वास्तविक संख्या निकाय $\mathbb{R}$ में किसी भी वास्तविक संख्या का वर्ग कभी ऋणात्मक नहीं हो सकता ($x^2 \ge 0$)। इस कारण $x^2 + 1 = 0 \implies x^2 = -1$ जैसे समीकरणों का वास्तविक संख्याओं में कोई हल नहीं होता। इस सीमा को दूर करने के लिए स्विस गणितज्ञ लियोनार्ड ऑयलर ने ऋणात्मक संख्या के वर्गमूल को दर्शाने हेतु काल्पनिक इकाई $\mathbf{i}$ (iota) का प्रतिपादन किया।
काल्पनिक इकाई की मूलभूत परिभाषा:
$i$ की धनात्मक पूर्णांक घातें एक निश्चित 4-चरणीय चक्रीय क्रम का पालन करती हैं:
- $i^1 = i$
- $i^2 = -1$
- $i^3 = i^2 \cdot i = (-1) \cdot i = -i$
- $i^4 = (i^2)^2 = (-1)^2 = 1$
किसी भी पूर्णांक $n \in \mathbb{Z}$ को $4$ से भाग देने पर यूक्लिड विभाजन प्रमेयिका के अनुसार $n = 4k + r$ लिखा जा सकता है, जहाँ शेषफल $r \in \{0, 1, 2, 3\}$ है। अतः:
ऋणात्मक घातों के लिए भी यही नियम लागू होता है: $i^{-1} = \frac{1}{i} = \frac{i}{i^2} = -i$, $i^{-2} = -1$, $i^{-3} = i$, $i^{-4} = 1$।
वह संख्या जिसे निम्नलिखित रूप में लिखा जा सके:
उसे एक सम्मिश्र संख्या (Complex Number) कहा जाता है। समस्त सम्मिश्र संख्याओं के समुच्चय को $\mathbb{C}$ द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
- $\mathbf{a = \text{Re}(z)}$ को सम्मिश्र संख्या का वास्तविक भाग (Real Part) कहते हैं।
- $\mathbf{b = \text{Im}(z)}$ को सम्मिश्र संख्या का काल्पनिक भाग (Imaginary Part) कहते हैं (ध्यान दें: $\text{Im}(z)$ वास्तविक गुणांक $b$ है, $ib$ नहीं)।
- यदि $b = 0$ हो, तो $z = a$ एक शुद्ध वास्तविक संख्या (Purely Real) कहलाती है ($\mathbb{R} \subset \mathbb{C}$)।
- यदि $a = 0$ तथा $b \neq 0$ हो, तो $z = ib$ एक शुद्ध काल्पनिक संख्या (Purely Imaginary) कहलाती है।
- संख्या $0 = 0 + 0i$ एक साथ शुद्ध वास्तविक और शुद्ध काल्पनिक दोनों है।
दो सम्मिश्र संख्याएँ $z_1 = a_1 + ib_1$ तथा $z_2 = a_2 + ib_2$ परस्पर समान ($z_1 = z_2$) तभी होती हैं जब उनके वास्तविक भाग और काल्पनिक भाग पृथक-पृथक समान हों:
क्रम असमिका टिप्पणी: सम्मिश्र संख्याओं में कोई क्रम संबंध ($>$ अथवा $<$) परिभाषित नहीं होता। $z_1 > z_2$ या $z_1 < z_2$ जैसे कथन सर्वथा अर्थहीन हैं, जब तक कि दोनों संख्याएँ शुद्ध वास्तविक न हों।