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CBSE • कक्षा XII • Political Science • अध्याय 12
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

कांग्रेस प्रणाली: चुनौतियां और पुनर्स्थापना

1960 के दशक को भारतीय राजनीति में 'खतरनाक दशक' (Dangerous Decade) कहा जाता था, जब देश को पंडित जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री के आकस्मिक निधन से उत्पन्न नेतृत्व के गंभीर संकटों, 1965 के भारत-पाक युद्ध, भयंकर सूखे और आर्थिक बदहाली का सामना करना पड़ा। इस दौर में आलोचकों को लगने लगा था कि भारतीय लोकतंत्र बिखर जाएगा। 1967 का चौथा आम चुनाव भारतीय राजनीति में एक 'राजनीतिक भूकंप' (Political Earthquake) साबित हुआ, जिसने केंद्र और राज्यों में कांग्रेस के निर्विवाद एकाधिकार को हिलाकर रख दिया और देश में गठबंधन सरकारों (संविद सरकारें) तथा 'आया राम, गया राम' (दलबदल) के नए युग की शुरुआत की। इसके तुरंत बाद पार्टी के भीतर बुजुर्ग दिग्गजों के शक्तिशाली गुट 'सिंडिकेट' (Syndicate) और युवा प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के बीच सत्ता का भीषण संघर्ष छिड़ा। 1969 के राष्ट्रपति चुनाव में वी. वी. गिरि की जीत के साथ ही कांग्रेस दो फाड़ हो गई—कांग्रेस (ओ) और कांग्रेस (आर)। परंतु 1971 के ऐतिहासिक आम चुनाव में इंदिरा गांधी ने विपक्ष के नकारात्मक गठबंधन ('इंदिरा हटाओ') के विरुद्ध 'गरीबी हटाओ' का क्रांतिकारी नारा देकर और प्रिवी पर्स व बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके ऐतिहासिक प्रचंड बहुमत हासिल किया। इस अध्याय में राजनीतिक उत्तराधिकार की चुनौती, 1967 के चौथे आम चुनाव, गैर-कांग्रेसवाद (डॉ. राम मनोहर लोहिया), 1969 में कांग्रेस का विभाजन, तथा 1971 के चुनाव में कांग्रेस प्रणाली के पुनर्स्थापन और उसकी बदली हुई प्रकृति का गहन विश्लेषण किया गया है। जैक बोर्ड (CBSE Class 12) राजनीति विज्ञान की परीक्षा में यह अध्याय 6 से 8 अंकों का महत्वपूर्ण स्थान रखता है, जिसमें 1967 के चुनाव परिणाम, कांग्रेस विभाजन के कारण, और 1971 के 'गरीबी हटाओ' चुनाव पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।

👑 क्या आपने कभी सोचा है: जिस महिला को पुराने नेताओं ने कठपुतली समझकर प्रधानमंत्री बनाया, उसने कैसे पूरी पार्टी के दिग्गजों को एक झटके में बाहर का रास्ता दिखा दिया?

1966 में जब लाल बहादुर शास्त्री का ताशकंद में अचानक निधन हुआ, तो कांग्रेस पार्टी के बूढ़े और अनुभवी नेताओं (सिंडिकेट) ने मोरारजी देसाई जैसे कद्दावर नेता को दरकिनार करके नेहरू की युवा बेटी इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का फैसला किया। जानते हैं क्यों?

सिंडिकेट के नेताओं—के. कामराज, एस. के. पाटिल और निजलिंगप्पा—को लगा था कि "इंदिरा एक कम-अनुभवी और शर्मीली महिला है, जिसे संसद में बोलने में भी झिझक होती है (विपक्ष उन्हें 'गूंगी गुड़िया' कहता था)। वह प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठकर केवल हमारे इशारों पर नाचेगी और सरकार हम चलाएंगे!"

लेकिन सिंडिकेट को यह नहीं पता था कि वे एक साधारण महिला से नहीं, बल्कि भारत की भावी 'आयरन लेडी' से खेल रहे थे! मात्र 3 साल के भीतर इंदिरा गांधी ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स समाप्त करने जैसे समाजवादी फैसले लेकर सिंडिकेट को किनारे लगा दिया। और जब 1969 में राष्ट्रपति चुनाव आया, तो पार्टी व्हिप की धज्जियां उड़ाते हुए इंदिरा ने अपनी ही पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार को हरवा दिया और निर्दलीय उम्मीदवार वी. वी. गिरि को राष्ट्रपति बनवा दिया! यह अध्याय भारतीय राजनीति के सबसे साहसिक सत्ता-संघर्ष और एक महिला के अदम्य पराक्रम का रोमांचक आख्यान है!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

इस अध्याय का अध्ययन आपके लिए क्यों अनिवार्य है?

  1. बोर्ड परीक्षा में उत्कृष्ट अंक: CBSE कक्षा 12 में "1967 के चुनाव को राजनीतिक भूकंप क्यों कहा जाता है?", "दलबदल (आया राम, गया राम)", "1969 के कांग्रेस विभाजन के कारण", और "1971 के चुनाव में इंदिरा की जीत के कारक" से 4 और 6 अंक के प्रश्न बार-बार आते हैं।
  2. संसदीय राजनीति और दलबदल की समझ: 10वीं अनुसूची (Anti-Defection Law) की ऐतिहासिक उत्पत्ति, गठबंधन सरकारों की मजबूरी और चुनावी नारों की ताकत को समझने का यह सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है।
  3. प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC/JPSC) का मुख्य विषय: सिंडिकेट का प्रभाव, 1969 का राष्ट्रपति चुनाव, प्रिवी पर्स का उन्मूलन, और 'कांग्रेस प्रणाली' के पुनर्स्थापन की नई प्रकृति सिविल सेवा मुख्य परीक्षा के अनिवार्य प्रश्न हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • नेहरू का युग: 1952-1962 में कांग्रेस का निर्विवाद प्रभुत्व और गुटों का आंतरिक प्रबंधन।

  • आर्थिक संकट 1965-66: खाद्यान्न संकट, रुपये का अवमूल्यन और जनता में व्यापक असंतोष।

  • राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया: संसद और विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों का आनुपातिक प्रतिनिधित्व।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • नेहरू के बाद राजनीतिक उत्तराधिकार (शास्त्री जी और फिर इंदिरा गांधी) के शांतिपूर्ण समाधान की व्याख्या कर सकेंगे।
  • 1967 के चौथे आम चुनाव के परिणामों को "राजनीतिक भूकंप" कहे जाने के कारणों और गठबंधन सरकारों के उदय को स्पष्ट कर सकेंगे।
  • डॉ. राम मनोहर लोहिया की "गैर-कांग्रेसवाद" (Non-Congressism) की रणनीति और "आया राम, गया राम" (दलबदल) के प्रभाव का विश्लेषण कर सकेंगे।
  • कांग्रेस पार्टी के भीतर "सिंडिकेट" और इंदिरा गांधी के बीच सत्ता संघर्ष तथा 1969 के ऐतिहासिक विभाजन के घटनाक्रम का परीक्षण कर सकेंगे।
  • 1969 के राष्ट्रपति चुनाव में वी. वी. गिरि की जीत और "अंतरात्मा की आवाज" के महत्व का मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • 1971 के चुनाव में "गरीबी हटाओ" के नारे, बांग्लादेश युद्ध की विजय और कांग्रेस प्रणाली के पुनर्स्थापन की बदली हुई प्रकृति का समालोचनात्मक अध्ययन कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. राजनीतिक उत्तराधिकार की चुनौती:...
2 2. 1967 का चौथा आम चुनाव: "राजनीतिक...
3 3. कांग्रेस में ऐतिहासिक विभाजन (19...
4 4. 1971 का आम चुनाव: "गरीबी हटाओ" औ...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. राजनीतिक उत्तराधिकार की चुनौती: नेहरू से शास्त्री और इंदिरा तक

(क) नेहरू के बाद कौन? (मई 1964)

मई 1964 में जब पंडित जवाहरलाल नेहरू का निधन हुआ, तो दुनिया भर में यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि अब भारतीय लोकतंत्र समाप्त हो जाएगा और सेना सत्ता पर कब्जा कर लेगी। परंतु कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज ने पार्टी में आम सहमति बनाई और अत्यंत सादगी पसंद, ईमानदार व निर्विवाद नेता लाल बहादुर शास्त्री सर्वसम्मति से देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने।

शास्त्री जी का कार्यकाल (1964-1966) संक्षिप्त रहा, परंतु उन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध और भीषण सूखे का दृढ़ता से सामना करते हुए ऐतिहासिक नारा दिया: "जय जवान, जय किसान!" 10 जनवरी 1966 को ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर के कुछ ही घंटों बाद उनका असामयिक निधन हो गया।

(ख) शास्त्री के बाद इंदिरा गांधी का निर्वाचन (जनवरी 1966)

शास्त्री जी के निधन के बाद प्रधानमंत्री पद के लिए मोरारजी देसाई और श्रीमती इंदिरा गांधी के बीच तीखी चुनावी प्रतिस्पर्धा हुई। कांग्रेस संसदीय दल में गुप्त मतदान हुआ, जिसमें इंदिरा गांधी ने मोरारजी देसाई को भारी बहुमत (355 के मुकाबले 169 मत) से पराजित किया और देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं।

💡 सिंडिकेट की गलत गणना:
कांग्रेस के वरिष्ठ बुजुर्ग नेताओं के गुट—'सिंडिकेट' (Syndicate)—ने इंदिरा गांधी का समर्थन इस उम्मीद में किया था कि अनुभवहीन होने के कारण वे दिशा-निर्देशों के लिए पूरी तरह सिंडिकेट पर निर्भर रहेंगी। उस समय विपक्ष ने उन्हें संसद में कम बोलने के कारण 'गूंगी गुड़िया' कहा था। परंतु इंदिरा ने शीघ्र ही अपने स्वतंत्र और कड़े फैसलों से सिंडिकेट के भ्रम को तोड़ दिया।

2. 1967 का चौथा आम चुनाव: "राजनीतिक भूकंप", गैर-कांग्रेसवाद एवं दलबदल

(क) 1967 के चुनाव का संदर्भ: अशांति और आर्थिक संकट

फरवरी 1967 का चुनाव नेहरू के बिना लड़ा गया पहला आम चुनाव था। उस समय देश भयंकर आर्थिक संकट में था: लगातार सूखा, खाद्यान्न की कमी, विदेशी मुद्रा संकट, और जून 1966 में अमेरिकी दबाव में रुपये का अवमूल्यन (1 डॉलर = 5 रुपये से बढ़कर 7.50 रुपये)। देश भर में मूल्य वृद्धि और बेरोजगारी के विरुद्ध व्यापक बंद, हड़तालें और हिंसक प्रदर्शन हो रहे थे।

(ख) डॉ. राम मनोहर लोहिया का "गैर-कांग्रेसवाद" (Non-Congressism)

प्रख्यात समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया ने विपक्ष को एकजुट करने के लिए 'गैर-कांग्रेसवाद' का सैद्धांतिक नारा दिया। उनका तर्क था:

  • कांग्रेस का शासन अलोकतांत्रिक और गरीबों व किसानों के हितों के विरुद्ध है।
  • विपक्षी दलों के मत आपस में बंट जाने के कारण कांग्रेस अल्पमत वोट (45%) पाकर भी सत्ता में बनी रहती है।
  • अतः लोकतंत्र की रक्षा और गरीबों के कल्याण के लिए सभी विपक्षी दलों (चाहे वे दक्षिणपंथी जनसंघ हों या वामपंथी कम्युनिस्ट) को अपने मतभेद भुलाकर एक मंच पर आना चाहिए ताकि कांग्रेस विरोधी वोट न बंटें।

(ग) 1967 के चुनाव परिणाम: "राजनीतिक भूकंप"

चुनाव परिणामों ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया:

  1. लोकसभा में झटका: कांग्रेस केंद्र में सरकार तो बना पाई, परंतु उसे अब तक की सबसे कम सीटें (520 में से मात्र 283) और सबसे कम मत प्रतिशत मिला। इंदिरा गांधी के आधे से अधिक केंद्रीय मंत्री (स्वयं कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज, एस. के. पाटिल, अतुल्य घोष आदि) चुनाव हार गए!
  2. राज्यों में सफाया: देश के 9 राज्यों (पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मद्रास और केरल) में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं। मद्रास (तमिलनाडु) में सी. एन. अन्नादुरई के नेतृत्व में द्रमुक (DMK) ने पूर्ण बहुमत हासिल किया और पहली बार किसी क्षेत्रीय दल ने बिना गठबंधन के सरकार बनाई।

(घ) गठबंधन सरकारें एवं "आया राम, गया राम" (दलबदल)

राज्यों में विरोधी विचारधारा वाली पार्टियों ने मिलकर 'संयुक्त विधायक दल' (SVD) की मिली-जुली सरकारें बनाईं (जैसे उत्तर प्रदेश में जनसंघ और सोशलिस्ट पार्टी साथ आ गए)।

🏃‍♂️ 'आया राम, गया राम' (The Defection Culture):
1967 के चुनाव के बाद भारतीय राजनीति में दलबदल (Defection) का एक घिनौना दौर शुरू हुआ। विधायक निजी लाभ, मंत्री पद या पैसे के लालच में बार-बार पार्टियां बदलने लगे।
- ऐतिहासिक संदर्भ: हरियाणा के एक निर्दलीय विधायक गया लाल (Gaya Lal) ने 1967 में मात्र एक पखवाड़े (15 दिन) के भीतर तीन बार पार्टी बदली! जब वे दोबारा कांग्रेस में लौटे, तो कांग्रेस नेता राव बीरेंद्र सिंह ने चंडीगढ़ में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा: "गया राम अब आया राम हैं!"
- इसी घटना से भारतीय राजनीति का अमर मुहावरा 'आया राम, गया राम' प्रचलित हुआ। इस राजनीतिक खरीद-फरोख्त के कारण 1967 से 1971 के बीच राज्यों में कई सरकारें बनीं और गिरीं। (अंततः 1985 में राजीव गांधी सरकार ने 52वें संविधान संशोधन द्वारा 10वीं अनुसूची में 'दलबदल विरोधी कानून' बनाया)।

3. कांग्रेस में ऐतिहासिक विभाजन (1969): सिंडिकेट बनाम इंदिरा गांधी

(क) सिंडिकेट और इंदिरा के बीच आंतरिक संघर्ष

1967 के झटके के बाद इंदिरा गांधी ने अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए वामपंथी और समाजवादी रुख अपनाया। मई 1967 में उन्होंने कांग्रेस कार्यसमिति से दस सूत्रीय कार्यक्रम (Ten-Point Programme) पारित कराया, जिसमें 14 प्रमुख निजी बैंकों का सामाजिक नियंत्रण/राष्ट्रीयकरण, सामान्य बीमा का राष्ट्रीयकरण, शहरी संपत्ति की सीमा तय करना और राजाओं के 'प्रिवी पर्स' की समाप्ति शामिल थी। सिंडिकेट के रूढ़िवादी नेताओं (विशेषकर मोरारजी देसाई) ने इन फैसलों का कड़ा विरोध किया।

(ख) 1969 का ऐतिहासिक राष्ट्रपति चुनाव: "अंतरात्मा की आवाज"

मई 1969 में राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन के आकस्मिक निधन के बाद राष्ट्रपति पद का चुनाव सिंडिकेट और इंदिरा गांधी के बीच आर-पार की लड़ाई बन गया:

  • सिंडिकेट का दांव: सिंडिकेट ने इंदिरा की असहमति के बावजूद लोकसभा अध्यक्ष नीलम संजीव रेड्डी को कांग्रेस का आधिकारिक उम्मीदवार घोषित कर दिया।
  • इंदिरा का जवाबी वार: इंदिरा गांधी ने तत्कालीन उपराष्ट्रपति वी. वी. गिरि (V. V. Giri) को एक स्वतंत्र (निर्दलीय) उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल करने के लिए प्रेरित किया।
  • व्हिप का उल्लंघन: कांग्रेस अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा ने सभी कांग्रेस सांसदों और विधायकों को संजीव रेड्डी के पक्ष में मतदान करने का सख्त व्हिप (Whip) जारी किया। इसके जवाब में इंदिरा गांधी ने खुलकर ऐलान किया कि सभी निर्वाचित प्रतिनिधि किसी पार्टी व्हिप के बजाय अपनी 'अंतरात्मा की आवाज' (Conscience Vote) पर मतदान करें!
🗳️ चुनाव परिणाम और कांग्रेस का विभाजन:
वी. वी. गिरि ने आधिकारिक कांग्रेसी प्रत्याशी संजीव रेड्डी को ऐतिहासिक रूप से पराजित कर दिया! इस अपमान से तिलमिलाकर कांग्रेस अध्यक्ष निजलिंगप्पा ने 12 नवंबर 1969 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पार्टी से निष्कासित कर दिया।
इसके साथ ही कांग्रेस औपचारिक रूप से दो दलों में टूट गई:
  1. कांग्रेस (ओ - Organisation): सिंडिकेट और मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली पुरानी कांग्रेस (Old Congress)।
  2. कांग्रेस (आर - Requisitionists): इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली नई कांग्रेस (New Congress)।
संसद में बहुमत खोने के बावजूद इंदिरा सरकार ने भाकपा (CPI) और द्रमुक (DMK) के बाहरी समर्थन से अपनी सरकार को कुशलतापूर्वक चलाए रखा।

4. 1971 का आम चुनाव: "गरीबी हटाओ" और कांग्रेस प्रणाली का पुनर्स्थापन

(क) समय से पूर्व चुनाव की घोषणा (दिसंबर 1970)

इंदिरा गांधी वामपंथी दलों के बाहरी समर्थन पर निर्भर रहने के बजाय अपनी पूर्ण शक्ति स्थापित करना चाहती थीं। अतः उन्होंने दिसंबर 1970 में लोकसभा भंग करने की साहसिक सिफारिश कर दी और फरवरी 1971 में 5वें आम चुनाव हुए।

(ख) चुनावी मुकाबले का वैचारिक ध्रुवीकरण: "इंदिरा हटाओ" बनाम "गरीबी हटाओ"

इस चुनाव में आमने-सामने दो बिल्कुल विपरीत गठबंधन और नारे थे:

  • महागठबंधन (Grand Alliance): सभी गैर-कम्युनिस्ट और गैर-कांग्रेसी विपक्षी दलों—कांग्रेस (ओ), भारतीय जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (SSP), प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP)—ने मिलकर एक विशाल मोर्चा बनाया। उनके पास कोई सकारात्मक सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम नहीं था; उनका केवल एक नकारात्मक नारा था: "इंदिरा हटाओ!"
  • इंदिरा गांधी का मास्टरस्ट्रोक: इंदिरा गांधी ने जनता के सामने सीधा तर्क दिया कि विपक्ष के पास देश के विकास का कोई एजेंडा नहीं है, वे केवल मुझे हटाना चाहते हैं। उन्होंने एक चमत्कारी और ऐतिहासिक नारा दिया: "वे कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूँ गरीबी हटाओ!" इसके साथ उन्होंने 20-सूत्रीय कार्यक्रम और भूमिहीनों, दलितों व अल्पसंख्यकों के कल्याण का क्रांतिकारी वादा किया।

(ग) 1971 के चुनावी नतीजे और पुनर्स्थापन

परिणामों ने एक बार फिर दुनिया को हतप्रभ कर दिया:

राजनीतिक दल / गुटप्राप्त सीटें (लोकसभा)परिणाम की राजनीतिक महत्ता
कांग्रेस (आर) + CPI गठबंधन 375 सीटें (48.4% मत) इंदिरा गांधी की कांग्रेस ने अकेले 352 सीटें और 44% मत जीते! ऐतिहासिक प्रचंड बहुमत।
कांग्रेस (ओ) - सिंडिकेट मात्र 16 सीटें सिंडिकेट का राजनीतिक अस्तित्व लगभग समाप्त हो गया। साबित हुआ कि असली कांग्रेस इंदिरा की कांग्रेस है।
विपक्षी 'महागठबंधन' 40 से भी कम सीटें विपक्ष पूरी तरह धूल-धूसरित हो गया।

(घ) पुनर्स्थापित कांग्रेस प्रणाली की बदली हुई प्रकृति

1971 के अंत में भारत ने पाकिस्तान को युद्ध में हराकर बांग्लादेश को मुक्त कराया, जिसने इंदिरा गांधी की लोकप्रियता को हिमालय जैसी ऊंचाई पर पहुंचा दिया। विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में उन्हें 'दुर्गा' की संज्ञा दी।

परंतु यह पुनर्स्थापित कांग्रेस नेहरू के दौर की 'कांग्रेस प्रणाली' से बुनियादी रूप से भिन्न थी:

  • आंतरिक लोकतंत्र का अभाव: पुरानी कांग्रेस में विभिन्न गुटों को सहन किया जाता था और पार्टी के भीतर स्वतंत्र चर्चा होती थी। नई कांग्रेस पूरी तरह एक व्यक्ति—इंदिरा गांधी के सर्वोपरि करिश्मे—पर केंद्रित हो गई।
  • कमजोर संगठनात्मक ढांचा: पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता और प्रांतीय नेता अब स्वतंत्र शक्ति नहीं रहे; वे केवल 'हाईकमान' (इंदिरा गांधी) की कृपा पर निर्भर रहने लगे।
  • संस्थागत संतुलन का टूटना: इस अति-केंद्रीकरण ने पार्टी को तात्कालिक रूप से बहुत शक्तिशाली बनाया, परंतु भविष्य के संकटों को झेलने की उसकी संस्थागत क्षमता को खोखला कर दिया, जिसकी परिणति 1975 के 'आपातकाल' (Emergency) के रूप में हुई।

महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक सिद्धांत एवं कालक्रम

27 मई 1964
पंडित जवाहरलाल नेहरू का निधन; लाल बहादुर शास्त्री दूसरे प्रधानमंत्री बने।
1965
भारत-पाकिस्तान युद्ध; शास्त्री जी का नारा "जय जवान, जय किसान"।
10 जनवरी 1966
ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर; शास्त्री जी का असामयिक निधन।
24 जनवरी 1966
इंदिरा गांधी ने मोरारजी देसाई को हराकर प्रथम महिला प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।
जून 1966
आर्थिक संकट के कारण इंदिरा गांधी सरकार द्वारा भारतीय रुपये का अवमूल्यन।
फरवरी 1967
चौथा आम चुनाव ("राजनीतिक भूकंप"); 9 राज्यों में कांग्रेस पराजित, संविद सरकारों का दौर।
मई 1967
इंदिरा गांधी द्वारा बैंकों के सामाजिक नियंत्रण हेतु "दस सूत्रीय कार्यक्रम" पारित।
मई 1969
राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन का निधन; राष्ट्रपति पद को लेकर पार्टी में घमासान।
19 जुलाई 1969
इंदिरा गांधी द्वारा देश के 14 बड़े निजी वाणिज्यिक बैंकों का ऐतिहासिक राष्ट्रीयकरण।
अगस्त 1969
राष्ट्रपति चुनाव में वी. वी. गिरि की जीत; इंदिरा की "अंतरात्मा की आवाज" की विजय।
12 नवंबर 1969
कांग्रेस अध्यक्ष निजलिंगप्पा द्वारा इंदिरा गांधी निष्कासित; कांग्रेस का औपचारिक विभाजन।
दिसंबर 1970
इंदिरा गांधी की सिफारिश पर लोकसभा भंग; समय से पूर्व आम चुनाव की घोषणा।
फरवरी 1971
5वां आम चुनाव; "गरीबी हटाओ" के नारे के साथ इंदिरा कांग्रेस की प्रचंड जीत (352 सीटें)।
16 दिसंबर 1971
भारत द्वारा 1971 युद्ध में विजय; बांग्लादेश की मुक्ति, इंदिरा गांधी का अभूतपूर्व उत्कर्ष।
1971
संविधान संशोधन द्वारा भूतपूर्व राजाओं के "प्रिवी पर्स" की आधिकारिक समाप्ति।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1 (1 अंक - वस्तुनिष्ठ): 1967 के चौथे आम चुनाव के समय विपक्ष को एकजुट करने के लिए "गैर-कांग्रेसवाद" (Non-Congressism) का नारा किस समाजवादी नेता ने दिया था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
"गैर-कांग्रेसवाद" का ऐतिहासिक नारा प्रख्यात समाजवादी नेता और चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया ने दिया था।
उदाहरण 2
प्रश्न 2 (2 अंक - अति लघु उत्तरीय): भारतीय राजनीति में "आया राम, गया राम" जुमला किस राजनीतिक घटना से संबंधित है और इसका क्या अर्थ है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
संबंधित घटना: 1967 में हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने एक पखवाड़े में तीन बार पार्टियां बदली थीं। इसी संदर्भ में कांग्रेस नेता राव बीरेंद्र सिंह ने कहा था "गया राम अब आया राम हैं।"
अर्थ: यह मुहावरा चुनाव जीतने के बाद विधायकों या सांसदों द्वारा अपने निजी व आर्थिक लाभ के लिए निष्ठा बदलकर बार-बार दलबदल (Defection) करने की अनैतिक प्रवृत्ति का प्रतीक बन गया।
उदाहरण 3
प्रश्न 3 (4 अंक - लघु उत्तरीय): 1967 के चौथे आम चुनाव के परिणामों को भारतीय राजनीति में "राजनीतिक भूकंप" क्यों कहा जाता है? किन्हीं चार कारणों को स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1967 के चुनाव परिणामों को "राजनीतिक भूकंप" निम्नलिखित कारणों से कहा जाता है:

  1. केंद्र में कांग्रेस के बहुमत में भारी गिरावट: आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस को लोकसभा में सबसे कम सीटें (मात्र 283) और सबसे कम मत प्रतिशत (40.8%) मिला।
  2. शीर्ष कांग्रेसी नेताओं की करारी हार: कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज, एस. के. पाटिल, अतुल्य घोष और बी. बी. पटनायक जैसे दिग्गज सिंडिकेट नेता चुनाव हार गए।
  3. 9 राज्यों में कांग्रेस की सत्ता का अंत: उत्तर भारत के लगभग सभी राज्यों (पंजाब, हरियाणा, यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश, केरल, मद्रास) में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं।
  4. गठबंधन (संविद) सरकारों का उदय: पहली बार विरोधी दलों ने मिलकर संयुक्त विधायक दल (SVD) की गठबंधन सरकारें बनाईं तथा मद्रास में द्रमुक (DMK) के रूप में पहली बार किसी क्षेत्रीय दल को पूर्ण बहुमत मिला।
उदाहरण 4
प्रश्न 4 (4 अंक - लघु उत्तरीय): 1969 में कांग्रेस पार्टी के ऐतिहासिक विभाजन के प्रमुख कारणों की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1969 में कांग्रेस के विभाजन के मुख्य कारण निम्नलिखित थे:

  1. सिंडिकेट बनाम इंदिरा का सत्ता संघर्ष: सिंडिकेट के बुजुर्ग नेता इंदिरा गांधी को अपनी कठपुतली बनाकर रखना चाहते थे, जबकि इंदिरा गांधी ने सरकार और पार्टी पर अपना स्वतंत्र नियंत्रण स्थापित करना चाहा।
  2. वैचारिक मतभेद: इंदिरा गांधी ने 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स की समाप्ति जैसे कट्टर समाजवादी कदम उठाए, जिसे सिंडिकेट के दक्षिणपंथी नेताओं (मोरारजी देसाई आदि) ने नापसंद किया।
  3. 1969 का राष्ट्रपति चुनाव: सिंडिकेट ने नीलम संजीव रेड्डी को प्रत्याशी बनाया, जबकि इंदिरा ने स्वतंत्र प्रत्याशी वी. वी. गिरि का समर्थन किया।
  4. व्हिप का उल्लंघन और निष्कासन: इंदिरा गांधी ने पार्टी व्हिप के विरुद्ध 'अंतरात्मा की आवाज' पर वोट देने की अपील की जिससे गिरि जीत गए। फलस्वरूप कांग्रेस अध्यक्ष निजलिंगप्पा ने इंदिरा को पार्टी से निष्कासित कर दिया और पार्टी दो फाड़ हो गई।
उदाहरण 5
प्रश्न 5 (6 अंक - दीर्घ उत्तरीय): "1971 के आम चुनाव में श्रीमती इंदिरा गांधी की विजय ने यह सिद्ध कर दिया कि असली कांग्रेस वही थी जिसका नेतृत्व वे कर रही थीं।" इस कथन के आलोक में 1971 के चुनाव में इंदिरा की जीत के प्रमुख कारकों और पुनर्स्थापित कांग्रेस प्रणाली की प्रकृति का विस्तारपूर्वक मूल्यांकन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1969 में कांग्रेस विभाजन के बाद सिंडिकेट के पुराने दिग्गज स्वयं को 'असली कांग्रेस' [कांग्रेस (ओ)] मानते थे। परंतु 1971 के पांचवें आम चुनाव में इंदिरा गांधी की कांग्रेस (आर) ने 352 सीटें जीतकर सिंडिकेट को मात्र 16 सीटों पर समेट दिया और साबित किया कि वास्तविक कांग्रेस वही थी।

(क) 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी की प्रचंड विजय के मुख्य कारक:

  1. 'गरीबी हटाओ' का क्रांतिकारी नारा: विपक्षी 'महागठबंधन' (Grand Alliance) के पास कोई सकारात्मक नीति नहीं थी; उनका नारा केवल "इंदिरा हटाओ" था। इसके विपरीत इंदिरा ने देश की नब्ज पहचानते हुए नारा दिया: "वे कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूँ गरीबी हटाओ!" इस नारे ने करोड़ों गरीबों, किसानों और बेरोजगारों को सीधे उनसे जोड़ दिया।
  2. साहसिक और प्रगतिशील समाजवादी नीतियां: 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण, राजाओं के सामंती विशेषाधिकारों (प्रिवी पर्स) का उन्मूलन, और भूमि सुधारों के संकल्प ने इंदिरा की छवि 'गरीबों और वंचितों की मसीहा' के रूप में स्थापित कर दी।
  3. नया सामाजिक जनाधार: इंदिरा गांधी ने पारंपरिक जातीय गठजोड़ों से परे जाकर भूमिहीन खेतिहर मजदूरों, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों का एक नया और वफादार वोट बैंक तैयार किया।
  4. करिश्माई एवं निर्णायक नेतृत्व: इंदिरा गांधी ने एक साहसी, दृढ़ और निडर नेता के रूप में जनता का अटूट विश्वास जीता।

(ख) पुनर्स्थापित कांग्रेस प्रणाली की बदली हुई प्रकृति (Nature of Restored System):
यद्यपि इंदिरा गांधी ने कांग्रेस के वर्चस्व को दोबारा स्थापित कर दिया, परंतु यह नेहरू के दौर की 'कांग्रेस प्रणाली' की पुरानी संरचना नहीं थी:

  1. अति-केंद्रीकरण एवं व्यक्ति-पूजा: नेहरू की कांग्रेस एक 'विशाल सराय' थी जहाँ विभिन्न गुटों, स्वतंत्र विचारों और आंतरिक मतभेदों का सम्मान होता था। नई कांग्रेस पूरी तरह एक ही व्यक्ति—इंदिरा गांधी के व्यक्तिगत करिश्मे—पर आश्रित हो गई।
  2. संगठनात्मक कमजोरी: पार्टी का स्थानीय और प्रांतीय कैडर कमजोर हो गया। मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष अब लोकतांत्रिक ढंग से चुने जाने के बजाय दिल्ली हाईकमान द्वारा 'मनोनीत' किए जाने लगे।
  3. संस्थागत प्रतिरोध की असमर्थता: जब पार्टी आंतरिक लोकतंत्र और जमीनी कार्यकर्ताओं के प्रभाव से वंचित हो गई, तो वह जनता के बढ़ते असंतोष को भांपने में असमर्थ रही, जिसकी परिणति आगे चलकर 1975 के 'आपातकाल' के रूप में सामने आई।

निष्कर्ष: 1971 के चुनाव और उसके बाद बांग्लादेश युद्ध की विजय ने इंदिरा गांधी को भारतीय राजनीति का निर्विवाद सम्राट बना दिया। उन्होंने कांग्रेस प्रणाली को पुनर्स्थापित तो किया, परंतु उसके लोकतांत्रिक स्वरूप को बदलकर उसे एक अत्यधिक केंद्रीकृत और व्यक्ति-केंद्रित सत्ता में तब्दील कर दिया।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

परीक्षार्थी अक्सर सोचते हैं कि 1967 के चुनाव में कांग्रेस केंद्र की सत्ता से भी बाहर हो गई थी।

सही वैज्ञानिक तथ्य

कांग्रेस केंद्र में लोकसभा का चुनाव जीत गई थी (283 सीटें) और इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी थीं। वह केवल 9 राज्यों की विधानसभाओं में हारी थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

विद्यार्थी यह मान लेते हैं कि 1969 में कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा इंदिरा गांधी को राष्ट्रपति बनाया गया था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं; 1969 में राष्ट्रपति पद के चुनाव में उन्होंने वी. वी. गिरि का समर्थन किया था जो स्वतंत्र उम्मीदवार थे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह भ्रम होना कि सिंडिकेट वाली कांग्रेस (ओ) चुनाव जीत गई थी।

सही वैज्ञानिक तथ्य

1971 के चुनाव में सिंडिकेट की कांग्रेस (ओ) मात्र 16 सीटों पर सिमट गई थी, जबकि इंदिरा की कांग्रेस (आर) ने 352 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत प्राप्त किया था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

छात्र "प्रिवी पर्स" की समाप्ति को 1947 की घटना समझ लेते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

प्रिवी पर्स (राजाओं की पेंशन) को 1971 में 26वें संविधान संशोधन द्वारा इंदिरा गांधी सरकार ने समाप्त किया था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

परीक्षार्थी संविद (SVD) सरकारों को कांग्रेस की सरकारें समझ लेते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

संविद (संयुक्त विधायक दल) सरकारें 1967 में गैर-कांग्रेसी दलों (जनसंघ, सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट आदि) द्वारा मिलकर बनाई गई गठबंधन सरकारें थीं।

कांग्रेस प्रणाली का संकट, विभाजन एवं पुनर्स्थापन (1964-1971)

🇮🇳 कांग्रेस प्रणाली का संकट, विभाजन एवं पुनर्स्थापन (1964-1971)

1967 का राजनीतिक भूकंप - 1969 का विभाजन - 1971 की "गरीबी हटाओ" विजय

💥 1967 का राजनीतिक भूकंप
  • नतीजे: केंद्र में मात्र 283 सीटें; 9 राज्यों में हार
  • लोहिया का फॉर्मूला: "गैर-कांग्रेसवाद"
  • गठबंधन दौर: संविद (SVD) सरकारें
  • विकृति: "आया राम, गया राम" (दलबदल)
⚔️ 1969: कांग्रेस का विभाजन
  • द्वंद्व: सिंडिकेट (कामराज) vs इंदिरा गांधी
  • राष्ट्रपति चुनाव: वी.वी. गिरि vs संजीव रेड्डी
  • हथियार: "अंतरात्मा की आवाज" पर मतदान
  • विभाजन: कांग्रेस (O) बनाम कांग्रेस (R)
👑 1971: पुनर्स्थापन
  • मुकाबला: "इंदिरा हटाओ" vs "गरीबी हटाओ"
  • प्रचंड विजय: कांग्रेस (R) को 352 सीटें
  • बांग्लादेश विजय: इंदिरा का शीर्ष उत्कर्ष
  • नया रूप: अत्यधिक केंद्रीकृत हाईकमान संस्कृति

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
खतरनाक दशक: 1960 के दशक में नेहरू और शास्त्री का देहांत, युद्ध, सूखा और आर्थिक संकट झेलना पड़ा।
मुख्य बिंदु 2
इंदिरा का चयन (1966): सिंडिकेट ने मोरारजी देसाई के मुकाबले इंदिरा गांधी का समर्थन किया, उन्हें एक कठपुतली समझकर।
मुख्य बिंदु 3
1967 का चुनाव ("राजनीतिक भूकंप"): केंद्र में कांग्रेस के बहुत कम सीटें मिलीं और 9 राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं।
मुख्य बिंदु 4
गैर-कांग्रेसवाद: डॉ. राम मनोहर लोहिया द्वारा कांग्रेस विरोधी मतों के बिखराव को रोकने के लिए दिया गया सैद्धांतिक आह्वान।
मुख्य बिंदु 5
दलबदल ("आया राम, गया राम"): हरियाणा के गया लाल की 15 दिन में 3 बार पार्टी बदलने की घटना से दलबदल संस्कृति की शुरुआत।
मुख्य बिंदु 6
दस सूत्रीय कार्यक्रम (1967): इंदिरा गांधी द्वारा 14 बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स समाप्ति जैसे समाजवादी सुधारों की घोषणा।
मुख्य बिंदु 7
1969 का राष्ट्रपति चुनाव: इंदिरा समर्थित निर्दलीय वी. वी. गिरि ने आधिकारिक कांग्रेसी प्रत्याशी संजीव रेड्डी को हराया।
मुख्य बिंदु 8
कांग्रेस का विभाजन (1969): इंदिरा गांधी निष्कासित हुईं; पार्टी कांग्रेस (ओ - सिंडिकेट) और कांग्रेस (आर - इंदिरा) में बंट गई।
मुख्य बिंदु 9
1971 का आम चुनाव: विपक्षी महागठबंधन के "इंदिरा हटाओ" के जवाब में इंदिरा का ऐतिहासिक नारा "गरीबी हटाओ"; कांग्रेस (आर) को 352 सीटें।
मुख्य बिंदु 10
पुनर्स्थापित कांग्रेस की प्रकृति: पुरानी लोकतांत्रिक व सहिष्णु कांग्रेस के स्थान पर इंदिरा गांधी के सर्वोपरि करिश्मे पर टिकी केंद्रीकृत पार्टी का उदय।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
1966 में लाल बहादुर शास्त्री के आकस्मिक निधन के बाद प्रधानमंत्री पद के लिए इंदिरा गांधी का मुकाबला किस वरिष्ठ नेता से हुआ था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मोरारजी देसाई (Morarji Desai) से हुआ था।
2
1967 के चुनाव में किस राज्य में पहली बार किसी गैर-कांग्रेसी क्षेत्रीय दल (DMK) ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मद्रास राज्य (वर्तमान तमिलनाडु) में सी. एन. अन्नादुरई के नेतृत्व में।
3
1969 के राष्ट्रपति चुनाव में स्वतंत्र (निर्दलीय) उम्मीदवार के रूप में विजय प्राप्त करने वाले नेता कौन थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: श्री वी. वी. गिरि (V. V. Giri)।
4
1971 के आम चुनाव में श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा दिया गया सबसे लोकप्रिय और ऐतिहासिक नारा क्या था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: "गरीबी हटाओ!" (Remove Poverty)।
5
जुलाई 1969 में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा कितने बड़े निजी वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 14 बड़े निजी वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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