(क) पर्यावरण संकट अंतरराष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा क्यों बना?
1960 के दशक तक पर्यावरण को घरेलू विज्ञान का विषय माना जाता था। 1972 में विचारकों के वैश्विक समूह 'क्लब ऑफ रोम' (Club of Rome) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द लिमिट्स टू ग्रोथ' (The Limits to Growth) प्रकाशित की, जिसने पहली बार दुनिया को आगाह किया कि पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं और यदि जनसंख्या व औद्योगिकीकरण इसी गति से बढ़ता रहा, तो मानवता का विनाश निश्चित है।
पर्यावरण के प्रमुख संकट निम्नलिखित हैं:
- कृषि भूमि का क्षरण: अत्यधिक रासायनिक खादों और वनों की कटाई से उपजाऊ भूमि बंजर हो रही है।
- पेयजल संकट: विश्व की 1.2 अरब से अधिक आबादी को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं है, जिससे प्रतिवर्ष 30 लाख से अधिक बच्चे डायरिया और जलजनित रोगों से मर जाते हैं।
- ओजोन परत का क्षरण: सीएफसी (CFC) गैसों के कारण समताप मंडल में ओजोन छिद्र हो गया, जिससे सूर्य की पराबैंगनी (UV) किरणें पृथ्वी तक पहुँचकर कैंसर और पारिस्थितिक विनाश कर रही हैं।
- वैश्विक तापवृद्धि (Global Warming): ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ रहा है, जिससे ग्लेशियर पिघल रहे हैं और समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है।
(ख) वैश्विक साझी संपदा (Global Commons) की सुरक्षा
साझी संपदा उन संसाधनों को कहते हैं जिन पर किसी एक व्यक्ति या संप्रभु राष्ट्र का निजी अधिकार नहीं होता, बल्कि संपूर्ण मानव समुदाय का साझा स्वामित्व होता है (जैसे गाँव की चारागाह या नदी)।
वैश्विक साझी संपदा (Global Commons) के चार प्रमुख क्षेत्र हैं:
- पृथ्वी का वायुमंडल (Atmosphere)
- अंटार्कटिका महाद्वीप (Antarctica)
- समुद्री सतह एवं गहरे समुद्र का तल (Ocean Floor)
- बाहरी अंतरिक्ष (Outer Space)
इन साझी विरासतों की सुरक्षा के लिए कई ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय समझौते किए गए हैं: अंटार्कटिका संधि (1959), मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987 - ओजोन परत की रक्षा), और अंटार्कटिका पर्यावरण प्रोटोकॉल (1991)।