14-15 अगस्त 1947 की रात को पंडित नेहरू के प्रसिद्ध भाषण 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' के साथ स्वतंत्र भारत का जन्म हुआ। परंतु आज़ादी के उत्सव के साथ ही नवजात राष्ट्र के सामने तीन विकराल चुनौतियाँ उपस्थित थीं:
| चुनौती | गंभीरता एवं विस्तृत विश्लेषण |
|---|---|
| 1. एकता और अखंडता बनाए रखने की चुनौती | भारत एक उपमहाद्वीप के समान विशाल था, जिसमें सैकड़ों भाषाएं, अनगिनत बोलियां, विभिन्न धर्म और परस्पर विरोधी सांस्कृतिक अस्मिताएं थीं। विभाजन के खूनी माहौल में सबसे बड़ा प्रश्न यह था: "क्या इतनी विविधताओं से भरा देश एक राष्ट्र के रूप में एकजुट रह पाएगा?" देश को आंतरिक विखंडन से बचाना सर्वोच्च प्राथमिकता थी। |
| 2. लोकतंत्र को स्थापित करने की चुनौती | संविधान सभा ने संसदीय शासन प्रणाली और 'सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार' पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया। उस समय 85% से अधिक भारतीय आबादी निरक्षर थी और घोर निर्धनता में जी रही थी। दुनिया के कई पश्चिमी आलोचकों का मानना था कि "लोकतंत्र केवल धनी और साक्षर पश्चिमी देशों में ही चल सकता है; भारत में यह एक आत्मघाती प्रयोग सिद्ध होगा।" |
| 3. समतामूलक और समावेशी विकास की चुनौती | संविधान में 'राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों' के अंतर्गत यह स्पष्ट किया गया कि विकास का लाभ केवल मुट्ठी भर अमीरों तक सीमित नहीं रहेगा। सदियों से शोषित दलितों, आदिवासियों और धार्मिक-भाषाई अल्पसंख्यकों का उत्थान करना तथा देश से भुखमरी, अकाल और बेरोजगारी को समाप्त करना एक अत्यंत दुरूह कार्य था। |