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CBSE • कक्षा XII • Political Science • अध्याय 13
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

25 जून 1975 की काली मध्यरात्रि को स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे अंधकारमय अध्याय लिखा गया, जब प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की अनुशंसा पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश भर में 'आंतरिक अशांति' के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल (Emergency) की घोषणा कर दी। रातों-रात अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई, न्यायपालिका के हाथ बांध दिए गए, नागरिकों के मौलिक अधिकार छीन लिए गए और जयप्रकाश नारायण (जेपी), मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी सहित विपक्ष के हजारों शीर्ष नेताओं और निर्दोष नागरिकों को जेलों में ठूंस दिया गया। परंतु यह आपातकाल किसी शून्य से पैदा नहीं हुआ था। इसके पीछे 1973-75 की अभूतपूर्व आर्थिक बदहाली (30% तक महंगाई), गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन, बिहार का छात्र आंदोलन, जयप्रकाश नारायण की 'संपूर्ण क्रांति' (Total Revolution) का आह्वान, जॉर्ज फर्नांडीस के नेतृत्व में 1974 की ऐतिहासिक रेल हड़ताल, संसद और न्यायपालिका के बीच केशवानंद भारती मामले का टकराव, और अंततः 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध घोषित करने का ऐतिहासिक फैसला था। इस अध्याय में आपातकाल की पृष्ठभूमि, 21 महीनों के दमनकारी दौर (सेंसरशिप, जबरन नसबंदी, मीसा कानून, और 42वां संविधान संशोधन), आपातकाल के दुष्परिणाम, 1977 के चुनाव में कांग्रेस की ऐतिहासिक पराजय और प्रथम गैर-कांग्रेसी सरकार (जनता पार्टी) के गठन, तथा भारतीय लोकतंत्र द्वारा सीखे गए मूल्यवान सबकों और 44वें संविधान संशोधन का संपूर्ण व निष्पक्ष परीक्षण किया गया है। जैक बोर्ड (CBSE Class 12) राजनीति विज्ञान की परीक्षा में यह अध्याय 8 से 10 अंकों का सर्वोच्च महत्व रखता है, जिसमें आपातकाल की पृष्ठभूमि, जेपी आंदोलन, आपातकाल के परिणाम और इसके सबकों पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।

🌑 क्या आपने कभी सोचा है: जिस देश ने अंग्रेजों की गुलामी से 200 साल लड़कर आजादी पाई, वहाँ रातों-रात नागरिकों के जीने का अधिकार भी कैसे छीन लिया गया?

जरा सोचिए: 25 जून 1975 की रात आप सोए एक आज़ाद नागरिक की तरह, और 26 जून की सुबह जब आपकी आँख खुली, तो देश एक खुली जेल बन चुका था!

सुबह के अखबारों के पहले पन्ने कोरे (Blank) छपे थे क्योंकि रात 2 बजे पुलिस ने दिल्ली के प्रेस एन्क्लेव की बिजली काट दी थी ताकि कोई सच न छाप सके। यदि पुलिस आपको सड़क से उठाकर जेल में डाल दे, तो आप अदालत जाकर यह भी नहीं पूछ सकते थे कि मुझे क्यों पकड़ा गया है (Habeas Corpus समाप्त कर दिया गया था)। दिल्ली के तुर्कमान गेट पर बुलडोजर चलाकर गरीबों की बस्तियां उजाड़ दी गईं और गांवों-कस्बों में नौजवानों को बसों से खींच-खींचकर उनकी जबरन नसबंदी (Sterilisation) कर दी गई!

संसद में विपक्ष के सभी सांसद जेल में थे और संविधान को इस तरह बदल डाला गया कि न्यायपालिका भी सरकार के आगे नतमस्तक हो जाए। क्या भारत का महान लोकतंत्र हमेशा के लिए एक तानाशाही में बदल चुका था? 21 महीने बाद जब मार्च 1977 में चुनाव हुए, तो भारत की गरीब और निरक्षर जनता ने इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी दोनों को चुनाव में धूल चटाकर साबित किया कि "इस देश के डीएनए में आजादी बहती है, तानाशाही नहीं!" आइए, भारतीय लोकतंत्र की इस सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा का साक्षात्कार करें!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

इस अध्याय का अध्ययन आपके लिए क्यों अनिवार्य है?

  1. बोर्ड परीक्षा में उच्च अंक: CBSE कक्षा 12 में "आपातकाल की घोषणा के प्रमुख कारण", "जेपी का संपूर्ण क्रांति आंदोलन", "आपातकाल के दौरान नागरिकों पर अत्याचार व ज्यादतियाँ", और "आपातकाल से सीखे गए सबक (44वां संशोधन)" पर 6 अंक के प्रश्न नियमित रूप से आते हैं।
  2. संवैधानिक अधिकारों एवं नागरिक स्वतंत्रता की समझ: अनुच्छेद 19, 20, 21 (जीने का अधिकार), प्रेस की स्वतंत्रता और स्वतंत्र न्यायपालिका के मूल्य को समझने का सबसे सशक्त ऐतिहासिक उदाहरण यही कालखंड है।
  3. प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC/JPSC) का कोर विषय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय (12 जून 1975), एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला केस (Habeas Corpus Case), 42वां बनाम 44वां संविधान संशोधन, और शाह जांच आयोग की सिफारिशें भारतीय संविधान के अति-महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • संविधान का आपातकालीन उपबंध: भाग 18 में अनुच्छेद 352 (राष्ट्रीय आपातकाल), 356 (राष्ट्रपति शासन), और 360 (वित्तीय आपातकाल)।

  • केशवानंद भारती केस (1973): संसद की संविधान संशोधन शक्ति बनाम न्यायपालिका द्वारा प्रतिपादित 'मूल संरचना का सिद्धांत' (Basic Structure Doctrine)।

  • 1971 का चुनाव: इंदिरा गांधी का प्रचंड बहुमत और सत्ता का अति-केंद्रीकरण।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • 1973 से 1975 के बीच देश में आपातकाल की पृष्ठभूमि तैयार करने वाले आर्थिक व सामाजिक संकटों को रेखांकित कर सकेंगे।
  • गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन और बिहार छात्र आंदोलन में जयप्रकाश नारायण (JP) की "संपूर्ण क्रांति" के दर्शन का विश्लेषण कर सकेंगे।
  • 1974 की ऐतिहासिक देशव्यापी रेलवे हड़ताल और कार्यपालिका-न्यायपालिका के टकराव के विभिन्न आयामों को समझ सकेंगे।
  • 12 जून 1975 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले और 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा की परिस्थितियों का परीक्षण कर सकेंगे।
  • आपातकाल के दौरान प्रेस सेंसरशिप, निवारक नज़रबंदी (MISA), 42वें संविधान संशोधन और ज्यादतियों का समालोचनात्मक मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • 1977 के ऐतिहासिक आम चुनाव, जनता पार्टी की जीत, शाह आयोग की जांच और 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा सीखे गए सबकों की व्याख्या कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. आपातकाल की पृष्ठभूमि: आर्थिक संक...
2 2. न्यायपालिका से टकराव एवं 12 जून...
3 3. आपातकाल की घोषणा (25 जून 1975) ए...
4 4. 1977 का ऐतिहासिक आम चुनाव: जनता...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. आपातकाल की पृष्ठभूमि: आर्थिक संकट, छात्र आंदोलन एवं रेल हड़ताल

(क) आर्थिक संकट और जन-असंतोष (1971-1973)

1971 के चुनाव में 'गरीबी हटाओ' के नारे और बांग्लादेश युद्ध की जीत के बाद जनता की अपेक्षाएं बहुत बढ़ गई थीं, परंतु देश भयंकर आर्थिक संकट में घिर गया:

  • युद्ध और शरणार्थी संकट का बोझ: बांग्लादेश से आए 1 करोड़ शरणार्थियों के भरण-पोषण और 1971 के युद्ध के भारी खर्च ने भारत के खजाने को खाली कर दिया। अमेरिका ने भारत की सभी वित्तीय सहायता बंद कर दी।
  • 1973 का अंतरराष्ट्रीय तेल संकट: कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में अप्रत्याशित उछाल आया, जिससे 1973 में महंगाई 23% और 1974 में 30% तक पहुँच गई। आम जनता के लिए दाल, तेल, खाद्यान्न खरीदना दूभर हो गया।
  • मानसून की असफलता: कृषि पैदावार में 8% की गिरावट आई और औद्योगिक उत्पादन ठप हो गया। सरकारी कर्मचारियों के वेतन रोक दिए गए, जिससे भारी असंतोष फैला।

(ख) गुजरात और बिहार के छात्र आंदोलन (1974)

  1. गुजरात आंदोलन (जनवरी 1974): मोरबी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों ने मेस के बढ़े हुए बिल और खाद्य पदार्थों की महंगाई तथा भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन छेड़ा। यह 'नवनिर्माण आंदोलन' बन गया। विपक्षी दलों के समर्थन और मोरारजी देसाई के आमरण अनशन के दबाव में आकर केंद्र सरकार को गुजरात विधानसभा भंग करनी पड़ी और जून 1975 में चुनाव कराने पड़े (जिसमें कांग्रेस हार गई)।
  2. बिहार आंदोलन और जयप्रकाश नारायण (मार्च 1974): बिहार में छात्रों ने बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन शुरू किया और वयोवृद्ध सर्वोदयी नेता जयप्रकाश नारायण (JP) को आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए आमंत्रित किया।
💡 जेपी का आह्वान: "संपूर्ण क्रांति" (Total Revolution):
जेपी ने दो शर्तों पर नेतृत्व स्वीकार किया: (1) आंदोलन पूरी तरह अहिंसक रहेगा, और (2) यह केवल बिहार तक सीमित न रहकर राष्ट्रव्यापी बनेगा।
जेपी ने नारा दिया: "संपूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है!" इसका उद्देश्य केवल सरकार बदलना नहीं, बल्कि समाज के सभी 7 आयामों—सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक—में बुनियादी क्रांतिकारी परिवर्तन लाना था ताकि सच्चा लोकतांत्रिक समाज बन सके।

(ग) 1974 की ऐतिहासिक रेल हड़ताल

मई 1974 में जॉर्ज फर्नांडीस के नेतृत्व वाली 'नेशनल कोऑर्डिनेशन कमेटी फॉर रेलवेमेन्स स्ट्रगल' ने बोनस और सेवा शर्तों की बहाली को लेकर 20 दिनों की अभूतपूर्व देशव्यापी रेल हड़ताल कर दी। भारत की जीवन रेखा (रेलवे) पूरी तरह ठप हो गई। इंदिरा सरकार ने इसे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को पंगु बनाने की राष्ट्र-विरोधी साजिश माना और सेना व अर्धसैनिक बलों का प्रयोग कर हजारों रेलवे कर्मचारियों को गिरफ्तार करके हड़ताल को बेरहमी से कुचल दिया।

2. न्यायपालिका से टकराव एवं 12 जून 1975 का इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय

(क) संसद बनाम न्यायपालिका का टकराव (1973)

इंदिरा गांधी सरकार के भूमि सुधारों, बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स समाप्ति के कानूनों को न्यायपालिका ने मौलिक अधिकारों (संपत्ति का अधिकार) का उल्लंघन बताकर रद्द कर दिया।

  • केशवानंद भारती केस (24 अप्रैल 1973): सर्वोच्च न्यायालय की 13 जजों की सबसे बड़ी पीठ ने ऐतिहासिक निर्णय दिया कि संसद संविधान में संशोधन तो कर सकती है, परंतु वह संविधान के 'मूल ढांचे' (Basic Structure) को नहीं बदल सकती।
  • मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में वरिष्ठता का उल्लंघन: अप्रैल 1973 में मुख्य न्यायाधीश एस. एम. सीकरी के सेवानिवृत्त होने पर सरकार के विरुद्ध फैसला देने वाले तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों (जे. एम. शेलत, के. एस. हेगड़े और ए. एन. ग्रोवर) की वरिष्ठता को दरकिनार करके सरकार के पसंदीदा कनिष्ठ न्यायाधीश ए. एन. रे (A. N. Ray) को भारत का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया। इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सरकार का खुला प्रहार माना गया।

(ख) 12 जून 1975: जगमोहन लाल सिन्हा का युगांतरकारी फैसला

1971 के रायबरेली लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी से पराजित हुए समाजवादी उम्मीदवार राजनारायण ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनाव याचिका दायर की थी।

⚖️ 12 जून 1975 का फैसला:
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सरकारी अधिकारियों (यशपाल कपूर) और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के आधार पर श्रीमती इंदिरा गांधी के 1971 के लोकसभा निर्वाचन को अवैध और शून्य घोषित कर दिया!
इस फैसले का कानूनी अर्थ यह था कि इंदिरा गांधी अब सांसद नहीं रहीं और उन्हें 6 महीने के भीतर प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना होगा! 24 जून को सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशकालीन न्यायाधीश वी. आर. कृष्णा अय्यर ने इस फैसले पर आंशिक स्थगन (Conditional Stay) दिया कि वे प्रधानमंत्री रह सकती हैं, परंतु संसद की कार्यवाही में मतदान नहीं कर सकतीं।

3. आपातकाल की घोषणा (25 जून 1975) एवं 21 महीनों की ज्यादतियाँ

(क) 25 जून 1975: रामलीला मैदान रैली एवं आपातकाल की घोषणा

25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी के नेतृत्व में विशाल जनसैलाब उमड़ा। जेपी ने रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध पंक्ति दोहराई: "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है!" और सेना, पुलिस व सरकारी कर्मचारियों से अपील की कि वे सरकार के असंवैधानिक व अवैध आदेशों का पालन न करें।

इंदिरा गांधी ने इसे देश की अखंडता के विरुद्ध खुला विद्रोह माना। उसी रात प्रधानमंत्री ने कैबिनेट की औपचारिक बैठक बुलाए बिना राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को अनुच्छेद 352 के तहत 'आंतरिक अशांति' (Internal Disturbance) के आधार पर आपातकाल लागू करने की अनुशंसा कर दी। राष्ट्रपति ने तुरंत हस्ताक्षर कर दिए। (मंत्रिमंडल को अगली सुबह 6 बजे केवल सूचित किया गया!)।

(ख) आपातकाल के दौरान प्रमुख ज्यादतियाँ एवं दमन

दमनकारी आयामघटनाक्रम एवं प्रभाव
1. राजनीतिक नेताओं की गिरफ्तारी जेपी, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, वाजपेयी, आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडीस सहित 1 लाख 11 हजार से अधिक विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं को मीसा (MISA) और डीआईआर (DIR) कानूनों के तहत बिना मुकदमा चलाए जेलों में बंद कर दिया गया।
2. प्रेस सेंसरशिप (Press Censorship) अखबारों में छपने वाली प्रत्येक खबर के लिए सरकारी सेंसर अधिकारी की पूर्व-अनुमति अनिवार्य कर दी गई। इसके विरोध में द इंडियन एक्सप्रेस और द स्टेट्समैन ने विरोध स्वरूप संपादकीय पृष्ठ खाली (Blank) छोड़ दिए।
3. मौलिक अधिकारों का हनन (बंदी प्रत्यक्षीकरण का अंत) अनुच्छेद 19 की सभी नागरिक स्वतंत्रताएं छीन ली गईं। प्रसिद्ध एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला केस (1976) में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि आपातकाल के दौरान सरकार किसी भी नागरिक का जीने का अधिकार (अनुच्छेद 21) भी छीन सकती है और नागरिक अदालत नहीं जा सकते!
4. 42वां संविधान संशोधन (1976) इसे 'लघु संविधान' (Mini Constitution) कहा गया। लोकसभा और विधानसभाओं का कार्यकाल 5 से बढ़ाकर 6 वर्ष कर दिया गया, न्यायपालिका की समीक्षा शक्ति छीन ली गई, तथा प्रस्तावना में 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्द जोड़े गए।
5. संजय गांधी की गैर-संवैधानिक सत्ता इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी ने बिना किसी आधिकारिक पद के समानांतर सत्ता चलाई। उनके 5-सूत्रीय कार्यक्रम के तहत दिल्ली के तुर्कमान गेट पर गरीबों की झुग्गियों को बुलडोजर से उजाड़ा गया तथा लाखों गरीब और असहाय पुरुषों की जबरन नसबंदी (Forced Sterilisation) कराई गई।

4. 1977 का ऐतिहासिक आम चुनाव: जनता पार्टी की जीत एवं आपातकाल के सबक

(क) जनवरी 1977 में चुनावों की घोषणा

21 महीने के आपातकाल के बाद जनवरी 1977 में इंदिरा गांधी ने अप्रत्याशित रूप से आपातकाल ढीला किया, राजनीतिक बंदियों को रिहा किया और मार्च 1977 में चुनाव कराने का ऐलान किया।

(ख) 'जनता पार्टी' का गठन और ऐतिहासिक जनादेश

चुनाव की घोषणा होते ही सभी विपक्षी दलों—कांग्रेस (ओ), भारतीय जनसंघ, भारतीय लोक दल (चरण सिंह) और सोशलिस्ट पार्टी—ने मिलकर एक नई पार्टी 'जनता पार्टी' बनाई, जिसका नेतृत्व जेपी ने किया। कांग्रेस के दिग्गज दलित नेता बाबू जगजीवन राम ने कांग्रेस छोड़कर 'कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी' (CFD) बनाई और जनता पार्टी से हाथ मिला लिया।

राजनीतिक दलप्राप्त सीटें (लोकसभा 542)परिणाम का ऐतिहासिक महत्व
जनता पार्टी + सहयोगी 330 सीटें (जनता पार्टी अकेले 295) स्वतंत्र भारत में पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। 81 वर्षीय मोरारजी देसाई प्रथम गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस मात्र 154 सीटें उत्तर भारत में कांग्रेस का पूरी तरह सूपड़ा साफ हो गया (यूपी, बिहार, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा में 0 सीट)। स्वयं इंदिरा गांधी (रायबरेली) और संजय गांधी (अमेठी) बुरी तरह चुनाव हार गए!

(ग) शाह जांच आयोग (Shah Commission - मई 1977)

जनता पार्टी सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे. सी. शाह की अध्यक्षता में एक जांच आयोग नियुक्त किया, जिसने आपातकाल के दौरान सत्ता के दुरुपयोग, अवैध गिरफ्तारियों और पुलिस बर्बरता की विस्तृत जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत की।

(घ) आपातकाल से सीखे गए मूल्यवान सबक एवं 44वां संविधान संशोधन (1978)

📜 भारतीय लोकतंत्र द्वारा सीखे गए 4 महान सबक:
1. लोकतंत्र की अदम्य ताकत: आपातकाल ने सिद्ध कर दिया कि भारत से लोकतंत्र को समाप्त करना असंभव है; जनता तानाशाही को उखाड़ फेंकने की अचूक ताकत रखती है।
2. संविधान में सुधार (44वां संशोधन 1978):
- अनुच्छेद 352 से अस्पष्ट शब्द 'आंतरिक अशांति' को हटाकर उसके स्थान पर 'सशस्त्र विद्रोह' (Armed Rebellion) शब्द जोड़ा गया ताकि कोई प्रधानमंत्री मनमाने ढंग से आपातकाल न लगा सके।
- आपातकाल केवल तभी लगाया जा सकता है जब केंद्रीय मंत्रिमंडल लिखित रूप में राष्ट्रपति को सिफारिश करे।
- यह स्पष्ट किया गया कि आपातकाल के दौरान भी अनुच्छेद 20 (अपराधों के लिए दोषसिद्धि से संरक्षण) और अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता) को कभी निलंबित नहीं किया जा सकता!
3. नागरिक समाज और मानवाधिकारों की जागृति: आपातकाल के बाद भारत में मानवाधिकार संगठनों (जैसे PUCL, PUDR) और नागरिक स्वतंत्रता आंदोलनों की बाढ़ आ गई।
4. न्यायपालिका की सक्रियता: अपनी खोई प्रतिष्ठा वापस पाने के लिए न्यायपालिका ने 'जनहित याचिका' (PIL) और न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) का मार्ग अपनाया।

महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक सिद्धांत एवं कालक्रम

24 अप्रैल 1973
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केशवानंद भारती मामले में "संविधान के मूल ढांचे" का ऐतिहासिक सिद्धांत।
जनवरी 1974
गुजरात में छात्रों द्वारा "नवनिर्माण आंदोलन"; विधानसभा भंग करने की मांग।
मार्च 1974
बिहार छात्र आंदोलन प्रारंभ; जयप्रकाश नारायण (JP) द्वारा "संपूर्ण क्रांति" का आह्वान।
मई 1974
जॉर्ज फर्नांडीस के नेतृत्व में 20 दिनों की ऐतिहासिक देशव्यापी रेलवे हड़ताल।
12 जून 1975
इलाहाबाद हाईकोर्ट (जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा) द्वारा इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द।
25 जून 1975
दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी की विशाल रैली; दिनकर की कविता "सिंहासन खाली करो"।
25-26 जून 1975
अनुच्छेद 352 के तहत आंतरिक अशांति के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा।
1976
42वां संविधान संशोधन अधिनियम ("लघु संविधान") पारित; संसद और कार्यपालिका असीमित।
जनवरी 1977
आपातकाल शिथिल; विपक्षी नेताओं की रिहाई और मार्च 1977 में चुनाव की घोषणा।
मार्च 1977
6वां आम चुनाव; जनता पार्टी की प्रचंड जीत (330 सीटें), कांग्रेस और इंदिरा गांधी पराजित।
24 मार्च 1977
मोरारजी देसाई स्वतंत्र भारत के प्रथम गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने।
मई 1977
आपातकाल की ज्यादतियों की जांच हेतु न्यायमूर्ति जे. सी. शाह आयोग का गठन।
1978
44वां संविधान संशोधन अधिनियम पारित; आपातकाल के दुरुपयोग को रोकने हेतु कड़े प्रावधान।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1 (1 अंक - वस्तुनिष्ठ): 25 जून 1975 को राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा के समय भारत के राष्ट्रपति कौन थे?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
आपातकाल की घोषणा के समय भारत के राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद (Fakhruddin Ali Ahmed) थे।
उदाहरण 2
प्रश्न 2 (2 अंक - अति लघु उत्तरीय): 1974 में बिहार छात्र आंदोलन के दौरान जयप्रकाश नारायण (JP) द्वारा दिए गए "संपूर्ण क्रांति" (Total Revolution) के आह्वान का क्या अर्थ था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
संपूर्ण क्रांति: जेपी के अनुसार इसका अर्थ केवल सरकार या सत्ता बदलना नहीं था, बल्कि भारतीय समाज के सभी सातों क्षेत्रों—सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और नैतिक—में आमूलचूल बुनियादी परिवर्तन लाना था ताकि एक सच्चा शोषणमुक्त और समतावादी लोकतंत्र स्थापित हो सके।
उदाहरण 3
प्रश्न 3 (4 अंक - लघु उत्तरीय): 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा सुनाए गए फैसले का भारतीय राजनीति पर क्या तात्कालिक प्रभाव पड़ा?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
12 जून 1975 को न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने समाजवादी नेता राजनारायण की याचिका पर फैसला सुनाते हुए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के 1971 के रायबरेली निर्वाचन को भ्रष्ट चुनावी आचरण के आधार पर अवैध घोषित कर दिया।
तात्कालिक प्रभाव:

  1. इंदिरा गांधी कानूनी रूप से सांसद नहीं रहीं और उनके प्रधानमंत्री पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार समाप्त हो गया।
  2. संपूर्ण विपक्ष ने जेपी और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में इंदिरा गांधी के तुरंत इस्तीफे की मांग को लेकर देशव्यापी सत्याग्रह शुरू कर दिया।
  3. 24 जून को सुप्रीम कोर्ट ने केवल सशर्त स्थगन (Conditional Stay) दिया कि वे संसद में वोट नहीं कर सकतीं।
  4. अपने इस्तीफे से बचने और सत्ता पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए इंदिरा गांधी ने 25 जून की रात को देश में आपातकाल (Emergency) थोप दिया।
उदाहरण 4
प्रश्न 4 (4 अंक - लघु उत्तरीय): 1975 के आपातकाल के दौरान नागरिकों और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर थोपी गई किन्हीं चार प्रमुख ज्यादतियों का उल्लेख कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
आपातकाल के दौरान की गई चार प्रमुख ज्यादतियाँ निम्नलिखित थीं:

  1. प्रेस सेंसरशिप: अखबारों की स्वतंत्रता समाप्त कर दी गई; सरकार की पूर्व-अनुमति के बिना कोई भी समाचार छापना अपराध बना दिया गया।
  2. विपक्षी नेताओं की अवैध नजरबंदी: जेपी, मोरारजी देसाई, वाजपेयी, आडवाणी सहित 1 लाख से अधिक लोगों को बिना किसी आरोप के मीसा (MISA) कानून के तहत जेलों में ठूंस दिया गया।
  3. मौलिक अधिकारों का स्थगन: अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताएं छीन ली गईं और अदालतों के 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' (Habeas Corpus) के अधिकार को निष्प्रभावी कर दिया गया।
  4. संजय गांधी की जबरन नसबंदी एवं विध्वंस: बिना किसी संवैधानिक पद के संजय गांधी के इशारे पर लाखों निर्दोषों की जबरन नसबंदी कराई गई और दिल्ली के तुर्कमान गेट पर गरीबों की झुग्गियों को बुलडोजर से रौंद दिया गया।
उदाहरण 5
प्रश्न 5 (6 अंक - दीर्घ उत्तरीय): "1975 का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के लिए एक अग्निपरीक्षा साबित हुआ जिससे व्यवस्था और अधिक परिपक्व होकर निकली।" इस कथन की समीक्षा करते हुए आपातकाल से सीखे गए प्रमुख सबकों तथा 44वें संविधान संशोधन (1978) के सुरक्षात्मक प्रावधानों का सविस्तार वर्णन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का आपातकाल स्वतंत्र भारत का सर्वाधिक विवादास्पद और दमनकारी कालखंड था। परंतु इस तानाशाही के अंधकार ने भारतीय लोकतंत्र की अंतर्निहित शक्ति को भी उजागर किया। 1977 के चुनाव में जनता ने जिस निर्भीकता से तानाशाही को उखाड़ फेंका, उसने साबित किया कि भारत में लोकतंत्र को मिटाया नहीं जा सकता।

(क) आपातकाल से सीखे गए प्रमुख सबक:

  1. लोकतंत्र की अजेयता: आलोचकों का मानना था कि भारत का लोकतंत्र बहुत कमजोर है। परंतु आपातकाल की पराजय ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय जनता भले ही गरीब और अशिक्षित हो, परंतु वह अपनी नागरिक स्वतंत्रताओं और वोट के अधिकार से कोई समझौता नहीं करती।
  2. संविधान के आपातकालीन प्रावधानों की अस्पष्टता उजागर होना: यह साबित हुआ कि सत्ताधारी दल संविधान में लिखे 'आंतरिक अशांति' जैसे अस्पष्ट शब्दों का दुरुपयोग करके अपनी कुर्सी बचाने के लिए पूरे देश को बंधक बना सकता है।
  3. नागरिक समाज और मानवाधिकारों की जागृति: आपातकाल के बाद देश में स्वतंत्र मानवाधिकार संगठनों (जैसे PUCL) और जन-आंदोलनों की बाढ़ आ गई जो नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए सजग पहरेदार बने।
  4. न्यायपालिका का आत्म-चिंतन: एडीएम जबलपुर मामले में कार्यपालिका के सामने झुकने की अपनी ऐतिहासिक भूल से सबक लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने बाद के वर्षों में 'जनहित याचिका' (PIL) और न्यायिक सक्रियता के माध्यम से स्वयं को मानवाधिकारों का सबसे बड़ा संरक्षक बनाया।

(ख) 44वां संविधान संशोधन अधिनियम (1978) द्वारा किए गए ऐतिहासिक सुरक्षात्मक प्रावधान:
जनता पार्टी सरकार ने 1978 में 44वां संशोधन पारित करके यह सुनिश्चित किया कि भविष्य में कोई भी शासक दोबारा आपातकाल का दुरुपयोग न कर सके:

  1. 'आंतरिक अशांति' शब्द की समाप्ति: अनुच्छेद 352 से अस्पष्ट शब्द 'आंतरिक अशांति' को हमेशा के लिए हटा दिया गया और उसके स्थान पर 'सशस्त्र विद्रोह' (Armed Rebellion) शब्द जोड़ा गया। अब केवल आंदोलन या हड़ताल के आधार पर आपातकाल नहीं लगाया जा सकता।
  2. मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश अनिवार्य: अब कोई प्रधानमंत्री अकेले अपनी मर्जी से राष्ट्रपति को आपातकाल की सलाह नहीं दे सकता; इसके लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश (Written Recommendation) अनिवार्य कर दी गई।
  3. संसद का विशेष अनुमोदन: आपातकाल लागू रहने के लिए संसद के दोनों सदनों द्वारा एक माह के भीतर 'विशेष बहुमत' (कुल सदस्यों का बहुमत तथा उपस्थित व मतदान करने वालों का दो-तिहाई मत) से अनुमोदन आवश्यक कर दिया गया।
  4. अनुच्छेद 20 और 21 की अक्षुण्णता: यह सबसे क्रांतिकारी प्रावधान था कि आपातकाल के दौरान भी अनुच्छेद 20 (दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) को किसी भी परिस्थिति में निलंबित नहीं किया जा सकता।

निष्कर्ष: आपातकाल ने भारतीय लोकतंत्र को घायल तो किया, परंतु 1977 के जनादेश और 44वें संविधान संशोधन ने लोकतंत्र की रक्षा प्राचीरों को इतना अभेद्य बना दिया कि आज आधी सदी बाद भी भारत विश्व का सबसे जीवंत और अटूट लोकतंत्र बना हुआ है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

परीक्षार्थी अक्सर सोचते हैं कि 1975 का आपातकाल विदेशी आक्रमण (युद्ध) के आधार पर लगाया गया था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

1975 का आपातकाल युद्ध के आधार पर नहीं, बल्कि अनुच्छेद 352 के तहत "आंतरिक अशांति" (Internal Disturbance) के आधार पर लगाया गया था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

विद्यार्थी यह मान लेते हैं कि 1977 में जयप्रकाश नारायण (JP) भारत के प्रधानमंत्री बने थे।

सही वैज्ञानिक तथ्य

जेपी ने कभी कोई सरकारी पद स्वीकार नहीं किया; 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने पर 81 वर्षीय "मोरारजी देसाई" देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने थे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह भ्रम होना कि 42वां संविधान संशोधन जनता पार्टी ने किया था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

42वां संशोधन (1976) इंदिरा गांधी सरकार द्वारा आपातकाल में किया गया था; जनता पार्टी ने 44वें संशोधन (1978) द्वारा उसकी अलोकतांत्रिक धाराओं को रद्द किया।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

छात्र यह समझ लेते हैं कि आपातकाल 1975 से 1980 तक 5 साल चला।

सही वैज्ञानिक तथ्य

आपातकाल 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक कुल 21 महीने चला था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

परीक्षार्थी शाह आयोग को चुनाव आयोग से मिला देते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

शाह आयोग (1977) आपातकाल के दौरान हुई सत्ता के दुरुपयोग और ज्यादतियों की जांच के लिए गठित एक विशेष जांच आयोग था, जिसके अध्यक्ष जस्टिस जे. सी. शाह थे।

लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट: आपातकाल का घटनाक्रम, ज्यादतियाँ एवं 1977 का जनादेश

🌑 1975 का राष्ट्रीय आपातकाल: संकट से लोकतंत्र की बहाली तक

जेपी आंदोलन - 25 जून 1975 की घोषणा - 21 महीने का दमन - 1977 का ऐतिहासिक जनादेश

🔥 आपातकाल की पृष्ठभूमि
  • आर्थिक संकट: 30% महंगाई, अकाल, तेल संकट
  • जेपी आंदोलन: "संपूर्ण क्रांति" का राष्ट्रव्यापी नारा
  • 1974 रेल हड़ताल: जॉर्ज फर्नांडीस का नेतृत्व
  • 12 जून 1975: इलाहाबाद HC ने इंदिरा का चुनाव रद्द किया
⛓️ 21 महीनों का दमन (1975-77)
  • घोषणा: 25 जून 1975 (अनुच्छेद 352 - आंतरिक अशांति)
  • दमन: 1.1 लाख बंदी (मीसा), प्रेस सेंसरशिप
  • संजय गांधी: तुर्कमान गेट विध्वंस, जबरन नसबंदी
  • संशोधन: 42वां संशोधन (लघु संविधान 1976)
☀️ 1977: लोकतंत्र की विजय
  • चुनाव: जनता पार्टी गठबंधन को 330 सीटें
  • ऐतिहासिक हार: इंदिरा व संजय दोनों चुनाव हारे
  • मोरारजी देसाई: प्रथम गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री
  • 44वां संशोधन (1978): अनुच्छेद 21 कभी निलंबित नहीं

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
आपातकाल की पृष्ठभूमि: 1973-74 का भीषण आर्थिक संकट, 30% महंगाई, गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन और बिहार का छात्र आंदोलन।
मुख्य बिंदु 2
जेपी की "संपूर्ण क्रांति": जयप्रकाश नारायण द्वारा भ्रष्टाचार व तानाशाही के विरुद्ध समाज के सभी 7 क्षेत्रों में क्रांति का ऐतिहासिक आह्वान।
मुख्य बिंदु 3
1974 की रेल हड़ताल: जॉर्ज फर्नांडीस के नेतृत्व में 20 दिन की देशव्यापी हड़ताल जिसे सरकार ने कठोरता से कुचल दिया।
मुख्य बिंदु 4
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय (12 जून 1975): जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा द्वारा इंदिरा गांधी के 1971 के निर्वाचन को भ्रष्ट आचरण पर रद्द करना।
मुख्य बिंदु 5
25 जून 1975 की घोषणा: अनुच्छेद 352 के तहत "आंतरिक अशांति" के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल की आधी रात में घोषणा।
मुख्य बिंदु 6
नागरिक स्वतंत्रताओं का हनन: 1.1 लाख से अधिक गिरफ्तारियां (MISA), प्रेस सेंसरशिप, और अनुच्छेद 21 (जीने के अधिकार) का निलंबन।
मुख्य बिंदु 7
संजय गांधी की ज्यादतियाँ: गैर-संवैधानिक सत्ता केंद्र के रूप में जबरन नसबंदी और दिल्ली तुर्कमान गेट पर बस्तियों का विध्वंस।
मुख्य बिंदु 8
42वां संविधान संशोधन (1976): "लघु संविधान"; संसद की असीमित शक्तियां, विधानसभाओं का कार्यकाल 6 वर्ष, और प्रस्तावना में संशोधन।
मुख्य बिंदु 9
1977 का ऐतिहासिक चुनाव: जनता पार्टी गठबंधन को 330 सीटें; इंदिरा गांधी की पराजय और मोरारजी देसाई प्रथम गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने।
मुख्य बिंदु 10
44वां संविधान संशोधन (1978): "आंतरिक अशांति" की जगह "सशस्त्र विद्रोह", कैबिनेट की लिखित सिफारिश अनिवार्य, तथा अनुच्छेद 20 व 21 कभी निलंबित न करने का सुरक्षा कवच।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के किस प्रसिद्ध न्यायाधीश ने इंदिरा गांधी का लोकसभा चुनाव रद्द किया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा (Justice Jagmohan Lal Sinha) ने।
2
1974 की ऐतिहासिक 20-दिवसीय देशव्यापी रेलवे हड़ताल का नेतृत्व किस समाजवादी नेता ने किया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: जॉर्ज फर्नांडीस (George Fernandes) ने किया था।
3
आपातकाल के दौरान किस आंतरिक सुरक्षा कानून (निवारक नज़रबंदी) के तहत विपक्ष के हजारों नेताओं को गिरफ्तार किया गया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मीसा (MISA - Maintenance of Internal Security Act)।
4
मार्च 1977 के आम चुनाव में स्वतंत्र भारत के प्रथम गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री कौन बने थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: श्री मोरारजी देसाई (Morarji Desai)।
5
1978 के 44वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 352 में "आंतरिक अशांति" के स्थान पर कौन सा नया शब्द जोड़ा गया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: "सशस्त्र विद्रोह" (Armed Rebellion) शब्द जोड़ा गया।
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