(क) चुनाव आयोग का गठन और चुनौतियाँ
भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए जनवरी 1950 में भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की स्थापना की गई और सुकुमार सेन देश के प्रथम मुख्य चुनाव आयुक्त बने।
उस समय भारत में चुनाव कराना विश्व इतिहास का सबसे जटिल और चुनौतीपूर्ण कार्य था:
- विशाल मतदाता वर्ग: देश में कुल 17 करोड़ 32 लाख मतदाता थे, जिन्हें 3,200 विधायकों और 489 लोकसभा सांसदों का चुनाव करना था।
- व्यापक निरक्षरता: कुल मतदाताओं में से मात्र 15% साक्षर थे और शेष 85% निरक्षर थे। अतः मतपत्रों पर नाम लिखने के बजाय प्रत्येक उम्मीदवार के लिए अलग-अलग 'चुनाव चिन्ह' (Election Symbols) वाली मतपेटियाँ तैयार की गईं।
- मतदाता सूची की विसंगतियाँ: पहली सूची में 40 लाख महिलाओं के नाम 'फलाने की पत्नी' या 'फलाने की बेटी' के रूप में दर्ज थे। सुकुमार सेन ने इस अपमानजनक व्यवस्था को रद्द किया और नए सिरे से वास्तविक नामों को दर्ज कराया।
- प्रशिक्षण: 3 लाख से अधिक चुनाव कर्मियों, मतदान अधिकारियों और पुलिसकर्मियों को पहली बार प्रशिक्षित किया गया।
(ख) चुनाव का सफल आयोजन और विश्वव्यापी प्रभाव
यह चुनाव अक्टूबर 1951 से फरवरी 1952 तक संपन्न हुआ (इसे सामान्यतः 1952 का चुनाव कहा जाता है)।
कड़ाके की ठंड, दुर्गम रास्तों और निरक्षरता के बावजूद 50% से अधिक मतदाताओं ने मतदान किया। चुनाव निष्पक्ष और शांतिपूर्ण रहे; पराजित उम्मीदवारों ने भी जनादेश को सहर्ष स्वीकार किया। इस चुनाव ने पश्चिमी दुनिया के इस भ्रम को हमेशा के लिए तोड़ दिया कि "लोकतंत्र केवल धनी और साक्षर देशों में ही संभव है।"