पश्चिम बंगाल (दार्जिलिंग, कालिम्पोंग, जलपाईगुड़ी), दिल्ली एवं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR), उत्तर प्रदेश व बिहार के उत्तरी मैदान, पश्चिमी हिमालय का शेष भाग।
ज़ोन III (Zone III) तीव्रता VII
मध्यम क्षति जोखिम
०.१६ दक्षिणी पश्चिम बंगाल (कोलकाता, हावड़ा, २४ परगना), तटीय महाराष्ट्र (मुंबई), केरल, गोवा, गुजरात का मध्य भाग, ओडिशा और मध्य प्रदेश।
ज़ोन II (Zone II) तीव्रता VI अथवा कम
न्यून क्षति जोखिम
०.१० प्रायद्वीपीय शील्ड का अधिकांश स्थिर भाग: कर्नाटक, तेलंगाना, तमिलनाडु, मध्य महाराष्ट्र तथा राजस्थान का मरुस्थलीय क्षेत्र।
३. भारत के कुछ प्रमुख ऐतिहासिक विनाशकारी भूकंप
  • १८९७ का महान असम भूकंप (Mw ८.१-८.७): आधुनिक इतिहास के सबसे शक्तिशाली महाद्वीपीय भूकंपों में से एक, जिसने शिलांग पठार को हिला दिया था और ब्रह्मपुत्र नदी का प्रवाह कुछ समय के लिए उल्टा कर दिया था।
  • १९३४ का बिहार-नेपाल भूकंप (Mw ८.४): उत्तरी बिहार (मुंगेर, दरभंगा) और काठमांडू घाटी को खंडहर में बदल दिया था तथा बड़े पैमाने पर मृदा द्रवीकरण (Liquefaction) हुआ था।
  • १९९३ का लातूर भूकंप (Mw ६.२): महाराष्ट्र के किल्लारी गांव में उथले केंद्र के भूकंप के कारण पत्थरों और मिट्टी के बने भारी मकानों के गिरने से लगभग १०,००० लोगों की मृत्यु हुई।
  • २००१ का भुज भूकंप (Mw ७.७): २६ जनवरी को गुजरात के कच्छ में आया; २०,००० से अधिक लोगों की जान गई और राष्ट्रीय स्तर पर भवन निर्माण संहिताओं के कड़े अनुपालन की शुरुआत हुई।

भारत में बाढ़ एवं सूखा: स्थानिक प्रारूप, कारण एवं प्रबंधन

१. भारत में बाढ़: कारण, स्वरूप एवं प्रमुख नदी घाटियां

भारत विश्व के सर्वाधिक बाढ़-प्रवण देशों में से एक है, जहां प्रतिवर्ष लगभग ४ करोड़ हेक्टेयर भूमि (कुल क्षेत्रफल का लगभग १२%) जलमग्न हो जाती है:

  • बाढ़ के प्रमुख कारण:
    • मानसूनी वर्षा का मौसमी संकेंद्रण: कुल वार्षिक वर्षा का लगभग ७५-८०% केवल जून से सितंबर के १०० दिनों के भीतर होता है।
    • नदी तलों में भारी गाद (सिल्ट) का जमाव: हिमालय से उतरने वाली नदियां (ब्रह्मपुत्र, कोसी, तीस्ता) विशाल मात्रा में मलबा लाती हैं जिससे नदी तल उथला हो जाता है और थोड़ा सा पानी बढ़ने पर भी नदी किनारों को तोड़कर फैल जाती है।
    • बादल फटना और बांधों से जल निकासी: पहाड़ी घाटियों में बादल फटने से अचानक भारी पानी आना तथा मैदानी इलाकों में बैराजों से अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़ा जाना।
    • अनियोजित नगरीकरण: प्राकृतिक जलमार्गों और झीलों के अतिक्रमण से कोलकाता, मुंबई, चेन्नई जैसे महानगरों में भीषण शहरी जलभराव।
  • प्रमुख बाढ़ग्रस्त क्षेत्र:
    • ब्रह्मपुत्र घाटी (असम): हर साल की प्रलयकारी बाढ़ जिसमें काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और लाखों ग्रामीण प्रभावित होते हैं।
    • गंगा एवं कोसी नदी: कोसी नदी को 'बिहार का शोक' कहा जाता है; पिछले २५० वर्षों में इसने गाद जमाव के कारण अपना मार्ग पश्चिम की ओर १२० किमी से अधिक बदल लिया है।
    • पश्चिम बंगाल की बाढ़: उत्तर बंगाल के डूआर्स में तीस्ता, तोर्षा, जलढाका की आकस्मिक बाढ़; छोटानागपुर से उतरने वाली दामोदर, अजय, मयूराक्षी, कंसावती के निचले बेसिन में हुगली, हावड़ा और पूर्व बर्धमान की बाढ़; तथा सुंदरबन का ज्वारीय जलभराव।
२. भारत में सूखा: वर्गीकरण एवं सूखा-प्रवण क्षेत्र

सूखा एक धीमी गति से शुरू होने वाली पर्यावरणीय आपदा है जो वर्षा की दीर्घकालिक कमी के कारण उत्पन्न होती है:

सूखे का प्रकार वैज्ञानिक मापदंड (IMD मानक) पारिस्थितिक एवं सामाजिक प्रभाव
मौसम वैज्ञानिक सूखा (Meteorological) सामान्य वर्षा की तुलना में मौसमी वर्षा में २५% से अधिक की कमी।
मध्यम: २६-५०% कमी।
गंभीर: >५०% कमी।
दीर्घकालिक शुष्कता, अत्यधिक गर्मी और वायुमंडल में आर्द्रता की भारी कमी।
जल वैज्ञानिक सूखा (Hydrological) नदियों, झीलों, जलाशयों के जल स्तर में भारी गिरावट और भूजल स्तर का खतरनाक रूप से नीचे जाना। पेयजल का गंभीर संकट, सिंचाई नहरों का सूखना और पनबिजली उत्पादन में भारी गिरावट।
कृषि सूखा (Agricultural) फसल के विकास के महत्वपूर्ण चरणों में मिट्टी में आवश्यक नमी की अत्यधिक कमी। फसलों का मुरझाना, कृषि उत्पादन में भारी गिरावट और पशुओं के चारे का अभाव।
सामाजिक-आर्थिक सूखा (Socio-Economic) जल और खाद्यान्न के अभाव से ग्रामीण अर्थव्यवस्था का चरमराना और आजीविका की हानि। ग्रामीण आबादी का शहरों की ओर पलायन, किसानों की ऋणग्रस्तता और भुखमरी जैसी स्थिति।
सूखा-प्रवण क्षेत्र एवं प्रबंधन तकनीक:
• संवेदनशील क्षेत्र: पश्चिमी घाट का वृष्टि छाया प्रदेश (मराठवाड़ा, विदर्भ, रायलसीमा), राजस्थान का थार मरुस्थल, बुंदेलखंड और पश्चिम बंगाल का पश्चिमी राढ़ पठार (पुरुलिया और बांकुड़ा)।
• प्रबंधन उपाय: वाटरशेड प्रबंधन, वर्षा जल संचयन (पश्चिम बंगाल में खेतों के निचले कोने में 'हापा' तालाब खोदना), टपक (ड्रिप) व फव्वारा (स्प्रिंकलर) सूक्ष्म सिंचाई, तथा अधिक जल वाली फसलों के स्थान पर मोटे अनाज (मिलेट्स—बाजरा, रागी, ज्वार) की खेती को बढ़ावा देना।

उष्णकटिबंधीय चक्रवात एवं तूफानी लहरें: बंगाल की खाड़ी का विशेष संदर्भ

१. उष्णकटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति की अनुकूल परिस्थितियां एवं यांत्रिकी

उष्णकटिबंधीय चक्रवात गर्म महासागरों के ऊपर विकसित होने वाले तीव्र निम्न वायुदाब के भंवर होते हैं, जिनके चारों ओर अत्यधिक तेज हवाएं और मूसलाधार वर्षा होती है:

  • चक्रवात निर्माण की अनिवार्य दशाएं:
    1. समुद्र की सतह का तापमान निरंतर २६.५° से २७°C से अधिक होना (कम से कम ५० मीटर की गहराई तक)।
    2. घूर्णन उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त कोरिओलिस बल (भूमध्य रेखा से कम से कम ५° दूर)।
    3. निचले और ऊपरी क्षोभमंडल के मध्य ऊर्ध्वाधर पवन अपरूपण (Wind Shear) का अत्यंत कम होना।
    4. मध्य क्षोभमंडल में उच्च सापेक्षिक आर्द्रता (>६०%) का होना।
  • बंगाल की खाड़ी बनाम अरब सागर की विषमता (४:१ अनुपात):
    • अरब सागर की तुलना में बंगाल की खाड़ी में लगभग चार गुना अधिक चक्रवात उत्पन्न होते हैं।
    • कारण: बंगाल की खाड़ी का सतही तापमान अधिक होता है; इसकी आकृति त्रिभुजाकार व कीपाकार है; गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी विशाल नदियों का मीठा पानी ऊपर एक हल्का व गर्म स्तर बना देता है जो नीचे के ठंडे पानी से मिश्रण को रोकता है; तथा दक्षिण चीन सागर के टाइफून म्यांमार पार कर बंगाल की खाड़ी में आकर पुनर्जीवित हो जाते हैं।
  • ऋतु चक्र: भारत में चक्रवात मुख्य रूप से दो मौसमों में आते हैं—मानसून पूर्व (अप्रैल-मई) तथा मानसून पश्चात (अक्टूबर-नवंबर)। इनमें मानसून पश्चात के चक्रवात सर्वाधिक विनाशकारी होते हैं।
२. तूफानी लहरें (Storm Surge): तटीय क्षेत्रों का सबसे घातक खतरा

तूफानी लहरें चक्रवात के समय सामान्य खगोलीय ज्वार के स्तर से कई मीटर ऊपर उठने वाली विशालकाय समुद्री लहरें होती हैं, जो मुख्यतः दो कारणों से उत्पन्न होती हैं:

  1. हवा का प्रचंड घर्षण दबाव: १५० से २५० किमी/घंटा की गति से चलने वाली चक्रवाती हवाएं समुद्र के विशाल जल को किनारे की ओर धकेलकर उथले महाद्वीपीय मग्नतट पर जल का पहाड़ बना देती हैं।
  2. प्रतिलोम वायुदाबमापी प्रभाव (Inverted Barometer Effect): चक्रवात के केंद्र (आंख) में वायुदाब अत्यंत कम हो जाने से (प्रति १ मिलीबार दबाव घटने पर) समुद्र का जल लगभग १ सेमी ऊपर उठ जाता है।
सुंदरबन एवं बंगाल तट की अत्यधिक संवेदनशीलता:
• बंगाल की खाड़ी का उथला समुद्री तल और कीपाकार तटीय मुख तूफानी लहरों की ऊंचाई को ५ से १० मीटर तक बढ़ा देता है।
• सुंदरबन के द्वीप समुद्र तल से मात्र २-३ मीटर ऊंचे हैं, जिससे मिट्टी के बांध टूट जाते हैं और खारा पानी खेतों व मीठे पानी के तालाबों में भर जाता है।
• ऐतिहासिक विनाशकारी चक्रवात: १९७० का भोला चक्रवात (लगभग ३-५ लाख मौतें); १९९९ का ओडिशा सुपर चक्रवात; २००९ का आइला; २०२० का अम्फान (सुपर साइक्लोन जिसने कोलकाता को हिला दिया); २०२१ का यास तथा २०२४ का रेमल।

भूस्खलन एवं सुनामी: भू-आकृतिक कारक, प्रभाव एवं न्यूनीकरण

१. भारत में भूस्खलन के प्रमुख क्षेत्र एवं कारण

भूस्खलन गुरुत्वाकर्षण बल के प्रत्यक्ष प्रभाव में पहाड़ी ढलानों से चट्टानों, मलबे और मिट्टी का तीव्र अथवा धीमा नीचे की ओर खिसकना है:

  • भारत के प्रमुख भूस्खलन-प्रवण क्षेत्र:
    • हिमालय पर्वतमाला (दार्जिलिंग-कालिम्पोंग की पहाड़ियां, उत्तराखंड, हिमाचल): नवीन वलित पर्वत, अत्यधिक खंडित अवसादी शैलें, सक्रिय भ्रंश रेखाएं और भीषण मानसूनी वर्षा।
    • पश्चिमी घाट (नीलगिरि, वायनाड, कोंकण): पश्चिमी ढाल की अत्यधिक खड़ी ढलानें जहां भारी पर्वतीय वर्षा से विनाशकारी मलबे का प्रवाह होता है।
  • भूस्खलन के मुख्य कारक:
    • प्राकृतिक कारक: मूसलाधार वर्षा से मिट्टी के छिद्रों में जलदाब (Pore-water pressure) बढ़ जाना जिससे ढाल की घर्षण प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है; भूकंप के झटके।
    • मानवजनित कारक: सड़कों के चौड़ीकरण के लिए ढलानों की अवैज्ञानिक कटाई (जैसे—सिलीगुड़ी से सिक्किम को जोड़ने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग १० या NH-10); अंधाधुंध होटल निर्माण; और प्राकृतिक पहाड़ी नालों (झोरा) का अवरुद्ध होना।
  • अभियांत्रिकी एवं जैव-अभियांत्रिकी न्यूनीकरण उपाय:
    1. छिद्रयुक्त रिटेनिंग दीवारें और तार की जाली वाली गैबियन दीवारें बनाना ताकि फंसा हुआ पानी बाहर निकल सके।
    2. पहाड़ी झरनों और नालों को पक्का करना (Jhora training) ताकि पानी दरारों में न रिस सके।
    3. ढलानों को सीढ़ीदार बनाना (Terraced Benching) जिससे गुरुत्वाकर्षण का दबाव कम हो सके।
    4. गहरी जड़ों वाली वेटीवर घास लगाना और भू-वस्त्र (जियोटेक्सटाइल) बिछाकर मिट्टी के क्षरण को रोकना।
२. सुनामी (Tsunami) एवं हिंद महासागरीय पूर्व चेतावनी प्रणाली

सुनामी समुद्र के तल में शक्तिशाली भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट अथवा अंतःसमुद्री भूस्खलन से उत्पन्न होने वाली विशालकाय व लंबी तरंगदैर्घ्य की समुद्री तरंगें हैं:

  • २६ दिसंबर २००४ की हिंद महासागरीय सुनामी:
    • कारण: इंडोनेशिया के उत्तरी सुमात्रा के निकट सुंडा गर्त में आया Mw ९.१-९.३ तीव्रता का महा-भूकंप।
    • भारत में प्रभाव: अंडमान-निकोबार द्वीप समूह तथा तमिलनाडु के नागापट्टिनम, आंध्र प्रदेश और केरल के तटों पर १०-१२ मीटर ऊंची लहरों ने लगभग १६,००० लोगों की जान ले ली।
  • भारतीय सुनामी पूर्व चेतावनी केंद्र (ITEWC):
    • वर्ष २००७ में हैदराबाद स्थित INCOIS (Indian National Centre for Ocean Information Services) में अत्याधुनिक चेतावनी केंद्र की स्थापना की गई।
    • समुद्र तल के प्रेशर सेंसर (BPR), तटीय ज्वारमापी और उपग्रहों के माध्यम से भूकंप आने के मात्र १० मिनट के भीतर तटीय क्षेत्रों को सुनामी की पूर्व चेतावनी जारी करने में सक्षम।

आपदा प्रबंधन ढांचा: आपदा अधिनियम 2005, NDMA एवं सेंडाई फ्रेमवर्क

१. ऐतिहासिक दृष्टिकोण परिवर्तन: आपदा राहत से जोखिम न्यूनीकरण (DRR)

पारंपरिक रूप से भारत में आपदा प्रबंधन केवल प्रतिक्रियात्मक (Reactive) था—अर्थात आपदा आने के बाद राहत बांटना, बचाव करना और मुआवजा देना। परंतु १९९९ के ओडिशा चक्रवात, २००१ के भुज भूकंप और २००४ की सुनामी के बाद भारत सरकार ने आपदा प्रबंधन अधिनियम, २००५ (Disaster Management Act, 2005) पारित कर पूर्व तैयारी, जोखिम न्यूनीकरण और शमन पर आधारित एक सक्रिय दृष्टिकोण अपनाया।

२. २००५ के अधिनियम के अंतर्गत त्रिस्तरीय संस्थागत ढांचा
प्रशासनिक स्तर वैधानिक प्राधिकरण अध्यक्ष / प्रमुख मुख्य कार्य एवं दायित्व
राष्ट्रीय स्तर (शीर्ष) NDMA
(राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण)
भारत के प्रधानमंत्री आपदा प्रबंधन की राष्ट्रीय नीतियां बनाना, विभिन्न मंत्रालयों में समन्वय स्थापित करना और राष्ट्रीय योजनाएं स्वीकृत करना।
राज्य स्तर SDMA
(राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण)
राज्य के मुख्यमंत्री राज्य आपदा प्रबंधन योजना तैयार करना, विभागों के बजट में शमन कार्य शामिल करना (जैसे—पश्चिम बंगाल SDMA)।
जिला स्तर (अग्रिम मोर्चा) DDMA
(जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण)
जिलाधिकारी (DM / Collector)
सह-अध्यक्ष: जिला परिषद अध्यक्ष
जमीनी स्तर पर राहत व बचाव कार्य का संचालन, नियंत्रण कक्ष स्थापित करना, राहत शिविर चलाना।
३. त्वरित प्रतिक्रिया बल एवं सेंडाई फ्रेमवर्क (2015-2030)
  • राष्ट्रीय एवं राज्य आपदा मोचन बल (NDRF & SDRF): आधुनिकतम बचाव उपकरणों से सुसज्जित विशेष प्रशिक्षित बल, जो प्राकृतिक अथवा मानवजनित किसी भी संकट में तुरंत मोर्चा संभालते हैं।
  • सेंडाई फ्रेमवर्क (Sendai Framework 2015-2030): वर्ष २०१५ में जापान के सेंडाई में संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वीकृत वैश्विक घोषणापत्र, जिसके ४ प्रमुख स्तंभ हैं:
    1. प्राथमिकता १: वैज्ञानिक शोध द्वारा आपदा जोखिम को गहराई से समझना।
    2. प्राथमिकता २: आपदा जोखिम प्रबंधन हेतु प्रशासनिक शासन को मजबूत करना।
    3. प्राथमिकता ३: आपदा-रोधी टिकाऊ अधोसंरचना निर्माण में आर्थिक निवेश बढ़ाना।
    4. प्राथमिकता ४: प्रभावी प्रतिक्रिया की तैयारी और पुनर्निर्माण में "Build Back Better" (पहले से बेहतर व सुरक्षित निर्माण) का सिद्धांत लागू करना।
  • समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन (CBDRM): स्थानीय युवाओं, ग्राम पंचायतों और मछुआरों को प्राथमिक चिकित्सा, तैराकी और बचाव कार्यों का प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाना।

महत्वपूर्ण भौगोलिक अवधारणाएँ, नियम एवं निर्देशांक

आपदा जोखिम का मूलभूत सूत्र
Disaster Risk = {Hazard (संकट) × Vulnerability (सुभेद्यता)}{Capacity (निपटने की क्षमता)}
गुटेनबर्ग-रिक्टर ऊर्जा एवं परिमाण संबंध
$$\log_{10}(E) = 4.8 + 1.5 M_w$$
बाढ़ पुनरावृत्ति अंतराल (Weibull Formula)
$$T = \frac{N + 1}{m}$$

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्राकृतिक संकट (Hazard) और प्राकृतिक आपदा (Disaster) में मूलभूत अंतर स्पष्ट कीजिए। आपदा जोखिम समीकरण (Disaster Risk Equation) की व्याख्या कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. संकट और आपदा के मध्य मूलभूत अंतर:

  • प्राकृतिक संकट (Natural Hazard):
    • यह एक संभावित रूप से हानिकारक भौतिक घटना, प्राकृतिक प्रक्रम अथवा वायुमंडलीय विक्षोभ है, जिसमें जीवन, संपत्ति अथवा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की अंतर्निहित संभावना होती है।
    • जब तक यह किसी कमजोर या असुरक्षित मानव बस्ती से नहीं टकराता, तब तक यह केवल एक संकट बना रहता है।
    • उदाहरण: बंगाल की खाड़ी के गहरे और निर्जन समुद्री भाग में चक्कर काटता हुआ एक शक्तिशाली चक्रवात।
  • प्राकृतिक आपदा (Natural Disaster):
    • जब कोई संकट किसी असहाय मानव आबादी पर आघात करता है, जिसके परिणामस्वरूप भारी जन-धन की हानि होती है और स्थानीय समुदाय के लिए अपने संसाधनों से उससे उबरना असंभव हो जाता है, तो उसे आपदा कहते हैं।
    • उदाहरण: वही चक्रवात जब सुंदरबन के घनी आबादी वाले तटीय क्षेत्र में टकराता है, कच्चे घरों को नष्ट करता है, खारा पानी भरकर फसलों को बर्बाद करता है और जनहानि करता है।

२. आपदा जोखिम समीकरण (Disaster Risk Equation):

$$\text{आपदा जोखिम (Risk)} = \frac{\text{संकट (Hazard)} \times \text{सुभेद्यता (Vulnerability)}}{\text{निपटने की क्षमता (Capacity)}}$$

  • संकट (H): प्राकृतिक घटना की तीव्रता, अवधि और उसका फैलाव।
  • सुभेद्यता (V): भौतिक, सामाजिक और आर्थिक कमजोरी का स्तर (जैसे—नदी के किनारे मिट्टी के कच्चे मकान, समय पर चेतावनी न मिल पाना)।
  • निपटने की क्षमता (C): पूर्व तैयारी, पक्के चक्रवात आश्रय स्थल, डॉपलर रडार प्रणाली और बचाव दल की तत्परता।
  • निष्कर्ष: प्राकृतिक घटना को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, किंतु यदि मानव बस्तियों की सुभेद्यता कम कर दी जाए और प्रशासनिक क्षमता बढ़ा दी जाए, तो आपदा जोखिम को न्यूनतम किया जा सकता है।
उदाहरण 2
भारत में भूकंप आने के मुख्य भू-विवर्तनिक कारणों की विवेचना कीजिए। भारतीय मानक ब्यूरो (BIS IS 1893) द्वारा निर्धारित चार भूकंपीय ज़ोन का सविस्तार वर्णन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. भारत में भूकंपीयता के भू-विवर्तनिक कारण:

  • महाद्वीपीय प्लेटों की टक्कर: भारतीय विवर्तनिक प्लेट प्रतिवर्ष लगभग ४-५ सेमी की गति से उत्तर की ओर गतिशील होकर यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है और उसके नीचे धंस रही है।
  • हिमालयी भ्रंशों में ऊर्जा का संचय: हिमालय पर्वतमाला के प्रमुख भ्रंशों (MCT, MBT, MFT) पर चट्टानों में विशाल प्रत्यास्थ तनाव संचित होता है। जब यह चट्टानों की सहन सीमा से अधिक हो जाता है, तो भ्रंश रेखा अचानक टूटती है और तीव्र भूकंपीय तरंगें उत्पन्न होती हैं।
  • प्रायद्वीपीय भारत में भ्रंशों की सक्रियता: दक्कन के प्राचीन शील्ड में नर्मदा-ताप्ती-सोन तथा कुर्दुवादी जैसी प्राचीन दरारों के पुनर्सक्रिय होने से लातूर (१९९३) और जबलपुर (१९९७) जैसे उथले अंतःप्लेट भूकंप आते हैं।

२. BIS IS 1893: 2016 के अनुसार ४ भूकंपीय ज़ोन:

  • ज़ोन V (अति उच्च जोखिम, Z = ०.३६):
    • यहां MSK तीव्रता ९ या उससे अधिक के अत्यंत विनाशकारी भूकंप आ सकते हैं।
    • क्षेत्र: संपूर्ण पूर्वोत्तर भारत (असम, मेघालय आदि), जम्मू-कश्मीर, हिमाचल व उत्तराखंड का कुछ भाग, उत्तरी बिहार, गुजरात का कच्छ तथा अंडमान-निकोबार।
  • ज़ोन IV (उच्च जोखिम, Z = ०.२४):
    • यहां तीव्रता ८ के झटके महसूस होते हैं।
    • क्षेत्र: उत्तरी पश्चिम बंगाल (दार्जिलिंग, कालिम्पोंग, जलपाईगुड़ी), दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश व बिहार के उत्तरी मैदान तथा पश्चिमी हिमालय का शेष भाग।
  • ज़ोन III (मध्यम जोखिम, Z = ०.१६):
    • यहां तीव्रता ७ तक के भूकंप आ सकते हैं।
    • क्षेत्र: दक्षिणी पश्चिम बंगाल (कोलकाता, हावड़ा, २४ परगना), तटीय महाराष्ट्र (मुंबई), केरल, गुजरात का मध्य भाग और ओडिशा।
  • ज़ोन II (न्यून जोखिम, Z = ०.१०):
    • यहां तीव्रता ६ या उससे कम के झटके आते हैं।
    • क्षेत्र: प्रायद्वीपीय भारत का स्थिर आंतरिक भाग (कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना और मध्य महाराष्ट्र)।
उदाहरण 3
अरब सागर की तुलना में बंगाल की खाड़ी में चक्रवात अधिक संख्या और तीव्रता में क्यों आते हैं? तूफानी लहरों (Storm Surge) की उत्पत्ति की प्रक्रिया समझाइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. बंगाल की खाड़ी में चक्रवातों की अधिकता के कारण (४:१ अनुपात): उत्तर हिंद महासागर के लगभग ८०% चक्रवात बंगाल की खाड़ी में उत्पन्न होते हैं, जिसके चार मुख्य कारण हैं:

  • उच्च सतही तापमान: बंगाल की खाड़ी का समुद्री जल सामान्यतः २८° से ३०°C तक गर्म रहता है, जो चक्रवात को शक्ति देने के लिए प्रचुर मात्रा में वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा प्रदान करता है। इसके विपरीत अरब सागर में ग्रीष्मकालीन मानसूनी हवाएं गहरे ठंडे पानी को ऊपर लाती हैं (अपवेलिंग), जिससे वहां तापमान अपेक्षाकृत कम रहता है।
  • मीठे पानी का हल्का स्तर: गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी और इरावदी नदियों द्वारा भारी मात्रा में लाया गया मीठा जल समुद्र की सतह पर कम खारा और हल्का आवरण बना देता है, जिससे पानी का ऊर्ध्वाधर मिश्रण रुक जाता है और ऊपरी परत बहुत तेजी से गर्म होती है।
  • कीपाकार खाड़ी की बनावट: बंगाल की खाड़ी का उत्तल और त्रिभुजाकार स्वरूप चक्रवातों को सीधे ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के तटों की ओर मोड़ देता है।
  • टाइफून का पुनर्जीवन: दक्षिण चीन सागर से आने वाले टाइफून म्यांमार और मलय प्रायद्वीप को पार कर बंगाल की खाड़ी में प्रवेश करते ही फिर से तीव्र चक्रवात बन जाते हैं।

२. तूफानी लहरों (Storm Surge) की उत्पत्ति: चक्रवात के समय समुद्र का जल असामान्य रूप से ऊपर उठकर तट पर बाढ़ ला देता है:

  • पवन का खिंचाव दबाव: चक्रवात की १५०-२५० किमी/घंटा की तेज हवाएं समुद्र के जल को किनारे की ओर धकेलती हैं, जिससे उथले तट पर पानी का विशाल ढेर बन जाता है।
  • प्रतिलोम बैरोमीटर प्रभाव: चक्रवात की आंख में वायुदाब अत्यंत कम (लगभग ९२०-९५० मिलीबार) हो जाता है। बाहर का उच्च वायुदाब समुद्र के जल को केंद्र की ओर धकेलता है, जिससे जल गुंबद की तरह ऊपर उठ जाता है।
  • तटीय फनल प्रभाव: उथले बंगाल डेल्टा के संकरे मुहानों में प्रवेश करते ही यह पानी ५ से १० मीटर ऊंची दीवारों के रूप में तटबंधों को तोड़कर बस्तियों में घुस जाता है।
उदाहरण 4
पश्चिम बंगाल के उत्तरी पहाड़ी भाग तथा दक्षिणी राढ़ व सुंदरबन क्षेत्र की प्रमुख प्राकृतिक आपदाओं के कारणों की तुलनात्मक विवेचना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

पश्चिम बंगाल में भू-आकृतिक विषमताओं के कारण उत्तरी और दक्षिणी भागों में भिन्न-भिन्न आपदाएं आती हैं:

१. उत्तरी पर्वतीय एवं डूआर्स क्षेत्र (दार्जिलिंग, कालिम्पोंग, जलपाईगुड़ी):

  • मुख्य आपदाएं: विनाशकारी भूस्खलन तथा नदियों में आकस्मिक बाढ़ (Flash Floods)।
  • कारण:
    • कमजोर शैल संरचना: हिमालय का यह भाग अत्यधिक टूटी-फूटी अवसादी व रूपांतरित शैलों से बना है।
    • अत्यधिक मानसूनी वर्षा: २४ घंटे में २००-३०० मिमी की भारी वर्षा होने से मिट्टी में जलदाब बढ़ जाता है और राष्ट्रीय राजमार्ग १० (NH-10) पर बार-बार भूस्खलन होता है।
    • अवैज्ञानिक निर्माण: सड़क चौड़ीकरण के लिए पहाड़ के निचले भाग को काटना और प्राकृतिक झरनों (झोरा) का अवरुद्ध होना।
    • डूआर्स की बाढ़: तीस्ता, तोर्षा और जलढाका नदियां पहाड़ों से मैदान में उतरते ही भारी गाद जमा करती हैं, जिससे नदी तल उथला होकर बाढ़ लाता है।

२. पश्चिमी राढ़ क्षेत्र एवं दक्षिणी सुंदरबन डेल्टा:

  • मुख्य आपदाएं: राढ़ में बैराजों से छोड़े गए पानी की बाढ़ तथा सुंदरबन में चक्रवात व खारे पानी की तूफानी लहरें।
  • कारण:
    • जलाशयों से जल निकासी: झारखंड के छोटानागपुर पठार पर भारी वर्षा होने पर दामोदर घाटी निगम (DVC) के मैथन व पंचेत बांधों से पानी छोड़ने के कारण निचले दामोदर बेसिन (हावड़ा, हुगली) में भीषण बाढ़ आती है।
    • नदियों में गाद भराव: हुगली व भागीरथी नदी के तल में गाद जमने से जल निकासी क्षमता घट गई है।
    • सुंदरबन में ज्वारीय प्लावन: पूर्णिमा-अमावस्या के ऊंचे ज्वार के साथ चक्रवाती तूफानी लहरें मिलकर मिट्टी के कमजोर तटबंधों को तोड़ देती हैं, जिससे खारा पानी धानी खेतों को बंजर बना देता है।
उदाहरण 5
आपदा प्रबंधन अधिनियम २००५ के अंतर्गत गठित त्रिस्तरीय प्रशासनिक संरचना का वर्णन कीजिए। सेंडाई फ्रेमवर्क (2015-2030) की चार प्रमुख प्राथमिकताओं का उल्लेख कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. आपदा प्रबंधन अधिनियम २००५ का त्रिस्तरीय संस्थागत ढांचा:

  • १. राष्ट्रीय स्तर: NDMA (राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण):
    • अध्यक्ष: पदेन रूप से भारत के प्रधानमंत्री।
    • कार्य: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन नीति तैयार करना, विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों के कार्यों में समन्वय और दिशा-निर्देश जारी करना तथा राष्ट्रीय योजनाएं स्वीकृत करना।
  • २. राज्य स्तर: SDMA (राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण):
    • अध्यक्ष: पदेन रूप से राज्य के मुख्यमंत्री (जैसे—पश्चिम बंगाल SDMA)।
    • कार्य: राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार आपदा योजनाएं तैयार करना तथा विभागों के बजट और राहत कार्यों में समन्वय स्थापित करना।
  • ३. जिला स्तर: DDMA (जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण):
    • अध्यक्ष: जिलाधिकारी (DM / Collector) और सह-अध्यक्ष जिला परिषद अध्यक्ष।
    • कार्य: जमीनी स्तर पर राहत व बचाव कार्यों का नेतृत्व करना, नियंत्रण कक्ष स्थापित करना, राहत शिविर चलाना और त्वरित सहायता पहुंचाना।
  • विशेष प्रतिक्रिया बल: केंद्र में NDRF और राज्यों में SDRF आधुनिकतम तकनीकों से सुसज्जित होकर बचाव कार्य करते हैं।

२. सेंडाई फ्रेमवर्क (Sendai Framework 2015-2030) की चार प्रमुख प्राथमिकताएं:

  • प्राथमिकता १: आपदा जोखिम को समझना: वैज्ञानिक अनुसंधान, जोखिम मानचित्रण और आंकड़ों के विश्लेषण द्वारा आपदा की संभावनाओं का सही आकलन करना।
  • प्राथमिकता २: आपदा जोखिम प्रबंधन हेतु शासन व्यवस्था को सुदृढ़ करना: सभी संस्थाओं के मध्य स्पष्ट जवाबदेही और बेहतर समन्वय स्थापित करना।
  • प्राथमिकता ३: आपदा-रोधी अधोसंरचना में निवेश बढ़ाना: अस्पताल, पुल, स्कूल और भवनों को आपदा-रोधी बनाने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन आवंटित करना।
  • प्राथमिकता ४: पूर्व तैयारी को बढ़ाना और 'Build Back Better' लागू करना: पूर्व चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना और आपदा के बाद पुनर्निर्माण में संरचनाओं को पहले से भी अधिक सुरक्षित और आपदा-रोधी बनाना।
उदाहरण 6
मौसम विभाग (IMD) द्वारा वर्गीकृत प्रमुख प्रकार के सूखे कौन-से हैं? पश्चिम बंगाल के पुरुलिया और बांकुड़ा जैसे सूखा-प्रवण जिलों में दीर्घकालिक जल प्रबंधन के उपाय सुझाइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

१. मौसम विभाग (IMD) के अनुसार सूखे का वर्गीकरण:

  • मौसम वैज्ञानिक सूखा (Meteorological Drought): जब किसी क्षेत्र में मौसमी वर्षा सामान्य से २५% या उससे अधिक कम होती है (२६-५०% कमी पर मध्यम और ५०% से अधिक कमी पर गंभीर सूखा माना जाता है)।
  • जल वैज्ञानिक सूखा (Hydrological Drought): वर्षा की कमी के कारण जब नदियों, तालाबों, जलाशयों का जल सूख जाता है और भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे गिर जाता है।
  • कृषि सूखा (Agricultural Drought): जब मिट्टी में नमी इतनी कम हो जाती है कि पौधों की जड़ें पानी नहीं खींच पातीं और फसलें मुरझाकर नष्ट हो जाती हैं।
  • सामाजिक-आर्थिक सूखा (Socio-Economic Drought): जब पानी और खाद्यान्न के गंभीर अभाव से रोजगार छिन जाता है, भुखमरी फैलती है और लोग पलायन करने लगते हैं।

२. पुरुलिया और बांकुड़ा जिलों में दीर्घकालिक जल प्रबंधन समाधान:

  • वाटरशेड प्रबंधन एवं 'हापा' मॉडल:
    • खेतों के सबसे निचले कोने में छोटे तालाब या 'हापा' खोदकर वर्षा के पानी को संचित करना, जिसका उपयोग मानसून के बाद जीवनरक्षक सिंचाई के रूप में किया जाता है।
    • पहाड़ी नालों पर चेक डैम और गली प्लग बनाकर भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देना।
  • सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation): पारंपरिक बाढ़ सिंचाई के स्थान पर ड्रिप (टपक) और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली अपनाना, जिससे ६०-७०% जल की बचत होती है।
  • कम जल वाली फसलों एवं मिलेट्स की खेती: ग्रीष्मकालीन अत्यधिक जल चाहने वाले बोरो धान के स्थान पर सूखा-रोधी मोटे अनाजों (रागी, ज्वार, बाजरा) तथा दलहनी फसलों (अरहर, चना) की खेती को प्रोत्साहित करना।
  • सामाजिक वानिकी: बंजर लेटराइट भूमियों पर नीम, पलाश, महुआ और शीशम जैसे स्थानीय वृक्ष लगाना ताकि मिट्टी की नमी बनी रहे और वाष्पीकरण कम हो।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

संकट (Hazard) और आपदा (Disaster) को एक ही अर्थ में प्रयुक्त करना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

संकट केवल एक संभावित चरम भौतिक घटना या खतरा है; किंतु जब यह किसी असुरक्षित मानव समाज को व्यापक क्षति पहुंचाता है, तभी वह आपदा कहलाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि प्रायद्वीपीय भारत में कभी भूकंप नहीं आ सकते।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यद्यपि दक्कन का शील्ड अपेक्षाकृत सुरक्षित है, किंतु प्राचीन आंतरिक भ्रंशों के सक्रिय होने से लातूर (1993) और जबलपुर (1997) जैसे विनाशकारी भूकंप आ चुके हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि पश्चिम बंगाल में बाढ़ केवल स्थानीय वर्षा से आती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

दक्षिणी पश्चिम बंगाल (निचला दामोदर बेसिन) में बाढ़ का एक बड़ा कारण झारखंड के पठारी क्षेत्र में भारी वर्षा और DVC बांधों से पानी छोड़ा जाना है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

भारत की प्राकृतिक आपदाएं, संकट एवं आपदा प्रबंधन भूकंपीय क्षेत्र (BIS जोन), चक्रवात, बाढ़-सूखा एवं NDMA संस्थागत ढांचा १. संकट (Hazard) बनाम आपदा (Disaster) • संकट: प्राकृतिक चरम घटना (हानि की आशंका) • आपदा: संकट × सुभेद्यता / सहन क्षमता • सेंडाई फ्रेमवर्क (Sendai 2015-30) लक्ष्य Disaster = (Hazard × Vulnerability) / Capacity २. भूकंपीय पेटियां (BIS ज़ोन) • ज़ोन V (अति उच्च जोखिम): पूर्वोत्तर, कश्मीर, कच्छ • ज़ोन IV (उच्च जोखिम): उत्तरी बंगाल, दिल्ली, बिहार • ज़ोन III (मध्यम जोखिम): कोलकाता व दक्षिण बंगाल • ज़ोन II (न्यून जोखिम): दक्कन का प्राचीन शील्ड आपदा जोखिम न्यूनीकरण चक्र (DRR) १. रोकथाम व शमन २. तैयारी व पूर्व चेतावनी ३. त्वरित बचाव व राहत ४. पुनर्वास व पुनर्निर्माण ३. मौसम वैज्ञानिक आपदाएं • चक्रवात व तूफानी लहरें: बंगाल की खाड़ी • बाढ़: तीस्ता, तोर्षा, कोसी, निचला दामोदर • सूखा: पुरुलिया, मराठवाड़ा, पश्चिमी राजस्थान • भूस्खलन: दार्जिलिंग, कालिम्पोंग व पश्चिमी घाट ४. आपदा प्रबंधन ढांचा (DM Act 2005) • NDMA: राष्ट्रीय स्तर (अध्यक्ष: प्रधानमंत्री) • SDMA: राज्य स्तर (अध्यक्ष: मुख्यमंत्री) • DDMA: जिला स्तर (अध्यक्ष: जिलाधिकारी/DM) • NDRF / SDRF: त्वरित बचाव व राहत बल WBCHSE Class 11 Geography • Natural Hazards & Disasters of India • TargetExams Academic Standard

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
प्राकृतिक संकट जान-माल को क्षति पहुंचाने की क्षमता रखने वाली चरम घटना है, जबकि आपदा तब बनती है जब संकट किसी कमजोर समाज पर कहर बरपाता है।
मुख्य बिंदु 2
आपदा जोखिम संकट और मानवीय सुभेद्यता के गुणनफल के बराबर तथा निपटने की क्षमता का व्युत्क्रमानुपाती होता है: जोखिम = (संकट x सुभेद्यता) / क्षमता।
मुख्य बिंदु 3
भारतीय एवं यूरेशियन प्लेटों की टक्कर (4-5 सेमी/वर्ष) के कारण भारत का 59% भूभाग भूकंप-प्रवण है; BIS IS 1893 देश को ज़ोन II से V में बांटता है।
मुख्य बिंदु 4
ज़ोन V सर्वाधिक भूकंप-संवेदनशील है (पूर्वोत्तर, कच्छ, हिमालय); उत्तरी बंगाल ज़ोन IV तथा दक्षिणी बंगाल/कोलकाता ज़ोन III में आते हैं।
मुख्य बिंदु 5
मानसूनी वर्षा के मौसमी संकेंद्रण और हिमालयी गाद भराव के कारण भारत में प्रतिवर्ष 4 करोड़ हेक्टेयर भूमि बाढ़ग्रस्त होती है (कोसी 'बिहार का शोक' व ब्रह्मपुत्र)।
मुख्य बिंदु 6
पश्चिम बंगाल में उत्तर में तीस्ता-तोर्षा की आकस्मिक बाढ़, पश्चिम में निचले दामोदर बेसिन की बाढ़ तथा दक्षिण में सुंदरबन का लवणीय जलभराव होता है।
मुख्य बिंदु 7
गर्म समुद्री जल (>28°C), मीठे पानी की हल्की परत और कीपाकार तट के कारण बंगाल की खाड़ी में अरब सागर से 4 गुना अधिक चक्रवात आते हैं।
मुख्य बिंदु 8
सुंदरबन के निचले द्वीपों में 5-10 मीटर ऊंची तूफानी लहरें तटबंधों को तोड़कर हजारों एकड़ उपजाऊ भूमि को खारा और बंजर बना देती हैं।
मुख्य बिंदु 9
दार्जिलिंग और कालिम्पोंग (NH-10) में अत्यधिक वर्षा और अवैज्ञानिक पहाड़ी कटाई के कारण मानसूनी ऋतु में बार-बार भीषण भूस्खलन होते हैं।
मुख्य बिंदु 10
आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के माध्यम से भारत ने NDMA, SDMA, DDMA और सेंडाई फ्रेमवर्क (2015-2030) पर आधारित सक्रिय जोखिम न्यूनीकरण प्रणाली अपनाई है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
2
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
3
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
4
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
5
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

ऑनलाइन CBT टेस्ट देकर तैयारी का मूल्यांकन करें

झारखण्ड बोर्ड परीक्षा पैटर्न पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्नों का ऑनलाइन टेस्ट दें। तुरंत परिणाम, समय विश्लेषण और प्रत्येक प्रश्न का विस्तृत हल प्राप्त करें।

कक्षा 11 Geography के सभी अध्याय

अध्याय 1: एक विषय के रूप में भूगोल अध्याय 2: पृथ्वी की उत्पत्ति एवं आंतरिक संरचना अध्याय 3: भू-आकृतिक प्रक्रियाएं अध्याय 4: मौसम एवं जलवायु अध्याय 5: समस्थिति की संकल्पना अध्याय 6: जलमंडल अध्याय 7: मानव भूगोल का क्षेत्र एवं विषय-वस्तु अध्याय 8: आर्थिक भूगोल अध्याय 9: Secondary Activities - Industry अध्याय 10: तृतीयक क्रियाकलाप अध्याय 11: चतुर्थक क्रियाकलाप अध्याय 12: पंचमक क्रियाकलाप अध्याय 13: एक देश के रूप में भारत अध्याय 14: भारत की संरचना एवं भू-आकृति अध्याय 15: भारत का अपवाह तंत्र अध्याय 16: भारत की जलवायु अध्याय 17: भारत के वन एवं प्राकृतिक वनस्पति अध्याय 18: भारत की प्राकृतिक आपदाएं एवं संकट

AI अध्ययन मित्र

त्वरित शंका समाधान

भारत की प्राकृतिक आपदाएं एवं संकट में कोई संदेह या प्रश्न है? हमारे AI अध्ययन मित्र से तुरंत समझें।