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CBSE • कक्षा XII • Political Science • अध्याय 1
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

दो ध्रुवीयता का अंत

केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) कक्षा 12 राजनीति विज्ञान के समकालीन विश्व राजनीति भाग का द्वितीय अध्याय 'दो ध्रुवीयता का अंत' (The End of Bipolarity) 20वीं सदी के सबसे युगांतरकारी वैश्विक भू-राजनीतिक परिवर्तन का संपूर्ण एवं प्रामाणिक विश्लेषण करता है। 9 नवंबर 1989 को शीतयुद्ध के प्रतीक 'बर्लिन की दीवार' का आम जनता द्वारा ढहाया जाना और 25 दिसंबर 1991 को 15 गणराज्यों से बने शक्तिशाली सोवियत समाजवादी गणराज्य संघ (USSR) का औपचारिक विघटन आधुनिक विश्व इतिहास का निर्णायक मोड़ था। इस अध्याय में सोवियत प्रणाली की आंतरिक संरचना व कमजोरियाँ, मिखाइल गोर्बाचेव की सुधार नीतियाँ (ग्लासनोस्त एवं पेरेस्त्रोइका), सोवियत पतन के आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक कारण, पूर्व साम्यवादी देशों पर थोपी गई विनाशकारी 'शॉक थेरेपी' (Shock Therapy), चेचन्या व मध्य एशिया में उपजे संघर्ष, तथा सोवियत संघ के उत्तराधिकारी रूस के साथ भारत के सामरिक, ऊर्जा एवं कूटनीतिक संबंधों का गहन, प्रामाणिक और परीक्षा-उन्मुख अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।

🔨 क्या आपने कभी सोचा है: जिस महाशक्ति के पास दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु मिसाइलें, 50 लाख की विशाल सेना और असीमित तेल भंडार थे, वह बिना कोई युद्ध लड़े ताश के पत्तों की तरह कैसे ढह गई?

🏰 9 नवंबर 1989 की रात बर्लिन में लाखों उन्मादी नागरिकों ने हथौड़ों और छेनी से उस 155 किमी लंबी कंक्रीट की दीवार को ढहाना शुरू किया, जो 28 वर्षों से शीतयुद्ध के विभाजन का सबसे अभेद्य प्रतीक थी!

इसके मात्र दो वर्ष बाद, 25 दिसंबर 1991 को मॉस्को के क्रेमलिन से सोवियत संघ का लाल झंडा (हंसिया और हथौड़ा) हमेशा के लिए उतार दिया गया और रूसी तिरंगा लहरा दिया गया। बिना एक भी परमाणु मिसाइल दागे, दुनिया की सबसे विशाल महाशक्ति 15 स्वतंत्र देशों में बिखर गई!

आखिर वह सोवियत प्रणाली क्या थी जिसने एक पिछड़े कृषि प्रधान देश को अंतरिक्ष की दौड़ में अमेरिका से आगे पहुँचा दिया था? फिर अचानक ऐसी क्या आंतरिक सड़न पैदा हुई कि वहाँ के नागरिकों को ब्रेड और मक्खन के लिए घंटों कतारों में खड़ा होना पड़ा? और पतन के बाद जब पूंजीवाद थोपने के लिए 'शॉक थेरेपी' दी गई, तो रूस की 90% राष्ट्रीय संपत्ति कौड़ियों के भाव माफियाओं के हाथों क्यों बिक गई?

आइए, समकालीन विश्व राजनीति को एकाकी महाशक्ति (अमेरिकी वर्चस्व) के युग में धकेलने वाले इस महा-पतन की संपूर्ण गाथा को गहराई से समझें।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

सोवियत संघ के पतन ने विश्व से द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था को समाप्त कर अमेरिका के नेतृत्व में 'एक-ध्रुवीय विश्व' (Unipolar World) की स्थापना की। आज का रूस-यूक्रेन युद्ध, नाटो का पूर्वी यूरोप में विस्तार, मध्य एशियाई देशों (कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान) के तेल-गैस संसाधन तथा भारत-रूस के ऐतिहासिक संबंधों के मूल सूत्र इसी अध्याय में निहित हैं। सीबीएसई बोर्ड परीक्षा एवं CUET में शॉक थेरेपी, सोवियत प्रणाली की कमियों और भारत-रूस संबंधों पर अनिवार्य रूप से 3-अंक और 5-अंक के दीर्घ उत्तरीय प्रश्न पूछे जाते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • 1917 की रूसी बोल्शेविक क्रांति (व्लादिमीर लेनिन का नेतृत्व) और पूंजीवाद विरोधी साम्यवादी राज्य की स्थापना।
  • द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945) में नाजी जर्मनी को हराने में सोवियत लाल सेना (Red Army) का अप्रतिम योगदान।
  • शीतयुद्ध की द्वि-ध्रुवीय संरचना (Bipolarity) तथा पूर्वी यूरोप के देशों पर सोवियत संघ का वैचारिक व सैन्य नियंत्रण (वारसॉ पैक्ट)।
  • पूंजीवादी बाजार अर्थव्यवस्था (मुक्त व्यापार) बनाम समाजवादी नियोजित अर्थव्यवस्था (राज्य का एकाधिकार) का बुनियादी अंतर।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • सोवियत राजनीतिक और आर्थिक प्रणाली (Soviet System) की सकारात्मक विशेषताओं और नकारात्मक कमियों का संतुलित विश्लेषण कर सकेंगे।
  • मिखाइल गोर्बाचेव द्वारा प्रारंभ किए गए सुधारों—'ग्लासनोस्त' (खुलापन) और 'पेरेस्त्रोइका' (पुनर्गठन) के उद्देश्यों एवं परिणामों का मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • सोवियत संघ के विघटन के मूलभूत कारणों (आर्थिक गतिहीनता, नौकरशाही का शिकंजा, हथियारों की अंधी दौड़, राष्ट्रवाद का उभार) को तर्कपूर्ण ढंग से सिद्ध कर सकेंगे।
  • सोवियत संघ के पतन के वैश्विक परिणामों (शीतयुद्ध का अंत, अमेरिकी वर्चस्व, 15 नए देशों का उदय, वारसॉ पैक्ट का विघटन) की विस्तृत समीक्षा कर सकेंगे।
  • विश्व बैंक व IMF द्वारा निर्देशित 'शॉक थेरेपी' (Shock Therapy) की प्रक्रिया, 'इतिहास की सबसे बड़ी गराज सेल' और रूसी अर्थव्यवस्था पर इसके विनाशकारी प्रभावों की व्याख्या कर सकेंगे।
  • पूर्व सोवियत गणराज्यों (चेचन्या, दागिस्तान, ताजिकिस्तान, जॉर्जिया) में भड़के गृहयुद्धों और युगोस्लाविया के हिंसक विखंडन का अध्ययन कर सकेंगे।
  • सोवियत संघ के उत्तराधिकारी के रूप में रूस की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति तथा भारत-रूस बहुध्रुवीय वैश्विक संबंधों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. सोवियत प्रणाली क्या थी? सकारात्म...
2 2. मिखाइल गोर्बाचेव और सुधारों की व...
3 3. सोवियत संघ के विघटन के मूल कारण...
4 4. सोवियत संघ के विघटन के वैश्विक प...
5 5. शॉक थेरेपी और इसके विनाशकारी प्र...
6 6. पूर्व साम्यवादी देशों में तनाव,...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. सोवियत प्रणाली क्या थी? सकारात्मक पहलू एवं अंतर्निहित कमजोरियाँ (The Soviet System: Strengths & Weaknesses)

सोवियत प्रणाली (Soviet System) की उत्पत्ति: 1917 की रूसी बोल्शेविक क्रांति (Bolshevik Revolution) के बाद स्थापित सोवियत समाजवादी गणराज्य संघ (USSR) मानव इतिहास का पहला ऐसा देश था जिसने पूंजीवादी शोषण को समाप्त कर कार्ल मार्क्स और व्लादिमीर लेनिन के विचारों के आधार पर 'समानता' और 'समाजवाद' के आदर्शों पर राज्य की नींव रखी। इसमें निजी संपत्ति की संस्था को समाप्त कर दिया गया और संपूर्ण उत्पादन के साधनों (उद्योग, भूमि, खनिज) पर राज्य का एकाधिकार स्थापित किया गया।

(क) सोवियत प्रणाली की सकारात्मक विशेषताएं (Strengths of Soviet System)

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ विश्व की दूसरी सबसे विशाल आर्थिक व सैन्य महाशक्ति बना। अमेरिका को छोड़कर सोवियत अर्थव्यवस्था दुनिया के किसी भी अन्य देश से कहीं अधिक विकसित थी:

  • जटिल संचार एवं ऊर्जा नेटवर्क: सोवियत संघ के पास तेल, लोहा, इस्पात और प्राकृतिक गैस के विशाल खनिज भंडार थे। साइबेरिया के सुदूर बर्फीले इलाकों से लेकर मध्य एशिया तक एक अत्यंत सुदृढ़ परिवहन नेटवर्क फैला हुआ था।
  • घरेलू उपभोक्ता उद्योग में आत्मनिर्भरता: सोवियत उद्योग छोटी-सी पिन से लेकर विशालकाय जेट विमानों तक का निर्माण घरेलू स्तर पर स्वयं करता था। हालांकि इनकी गुणवत्ता पश्चिमी उत्पादों से कम थी, फिर भी देश आयात पर निर्भर नहीं था।
  • न्यूनतम जीवन स्तर की सरकारी गारंटी (Welfare State): राज्य सभी नागरिकों के लिए एक न्यूनतम गरिमापूर्ण जीवन स्तर सुनिश्चित करता था। स्वास्थ्य सेवाएँ, प्राथमिक व उच्च शिक्षा, बाल देखभाल और आवास रियायती दरों पर सरकारी खर्चे पर उपलब्ध थे।
  • शून्य बेरोजगारी (Zero Unemployment): प्रत्येक नागरिक को काम का कानूनी अधिकार था और देश में व्यावहारिक रूप से बेरोजगारी समाप्त हो चुकी थी। भूमि और प्रमुख उत्पादन संपत्तियाँ राज्य के स्वामित्व में थीं।

(ख) सोवियत प्रणाली की अंतर्निहित कमजोरियाँ एवं विकृतियाँ (Inherent Flaws)

सकारात्मक पहलुओं के बावजूद सोवियत प्रणाली समय के साथ सड़ने लगी और जनता के लिए दमघोंटू बन गई:

कमजोरी का क्षेत्रविस्तृत विश्लेषण एवं जनता पर प्रभाव
1. नौकरशाही का शिकंजा (Bureaucratic Choke)सोवियत प्रणाली अत्यधिक नौकरशाही और तानाशाही (Authoritarian) हो गई। सत्ता आम जनता या निर्वाचित प्रतिनिधियों के बजाय अनुत्तरदायी नौकरशाहों (Aparatchiks) के हाथों में केंद्रित हो गई, जो जनता के प्रति तनिक भी संवेदनशील नहीं थे।
2. लोकतंत्र और अभिव्यक्ति का अभावदेश में बोलने की स्वतंत्रता (Freedom of Speech) का पूर्ण अभाव था। सरकार या व्यवस्था की आलोचना करने पर नागरिकों को साइबेरिया के यातना शिविरों (Gulags) में भेज दिया जाता था। लोग अपनी असहमति केवल चुटकुलों और कार्टूनों के जरिए व्यक्त कर पाते थे।
3. एक ही दल का 70 वर्षों का एकाधिकारसोवियत संघ में केवल एक ही राजनीतिक दल—सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी (CPSU) का शासन था। किसी भी विपक्षी दल या स्वतंत्र संगठन की अनुमति नहीं थी। दल का हर स्तर पर पूर्ण नियंत्रण था और वह जनता के प्रति पूरी तरह निरंकुश व जवाबदेही से मुक्त था।
4. रूसी गणराज्य का अनुचित प्रभुत्वयद्यपि सोवियत संघ कागजों पर 15 गणराज्यों (रूस, यूक्रेन, बेलारूस, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान आदि) का संघ था, परंतु व्यवहार में अकेले रूस (Russia) का हर क्षेत्र (राजनीति, सेना, संस्कृति) पर अनुचित दबदबा था। बाकी 14 गणराज्यों की जनता खुद को अपमानित और उपेक्षित महसूस करती थी।
5. हथियारों की अंधी होड़ एवं आर्थिक संकटअमेरिका से सैन्य बराबरी की होड़ में सोवियत संघ ने अपने सीमित राष्ट्रीय बजट का 70-80% हिस्सा परमाणु मिसाइलों, अंतरिक्ष कार्यक्रमों और सेना पर फूंक दिया। परिणामतः उपभोक्ता वस्तुओं की भीषण कमी हो गई, तकनीकी पिछड़ापन बढ़ा और खाद्यान्न आयात करना पड़ा।

2. मिखाइल गोर्बाचेव और सुधारों की विफलता (Gorbachev's Reforms: Glasnost & Perestroika)

मार्च 1985 में सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने मिखाइल गोर्बाचेव (Mikhail Gorbachev) ने सोवियत प्रणाली को बचाने और उसे पश्चिमी देशों के तकनीकी स्तर पर लाने के लिए साहसिक सुधारों की शुरुआत की। परंतु इन सुधारों की गति और दिशा पर उनका नियंत्रण नहीं रहा, जिससे विघटन की प्रक्रिया अप्रत्याशित रूप से तीव्र हो गई।

(क) गोर्बाचेव के दो मूल मंत्र: पेरेस्त्रोइका एवं ग्लासनोस्त

पेरेस्त्रोइका (Perestroika - पुनर्गठन)

इसका अर्थ था—सोवियत आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था का पुनर्गठन। गोर्बाचेव ने केंद्रीय योजना के कठोर नियंत्रण को ढीला किया, उद्यमों को सीमित स्वायत्तता दी, विदेशी निवेश को अनुमति दी और बाजार तत्वों को पेश किया। उनका उद्देश्य समाजवाद को नष्ट करना नहीं, बल्कि उसे अधिक कार्यकुशल और आधुनिक बनाना था।

ग्लासनोस्त (Glasnost - खुलापन)

इसका अर्थ था—सार्वजनिक जीवन में अभिव्यक्ति और विचार की पूर्ण स्वतंत्रता। मीडिया पर से सरकारी सेंसरशिप हटा ली गई, नागरिकों को कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों, इतिहास की गलतियों (स्टालिन के अत्याचारों) और भ्रष्टाचार की खुली आलोचना करने का अधिकार दिया गया।

(ख) सुधारों का उल्टा असर और गोर्बाचेव का राजनीतिक अंतर्द्वंद्व

गोर्बाचेव के सुधारों ने एक ऐसा भंवर पैदा किया जिसमें वे दोनों तरफ से घिर गए:

  • कट्टरपंथियों (Hardliners) का विरोध: कम्युनिस्ट पार्टी के पुराने नेताओं और नौकरशाहों का मानना था कि गोर्बाचेव बहुत तेजी से सुधार कर रहे हैं, जिससे पार्टी का दबदबा और साम्यवाद की नींव हिल रही है।
  • उदारवादियों व आम जनता (Reformers) की निराशा: दूसरी ओर, बोरिस येल्तसिन (Boris Yeltsin) के नेतृत्व वाले आमूलचूल सुधारवादियों और जनता का मानना था कि सुधारों की गति बहुत धीमी है और इससे रोजमर्रा के जीवन (महंगाई, ब्रेड की कमी) में कोई तुरंत लाभ नहीं मिल रहा है।
  • अगस्त 1941 का असफल तख्तापलट (August 1991 Coup): अगस्त 1991 में कम्युनिस्ट पार्टी के कट्टरपंथियों ने गोर्बाचेव को क्रीमिया में नजरबंद कर तख्तापलट करने की कोशिश की। परंतु मॉस्को की जनता सड़कों पर उतर आई और बोरिस येल्तसिन ने एक टैंक पर चढ़कर तख्तापलट का ऐतिहासिक विरोध किया। तख्तापलट विफल हो गया, लेकिन इस घटना ने गोर्बाचेव की बची-खुची सत्ता छीन ली और बोरिस येल्तसिन रूस के निर्विवाद नायक बनकर उभरे।

3. सोवियत संघ के विघटन के मूल कारण (Causes of the Collapse of the Soviet Union)

सोवियत संघ का पतन किसी एक व्यक्ति या तात्कालिक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि यह दशकों से संचित आर्थिक, राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक और राष्ट्रवादी विसंगतियों का विस्फोट था। इसके मुख्य कारणों का विश्लेषण निम्नलिखित 5 बिंदुओं में है:

प्रमुख कारणगहन विश्लेषण एवं परीक्षा बिंदु
1. आंतरिक आर्थिक गतिहीनता एवं खजाने का दोहनसोवियत संघ ने अपने संसाधनों का एक विशाल हिस्सा (लगभग 20% जीडीपी) परमाणु और पारंपरिक हथियारों के निर्माण, अंतरिक्ष दौड़ और पूर्वी यूरोप के अपने उपग्रह राज्यों (Satellite States) को वफादार बनाए रखने पर खर्च किया। सोवियत अर्थव्यवस्था 1970 के दशक के उत्तरार्ध से ही ठहर चुकी थी। उपभोक्ता वस्तुओं की भारी कमी हो गई, ब्रेड और दूध की दुकानों के बाहर मीलों लंबी कतारें लगने लगीं और 1970 के बाद सोवियत संघ को प्रतिवर्ष लाखों टन गेहूं पश्चिमी देशों से आयात करना पड़ा।
2. पश्चिमी जीवन स्तर से जनता की तुलना (मनोवैज्ञानिक आघात)दशकों तक सोवियत जनता को यह झूठ बताया गया था कि साम्यवादी व्यवस्था पूंजीवाद से कहीं बेहतर है और पश्चिमी देशों में भुखमरी व शोषण है। लेकिन ग्लासनोस्त (खुलेपन) और टेलीविजन-सिनेमा के कारण जब सोवियत नागरिकों को पश्चिमी देशों की जीवनशैली, आधुनिक तकनीक, कारों और उपभोग के स्तर का पता चला, तो उनका साम्यवादी व्यवस्था से मोहभंग हो गया। वे खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगे।
3. राजनीतिक-प्रशासनिक पक्षाघात एवं नौकरशाही का भ्रष्टाचारकम्युनिस्ट पार्टी पिछले 70 वर्षों से सत्ता में थी और वह जनता की आशाओं-आकांक्षाओं से पूरी तरह कट चुकी थी। पार्टी के उच्च अधिकारी (Nomenklatura) विलासितापूर्ण जीवन जी रहे थे, जबकि आम नागरिक अभावों में जी रहा था। व्यापक भ्रष्टाचार, जनता के प्रति जवाबदेही का पूर्ण अभाव और केंद्रीय सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण व्यवस्था के पतन का कारण बना।
4. राष्ट्रवादी भावनाओं और संप्रभुता की इच्छा का उभार (सर्वाधिक निर्णायक कारण)सोवियत संघ के विभिन्न गणराज्यों में दमित राष्ट्रवाद (Nationalism) और संप्रभु राज्य बनने की भावना अचानक भड़क उठी। आश्चर्यजनक रूप से राष्ट्रवाद की शुरुआत सबसे पहले बाल्टिक गणराज्यों—एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया तथा यूक्रेन, जॉर्जिया और स्वयं रूस में हुई। इन गणराज्यों के नागरिकों को लगने लगा कि केंद्रीय सोवियत संघ उन पर आर्थिक बोझ है और वे अलग होकर अधिक समृद्ध बन सकते हैं।
5. गोर्बाचेव के सुधारों की गलत गति एवं दिशागोर्बाचेव ने एक ऐसी व्यवस्था को सुधारने का प्रयास किया जो सुधार के योग्य ही नहीं बची थी। उन्होंने राजनीतिक स्वतंत्रता पहले दे दी (ग्लासनोस्त), जिससे जनता को सड़कों पर उतरने का अवसर मिल गया, जबकि आर्थिक मोर्चे पर वे कोई तुरंत राहत नहीं दे सके। जब जनता की आकांक्षाओं का बांध टूटा, तो गोर्बाचेव के पास उसे थामने का कोई साधन नहीं बचा।
🚨 दिसंबर 1991: सोवियत संघ का औपचारिक अंत:
दिसंबर 1991 में बोरिस येल्तसिन के नेतृत्व में सोवियत संघ के तीन सबसे बड़े स्लाव गणराज्यों—रूस, यूक्रेन और बेलारूस ने सोवियत संघ के विघटन की ऐतिहासिक घोषणा की। कम्युनिस्ट पार्टी को प्रतिबंधित कर दिया गया। 25 दिसंबर 1991 को मिखाइल गोर्बाचेव ने सोवियत राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया और इसके साथ ही 69 वर्ष पुराना सोवियत साम्राज्य हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन हो गया।

4. सोवियत संघ के विघटन के वैश्विक परिणाम (Global Consequences of the Disintegration)

सोवियत संघ के पतन ने संपूर्ण विश्व व्यवस्था को आमूलचूल रूप से बदल दिया। इसके मुख्य वैश्विक परिणाम निम्नलिखित 5 आयामों में स्पष्ट हैं:

  1. शीतयुद्ध कालीन संघर्ष एवं हथियारों की होड़ की समाप्ति: 1945 से चला आ रहा पूंजीवाद बनाम साम्यवाद का वैचारिक द्वंद्व समाप्त हो गया। परमाणु हथियारों की अंधाधुंध होड़ पर विराम लगा और दोनों गुटों के बीच सैन्य तनाव समाप्त होने से विश्व शांति की नई संभावनाएँ खुलीं।
  2. शक्ति-संतुलन में ऐतिहासिक बदलाव (एक-ध्रुवीय विश्व का उदय): विश्व द्वि-ध्रुवीयता से निकलकर एक-ध्रुवीय (Unipolar) बन गया, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका एकमात्र निर्विवाद वैश्विक महाशक्ति (Hyperpower/Hegemon) बनकर उभरा। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था और उदारवादी लोकतंत्र को पूरी दुनिया में विकास का एकमात्र सर्वश्रेष्ठ मॉडल स्वीकार कर लिया गया। अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं (IMF, World Bank) पर अमेरिकी प्रभाव निर्णायक हो गया।
  3. 15 नए स्वतंत्र राष्ट्रों का उदय: सोवियत संघ के मलबे से 15 नए संप्रभु देश बने। इनमें बाल्टिक देश (एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया) नाटो और यूरोपीय संघ (EU) में शामिल हो गए, जबकि रूस सहित अन्य गणराज्यों ने स्वतंत्र देशों का राष्ट्रकुल (CIS - Commonwealth of Independent States) बनाया।
  4. रूस को सोवियत संघ का उत्तराधिकारी स्वीकार किया जाना:
    • रूस को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सोवियत संघ की स्थायी वीटो सीट दी गई।
    • सोवियत संघ द्वारा हस्ताक्षरित सभी अंतर्राष्ट्रीय संधियों और दायित्वों को निभाने की जिम्मेदारी रूस ने ली।
    • सोवियत संघ के सभी पूर्व गणराज्यों (यूक्रेन, बेलारूस, कजाकिस्तान) के परमाणु हथियारों को रूस को सौंप दिया गया, जिससे रूस एकमात्र परमाणु-सज्जित सोवियत उत्तराधिकारी बना।
  5. वारसॉ पैक्ट का अंत एवं नाटो का विस्तार: 1955 में बना सोवियत सैन्य गठबंधन वारसॉ पैक्ट औपचारिक रूप से भंग हो गया, जबकि अमेरिकी गठबंधन नाटो समाप्त होने के बजाय पूर्व की ओर रूस की सीमाओं तक फैलता चला गया।

5. शॉक थेरेपी और इसके विनाशकारी प्रभाव (Shock Therapy: Concepts, Garage Sale & Disaster)

शॉक थेरेपी (Shock Therapy) की वैज्ञानिक परिभाषा: सोवियत संघ के विघटन के पश्चात रूस, पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया के पूर्व साम्यवादी देशों में सत्तावादी समाजवादी व्यवस्था से लोकतांत्रिक पूंजीवादी मुक्त बाजार व्यवस्था में संक्रमण (Transition) के लिए विश्व बैंक (World Bank) और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा निर्देशित जिस दर्दनाक, तीव्र और क्रूर आर्थिक मॉडल को थोपा गया, उसे 'शॉक थेरेपी' (आघात पहुँचाकर उपचार करना) कहा जाता है।

(क) शॉक थेरेपी की मुख्य कार्यप्रणाली एवं विशेषताएँ

  • निजी संपत्ति का पूर्ण प्रभुत्व: राज्य के स्वामित्व वाले विशाल कारखानों, खेतों और उपक्रमों का त्वरित निजीकरण (Privatization)। सामूहिक कृषि (Kolkhoz) की जगह निजी फार्मों की स्थापना।
  • मुक्त व्यापार एवं मुद्रा परिवर्तनीयता: विदेशी पूंजी निवेश (FDI) के लिए अर्थव्यवस्था को पूरी तरह खोलना, वित्तीय विनिमय और मुद्राओं की मुक्त परिवर्तनीयता (Convertibility)।
  • पारस्परिक व्यापार गठबंधनों का टूटना: सोवियत खेमे के देशों के बीच दशकों पुराने व्यापारिक संबंध तोड़ दिए गए और प्रत्येक देश को सीधे पश्चिमी पूंजीवादी तंत्र से जोड़ दिया गया।

(ख) शॉक थेरेपी के विनाशकारी परिणाम (The Catastrophic Consequences)

शॉक थेरेपी ने इन देशों को समृद्धि देने के बजाय उनकी संपूर्ण अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने को बर्बाद कर दिया:

प्रभाव का क्षेत्रविस्तृत परिणाम एवं ऐतिहासिक तथ्य
1. इतिहास की सबसे बड़ी गराज सेल (The Largest Garage Sale in History)रूस का विशाल औद्योगिक ढांचा, जिसे खड़ा करने में 70 वर्ष लगे थे, पूरी तरह चरमरा गया। रूस के लगभग 90% बड़े सरकारी उद्योगों को निजी हाथों और कंपनियों को औने-पौने दामों में बेच दिया गया। हालांकि नागरिकों को उद्योगों में हिस्सेदारी के लिए 'अधिकार पत्र' (Vouchers) दिए गए थे, लेकिन गरीबी के कारण लोगों ने अपने वाउचर कालाबाजारियों को सस्ते में बेच दिए। अमूल्य राष्ट्रीय संपत्तियों को कौड़ियों के भाव माफियाओं ने लूट लिया।
2. रूसी मुद्रा रूबल का महा-अवमूल्यनरूसी मुद्रा रूबल (Ruble) का मूल्य अंतरराष्ट्रीय बाजार में नाटकीय रूप से गिर गया। मुद्रास्फीति (Inflation) इतनी तीव्र थी कि लोगों की जीवन भर की जमा-पूंजी और बचतें कुछ ही महीनों में स्वाहा हो गईं। खाद्यान्न संकट गहरा गया और रूस को विदेशों से खाना मंगाना पड़ा।
3. समाज कल्याण प्रणाली का विनाशसोवियत काल की मुफ्त स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास की कल्याणकारी व्यवस्था को रातों-रात खत्म कर दिया गया। सरकारी सब्सिडी समाप्त होने से आबादी का एक विशाल हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे चला गया। अकादमिक और बौद्धिक वर्ग बिखर गया या विदेश पलायन कर गया।
4. माफिया राज एवं भीषण आर्थिक विषमताअधिकांश पूर्व सोवियत देशों में संगठित आपराधिक गिरोहों (Mafia) का उदय हुआ, जिन्होंने आर्थिक गतिविधियों और बैंकों पर नियंत्रण कर लिया। अमीर और गरीब के बीच इतनी गहरी खाई पैदा हो गई जैसी रूस के इतिहास में कभी नहीं देखी गई थी।
5. लोकतांत्रिक संस्थाओं की उपेक्षा एवं अधिनायकवादसंविधान इतनी जल्दबाजी में बनाए गए कि राष्ट्रपतियों को असीमित शक्तियाँ दे दी गईं और संसदों (Duma) को पंगु बना दिया गया। मध्य एशिया (तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान) में राष्ट्रपतियों ने खुद को 10-10 वर्षों के लिए सत्ता में बैठा लिया और सभी विरोधियों को कुचल दिया।

6. पूर्व साम्यवादी देशों में तनाव, संघर्ष एवं भारत-रूस संबंध (Conflicts in Post-Communist States & India-Russia Ties)

(क) पूर्व सोवियत गणराज्यों में तनाव एवं गृहयुद्ध (Tensions & Civil Wars)

सोवियत संघ के पतन के बाद कई गणराज्यों में पुराने जातीय, धार्मिक और सीमाई विवाद हिंसक संघर्षों में बदल गए:

  • रूस में चेचन्या एवं दागिस्तान: रूस के दो उत्तरी काकेशस गणराज्यों—चेचन्या (Chechnya) और दागिस्तान में हिंसक अलगाववादी आंदोलन चले। रूस ने चेचन विद्रोहियों को कुचलने के लिए हवाई बमबारी और भारी सैन्य बल का प्रयोग किया, जिसमें मानवाधिकारों का व्यापक हनन हुआ।
  • मध्य एशिया में ताजिकिस्तान का गृहयुद्ध: ताजिकिस्तान में लगभग 10 वर्षों (1992-2001) तक भयानक जातीय गृहयुद्ध चला। मध्य एशियाई गणराज्यों (अजरबैजान, आर्मेनिया, जॉर्जिया) में तेल-गैस भंडारों पर नियंत्रण के लिए पश्चिमी तेल कंपनियों और महाशक्तियों के बीच अखाड़ा बन गया।
  • युगोस्लाविया का खूनी विखंडन: बाल्कन क्षेत्र में स्थित युगोस्लाविया जातीय हिंसा की आग में जलकर कई स्वतंत्र देशों में टूट गया—बोस्निया-हर्जेगोविना, क्रोएशिया, स्लोवेनिया, मैसेडोनिया, सर्बिया और मोंटेनेग्रो। नाटो ने सर्बिया पर 1999 में भीषण बमबारी की।

(ख) भारत और सोवियत संघ/रूस के ऐतिहासिक संबंध (India-Russia Relations)

भारत के सभी पूर्व साम्यवादी देशों के साथ मधुर संबंध रहे हैं, परंतु भारत के सबसे घनिष्ठ, रणनीतिक और परखे हुए संबंध रूस के साथ हैं। भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रूस के साथ संबंध रहा है:

सहयोग का क्षेत्रपारस्परिक लाभ एवं ऐतिहासिक तथ्य
1. बहु-ध्रुवीय विश्व का साझा विजन (Multipolar World)भारत और रूस दोनों का दृढ़ विश्वास है कि विश्व किसी एक महाशक्ति (अमेरिका) के अधीन नहीं होना चाहिए, बल्कि बहु-ध्रुवीय (Multipolar) होना चाहिए, जहाँ अंतर्राष्ट्रीय संप्रभुता, वार्ता द्वारा विवाद समाधान और संयुक्त राष्ट्र की सर्वोच्चता का सम्मान हो।
2. कश्मीर एवं भू-राजनीतिक समर्थनरूस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कश्मीर मुद्दे पर हमेशा भारत के रुख का समर्थन किया और कई बार अपने वीटो (Veto) का उपयोग करके भारत विरोधी पश्चिमी प्रस्तावों को गिराया। इसी प्रकार भारत ने चेचन्या और अन्य मुद्दों पर रूस के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप का विरोध किया।
3. रक्षा एवं सैन्य साजो-सामान (Defense Ties)भारत अपने सैन्य साजो-सामान का लगभग 60-70% हिस्सा रूस से आयात करता है। सुखोई-30MKI, T-90 भीष्म टैंक, S-400 वायु रक्षा प्रणाली तथा ब्रह्मोस (BrahMos) सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का संयुक्त निर्माण भारत-रूस रक्षा सहयोग के प्रतीक हैं।
4. ऊर्जा सुरक्षा एवं परमाणु ऊर्जा (Energy Security)भारत तेल और गैस का बड़ा आयातक है। रूस के सखालिन-1 तेल क्षेत्र में भारतीय कंपनी ONGC विदेश ने भारी निवेश किया है। रूस ने तमिलनाडु के कुडनकुलम में परमाणु ऊर्जा संयंत्र की इकाइयों का निर्माण किया है।
5. अंतरिक्ष अनुसंधान एवं वैज्ञानिक सहयोगसोवियत संघ ने भारत के प्रथम उपग्रह 'आर्यभट्ट' (1975) के प्रक्षेपण में मदद की थी तथा राकेश शर्मा 1984 में सोवियत अंतरिक्ष यान से अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय बने। रूस ने भारत के क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन कार्यक्रम में महत्वपूर्ण तकनीकी मदद दी।

महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक सिद्धांत एवं कालक्रम

1917
रूसी बोल्शेविक क्रांति (लेनिन का नेतृत्व) - विश्व के प्रथम साम्यवादी राज्य USSR की स्थापना।
मार्च 1985
मिखाइल गोर्बाचेव सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने; 'पेरेस्त्रोइका' व 'ग्लासनोस्त' की शुरुआत।
1989
9 नवंबर 1989 को बर्लिन की दीवार का आम जनता द्वारा पतन - शीतयुद्ध के अंत का प्रतीक।
मार्च 1990
लिथुआनिया सोवियत संघ से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करने वाला पहला गणराज्य बना।
जून 1991
बोरिस येल्तसिन रूसी गणराज्य के पहले निर्वाचित राष्ट्रपति बने।
अगस्त 1991
कम्युनिस्ट पार्टी के कट्टरपंथियों द्वारा गोर्बाचेव के खिलाफ असफल तख्तापलट का प्रयास।
दिसंबर 1991
रूस, यूक्रेन व बेलारूस द्वारा USSR के विघटन की घोषणा; स्वतंत्र देशों का राष्ट्रकुल (CIS) बना।
25 दिसंबर 1991
मिखाइल गोर्बाचेव का सोवियत राष्ट्रपति पद से इस्तीफा; सोवियत संघ का औपचारिक अंत।
1992
पूर्व साम्यवादी देशों में विश्व बैंक व IMF द्वारा 'शॉक थेरेपी' की शुरुआत; इतिहास की सबसे बड़ी गराज सेल।
2001
भारत और रूस के बीच सामरिक साझेदारी पर ऐतिहासिक समझौते (द्विपक्षीय वार्षिक शिखर सम्मेलन) पर हस्ताक्षर।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
Q1 (दीर्घ उत्तरीय - CBSE 5 Marks): 'शॉक थेरेपी' (Shock Therapy) क्या थी? इसने पूर्व सोवियत देशों की अर्थव्यवस्था और समाज को किस प्रकार तबाह कर दिया? सविस्तार वर्णन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: 1. शॉक थेरेपी की अवधारणा: सोवियत संघ के विघटन के बाद 1992 में विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा निर्देशित पूंजीवादी मुक्त बाजार व्यवस्था में संक्रमण के तीव्र, कष्टकारी और दर्दनाक मॉडल को 'शॉक थेरेपी' (आघात पहुँचाकर उपचार करना) कहा जाता है। इसमें राज्य नियंत्रित अर्थव्यवस्था को रातों-रात निजी हाथों में सौंपने की नीति अपनाई गई।

2. अर्थव्यवस्था और समाज पर विनाशकारी प्रभाव:
  • इतिहास की सबसे बड़ी गराज सेल: रूस के 70 वर्षों में निर्मित लगभग 90% बड़े सरकारी औद्योगिक उपक्रमों को निजी कंपनियों और व्यक्तियों को औने-पौने दामों में बेच दिया गया। बाजार की ताकतों ने औद्योगिक ढांचे को पूरी तरह नष्ट कर दिया।
  • रूसी मुद्रा रूबल का महा-अवमूल्यन: रूसी मुद्रा रूबल के मूल्य में भारी गिरावट आई। मुद्रास्फीति (महंगाई) इतनी बेतहाशा बढ़ी कि आम नागरिकों की जीवन भर की जमा-पूंजी शून्य हो गई। खाद्यान्न आयात करना पड़ा।
  • सामाजिक सुरक्षा तंत्र का ध्वस्त होना: सोवियत काल में मिलने वाली मुफ्त चिकित्सा, रियायती शिक्षा, आवास और खाद्यान्न सब्सिडी बंद कर दी गई। इसके परिणामस्वरूप आबादी का एक बड़ा हिस्सा अचानक गरीबी और भुखमरी के गर्त में गिर गया।
  • माफिया राज का उदय: निजीकरण की प्रक्रिया के दौरान आर्थिक गतिविधियों, बैंकों और व्यापार पर संगठित आपराधिक गिरोहों (Mafia) का एकाधिकार स्थापित हो गया, जिससे भ्रष्टाचार चरम पर पहुँच गया।
  • भीषण आर्थिक विषमता: अमीर और गरीब के बीच ऐतिहासिक खाई उत्पन्न हो गई। कुछ ही वर्षों में रूस की अधिकांश दौलत मुट्ठी भर कुलीन पूंजीपतियों (Oligarchs) के हाथों में सिमट गई।
निष्कर्ष: शॉक थेरेपी ने सोवियत देशों को आर्थिक स्वर्ग का सपना दिखाकर नरक के मुंह में धकेल दिया, जिससे उबरने में रूस को एक दशक से अधिक का समय लगा।
उदाहरण 2
Q2 (दीर्घ उत्तरीय - CBSE 5 Marks): सोवियत संघ के विघटन के मुख्य कारणों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: सोवियत संघ के विघटन के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
  1. आर्थिक गतिहीनता एवं हथियारों की होड़: सोवियत संघ ने अमेरिका से सैन्य बराबरी करने के पागलपन में अपने सीमित राष्ट्रीय संसाधनों का 70% से अधिक हिस्सा हथियारों और उपग्रह देशों पर खर्च कर दिया। उपभोक्ता उद्योगों की उपेक्षा के कारण 1970 के बाद खाद्यान्न संकट पैदा हुआ और अर्थव्यवस्था ठहर गई।
  2. कम्युनिस्ट पार्टी का निरंकुश व अनुत्तरदायी शासन: पिछले 70 वर्षों से सत्ता पर काबिज सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी (CPSU) पूरी तरह भ्रष्ट, अक्षम और जनता के प्रति अनुत्तरदायी हो चुकी थी। पार्टी के विशेषाधिकार प्राप्त अधिकारी जनता के दुखों से बेखबर थे।
  3. नागरिक स्वतंत्रताओं और लोकतंत्र का पूर्ण अभाव: देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं थी। नागरिक अपनी सरकार की आलोचना नहीं कर सकते थे, जिससे जनता में व्यवस्था के प्रति गहरा असंतोष और दमघोंटू वातावरण था।
  4. राष्ट्रवादी भावनाओं और संप्रभुता की तीव्र आकांक्षा: सोवियत संघ के विभिन्न गणराज्यों (विशेषकर बाल्टिक देशों—एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया तथा यूक्रेन व रूस) में अपनी स्वतंत्र राष्ट्रीय पहचान और संप्रभुता की इच्छा भड़क उठी। यह विघटन का सबसे तात्कालिक व शक्तिशाली कारण सिद्ध हुआ।
  5. गोर्बाचेव के सुधारों की विफलता: मिखाइल गोर्बाचेव ने 'ग्लासनोस्त' (खुलापन) और 'पेरेस्त्रोइका' (पुनर्गठन) के जरिए सुधार शुरू किए, लेकिन वे व्यवस्था पर नियंत्रण नहीं रख सके। कट्टरपंथी और सुधारवादी दोनों उनसे नाराज हो गए और व्यवस्था बिखर गई।
उदाहरण 3
Q3 (लघु उत्तरीय - CBSE 3 Marks): सोवियत संघ के विघटन के कोई तीन प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय परिणाम लिखिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: सोवियत संघ के विघटन के तीन प्रमुख परिणाम निम्नलिखित हैं:
  1. शीतयुद्ध कालीन संघर्ष का अंत: अमेरिका और सोवियत संघ के मध्य 1945 से चली आ रही 45 वर्षों की वैचारिक शत्रुता और परमाणु हथियारों की अंधी होड़ समाप्त हो गई तथा वारसॉ पैक्ट भंग हो गया।
  2. एक-ध्रुवीय विश्व और अमेरिकी वर्चस्व का प्रादुर्भाव: विश्व द्वि-ध्रुवीयता से निकलकर एक-ध्रुवीय बन गया, जिसमें अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति बन गया और पूंजीवादी उदारवादी व्यवस्था का वैश्विक प्रभुत्व स्थापित हुआ।
  3. 15 नए स्वतंत्र देशों का उदय: सोवियत संघ के विघटन से रूस, यूक्रेन, बेलारूस, बाल्टिक गणराज्यों और मध्य एशियाई देशों सहित 15 नए संप्रभु राष्ट्र विश्व मानचित्र पर उभरे।
उदाहरण 4
Q4 (अवधारणात्मक - CBSE 3 Marks): सोवियत प्रणाली की कोई तीन सकारात्मक विशेषताएँ बताइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: सोवियत प्रणाली की तीन प्रमुख सकारात्मक विशेषताएँ निम्नलिखित थीं:
  1. न्यूनतम जीवन स्तर की गारंटी: सोवियत राज्य अपने सभी नागरिकों के लिए स्वास्थ्य, मुफ्त शिक्षा, सस्ती बाल देखभाल और रियायती आवास की गारंटी देता था।
  2. पूर्ण रोजगार: सोवियत संघ में कोई भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं था; प्रत्येक नागरिक को काम का संवैधानिक अधिकार प्राप्त था।
  3. आत्मनिर्भर घरेलू उद्योग: देश में सुई से लेकर विशालकाय जेट विमानों तक सभी उपभोक्ता व भारी वस्तुओं का निर्माण अपने ही कारखानों में होता था, जिससे देश आत्मनिर्भर था।
उदाहरण 5
Q5 (तुलनात्मक - CBSE 4 Marks): भारत और रूस के घनिष्ठ संबंधों के मुख्य आधार क्या हैं? संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: भारत और रूस के ऐतिहासिक संबंधों के मुख्य आधार निम्नलिखित हैं:
  1. बहु-ध्रुवीय विश्व का साझा संकल्प: दोनों देश अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में किसी एक देश के वर्चस्व का विरोध करते हैं और संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का समर्थन करते हैं।
  2. रक्षा व सैन्य सहयोग: भारत के कुल सैन्य साजो-सामान का 60% से अधिक रूस से आता है। दोनों देश मिलकर ब्रह्मोस मिसाइल और सुखोई विमानों का निर्माण करते हैं।
  3. ऊर्जा सुरक्षा: रूस भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के लिए कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है तथा कुडनकुलम में परमाणु रिएक्टर बना रहा है।
  4. कश्मीर मुद्दे पर कूटनीतिक समर्थन: रूस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कश्मीर के मामले पर हमेशा भारत के रुख का समर्थन किया है और अपने वीटो का प्रयोग किया है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भ्रम: सोवियत संघ के पतन की शुरुआत और मांग मध्य एशिया के गरीब गणराज्यों (ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान आदि) ने की थी।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वास्तविकता: मध्य एशियाई गणराज्य सोवियत संघ में ही बने रहना चाहते थे। विघटन की शुरुआत सबसे समृद्ध यूरोपीय बाल्टिक गणराज्यों (एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया) और स्वयं रूस और यूक्रेन के राष्ट्रवादियों ने की थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भ्रम: 'शॉक थेरेपी' सोवियत संघ को आर्थिक पतन से बचाने के लिए एक सफल योजना सिद्ध हुई।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वास्तविकता: शॉक थेरेपी ने अर्थव्यवस्था को सुधारा नहीं, बल्कि 90% उद्योगों को नष्ट कर दिया, रूबल का अवमूल्यन हुआ और जनता को भीषण गरीबी और माफिया राज में धकेल दिया। इसे 'इतिहास की सबसे बड़ी गराज सेल' कहा गया।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भ्रम: मिखाइल गोर्बाचेव सोवियत संघ और समाजवाद को समाप्त करना चाहते थे।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वास्तविकता: गोर्बाचेव साम्यवाद को नष्ट नहीं, बल्कि 'पेरेस्त्रोइका' और 'ग्लासनोस्त' के माध्यम से उसे आधुनिक, लोकतांत्रिक और मजबूत बनाकर बचाना चाहते थे। परंतु परिस्थितियों पर उनका नियंत्रण छूट गया।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भ्रम: सोवियत संघ के विघटन के बाद उसके सभी पूर्व 15 गणराज्यों के पास परमाणु हथियार बने रहे।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वास्तविकता: यूक्रेन, कजाकिस्तान और बेलारूस के सभी परमाणु हथियार समझौते के तहत रूस को सौंप दिए गए और केवल रूस को ही एकमात्र परमाणु उत्तराधिकारी राज्य स्वीकार किया गया।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भ्रम: रूस में 1991 के तख्तापलट का विरोध गोर्बाचेव ने सड़कों पर उतरकर किया था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वास्तविकता: गोर्बाचेव उस समय नजरबंद थे। तख्तापलट का ऐतिहासिक विरोध जनता के साथ मिलकर टैंक पर चढ़कर बोरिस येल्तसिन ने किया था, जिससे वे जननायक बने।

सोवियत विघटन की शृंखला एवं 15 नए गणराज्यों का उदय (Soviet Collapse & Succession Architecture)

सोवियत संघ (USSR) का विखंडन (1917 - 1991) एवं भू-राजनीतिक रूपांतरण

द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था का अंत $\implies$ शॉक थेरेपी $\implies$ एक-ध्रुवीय अमेरिकी वर्चस्व
⚠️ विघटन के मूल कारक
  • सैन्य होड़ में खजाने का विनाश
  • कम्युनिस्ट पार्टी का 70 वर्षीय निरंकुश शासन
  • उपभोक्ता वस्तुओं व खाद्यान्न का भारी संकट
  • बाल्टिक व रूसी राष्ट्रवाद का विस्फोटक उभार
  • गोर्बाचेव के सुधारों (ग्लासनोस्त/पेरेस्त्रोइका) की विफलता
⚡ निर्णायक ऐतिहासिक मोड़
  • 9 नवं 1989: बर्लिन की दीवार का पतन
  • मार्च 1990: लिथुआनिया स्वतंत्र घोषित
  • अगस्त 1991: येल्तसिन का तख्तापलट विरोध
  • दिसंबर 1991: रूस, यूक्रेन, बेलारूस अलग
  • 25 दिसं 1991: सोवियत संघ का पूर्ण विसर्जन
📉 शॉक थेरेपी का कहर
  • 90% उद्योगों की 'गराज सेल' में कौड़ियों के भाव बिक्री
  • रूसी मुद्रा रूबल का महा-अवमूल्यन
  • सामाजिक सुरक्षा व पेंशन तंत्र पूरी तरह समाप्त
  • माफिया राज और कुलीन वर्ग (Oligarchs) का जन्म
  • रूस को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की वीटो सीट
🌍 सोवियत संघ से बने 15 नए संप्रभु राष्ट्र
🇷🇺 रूस (उत्तराधिकारी) 🇺🇦 यूक्रेन 🇧🇾 बेलारूस 🇪🇪 एस्टोनिया 🇱🇻 लातविया 🇱🇹 लिथुआनिया 🇰🇿 कजाकिस्तान 🇺🇿 उज्बेकिस्तान 🇹🇲 तुर्कमेनिस्तान 🇰🇬 किर्गिस्तान 🇹🇯 ताजिकिस्तान 🇬🇪 जॉर्जिया 🇦🇿 अजरबैजान 🇦🇲 आर्मेनिया 🇲🇩 मोल्दोवा

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
सोवियत प्रणाली की नींव: 1917 की रूसी क्रांति के बाद समतावादी समाज और राज्य नियंत्रित उत्पादन साधनों के आधार पर USSR की स्थापना हुई थी।
मुख्य बिंदु 2
प्रणाली की खूबियां: न्यूनतम जीवन स्तर की गारंटी, शून्य बेरोजगारी, मुफ्त स्वास्थ्य व शिक्षा, तथा सुई से लेकर हवाई जहाज तक घरेलू उत्पादन में आत्मनिर्भरता।
मुख्य बिंदु 3
प्रणाली की विकृतियां: कम्युनिस्ट पार्टी का एकाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन, अनुत्तरदायी नौकरशाही तथा हथियारों की अंधी दौड़ में खजाने का विनाश।
मुख्य बिंदु 4
गोर्बाचेव के सुधार: मिखाइल गोर्बाचेव ने 'पेरेस्त्रोइका' (पुनर्गठन) और 'ग्लासनोस्त' (खुलापन) की शुरुआत की, परंतु वे व्यवस्था को संभाल नहीं सके।
मुख्य बिंदु 5
बर्लिन दीवार का पतन: 9 नवंबर 1989 को बर्लिन की दीवार गिरा दी गई, जिसने जर्मनी के एकीकरण और सोवियत प्रभाव के अंत की घोषणा की।
मुख्य बिंदु 6
विघटन की औपचारिक घोषणा: दिसंबर 1991 में रूस, यूक्रेन और बेलारूस ने येल्तसिन के नेतृत्व में USSR के अंत की घोषणा की; 25 दिसंबर 1991 को गोर्बाचेव ने इस्तीफा दिया।
मुख्य बिंदु 7
शॉक थेरेपी की विभीषिका: IMF व विश्व बैंक निर्देशित अचानक पूंजीवादी मॉडल ने रूस के 90% उद्योगों को 'इतिहास की सबसे बड़ी गराज सेल' में कौड़ियों के भाव बेच दिया।
मुख्य बिंदु 8
आर्थिक तबाही: रूबल का अवमूल्यन, बेतहाशा महंगाई, सामाजिक सुरक्षा का खात्मा, तथा माफिया राज और कुलीन वर्ग (Oligarchs) का अभ्युदय हुआ।
मुख्य बिंदु 9
रूस को सोवियत उत्तराधिकार: रूस को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी वीटो सीट, सोवियत परमाणु हथियार तथा अंतर्राष्ट्रीय दायित्व प्राप्त हुए।
मुख्य बिंदु 10
भारत-रूस संबंध: भारत और रूस बहु-ध्रुवीय विश्व, रक्षा साजो-सामान (ब्रह्मोस, सुखोई), ऊर्जा सुरक्षा तथा कश्मीर मुद्दे पर ऐतिहासिक सामरिक साझेदार हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
सोवियत प्रणाली में 'ग्लासनोस्त' (Glasnost) और 'पेरेस्त्रोइका' (Perestroika) का क्या अर्थ था और इन्हें किसने लागू किया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: ग्लासनोस्त का अर्थ 'खुलापन' (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व सेंसरशिप का अंत) तथा पेरेस्त्रोइका का अर्थ 'पुनर्गठन' (आर्थिक व राजनीतिक व्यवस्था का नवीनीकरण) था। इन्हें मार्च 1985 में मिखाइल गोर्बाचेव ने लागू किया था।
सोवियत संघ को आधुनिक बनाने के दो क्रांतिकारी सुधार।
2
'इतिहास की सबसे बड़ी गराज सेल' (The Largest Garage Sale in History) किसे कहा जाता है और क्यों?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: शॉक थेरेपी के दौरान रूस के 70 वर्षों में बने 90% सरकारी औद्योगिक उपक्रमों को औने-पौने दामों में निजी कंपनियों और माफियाओं को बेचे जाने की प्रक्रिया को 'इतिहास की सबसे बड़ी गराज सेल' कहा जाता है।
सोवियत उद्योग को कौड़ियों के भाव बेचा गया था।
3
सोवियत संघ के विघटन की घोषणा किन तीन प्रमुख गणराज्यों ने की थी और कब?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: दिसंबर 1991 में बोरिस येल्तसिन के नेतृत्व में रूस (Russia), यूक्रेन (Ukraine) और बेलारूस (Belarus) ने सोवियत संघ के विघटन की ऐतिहासिक घोषणा की थी।
तीनों सबसे बड़े स्लाव गणराज्य थे।
4
सोवियत संघ के पतन के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उसकी स्थायी सीट और वीटो पावर किसे सौंपी गई?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: सोवियत संघ के उत्तराधिकारी राज्य (Successor State) के रूप में रूस (Russia) को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी वीटो सीट सौंपी गई।
15 गणराज्यों में सबसे बड़ा गणराज्य।
5
भारत और रूस दोनों अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में किस प्रकार के विश्व का समर्थन करते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: बहु-ध्रुवीय विश्व (Multipolar World) का, जहाँ किसी एक महाशक्ति का वर्चस्व न हो और अंतर्राष्ट्रीय निर्णय संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से सामूहिक रूप से लिए जाएँ।
एक-ध्रुवीय अमेरिकी वर्चस्व के विपरीत व्यवस्था।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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