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CBSE • कक्षा X • Social Science • अध्याय 9
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

कृषि

भारत एक कृषि-प्रधान देश है जहाँ की दो-तिहाई जनसंख्या प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कृषि कार्यों में संलग्न है। कृषि न केवल देश की विशाल आबादी के लिए खाद्यान्न उत्पन्न करती है बल्कि वस्त्र, चीनी, जूट और खाद्य प्रसंस्करण जैसे अनेक उद्योगों के लिए कच्चा माल भी उपलब्ध कराती है। इसके अतिरिक्त चाय, कॉफी और मसालों जैसी कृषि वस्तुओं का निर्यात करके देश विदेशी मुद्रा अर्जित करता है। भौतिक पर्यावरण, प्रौद्योगिकी और सामाजिक-सांस्कृतिक रीति-रिवाजों के आधार पर भारत में कृषि पद्धतियाँ प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि (झूम या कर्तन-दहन प्रणाली), गहन जीविका कृषि और वाणिज्यिक कृषि (विशेष रूप से रोपण कृषि) में विकसित हुई हैं। भारत की जलवायु विविधता ने तीन स्पष्ट शस्य ऋतुओं—रबी, खरीफ और जायद—को जन्म दिया है। देश में चावल और गेहूं जैसी प्रमुख खाद्यान्न फसलें, पोषक मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, रागी), दलहन, गन्ना, तिलहन, चाय, कॉफी, तथा बागवानी एवं रेशेदार फसलें (कपास और 'सुनहरा रेशा' जूट) बड़े पैमाने पर उगाई जाती हैं। स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार, चकबंदी और जमींदारी उन्मूलन जैसे संस्थागत सुधार किए गए। 1960 और 70 के दशक में हरित क्रांति (Green Revolution) और श्वेत क्रांति (ऑपरेशन फ्लड) ने तकनीकी बदलाव की नींव रखी, जबकि 1980 के बाद किसान क्रेडिट कार्ड (KCC), न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), और फसल बीमा योजनाओं ने किसानों को वित्तीय सुरक्षा दी। इस अध्याय में हम विनोबा भावे के 'भूदान-ग्रामदान' आंदोलन (रक्तहीन क्रांति), खाद्य सुरक्षा की चुनौतियों और वैश्वीकरण के भारतीय कृषि पर प्रभावों का गहन, विश्लेषणात्मक और संपूर्ण बोर्ड-स्तरीय अध्ययन करेंगे।

जब बिना एक भी गोली चले, हजारों एकड़ जमीन गरीबों में बंट गई!

18 अप्रैल 1951 को आंध्र प्रदेश (अब तेलंगाना) के पोचमपल्ली गांव में महात्मा गांधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी विनोबा भावे पहुंचे। वहाँ 80 भूमिहीन हरिजनों ने अपने गुजारे के लिए 80 एकड़ जमीन मांगी। विनोबा जी अभी सोच ही रहे थे कि सभा में बैठे एक जमींदार श्री रामचंद्र रेड्डी उठे और उन्होंने स्वेच्छा से अपनी 80 एकड़ जमीन दान करने की घोषणा कर दी! यहीं से जन्म हुआ इतिहास के सबसे अनोखे 'भूदान-ग्रामदान' आंदोलन का, जिसे इतिहासकारों ने 'रक्तहीन क्रांति' (Bloodless Revolution) कहा। आइए जानें कि खेतों में पसीना बहाने वाले भारतीय अन्नदाता की पूरी कहानी क्या है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

CBSE एवं CBSE 10वीं बोर्ड परीक्षा में 'कृषि' भूगोल का सर्वाधिक प्रश्न-प्रदाता और उच्च अंक-भार वाला अध्याय है। प्रारंभिक जीविका निर्वाह (झूम) कृषि के विभिन्न राज्यों में स्थानीय नाम, रबी व खरीफ फसलों की तुलना, चावल एवं गेहूं की भौगोलिक दशाएं (तापमान, वर्षा, मिट्टी, शीर्ष उत्पादक राज्य), रोपण कृषि की विशेषताएं, कृषि में किए गए संस्थागत व तकनीकी सुधार (KCC, MSP, फसल बीमा), तथा विनोबा भावे के 'भूदान-ग्रामदान' पर 3 से 5 अंकों के प्रश्न प्रतिवर्ष अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं। मानचित्र कार्य (Map Work) में चावल, गेहूं, चाय, कॉफी, गन्ना, कपास और जूट के सबसे बड़े उत्पादक राज्यों को चिह्नित करने वाले प्रश्न 100% आते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • भारत की मानसूनी जलवायु (ग्रीष्मकालीन दक्षिण-पश्चिम मानसून और शीतकालीन पश्चिमी विक्षोभ) की समझ।
  • जलोढ़, काली, लाल और लैटेराइट मृदाओं की मूल विशेषताओं से परिचय।
  • खाद्यान्न (Food Crops) और नकदी/व्यापारिक फसलों (Cash Crops) का सामान्य अंतर।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • प्रारंभिक जीविका निर्वाह (झूम), गहन जीविका और वाणिज्यिक/रोपण कृषि की विशेषताओं और कार्यपद्धति में अंतर स्पष्ट करना।
  • रबी, खरीफ और जायद शस्य प्रारूपों के बुवाई-कटाई के समय, मुख्य फसलों और जलवायु परिस्थितियों का विश्लेषण करना।
  • भारत की मुख्य फसलों (चावल, गेहूं, मोटे अनाज, दालें, गन्ना, चाय, कॉफी, कपास, जूट) की भौगोलिक आवश्यकताओं और राज्यवार वितरण की व्याख्या करना।
  • स्वतंत्रता के पश्चात कृषि के विकास हेतु लागू किए गए संस्थागत (जमींदारी उन्मूलन, चकबंदी) और तकनीकी (हरित क्रांति, KCC, MSP) सुधारों का मूल्यांकन करना।
  • विनोबा भावे द्वारा संचालित 'भूदान-ग्रामदान आंदोलन' (रक्तहीन क्रांति) और भारतीय कृषि पर वैश्वीकरण के प्रभावों का समालोचनात्मक परीक्षण करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. कृषि के प्रकार: प्रारंभिक जीविका...
2 2. भारत का शस्य प्रारूप (Cropping S...
3 3. भारत की प्रमुख फसलें: खाद्यान्न,...
4 4. अखाद्य, नकदी एवं रेशेदार फसलें:...
5 5. संस्थागत व तकनीकी सुधार एवं भूदा...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. कृषि के प्रकार: प्रारंभिक जीविका, गहन जीविका एवं वाणिज्यिक कृषि

1.1 प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि (झूम अथवा कर्तन-दहन प्रणाली)

यह कृषि भूमि के छोटे टुकड़ों पर आदिम औजारों (जैसे लकड़ी के हल, डाओ और खुदाई करने वाली छड़ी) तथा पारिवारिक या सामुदायिक श्रम की सहायता से की जाती है:

  • कर्तन एवं दहन प्रणाली (Slash and Burn): किसान जंगल के एक छोटे हिस्से की वनस्पति को काटकर साफ करते हैं और फिर उसे जला देते हैं। राख को मिट्टी में मिला दिया जाता है और उस पर फसलें उगाई जाती हैं। जब मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है, तो किसान उस जमीन को छोड़ देते हैं और किसी दूसरे नए भूखंड को साफ करते हैं।
  • विशेषताएं: यह पूरी तरह मानसून, मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता और पर्यावरण पर निर्भर होती है। इसमें रासायनिक खादों या आधुनिक उपकरणों का प्रयोग नहीं होता; अतः उत्पादकता बहुत कम होती है।

झूम कृषि के विभिन्न स्थानीय व वैश्विक नाम (बोर्ड परीक्षा हेतु अति-महत्वपूर्ण):

क्षेत्र / राज्य / देशस्थानीय नाम
पूर्वोत्तर राज्य (असम, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड)झूम (Jhumming)
मध्य प्रदेशबेवर (Bewar) या दहिया (Dahiya)
आंध्र प्रदेशपोडू (Podu) या पेंडा (Penda)
ओडिशापामा डाबी (Pama Dabi), कोमान या बरिंगा
पश्चिमी घाटकुमारी (Kumari)
दक्षिण-पूर्वी राजस्थानवालरे (Valre) या वाल्टरे
हिमालयी क्षेत्रखिल (Khil)
झारखंडकुरुवा (Kuruwa)
बस्तर (छत्तीसगढ़) व अंडमान-निकोबारदीपा (Dipa)
मैक्सिको व मध्य अमेरिका (विश्व)मिल्पा (Milpa)
ब्राजील (दक्षिण अमेरिका)रोका (Roca)
मलेशिया व इंडोनेशिया (एशिया)लादांग (Ladang)

1.2 गहन जीविका कृषि (Intensive Subsistence Farming)

  • यह कृषि उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ भूमि पर जनसंख्या का दबाव अत्यधिक होता है।
  • यह श्रम-सघन (Labour intensive) कृषि है जहाँ सीमित भूमि से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने के लिए जैव-रासायनिक उर्वरकों और अत्यधिक सिंचाई का उपयोग किया जाता है।
  • भू-जोत का छोटा आकार: 'पीढ़ी-दर-पीढ़ी उत्तराधिकार के अधिकार' (Right of inheritance) के कारण खेतों का आकार निरंतर छोटा और अलाभकारी होता जा रहा है। किसान सीमित भूमि से ही पूरी जीविका चलाने के लिए बाध्य हैं।

1.3 वाणिज्यिक कृषि एवं रोपण कृषि (Commercial & Plantation Agriculture)

इस कृषि का मुख्य उद्देश्य फसल को बाजार में बेचकर भारी लाभ कमाना होता है। इसमें आधुनिक तकनीकों, अधिक उपज देने वाले प्रमाणित बीजों (HYV), रासायनिक खादों और कीटनाशकों का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जाता है।

रोपण कृषि (Plantation Agriculture) की मुख्य विशेषताएं:
1. यह एक प्रकार की वाणिज्यिक कृषि है जिसमें एक बहुत बड़े विस्तृत भूखंड पर केवल एक ही फसल (एकल फसल) उगाई जाती है।
2. यह उद्योग और कृषि के बीच का 'अंतरापृष्ठ' (Interface) है; यानी यहाँ पैदा होने वाली फसल उद्योगों के लिए कच्चा माल बनती है।
3. इसमें भारी मात्रा में पूंजी (Capital intensive) और प्रवासी श्रमिकों (Migrant labourers) की आवश्यकता होती है।
4. प्रमुख उदाहरण: चाय (असम व उत्तरी बंगाल), कॉफी (कर्नाटक की नीलगिरि पहाड़ियाँ), रबड़ (केरल), गन्ना, और केला (तमिलनाडु)।

2. भारत का शस्य प्रारूप (Cropping Seasons: रबी, खरीफ और जायद)

2.1 भारत की तीन शस्य ऋतुएं

भारत में भौतिक विविधता और जलवायु चक्र के अनुसार तीन मुख्य फसल ऋतुएं पाई जाती हैं:

शस्य ऋतुबुवाई का समयकटाई का समयप्रमुख फसलेंअनुकूल जलवायु एवं प्रमुख राज्य
रबी (Rabi)शीत ऋतु में (अक्टूबर से दिसंबर)ग्रीष्म ऋतु में (अप्रैल से जून)गेहूं, जौ, मटर, चना, सरसोंशीतकाल में पश्चिमी विक्षोभ (Western Temperate Cyclones) से होने वाली वर्षा इन फसलों के लिए अत्यंत लाभकारी होती है। पंजाब, हरियाणा, हि.प्र., जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और पश्चिमी उ.प्र.।
खरीफ (Kharif)मानसून के आगमन पर (जून से जुलाई)मानसून के अंत में (सितंबर से अक्टूबर)धान (चावल), मक्का, ज्वार, बाजरा, अरहर (तूर), मूंग, उड़द, कपास, जूट, मूंगफली, सोयाबीनदक्षिण-पश्चिम मानसून की भारी वर्षा और उच्च तापमान। असम, प. बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र। (असम, प. बंगाल व ओडिशा में धान की 3 फसलें: औस, अमन और बोरो उगाई जाती हैं)।
जायद (Zaid)रबी और खरीफ के मध्य ग्रीष्म ऋतु में (मार्च से मई)मई से जूनतरबूज, खरबूजा, खीरा, सब्जियां और चारे की फसलेंशुष्क व गर्म मौसम; सिंचाई के सहारे नदियों के कछारों में उगाई जाती हैं। (गन्ने की फसल को तैयार होने में लगभग एक वर्ष लगता है)।

3. भारत की प्रमुख फसलें: खाद्यान्न, मोटे अनाज एवं दालें

3.1 प्रमुख खाद्यान्न फसलें: चावल एवं गेहूं

तुलना का आधारचावल (Rice / धान) - खरीफ फसलगेहूं (Wheat) - रबी फसल
महत्वभारत के अधिकांश लोगों का मुख्य खाद्यान्न। भारत चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।भारत की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसल जो उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भागों का मुख्य भोजन है।
तापमानउच्च तापमान (25°C से अधिक) और उच्च आर्द्रता (नमी)।उगते समय ठंडी जलवायु और पकते समय खिली व तेज धूप की आवश्यकता।
वार्षिक वर्षा100 सेमी से अधिक वर्षा (कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सिंचाई आवश्यक)।समान रूप से वितरित 50 से 75 सेमी वार्षिक वर्षा।
उपयुक्त मृदाचिकनी दोमट और जलोढ़ मृदा (जो पानी को रोक सके)।दोमट जलोढ़ मृदा तथा दक्कन की काली मिट्टी।
शीर्ष उत्पादक राज्यपश्चिम बंगाल (प्रथम), उत्तर प्रदेश, पंजाब, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, बिहार।उत्तर प्रदेश (प्रथम), पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार।

3.2 मोटे अनाज (Millets / पोषक अनाज)

ज्वार, बाजरा और रागी भारत में उगाए जाने वाले तीन प्रमुख मोटे अनाज हैं। इनमें पोषक तत्वों (आयरन, कैल्शियम, फाइबर) की प्रचुरता होती है:

  • ज्वार (Jowar): क्षेत्रफल और उत्पादन की दृष्टि से चावल और गेहूं के बाद देश की तीसरी सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसल है। यह मुख्यतः वर्षा-पोषित फसल है जिसे सिंचाई की बहुत कम आवश्यकता होती है। महाराष्ट्र ज्वार का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है, इसके बाद कर्नाटक, आ.प्र. और म.प्र. हैं।
  • बाजरा (Bajra): यह बलुई (रेतीली) मिट्टी और उथली काली मिट्टी पर अच्छी तरह उगाया जाता है। राजस्थान देश का सबसे बड़ा बाजरा उत्पादक राज्य है, इसके बाद उत्तर प्रदेश, गुजरात और हरियाणा हैं।
  • रागी (Ragi): यह शुष्क प्रदेशों की फसल है जो लाल, काली, बलुई और दोमट मिट्टी पर अच्छी तरह उगती है। इसमें प्रचुर मात्रा में आयरन, कैल्शियम और रफेज होता है। कर्नाटक रागी का सबसे बड़ा उत्पादक है, इसके बाद तमिलनाडु है।
  • मक्का (Maize): यह खाद्यान्न और चारा दोनों रूपों में प्रयुक्त होती है। यह खरीफ फसल है जिसके लिए 21°C से 27°C तापमान और पुरानी जलोढ़ मिट्टी अनुकूल होती है (बिहार में मक्का रबी ऋतु में भी उगाई जाती है)। कर्नाटक, म.प्र., यू.पी. अग्रणी हैं।

3.3 दालें (Pulses)

भारत विश्व में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक तथा सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है:

  • शाकाहारी भोजन में दालें प्रोटीन का सबसे प्रमुख स्रोत हैं। मुख्य दालें: तुअर (अरहर), उड़द, मूंग, मसूर, मटर और चना हैं।
  • फलीदार फसलें (Leguminous Crops): अरहर को छोड़कर अन्य सभी दालें हवा से नाइट्रोजन लेकर भूमि में स्थिर (Fix) करती हैं, जिससे मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता पुनः बहाल हो जाती है। इसलिए इन्हें प्रायः अन्य फसलों के साथ आवर्तन (Crop rotation) में बोया जाता है।
  • प्रमुख उत्पादक राज्य: मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक।

4. अखाद्य, नकदी एवं रेशेदार फसलें: गन्ना, चाय, कॉफी, कपास एवं जूट

4.1 गन्ना, तिलहन, चाय एवं कॉफी

फसल का नामभौगोलिक एवं जलवायु आवश्यकताएंविशेषताएं एवं शीर्ष उत्पादक राज्य
गन्ना (Sugarcane)उष्ण और उपोष्ण कटिबंधीय फसल; 21°C से 27°C तापमान और 75 से 100 सेमी वार्षिक वर्षा; गर्म व आर्द्र जलवायु।ब्राजील के बाद भारत गन्ने का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। चीनी, गुड़, खांडसारी का स्रोत। उत्तर प्रदेश (शीर्ष), महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु।
तिलहन (Oilseeds)देश के कुल बोए गए क्षेत्र के लगभग 12% भाग पर तिलहन उगाए जाते हैं। मुख्य तिलहन: मूंगफली, सरसों, नारियल, तिल, सोयाबीन, अरंडी, बिनौला, अलसी, सूरजमुखी।मूंगफली (Groundnut) खरीफ फसल है और कुल तिलहन उत्पादन का आधा हिस्सा है; गुजरात मूंगफली का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। (अरंडी का बीज खरीफ व रबी दोनों है)।
चाय (Tea)उष्ण व उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु; गहरी उपजाऊ ह्यूमस और जीवांश युक्त सुअपवाहित (Well-drained) ढलवां मिट्टी; वर्ष भर समान रूप से होने वाली हल्की बौछारें।महत्वपूर्ण पेय पदार्थ; रोपण कृषि; श्रम-सघन उद्योग (पत्तियां चुनने हेतु कुशल सस्ता श्रम)। असम (शीर्ष उत्पादक), पश्चिम बंगाल (दार्जिलिंग की चाय सुगंध हेतु विश्व विख्यात), तमिलनाडु, केरल।
कॉफी (Coffee)उष्ण व आर्द्र जलवायु, छायादार ढलान। भारत की 'अरेबिका' (Arabica) किस्म अपनी उत्तम गुणवत्ता के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है, जो मूल रूप से यमन से लाई गई थी।इसकी खेती की शुरुआत ऐतिहासिक रूप से बाबा बूदन की पहाड़ियों (कर्नाटक) पर हुई थी। आज भी इसकी खेती मुख्यतः नीलगिरि की पहाड़ियों (कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु) में केंद्रित है।

4.2 रेशेदार फसलें: कपास एवं जूट ('सुनहरा रेशा')

कपास (Cotton)

• भारत को कपास के पौधे का मूल स्थान माना जाता है। सूती वस्त्र उद्योग का मुख्य कच्चा माल।
• भौगोलिक दशाएं: दक्कन पठार की काली मृदा (Black Soil), उच्च तापमान, हल्की वर्षा या सिंचाई, 210 पाला-रहित दिन (Frost-free days) और खिली हुई तेज धूप।
• यह खरीफ फसल है जिसे पककर तैयार होने में 6 से 8 महीने लगते हैं।
• शीर्ष उत्पादक राज्य: गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, राजस्थान।

जूट (Jute) - 'सुनहरा रेशा' (Golden Fibre)

• जूट को अपनी चमक और मूल्यवान प्रकृति के कारण 'सुनहरा रेशा' (Golden Fibre) कहा जाता है।
• भौगोलिक दशाएं: बाढ़ के मैदानों में प्रतिवर्ष नवीकृत होने वाली उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी, उच्च तापमान और भारी वर्षा।
• उपयोग: गनी बैग्स (बोरियां), रस्सियां, चटाई, तंबू, कालीन और सजावटी सामान बनाने में।
• चुनौतियाँ: उच्च उत्पादन लागत और सिंथेटिक फाइबर (नायलॉन व प्लास्टिक पैकिंग) के सस्ते विकल्पों से कड़ी प्रतिस्पर्धा।
• शीर्ष उत्पादक राज्य: पश्चिम बंगाल (हुगली बेसिन), बिहार, असम, ओडिशा।

5. संस्थागत व तकनीकी सुधार एवं भूदान-ग्रामदान आंदोलन

5.1 स्वतंत्रता के पश्चात संस्थागत एवं तकनीकी सुधार

कृषि में हजारों वर्षों से निरंतर लकड़ी के हल और पारंपरिक औजारों के उपयोग से उत्पादकता ठहर गई थी। इसे गति देने हेतु सरकार ने सुधार किए:

1. संस्थागत सुधार (Institutional Reforms):
• प्रथम पंचवर्षीय योजना में 'भूमि सुधार' (Land Reforms) को मुख्य लक्ष्य बनाया गया।
• जमींदारी प्रथा का उन्मूलन: बिचौलियों और जमींदारों की व्यवस्था समाप्त कर जमीन का मालिकाना हक जोतने वाले किसानों को दिया गया।
• चकबंदी (Consolidation of holdings): उत्तराधिकार के कारण टुकड़ों में बंटी बिखरी हुई भूमि को एक स्थान पर जोड़कर बड़े चक बनाए गए।
• सहकारी खेती (Cooperation) को बढ़ावा दिया गया।
2. तकनीकी एवं वित्तीय सुधार (Technological Reforms):
• 1960 और 1970 के दशक में हरित क्रांति (Green Revolution) और श्वेत क्रांति (Operation Flood) की शुरुआत; HYV बीज, रासायनिक उर्वरक और नहरी सिंचाई।
• 1980 और 1990 के दशक में व्यापक भूमि विकास कार्यक्रम: सूखा, बाढ़, चक्रवात, आग और बीमारी के लिए फसल बीमा (Crop Insurance) की व्यवस्था।
• किसानों को कम ब्याज दर पर ऋण देने के लिए ग्रामीण बैंक, सहकारी समितियां और बैंकों की स्थापना।
• किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) और व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना (PAIS) की शुरुआत।
• आकाशवाणी और दूरदर्शन पर किसानों के लिए विशेष कृषि बुलेटिन और मौसम समाचारों का प्रसारण।
• बिचौलियों और दलालों के शोषण से बचाने के लिए सरकार द्वारा फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP - Minimum Support Price) की घोषणा।

5.2 विनोबा भावे का 'भूदान-ग्रामदान' आंदोलन (रक्तहीन क्रांति)

महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज और सर्वोदय के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उनके प्रिय शिष्य संत विनोबा भावे ने पूरे देश में पदयात्रा शुरू की:

  • भूदान (Bhoodan): 1951 में आंध्र प्रदेश (वर्तमान तेलंगाना) के पोचमपल्ली गांव में जब भूमिहीन ग्रामीणों ने 80 एकड़ जमीन मांगी, तो स्थानीय धनी जमींदार श्री रामचंद्र रेड्डी ने स्वेच्छा से अपनी 80 एकड़ जमीन दान कर दी। इसे 'भूदान' कहा गया।
  • ग्रामदान (Gramdan): बाद में कई बड़े जमींदारों ने अपने पूरे-के-पूरे गांव भूमिहीनों में बांटने की पेशकश की, जिसे 'ग्रामदान' कहा गया। (कई जमींदारों ने भूमि-सीमा कानून से बचने के लिए भी जमीनें दान कीं)।
  • विनोबा भावे द्वारा शुरू किए गए इस आंदोलन को 'रक्तहीन क्रांति' (Bloodless Revolution) के नाम से जाना जाता है क्योंकि इसमें बिना किसी हिंसा या कानून के भय के स्वेच्छा से लाखों एकड़ जमीन गरीबों को मिली।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

2/3 भारतीय आबादी
भारत की दो-तिहाई जनसंख्या प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर।
झूम / कर्तन-दहन
आदिम जीविका कृषि; पूर्वोत्तर में झूम, म.प्र. में बेवर, झारखंड में कुरुवा।
चावल (Rice)
खरीफ; 25°C+ तापमान; 100 सेमी+ वर्षा; चिकनी जलोढ़ मृदा; प. बंगाल शीर्ष।
गेहूं (Wheat)
रबी; 50-75 सेमी वर्षा; पकते समय खिली धूप; दोमट मृदा; उत्तर प्रदेश शीर्ष।
ज्वार (Jowar)
देश की तीसरी मुख्य खाद्य फसल; वर्षा-पोषित; महाराष्ट्र शीर्ष उत्पादक।
बाजरा व रागी
बाजरा: बलुई मिट्टी (राजस्थान शीर्ष); रागी: आयरन व कैल्शियम समृद्ध (कर्नाटक शीर्ष)।
फलीदार दालें
वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर मिट्टी की उर्वरता बहाल करने वाली फसलें।
अरेबिका कॉफी
यमन से लाई गई उच्च गुणवत्ता वाली किस्म; बाबा बूदन व नीलगिरि पहाड़ियों में उत्पादन।
कपास (Cotton)
दक्कन की काली मिट्टी; 210 पाला-रहित दिन; खिली धूप; गुजरात शीर्ष।
सुनहरा रेशा (Jute)
बाढ़ मैदानों की जलोढ़ मिट्टी; बोरियां व रस्सियां; पश्चिम बंगाल शीर्ष।
KCC एवं MSP
किसान क्रेडिट कार्ड (सस्ता ऋण) एवं न्यूनतम समर्थन मूल्य (मूल्य सुरक्षा)।
1951 पोचमपल्ली
विनोबा भावे का भूदान-ग्रामदान आंदोलन ('रक्तहीन क्रांति') प्रारंभ।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि (झूम कृषि) और गहन जीविका कृषि के मध्य प्रमुख अंतरों की तुलना कीजिए। (तालिका रूप में)
विस्तृत समाधान / उत्तर:
प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि और गहन जीविका कृषि दोनों ही जीविका चलाने के साधन हैं, परंतु इनकी पद्धतियों और परिस्थितियों में गहरा अंतर है:

तुलना का आधारप्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि (झूम कृषि)गहन जीविका कृषि (Intensive Subsistence)
भूमि पर जनसंख्या दबावकम जनसंख्या दबाव वाले पहाड़ी और वनाच्छादित क्षेत्रों में की जाती है।अत्यधिक घनी जनसंख्या और भूमि पर भारी दबाव वाले मैदानी भागों में की जाती है।
उपकरण एवं तकनीकपारंपरिक और आदिम औजार (लकड़ी का हल, डाओ, खुरपी) तथा पारिवारिक श्रम।आधुनिक कृषि उपकरण, उन्नत बीज और जैव-रासायनिक उर्वरक।
उर्वरकता का आधारपूरी तरह प्राकृतिक उर्वरता (जंगल काटकर जलाने से बनी राख) पर निर्भर।कृत्रिम रासायनिक खाद, कीटनाशक और नियमित नहरी/नलकूप सिंचाई पर निर्भर।
खेतों का स्वरूपअस्थायी खेत (कर्तन-दहन); उर्वरता घटते ही किसान नए भूखंड पर चले जाते हैं।स्थायी खेत; परंतु उत्तराधिकार के नियमों के कारण जोतों का आकार बहुत छोटा होता है।
उत्पादकताप्रति हेक्टेयर उत्पादकता अत्यंत न्यून होती है।सीमित भूमि से अधिकतम उत्पादन लेने के कारण प्रति हेक्टेयर उत्पादकता बहुत अधिक होती है।
प्रमुख क्षेत्रपूर्वोत्तर भारत (असम, मिजोरम), मध्य प्रदेश, ओडिशा, झारखंड (कुरुवा)।उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, पंजाब, हरियाणा, तटीय डेल्टा।
उदाहरण 2
चावल और गेहूं भारत की दो प्रमुख खाद्यान्न फसलें हैं। इनकी भौगोलिक दशाओं (तापमान, वर्षा, मृदा और शीर्ष उत्पादक राज्य) की विस्तृत तुलना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
चावल और गेहूं भारत की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ हैं। इनकी भौगोलिक आवश्यकताओं की तुलना निम्न प्रकार है:

1. चावल (धान) की भौगोलिक दशाएं:
• फसल का प्रकार: यह मुख्य रूप से खरीफ फसल है जिसे जून-जुलाई में बोया और अक्टूबर में काटा जाता है।
• तापमान: इसके लिए उच्च तापमान (25°C से अधिक) और उच्च आर्द्रता की आवश्यकता होती है।
• वार्षिक वर्षा: इसके लिए 100 सेमी से अधिक भारी वर्षा चाहिए। कम वर्षा वाले क्षेत्रों (जैसे पंजाब, हरियाणा) में इसे नहरी व नलकूप सिंचाई द्वारा उगाया जाता है।
• मृदा: बारीक चीका युक्त दोमट और जलोढ़ मिट्टी जो अपने भीतर पानी रोककर रख सके।
• शीर्ष उत्पादक राज्य: पश्चिम बंगाल (सबसे बड़ा उत्पादक), उत्तर प्रदेश, पंजाब, आंध्र प्रदेश और बिहार。

2. गेहूं की भौगोलिक दशाएं:
• फसल का प्रकार: यह मुख्य रूप से रबी फसल है जिसे शीतकाल (अक्टूबर-दिसंबर) में बोया और ग्रीष्मकाल (अप्रैल) में काटा जाता है।
• तापमान: इसे उगते समय ठंडी जलवायु (10°C से 15°C) और पकते समय खिली व तेज धूप (20°C से 25°C) की आवश्यकता होती है।
• वार्षिक वर्षा: इसके लिए समान रूप से वितरित 50 से 75 सेमी वर्षा पर्याप्त होती है। शीतकाल में पश्चिमी विक्षोभ से होने वाली हल्की वर्षा इसके लिए अमृत समान होती है।
• मृदा: अच्छी जल-निकासी वाली दोमट जलोढ़ मिट्टी तथा दक्कन की काली मिट्टी।
• शीर्ष उत्पादक राज्य: उत्तर प्रदेश (सबसे बड़ा उत्पादक), पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान।
उदाहरण 3
रोपण कृषि (Plantation Agriculture) की मुख्य विशेषताएं क्या हैं? भारत की किन्हीं दो प्रमुख रोपण फसलों और उनके उत्पादक क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
रोपण कृषि की मुख्य विशेषताएं:
1. विशाल भूखंड पर एकल फसल: रोपण कृषि एक प्रकार की बड़े पैमाने की वाणिज्यिक खेती है जिसमें एक बहुत बड़े बागान (विस्तृत क्षेत्र) पर केवल एक ही नकदी फसल उगाई जाती है।
2. कृषि और उद्योग का मिलन: यह उद्योग और कृषि के मध्य एक सेतु है। बागान में उत्पादित कच्चा माल सीधे कारखानों में प्रसंस्कृत होता है (जैसे चाय की पत्तियां, रबड़ का लेटेक्स)।
3. पूंजी और श्रम सघन: इसमें आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों, प्रबंधकीय कौशल, भारी पूंजी निवेश और बड़ी संख्या में सस्ते प्रवासी मजदूरों की आवश्यकता होती है।
4. परिवहन तंत्र पर निर्भरता: चूंकि सारा उत्पादन बाजार के लिए होता है, अतः बागानों को कारखानों और बंदरगाहों से जोड़ने के लिए विकसित परिवहन और संचार व्यवस्था अनिवार्य होती है。

भारत की दो प्रमुख रोपण फसलें:
1. चाय (Tea): यह एक महत्वपूर्ण पेय रोपण फसल है। इसके लिए वर्ष भर समान रूप से वितरित बौछारें और ढलवां उपजाऊ भूमि चाहिए। मुख्य क्षेत्र: असम, पश्चिम बंगाल (दार्जिलिंग व जलपाईगुड़ी की पहाड़ियां), तमिलनाडु और केरल।
2. कॉफी (Coffee): भारत में उगाई जाने वाली यमन की 'अरेबिका' कॉफी विश्व प्रसिद्ध है। इसकी खेती मुख्यतः कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु की नीलगिरि पहाड़ियों (विशेष रूप से कर्नाटक के बाबा बूदन क्षेत्र) में की जाती है।
उदाहरण 4
स्वतंत्रता के पश्चात भारत सरकार द्वारा कृषि में किए गए प्रमुख 'संस्थागत' और 'तकनीकी' सुधारों का सविस्तार वर्णन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारतीय कृषि अत्यंत पिछड़ी और सामंती बंधनों में जकड़ी हुई थी। इसके आधुनिकीकरण के लिए सरकार ने दो स्तरों पर व्यापक सुधार किए:

1. संस्थागत सुधार (Institutional Reforms):
• जमींदारी उन्मूलन: सदियों से किसानों का खून चूसने वाली मध्यस्थों और जमींदारों की व्यवस्था को कानूनी रूप से समाप्त कर जोतने वाले को भूमि का स्वामी बनाया गया।
• चकबंदी (Consolidation of Holdings): उत्तराधिकार के कारण पीढ़ी-दर-पीढ़ी छोटे और बिखरे हुए खेतों को आपस में बदलकर एक बड़ा चक बनाया गया ताकि आधुनिक जुताई संभव हो सके।
• भूमि-सीमा कानून (Land Ceiling Act): किसी व्यक्ति द्वारा रखी जा सकने वाली कृषि भूमि की अधिकतम सीमा तय की गई और अतिरिक्त भूमि को भूमिहीनों में वितरित किया गया。

2. तकनीकी एवं वित्तीय सुधार (Technological Reforms):
• हरित क्रांति: 1960 के दशक में उच्च उत्पादकता वाले प्रमाणित बीजों (HYV), रासायनिक खादों, कीटनाशकों और नलकूपों के प्रयोग से खाद्यान्न (विशेषकर गेहूं और चावल) उत्पादन में ऐतिहासिक वृद्धि हुई।
• किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) व फसल बीमा: किसानों को साहूकारों के चंगुल से बचाने हेतु बैंकों द्वारा KCC के जरिए नाममात्र ब्याज पर फसली ऋण तथा सूखा, बाढ़ या ओलावृष्टि होने पर 'फसल बीमा' की सुरक्षा दी गई।
• न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP): दलालों और व्यापारियों द्वारा फसल कटाई के समय कम दाम पर अनाज खरीदने की लूट को रोकने के लिए सरकार प्रतिवर्ष बुवाई से पहले लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है और भारतीय खाद्य निगम (FCI) द्वारा खरीद की गारंटी देती है।
उदाहरण 5
संत विनोबा भावे द्वारा संचालित 'भूदान-ग्रामदान आंदोलन' को 'रक्तहीन क्रांति' क्यों कहा जाता है? इसके आरंभ और महत्व को स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
आंदोलन का आरंभ:
महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के स्वप्न को साकार करने हेतु उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकारी संत विनोबा भावे ने पूरे भारत में पदयात्राएं कीं। 18 अप्रैल 1951 को जब वे आंध्र प्रदेश (अब तेलंगाना) के पोचमपल्ली गांव पहुंचे, तो वहाँ के 80 भूमिहीन दलित परिवारों ने अपनी आजीविका के लिए 80 एकड़ भूमि की मांग की।
विनोबा जी की अपील पर उसी सभा में उपस्थित एक संपन्न जमींदार श्री वेदरे रामचंद्र रेड्डी ने स्वेच्छा से आगे आकर अपनी 80 एकड़ भूमि उन भूमिहीनों को दान कर दी। यह इतिहास का पहला 'भूदान' था。

ग्रामदान:
इसके बाद विनोबा जी के विचारों से प्रभावित होकर देश भर के अनेक बड़े भूस्वामियों ने अपने पूरे गांव की भूमि को ग्राम समुदाय के कल्याण हेतु समर्पित कर दिया, जिसे 'ग्रामदान' कहा गया。

'रक्तहीन क्रांति' (Bloodless Revolution) कहे जाने का कारण:
विश्व इतिहास में जब भी भूमि का पुनर्वितरण हुआ (जैसे रूस या चीन में), तो वह भयंकर खूनी संघर्षों, युद्धों और लाखों लोगों की हत्याओं के बाद ही संभव हुआ था। परंतु भारत में विनोबा भावे के नैतिक प्रभाव और अंतरात्मा की पुकार पर बिना एक भी लाठी चले, बिना किसी हिंसा या गोलीबारी के, और बिना किसी कानूनी बल प्रयोग के जमींदारों ने स्वेच्छा से लाखों हेक्टेयर भूमि निर्धनों को दान कर दी। इसी कारण इतिहासकारों ने इसे विश्व की अनूठी 'रक्तहीन क्रांति' की संज्ञा दी।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

झूम कृषि को केवल भारत में प्रचलित आदिम कृषि समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

झूम कृषि (कर्तन-दहन प्रणाली) दुनिया के अनेक देशों में प्रचलित है; इसे मैक्सिको व मध्य अमेरिका में 'मिल्पा', ब्राजील में 'रोका' और मलेशिया में 'लादांग' कहा जाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गन्ना और मूंगफली को रबी फसल मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

गन्ना और मूंगफली दोनों मुख्य रूप से 'खरीफ फसलें' हैं जिन्हें मानसून के समय बोया जाता है। (गन्ने को तैयार होने में लगभग 1 वर्ष का समय लगता है)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

दालों को मिट्टी की उर्वरता घटाने वाली फसल समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

अरहर को छोड़कर अन्य सभी दालें 'फलीदार' (Leguminous) फसलें हैं जिनकी जड़ों की ग्रंथियां वायु से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में स्थिर करती हैं और मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता बढ़ाती हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भारत में कॉफी की सबसे पहली किस्म को रोबस्टा मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

भारत में सबसे पहले यमन से लाई गई उच्च कोटि की 'अरेबिका' (Arabica) किस्म की कॉफी की शुरुआत कर्नाटक की बाबा बूदन पहाड़ियों से की गई थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भूदान आंदोलन के पहले दानदाता का नाम विनोबा भावे लिख देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

विनोबा भावे आंदोलन के प्रणेता/नेता थे; पहले दानदाता पोचमपल्ली के जमींदार 'श्री रामचंद्र रेड्डी' थे जिन्होंने अपनी 80 एकड़ भूमि दान की थी।

भारतीय कृषि का समग्र स्वरूप: शस्य प्रारूप, मुख्य फसलें एवं संस्थागत सुधार

भारतीय कृषि: शस्य प्रारूप, मुख्य फसलें एवं संस्थागत सुधार1. शस्य प्रारूप (3 ऋतुएं)रबी, खरीफ व जायद• रबी (अक्टूबर - अप्रैल):गेहूं, जौ, चना, सरसों, मटर• खरीफ (जून - अक्टूबर):धान, मक्का, ज्वार, बाजरा,कपास, जूट, मूंगफली, सोयाबीन• जायद (मार्च - मई):तरबूज, खीरा, सब्जियां, चारा• झूम: कर्तन-दहन (झारखंड: कुरुवा)2. प्रमुख फसलें व राज्यखाद्यान्न व नकदी फसलें• चावल: प. बंगाल शीर्ष (100cm+ वर्षा)• गेहूं: उत्तर प्रदेश शीर्ष (50-75cm)• मोटे अनाज: ज्वार (महाराष्ट्र),बाजरा (राजस्थान), रागी (कर्नाटक)• दालें: फलीदार नाइट्रोजन स्थिरीकरण• रोपण: चाय (असम), अरेबिकाकॉफी (कर्नाटक की नीलगिरि)• कपास (गुजरात) व जूट (प. बंगाल)3. संस्थागत व तकनीकी सुधारहरित क्रांति व भूदान• जमींदारी उन्मूलन व चकबंदी• हरित क्रांति (HYV बीज, खाद)• श्वेत क्रांति (ऑपरेशन फ्लड)• किसान क्रेडिट कार्ड (KCC)• न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)• 1951 भूदान - ग्रामदान आंदोलन:विनोबा भावे की 'रक्तहीन क्रांति'रामचंद्र रेड्डी द्वारा 80 एकड़ दानबोर्ड परीक्षा हेतु प्रमुख कृषि सूत्र (Golden Examination Capsule)कर्तन-दहन (झूम):पूर्वोत्तर में झूम; मध्य प्रदेश में बेवर; झारखंड में कुरुवा; मैक्सिको में मिल्पा।कपास बनाम जूट:कपास: काली मिट्टी (210 पाला-रहित दिन, गुजरात); जूट: 'सुनहरा रेशा' (प. बंगाल)।रक्तहीन क्रांति (1951):संत विनोबा भावे का भूदान-ग्रामदान आंदोलन; बिना हिंसा के भूमिहीनों को भूमि।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
भारत की दो-तिहाई जनसंख्या कृषि पर निर्भर है जो खाद्यान्न के साथ-साथ उद्योगों के लिए कच्चा माल और निर्यात से विदेशी मुद्रा प्रदान करती है।
मुख्य बिंदु 2
प्रारंभिक जीविका निर्वाह (झूम या कर्तन-दहन) कृषि आदिम औजारों व वर्षा पर निर्भर होती है; इसे झारखंड में 'कुरुवा' और पूर्वोत्तर में 'झूम' कहते हैं।
मुख्य बिंदु 3
गहन जीविका कृषि उच्च जनसंख्या दबाव वाले क्षेत्रों में रासायनिक खादों व सिंचाई के सहारे छोटे भूखंडों पर की जाती है।
मुख्य बिंदु 4
रोपण कृषि एक प्रकार की बड़े पैमाने की पूंजी-सघन वाणिज्यिक कृषि है जिसमें एक बड़े क्षेत्र पर एकल फसल (चाय, कॉफी, रबड़) उगाई जाती है।
मुख्य बिंदु 5
भारत की तीन शस्य ऋतुएं हैं: रबी (शीतकाल - गेहूं, चना, सरसों), खरीफ (मानसून - धान, मक्का, कपास, जूट), और जायद (ग्रीष्मकाल - तरबूज, खीरा)।
मुख्य बिंदु 6
चावल देश की मुख्य खाद्य फसल है (उच्च तापमान, 100cm+ वर्षा, प. बंगाल शीर्ष); गेहूं दूसरी मुख्य खाद्य फसल है (50-75cm वर्षा, खिली धूप, उ.प्र. शीर्ष)।
मुख्य बिंदु 7
ज्वार, बाजरा और रागी पोषक मोटे अनाज (Millets) हैं; दालें फलीदार फसलें हैं जो वायु से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी की उर्वरता बहाल करती हैं।
मुख्य बिंदु 8
कपास दक्कन की काली मिट्टी में 210 पाला-रहित दिनों में पकती है; जूट को 'सुनहरा रेशा' कहा जाता है जिसका सबसे बड़ा उत्पादक पश्चिम बंगाल है।
मुख्य बिंदु 9
स्वतंत्रता के बाद जमींदारी उन्मूलन और चकबंदी जैसे संस्थागत सुधार, तथा हरित क्रांति, KCC और MSP जैसे तकनीकी-वित्तीय सुधार किए गए।
मुख्य बिंदु 10
1951 में पोचमपल्ली से संत विनोबा भावे द्वारा शुरू किया गया 'भूदान-ग्रामदान आंदोलन' विश्व की अनूठी 'रक्तहीन क्रांति' के रूप में विख्यात है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
कर्तन एवं दहन प्रणाली (Slash and Burn) क्या है और इसे झारखंड तथा पूर्वोत्तर राज्यों में किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: इसमें किसान जंगल के एक हिस्से को काटकर व जलाकर साफ करते हैं और राख मिली मिट्टी पर फसल उगाते हैं। उर्वरता घटने पर वे दूसरे नए टुकड़े पर चले जाते हैं। इसे झारखंड में 'कुरुवा' (Kuruwa) और पूर्वोत्तर राज्यों में 'झूम' (Jhumming) कहा जाता है।
2
चावल की खेती के लिए आवश्यक दो मुख्य भौगोलिक दशाओं और देश के सबसे बड़े उत्पादक राज्य का नाम लिखिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
  1. 25°C से अधिक उच्च तापमान और उच्च आर्द्रता। 2. 100 सेमी से अधिक वार्षिक वर्षा (या उत्तम नहरी सिंचाई)। सबसे बड़ा उत्पादक राज्य पश्चिम बंगाल है।

3
दालों को फसल चक्र (Crop Rotation) में शामिल करना किसानों के लिए क्यों आवश्यक और लाभदायक माना जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि अरहर को छोड़कर अन्य सभी दालें फलीदार (Leguminous) फसलें हैं जिनकी जड़ों में मौजूद राइजोबियम जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करके उसकी प्राकृतिक उर्वरता को बिना खाद के स्वतः बहाल कर देते हैं।
4
कपास की खेती के लिए कौन सी मिट्टी सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है और इसके लिए कितने पाला-रहित दिनों की आवश्यकता होती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: कपास की खेती के लिए दक्कन के पठार की 'काली मिट्टी' (Black / Regur Soil) सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इसके पौधों को पकने के लिए कम से कम 210 पाला-रहित दिनों (Frost-free days) और खिली हुई तेज धूप की आवश्यकता होती है।
5
विनोबा भावे के 'भूदान-ग्रामदान आंदोलन' को 'रक्तहीन क्रांति' क्यों कहा गया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि विश्व इतिहास में भूमि का पुनर्वितरण प्रायः हिंसक क्रांतियों और रक्तपात से हुआ था, जबकि भारत में बिना किसी हिंसा, गोलीबारी या कानून के दबाव के बड़े जमींदारों ने स्वेच्छा से अपनी लाखों एकड़ भूमि गरीबों को दान कर दी।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
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अध्याय 1: यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय अध्याय 2: भारत में राष्ट्रवाद अध्याय 3: भूमंडलीकृत विश्व का बनना अध्याय 4: औद्योगिकीकरण का युग अध्याय 5: मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया अध्याय 6: संसाधन एवं विकास अध्याय 7: वन एवं वन्यजीव संसाधन अध्याय 8: जल संसाधन अध्याय 9: कृषि अध्याय 10: खनिज तथा ऊर्जा संसाधन अध्याय 11: विनिर्माण उद्योग अध्याय 12: राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की जीवन रेखाएँ अध्याय 13: सत्ता की साझेदारी (Power-sharing) अध्याय 14: संघवाद (Federalism) अध्याय 15: लिंग, धर्म और जाति अध्याय 16: राजनीतिक दल (Political Parties) अध्याय 17: लोकतंत्र के परिणाम अध्याय 18: विकास (Development) अध्याय 19: भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक अध्याय 20: मुद्रा और साख अध्याय 21: वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था अध्याय 22: उपभोक्ता अधिकार

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