(क) पारंपरिक सुरक्षा की बाहरी धारणा (External Threats)
पारंपरिक धारणा में किसी भी देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा और जानलेवा खतरा सीमा पार से होने वाला सैन्य आक्रमण होता है। यह खतरा किसी अन्य राष्ट्र-राज्य द्वारा प्रस्तुत किया जाता है जो सैन्य बल के प्रयोग से किसी देश की संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता को छीनने का प्रयास करता है।
युद्ध की स्थिति में किसी देश की सरकार के पास बुनियादी तौर पर तीन कूटनीतिक व सैन्य विकल्प होते हैं:
- आत्मसमर्पण करना (Surrender): युद्ध में विनाश से बचने के लिए शत्रु की शर्तों के आगे घुटने टेक देना (यद्यपि कोई भी संप्रभु राष्ट्र इसे अपनी आधिकारिक नीति नहीं बनाता)।
- अपरोध (Deterrence): युद्ध की विभीषिका और जवाबी हमले की लागत को इतना बढ़ा देना कि हमलावर देश आक्रमण करने का दुस्साहस ही न कर सके। (अर्थात: युद्ध को होने ही न देना)।
- रक्षा (Defense): यदि अपरोध विफल हो जाए और युद्ध छिड़ ही जाए, तो हमलावर को हराना, उसके सैन्य मंसूबों को नाकाम करना और पीछे धकेल देना। (अर्थात: युद्ध को सीमित करना या जीतना)।
(ख) शक्ति संतुलन (Balance of Power) एवं गठबंधन निर्माण
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक शाश्वत नियम है कि कोई भी देश अपने पड़ोसी या प्रतिद्वंद्वी देश को इतना शक्तिशाली नहीं बनने देना चाहता कि वह मनमानी करने लगे। जब कोई देश अपनी सैन्य शक्ति अत्यधिक बढ़ाता है, तो अन्य देश अपनी आर्थिक शक्ति बढ़ाकर, आधुनिक हथियार खरीदकर और कूटनीतिक गठजोड़ करके उसके बराबर शक्ति हासिल करने का प्रयास करते हैं। इसे 'शक्ति संतुलन' कहते हैं।
गठबंधन निर्माण (Alliance Building): समान हितों वाले देश मिलकर औपचारिक सैन्य संधियाँ करते हैं (जैसे शीतयुद्ध में नाटो और वारसा पैक्ट)। गठबंधन का मूल सिद्धांत है: "किसी एक सदस्य पर हमला, सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा।"
(ग) पारंपरिक सुरक्षा की आंतरिक धारणा (Internal Security)
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पश्चिमी विकसित देशों के लिए आंतरिक सुरक्षा कोई बड़ी समस्या नहीं रही क्योंकि उनकी सीमाएं और राष्ट्रीय पहचान पहले ही तय हो चुकी थीं। परंतु एशिया और अफ्रीका के नव-स्वतंत्र विकासशील देशों (जैसे भारत, नाइजीरिया, म्यांमार आदि) के लिए आंतरिक खतरे बाह्य खतरों से भी अधिक घातक सिद्ध हुए:
- जातीय, भाषाई और धार्मिक अलगाववादी आंदोलन (जैसे श्रीलंका में तमिल अलगाववाद, भारत में पूर्वोत्तर व कश्मीर का उग्रवाद)।
- कमजोर लोकतांत्रिक संस्थाएं और सैन्य तख्तापलट का भय (जैसे पाकिस्तान और म्यांमार में)।
- 1945 से 1990 के बीच लड़े गए अधिकांश युद्ध दो देशों के बीच नहीं, बल्कि राष्ट्रों के भीतर गृहयुद्ध (Civil Wars) के रूप में लड़े गए।