1.1 विनिर्माण का अर्थ एवं आर्थिक विकास में महत्व
विनिर्माण (Manufacturing): कच्चे माल को मूल्यवान उत्पाद में बदलकर अधिक मात्रा में वस्तुओं के उत्पादन को विनिर्माण कहते हैं। (जैसे गन्ने से चीनी, बॉक्साइट से एल्युमिनियम, लोहे से मशीनें)।
1. कृषि का आधुनिकीकरण: ये कृषि के आधुनिकीकरण में सहायक हैं। ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, ट्यूबवेल, रासायनिक खाद और कीटनाशक उपलब्ध कराकर कृषि उत्पादकता को कई गुना बढ़ा देते हैं।
2. कृषि पर निर्भरता में कमी: द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रों में लाखों नौकरियों का सृजन करके कृषि पर से जनसंख्या का अत्यधिक बोझ घटाते हैं।
3. बेरोजगारी और गरीबी उन्मूलन: देश के पिछड़े और जनजातीय इलाकों में उद्योग स्थापित करके क्षेत्रीय असमानताओं को दूर किया जाता है।
4. विदेशी मुद्रा अर्जन: निर्मित वस्तुओं के अंतरराष्ट्रीय निर्यात से व्यापार का विस्तार होता है और बहुमूल्य विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।
'कृषि और उद्योग एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं': कृषि उद्योगों को कच्चा माल (कपास, जूट, गन्ना, तिलहन) देती है और उद्योग कृषि को उन्नत उपकरण, पंप, उर्वरक और प्लास्टिक पाइप प्रदान करते हैं। कृषि के विकास से उद्योगों को विशाल ग्रामीण बाजार मिलता है।
1.2 उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक एवं समूहन बचत
उद्योगों की स्थापना एक जटिल प्रक्रिया है जो निम्नलिखित कारकों की उपलब्धता से प्रभावित होती है:
- भौगोलिक कारक: कच्चे माल की सुलभता, शक्ति के साधन (बिजली, कोयला), जल की प्रचुरता, और अनुकूल जलवायु।
- गैर-भौगोलिक (आर्थिक) कारक: कुशल व सस्ता श्रम, पूंजी, बाजार, परिवहन व संचार तंत्र, तथा सरकारी नीतियां।
- समूहन बचत (Agglomeration Economies): नगर उद्योगों को बाजार उपलब्ध कराते हैं तथा बैंकिंग, बीमा, परिवहन, श्रमिक और वित्तीय सलाह जैसी सुविधाएं देते हैं। कई बार अनेक उद्योग नगरीय केंद्रों द्वारा दी गई सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए एक साथ आसपास स्थापित हो जाते हैं। इसे 'समूहन बचत' कहते हैं।