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CBSE • कक्षा XII • Political Science • अध्याय 6
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन

पारंपरिक रूप से अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सरोकार केवल युद्ध, शांति, संधियों और संप्रभु सीमाओं तक सीमित था। परंतु 20वीं सदी के अंतिम दशकों में यह निर्विवाद सत्य स्थापित हो गया कि मानव सभ्यता का अस्तित्व केवल सेनाओं और हथियारों से ही नहीं, बल्कि उस प्राकृतिक पर्यावरण और जीवन-दायिनी पारिस्थितिकी (Ecology) से भी गहराई से जुड़ा है जिसमें हम सांस लेते हैं। आज वैश्विक तापवृद्धि (Global Warming), ओजोन परत का विनाश, वनों की अंधाधुंध कटाई, पीने योग्य मीठे पानी का अभाव और उपजाऊ कृषि भूमि का मरुस्थलीकरण ऐसे संकट हैं जो किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं हैं; इनका प्रभाव पूरी पृथ्वी पर पड़ता है। इस अध्याय में पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के वैश्विक राजनीतिक आयामों का गहन अध्ययन किया गया है: साझी संपदा (Global Commons) की सुरक्षा: अंटार्कटिका, वायुमंडल, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष जैसी साझी विरासतों के प्रबंधन और संरक्षण की चुनौतियाँ। साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ (CBDR - Common But Differentiated Responsibilities): 1992 के ऐतिहासिक रियो पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit) में स्वीकृत वह मील का पत्थर सिद्धांत, जिसने पर्यावरण संरक्षण को लेकर विकसित (उत्तरी) और विकासशील (दक्षिणी) देशों के बीच एक न्यायसंगत संतुलन स्थापित किया। संसाधनों की भू-राजनीति (Resource Geopolitics): 20वीं और 21वीं सदी में पेट्रोलियम (कच्चा तेल) और जल (Water) के नियंत्रण को लेकर लड़े गए युद्ध और महाशक्तियों की कूटनीतिक चालें। मूलवासियों (Indigenous Peoples) के अधिकार: जल, जंगल और जमीन के मूल संरक्षक समुदायों के अधिकारों की रक्षा और उनके संघर्ष। पर्यावरण पर भारत का दृष्टिकोण: क्योटो प्रोटोकॉल (1997) से लेकर पेरिस समझौते (2015) और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) तक भारत की नेतृत्वकारी भूमिका। जैक बोर्ड (CBSE Class 12) राजनीति विज्ञान की परीक्षा में यह अध्याय 6 से 8 अंकों का महत्वपूर्ण भार रखता है, जिसमें रियो सम्मेलन (एजेंडा 21), साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ और क्योटो प्रोटोकॉल पर विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं।

🌊 क्या आपने कभी सोचा है: जिस तेल और पानी के लिए हम आपस में लड़ते हैं, वही खत्म हो जाए तो हमारी परमाणु मिसाइलें क्या खाकर जिंदा रहेंगी?

1990 में जब इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर हमला किया, तो वह कोई धार्मिक या वैचारिक लड़ाई नहीं थी; वह जमीन के नीचे दबे काले सोने—'कच्चे तेल' (Crude Oil)—पर कब्जे की हवस थी! उसी खाड़ी युद्ध में भागती हुई इराकी सेना ने कुवैत के 700 तेल के कुओं में आग लगा दी थी, जिससे महीनों तक आकाश में सूरज नहीं दिखा और समुद्र में लाखों समुद्री जीव तड़प-तड़प कर मर गए।

आज 21वीं सदी में वैज्ञानिकों की चेतावनी और भी अधिक खौफनाक है: "20वीं सदी के युद्ध अगर तेल के लिए लड़े गए थे, तो 21वीं सदी के तीसरे विश्वयुद्ध की लड़ाई 'पीने के पानी' (Water) के लिए लड़ी जाएगी!" यदि हिमालय के ग्लेशियर पिघल गए और गंगा व सिंधु नदियां सूख गईं, तो भारत और पाकिस्तान की 1.7 अरब आबादी कहाँ जाएगी? और जिस कार्बन धुएं को उगलकर अमेरिका और यूरोप अमीर बने, उसकी कीमत मालदीव, बांग्लादेश और सुंदरबन के गरीब किसान अपने घर डूबने से क्यों चुकाएं? यह अध्याय केवल भूगोल नहीं, बल्कि पृथ्वी को बचाने की वैश्विक राजनीति का महासंग्राम है!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

इस अध्याय का अध्ययन आपके लिए क्यों अनिवार्य है?

  1. बोर्ड परीक्षा में उत्कृष्ट अंक: CBSE कक्षा 12 में "साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियों का सिद्धांत", "रियो पृथ्वी सम्मेलन 1992 (एजेंडा-21)", और "पर्यावरण संरक्षण पर भारत का पक्ष" से सीधे 4 और 6 अंक के प्रश्न पूछे जाते हैं।
  2. समकालीन वैश्विक संकटों की समझ: कॉप-28 (COP-28), कार्बन क्रेडिट, पेरिस जलवायु समझौता, और मध्य पूर्व में तेल की राजनीति को समझने का यह आधारभूत स्तंभ है।
  3. प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC/JPSC) का केंद्रीय विषय: मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987), क्योटो प्रोटोकॉल (1997), संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP), और मूलवासियों के अधिकारों (UNDRIP) पर ढेरों प्रश्न बनते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • औद्योगिक क्रांति और प्रदूषण: 18वीं सदी से जीवाश्म ईंधनों (कोयला, तेल) के अंधाधुंध दोहन का इतिहास।

  • उत्तर बनाम दक्षिण विभाजन: अमीर पश्चिमी औद्योगिक देश (Global North) बनाम गरीब/विकासशील देश (Global South)।

  • संप्रभुता की सीमाएं: यह समझना कि हवा, बादल और समुद्री लहरें किसी देश के पासपोर्ट या वीज़ा की मोहताज नहीं होतीं।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पर्यावरण के मुद्दों के उद्भव और वैश्विक पारिस्थितिकी संकटों को रेखांकित कर सकेंगे।
  • "वैश्विक साझी संपदा" (Global Commons) की अवधारणा तथा अंटार्कटिका व बाहरी अंतरिक्ष की संधियों का विश्लेषण कर सकेंगे।
  • 1992 के रियो पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit) के ऐतिहासिक महत्व और "साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियों" (CBDR) के सिद्धांत की व्याख्या कर सकेंगे।
  • क्योटो प्रोटोकॉल (1997) और पेरिस समझौते (2015) के तहत ग्रीनहाउस गैसों की कटौती के तंत्र को समझ सकेंगे।
  • पेट्रोलियम (तेल) और जल संसाधनों की भू-राजनीति (Resource Geopolitics) का समालोचनात्मक मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • पर्यावरण संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा और मूलवासियों के अधिकारों पर भारत की राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय नीतियों का परीक्षण कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. वैश्विक राजनीति में पर्यावरण के...
2 2. रियो पृथ्वी सम्मेलन (1992) एवं "...
3 3. क्योटो प्रोटोकॉल (1997) से पेरिस...
4 4. प्राकृतिक संसाधनों की भू-राजनीति...
5 5. मूलवासियों (Indigenous Peoples)...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. वैश्विक राजनीति में पर्यावरण के मुद्दे एवं साझी संपदा (Global Commons)

(क) पर्यावरण संकट अंतरराष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा क्यों बना?

1960 के दशक तक पर्यावरण को घरेलू विज्ञान का विषय माना जाता था। 1972 में विचारकों के वैश्विक समूह 'क्लब ऑफ रोम' (Club of Rome) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द लिमिट्स टू ग्रोथ' (The Limits to Growth) प्रकाशित की, जिसने पहली बार दुनिया को आगाह किया कि पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं और यदि जनसंख्या व औद्योगिकीकरण इसी गति से बढ़ता रहा, तो मानवता का विनाश निश्चित है।

पर्यावरण के प्रमुख संकट निम्नलिखित हैं:

  • कृषि भूमि का क्षरण: अत्यधिक रासायनिक खादों और वनों की कटाई से उपजाऊ भूमि बंजर हो रही है।
  • पेयजल संकट: विश्व की 1.2 अरब से अधिक आबादी को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं है, जिससे प्रतिवर्ष 30 लाख से अधिक बच्चे डायरिया और जलजनित रोगों से मर जाते हैं।
  • ओजोन परत का क्षरण: सीएफसी (CFC) गैसों के कारण समताप मंडल में ओजोन छिद्र हो गया, जिससे सूर्य की पराबैंगनी (UV) किरणें पृथ्वी तक पहुँचकर कैंसर और पारिस्थितिक विनाश कर रही हैं।
  • वैश्विक तापवृद्धि (Global Warming): ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ रहा है, जिससे ग्लेशियर पिघल रहे हैं और समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है।

(ख) वैश्विक साझी संपदा (Global Commons) की सुरक्षा

💡 साझी संपदा (Commons) की परिभाषा:
साझी संपदा उन संसाधनों को कहते हैं जिन पर किसी एक व्यक्ति या संप्रभु राष्ट्र का निजी अधिकार नहीं होता, बल्कि संपूर्ण मानव समुदाय का साझा स्वामित्व होता है (जैसे गाँव की चारागाह या नदी)।
वैश्विक साझी संपदा (Global Commons) के चार प्रमुख क्षेत्र हैं:
  1. पृथ्वी का वायुमंडल (Atmosphere)
  2. अंटार्कटिका महाद्वीप (Antarctica)
  3. समुद्री सतह एवं गहरे समुद्र का तल (Ocean Floor)
  4. बाहरी अंतरिक्ष (Outer Space)

इन साझी विरासतों की सुरक्षा के लिए कई ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय समझौते किए गए हैं: अंटार्कटिका संधि (1959), मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987 - ओजोन परत की रक्षा), और अंटार्कटिका पर्यावरण प्रोटोकॉल (1991)।

2. रियो पृथ्वी सम्मेलन (1992) एवं "साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ" (CBDR)

(क) रियो पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit - 1992)

जून 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरो शहर में 'पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन' (UNCED) आयोजित हुआ, जिसे लोकप्रसिद्ध रूप से 'पृथ्वी सम्मेलन' (Earth Summit) कहा जाता है। इसमें 170 देशों के राष्ट्राध्यक्षों, हजारों एनजीओ और बहुराष्ट्रीय निगमों ने भाग लिया।

  • सम्मेलन की ऐतिहासिक उपलब्धि: इसने पर्यावरण के मुद्दे को विश्व राजनीति के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित किया और 'टिकाऊ / सतत विकास' (Sustainable Development) की अवधारणा को औपचारिक मान्यता दी।
  • एजेंडा 21 (Agenda 21): 21वीं सदी में पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाने के लिए एक व्यापक कार्ययोजना (Action Plan) अंगीकार की गई।
  • दो महत्वपूर्ण संधियाँ: जलवायु परिवर्तन पर रूपरेखा सम्मेलन (UNFCCC) और जैव विविधता अभिसमय (CBD)।

(ख) "साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ" (CBDR) का सिद्धांत

रियो सम्मेलन में उत्तरी (अमीर/विकसित) और दक्षिणी (गरीब/विकासशील) देशों के बीच एक तीखा टकराव देखने को मिला:

तुलना का आधारउत्तरी विकसित देश (Global North)दक्षिणी विकासशील देश (Global South)
प्राथमिक चिंता ओजोन परत का क्षरण, ग्लोबल वार्मिंग और वनों का संरक्षण। आर्थिक विकास, निर्धनता उन्मूलन और नागरिकों का जीवन स्तर सुधारना।
जिम्मेदारी का दृष्टिकोण "पर्यावरण सबका साझा है, इसलिए प्रदूषण रोकने की जिम्मेदारी सभी देशों की बराबर होनी चाहिए।" "वर्तमान प्रदूषण औद्योगिक क्रांति के बाद 150 वर्षों तक विकसित देशों द्वारा किए गए अंधाधुंध दोहन का परिणाम है!"
ऐतिहासिक न्याय अतीत को भूलकर वर्तमान उत्सर्जन पर समान सीमा लगाने की वकालत। विकासशील देशों का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन विकसित देशों की तुलना में नगण्य है। अतः अमीर देश वित्तीय व तकनीकी मदद दें।
🌿 CBDR सिद्धांत का निष्कर्ष (रियो घोषणा का सिद्धांत 7):
पारस्परिक वार्ताओं के बाद यह ऐतिहासिक सिद्धांत स्वीकार किया गया: "पृथ्वी के पर्यावरण की रक्षा करना सभी देशों की 'साझी जिम्मेदारी' (Common Responsibility) है, परंतु ऐतिहासिक उत्सर्जन, आर्थिक क्षमता और तकनीकी विकास के अंतर के आधार पर विभिन्न देशों की 'अलग-अलग जिम्मेदारियाँ' (Differentiated Responsibilities) होंगी।"
अर्थात: विकसित देशों को ग्रीनहाउस गैसों में तत्काल और बड़ी कटौती करनी होगी तथा विकासशील देशों को रियायती तकनीक और वित्तीय सहायता देनी होगी।

3. क्योटो प्रोटोकॉल (1997) से पेरिस समझौते (2015) तक

(क) क्योटो प्रोटोकॉल (Kyoto Protocol - 1997)

जापान के क्योटो शहर में 1997 में UNFCCC के तहत क्योटो प्रोटोकॉल पर सहमति बनी (यह 2005 में प्रभावी हुआ):

  • उद्देश्य: वैश्विक तापवृद्धि पैदा करने वाली छह प्रमुख ग्रीनहाउस गैसों (विशेषकर कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, हाइड्रोफ्लोरोकार्बन आदि) के उत्सर्जन में कटौती करना।
  • बाध्यकारी लक्ष्य: औद्योगिक रूप से विकसित देशों (अनुलग्नक-I देश) के लिए 1990 के स्तर से औसतन 5.2% उत्सर्जन कटौती का कानूनी रूप से बाध्यकारी लक्ष्य रखा गया।
  • विकासशील देशों को छूट: CBDR सिद्धांत के आधार पर भारत और चीन जैसे विकासशील देशों को क्योटो प्रोटोकॉल के पहले चरण की बाध्यकारी कटौतियों से छूट दी गई क्योंकि उनका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन बेहद कम था। (भारत ने अगस्त 2002 में इसका अनुसमर्थन किया)।

(ख) पेरिस जलवायु समझौता (Paris Agreement - 2015)

दिसंबर 2015 में कॉप-21 (COP-21) में हस्ताक्षरित पेरिस समझौते ने वैश्विक जलवायु कूटनीति में नया इतिहास रचा:

  • तापमान सीमा: पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे और यथासंभव 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का वैश्विक संकल्प।
  • राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs): प्रत्येक देश (विकसित व विकासशील दोनों) स्वेच्छा से अपने कार्बन उत्सर्जन में कमी के महत्वाकांक्षी लक्ष्य घोषित करता है।

4. प्राकृतिक संसाधनों की भू-राजनीति: पेट्रोलियम (तेल) एवं जल युद्ध

विश्व राजनीति में प्राकृतिक संसाधनों का नियंत्रण शक्ति और वर्चस्व का मुख्य आधार रहा है:

(क) तेल की भू-राजनीति (Geopolitics of Oil)

आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था और सैन्य मशीनरी पूरी तरह पेट्रोलियम पर निर्भर है। विश्व के कुल ज्ञात तेल भंडार का लगभग 64% हिस्सा अकेले मध्य पूर्व (सऊदी अरब, इराक, ईरान, यूएई, कुवैत आदि) में संचित है।

  • अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों की पूरी विदेश नीति मध्य पूर्व के तेल कुओं और तेल परिवहन के समुद्री मार्गों (जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य) पर नियंत्रण बनाए रखने पर केंद्रित रही है।
  • 1990 का प्रथम खाड़ी युद्ध (कुवैत की मुक्ति) और 2003 में इराक पर अमेरिकी आक्रमण के मूल में सद्दाम हुसैन के तेल भंडारों पर नियंत्रण स्थापित करने की मंशा थी।

(ख) जल की भू-राजनीति (Geopolitics of Water / Water Wars)

स्वच्छ मीठा पानी 21वीं सदी का सबसे मूल्यवान और दुर्लभ रणनीतिक संसाधन बन चुका है। जब कोई नदी कई देशों से होकर बहती है, तो ऊपरी तटवर्ती देश (Upstream) द्वारा बांध बनाने पर निचले तटवर्ती देश (Downstream) को जल संकट का सामना करना पड़ता है:

  • दजला-फरात (Tigris-Euphrates) नदी विवाद: तुर्की द्वारा अतातुर्क बांध बनाने से सीरिया और इराक में पानी का प्रवाह रुकने पर युद्ध की नौबत आई।
  • नील नदी (Nile River) विवाद: इथियोपिया द्वारा ग्रैंड रेनेसां बांध (GERD) बनाने पर मिस्र और सूडान के साथ गंभीर सैन्य तनाव।
  • दक्षिण एशिया में जल विवाद: भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल विवाद (1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से सुलझा), भारत-बांग्लादेश के बीच तीस्ता व गंगा जल विवाद, और ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन द्वारा तिब्बत में विशाल बांध निर्माण से भारत की सामरिक चिंताएं।

5. मूलवासियों (Indigenous Peoples) के अधिकार एवं भारत का रुख

(क) मूलवासी कौन हैं? (Who are Indigenous Peoples?)

संयुक्त राष्ट्र की 1982 की परिभाषा के अनुसार: "मूलवासी वे लोग हैं जो किसी देश में उस समय से रहते आ रहे हैं जब किसी अन्य संस्कृति या मूल के लोगों ने वहाँ आकर उन पर अपनी राजनीतिक सत्ता स्थापित की थी।" आज भी वे अपनी विशिष्ट सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार जीते हैं (उदा. अमेरिका के रेड इंडियंस, ऑस्ट्रेलिया के एबोरिजिनल्स, लैटिन अमेरिका के मूल निवासी)।

मूलवासियों की वैश्विक मांगें:

  • उनके पूर्वजों की भूमि, जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों पर उनके पारंपरिक संप्रभु अधिकारों को मान्यता दी जाए।
  • विकास परियोजनाओं (खदानों, बांधों) के नाम पर उनका विस्थापन और सांस्कृतिक विनाश तुरंत रोका जाए।
  • 1975 में 'वर्ल्ड काउंसिल ऑफ इंडिजिनस पीपल्स' (WCIP) का गठन हुआ और 2007 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मूलवासियों के अधिकारों पर ऐतिहासिक घोषणा-पत्र (UNDRIP) पारित किया।

(ख) पर्यावरण के मुद्दों पर भारत का दृष्टिकोण एवं योगदान

भारत विश्व की 18% आबादी का भरण-पोषण करता है, जबकि ऐतिहासिक वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी मात्र 3% से 4% रही है। भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन विश्व औसत के आधे से भी कम है।

  • न्यायसंगत दृष्टिकोण: भारत लगातार इस बात पर बल देता है कि जलवायु न्याय (Climate Justice) के तहत अमीर देशों को अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए और विकासशील देशों को रियायती तकनीक देनी चाहिए।
  • घरेलू पहल: 2008 में 'जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना' (NAPCC) के तहत 8 राष्ट्रीय मिशन (सौर ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, जल आदि) शुरू किए गए।
  • अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA): 2015 में पेरिस सम्मेलन के दौरान भारत और फ्रांस ने मिलकर International Solar Alliance की स्थापना की (मुख्यालय: गुरुग्राम, हरियाणा), जो कर्क और मकर रेखा के बीच स्थित धूप-संपन्न देशों में सौर ऊर्जा क्रांति का नेतृत्व कर रहा है।
  • पंचामृत संकल्प (कॉप-26 ग्लासगो): भारत ने 2070 तक 'नेट ज़ीरो' (Net Zero) कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य तथा 2030 तक 50% बिजली गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त करने का संकल्प लिया है।

महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक सिद्धांत एवं कालक्रम

1959
अंटार्कटिका संधि पर वाशिंगटन में 12 देशों द्वारा हस्ताक्षर; सैन्य गतिविधियों पर रोक।
1972
क्लब ऑफ रोम द्वारा पर्यावरण संकट पर प्रसिद्ध पुस्तक "द लिमिट्स टू ग्रोथ" प्रकाशित।
1987
ओजोन परत को नष्ट करने वाली CFC गैसों पर प्रतिबंध हेतु मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल अंगीकार।
1987
ब्रंटलैंड आयोग (WCED) की रिपोर्ट "हमारा साझा भविष्य" (Our Common Future) प्रकाशित।
जून 1992
रियो डी जेनेरो (ब्राजील) में संयुक्त राष्ट्र पृथ्वी सम्मेलन; एजेंडा-21 एवं CBDR सिद्धांत स्वीकृत।
11 दिसंबर 1997
क्योटो प्रोटोकॉल अंगीकार; ग्रीनहाउस गैसों की कटौती के बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित।
अगस्त 2002
भारत द्वारा क्योटो प्रोटोकॉल (1997) का औपचारिक अनुसमर्थन।
2005
रूस के अनुसमर्थन के साथ क्योटो प्रोटोकॉल औपचारिक रूप से कानूनी रूप से प्रभावी हुआ।
2007
संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा "मूलवासियों के अधिकारों पर घोषणा-पत्र" (UNDRIP) अंगीकार।
2008
भारत सरकार द्वारा "जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना" (NAPCC) की घोषणा।
दिसंबर 2015
पेरिस जलवायु समझौता (COP-21) अंगीकार; तापमान वृद्धि 1.5°C तक सीमित करने का लक्ष्य।
2015
भारत और फ्रांस द्वारा "अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन" (ISA) की स्थापना (मुख्यालय: गुरुग्राम)।
2021
ग्लासगो (COP-26) में भारत द्वारा "पंचामृत" संकल्प एवं 2070 तक नेट-ज़ीरो का लक्ष्य घोषित।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1 (1 अंक - वस्तुनिष्ठ): 1992 में ऐतिहासिक पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit) किस देश के किस शहर में आयोजित किया गया था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
ऐतिहासिक पृथ्वी सम्मेलन (UNCED) जून 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरो (Rio de Janeiro) शहर में आयोजित किया गया था।
उदाहरण 2
प्रश्न 2 (2 अंक - अति लघु उत्तरीय): "वैश्विक साझी संपदा" (Global Commons) से क्या अभिप्राय है? इसके किन्हीं दो उदाहरणों का उल्लेख कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
वैश्विक साझी संपदा: वे प्राकृतिक संसाधन या भू-भाग जिन पर किसी एक संप्रभु राष्ट्र का संप्रभु अधिकार नहीं होता, बल्कि संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समुदाय का सामूहिक स्वामित्व व प्रबंधन होता है।
दो प्रमुख उदाहरण:

  1. पृथ्वी का वायुमंडल (Earth's Atmosphere)
  2. अंटार्कटिका महाद्वीप (Antarctica) अथवा बाहरी अंतरिक्ष (Outer Space)।
उदाहरण 3
प्रश्न 3 (4 अंक - लघु उत्तरीय): रियो पृथ्वी सम्मेलन (1992) में स्वीकृत "साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ" (CBDR) के सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ (CBDR):

  1. साझी जिम्मेदारी: पर्यावरण का क्षरण पूरी पृथ्वी को प्रभावित करता है, इसलिए पर्यावरण की रक्षा करना विश्व के सभी देशों (अमीर और गरीब दोनों) की साझी जिम्मेदारी है।
  2. अलग-अलग जिम्मेदारियाँ: परंतु प्रदूषण फैलाने में सभी देशों की भूमिका समान नहीं रही है। उत्तरी विकसित देशों (अमेरिका, यूरोप आदि) ने पिछले 150 वर्षों के अनियंत्रित औद्योगिकीकरण से भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन किया है।
  3. विकासशील देशों का तर्क: भारत और अफ्रीका जैसे विकासशील देश अभी गरीबी और औद्योगीकरण के प्रारंभिक दौर में हैं और उनका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन विकसित देशों की तुलना में नगण्य है।
  4. निष्कर्ष: अतः यह सिद्धांत तय करता है कि अमीर विकसित देशों को ग्रीनहाउस गैसों में तत्काल बड़ी कटौती करनी होगी तथा विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा अपनाने के लिए वित्तीय अनुदान और तकनीक हस्तांतरित करनी होगी।
उदाहरण 4
प्रश्न 4 (4 अंक - लघु उत्तरीय): क्योटो प्रोटोकॉल (1997) क्या है? इसमें भारत और अन्य विकासशील देशों को बाध्यकारी कटौतियों से छूट क्यों दी गई थी?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
क्योटो प्रोटोकॉल: 1997 में जापान के क्योटो में हस्ताक्षरित एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसके तहत औद्योगिक रूप से विकसित देशों पर छह प्रमुख ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 1990 के स्तर से औसतन 5.2% की कानूनी रूप से बाध्यकारी कटौती का दायित्व सौंपा गया।

भारत और विकासशील देशों को छूट का कारण:

  1. ऐतिहासिक उत्सर्जन में नगण्य भूमिका: ग्लोबल वार्मिंग के लिए ऐतिहासिक रूप से जिम्मेदार विकसित देश थे, विकासशील देश नहीं।
  2. अत्यंत निम्न प्रति व्यक्ति उत्सर्जन: भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वैश्विक औसत का मात्र आधा और अमेरिकी प्रति व्यक्ति उत्सर्जन का 10वां हिस्सा भी नहीं था।
  3. विकास और निर्धनता उन्मूलन की प्राथमिकता: विकासशील देशों के सामने करोड़ों लोगों को भुखमरी और अंधकार से बाहर निकालने के लिए बिजली और बुनियादी उद्योगों का विस्तार करना पहली आवश्यकता थी। अतः CBDR के तहत उन्हें पहले चरण में छूट दी गई।
उदाहरण 5
प्रश्न 5 (6 अंक - दीर्घ उत्तरीय): "प्राकृतिक संसाधनों की राजनीति 21वीं सदी में युद्ध और शांति का मुख्य निर्धारक बन चुकी है।" इस कथन के संदर्भ में पेट्रोलियम (कच्चे तेल) और जल संसाधनों की भू-राजनीति का विस्तृत विश्लेषण कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
20वीं और 21वीं सदी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों का इतिहास इस बात का साक्षी है कि वैश्विक महाशक्तियों की कूटनीतिक चालें, सैन्य गठबंधन और युद्ध अक्सर विचारधारा के बजाय दुर्लभ प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए लड़े गए हैं:

(क) पेट्रोलियम (कच्चे तेल) की भू-राजनीति (Geopolitics of Oil):

  1. आधुनिक सभ्यता का जीवन-रक्त: औद्योगिक उत्पादन, वैश्विक परिवहन और सेनाओं के टैंक, जहाज व लड़ाकू विमान पेट्रोलियम के बिना एक दिन भी काम नहीं कर सकते।
  2. मध्य पूर्व का रणनीतिक महत्व: विश्व के ज्ञात तेल भंडारों का 64% अकेले खाड़ी क्षेत्र (सऊदी अरब, इराक, ईरान, यूएई, कुवैत) में स्थित है। शीतयुद्ध के समय से ही अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपनी विशाल नौसेना तैनात रखी है और कठपुतली शासनों का पोषण किया है।
  3. संसाधनों के लिए युद्ध:
    • 1990 में इराक द्वारा कुवैत पर कब्जा तेल भंडारों की लूट के लिए था, जिसे 1991 के 'ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म' में अमेरिकी सेना ने निष्फल किया।
    • 2003 में अमेरिका द्वारा इराक पर हमला सामूहिक विनाश के हथियारों के बहाने किया गया, जबकि वास्तविक उद्देश्य इराक के विशाल तेल क्षेत्रों पर अमेरिकी कंपनियों का नियंत्रण स्थापित करना था।

(ख) जल संसाधनों की भू-राजनीति (Geopolitics of Water / Water Wars):
संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव बुतरस बुतरस-घाली ने चेतावनी दी थी कि "आगामी सदी के युद्ध जमीन के लिए नहीं, बल्कि पानी के लिए लड़े जाएंगे।"

  1. साझा नदियों पर विवाद: विश्व की 200 से अधिक बड़ी नदियां दो या दो से अधिक देशों से होकर बहती हैं। जब ऊपरी तटवर्ती देश (Upstream) बांध बनाकर पानी रोकता है, तो निचले देश (Downstream) की कृषि और पेयजल संकटग्रस्त हो जाते हैं:
    • दजला-फरात विवाद: तुर्की द्वारा अतातुर्क बांध परियोजना बनाने पर सीरिया और इराक ने युद्ध की धमकी दी।
    • नील नदी विवाद: इथियोपिया के ग्रैंड रेनेसां बांध के विरुद्ध मिस्र अपनी जीवन-रेखा बचाने के लिए सैन्य हमले की चेतावनी देता रहा है।
    • दक्षिण एशिया: भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में सिंधु जल समझौता हुआ जो कई युद्धों के बाद भी टिका रहा। परंतु चीन द्वारा तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर विशाल बांधों का निर्माण भारत और बांग्लादेश के लिए गंभीर सामरिक व पर्यावरणीय चिंता का विषय है।

निष्कर्ष: जब तक दुनिया जीवाश्म ईंधनों से नवीकरणीय ऊर्जा (सौर व पवन) की ओर नहीं बढ़ेगी और वर्षा जल संचयन व जल संरक्षण को अनिवार्य नहीं बनाएगी, तब तक संसाधनों की यह भू-राजनीति वैश्विक शांति के लिए बारूद का ढेर बनी रहेगी।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

परीक्षार्थी अक्सर रियो पृथ्वी सम्मेलन (1992) और क्योटो प्रोटोकॉल (1997) को एक ही समझ लेते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

रियो सम्मेलन 1992 में ब्राजील में हुआ था जहाँ एजेंडा-21 और CBDR सिद्धांत बना। क्योटो प्रोटोकॉल 1997 में जापान में हुआ जिसमें ग्रीनहाउस गैसों की कटौती के कानूनी लक्ष्य तय हुए।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

विद्यार्थी यह मान लेते हैं कि क्योटो प्रोटोकॉल में भारत पर भी कार्बन उत्सर्जन कटौती की कानूनी बाध्यता थी।

सही वैज्ञानिक तथ्य

भारत एक विकासशील देश होने के नाते क्योटो प्रोटोकॉल के पहले चरण के बाध्यकारी कटौती लक्ष्यों से पूरी तरह मुक्त था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987) ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ओजोन परत को नुकसान पहुँचाने वाले क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) के उत्पादन को रोकने के लिए था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

छात्र सोचते हैं कि अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) का मुख्यालय पेरिस या न्यूयॉर्क में है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) का स्थायी मुख्यालय गुरुग्राम (हरियाणा, भारत) में स्थित है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

परीक्षार्थी साझी संपदा (Commons) और निजी संपत्ति में अंतर स्पष्ट नहीं कर पाते।

सही वैज्ञानिक तथ्य

साझी संपदा पर पूरे समुदाय/विश्व का साझा अधिकार होता है (उदा. वायुमंडल, अंटार्कटिका), जबकि निजी संपत्ति पर किसी एक व्यक्ति या राष्ट्र का एकाधिकार होता है।

पर्यावरण की वैश्विक राजनीति: रियो सम्मेलन, CBDR सिद्धांत एवं संसाधन संघर्ष

🌍 पर्यावरण एवं प्राकृतिक संसाधनों की वैश्विक भू-राजनीति

रियो 1992 से पेरिस 2015 तक: साझी संपदा, जलवायु न्याय और संसाधन युद्ध

🌐 वैश्विक साझी संपदा (Global Commons)
  • 4 प्रमुख क्षेत्र: वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री तल, अंतरिक्ष
  • संधियाँ: अंटार्कटिका संधि 1959, मॉन्ट्रियल 1987
  • चुनौती: निजीकरण और अति-दोहन की प्रवृत्ति
⚖️ साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ (CBDR)
  • उद्गम: रियो पृथ्वी सम्मेलन 1992 (एजेंडा 21)
  • तर्क: विकसित देशों ने 150 साल तक ऐतिहासिक प्रदूषण किया
  • नियम: अमीर देश कटौती करें + तकनीक व धन दें
⚔️ संसाधनों की भू-राजनीति (Resource Wars)
  • तेल का खेल: 64% भंडार मध्य पूर्व में; 1991 व 2003 के खाड़ी युद्ध
  • जल युद्ध (Water Wars): नील, दजला-फरात, ब्रह्मपुत्र विवाद
  • भारत पहल: ISA (गुरुग्राम) और 2070 तक नेट-ज़ीरो लक्ष्य

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
पर्यावरण संकट की वैश्विक प्रकृति: ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन क्षरण, जल संकट और वनों की कटाई किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं हैं।
मुख्य बिंदु 2
क्लब ऑफ रोम (1972): "द लिमिट्स टू ग्रोथ" पुस्तक द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के विरुद्ध विश्व को सर्वप्रथम चेतावनी दी गई।
मुख्य बिंदु 3
वैश्विक साझी संपदा (Global Commons): वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष पर संपूर्ण मानव जाति का साझा अधिकार है।
मुख्य बिंदु 4
रियो पृथ्वी सम्मेलन (1992): ब्राजील में आयोजित; टिकाऊ विकास (Sustainable Development) और "एजेंडा 21" को वैश्विक मान्यता मिली।
मुख्य बिंदु 5
साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ (CBDR): पर्यावरण की रक्षा सबकी साझी जिम्मेदारी है, परंतु ऐतिहासिक उत्सर्जन और आर्थिक क्षमता के आधार पर विकसित देशों पर अधिक दायित्व है।
मुख्य बिंदु 6
क्योटो प्रोटोकॉल (1997): छह ग्रीनहाउस गैसों की कटौती के बाध्यकारी लक्ष्य तय किए गए; भारत और विकासशील देशों को पहले चरण में छूट दी गई।
मुख्य बिंदु 7
पेरिस जलवायु समझौता (2015): वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.5°C से 2°C तक सीमित करने का सर्वसम्मत ऐतिहासिक संकल्प।
मुख्य बिंदु 8
तेल की भू-राजनीति: मध्य पूर्व के 64% तेल भंडारों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए महाशक्तियों ने खाड़ी युद्ध (1991, 2003) लड़े।
मुख्य बिंदु 9
जल युद्ध की आशंका: 21वीं सदी में साझा नदियों (नील, दजला-फरात, ब्रह्मपुत्र) के पानी को लेकर राष्ट्रों के बीच सैन्य टकराव की गंभीर आशंका है।
मुख्य बिंदु 10
भारत का योगदान: क्योटो प्रोटोकॉल (2002 में अनुसमर्थन), 2008 की NAPCC, फ्रांस के साथ अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA - गुरुग्राम), और 2070 तक नेट-ज़ीरो का लक्ष्य।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
1992 के रियो पृथ्वी सम्मेलन में स्वीकृत पर्यावरण संरक्षण की व्यापक कार्ययोजना को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: उसे "एजेंडा 21" (Agenda 21) के नाम से जाना जाता है।
2
ओजोन परत के संरक्षण के लिए 1987 में किस ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol - 1987)।
3
क्योटो प्रोटोकॉल किस वर्ष अंगीकार किया गया और भारत ने इसका अनुसमर्थन किस वर्ष किया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योटो प्रोटोकॉल 1997 में अंगीकार किया गया और भारत ने अगस्त 2002 में इसका औपचारिक अनुसमर्थन किया।
4
अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) की स्थापना किन दो देशों के संयुक्त प्रयास से हुई और इसका मुख्यालय कहाँ है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: इसकी स्थापना भारत और फ्रांस के संयुक्त प्रयास से 2015 में हुई और इसका मुख्यालय गुरुग्राम (हरियाणा, भारत) में स्थित है।
5
विश्व के कुल ज्ञात कच्चे तेल भंडार का लगभग कितना प्रतिशत हिस्सा मध्य पूर्व में संचित है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: लगभग 64% हिस्सा अकेले मध्य पूर्व (खाड़ी क्षेत्र) में संचित है।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
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