सोवियत प्रणाली (Soviet System) की उत्पत्ति: 1917 की रूसी बोल्शेविक क्रांति (Bolshevik Revolution) के बाद स्थापित सोवियत समाजवादी गणराज्य संघ (USSR) मानव इतिहास का पहला ऐसा देश था जिसने पूंजीवादी शोषण को समाप्त कर कार्ल मार्क्स और व्लादिमीर लेनिन के विचारों के आधार पर 'समानता' और 'समाजवाद' के आदर्शों पर राज्य की नींव रखी। इसमें निजी संपत्ति की संस्था को समाप्त कर दिया गया और संपूर्ण उत्पादन के साधनों (उद्योग, भूमि, खनिज) पर राज्य का एकाधिकार स्थापित किया गया।
(क) सोवियत प्रणाली की सकारात्मक विशेषताएं (Strengths of Soviet System)
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ विश्व की दूसरी सबसे विशाल आर्थिक व सैन्य महाशक्ति बना। अमेरिका को छोड़कर सोवियत अर्थव्यवस्था दुनिया के किसी भी अन्य देश से कहीं अधिक विकसित थी:
- जटिल संचार एवं ऊर्जा नेटवर्क: सोवियत संघ के पास तेल, लोहा, इस्पात और प्राकृतिक गैस के विशाल खनिज भंडार थे। साइबेरिया के सुदूर बर्फीले इलाकों से लेकर मध्य एशिया तक एक अत्यंत सुदृढ़ परिवहन नेटवर्क फैला हुआ था।
- घरेलू उपभोक्ता उद्योग में आत्मनिर्भरता: सोवियत उद्योग छोटी-सी पिन से लेकर विशालकाय जेट विमानों तक का निर्माण घरेलू स्तर पर स्वयं करता था। हालांकि इनकी गुणवत्ता पश्चिमी उत्पादों से कम थी, फिर भी देश आयात पर निर्भर नहीं था।
- न्यूनतम जीवन स्तर की सरकारी गारंटी (Welfare State): राज्य सभी नागरिकों के लिए एक न्यूनतम गरिमापूर्ण जीवन स्तर सुनिश्चित करता था। स्वास्थ्य सेवाएँ, प्राथमिक व उच्च शिक्षा, बाल देखभाल और आवास रियायती दरों पर सरकारी खर्चे पर उपलब्ध थे।
- शून्य बेरोजगारी (Zero Unemployment): प्रत्येक नागरिक को काम का कानूनी अधिकार था और देश में व्यावहारिक रूप से बेरोजगारी समाप्त हो चुकी थी। भूमि और प्रमुख उत्पादन संपत्तियाँ राज्य के स्वामित्व में थीं।
(ख) सोवियत प्रणाली की अंतर्निहित कमजोरियाँ एवं विकृतियाँ (Inherent Flaws)
सकारात्मक पहलुओं के बावजूद सोवियत प्रणाली समय के साथ सड़ने लगी और जनता के लिए दमघोंटू बन गई:
| कमजोरी का क्षेत्र | विस्तृत विश्लेषण एवं जनता पर प्रभाव |
|---|---|
| 1. नौकरशाही का शिकंजा (Bureaucratic Choke) | सोवियत प्रणाली अत्यधिक नौकरशाही और तानाशाही (Authoritarian) हो गई। सत्ता आम जनता या निर्वाचित प्रतिनिधियों के बजाय अनुत्तरदायी नौकरशाहों (Aparatchiks) के हाथों में केंद्रित हो गई, जो जनता के प्रति तनिक भी संवेदनशील नहीं थे। |
| 2. लोकतंत्र और अभिव्यक्ति का अभाव | देश में बोलने की स्वतंत्रता (Freedom of Speech) का पूर्ण अभाव था। सरकार या व्यवस्था की आलोचना करने पर नागरिकों को साइबेरिया के यातना शिविरों (Gulags) में भेज दिया जाता था। लोग अपनी असहमति केवल चुटकुलों और कार्टूनों के जरिए व्यक्त कर पाते थे। |
| 3. एक ही दल का 70 वर्षों का एकाधिकार | सोवियत संघ में केवल एक ही राजनीतिक दल—सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी (CPSU) का शासन था। किसी भी विपक्षी दल या स्वतंत्र संगठन की अनुमति नहीं थी। दल का हर स्तर पर पूर्ण नियंत्रण था और वह जनता के प्रति पूरी तरह निरंकुश व जवाबदेही से मुक्त था। |
| 4. रूसी गणराज्य का अनुचित प्रभुत्व | यद्यपि सोवियत संघ कागजों पर 15 गणराज्यों (रूस, यूक्रेन, बेलारूस, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान आदि) का संघ था, परंतु व्यवहार में अकेले रूस (Russia) का हर क्षेत्र (राजनीति, सेना, संस्कृति) पर अनुचित दबदबा था। बाकी 14 गणराज्यों की जनता खुद को अपमानित और उपेक्षित महसूस करती थी। |
| 5. हथियारों की अंधी होड़ एवं आर्थिक संकट | अमेरिका से सैन्य बराबरी की होड़ में सोवियत संघ ने अपने सीमित राष्ट्रीय बजट का 70-80% हिस्सा परमाणु मिसाइलों, अंतरिक्ष कार्यक्रमों और सेना पर फूंक दिया। परिणामतः उपभोक्ता वस्तुओं की भीषण कमी हो गई, तकनीकी पिछड़ापन बढ़ा और खाद्यान्न आयात करना पड़ा। |