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CBSE • कक्षा XII • Political Science • अध्याय 14
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

क्षेत्रीय आकांक्षाएं

1980 के दशक को स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में 'क्षेत्रीय स्वायत्तता और आंदोलनों का दशक' माना जाता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने राष्ट्र निर्माण के जिस लोकतांत्रिक मॉडल को अपनाया, वह यूरोपीय देशों के 'समानतावादी या आत्मसातवादी' (Assimilationist) मॉडल से एकदम भिन्न था। भारत ने विविधता को नकारने या दबाने के बजाय उसे स्वीकार किया और संवैधानिक संघवाद के माध्यम से विभिन्न भाषाई, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय समूहों को अपनी पहचान सुरक्षित रखने का लोकतांत्रिक अधिकार दिया। परंतु 1980 के दशक में भारत के कई सीमान्त व महत्वपूर्ण राज्यों—विशेषकर जम्मू और कश्मीर, पंजाब और पूर्वोत्तर के राज्यों (असम, मिजोरम, नगालैंड)—में क्षेत्रीय आकांक्षाओं ने उग्र और कभी-कभी हिंसक व अलगाववादी रूप धारण कर लिया। इन आंदोलनों ने भारतीय राज्य की संप्रभुता, एकता और लोकतांत्रिक ताने-बाने के समक्ष गंभीर चुनौतियाँ खड़ी कीं। कश्मीर में स्वायत्तता की माँग और 1989 के बाद आतंकवाद का भयावह दौर, पंजाब में 'आनंदपुर साहिब प्रस्ताव', जरनैल सिंह भिंडरावाले का उग्रवाद, 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' (1984) और उसके बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या व 1984 के सिख विरोधी दंगे, तथा पूर्वोत्तर में नगा-मिजो अलगाववाद और असम का छात्र आंदोलन (AASU)—ये सभी घटनाएं भारतीय राजनीति की जटिलता को उजागर करती हैं। भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह रही कि उसने इन गंभीर संकटों का समाधान केवल सैन्य बल से नहीं, बल्कि संवैधानिक वार्ताओं, राजनीतिक समझौतों (जैसे राजीव गांधी-लोंगोवाल समझौता, असम समझौता 1985, मिजोरम शांति समझौता 1986) और सत्ता के विकेंद्रीकरण के माध्यम से निकाला। इस अध्याय में क्षेत्रीय आकांक्षाओं के स्वरूप, विभिन्न राज्यों के आंदोलनों, समझौतों की सफलता व सीमाओं, तथा भारत द्वारा सीखे गए मूल्यवान लोकतांत्रिक सबकों का समग्र और गहन विश्लेषण किया गया है। झारखंड बोर्ड (CBSE Class 12) राजनीति विज्ञान की वार्षिक परीक्षा में यह अध्याय 8 से 10 अंकों का अत्यधिक महत्वपूर्ण भार रखता है। इसमें जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति, पंजाब संकट व ऑपरेशन ब्लू स्टार, पूर्वोत्तर के तीन प्रमुख मुद्दे (स्वायत्तता, अलगाववाद, बाहरी बनाम मूल निवासी) और क्षेत्रीय आकांक्षाओं से सीखे गए सबकों पर बहुविकल्पीय, लघु और दीर्घ उत्तरीय प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।

🏔️ क्या विविधता से भरा भारत कभी एक अखंड राष्ट्र बना रह सकता था, या क्षेत्रीय आकांक्षाओं से देश के टुकड़े हो जाते?

1947 में जब भारत आज़ाद हुआ, तो पश्चिमी राजनीतिक विश्लेषकों ने भविष्यवाणी की थी कि भारत भाषा, जाति, धर्म और भूगोल की अनगिनत भिन्नताओं के कारण जल्द ही 20-25 छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखर जाएगा! 1980 के दशक में जब पंजाब में खालिस्तान की माँग को लेकर हिंसा भड़की, स्वर्ण मंदिर पर सेना को टैंक ले जाने पड़े (ऑपरेशन ब्लू स्टार), कश्मीर घाटी में आतंकवाद ने सिर उठाया और लाखों कश्मीरी पंडितों को अपनी ही ज़मीन से बेघर होना पड़ा, तथा पूर्वोत्तर के जंगलों में मिजो और नागा विद्रोही भारतीय सेना से सीधे युद्ध लड़ रहे थे—तब लगा कि शायद पश्चिमी विद्वानों की वह डरावनी भविष्यवाणी सच होने जा रही है!

परंतु भारत बिखरा नहीं, बल्कि और अधिक मजबूत होकर उभरा! जानते हैं क्यों? क्योंकि भारत ने क्षेत्रीय आकांक्षाओं को "देशद्रोह" नहीं, बल्कि "लोकतंत्र की स्वाभाविक अभिव्यक्ति" माना। बातचीत की मेज पर धुर विद्रोही लालडेंगा मिजोरम के मुख्यमंत्री बने, पंजाब में शांति लौटी और असम में छात्र नेता चुनाव जीतकर सरकार में आए! आइए, भारत के इस अदम्य संघीय साहस और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के रोमांचक राजनीतिक सफर को गहराई से समझें!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

इस अध्याय का अध्ययन आपके लिए क्यों अनिवार्य है?

  1. बोर्ड परीक्षा में उत्कृष्ट अंक: CBSE कक्षा 12वीं में "जम्मू और कश्मीर का विशेष दर्जा (अनुच्छेद 370)", "पंजाब संकट: कारण एवं परिणाम", "पूर्वोत्तर भारत के तीन प्रमुख मुद्दे", और "क्षेत्रीय आकांक्षाओं से भारतीय लोकतंत्र ने क्या सबक सीखे?" पर 4 और 6 अंक के प्रश्न बार-बार दोहराए जाते हैं।
  2. संवैधानिक एवं समकालीन ज्ञान: अनुच्छेद 370 और 35A का ऐतिहासिक संदर्भ और 2019 का पुनर्गठन, 6वीं अनुसूची की स्वायत्त परिषदें (Autonomous Councils), तथा 'क्षेत्रीयता बनाम राष्ट्रीयता' का संतुलन समझने में मदद मिलती है।
  3. प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC/JPSC/NDA) का आधार: पूर्वोत्तर के शांति समझौते, असम गण परिषद, मिजो नेशनल फ्रंट, सिख विरोधी दंगों के लिए नानावती आयोग, और भारतीय संघवाद की असममित प्रकृति (Asymmetric Federalism) प्रतियोगी परीक्षाओं के केंद्र में रहते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • भारतीय संघवाद की संरचना: केंद्र-राज्य संबंध, सातवीं अनुसूची की सूचियां और भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन (1956)।

  • संविधान के विशेष उपबंध: अनुच्छेद 370 (जम्मू-कश्मीर) एवं अनुच्छेद 371 (महाराष्ट्र, गुजरात, नगालैंड, असम, मणिपुर, आंध्र, सिक्किम, मिजोरम, अरुणाचल आदि के लिए विशेष प्रावधान)।

  • 1980 के दशक की राजनीतिक पृष्ठभूमि: केंद्र में सत्ता का केंद्रीकरण और क्षेत्रीय दलों का उभार।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • भारतीय लोकतंत्र के विविधता मॉडल और यूरोपीय राष्ट्र-राज्य मॉडल के अंतर का विश्लेषण कर सकेंगे।
  • जम्मू-कश्मीर के विलय, अनुच्छेद 370, आंतरिक स्वायत्तता की माँगों और 2019 के संवैधानिक पुनर्गठन की व्याख्या कर सकेंगे।
  • पंजाब संकट, आनंदपुर साहिब प्रस्ताव, ऑपरेशन ब्लू स्टार और 1985 के राजीव गांधी-लोंगोवाल समझौते के कारणों व परिणामों का मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • पूर्वोत्तर भारत की अद्वितीय भौगोलिक व सांस्कृतिक बनावट तथा इसके तीन प्रमुख मुद्दों (स्वायत्तता, अलगाववाद, बाहरी बनाम मूल निवासी) को वर्गीकृत कर सकेंगे।
  • मिजोरम के लालडेंगा समझौते (1986) और असम के छात्र आंदोलन (AASU) व 1985 के असम समझौते की सफलता का परीक्षण कर सकेंगे।
  • क्षेत्रीय आकांक्षाओं से भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली द्वारा सीखे गए चार सार्वभौमिक सबकों का समालोचनात्मक विश्लेषण कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. क्षेत्र और राष्ट्र: विविधता का भ...
2 2. जम्मू और कश्मीर: स्वायत्तता, विव...
3 3. पंजाब संकट: आनंदपुर साहिब प्रस्त...
4 4. पूर्वोत्तर भारत: स्वायत्तता, अलग...
5 5. द्रविड़ आंदोलन एवं दक्षिण भारत म...
6 6. क्षेत्रीय आकांक्षाओं से सीखे गए...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. क्षेत्र और राष्ट्र: विविधता का भारतीय मॉडल बनाम यूरोपीय मॉडल

(क) राष्ट्र निर्माण के दो परस्पर विरोधी दृष्टिकोण

विश्व में राष्ट्र निर्माण और राष्ट्रीय एकता को साधने के ऐतिहासिक रूप से दो भिन्न मॉडल रहे हैं:

  • यूरोपीय/पश्चिमी आत्मसातवादी मॉडल (Assimilationist Model): यूरोप के अधिकांश देशों में राष्ट्र-राज्य का निर्माण एकल भाषा, एकल धर्म और एकल संस्कृति के आधार पर हुआ। वहाँ सांस्कृतिक विविधता को राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा माना गया और अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक संस्कृति में विलीन होने पर बाध्य किया गया।
  • भारतीय लोकतांत्रिक मॉडल (Democratic Pluralist Model): भारत ने विविधता को राष्ट्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति और पहचान माना। भारतीय दृष्टिकोण यह है कि 'एक व्यक्ति एक ही समय में एक गर्वित बंगाली, तमिल, पंजाबी या कश्मीरी भी हो सकता है और साथ ही एक निष्ठावान भारतीय नागरिक भी।' भारत में राष्ट्रीयता क्षेत्रीय पहचानों का दमन करके नहीं, बल्कि उनके समन्वय से निर्मित होती है।
तुलना का बिंदु यूरोपीय मॉडल (पश्चिमी दृष्टिकोण) भारतीय लोकतांत्रिक मॉडल (विविधता का सम्मान)
विविधता के प्रति दृष्टिकोण विविधता को राष्ट्रीय एकता में बाधक व विभाजनकारी माना गया। विविधता को प्राकृतिक व लोकतंत्र की जीवनरेखा माना गया।
समाधान का मार्ग सांस्कृतिक समरूपता (एक भाषा, एक धर्म, एक राष्ट्रीय संस्कृति)। संवैधानिक स्वायत्तता, भाषाई पुनर्गठन और बहुलतावाद।
संघीय व्यवस्था अधिकांशतः एकात्मक या कठोर रूप से सममित (Symmetric)। लचीला एवं असममित संघवाद (अनुच्छेद 370, 371, 5वीं व 6वीं अनुसूची)।

(ख) क्षेत्रीय आकांक्षाओं के तीन प्रमुख कारक

  1. स्वायत्तता की माँग (Demand for Autonomy): राज्यों का मानना कि केंद्र सरकार अत्यधिक शक्तियाँ अपने पास रखती है और अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का दुरुपयोग करके चुनी हुई राज्य सरकारों को गिराती है। अतः राज्यों को अधिक वित्तीय व विधायी अधिकार मिलने चाहिए।
  2. आर्थिक असंतुलन और संसाधनों पर नियंत्रण (Economic Disparity): प्राकृतिक संसाधनों (जैसे खनिज, वन, नदी जल) से संपन्न राज्यों (उदा. असम, झारखंड) में यह असंतोष पनपा कि उनके संसाधनों का दोहन केंद्र करता है, किंतु स्थानीय जनता को विकास का यथोचित लाभ नहीं मिलता।
  3. सांस्कृतिक व भाषाई अस्मिता (Cultural & Linguistic Identity): गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी को थोपने का विरोध और अपनी मातृभाषा, लिपि व विशिष्ट जनजातीय संस्कृति के संरक्षण की प्रबल चाह।
📌 परीक्षा उपयोगी तथ्य: 1980 के दशक को 'क्षेत्रीय आकांक्षाओं का दशक' कहा जाता है क्योंकि इस दौर में केंद्र सरकार के सत्ता-केंद्रीकरण के विरुद्ध देश के विभिन्न कोनों में क्षेत्रीय शक्तियों का अभूतपूर्व विस्फोट हुआ।

2. जम्मू और कश्मीर: स्वायत्तता, विवाद और संवैधानिक पुनर्गठन

(क) ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और भारत में विलय

1947 से पूर्व जम्मू और कश्मीर एक देशी रियासत थी, जिसके शासक महाराजा हरि सिंह थे। वे न तो भारत में और न ही पाकिस्तान में शामिल होना चाहते थे, बल्कि अपने राज्य को एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाए रखना चाहते थे:

  • शेख अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस: राज्य की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी के लोकप्रिय नेता शेख मोहम्मद अब्दुल्ला महाराजा के निरंकुश शासन के विरोधी थे, लेकिन वे धर्मनिरपेक्ष थे और पाकिस्तान के द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के भी घोर विरोधी थे। वे कांग्रेस और जवाहरलाल नेहरू के मित्र थे।
  • अक्टूबर 1947 का पाकिस्तानी हमला: पाकिस्तान ने कबायलियों के भेष में अपनी सेना भेजकर कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। राजधानी श्रीनगर पर खतरा मंडराते देख महाराजा हरि सिंह ने भारत से सैन्य सहायता माँगी।
  • विलय पत्र (Instrument of Accession): 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ 'विलय पत्र' पर हस्ताक्षर किए। भारत सरकार ने तुरंत वायुसेना भेजकर श्रीनगर को बचाया। शर्त यह थी कि स्थिति सामान्य होने पर जनता की राय (जनमत संग्रह) ली जाएगी, जो पाकिस्तान द्वारा अपने कब्जे वाले क्षेत्र (POK) से सेना न हटाने के कारण कभी नहीं हो सका।

(ख) अनुच्छेद 370 और आंतरिक अशांति के चरण

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया:

  1. विशेष प्रावधान: राज्य का अपना अलग संविधान था। संसद को केवल रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय पर कानून बनाने का अधिकार था; अन्य विषयों पर राज्य विधानसभा की सहमति अनिवार्य थी।
  2. शेख अब्दुल्ला की बर्खास्तगी (1953): प्रधानमंत्री बनने के बाद शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर की संप्रभुता पर बल देना शुरू किया। केंद्र सरकार ने 1953 में उन्हें पद से बर्खास्त कर कई वर्षों के लिए नजरबंद कर दिया।
  3. इंदिरा-शेख समझौता (1974): 1974 में इंदिरा गांधी और शेख अब्दुल्ला के बीच ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसके तहत शेख अब्दुल्ला ने भारत के साथ कश्मीर के स्थायी विलय को स्वीकार किया और वे राज्य के मुख्यमंत्री बने।
  4. 1987 का विवादास्पद चुनाव और उग्रवाद का जन्म: 1987 के विधानसभा चुनावों में व्यापक धांधली के आरोप लगे। नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन की जीत हुई, लेकिन असंतुष्ट युवाओं ने मतपत्र (Ballot) की जगह बंदूक (Bullet) उठा ली। पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद ने घाटी को अपनी गिरफ्त में ले लिया।
  5. कश्मीरी पंडितों का निष्कासन (1990): आतंकवादी संगठनों द्वारा लक्षित हत्याओं के कारण 1990 के आरंभ में लाखों कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़कर जम्मू और दिल्ली में शरणार्थी शिविरों में रहने पर विवश होना पड़ा।

(ग) 5 अगस्त 2019 का ऐतिहासिक पुनर्गठन

संसद ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 पारित कर अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों और अनुच्छेद 35A को निष्प्रभावी कर दिया। राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया:

  • जम्मू और कश्मीर: विधानसभा युक्त केंद्र शासित प्रदेश।
  • लद्दाख: बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश (कारगिल और लेह जिले)।
  • अब भारत का संपूर्ण संविधान, मौलिक अधिकार और कानून जम्मू-कश्मीर में शेष भारत की तरह ही लागू होते हैं।
⚠️ परीक्षक की चेतावनी (Examiner Warning): छात्र अक्सर मानते हैं कि कश्मीर में केवल एक आकांक्षा थी। वास्तव में जम्मू-कश्मीर के तीन भाग थे: कश्मीर घाटी (मुस्लिम बहुल, स्वायत्तता की प्रबल माँग), जम्मू (हिंदू-मुस्लिम मिश्रित, भारत के साथ पूर्ण एकीकरण की माँग), और लद्दाख (बौद्ध-मुस्लिम बहुल, कश्मीर के नियंत्रण से मुक्ति की माँग)।

3. पंजाब संकट: आनंदपुर साहिब प्रस्ताव, ऑपरेशन ब्लू स्टार एवं शांति बहाली

(क) पृष्ठभूमि: पंजाबी सूबा और अकाली दल की राजनीति

1950 और 1960 के दशक में अकाली दल ने 'पंजाबी सूबा' (पंजाबी भाषी राज्य) के गठन के लिए आंदोलन चलाया। अंततः 1966 में तत्कालीन पंजाब का त्रिविभाजन हुआ:

  • पंजाबी भाषा बोलने वालों के लिए पंजाब।
  • हिंदी भाषा बोलने वालों के लिए हरियाणा।
  • पहाड़ी क्षेत्रों को मिलाकर हिमाचल प्रदेश (केंद्र शासित प्रदेश, बाद में 1971 में पूर्ण राज्य)।

परंतु विभाजन के बाद भी समस्याएँ समाप्त नहीं हुईं। चंडीगढ़ दोनों राज्यों की साझा राजधानी बना रहा, रावी-ब्यास नदी जल के बंटवारे पर विवाद बना रहा, और अकाली दल की शिकायत रही कि सामाजिक संरचना ऐसी थी कि चुनाव में उन्हें स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाता था।

(ख) आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973)

1973 में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब में एक ऐतिहासिक राजनीतिक प्रस्ताव पारित किया:

  1. संघीय स्वायत्तता: केंद्र सरकार के पास केवल रक्षा, विदेश, संचार और मुद्रा रहे; शेष सभी शक्तियाँ राज्यों को दी जाएं।
  2. सिख 'कौम' (राष्ट्र/समुदाय) की पहचान: सिखों के राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों की विशेष सुरक्षा।
  3. विवाद: मध्यममार्गी अकालियों के लिए यह प्रस्ताव अधिक स्वायत्तता का दस्तावेज था, लेकिन कुछ चरमपंथी तत्वों ने इसे स्वतंत्र 'खालिस्तान' (सिख राष्ट्र) की नींव के रूप में व्याख्यायित किया।

(ग) उग्रवाद, ऑपरेशन ब्लू स्टार और 1984 के दंगे

1980 के दशक में अकाली दल का नेतृत्व मध्यममार्गियों से खिसककर उग्रवादी तत्वों, विशेषकर जरनैल सिंह भिंडरावाले के हाथों में चला गया:

  • स्वर्ण मंदिर को किला बनाना: उग्रवादियों ने अमृतसर के पवित्र स्वर्ण मंदिर परिसर (हरिमंदिर साहिब व अकाल तख्त) में अत्याधुनिक हथियारों का जखीरा जमा कर उसे अपना सुरक्षित ठिकाना बना लिया। निर्दोष नागरिकों व अधिकारियों की हत्याएं होने लगीं।
  • ऑपरेशन ब्लू स्टार (Operation Blue Star - जून 1984): प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सेना को स्वर्ण मंदिर से आतंकियों को बाहर निकालने का आदेश दिया। 3 से 6 जून 1984 के बीच चले इस सैन्य अभियान में टैंकों व बख्तरबंद गाड़ियों का प्रयोग हुआ। सभी उग्रवादी मारे गए, लेकिन ऐतिहासिक अकाल तख्त भवन को भारी क्षति पहुँची। इससे देश-विदेश के करोड़ों सिखों की धार्मिक भावनाएं गहरी आहत हुईं।
  • इंदिरा गांधी की हत्या (31 अक्टूबर 1984): ऑपरेशन ब्लू स्टार के प्रतिशोध में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दो सिख अंगरक्षकों (सतवंत सिंह और बेअंत सिंह) ने उनके आवास पर गोलियां बरसाकर उनकी हत्या कर दी।
  • 1984 के सिख विरोधी कत्लेआम: इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली, कानपुर, बोकारो आदि शहरों में निर्दोष सिखों का सुनियोजित नरसंहार हुआ। 3,000 से अधिक सिख जिंदा जला दिए गए और उनकी संपत्तियां लूट ली गईं। 2005 में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने संसद में इस त्रासदी के लिए देश और सिख समुदाय से औपचारिक क्षमा माँगी।

(घ) राजीव गांधी-लोंगोवाल समझौता (पंजाब समझौता 1985)

जुलाई 1985 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी और अकाली दल के अध्यक्ष हरचंद सिंह लोंगोवाल के बीच शांति समझौता हुआ:

  • चंडीगढ़ को पूर्णतः पंजाब को सौंपने पर सहमति।
  • पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के बीच नदी जल बंटवारे के लिए एक न्यायाधिकरण (Tribunal) की स्थापना।
  • सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (AFSPA) की समीक्षा और पीड़ितों को मुआवजा।
  • यद्यपि लोंगोवाल की उग्रवादियों द्वारा हत्या कर दी गई, लेकिन 1990 के दशक के मध्य तक पुलिस (डीजीपी के.पी.एस. गिल) और सुरक्षा बलों की कार्रवाई तथा जनता की शांति की लालसा से पंजाब में उग्रवाद समाप्त हो गया और सामान्य लोकतांत्रिक राजनीति बहाल हुई।

4. पूर्वोत्तर भारत: स्वायत्तता, अलगाववाद और बाहरी लोगों का विरोध

(क) पूर्वोत्तर की विशिष्ट भौगोलिक एवं राजनीतिक बनावट

पूर्वोत्तर भारत (Seven Sisters + सिक्किम) भारत के कुल क्षेत्रफल का लगभग 8% और जनसंख्या का 4% है। यह क्षेत्र 22 किमी संकीर्ण 'सिलीगुड़ी कॉरिडोर' (चिकन नेक) के माध्यम से शेष भारत से जुड़ा है। इसकी सीमाएं चीन, म्यांमार, बांग्लादेश और भूटान से लगती हैं। पूर्वोत्तर की राजनीति में तीन प्रमुख मुद्दे प्रमुख रहे हैं:

1. स्वायत्तता की माँग (Demand for Autonomy)

स्वतंत्रता के समय पूरा पूर्वोत्तर (मणिपुर व त्रिपुरा रियासतों को छोड़कर) असम राज्य का भाग था। गैर-असमिया जनजातीय आबादी (खासी, गारो, जयंतिया, मिजो आदि) पर असमिया भाषा थोपने का विरोध हुआ। केंद्र सरकार ने जनजातीय आकांक्षाओं का सम्मान करते हुए असम का पुनर्गठन किया:

  • 1963 में नगालैंड का गठन।
  • 1972 में मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा को पूर्ण राज्य बनाया गया।
  • 1987 में मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया।
  • संविधान की छठी अनुसूची के तहत कार्बी आंगलोंग, बोडोलैंड आदि क्षेत्रों में स्वायत्त जिला परिषदों (Autonomous District Councils) का गठन किया गया।

2. अलगाववादी आंदोलन (Secessionist Movements)

राज्य विद्रोह का कारण एवं नेतृत्व समाधान एवं वर्तमान स्थिति
मिजोरम (Mizoram) 1959 के 'मऊतम अकाल' में असम सरकार की लापरवाही से नाराज होकर लालडेंगा ने 'मिजो नेशनल फ्रंट' (MNF) बनाया और 1966 में भारत से आजादी की घोषणा कर दी। गुरिल्ला युद्ध लड़ा गया। 1986 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी और लालडेंगा के बीच ऐतिहासिक मिजोरम शांति समझौता हुआ। लालडेंगा मुख्यमंत्री बने। आज मिजोरम पूर्वोत्तर का सबसे शांत व साक्षर राज्यों में से एक है।
नगालैंड (Nagaland) 1947 में अंगामी जापू फिज़ो (A.Z. Phizo) के नेतृत्व में 'नागा नेशनल काउंसिल' (NNC) ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित किया और भारतीय सेना के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह शुरू किया। 1975 में शिलॉन्ग समझौता हुआ, परंतु एनएससीएन (NSCN - इसाक-मुइवा गुट) ने संघर्ष जारी रखा। वर्तमान में केंद्र सरकार के साथ संघर्ष विराम और शांति वार्ताएं जारी हैं।

3. बाहरी लोगों का विरोध: असम आंदोलन (1979-1985)

पूर्वोत्तर का तीसरा बड़ा मुद्दा 'बाहरी लोगों' (बंगाली, मारवाड़ी, और विशेषकर बांग्लादेश से आए अवैध घुसपैठियों) के विरुद्ध जन-विद्रोह था:

  • असम छात्र संघ (AASU) का आंदोलन: 1979 में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) और असम गण संग्राम परिषद ने मांग उठाई कि 1951 के बाद असम में अवैध रूप से घुसे सभी विदेशियों की पहचान कर उन्हें मतदाता सूची से हटाया जाए और देश से बाहर निकाला जाए।
  • असम समझौता (Assam Accord - 15 अगस्त 1985): राजीव गांधी सरकार और आसू नेताओं के बीच समझौता हुआ। तय हुआ कि 25 मार्च 1971 (बांग्लादेश युद्ध) के बाद असम आए विदेशियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजा जाएगा।
  • असम गण परिषद (AGP): आंदोलनकारी छात्रों ने एक नया राजनीतिक दल 'असम गण परिषद' बनाया और 1985 के चुनाव में प्रफुल्ल कुमार महंत के नेतृत्व में ऐतिहासिक जीत दर्ज कर सरकार बनाई।

5. द्रविड़ आंदोलन एवं दक्षिण भारत में क्षेत्रीय चेतना

(क) द्रविड़ आंदोलन का उदय और वैचारिक आधार

उत्तर भारत की तरह दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में भी क्षेत्रीय अस्मिता का सशक्त आंदोलन चला, जिसे द्रविड़ आंदोलन (Dravidian Movement) कहा जाता है:

  • ई.वी. रामास्वामी 'पेरियार' और आत्मसम्मान आंदोलन: पेरियार ने ब्राह्मणवाद, जाति व्यवस्था, उत्तर भारतीय प्रभुत्व और धार्मिक अंधविश्वासों के विरुद्ध 1925 में 'आत्मसम्मान आंदोलन' (Self-Respect Movement) शुरू किया। उन्होंने 'द्रविड़ कड़गम' (DK) की स्थापना की, जो मूल रूप से एक अलग संप्रभु राष्ट्र 'द्रविड़ नाडु' की मांग करती थी।
  • द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) का उदय: 1949 में सी.एन. अन्नादुरै ने चुनावी राजनीति में भाग लेने के लिए DMK की स्थापना की। अन्नादुरै ने 'द्रविड़ नाडु' की अलगाववादी मांग को त्याग दिया और भारतीय संघ के भीतर ही राज्यों की स्वायत्तता और तमिल संस्कृति की रक्षा को अपना लक्ष्य बनाया।

(ख) 1965 का हिंदी विरोधी आंदोलन

संविधान के अनुसार 26 जनवरी 1965 को अंग्रेजी को राजभाषा के पद से हटाकर केवल हिंदी को एकमात्र संघ की राजभाषा बनाया जाना था। तमिलनाडु में इसके विरुद्ध उग्र आंदोलन भड़क उठा। छात्रों ने आत्मदाह किए और रेलगाड़ियां रोकी गईं।

परिणामस्वरूप, केंद्र सरकार ने आश्वासन दिया कि जब तक गैर-हिंदी भाषी राज्य चाहेंगे, तब तक अंग्रेजी का सह-राजभाषा (Associate Official Language) के रूप में प्रयोग जारी रहेगा। 1967 के विधानसभा चुनाव में DMK ने कांग्रेस को करारी शिकस्त देकर सत्ता हासिल की, और तब से आज तक तमिलनाडु में केवल द्रविड़ दलों (DMK या AIADMK) का ही शासन रहा है।

6. क्षेत्रीय आकांक्षाओं से सीखे गए सबक (Lessons for Indian Democracy)

जम्मू-कश्मीर, पंजाब, असम, मिजोरम और दक्षिण भारत के अनुभवों से भारतीय लोकतंत्र ने चार अत्यंत महत्वपूर्ण सबक सीखे हैं, जो बोर्ड परीक्षा का सर्वप्रमुख दीर्घ उत्तरीय प्रश्न है:

  1. सबक 1: क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतांत्रिक राजनीति का स्वाभाविक अंग हैं
    विविधतापूर्ण समाज में क्षेत्रीय पहचान और स्वायत्तता की मांग उठना कोई असामान्य या राष्ट्रविरोधी बात नहीं है। यह लोकतंत्र की जीवंतता का प्रतीक है। यूनाइटेड किंगडम में स्कॉटलैंड, स्पेन में कैटेलोनिया की तरह भारत में भी क्षेत्रीयता राष्ट्रवाद की पूरक है, विरोधी नहीं।
  2. सबक 2: बल प्रयोग के बजाय लोकतांत्रिक वार्ताओं और समझौतों का मार्ग ही स्थायी है
    सैन्य शक्ति या पुलिस दमन से कुछ समय के लिए विद्रोह दबाया जा सकता है, किंतु स्थायी समाधान केवल बातचीत और राजनीतिक समझौतों से ही निकलता है। मिजोरम समझौता (1986) और असम समझौता (1985) इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं जहाँ विद्रोही मुख्यधारा की लोकतांत्रिक राजनीति में शामिल हुए।
  3. सबक 3: सत्ता में क्षेत्रीय दलों की साझेदारी और सत्ता का विकेंद्रीकरण अनिवार्य है
    यदि केंद्र सरकार राज्यों की सरकारों को मनमाने ढंग से बर्खास्त करेगी या स्थानीय नेताओं की अनदेखी करेगी, तो असंतोष उग्र रूप लेगा। 1990 के बाद केंद्र में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू होने से क्षेत्रीय दलों (जैसे द्रमुक, अकाली दल, असम गण परिषद, तृणमूल, बीजद) को राष्ट्रीय नीति निर्धारण में हिस्सेदारी मिली, जिससे अलगाववाद कमजोर हुआ।
  4. सबक 4: आर्थिक विकास के लाभों का सभी क्षेत्रों में न्यायसंगत वितरण
    यदि किसी क्षेत्र को यह महसूस होगा कि उसके प्राकृतिक संसाधनों का दोहन शेष देश कर रहा है और स्थानीय जनता पिछड़ी हुई है, तो वहाँ असंतोष फूटेगा। अतः क्षेत्रीय असंतुलन को समाप्त करना राष्ट्रीय एकता की पहली शर्त है।
🎯 निष्कर्ष: भारत ने सिद्ध किया कि राष्ट्रीय एकता का अर्थ 'सांस्कृतिक समरूपता' नहीं, बल्कि 'विविधता का सम्मान और लोकतांत्रिक समन्वय' है।

महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक सिद्धांत एवं कालक्रम

1947 (26 अक्टूबर)
महाराजा हरि सिंह द्वारा भारत के साथ विलय पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर।
1952
दिल्ली समझौता: जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति पर सहमति।
1953
शेख अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री पद से बर्खास्त कर नजरबंद किया गया; बख्शी गुलाम मोहम्मद नए प्रधानमंत्री बने।
1959
असम के मिजो हिल्स में भीषण मऊतम अकाल; राहत कार्यों की विफलता से असंतोष का जन्म।
1961
लालडेंगा द्वारा मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) की स्थापना।
1963
नगालैंड को भारत का 16वां पूर्ण राज्य बनाया गया।
1965
तमिलनाडु में हिंदी थोपे जाने के विरुद्ध विशाल एवं हिंसक छात्र आंदोलन।
1966
पंजाब का पुनर्गठन: पंजाब (पंजाबी भाषी) और हरियाणा (हिंदी भाषी) दो पृथक राज्य बने।
1966 (मार्च)
मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) द्वारा सशस्त्र विद्रोह और मिजोरम की आजादी की घोषणा।
1972
पूर्वोत्तर पुनर्गठन: मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा को पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ।
1973
अकाली दल द्वारा आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित (राज्यों के लिए अधिकतम स्वायत्तता की माँग)।
1974
इंदिरा-शेख समझौता; शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर के भारत में स्थायी विलय को स्वीकार किया।
1979-1985
ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) द्वारा अवैध विदेशियों के निष्कासन हेतु 6 वर्षीय ऐतिहासिक असम आंदोलन।
1984 (3-6 जून)
ऑपरेशन ब्लू स्टार: अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से उग्रवादियों को बाहर निकालने हेतु सैन्य कार्रवाई।
1984 (31 अक्टूबर)
प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या; देशव्यापी सिख विरोधी दंगे।
1985 (जुलाई)
राजीव गांधी-लोंगोवाल समझौता (पंजाब समझौता); चंडीगढ़ और नदी जल विवाद पर सहमति।
1985 (15 अगस्त)
राजीव गांधी सरकार और आसू (AASU) के बीच असम समझौता (Assam Accord)।
1986
राजीव गांधी और लालडेंगा के बीच ऐतिहासिक मिजोरम शांति समझौता; लालडेंगा मुख्यमंत्री बने।
1987
मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा; जम्मू-कश्मीर के विवादास्पद विधानसभा चुनाव।
2019 (5 अगस्त)
जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम: अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी; J&K और लद्दाख दो अलग केंद्र शासित प्रदेश बने।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1 (अति लघु उत्तरीय - 1 अंक): "ऑपरेशन ब्लू स्टार" क्या था और यह किस वर्ष चलाया गया था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
ऑपरेशन ब्लू स्टार (Operation Blue Star) जून 1984 में अमृतसर स्थित सिखों के पवित्र धार्मिक स्थल स्वर्ण मंदिर (हरिमंदिर साहिब) परिसर से जरनैल सिंह भिंडरावाले के नेतृत्व वाले सशस्त्र उग्रवादियों को बाहर निकालने के लिए भारतीय सेना द्वारा चलाया गया एक सैन्य अभियान था। यह कार्रवाई 3 से 6 जून 1984 के मध्य तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के आदेश पर की गई थी।
उदाहरण 2
प्रश्न 2 (लघु उत्तरीय - 2 अंक): आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973) की दो प्रमुख मांगें क्या थीं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
1973 में अकाली दल द्वारा स्वीकृत आनंदपुर साहिब प्रस्ताव की दो प्रमुख मांगें निम्नलिखित थीं:
  1. राज्यों के लिए अधिकतम स्वायत्तता: केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र को केवल चार विषयों—रक्षा, विदेश नीति, संचार और मुद्रा—तक सीमित रखा जाए, और शेष सभी अवशिष्ट व वित्तीय शक्तियाँ राज्यों को सौंपी जाएं।
  2. सिख पहचान एवं धार्मिक हितों का संरक्षण: सिखों को एक विशिष्ट 'कौम' (धार्मिक-सांस्कृतिक समुदाय) के रूप में मान्यता दी जाए और उनके हितों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
उदाहरण 3
प्रश्न 3 (लघु उत्तरीय - 4 अंक): पूर्वोत्तर भारत की राजनीति में "बाहरी बनाम मूल निवासी" का मुद्दा क्या था? असम आंदोलन के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
पूर्वोत्तर भारत में 'बाहरी बनाम मूल निवासी' का मुद्दा स्थानीय जनजातीय व भाषाई समुदायों में यह भय था कि बाहर से आए लोग उनकी ज़मीन, रोजगार और राजनीतिक सत्ता पर कब्जा कर उन्हें अपने ही गृह-राज्य में अल्पसंख्यक बना देंगे:
  • समस्या का मूल: असम में चाय बागानों और उपजाऊ भूमि के कारण अंग्रेजों के समय से ही बंगाल और बिहार से लोग आकर बसे थे। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान लाखों शरणार्थी असम में आ बसे और वे वापस नहीं लौटे।
  • जनसांख्यिकीय संकट का भय: असमिया जनता को लगा कि उनकी विशिष्ट भाषा और संस्कृति खतरे में है तथा चुनावों में अवैध विदेशी अप्रवासी ही निर्णायक भूमिका निभाने लगे हैं।
  • आसू (AASU) का आंदोलन: 1979 में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने 6 वर्षीय व्यापक जनांदोलन छेड़ा। उनकी स्पष्ट मांग थी कि 1951 के बाद अवैध रूप से आए सभी विदेशियों की पहचान कर उन्हें राज्य से बाहर निकाला जाए।
  • समाधान (असम समझौता 1985): 15 अगस्त 1985 को केंद्र सरकार और छात्र नेताओं के बीच असम समझौता हुआ, जिसमें 25 मार्च 1971 को कट-ऑफ तिथि माना गया और इसके बाद आए अवैध अप्रवासियों के निष्कासन पर सहमति बनी।
उदाहरण 4
प्रश्न 4 (दीर्घ उत्तरीय - 6 अंक): जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय की ऐतिहासिक परिस्थितियों, अनुच्छेद 370 के विशेष प्रावधानों और 2019 के संवैधानिक पुनर्गठन का विस्तृत परीक्षण कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
(1) विलय की ऐतिहासिक परिस्थितियाँ:
  • स्वतंत्रता के समय जम्मू-कश्मीर के शासक महाराजा हरि सिंह थे। वे भारत या पाकिस्तान किसी में शामिल न होकर स्वतंत्र रहना चाहते थे।
  • अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान ने कबायली घुसपैठियों के भेष में कश्मीर पर सशस्त्र आक्रमण कर दिया। राजधानी श्रीनगर के पतन के खतरे को देखते हुए महाराजा ने भारत से सैन्य मदद माँगी।
  • भारत सरकार ने सहायता के पूर्व वैध विलय की शर्त रखी। 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने विलय पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर किए। भारतीय सेना ने तुरंत पहुंचकर घुसपैठियों को पीछे खदेड़ा और श्रीनगर की रक्षा की।
(2) अनुच्छेद 370 के तहत विशेष प्रावधान:
  • जम्मू-कश्मीर को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत असाधारण स्वायत्तता दी गई। राज्य का अपना अलग संविधान और अलग ध्वज था।
  • केंद्रीय संसद को केवल रक्षा, विदेश और संचार के मामलों में कानून बनाने की अनन्य शक्ति थी। अन्य केंद्रीय कानूनों को राज्य में लागू करने के लिए राज्य विधानसभा की सहमति अनिवार्य थी।
  • अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) और वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360) राज्य पर सीधे लागू नहीं होते थे। अनुच्छेद 35A के तहत राज्य के स्थायी निवासियों को ही संपत्ति खरीदने और सरकारी नौकरियों का विशेषाधिकार था।
(3) 5 अगस्त 2019 का ऐतिहासिक पुनर्गठन:
  • संसद ने 'जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019' पारित कर अनुच्छेद 370 के प्रभाव को समाप्त कर दिया और अनुच्छेद 35A को निरस्त कर दिया।
  • राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया: (क) जम्मू और कश्मीर (विधानसभा सहित) और (ख) लद्दाख (बिना विधानसभा)।
  • अब भारत का संपूर्ण संविधान, शिक्षा का अधिकार, आरक्षण नीतियाँ और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पूरी तरह से वहाँ लागू हैं, जिससे यह क्षेत्र शेष भारत की मुख्यधारा से पूर्णतः एकीकृत हो गया है।
उदाहरण 5
प्रश्न 5 (दीर्घ उत्तरीय - 6 अंक): क्षेत्रीय आकांक्षाओं और आंदोलनों से भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था ने कौन-से प्रमुख सबक सीखे हैं? सविस्तार विवेचना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर:
भारत जैसे बहु-सांस्कृतिक और विशाल देश में 1980 के दशक के क्षेत्रीय संकटों (पंजाब, असम, मिजोरम, कश्मीर) से भारतीय लोकतंत्र ने निम्नलिखित चार अत्यंत महत्वपूर्ण सबक सीखे हैं:
  1. क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतांत्रिक राजनीति का स्वाभाविक अंग हैं: भारत ने सीखा कि क्षेत्रीय पहचान, भाषाई गौरव और स्वायत्तता की मांगें कोई 'राष्ट्र-विरोधी' षड्यंत्र नहीं हैं। एक परिपक्व लोकतंत्र में विभिन्न क्षेत्रों का अपनी विशिष्ट पहचान और अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना पूर्णतः स्वाभाविक है। विविधता को बलपूर्वक दबाने के बजाय उसका लोकतांत्रिक प्रबंधन करना ही राष्ट्र निर्माण का सही मार्ग है।
  2. सैनिक बल के बजाय राजनीतिक समझौते और वार्ताएं ही स्थायी समाधान हैं: पंजाब में ऑपरेशन ब्लू स्टार या मिजोरम में वायुसेना के प्रयोग से असंतोष समाप्त नहीं हुआ, बल्कि बढ़ा। स्थायी शांति तभी आई जब केंद्र सरकार ने राजनीतिक वार्ताएं कीं। इसके जीवंत प्रमाण हैं:
    • 1985 का राजीव गांधी-लोंगोवाल समझौता।
    • 1985 का असम समझौता।
    • 1986 का मिजोरम शांति समझौता (जिसने 20 वर्षों के विद्रोही लालडेंगा को मुख्यधारा का मुख्यमंत्री बना दिया)।
  3. सत्ता में क्षेत्रीय शक्तियों की साझेदारी और सत्ता का विकेंद्रीकरण अनिवार्य है: जब तक केंद्र सरकार राज्यों पर हावी रही और क्षेत्रीय नेताओं की उपेक्षा की गई, तब तक असंतोष भड़का। 1989 के बाद जब केंद्र में गठबंधन सरकारों का दौर आया, तो क्षेत्रीय दलों (द्रमुक, अन्नाद्रमुक, अकाली दल, असम गण परिषद, तृणमूल कांग्रेस आदि) को राष्ट्रीय सत्ता में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी मिली। इससे क्षेत्रीय दलों में 'राष्ट्रीय स्वामित्व' की भावना पैदा हुई और अलगाववाद की धार कुंद हो गई।
  4. आर्थिक असंतुलन और संसाधनों के असमान वितरण को दूर करना आवश्यक: अधिकांश क्षेत्रीय आंदोलनों की जड़ में आर्थिक उपेक्षा का भाव होता है। असम का तेल और प्राकृतिक गैस, झारखंड के खनिज, या पूर्वोत्तर के वनों का लाभ यदि स्थानीय जनता को नहीं मिलेगा, तो असंतोष पनपेगा। अतः संविधान की 6वीं अनुसूची, नीति आयोग और विशेष आर्थिक पैकेजों के माध्यम से क्षेत्रीय असंतुलन को समाप्त करना राष्ट्रीय एकता के लिए अपरिहार्य है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

छात्र अक्सर सोचते हैं कि अनुच्छेद 370 के तहत केवल जम्मू-कश्मीर को ही विशेष दर्जा प्राप्त था और अन्य किसी राज्य को नहीं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह गलत है। यद्यपि अनुच्छेद 370 केवल जम्मू-कश्मीर के लिए था, किंतु संविधान के अनुच्छेद 371 (A से J तक) के तहत नगालैंड, असम, मणिपुर, आंध्र प्रदेश, सिक्किम, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, गोवा और कर्नाटक जैसे कई राज्यों को उनकी जनजातीय संस्कृति व पिछड़े क्षेत्रों के संरक्षण के लिए विशेष संवैधानिक अधिकार दिए गए हैं (असममित संघवाद)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मान लेना कि आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973) केवल एक अलग देश "खालिस्तान" की मांग का दस्तावेज था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

आनंदपुर साहिब प्रस्ताव मूल रूप से अकाली दल द्वारा भारतीय संघ के भीतर ही राज्यों के लिए अधिकतम स्वायत्तता और संघीय शक्तियों के विकेंद्रीकरण की मांग थी। यद्यपि कुछ चरमपंथी तत्वों ने इसे अलग खालिस्तान के रूप में प्रचारित किया, लेकिन आधिकारिक प्रस्ताव भारत संघ के भीतर स्वायत्तता का था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

असम आंदोलन (1979-85) को केवल धार्मिक या सांप्रदायिक आंदोलन समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

असम आंदोलन धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक, भाषाई और जनसांख्यिकीय अस्मिता का आंदोलन था। छात्र संगठन (AASU) की मुख्य चिंता यह थी कि बाहर से (विशेषकर बांग्लादेश से) आने वाले अवैध अप्रवासी स्थानीय असमिया लोगों को उनके ही गृह-राज्य में भाषाई व सांस्कृतिक रूप से अल्पसंख्यक न बना दें।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह भ्रम होना कि ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद पंजाब में तुरंत शांति स्थापित हो गई थी।

सही वैज्ञानिक तथ्य

ऑपरेशन ब्लू स्टार (जून 1984) के तुरंत बाद शांति नहीं लौटी, बल्कि हिंसा और बढ़ गई—अक्टूबर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या हुई, सिख विरोधी दंगे हुए और 1985 के राजीव-लोंगोवाल समझौते के बाद भी उग्रवाद जारी रहा। वास्तविक शांति 1990 के दशक के मध्य में जाकर स्थापित हो सकी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

मिजोरम और नगालैंड दोनों के अलगाववादी आंदोलनों को असफल मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मिजोरम समझौता (1986) विश्व के सबसे सफल शांति समझौतों में से एक माना जाता है, जहाँ 20 साल के भीषण सशस्त्र विद्रोह के बाद लालडेंगा ने हिंसा त्यागकर भारतीय संविधान की शपथ ली और लोकतांत्रिक चुनाव जीते। मिजोरम आज भारत के सर्वाधिक शांतिपूर्ण राज्यों में गिना जाता है।

क्षेत्रीय आकांक्षाओं का प्रबंधन: भारतीय लोकतंत्र के तीन स्तंभ

🏛️ भारतीय संघवाद और क्षेत्रीय आकांक्षाओं का समाधान मॉडल

1. संवैधानिक लचीलापन

• अनुच्छेद 371 के तहत विशेष प्रावधान
• 6वीं अनुसूची (स्वायत्त जिला परिषदें)
• त्रि-भाषाई सूत्र व भाषाई राज्य पुनर्गठन

2. लोकतांत्रिक समझौते

• पंजाब समझौता (1985)
• असम समझौता (1985)
• मिजोरम शांति समझौता (1986)
• विद्रोहियों को मुख्यधारा में शामिल करना

3. गठबंधन और सहभागिता

• 1989 के बाद केंद्र में क्षेत्रीय दलों की भागीदारी
• राष्ट्रीय नीतियों में क्षेत्रीय प्राथमिकताओं का सम्मान
• संघवाद का व्यवहारिक सुदृढ़ीकरण

💡 मूल मंत्र: राष्ट्रीय एकता का अर्थ विविधताओं को मिटाना नहीं, बल्कि उनका लोकतांत्रिक सम्मान व सह-अस्तित्व है।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. भारत ने राष्ट्र निर्माण के यूरोपीय आत्मसातवादी मॉडल के विपरीत विविधता के लोकतांत्रिक सम्मान और बहुलतावादी मॉडल को अपनाया।
मुख्य बिंदु 2
  1. 1980 के दशक को भारत में क्षेत्रीय आकांक्षाओं और स्वायत्तता आंदोलनों का सबसे उथल-पुथल भरा दशक माना जाता है।
मुख्य बिंदु 3
  1. जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए; अनुच्छेद 370 ने राज्य को विशेष स्वायत्त दर्जा प्रदान किया।
मुख्य बिंदु 4
  1. 5 अगस्त 2019 को संसद द्वारा अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी कर जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख को दो केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठित किया गया।
मुख्य बिंदु 5
  1. 1966 में भाषाई आधार पर तत्कालीन पंजाब का विभाजन कर पंजाब और हरियाणा दो नए राज्य तथा चंडीगढ़ साझा राजधानी बना।
मुख्य बिंदु 6
  1. अकाली दल के 1973 के आनंदपुर साहिब प्रस्ताव ने राज्यों के लिए अधिक स्वायत्तता और संघीय शक्तियों के विकेंद्रीकरण की मांग की।
मुख्य बिंदु 7
  1. जून 1984 में स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया गया, जिसके प्रतिशोध में 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई और दिल्ली में सिख विरोधी दंगे भड़के।
मुख्य बिंदु 8
  1. पूर्वोत्तर में तीन प्रमुख मुद्दे रहे: स्वायत्तता की मांग (असम का पुनर्गठन), अलगाववादी आंदोलन (मिजोरम व नगालैंड), और बाहरी लोगों का विरोध (असम आंदोलन)।
मुख्य बिंदु 9
  1. 1985 का असम समझौता और 1986 का मिजोरम शांति समझौता लोकतांत्रिक वार्ताओं के माध्यम से उग्रवाद समाप्त करने के स्वर्णिम उदाहरण हैं।
मुख्य बिंदु 10
  1. क्षेत्रीय आकांक्षाओं से भारत ने सीखा कि क्षेत्रीयता लोकतंत्र का स्वाभाविक अंग है और इसका समाधान सैन्य बल से नहीं बल्कि राजनीतिक समझौते, सत्ता की साझेदारी और आर्थिक संतुलन से संभव है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
1. 1986 में मिजोरम शांति समझौता किन दो प्रमुख पक्षों/नेताओं के मध्य हस्ताक्षरित हुआ था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: भारत सरकार (तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व में) और मिजो नेशनल फ्रंट (MNF के नेता लालडेंगा) के मध्य।
2
2. ऑपरेशन ब्लू स्टार कब और कहाँ संचालित किया गया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 3 से 6 जून 1984 के मध्य अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर (हरिमंदिर साहिब) परिसर में।
3
3. असम छात्र संघ (AASU) द्वारा चलाए गए 6 वर्षीय आंदोलन (1979-85) की मुख्य मांग क्या थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 1951 के बाद असम में अवैध रूप से आए सभी विदेशी घुसपैठियों (विशेषकर बांग्लादेशी शरणार्थियों) की पहचान कर उन्हें मतदाता सूची से हटाना और राज्य से बाहर निकालना।
4
4. तमिलनाडु में गैर-हिंदी भाषियों द्वारा 1965 में किस नीति के विरुद्ध विशाल आंदोलन हुआ था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: संविधान के अनुसार 26 जनवरी 1965 से केवल हिंदी को एकमात्र आधिकारिक संघ-भाषा (राजभाषा) बनाने के निर्णय के विरुद्ध।
5
5. जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम किस वर्ष लागू हुआ और इसके तहत राज्य को किन दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटा गया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: वर्ष 2019 (5 अगस्त/31 अक्टूबर) में लागू हुआ; इसके तहत (1) जम्मू और कश्मीर (विधानसभा सहित) तथा (2) लद्दाख (बिना विधानसभा) दो UT बनाए गए।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
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