(क) सैन्य तख्तापलटों का ऐतिहासिक सिलसिला
1947 में अपनी स्थापना के बाद से पाकिस्तान का राजनीतिक इतिहास निर्वाचित सरकारों और प्रत्यक्ष सैन्य तानाशाही के बीच झूलता रहा है:
- जनरल अयूब खान (1958-1969): देश के पहले संविधान बनने के तुरंत बाद सेना प्रमुख जनरल अयूब खान ने सत्ता पर कब्जा कर लिया। जन-असंतोष के कारण उन्हें सत्ता छोड़नी पड़ी।
- जनरल याहिया खान (1969-1971): अयूब खान के बाद याहिया खान ने बागडोर संभाली। इन्हीं के शासनकाल में 1971 का बांग्लादेश संकट उत्पन्न हुआ और भारत के हाथों पाकिस्तान की करारी पराजय हुई।
- जुल्फिकार अली भुट्टो (1971-1977): पराजय के बाद लोकतंत्र लौटा और भुट्टो के नेतृत्व में नागरिक सरकार बनी।
- जनरल जिया-उल-हक (1977-1988): 1977 में जनरल जिया ने भुट्टो का तख्तापलट किया (बाद में 1979 में भुट्टो को फांसी दे दी गई)। जिया ने पाकिस्तान का व्यापक इस्लामीकरण (Islamisation) किया।
- लोकतांत्रिक दौर (1988-1999): जिया की विमान दुर्घटना में मृत्यु के बाद बेनजीर भुट्टो (पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी) और नवाज शरीफ (मुस्लिम लीग) के बीच दलीय लोकतंत्र चला।
- जनरल परवेज मुशर्रफ (1999-2008): अक्टूबर 1999 में कारगिल युद्ध के तुरंत बाद मुशर्रफ ने नवाज शरीफ को अपदस्थ कर सत्ता हथिया ली।
- 2008 के बाद: यद्यपि लोकतांत्रिक चुनाव हो रहे हैं, परंतु पर्दे के पीछे असली शक्ति आज भी रावलपिंडी (सेना मुख्यालय) और आईएसआई (ISI) के पास ही केंद्रित है।
(ख) पाकिस्तान में लोकतंत्र के मार्ग में स्थायी बाधाएँ
| कारक | विस्तृत विश्लेषण |
|---|---|
| 1. सेना, धर्मगुरुओं और भूस्वामियों का सामाजिक दबदबा | पाकिस्तानी समाज में सामंती जमींदारों, कट्टरपंथी इस्लामी धर्मगुरुओं और सैन्य अभिजात वर्ग का त्रिकोणीय गठजोड़ इतना मजबूत है कि जब भी निर्वाचित सरकारें सुधार की बात करती हैं, सेना उन्हें 'राष्ट्रीय सुरक्षा' का हवाला देकर अपदस्थ कर देती है। |
| 2. भारत के साथ निरंतर शत्रुता | सेना और रूढ़िवादी गुटों ने जनता के बीच यह डर बैठा दिया है कि भारत पाकिस्तान को नष्ट करना चाहता है। इस 'भारतीय हौवे' के बल पर सेना भारी रक्षा बजट हड़पती है और अपने राजनीतिक दखल को जायज ठहराती है। |
| 3. अंतरराष्ट्रीय समर्थन और भू-राजनीतिक स्वार्थ | शीतयुद्ध के दौरान अमेरिका और पश्चिमी देशों ने सोवियत संघ के खिलाफ पाकिस्तान की सेना को अरबों डॉलर के हथियार और वित्तीय सहायता दी। बाद में 'आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक युद्ध' में भी अमेरिका ने लोकतंत्र के बजाय सैन्य तानाशाहों (जिया और मुशर्रफ) को अपना मुख्य मोहरा बनाया। |
| 4. कमजोर राजनीतिक दल एवं संस्थागत भ्रष्टाचार | नागरिक राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव, वंशवाद और व्यापक भ्रष्टाचार के कारण जनता का निर्वाचित नेताओं से मोहभंग हो जाता है, जिससे सेना को दखल देने का बहाना मिल जाता है। |