(क) संवैधानिक आधार एवं नेहरू की विदेश नीति के तीन बड़े उद्देश्य
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 (राज्य के नीति-निर्देशक तत्व) में यह स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि राज्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि, राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत व सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखने तथा अंतरराष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता से निपटाने का प्रयास करेगा।
प्रथम प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय विदेश नीति के तीन मूलभूत उद्देश्य निर्धारित किए:
- कठिन संघर्ष से प्राप्त संप्रभुता को बचाए रखना।
- क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करना।
- तेज रफ्तार से आर्थिक विकास सुनिश्चित करना।
नेहरू ने इन तीनों उद्देश्यों को साधने के लिए 'गुटनिरपेक्षता' (Non-Alignment) का मार्ग चुना, ताकि भारत बिना किसी महाशक्ति का पिछलग्गू बने अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार स्वतंत्र निर्णय ले सके।
(ख) पंचशील के पाँच ऐतिहासिक सिद्धांत (29 अप्रैल 1954)
29 अप्रैल 1954 को भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और चीनी प्रधानमंत्री चाउ एन-लाई के बीच तिब्बत क्षेत्र में भारत और चीन के व्यापार व संबंधों को लेकर एक ऐतिहासिक समझौता हुआ। इसकी प्रस्तावना में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांत (पंचशील) तय किए गए:
- एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का परस्पर सम्मान करना।
- एक-दूसरे पर परस्पर अनाक्रमण (Non-aggression)।
- एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में परस्पर अहस्तक्षेप (Non-interference)।
- समानता और परस्पर लाभकारी सहयोग।
- शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व (Peaceful Coexistence)।
(ग) एफ्रो-एशियाई एकता और बांडुंग सम्मेलन (1955)
नेहरू के नेतृत्व में भारत ने नव-स्वतंत्र एशियाई और अफ्रीकी देशों को संगठित करने में अग्रणी भूमिका निभाई। मार्च 1947 में नई दिल्ली में 'एशियाई संबंध सम्मेलन' हुआ। 1955 में इंडोनेशिया के बांडुंग शहर में ऐतिहासिक 'बांडुंग सम्मेलन' हुआ, जिसने 1961 में बेलग्रेड में गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) की स्थापना की सीधी आधारशिला रखी।