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CBSE • कक्षा XII • Political Science • अध्याय 5
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

समकालीन विश्व में सुरक्षा

'सुरक्षा' (Security) अंतरराष्ट्रीय राजनीति और मानव सभ्यता का सबसे बुनियादी और अपरिहार्य मूल्य है। साधारण शब्दों में सुरक्षा का अर्थ है "खतरों से मुक्ति" (Freedom from threats)। परंतु जीवन में प्रत्येक खतरा सुरक्षा का मुद्दा नहीं बनता; केवल वे गंभीर खतरे जो किसी राष्ट्र के अस्तित्व, संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता या नागरिकों के जीवन के मूल मूल्यों को नष्ट करने की क्षमता रखते हैं, सुरक्षा के अध्ययन के केंद्र में आते हैं। समकालीन विश्व में सुरक्षा की अवधारणा को दो व्यापक श्रेणियों में विभाजित किया गया है: पारंपरिक धारणा (Traditional Notion): जिसमें मुख्य खतरा सीमा पार से होने वाले सैन्य आक्रमणों, युद्धों और संप्रभुता के हनन से होता है। इससे निपटने के लिए सैन्य शक्ति, अपरोध (Deterrence), रक्षा (Defense), शक्ति संतुलन (Balance of Power) और सैन्य गठबंधन बनाए जाते हैं। गैर-पारंपरिक धारणा (Non-Traditional Notion): शीतयुद्धोत्तर काल में यह स्पष्ट हुआ कि खतरे केवल दूसरे देश की सेनाओं से ही नहीं आते, बल्कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, वैश्विक तापवृद्धि (Global Warming), निर्धनता, महामारियाँ (जैसे एड्स, इबोला, कोविड-19), और बड़े पैमाने पर शरणार्थी संकट ऐसे खतरे हैं जो बिना कोई गोली चलाए करोड़ों लोगों का जीवन लील सकते हैं। इसे 'मानव सुरक्षा' (Human Security) और 'वैश्विक सुरक्षा' (Global Security) कहा जाता है। इसके अतिरिक्त, इस अध्याय में भारत की सुरक्षा रणनीति के चार मूलभूत घटकों—सैन्य क्षमता का सुदृढ़ीकरण, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को मजबूत करना, आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों का समाधान और तीव्र आर्थिक विकास—का सांगोपांग परीक्षण किया गया है। जैक बोर्ड (CBSE Class 12) राजनीति विज्ञान में यह अध्याय 6 से 8 अंकों का भार रखता है, जिसमें पारंपरिक बनाम गैर-पारंपरिक सुरक्षा और भारत की सुरक्षा रणनीति पर विश्लेषणात्मक प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।

🛡️ क्या आपने कभी सोचा है: जिस दुनिया में परमाणु मिसाइलें तैनात हैं, वहाँ एक अदृश्य वायरस या समुद्र के 1 मीटर बढ़ते जलस्तर से पूरा देश कैसे तबाह हो सकता है?

हम बचपन से सुनते आए हैं कि देश की सुरक्षा का मतलब है—सीमा पर तोपें, लड़ाकू विमान और बंदूक ताने खड़े जवान! 1971 या 1999 के कारगिल युद्ध में हमारे सैनिकों ने छाती पर गोलियां खाकर देश की रक्षा की।

परंतु जरा सोचिए: जब 2020 में कोरोना (COVID-19) महामारी आई, तो क्या दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका की हजारों परमाणु मिसाइलें या 11 विशाल विमानवाहक पोत अपने 10 लाख नागरिकों को मरने से बचा पाए? क्या मालदीव या बांग्लादेश जैसे देशों के डूबने का खतरा किसी पड़ोसी देश के हमले से है या फिर वायुमंडल में घुलते कार्बन डाईऑक्साइड से? जब एक आत्मघाती आतंकवादी न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से विमान टकरा देता है, या मुंबई के ताज होटल में निर्दोषों को भून देता है, तो पारंपरिक तोपें धरी की धरी क्यों रह जाती हैं?

यही 21वीं सदी की सुरक्षा का सबसे बड़ा रहस्य है: खतरों का चेहरा बदल चुका है! अब जंग केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि हमारे फेफड़ों, हमारे कंप्यूटर नेटवर्कों और पृथ्वी के पर्यावरण में लड़ी जा रही है। आइए, इस अध्याय में समझें कि 21वीं सदी में सचमुच सुरक्षित होने का क्या अर्थ है!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

इस अध्याय का अध्ययन आपके लिए क्यों अनिवार्य है?

  1. बोर्ड परीक्षा में उच्च अंक: CBSE कक्षा 12 में "पारंपरिक और गैर-पारंपरिक सुरक्षा में अंतर", "भारत की सुरक्षा रणनीति के चार घटक" और "मानव सुरक्षा की संकीर्ण बनाम व्यापक धारणा" से 6 अंक और 4 अंक के प्रश्न निरंतर पूछे जाते हैं।
  2. समकालीन विश्व के संकटों की समझ: रूस-यूक्रेन युद्ध में शक्ति संतुलन, साइबर हमलों, जैव-आतंकवाद और कॉप-28 (COP-28) की जलवायु वार्ताओं के अंतर्संबंधों को समझना।
  3. प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC, JPSC, NDA, CDS) की रीढ़: सीबीएम (Confidence Building Measures), निशस्त्रीकरण संधियाँ (NPT, CTBT, BWC, CWC) और भारत की 'नो फर्स्ट यूज' परमाणु नीति का गहन वैचारिक आधार इसी अध्याय में है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • शीतयुद्ध और अपरोध (Deterrence): हथियारों की होड़ और परमाणु संतुलन की समझ।

  • राष्ट्र-राज्य और संप्रभुता: वेस्टफेलिया शांति संधि के बाद विकसित अंतरराष्ट्रीय सीमाएं और राज्य संप्रभुता।

  • वैश्वीकरण: परस्पर निर्भरता और सीमाओं के पार सूचना, वायरस व आतंकवाद का निर्बाध प्रवाह।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • सुरक्षा की मूल परिभाषा और खतरों से मुक्ति के सिद्धांत को स्पष्ट कर सकेंगे।
  • सुरक्षा की पारंपरिक बाहरी धारणा (अपरोध, रक्षा, शक्ति संतुलन, गठबंधन निर्माण) और आंतरिक धारणा का विश्लेषण कर सकेंगे।
  • पारंपरिक सुरक्षा के सहयोगपूर्ण उपायों (निशस्त्रीकरण, अस्त्र-नियंत्रण, विश्वास बहाली) की व्याख्या कर सकेंगे।
  • गैर-पारंपरिक सुरक्षा के दो रूपों—"मानव सुरक्षा" (Human Security) और "वैश्विक सुरक्षा" (Global Security)—के तत्वों को रेखांकित कर सकेंगे।
  • नए खतरों के स्रोतों: आतंकवाद, मानवाधिकार हनन, वैश्विक निर्धनता, शरणार्थी संकट और महामारियों का मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • भारत की सुरक्षा रणनीति के चार प्रमुख घटकों का समालोचनात्मक और व्यावहारिक विश्लेषण कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. सुरक्षा की पारंपरिक धारणा: बाहरी...
2 2. पारंपरिक सुरक्षा और सहयोग: निशस्...
3 3. गैर-पारंपरिक सुरक्षा की धारणा: म...
4 4. भारत की सुरक्षा रणनीति: चार मूलभ...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. सुरक्षा की पारंपरिक धारणा: बाहरी एवं आंतरिक आयाम

(क) पारंपरिक सुरक्षा की बाहरी धारणा (External Threats)

पारंपरिक धारणा में किसी भी देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा और जानलेवा खतरा सीमा पार से होने वाला सैन्य आक्रमण होता है। यह खतरा किसी अन्य राष्ट्र-राज्य द्वारा प्रस्तुत किया जाता है जो सैन्य बल के प्रयोग से किसी देश की संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता को छीनने का प्रयास करता है।

युद्ध की स्थिति में किसी देश की सरकार के पास बुनियादी तौर पर तीन कूटनीतिक व सैन्य विकल्प होते हैं:

  1. आत्मसमर्पण करना (Surrender): युद्ध में विनाश से बचने के लिए शत्रु की शर्तों के आगे घुटने टेक देना (यद्यपि कोई भी संप्रभु राष्ट्र इसे अपनी आधिकारिक नीति नहीं बनाता)।
  2. अपरोध (Deterrence): युद्ध की विभीषिका और जवाबी हमले की लागत को इतना बढ़ा देना कि हमलावर देश आक्रमण करने का दुस्साहस ही न कर सके। (अर्थात: युद्ध को होने ही न देना)।
  3. रक्षा (Defense): यदि अपरोध विफल हो जाए और युद्ध छिड़ ही जाए, तो हमलावर को हराना, उसके सैन्य मंसूबों को नाकाम करना और पीछे धकेल देना। (अर्थात: युद्ध को सीमित करना या जीतना)।

(ख) शक्ति संतुलन (Balance of Power) एवं गठबंधन निर्माण

💡 शक्ति संतुलन (Balance of Power):
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक शाश्वत नियम है कि कोई भी देश अपने पड़ोसी या प्रतिद्वंद्वी देश को इतना शक्तिशाली नहीं बनने देना चाहता कि वह मनमानी करने लगे। जब कोई देश अपनी सैन्य शक्ति अत्यधिक बढ़ाता है, तो अन्य देश अपनी आर्थिक शक्ति बढ़ाकर, आधुनिक हथियार खरीदकर और कूटनीतिक गठजोड़ करके उसके बराबर शक्ति हासिल करने का प्रयास करते हैं। इसे 'शक्ति संतुलन' कहते हैं।
गठबंधन निर्माण (Alliance Building): समान हितों वाले देश मिलकर औपचारिक सैन्य संधियाँ करते हैं (जैसे शीतयुद्ध में नाटो और वारसा पैक्ट)। गठबंधन का मूल सिद्धांत है: "किसी एक सदस्य पर हमला, सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा।"

(ग) पारंपरिक सुरक्षा की आंतरिक धारणा (Internal Security)

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पश्चिमी विकसित देशों के लिए आंतरिक सुरक्षा कोई बड़ी समस्या नहीं रही क्योंकि उनकी सीमाएं और राष्ट्रीय पहचान पहले ही तय हो चुकी थीं। परंतु एशिया और अफ्रीका के नव-स्वतंत्र विकासशील देशों (जैसे भारत, नाइजीरिया, म्यांमार आदि) के लिए आंतरिक खतरे बाह्य खतरों से भी अधिक घातक सिद्ध हुए:

  • जातीय, भाषाई और धार्मिक अलगाववादी आंदोलन (जैसे श्रीलंका में तमिल अलगाववाद, भारत में पूर्वोत्तर व कश्मीर का उग्रवाद)।
  • कमजोर लोकतांत्रिक संस्थाएं और सैन्य तख्तापलट का भय (जैसे पाकिस्तान और म्यांमार में)।
  • 1945 से 1990 के बीच लड़े गए अधिकांश युद्ध दो देशों के बीच नहीं, बल्कि राष्ट्रों के भीतर गृहयुद्ध (Civil Wars) के रूप में लड़े गए।

2. पारंपरिक सुरक्षा और सहयोग: निशस्त्रीकरण एवं विश्वास बहाली

पारंपरिक सुरक्षा में यह माना जाता है कि युद्धों को रोकने और हिंसा को सीमित करने के लिए विरोधी देशों के बीच भी कुछ बुनियादी नियमों और सहयोग की अनिवार्य आवश्यकता होती है:

सहयोग का साधनविस्तृत विश्लेषण एवं प्रमुख संधियाँ
1. निशस्त्रीकरण (Disarmament) विनाशकारी हथियारों के विशेष वर्गों को पूरी तरह समाप्त करने या उन पर प्रतिबंध लगाने का संकल्प।
- जैविक हथियार संधि (BWC - 1972): 150 से अधिक देशों ने जैविक हथियारों के निर्माण, भंडारण और प्रयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया।
- रासायनिक हथियार संधि (CWC - 1992): रासायनिक गैसों और घातक विषाक्त हथियारों के संपूर्ण उन्मूलन की संधि।
2. अस्त्र-नियंत्रण (Arms Control) हथियारों के अंधाधुंध संचय और विकास को संधियों द्वारा नियंत्रित व सीमित करना।
- परमाणु अप्रसार संधि (NPT - 1968): 1 जनवरी 1967 से पहले परमाणु परीक्षण करने वाले केवल 5 देशों (P-5) को परमाणु शक्ति माना गया और शेष देशों पर प्रतिबंध लगाया गया (भारत ने इसे भेदभावपूर्ण मानकर हस्ताक्षर नहीं किए)।
- सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ताएं (SALT-I, SALT-II) एवं START: अमेरिका और सोवियत संघ के बीच बैलिस्टिक मिसाइलों की संख्या सीमित करने के समझौते।
3. विश्वास बहाली के उपाय (Confidence Building Measures - CBMs) दो विरोधी देशों के बीच गलतफहमियों और अचानक युद्ध छिड़ने के डर को दूर करने की एक कूटनीतिक प्रक्रिया। इसके तहत दोनों देश अपनी सैन्य योजनाओं, अभ्यासों और सीमाओं पर सैनिकों की तैनाती की जानकारी एक-दूसरे से साझा करते हैं (जैसे भारत-पाक हॉटलाइन संपर्क)।

3. गैर-पारंपरिक सुरक्षा की धारणा: मानव सुरक्षा एवं वैश्विक सुरक्षा

(क) गैर-पारंपरिक सुरक्षा की विशेषताएं

गैर-पारंपरिक धारणा केवल राज्य की क्षेत्रीय संप्रभुता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्तियों, समुदायों और संपूर्ण मानव जाति की रक्षा पर केंद्रित है। इसके दो प्रमुख रूप हैं:

  1. मानव सुरक्षा (Human Security): इसका मूल मंत्र है—"राज्यों की सुरक्षा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण नागरिकों (मनुष्यों) की सुरक्षा है।" यदि कोई संप्रभु देश विदेशी आक्रमण से सुरक्षित है, परंतु उसके लाखों नागरिक भुखमरी, मलेरिया या अपनी ही सरकार के दमन से मर रहे हैं, तो वह देश सुरक्षित नहीं कहा जा सकता।
    • संकीर्ण धारणा (Narrow Concept): व्यक्तियों को हिंसक खतरों (युद्ध, नरसंहार, आतंकवाद) से सुरक्षा (Freedom from Fear)।
    • व्यापक धारणा (Broad Concept): भूख, कुपोषण, महामारी और प्राकृतिक आपदाओं से मुक्ति (Freedom from Want & Dignity)।
  2. वैश्विक सुरक्षा (Global Security): 1990 के दशक में उभरी वह अवधारणा जो ऐसे वैश्विक खतरों से निपटती है जिनका प्रभाव पूरी पृथ्वी पर पड़ता है और जिनका समाधान कोई एक देश अकेले नहीं कर सकता—जैसे ग्लोबल वार्मिंग, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, शरणार्थी संकट और वैश्विक महामारियाँ।

(ख) नए खतरों के प्रमुख स्रोत (New Sources of Threats)

खतरे का स्रोतविस्तृत विश्लेषण एवं प्रभाव
1. आतंकवाद (Terrorism) राजनीतिक या धार्मिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए निर्दोष नागरिकों को जानबूझकर और अंधाधुंध हिंसा का शिकार बनाना ताकि समाज में दहशत फैलाई जा सके। 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर 9/11 हमला और 26 नवंबर 2008 का मुंबई हमला इसके सर्वाधिक वीभत्स उदाहरण हैं।
2. मानवाधिकार हनन (Human Rights Violations) जब सरकारें ही अपने नागरिकों के अधिकारों को कुचलती हैं (उदा. 1994 में रवांडा में तुत्सी समुदाय का नरसंहार, म्यांमार में रोहिंग्या संकट)। क्या ऐसे मामलों में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सैन्य हस्तक्षेप करना चाहिए? यह संप्रभुता बनाम मानवता की गंभीर बहस है।
3. वैश्विक निर्धनता (Global Poverty) विश्व की जनसंख्या वृद्धि का 90% से अधिक हिस्सा सबसे गरीब विकासशील देशों में हो रहा है। अत्यधिक गरीबी भुखमरी, गृहयुद्ध और राजनीतिक अराजकता को जन्म देती है, जिससे लोग पलायन करने को मजबूर होते हैं।
4. शरणार्थी संकट एवं प्रवासन (Refugee Crisis & Migration) युद्ध, प्राकृतिक आपदाओं या राजनीतिक दमन के कारण जब लाखों लोग सीमा पार करते हैं, तो वे शरणार्थी (Refugees) कहलाते हैं (उदा. सीरिया, अफगानिस्तान, यूक्रेन संकट)। इससे आश्रय देने वाले देशों की अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने पर भारी दबाव पड़ता है।
5. स्वास्थ्य महामारियाँ (Health Epidemics) एड्स (HIV/AIDS), सार्स, बर्ड फ्लू, इबोला और हालिया कोविड-19 (COVID-19) ने साबित किया कि आधुनिक वैश्वीकृत दुनिया में किसी एक देश के एयरपोर्ट से निकलने वाला वायरस कुछ ही हफ्तों में पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को ठप कर सकता है।

4. भारत की सुरक्षा रणनीति: चार मूलभूत घटक

स्वतंत्रता के बाद से ही भारत को दो परमाणु संपन्न पड़ोसियों (पाकिस्तान और चीन) के साथ सीमा विवादों, कई युद्धों तथा आंतरिक अलगाववादी आंदोलनों का सामना करना पड़ा है। अतः भारत ने अपनी सुरक्षा के लिए एक व्यापक चार-आयामी रणनीति (Four-Pillar Strategy) विकसित की है:

घटक (Pillar)सामरिक उद्देश्य एवं कार्यान्वयन
1. सैन्य क्षमता को सुदृढ़ करना (Strengthening Military Capability) भारत पर 1947, 1965, 1971 और 1999 में पाकिस्तान तथा 1962 में चीन द्वारा हमले किए गए। अतः भारत ने अपनी थल, जल और नभ सेना को अत्याधुनिक हथियारों से सुसज्जित किया। 1974 और मई 1998 में पोखरण में सफल परमाणु परीक्षण करके भारत ने अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए विश्वसनीय न्यूनतम परमाणु प्रतिरोध (Credible Minimum Deterrence) स्थापित किया।
2. अंतरराष्ट्रीय नियमों और संस्थाओं को मजबूत करना भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गुटनिरपेक्षता (NAM), पंचशील, और एशियाई एकता की वकालत की। भारत ने हमेशा संयुक्त राष्ट्र (UN) के माध्यम से विवादों के समाधान, वैश्विक निरस्त्रीकरण, और जलवायु वार्ताओं में नियम-आधारित व्यवस्था का समर्थन किया है।
3. आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों का प्रभावी समाधान भारत की एकता और अखंडता को नागालैंड, मिजोरम, पंजाब, कश्मीर और पूर्वोत्तर के अलगाववादी आंदोलनों तथा नक्सलवाद से गंभीर चुनौतियाँ मिलीं। भारत ने लोकतांत्रिक वार्ताओं, संवैधानिक स्वायत्तता और दृढ़ सुरक्षा कार्रवाइयों के संतुलन से राष्ट्र को विखंडित होने से सफलतापूर्वक बचाया।
4. तीव्र एवं समतामूलक आर्थिक विकास सुरक्षा केवल सीमाओं की रक्षा से नहीं होती; जब तक देश के करोड़ों नागरिक घोर निर्धनता, अशिक्षा और बेरोजगारी में जी रहे हों, देश सुरक्षित नहीं हो सकता। भारत ने आर्थिक उदारीकरण, औद्योगिकीकरण और सामाजिक कल्याण योजनाओं के माध्यम से अपने नागरिकों की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास किया है।

महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक सिद्धांत एवं कालक्रम

1968
परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर; भारत ने भेदभावपूर्ण मानकर हस्ताक्षर से इनकार किया।
1972
जैविक हथियार संधि (BWC - Biological Weapons Convention) पर 150 से अधिक देशों के हस्ताक्षर।
18 मई 1974
पोखरण-I: भारत द्वारा प्रथम शांतिपूर्ण भूमिगत परमाणु परीक्षण ("स्माइलिंग बुद्धा")।
1992
रासायनिक हथियार संधि (CWC - Chemical Weapons Convention) जेनेवा में अंगीकार।
1994
रवांडा में भीषण जातीय नरसंहार; 8 लाख से अधिक तुत्सी और उदारवादी हुतु मारे गए।
1996
व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) अंगीकार; भारत ने विरोध किया।
11 एवं 13 मई 1998
पोखरण-II: भारत द्वारा 5 सफल भूमिगत परमाणु परीक्षण ("ऑपरेशन शक्ति")।
मई 1998
पाकिस्तान द्वारा चागई हिल्स में 6 परमाणु परीक्षण; उपमहाद्वीप परमाणु संपन्न बना।
मई-जुलाई 1999
कारगिल युद्ध (ऑपरेशन विजय): पारंपरिक हथियारों से लड़ा गया पहला परमाणु-छाया युद्ध।
11 सितंबर 2001
अमेरिका पर अल-कायदा द्वारा 9/11 का भयानक आतंकवादी हमला।
2003
भारत द्वारा औपचारिक परमाणु सिद्धांत (Nuclear Doctrine) की घोषणा ("नो फर्स्ट यूज")।
26 नवंबर 2008
मुंबई में पाकिस्तानी लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों द्वारा 26/11 का वीभत्स हमला।
2020-2022
कोविड-19 वैश्विक महामारी; गैर-पारंपरिक सुरक्षा खतरे के रूप में 70 लाख से अधिक मौतें।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1 (1 अंक - वस्तुनिष्ठ): जैविक हथियार संधि (BWC) किस वर्ष अस्तित्व में आई थी तथा इसका मुख्य उद्देश्य क्या था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
जैविक हथियार संधि (BWC) 1972 में अस्तित्व में आई थी। इसका मुख्य उद्देश्य जैविक (जीवाणु/विषाणु) हथियारों के विकास, उत्पादन, भंडारण और प्रयोग पर पूर्ण वैश्विक प्रतिबंध लगाना था।
उदाहरण 2
प्रश्न 2 (2 अंक - अति लघु उत्तरीय): सुरक्षा की पारंपरिक धारणा में "अपरोध" (Deterrence) और "रक्षा" (Defense) के बीच क्या अंतर है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  • अपरोध (Deterrence): अपनी सैन्य शक्ति और संभावित जवाबी हमले के भय से विरोधी देश को आक्रमण करने से रोकना (अर्थात: युद्ध को होने से रोकना)।
  • रक्षा (Defense): यदि युद्ध छिड़ ही जाए, तो सैन्य बल द्वारा शत्रु के हमले को निष्फल करना, उसे परास्त करना और अपनी सीमाओं की रक्षा करना (अर्थात: युद्ध को सीमित करना या जीतना)।
उदाहरण 3
प्रश्न 3 (4 अंक - लघु उत्तरीय): सुरक्षा की गैर-पारंपरिक धारणा के अंतर्गत "मानव सुरक्षा" (Human Security) से क्या अभिप्राय है? इसकी संकीर्ण और व्यापक अवधारणा में अंतर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
मानव सुरक्षा: सुरक्षा की वह गैर-पारंपरिक धारणा जो राज्यों की सीमाओं की रक्षा के स्थान पर आम व्यक्तियों और नागरिकों के जीवन, गरिमा और अधिकारों की रक्षा को केंद्र में रखती है।

संकीर्ण बनाम व्यापक अवधारणा में अंतर:

  1. संकीर्ण अवधारणा (Freedom from Fear): इस दृष्टिकोण के अनुसार मानव सुरक्षा का अर्थ व्यक्तियों को हिंसक खतरों—जैसे विदेशी आक्रमण, गृहयुद्ध, नरसंहार, आतंकवाद और राज्य प्रायोजित दमन—से सुरक्षित रखना है।
  2. व्यापक अवधारणा (Freedom from Want & Degradation): इस दृष्टिकोण के अनुसार केवल युद्ध से बचना ही पर्याप्त नहीं है; भूख, कुपोषण, भीषण गरीबी, महामारियाँ (जैसे कैंसर, एड्स, कोविड) और प्राकृतिक आपदाएं हिंसक युद्धों से कहीं अधिक जानें लेती हैं। अतः गरिमापूर्ण जीवन की सभी न्यूनतम दशाएं सुनिश्चित करना ही सच्ची मानव सुरक्षा है।
उदाहरण 4
प्रश्न 4 (4 अंक - लघु उत्तरीय): 21वीं सदी में सुरक्षा के लिए "नए खतरों के स्रोत" कौन-से हैं? किन्हीं चार स्रोतों की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
21वीं सदी में गैर-पारंपरिक सुरक्षा के चार प्रमुख नए खतरे निम्नलिखित हैं:

  1. अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद: राजनीतिक या वैचारिक लक्ष्यों के लिए जानबूझकर निर्दोष नागरिकों की हत्या करना (जैसे 9/11 हमला और 26/11 मुंबई हमला)। आतंकी किसी एक देश की सीमा के बंधक नहीं होते।
  2. वैश्विक निर्धनता और असमानता: उत्तर (विकसित) और दक्षिण (विकासशील) देशों के बीच बढ़ती आर्थिक खाई तथा विकासशील देशों में जनसंख्या विस्फोट से भुखमरी, गृहयुद्ध और अपराध बढ़ते हैं।
  3. शरणार्थी संकट एवं प्रवासन: युद्ध, राजनीतिक उत्पीड़न या पर्यावरणीय विनाश से विस्थापित होकर जब लाखों लोग दूसरे देशों में शरण लेते हैं (जैसे सीरियाई शरणार्थी), तो इससे भारी सामाजिक और आर्थिक तनाव उत्पन्न होता है।
  4. स्वास्थ्य महामारियाँ: कोविड-19, एड्स और इबोला जैसी महामारियाँ सीमाओं को नहीं मानतीं और तेजी से फैलकर लाखों लोगों की जान लेने के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था को पंगु बना देती हैं।
उदाहरण 5
प्रश्न 5 (6 अंक - दीर्घ उत्तरीय): "स्वतंत्रता के बाद से भारत की सुरक्षा रणनीति केवल सैन्य बल तक सीमित न रहकर बहु-आयामी रही है।" इस कथन के परिप्रेक्ष्य में भारत की सुरक्षा रणनीति के चार प्रमुख घटकों का विस्तारपूर्वक परीक्षण कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
भारत एक ऐसा देश है जिसे अपनी सीमाओं पर दो परमाणु-सशस्त्र पड़ोसियों (पाकिस्तान और चीन) की शत्रुता तथा भीतर कई अलगाववादी और आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। इस जटिल भू-राजनीतिक परिस्थिति में भारत ने अपनी सुरक्षा के लिए एक व्यापक चार-आयामी रणनीति तैयार की है:

1. सैन्य क्षमता का सुदृढ़ीकरण (Strengthening Military Capability):
भारत को 1947, 1965, 1971, 1999 में पाकिस्तान और 1962 में चीन के सैन्य आक्रमणों का सामना करना पड़ा। अतः भारत ने अपनी तीनों सेनाओं का आधुनिकीकरण किया। 1974 और मई 1998 (पोखरण-II) में परमाणु परीक्षण करके भारत ने एक परमाणु संपन्न राष्ट्र का दर्जा हासिल किया। भारत का परमाणु सिद्धांत 'विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध' (Credible Minimum Deterrence) और 'पहले प्रयोग नहीं' (No First Use) की नीति पर आधारित है।

2. अंतरराष्ट्रीय नियमों और बहुपक्षीय संस्थाओं को सुदृढ़ करना:
भारत ने कभी भी केवल सैन्य शक्ति पर भरोसा नहीं किया। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने एशियाई एकता, पंचशील और गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) के माध्यम से महाशक्तियों की गुटबाजी से दूरी बनाई। भारत ने हमेशा संयुक्त राष्ट्र (UN) के तत्वावधान में नियम-आधारित विश्व व्यवस्था, सार्वभौमिक व गैर-भेदभावपूर्ण निरस्त्रीकरण, और क्योटो प्रोटोकॉल जैसी संधियों का समर्थन किया है।

3. आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों का लोकतांत्रिक व रणनीतिक समाधान:
भारत के भीतर नागालैंड, मिजोरम, पंजाब, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में अलगाववादी आंदोलनों ने देश को तोड़ने का प्रयास किया। भारत ने केवल सेना का प्रयोग करने के बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया, निष्पक्ष चुनावों और संविधान के तहत विशेष स्वायत्तता (उदा. 1986 का मिजो समझौता) देकर इन चुनौतियों को शांत किया।

4. तीव्र एवं समावेशी आर्थिक विकास:
भारत की सुरक्षा का चौथा और सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है आर्थिक विकास। एक ऐसा देश जहाँ करोड़ों लोग गरीबी रेखा से नीचे हों, वह कभी भी वास्तविक रूप से सुरक्षित नहीं हो सकता। 1991 के बाद आर्थिक सुधारों और डिजिटल क्रांति ने भारत को विश्व की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाया है, जिससे देश अपने रक्षा बजट और जनकल्याण दोनों का वित्तपोषण करने में सक्षम हुआ है।

निष्कर्ष: भारत की सुरक्षा रणनीति सैन्य शक्ति, कूटनीतिक संतुलन, राष्ट्रीय एकता और आर्थिक समृद्धि का एक ऐसा बेजोड़ समन्वय है जो इसे 21वीं सदी की वैश्विक महाशक्ति बनाने में आधारशिला का कार्य कर रहा है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

परीक्षार्थी अक्सर सोचते हैं कि सुरक्षा का मतलब केवल विदेशी आक्रमण और युद्ध से बचाव है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह केवल "पारंपरिक सुरक्षा" है। समकालीन विश्व में गरीबी, महामारियाँ (कोविड), आतंकवाद और ग्लोबल वार्मिंग जैसी "गैर-पारंपरिक सुरक्षा" की धारणाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

विद्यार्थी परमाणु अप्रसार संधि (NPT) और व्यापक परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) को एक ही समझ लेते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

NPT (1968) परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने की संधि थी जिसने 5 देशों को ही परमाणु शक्ति माना। CTBT (1996) सभी प्रकार के परमाणु परीक्षण विस्फोटों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाली संधि है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह भ्रम होना कि भारत ने NPT पर हस्ताक्षर किए हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

भारत ने NPT पर कभी हस्ताक्षर नहीं किए क्योंकि भारत इसे अत्यधिक पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण संधि मानता है जो P-5 को परमाणु हथियार रखने की छूट देती है और बाकियों पर प्रतिबंध लगाती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

छात्र यह मान लेते हैं कि शक्ति संतुलन केवल सैन्य संधियों से बनता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

शक्ति संतुलन केवल सैन्य नहीं होता; इसके लिए आर्थिक विकास और तकनीकी बढ़त हासिल करना भी उतना ही आवश्यक होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

परीक्षार्थी प्रवासी (Migrants) और शरणार्थी (Refugees) में अंतर नहीं कर पाते।

सही वैज्ञानिक तथ्य

प्रवासी बेहतर जीवन या रोजगार के लिए अपनी मर्जी से देश छोड़ते हैं, जबकि शरणार्थी युद्ध, प्राकृतिक आपदा या राजनीतिक प्रताड़ना के कारण अपनी जान बचाने के लिए भागते हैं।

सुरक्षा की अवधारणा: पारंपरिक बनाम गैर-पारंपरिक सुरक्षा की तुलनात्मक संरचना

🛡️ समकालीन विश्व में सुरक्षा के दो प्रमुख आयाम

पारंपरिक राज्य-केंद्रित सुरक्षा बनाम गैर-पारंपरिक मानव-केंद्रित सुरक्षा

⚔️ पारंपरिक सुरक्षा (Traditional)
  • केंद्र बिंदु: राज्य (Nation-State) और उसकी संप्रभुता
  • मूल खतरा: सीमा पार से सैन्य आक्रमण व युद्ध
  • रणनीतिक साधन: अपरोध (Deterrence), रक्षा, शक्ति संतुलन
  • सहयोग के उपाय: निशस्त्रीकरण (BWC/CWC), अस्त्र-नियंत्रण, CBMs
  • गठबंधन: नाटो (NATO), वारसा पैक्ट जैसे सैन्य गुट
🌐 गैर-पारंपरिक सुरक्षा (Non-Traditional)
  • केंद्र बिंदु: मनुष्य, समुदाय और संपूर्ण पृथ्वी (Human & Global)
  • मूल खतरे: अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, कोविड जैसी महामारियाँ
  • पर्यावरणीय संकट: ग्लोबल वार्मिंग, समुद्र स्तर वृद्धि, अकाल
  • सामाजिक खतरे: भीषण निर्धनता, मानवाधिकार हनन, शरणार्थी संकट
  • समाधान: वैश्विक सहयोग, संयुक्त राष्ट्र, WHO, पेरिस समझौता

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
सुरक्षा का मूल अर्थ: गंभीर खतरों से मुक्ति (Freedom from threats), जो संप्रभुता, अखंडता और जीवन के मूल मूल्यों की रक्षा करे।
मुख्य बिंदु 2
पारंपरिक बाहरी सुरक्षा: विदेशी सैन्य आक्रमण से राज्य की रक्षा; इसके तीन विकल्प हैं—आत्मसमर्पण, अपरोध (युद्ध रोकना) और रक्षा (युद्ध जीतना)।
मुख्य बिंदु 3
शक्ति संतुलन एवं गठबंधन: प्रतिद्वंद्वी की शक्ति की बराबरी करना और सामूहिक रक्षा हेतु समान विचारधारा वाले देशों के साथ सैन्य संधियां करना।
मुख्य बिंदु 4
पारंपरिक सहयोग: विनाशकारी हथियारों पर रोक के लिए निशस्त्रीकरण (BWC 1972, CWC 1992), अस्त्र-नियंत्रण (START) और विश्वास बहाली (CBMs)।
मुख्य बिंदु 5
गैर-पारंपरिक सुरक्षा: राज्य के बजाय व्यक्ति और मानवता की सुरक्षा; इसके दो रूप हैं—"मानव सुरक्षा" और "वैश्विक सुरक्षा"।
मुख्य बिंदु 6
मानव सुरक्षा की दो धारणाएं: संकीर्ण धारणा (हिंसा व युद्ध से मुक्ति) और व्यापक धारणा (भूख, अभाव, बीमारी और प्राकृतिक आपदाओं से मुक्ति)।
मुख्य बिंदु 7
नए खतरों के 5 प्रमुख स्रोत: अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद (9/11 व 26/11), मानवाधिकारों का हनन, अत्यधिक गरीबी, शरणार्थी संकट और घातक महामारियाँ।
मुख्य बिंदु 8
भारत की सुरक्षा के चार घटक: (1) सैन्य आधुनिकीकरण व परमाणु प्रतिरोध (1998 पोखरण), (2) अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं व नियमों का सम्मान, (3) आंतरिक एकता व अखंडता, और (4) तीव्र आर्थिक विकास।
मुख्य बिंदु 9
भारत का परमाणु सिद्धांत: न्यूनतम विश्वसनीय प्रतिरोध, "नो फर्स्ट यूज" (पहले प्रयोग नहीं), और गैर-परमाणु देशों के विरुद्ध प्रयोग न करना।
मुख्य बिंदु 10
वैश्विक सहयोग की अनिवार्यता: महामारियों और जलवायु संकट से निपटने के लिए कोई भी महाशक्ति अकेले सक्षम नहीं है; अंतरराष्ट्रीय सहयोग ही एकमात्र मार्ग है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
पारंपरिक सुरक्षा में "अपरोध" (Deterrence) का क्या अर्थ है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अपरोध का अर्थ है विरोधी देश को यह विश्वास दिला देना कि यदि उसने हमला किया तो उसे असहनीय नुकसान उठाना पड़ेगा, जिससे वह युद्ध करने का विचार ही त्याग दे (युद्ध को होने से रोकना)।
2
जैविक हथियार संधि (BWC) और रासायनिक हथियार संधि (CWC) किन वर्षों में संपन्न हुईं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: जैविक हथियार संधि 1972 में तथा रासायनिक हथियार संधि 1992 में संपन्न हुई थी।
3
भारत ने अपना पहला और दूसरा परमाणु परीक्षण किस स्थान पर और किन वर्षों में किया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: भारत ने अपना पहला परीक्षण 18 मई 1974 को तथा दूसरा परीक्षण 11 एवं 13 मई 1998 को राजस्थान के पोखरण में किया था।
4
अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुआ भयानक 9/11 का आतंकवादी हमला किस तारीख को हुआ था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 11 सितंबर 2001 (9/11) को अल-कायदा के आतंकवादियों द्वारा किया गया था।
5
भारत के परमाणु सिद्धांत (Nuclear Doctrine) की सबसे मुख्य विशेषता क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: भारत के परमाणु सिद्धांत की मुख्य विशेषता "पहले प्रयोग नहीं" (No First Use) की नीति और "विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध" है।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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