ज्ञानमीमांसा और तर्कशास्त्र में "आगमन" का सामान्य अर्थ विशिष्ट उदाहरणों से सामान्य नियम बनाना होता है, परंतु गणित में "गणितीय आगमन" वास्तव में एक पूर्णतः निगमनात्मक और अकाट्य प्रमाण विधि है।
- अनुभवजन्य (वैज्ञानिक) आगमन: सीमित संख्या में विशिष्ट घटनाओं का अवलोकन करके एक सामान्य नियम की कल्पना करना। उदाहरण के लिए: 1,000 श्वेत हंस देखकर यह निष्कर्ष निकालना कि "सभी हंस श्वेत होते हैं।" यह तर्क गणित में अमान्य है, क्योंकि केवल एक काला हंस मिलने पर ही पूरा नियम खंडित हो जाता है।
- निगमनात्मक तर्क (Deductive Reasoning): स्वीकृत स्वयंसिद्धियों (Axioms) और तार्किक नियमों के आधार पर निश्चित निष्कर्ष तक पहुँचना। गणितीय आगमन पूरी तरह निगमनात्मक है, जो अनंत प्राकृतिक संख्याओं के लिए एक साथ पूर्ण सत्यता की गारंटी देता है।
प्राकृतिक संख्याओं $n \in \mathbb{N} = \{1, 2, 3, 4, \dots\}$ पर निर्भर गणितीय प्रस्तावना को $P(n)$ से निरूपित किया जाता है।
उदाहरण: मान लीजिए $P(n)$ कथन है: $1 + 2 + 3 + \dots + n = \frac{n(n + 1)}{2}$।
- $n = 1$ के लिए: $P(1)$ होगा $1 = \frac{1(1 + 1)}{2} = 1$ (सत्य)।
- $n = 2$ के लिए: $P(2)$ होगा $1 + 2 = \frac{2(2 + 1)}{2} = 3$ (सत्य)।
- $P(1), P(2), \dots, P(100)$ का सत्य होना यह सिद्ध नहीं करता कि कथन सभी $n$ के लिए सत्य है, क्योंकि यह $n = 101$ पर असफल हो सकता है। केवल गणितीय आगमन का सिद्धांत ही सार्वभौमिक उपपत्ति प्रदान करता है।
गणितीय आगमन का सिद्धांत तार्किक रूप से सु-क्रम सिद्धांत के समतुल्य है: यदि कोई कथन $P(n)$ कुछ प्राकृतिक संख्याओं के लिए असत्य हो, तो उन असत्य मानों के समुच्चय में एक न्यूनतम संख्या अवश्य होगी, जिससे आगमन चरण का विरोधभास उत्पन्न हो जाता है।