(क) राष्ट्र निर्माण के दो परस्पर विरोधी दृष्टिकोण
विश्व में राष्ट्र निर्माण और राष्ट्रीय एकता को साधने के ऐतिहासिक रूप से दो भिन्न मॉडल रहे हैं:
- यूरोपीय/पश्चिमी आत्मसातवादी मॉडल (Assimilationist Model): यूरोप के अधिकांश देशों में राष्ट्र-राज्य का निर्माण एकल भाषा, एकल धर्म और एकल संस्कृति के आधार पर हुआ। वहाँ सांस्कृतिक विविधता को राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा माना गया और अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक संस्कृति में विलीन होने पर बाध्य किया गया।
- भारतीय लोकतांत्रिक मॉडल (Democratic Pluralist Model): भारत ने विविधता को राष्ट्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति और पहचान माना। भारतीय दृष्टिकोण यह है कि 'एक व्यक्ति एक ही समय में एक गर्वित बंगाली, तमिल, पंजाबी या कश्मीरी भी हो सकता है और साथ ही एक निष्ठावान भारतीय नागरिक भी।' भारत में राष्ट्रीयता क्षेत्रीय पहचानों का दमन करके नहीं, बल्कि उनके समन्वय से निर्मित होती है।
| तुलना का बिंदु | यूरोपीय मॉडल (पश्चिमी दृष्टिकोण) | भारतीय लोकतांत्रिक मॉडल (विविधता का सम्मान) |
|---|---|---|
| विविधता के प्रति दृष्टिकोण | विविधता को राष्ट्रीय एकता में बाधक व विभाजनकारी माना गया। | विविधता को प्राकृतिक व लोकतंत्र की जीवनरेखा माना गया। |
| समाधान का मार्ग | सांस्कृतिक समरूपता (एक भाषा, एक धर्म, एक राष्ट्रीय संस्कृति)। | संवैधानिक स्वायत्तता, भाषाई पुनर्गठन और बहुलतावाद। |
| संघीय व्यवस्था | अधिकांशतः एकात्मक या कठोर रूप से सममित (Symmetric)। | लचीला एवं असममित संघवाद (अनुच्छेद 370, 371, 5वीं व 6वीं अनुसूची)। |
(ख) क्षेत्रीय आकांक्षाओं के तीन प्रमुख कारक
- स्वायत्तता की माँग (Demand for Autonomy): राज्यों का मानना कि केंद्र सरकार अत्यधिक शक्तियाँ अपने पास रखती है और अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का दुरुपयोग करके चुनी हुई राज्य सरकारों को गिराती है। अतः राज्यों को अधिक वित्तीय व विधायी अधिकार मिलने चाहिए।
- आर्थिक असंतुलन और संसाधनों पर नियंत्रण (Economic Disparity): प्राकृतिक संसाधनों (जैसे खनिज, वन, नदी जल) से संपन्न राज्यों (उदा. असम, झारखंड) में यह असंतोष पनपा कि उनके संसाधनों का दोहन केंद्र करता है, किंतु स्थानीय जनता को विकास का यथोचित लाभ नहीं मिलता।
- सांस्कृतिक व भाषाई अस्मिता (Cultural & Linguistic Identity): गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी को थोपने का विरोध और अपनी मातृभाषा, लिपि व विशिष्ट जनजातीय संस्कृति के संरक्षण की प्रबल चाह।