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CBSE • कक्षा XII • Political Science • अध्याय 15
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

भारतीय राजनीति: नए बदलाव

1989 का आम चुनाव स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास का सबसे बड़ा 'मोड़ बिंदु' (Turning Point) साबित हुआ। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस को लोकसभा की अभूतपूर्व 415 सीटें मिली थीं, परंतु ठीक पाँच वर्ष बाद 1989 में कांग्रेस मात्र 197 सीटों पर सिमट गई। इसी के साथ भारतीय राजनीति से लगभग चार दशकों तक चले 'कांग्रेस प्रणाली' (Congress System) का निर्णायक अंत हो गया और देश एक नए, बहुदलीय एवं अप्रत्याशित 'गठबंधन के युग' (Era of Coalitions) में प्रविष्ट हुआ। 1990 के दशक ने भारतीय राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज की दशा व दिशा को बुनियादी रूप से बदल कर रख दिया। इस दशक में पाँच युगांतरकारी परिघटनाएं घटीं: (1) कांग्रेस के एकछत्र प्रभुत्व का खात्मा और केंद्र में मिली-जुली सरकारों का दौर, (2) वी.पी. सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करना और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तथा दलितों की राजनीति का अभूतपूर्व उत्थान, (3) 1991 में पी.वी. नरसिम्हा राव और डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा नई आर्थिक नीति (LPG: उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण) का शुभारंभ, (4) अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का विध्वंस और इसके इर्द-गिर्द हिंदुत्व व धर्मनिरपेक्षता की तीखी बहस, और (5) 21 मई 1991 को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की नृशंस हत्या। 1989 से 2014 तक के ढाई दशकों में केंद्र में किसी भी एक राजनीतिक दल को अपने दम पर लोकसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। राष्ट्रीय मोर्चा, संयुक्त मोर्चा, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA - अटल बिहारी वाजपेयी) और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA - डॉ. मनमोहन सिंह) जैसी गठबंधन सरकारों ने सिद्ध किया कि गठबंधन भारतीय लोकतंत्र की मजबूरी नहीं, बल्कि विविधतापूर्ण देश में जन-आकांक्षाओं के प्रतिनिधित्व की सबसे सशक्त व्यवस्था है। 2014 और 2019 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को पूर्ण बहुमत मिला, किंतु तब भी सरकार 'NDA गठबंधन' के रूप में ही चलाई गई। इसके अतिरिक्त, इस पूरे वैचारिक टकराव के बीच 1990 के बाद भारतीय राजनीति में चार प्रमुख बिंदुओं पर एक अभूतपूर्व 'राजनीतिक सहमति' (Growing Consensus) भी विकसित हुई—नई आर्थिक नीतियों का सर्वदलीय समर्थन, पिछड़े वर्गों के राजनीतिक आरक्षण की स्वीकृति, राष्ट्रीय शासन में क्षेत्रीय दलों की अपरिहार्यता, और विचारधारा की जगह विकास व जनकल्याणकारी नीतियों को प्राथमिकता। झारखंड बोर्ड (CBSE Class 12) राजनीति विज्ञान की बोर्ड परीक्षा में यह अध्याय अत्यंत उच्च अंक भार (8 से 10 अंक) रखता है। इसमें 1990 के दशक के पाँच बड़े बदलाव, मंडल आयोग की सिफारिशें व प्रभाव, गठबंधन सरकारों की विशेषताएं व चुनौतियाँ, और 1990 के बाद उभरी चार सहमतियों पर लघु व दीर्घ उत्तरीय प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।

⚡ क्या आपको पता है: भारत में 25 वर्षों (1989-2014) तक किसी भी एक दल को बहुमत नहीं मिला, फिर भी देश दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती महाशक्ति कैसे बन गया?

1989 के चुनाव परिणाम जब आए, तो विश्लेषकों ने सिर पकड़ लिया—किसी एक पार्टी के पास 272 का जादुई आंकड़ा नहीं था! 1989 से 1998 के मात्र 9 सालों में भारत ने 6 प्रधानमंत्री (वी.पी. सिंह, चंद्रशेखर, पी.वी. नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी, एच.डी. देवेगौड़ा और आई.के. गुजराल) देख डाले। 1996 में वाजपेयी जी की सरकार मात्र 13 दिन में गिर गई! आलोचकों ने कहा कि "भारत एक अस्थिर और असफल लोकतंत्र बनने जा रहा है।" परंतु हुआ इसका ठीक उल्टा! इसी 'गठबंधन के दौर' में भारत ने 1991 में अपनी अर्थव्यवस्था को खोलकर दुनिया का आईटी हब बना दिया, 1998 में पोखरण-2 में परमाणु परीक्षण कर दुनिया को चौंकाया, और समाज के सबसे निचले तबके (ओबीसी और दलितों) के नेताओं ने दिल्ली की सत्ता की चाबी अपने हाथों में ले ली! जब दो धुर विरोधी पार्टियाँ (वामपंथी और भाजपा) एक साथ मिलकर वी.पी. सिंह की सरकार चला सकती थीं, तो समझ जाइए कि भारतीय लोकतंत्र कितना लचीला और अद्भुत है! आइए, भारत की समकालीन राजनीति के इन तूफानी और निर्णायक बदलावों का सजीव अध्ययन करें!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

इस अध्याय का अध्ययन आपके लिए क्यों अनिवार्य है?

  1. बोर्ड परीक्षा में उच्च स्कोरिंग: CBSE कक्षा 12वीं में "1990 के दशक की भारतीय राजनीति के 5 बड़े बदलाव", "मंडल आयोग: उद्देश्य, सिफारिशें एवं प्रभाव", "गठबंधन सरकारों के गुण व दोष", और "उभरती हुई राजनीतिक सहमति" पर सीधे 6 अंक के प्रश्न पूछे जाते हैं।
  2. समकालीन भारतीय राजनीति की व्यावहारिक समझ: वर्तमान भारत की दलीय व्यवस्था, एनडीए (NDA) बनाम इंडिया गठबंधन, ओबीसी राजनीति, जाति जनगणना की माँगें और आर्थिक नीतियों की जड़ें इसी अध्याय में समाहित हैं।
  3. प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC, JPSC, SSC) का अनिवार्य स्तंभ: मंडल आयोग (द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग), इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ वाद (1992), 73वां/74वां संशोधन, लिबरहान आयोग, और गठबंधन संघवाद के सिद्धांत भारतीय राजनीति विज्ञान के सर्वाधिक पूछे जाने वाले प्रश्न हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • कांग्रेस प्रणाली का स्वरूप: प्रथम तीन आम चुनावों में कांग्रेस का एकछत्र वर्चस्व और 1977 का पहला गैर-कांग्रेसी प्रयोग।

  • 1984 का आम चुनाव: इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस को 415 सीटों का ऐतिहासिक प्रचंड बहुमत।

  • संविधान का अनुच्छेद 340: सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति की जांच के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग गठित करने का राष्ट्रपति का अधिकार।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • 1989 के बाद भारतीय राजनीति की दिशा बदलने वाले पाँच युगांतरकारी बदलावों का सविस्तार विश्लेषण कर सकेंगे।
  • कांग्रेस प्रणाली के पतन और 1989 से 2014 तक के गठबंधन युग (National Front, United Front, NDA, UPA) के उत्थान व कार्यप्रणाली को समझ सकेंगे।
  • मंडल आयोग (द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग) की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, मुख्य सिफारिशों, वी.पी. सिंह के निर्णय और देशव्यापी प्रभाव का मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • 1991 की नई आर्थिक नीतियों (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण - LPG) के राजनीतिक एवं सामाजिक निहितार्थों की व्याख्या कर सकेंगे।
  • अयोध्या विवाद, 6 दिसंबर 1992 के घटनाक्रम, धर्मनिरपेक्षता पर उठने वाली बहसों और 2019 के न्यायिक समाधान का निष्पक्ष परीक्षण कर सकेंगे।
  • 1990 के दशक के तीखे मतभेदों के बावजूद सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच उभरी चार मुख्य सहमतियों को स्पष्ट कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. 1990 के दशक की भारतीय राजनीति के...
2 2. गठबंधन का युग: 1989 से 2014 तक क...
3 3. अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की राजनीत...
4 4. धर्मनिरपेक्षता, सांप्रदायिकता और...
5 5. उभरती हुई राजनीतिक सहमति (Growin...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. 1990 के दशक की भारतीय राजनीति के पाँच बड़े बदलाव (Five Major Developments)

1989 के चुनाव के बाद भारत की राजनीति में पाँच ऐसे अभूतपूर्व परिवर्तन आए, जिन्होंने आज तक की भारतीय राजनीतिक संरचना को पूरी तरह बदल कर रख दिया। CBSE बोर्ड परीक्षा में यह प्रश्न 6 अंकों के लिए अत्यंत लोकप्रिय है:

  1. 1. कांग्रेस प्रणाली का अंत (End of the Congress System):
    1952 से 1989 तक (1977 के ढाई साल के अपवाद को छोड़कर) केंद्र में कांग्रेस की ही निर्विवाद सरकार रही थी। 1989 में कांग्रेस 197 सीटों पर सिमट गई और यद्यपि वह सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन उसने विपक्ष में बैठने का फैसला किया। 1989 के बाद किसी एक पार्टी का वर्चस्व समाप्त हो गया और बहुदलीय गठबंधन राजनीति का दौर शुरू हुआ।
  2. 2. 'मंडल मुद्दा' और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की राजनीति का उभार:
    अगस्त 1990 में राष्ट्रीय मोर्चा के प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने केंद्रीय सरकारी नौकरियों में 'अन्य पिछड़ा वर्ग' (Other Backward Classes - OBC) के लिए 27% आरक्षण लागू करने की घोषणा कर दी। इसके बाद देश भर में भीषण छात्र आंदोलन, आत्मदाह और हिंसा हुई। इस फैसले ने भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय और पिछड़ी जातियों (यादव, कुर्मी, कोइरी, जाट आदि) को सत्ता का केंद्रबिंदु बना दिया।
  3. 3. नई आर्थिक नीतियाँ (New Economic Policy - 1991):
    1991 में भारत भयंकर भुगतान संतुलन संकट (विदेशी मुद्रा भंडार मात्र 2 सप्ताह के आयात लायक बचा था) में फँस गया। प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने समाजवाद-प्रेरित 'लाइसेंस-परमिट राज' को समाप्त कर LPG (Liberalisation, Privatisation, Globalisation) यानी उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों को अपनाया, जिससे भारत की विकास दर 8-9% तक पहुँची।
  4. 4. अयोध्या विवाद और हिंदुत्व की राजनीति का उदय:
    दिसंबर 1992 में अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे का विध्वंस हुआ। इस घटना ने देश में धर्मनिरपेक्षता बनाम राष्ट्रवाद की एक तीखी बहस को जन्म दिया। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) का एक प्रमुख राष्ट्रीय दल के रूप में तीव्र उत्थान हुआ।
  5. 5. राजीव गांधी की हत्या (21 मई 1991):
    तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में चुनावी सभा के दौरान श्रीलंकाई तमिल उग्रवादी संगठन LTTE के आत्मघाती हमलावर ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी। इसके परिणामस्वरूप कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के नेता पी.वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने और कांग्रेस ने नए नेतृत्व में कार्य करना शुरू किया।
📌 परीक्षा उपयोगी निष्कर्ष: इन पाँच बदलावों ने भारतीय राजनीति को 'एक-दलीय प्रभुत्व' से 'बहुदलीय प्रतिस्पर्धी संघवाद' में रूपांतरित कर दिया।

2. गठबंधन का युग: 1989 से 2014 तक का राजनीतिक सफ़र

(क) गठबंधन सरकारों का ऐतिहासिक कालक्रम

1989 के बाद केंद्र में विभिन्न विचारधाराओं वाले दलों ने मिलकर सरकारें बनाईं। इसका विस्तृत विवरण निम्न तालिका में प्रस्तुत है:

गठबंधन का नाम कार्यकाल एवं प्रधानमंत्री प्रमुख घटक दल बाहरी/महत्वपूर्ण समर्थन
राष्ट्रीय मोर्चा (National Front) 1989 - 1990
(विश्वनाथ प्रताप सिंह)
जनता दल, तेलुगु देशम, असम गण परिषद, द्रमुक अभूतपूर्व प्रयोग: दक्षिणपंथी भाजपा और वामपंथी लेफ्ट फ्रंट दोनों ने बाहर से समर्थन दिया!
राष्ट्रीय मोर्चा (चंद्रशेखर) 1990 - 1991
(चंद्रशेखर)
समाजवादी जनता पार्टी (सजपा - 64 सांसद) कांग्रेस (आई) द्वारा बाहर से समर्थन (मात्र 4 माह बाद समर्थन वापस लिया)।
कांग्रेस अल्पमत सरकार 1991 - 1996
(पी.वी. नरसिम्हा राव)
कांग्रेस (आई) झामुमो व अन्य छोटे दलों के समर्थन से पूरे 5 वर्ष सरकार चलाई।
संयुक्त मोर्चा (United Front) 1996 - 1998
(एच.डी. देवेगौड़ा, आई.के. गुजराल)
जनता दल, वाम मोर्चा, द्रमुक, तेदेपा, अगप, सपा कांग्रेस (आई) द्वारा बाहर से समर्थन (1989 की तरह भाजपा को सत्ता से बाहर रखने हेतु)।
राजग (NDA - I & II) 1998 - 2004
(अटल बिहारी वाजपेयी)
भाजपा, अन्नाद्रमुक/द्रमुक, तृणमूल, समता पार्टी, बीजद, अकाली दल प्रथम गैर-कांग्रेसी गठबंधन जिसने अपना 5 वर्ष का कार्यकाल (1999-2004) पूरा किया।
संप्रग (UPA - I & II) 2004 - 2014
(डॉ. मनमोहन सिंह)
कांग्रेस, राजद, द्रमुक, राकांपा, झामुमो आदि UPA-I (2004-2008) को वाम मोर्चे का बाहर से समर्थन (परमाणु समझौते पर वापस लिया)।
राजग (NDA - III & IV) 2014 - वर्तमान
(नरेंद्र मोदी)
भाजपा (स्वयं पूर्ण बहुमत: 282 व 303) + सहयोगी दल 'बहुमत युक्त गठबंधन' (Surplus Majority Coalition): भाजपा को अकेले बहुमत मिला किंतु उसने सहयोगियों को मंत्रिमंडल में बनाए रखा।

(ख) गठबंधन राजनीति की प्रमुख विशेषताएं एवं प्रभाव

  • क्षेत्रीय दलों का राष्ट्रीय महत्व: किसी भी राष्ट्रीय पार्टी को बहुमत न मिलने के कारण तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, अन्नाद्रमुक, बीजद, राजद, जदयू जैसी क्षेत्रीय पार्टियाँ केंद्र में 'किंगमेकर' बन गईं।
  • सहयोगात्मक संघवाद का सुदृढ़ीकरण: केंद्र सरकार अब राज्यों की अनदेखी नहीं कर सकती थी, क्योंकि राज्य स्तरीय दल ही केंद्र सरकार की जीवनरेखा थे। अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का दुरुपयोग लगभग बंद हो गया।
  • न्यूनतम साझा कार्यक्रम (Common Minimum Programme - CMP): विभिन्न विरोधी विचारधारा वाले दल एक साझा नीतिगत समझौते (CMP) के तहत काम करने लगे, जिससे कट्टरवादी मुद्दों को दरकिनार कर व्यावहारिक शासन पर बल दिया गया।

3. अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की राजनीति एवं मंडल आयोग

(क) मंडल आयोग की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत राष्ट्रपति को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति की जांच हेतु आयोग गठित करने की शक्ति प्राप्त है:

  • प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग (1953): काका कालेलकर की अध्यक्षता में गठित हुआ, परंतु इसकी रिपोर्ट को केंद्र सरकार द्वारा ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
  • द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग (1978-79): 1977 में बनी मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार ने 1 जनवरी 1979 को बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल (बी.पी. मंडल) की अध्यक्षता में दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग नियुक्त किया। इसीलिए इसे 'मंडल आयोग' (Mandal Commission) कहा जाता है।

(ख) मंडल आयोग की प्रमुख सिफारिशें

आयोग ने दिसंबर 1980 में अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी, जिसमें निम्नलिखित प्रमुख निष्कर्ष व सिफारिशें थीं:

  1. जनसंख्या अनुपात: आयोग के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या में अनुसूचित जातियों (SC) और जनजातियों (ST) के अतिरिक्त लगभग 52% आबादी अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) की थी।
  2. 27% आरक्षण की सिफारिश: चूँकि सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% तय कर रखी थी, और SC/ST को पहले से 22.5% आरक्षण प्राप्त था, अतः मंडल आयोग ने केंद्र सरकार की नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में OBC के लिए 27% आरक्षण की सिफारिश की।
  3. भूमि सुधार: पिछड़ी जातियों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए भूमि सुधारों को कठोरता से लागू करने की सिफारिश की गई।

(ग) 1990 का फैसला और इंदिरा साहनी केस (1992)

10 वर्षों तक ठंडे बस्ते में रहने के बाद 7 अगस्त 1990 को राष्ट्रीय मोर्चा के प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने संसद में मंडल आयोग की 27% आरक्षण की सिफारिश को केंद्रीय नौकरियों में लागू करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया:

  • देशव्यापी विरोध एवं हिंसक आंदोलन: उत्तर भारत के शहरों में सामान्य वर्ग के छात्रों ने उग्र आंदोलन किया। जगह-जगह बसों में आग लगाई गई और अनेक छात्रों (उदा. दिल्ली के राजीव गोस्वामी) ने आरक्षण के विरोध में आत्मदाह का प्रयास किया।
  • इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ वाद (1992 - मंडल केस): सर्वोच्च न्यायालय के 9 जजों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक निर्णय सुनाया:
    • न्यायालय ने 27% OBC आरक्षण को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया।
    • क्रीमी लेयर (Creamy Layer) का सिद्धांत: संपन्न और उच्च आय वाले पिछड़े वर्ग के लोगों को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने का आदेश दिया।
    • कुल आरक्षण की सीमा किसी भी स्थिति में 50% से अधिक नहीं हो सकती।
    • पदोन्नति (Promotion) में आरक्षण लागू नहीं होगा।

(घ) बहुजन राजनीति और कांशीराम का उदय

मंडल आंदोलन के समानांतर दलितों और पिछड़ों के राजनीतिक सशक्तिकरण की एक नई लहर पैदा हुई:

  • बामसेफ (BAMCEF - 1978): मान्यवर कांशीराम ने पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय के कर्मचारियों का संगठन (Backward and Minority Communities Employees Federation) बनाया।
  • डीएस-4 (DS-4 - 1981): दलित शोषित समाज संघर्ष समिति का गठन।
  • बहुजन समाज पार्टी (BSP - 1984): 14 अप्रैल 1984 को कांशीराम ने बसपा का गठन किया। 1995 में सुश्री मायावती उत्तर प्रदेश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं। इस आंदोलन ने दलितों में 'याचक नहीं, शासक बनो' का गहरा आत्मसम्मान जगाया।

4. धर्मनिरपेक्षता, सांप्रदायिकता और अयोध्या विवाद

(क) शाह बानो केस (1985) और राजनीतिक ध्रुवीकरण

1985 में सर्वोच्च न्यायालय ने 62 वर्षीय तलाकशुदा मुस्लिम महिला शाह बानो के पक्ष में फैसला सुनाते हुए आपराधिक दंड संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत उनके पूर्व पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया।

  • रूढ़िवादी मुस्लिम संगठनों ने इसे शरिया (मुस्लिम पर्सनल लॉ) में हस्तक्षेप माना और कड़ा विरोध किया।
  • राजीव गांधी सरकार ने दबाव में आकर 1986 में 'मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986' पारित कर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को निष्प्रभावी कर दिया।
  • विपक्षी दलों, विशेषकर भाजपा ने इसे 'तुष्टिकरण की राजनीति' (Appeasement Politics) और 'छद्म धर्मनिरपेक्षता' (Pseudo-Secularism) करार दिया।

(ख) अयोध्या विवाद और बाबरी मस्जिद विध्वंस (1992)

अयोध्या विवाद 16वीं शताब्दी में मीर बाकी द्वारा निर्मित बाबरी मस्जिद से संबंधित था, जिसे हिंदू समुदाय भगवान श्रीराम का जन्मस्थान मानता था:

  1. 1986 में ताला खुलना: फैजाबाद जिला अदालत के आदेश पर विवादित स्थल के ताले खोले गए और हिंदुओं को पूजा-अर्चना की अनुमति दी गई। इसके बाद विश्व हिंदू परिषद (VHP) और भाजपा ने राम मंदिर निर्माण हेतु देशव्यापी अभियान शुरू किया।
  2. रथ यात्रा (1990): भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक 'राम रथ यात्रा' निकाली, जिससे पूरे देश में हिंदुत्व की राजनीति का अभूतपूर्व प्रसार हुआ। बिहार में लालू प्रसाद यादव की सरकार ने आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया, जिसके विरोध में भाजपा ने वी.पी. सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई।
  3. 6 दिसंबर 1992 का विध्वंस: हजारों 'कारसेवकों' ने अयोध्या में एकत्रित होकर सुरक्षा घेरा तोड़ दिया और बाबरी मस्जिद के तीनों गुंबदों को गिरा दिया।
    • केंद्र सरकार (नरसिंह राव) ने उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार सहित भाजपा शासित 4 राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया।
    • देश के कई शहरों (मुंबई, सूरत आदि) में भीषण सांप्रदायिक दंगे भड़के।
    • घटना की जांच के लिए जस्टिस लिबरहान आयोग का गठन किया गया।
  4. 9 नवंबर 2019 का सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय: चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से विवादित 2.77 एकड़ भूमि रामलला विराजमान (ट्रस्ट) को मंदिर निर्माण हेतु देने और मुस्लिम पक्ष (सुन्नी वक्फ बोर्ड) को अयोध्या में ही मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ वैकल्पिक भूमि देने का ऐतिहासिक अंतिम निर्णय सुनाया।

5. उभरती हुई राजनीतिक सहमति (Growing Consensus in Indian Politics)

1990 के दशक के घोर वैचारिक मतभेदों और राजनीतिक अस्थिरता के बीच भी भारतीय राजनीति में चार प्रमुख बिंदुओं पर एक व्यापक सर्वदलीय सहमति विकसित हुई, जो बोर्ड परीक्षा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है:

सहमति का क्षेत्र सहमति का वास्तविक अर्थ एवं प्रभाव
1. नई आर्थिक नीतियों पर आम सहमति यद्यपि विभिन्न दल (वामपंथियों को छोड़कर) विपक्ष में रहकर निजीकरण और विदेशी निवेश की आलोचना करते हैं, लेकिन सत्ता में आने पर कांग्रेस, भाजपा, राजद, सपा, तृणमूल आदि सभी दल 1991 के आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाते हैं। इस पर सर्वसम्मति है कि आर्थिक वृद्धि ही गरीबी उन्मूलन का मार्ग है।
2. पिछड़े वर्गों (OBC) के राजनीतिक सशक्तिकरण पर सहमति आज भारत का कोई भी राजनीतिक दल मंडल आयोग या ओबीसी आरक्षण का विरोध करने का साहस नहीं कर सकता। सभी दलों ने स्वीकार कर लिया है कि सत्ता में पिछड़ी जातियों की आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी होना सामाजिक न्याय की अनिवार्य शर्त है।
3. प्रांतीय/क्षेत्रीय दलों की स्वीकार्यता पर सहमति यह मान लिया गया है कि केंद्र में स्थिर सरकार चलाने के लिए क्षेत्रीय दलों की भागीदारी अपरिहार्य है। अब राष्ट्रीय दल क्षेत्रीय दलों को प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि राष्ट्रीय शासन का अभिन्न साझेदार मानते हैं।
4. विचारधारा के स्थान पर कार्यसाधकता (Pragmatism over Ideology) राजनीतिक दल अब कट्टर वैचारिक आग्रहों को छोड़कर सत्ता प्राप्ति और विकास व जनकल्याणकारी योजनाओं (डीबीटी, मुफ्त राशन, बिजली, आवास, रोजगार गारंटी) पर ध्यान केंद्रित करते हैं। गठबंधन अब वैचारिक समानता के बजाय चुनावी अंकगणित के आधार पर बनते हैं।
🎯 अध्याय का निष्कर्ष: 1989 से प्रारंभ हुआ राजनीतिक संक्रमण दर्शाता है कि भारतीय लोकतंत्र अत्यधिक परिपक्व, लचीला और समावेशी है। सत्ता अब कुछ संभ्रांत लोगों के हाथ में न रहकर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच चुकी है।

महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक सिद्धांत एवं कालक्रम

1978 (दिसंबर)
जनता पार्टी सरकार द्वारा द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग (बी.पी. मंडल आयोग) की नियुक्ति।
1980 (दिसंबर)
मंडल आयोग द्वारा राष्ट्रपति को रिपोर्ट प्रस्तुत; OBC के लिए 27% आरक्षण की सिफारिश।
1984 (14 अप्रैल)
मान्यवर कांशीराम द्वारा बहुजन समाज पार्टी (बसपा - BSP) की स्थापना।
1985
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शाह बानो मामले में ऐतिहासिक गुजारा भत्ता निर्णय।
1986
संसद द्वारा मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम पारित; फैजाबाद कोर्ट द्वारा बाबरी मस्जिद के ताले खोलने का आदेश।
1989 (नवंबर)
9वां आम चुनाव: कांग्रेस की पराजय (197 सीटें); "कांग्रेस प्रणाली" का निर्णायक अंत।
1989 (दिसंबर)
वी.पी. सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार का गठन (भाजपा और वाम दलों का बाहर से समर्थन)।
1990 (7 अगस्त)
प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह द्वारा केंद्रीय नौकरियों में मंडल आयोग (27% OBC आरक्षण) लागू करने की घोषणा।
1990 (सितंबर-अक्टूबर)
लालकृष्ण आडवाणी की राम रथ यात्रा; समस्तीपुर में गिरफ्तारी; भाजपा द्वारा समर्थन वापसी से वी.पी. सिंह सरकार का पतन।
1991 (21 मई)
तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में LTTE के आत्मघाती हमले में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या।
1991 (जून-जुलाई)
पी.वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने; डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा ऐतिहासिक नई आर्थिक नीति (LPG) लागू।
1992 (16 नवंबर)
इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ केस (मंडल केस): सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 27% OBC आरक्षण वैध घोषित, क्रीमी लेयर नियम लागू।
1992 (6 दिसंबर)
अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद ढांचे का विध्वंस; देशव्यापी सांप्रदायिक दंगे।
1996 (मई)
11वां आम चुनाव: भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी; अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार; संयुक्त मोर्चा (देवेगौड़ा) सरकार का गठन।
1998 (मार्च)
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार का गठन; पोखरण-2 परमाणु परीक्षण।
1999 - 2004
NDA-II सरकार: प्रथम गैर-कांग्रेसी गठबंधन जिसने सफलतापूर्वक अपना 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा किया।
2002 (फरवरी-मार्च)
गोधरा ट्रेन अग्निकांड और उसके बाद गुजरात में भीषण सांप्रदायिक हिंसा।
2004 - 2014
डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA I & II) का 10 वर्षीय शासनकाल (RTI, मनरेगा, RTE लागू)।
2014 (मई)
16वां आम चुनाव: 30 वर्षों बाद भाजपा को 282 सीटों का पूर्ण बहुमत; नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने (NDA-III)।
2019 (9 नवंबर)
सर्वोच्च न्यायालय की 5 जजों की संविधान पीठ द्वारा अयोध्या विवाद पर अंतिम ऐतिहासिक निर्णय।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1 (अति लघु उत्तरीय - 1 अंक): मंडल आयोग के अध्यक्ष कौन थे और इस आयोग का गठन किस वर्ष किया गया था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
मंडल आयोग (द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग) के अध्यक्ष बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल (बी.पी. मंडल) थे। इस आयोग का गठन तत्कालीन जनता पार्टी सरकार द्वारा 1 जनवरी 1979 को संविधान के अनुच्छेद 340 के अंतर्गत किया गया था।
उदाहरण 2
प्रश्न 2 (लघु उत्तरीय - 2 अंक): 1989 के चुनाव को भारतीय राजनीतिक इतिहास में एक युगांतरकारी मोड़ क्यों माना जाता है? कोई दो कारण लिखिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
1989 के आम चुनाव को भारतीय राजनीति का युगांतरकारी मोड़ बिंदु माना जाता है क्योंकि:
  1. कांग्रेस प्रणाली का अंत: 1952 से लगातार चले आ रहे कांग्रेस के एकछत्र प्रभुत्व का अंत हो गया और किसी भी एक राजनीतिक दल को अपने दम पर लोकसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला।
  2. गठबंधन राजनीति की शुरुआत: केंद्र में बहुदलीय गठबंधन सरकारों (Coalition Governments) के उस दौर की शुरुआत हुई जो अगले 25 वर्षों (2014 तक) तक अनवरत चला।
उदाहरण 3
प्रश्न 3 (लघु उत्तरीय - 4 अंक): सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक "इंदिरा साहनी केस" (1992) के चार प्रमुख निर्णय क्या थे?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992 - जिसे 'मंडल केस' भी कहा जाता है) में सर्वोच्च न्यायालय की 9 जजों की संविधान पीठ ने निम्नलिखित चार ऐतिहासिक निर्णय दिए:
  • 27% OBC आरक्षण की वैधता: न्यायालय ने केंद्र सरकार द्वारा अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) को दिए गए 27% आरक्षण को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया।
  • 'क्रीमी लेयर' (मलाईदार परत) का सिद्धांत: पिछड़े वर्गों में से आर्थिक और सामाजिक रूप से संपन्न व्यक्तियों (क्रीमी लेयर) को आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाना चाहिए।
  • 50% की अधिकतम सीमा: विशेष परिस्थितियों को छोड़कर किसी भी स्थिति में कुल आरक्षण की सीमा 50% से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  • पदोन्नति में आरक्षण नहीं: आरक्षण केवल प्रारंभिक नियुक्तियों में लागू होगा, पदोन्नति (Promotions) में नहीं।
उदाहरण 4
प्रश्न 4 (दीर्घ उत्तरीय - 6 अंक): 1990 के दशक में भारतीय राजनीति को बुनियादी रूप से बदलने वाले पाँच प्रमुख बदलावों का सविस्तार वर्णन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
1990 के दशक में भारतीय राजनीति के क्षितिज पर पाँच युगांतरकारी बदलाव आए जिन्होंने समकालीन भारत की नींव रखी:
  1. कांग्रेस प्रणाली का अंत एवं गठबंधन का युग: 1989 के चुनाव में कांग्रेस की पराजय के साथ चार दशक पुरानी 'कांग्रेस प्रणाली' समाप्त हो गई। इसके बाद राष्ट्रीय मोर्चा, संयुक्त मोर्चा, राजग (NDA) और संप्रग (UPA) जैसी मिली-जुली सरकारों का दौर आया, जिसमें क्षेत्रीय दलों की भूमिका केंद्र में निर्णायक हो गई।
  2. मंडल आयोग का क्रियान्वयन एवं अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का राजनीतिक उभार: अगस्त 1990 में वी.पी. सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशों के तहत सरकारी नौकरियों में OBC को 27% आरक्षण दिया गया। इसने भारतीय राजनीति को जातिगत और सामाजिक न्याय के धरातल पर पुनर्गठित किया, जिससे पिछड़ी जातियों का सत्ता पर प्रभाव निर्णायक रूप से बढ़ा।
  3. 1991 की नई आर्थिक नीतियाँ (LPG Reforms): 1991 के गंभीर विदेशी मुद्रा संकट के बाद नरसिम्हा राव सरकार ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) का मार्ग अपनाया। इससे समाजवादी अर्थव्यवस्था का स्थान बाजार-उन्मुख अर्थव्यवस्था ने ले लिया और भारत का मध्यम वर्ग तेजी से उभरा।
  4. अयोध्या विवाद एवं हिंदुत्व की राजनीति: 1986 में बाबरी मस्जिद के ताले खुलने, 1990 की आडवाणी की रथ यात्रा और 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचे के विध्वंस ने भारतीय राजनीति में धर्मनिरपेक्षता बनाम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की तीखी बहस को जन्म दिया और भारतीय जनता पार्टी (BJP) का राष्ट्रीय उभार हुआ।
  5. राजीव गांधी की हत्या (1991): मई 1991 में लिट्टे द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या ने कांग्रेस के नेतृत्व ढांचे को बदल दिया। नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी के दौर के बाद सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली और पार्टी ने गठबंधन राजनीति को स्वीकार किया।
उदाहरण 5
प्रश्न 5 (दीर्घ उत्तरीय - 6 अंक): तीव्र वैचारिक मतभेदों के बावजूद 1990 के दशक के बाद भारतीय राजनीति में किन चार प्रमुख मुद्दों पर सर्वदलीय सहमति (Growing Consensus) विकसित हुई है? व्याख्या कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
1990 के दशक के तीखे ध्रुवीकरण और राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद भारतीय लोकतंत्र ने यह परिपक्वता दिखाई कि विभिन्न विरोधी दलों के मध्य चार मूलभूत विषयों पर व्यापक सहमति बन गई:
  1. नई आर्थिक नीतियों पर आम सहमति: 1991 में जब कांग्रेस ने आर्थिक उदारीकरण शुरू किया था, तो वामपंथियों और दक्षिणपंथियों दोनों ने इसका विरोध किया था। परंतु समय के साथ, चाहे केंद्र में वाजपेयी की राजग सरकार रही हो या मनमोहन सिंह की संप्रग सरकार, सभी ने निजीकरण, विदेशी निवेश और व्यापार उदारीकरण की नीतियों को निर्बाध रूप से आगे बढ़ाया। आज सभी दल मानते हैं कि तीव्र आर्थिक संवृद्धि ही जनकल्याण का आधार है।
  2. पिछड़े वर्गों (OBC) के आरक्षण और सामाजिक दावेदारी पर सहमति: 1990 में जब मंडल आयोग लागू हुआ, तब भीषण विरोध और दंगे हुए थे। परंतु आज भारत का कोई भी राजनीतिक दल—चाहे वह भाजपा हो, कांग्रेस हो या क्षेत्रीय दल—OBC आरक्षण का विरोध नहीं करता। शिक्षण संस्थानों में 27% आरक्षण, क्रीमी लेयर के नियम और जाति जनगणना की मांगों पर सभी दलों का सकारात्मक रुख सामाजिक न्याय की सर्वमान्य स्वीकृति को दर्शाता है।
  3. राष्ट्रीय शासन में क्षेत्रीय दलों की अपरिहार्य भूमिका पर सहमति: पूर्व में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों को राष्ट्र की एकता के लिए खतरा मानती थी। परंतु 1989 के बाद यह आम सहमति बन गई कि विशाल और विविधतापूर्ण भारत में क्षेत्रीय दलों की भागीदारी के बिना केंद्र में स्थिर और समावेशी सरकार नहीं चलाई जा सकती। राजग हो या संप्रग, दोनों ने क्षेत्रीय दलों को शासन का बराबर साझेदार बनाया।
  4. विचारधारा के स्थान पर कार्यसाधकता और लोक-कल्याणकारी राजनीति (Pragmatic Politics): कट्टर साम्यवादी, दक्षिणपंथी या समाजवादी विचारधाराओं का स्थान अब व्यावहारिक चुनावी राजनीति और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT, मुफ्त खाद्यान्न, पक्के मकान, किसान सम्मान निधि, लाडली बहना योजना आदि) ने ले लिया है। दल अब विचारधारा से अधिक जन-सुविधाओं और विकास के वादों पर वोट मांगते हैं।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

छात्र अक्सर मान लेते हैं कि गठबंधन सरकारों का दौर केवल राजनीतिक अस्थिरता और विकास की रुकावट का दौर था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह ऐतिहासिक रूप से गलत है। 1989-2014 के गठबंधन काल में ही भारत ने 1991 के ऐतिहासिक आर्थिक सुधार किए, 1998 में परमाणु परीक्षण किया, 8-9% की अभूतपूर्व जीडीपी वृद्धि दर हासिल की, और सूचना का अधिकार (RTI) तथा मनरेगा (MGNREGA) जैसे युगांतरकारी कानून पारित किए।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

मंडल आयोग को केवल वी.पी. सिंह द्वारा गठित आयोग समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मंडल आयोग का गठन 1979 में मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार ने किया था, और इसने अपनी रिपोर्ट 1980 में इंदिरा गांधी सरकार को दी थी। वी.पी. सिंह ने 10 साल बाद अगस्त 1990 में इसकी 27% आरक्षण की सिफारिश को लागू किया था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि 2014 और 2019 के बाद भारत में गठबंधन सरकारों का दौर पूरी तरह समाप्त हो गया।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यद्यपि 2014 और 2019 में भाजपा को अकेले लोकसभा में स्पष्ट बहुमत मिला, लेकिन सरकार भाजपा ने अकेले नहीं बल्कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के बैनर तले सहयोगी दलों को साथ लेकर चलाई (Surplus Majority Coalition)। 2024 में पुनः पारंपरिक गठबंधन सरकार की वापसी हुई।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

काका कालेलकर आयोग और मंडल आयोग में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

काका कालेलकर आयोग प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग (1953) था, जबकि बी.पी. मंडल आयोग द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग (1979) था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

इंदिरा साहनी केस (1992) को आरक्षण रद्द करने वाला फैसला मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

इंदिरा साहनी केस में सर्वोच्च न्यायालय ने 27% OBC आरक्षण को पूर्णतः वैध ठहराया था। न्यायालय ने केवल यह शर्त लगाई थी कि 'क्रीमी लेयर' को बाहर रखा जाए और कुल आरक्षण 50% से अधिक न हो।

1990 के बाद भारतीय राजनीति के 5 स्तंभ एवं नई सहमति

🇮🇳 1990 के दशक का राजनीतिक संक्रमण एवं उभरती हुई सहमति

1. दलीय व्यवस्था

कांग्रेस प्रणाली का अंत → बहुदलीय गठबंधन संघवाद (NDA / UPA).

2. सामाजिक न्याय

मंडल आयोग → 27% OBC आरक्षण, बहुजन समाज पार्टी एवं पिछड़ी जातियों का उभार.

3. आर्थिक ढांचा

लाइसेंस राज का अंत → LPG (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण 1991).

4. वैचारिक विमर्श

अयोध्या विवाद, हिंदुत्व का राष्ट्रीय उभार, धर्मनिरपेक्षता पर नई बहस.

🤝 सर्वदलीय सहमति: आर्थिक सुधार + पिछड़ा वर्ग आरक्षण + क्षेत्रीय दलों की हिस्सेदारी + विकासोन्मुखी राजनीति।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. 1989 का आम चुनाव भारतीय राजनीति का निर्णायक मोड़ बिंदु था, जिसने चार दशक पुरानी "कांग्रेस प्रणाली" का अंत कर दिया।
मुख्य बिंदु 2
  1. 1989 से 2014 तक के 25 वर्षों में किसी एक दल को लोकसभा में पूर्ण बहुमत नहीं मिला और भारत में गठबंधन सरकारों का निरंतर दौर चला।
मुख्य बिंदु 3
  1. 1990 के दशक के पाँच बड़े बदलाव थे: कांग्रेस का पतन, मंडल आयोग व OBC राजनीति, 1991 की नई आर्थिक नीतियाँ (LPG), अयोध्या विवाद और राजीव गांधी की हत्या।
मुख्य बिंदु 4
  1. द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग (बी.पी. मंडल आयोग) ने देश में 52% OBC आबादी का आकलन कर केंद्रीय नौकरियों में 27% आरक्षण की सिफारिश की थी।
मुख्य बिंदु 5
  1. 7 अगस्त 1990 को प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के बाद देश भर में भीषण आंदोलन और विरोध हुआ।
मुख्य बिंदु 6
  1. 1992 के इंदिरा साहनी केस में सर्वोच्च न्यायालय ने 27% OBC आरक्षण को वैध माना, लेकिन क्रीमी लेयर को बाहर रखने और 50% अधिकतम सीमा की शर्त तय की।
मुख्य बिंदु 7
  1. 1991 के भुगतान संतुलन संकट के बाद नरसिम्हा राव व डॉ. मनमोहन सिंह ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) की शुरुआत की।
मुख्य बिंदु 8
  1. 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ; 9 नवंबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वसम्मति से राम मंदिर निर्माण और 5 एकड़ वैकल्पिक मस्जिद भूमि का निर्णय दिया।
मुख्य बिंदु 9
  1. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली NDA सरकार (1999-2004) पहली गैर-कांग्रेसी गठबंधन सरकार थी जिसने पूरे 5 वर्ष का कार्यकाल पूर्ण किया।
मुख्य बिंदु 10
  1. 1990 के बाद भारतीय राजनीति में 4 मुद्दों पर आम सहमति बनी: नई आर्थिक नीतियाँ, पिछड़ा वर्ग सशक्तीकरण, क्षेत्रीय दलों की स्वीकार्यता, और व्यावहारिक कल्याणकारी राजनीति।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
1. मंडल आयोग की सिफारिशों को केंद्र सरकार की नौकरियों में किस प्रधानमंत्री के कार्यकाल में और किस वर्ष लागू किया गया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) के कार्यकाल में, 7 अगस्त 1990 को।
2
2. 1991 की "नई आर्थिक नीति" (LPG) के समय भारत के प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री कौन थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव थे और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह थे।
3
3. इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई दो प्रमुख शर्तें क्या थीं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (1) पिछड़े वर्गों के संपन्न तबके (क्रीमी लेयर) को आरक्षण के दायरे से बाहर रखा जाए, और (2) कुल आरक्षण किसी भी परिस्थिति में 50% से अधिक न हो।
4
4. केंद्र में अपना 5 वर्ष का पूर्ण कार्यकाल पूरा करने वाली पहली गैर-कांग्रेसी गठबंधन सरकार कौन सी थी और उसके प्रधानमंत्री कौन थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार (1999-2004), जिसके प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी थे।
5
5. 1990 के दशक के बाद भारतीय राजनीति में उभरी किन्हीं दो सर्वदलीय सहमतियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: (1) 1991 की नई आर्थिक नीतियों (सुधारों) की निरंतरता पर सहमति, और (2) अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के राजनीतिक और शैक्षणिक आरक्षण पर सभी दलों की सर्वसम्मति।
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