(क) विकास का अर्थ और वैचारिक ध्रुवीकरण
आजादी के समय 'विकास' को पश्चिमी आधुनिकता और औद्योगिकीकरण का पर्याय माना जाता था। विकास की दिशा को लेकर दो प्रमुख वैचारिक धाराएं सक्रिय थीं:
- वामपंथी दृष्टिकोण (Leftist): गरीबों और वंचितों के हितों की वकालत; उत्पादन के साधनों पर राज्य का नियंत्रण और निजी संपत्ति को सीमित करना।
- दक्षिणपंथी दृष्टिकोण (Rightist): खुली बाज़ार अर्थव्यवस्था, मुक्त व्यापार और निजी पूंजी को प्राथमिकता देना; सरकारी हस्तक्षेप का विरोध।
(ख) बॉम्बे प्लान (Bombay Plan - 1944)
आमतौर पर पूंजीपति और उद्योगपति सरकारी नियंत्रण और आर्थिक योजना का विरोध करते हैं। परंतु 1944 में भारत के शीर्ष उद्योगपतियों (जे. आर. डी. टाटा, घनश्याम दास बिड़ला, पुरुषोत्तमदास आदि) ने मुंबई में मिलकर एक संयुक्त प्रस्ताव तैयार किया, जिसे 'बॉम्बे प्लान' कहा जाता है।
इसमें उद्योगपतियों ने स्वयं यह मांग की कि "सरकार को देश के बुनियादी ढांचे, भारी उद्योगों और परिवहन में भारी सार्वजनिक पूंजी निवेश करना चाहिए।" इससे स्पष्ट हो गया कि स्वतंत्र भारत में 'नियोजित विकास' (Planned Economy) पर उद्योगपतियों से लेकर समाजवादियों तक राष्ट्रीय सहमति थी।
(ग) योजना आयोग (1950) से नीति आयोग (2015) तक
- योजना आयोग (Planning Commission): मार्च 1950 में केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक प्रस्ताव द्वारा स्थापित (गैर-संवैधानिक व परामर्शदात्री निकाय)। प्रधानमंत्री इसके पदेन अध्यक्ष होते थे। इसने सोवियत मॉडल पर आधारित 5-वर्षीय योजनाओं (FYP) का निर्माण किया।
- नीति आयोग (NITI Aayog): 1 जनवरी 2015 को नरेंद्र मोदी सरकार ने योजना आयोग को समाप्त कर राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान (NITI Aayog) की स्थापना की। यह 'टॉप-डाउन' मॉडल के स्थान पर 'सहकारी संघवाद' (Cooperative Federalism) और बॉटम-अप दृष्टिकोण पर आधारित एक थिंक-टैंक है।