1.1 बाजार में उपभोक्ता का शोषण किस प्रकार होता है?
बाजार में जब कोई उपभोक्ता अकेला होता है तो बड़ी-बड़ी उत्पादक कंपनियां और बेईमान व्यापारी उसका विभिन्न तरीकों से शोषण करते हैं:
- कम तोलना या मापना: तराजू में हेराफेरी करके या पैकेट पर लिखे वजन से कम सामान देना।
- मिलावट और अशुद्ध वस्तुएं: खाद्य पदार्थों में घटिया और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तत्वों की मिलावट (जैसे मसालों में रंग, दूध में यूरिया, घी में चर्बी)।
- असुरक्षित और दोषपूर्ण उत्पाद: घटिया सामग्री से बने विद्युत उपकरण (जैसे खराब हीटर, प्रेशर कुकर में घटिया सेफ्टी वॉल्व) जिससे जान-माल का भारी खतरा होता है।
- अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) से अधिक दाम वसूलना: एमआरपी से ज्यादा कीमत लेना और छुपाए गए अतिरिक्त शुल्क जोड़ना।
- समाप्ति तिथि (Expiry Date) के बाद सामान बेचना: एक्सपायरी डेट निकल चुकी दवाएं और डिब्बाबंद खाद्य सामग्री बेच देना।
- भ्रामक और झूठे विज्ञापन: मीडिया में उत्पादों के बारे में झूठे और बढ़ा-चढ़ाकर दावे करना (जैसे सिगरेट को मर्दानगी से जोड़ना या फेयरनेस क्रीम से 7 दिन में गोरा होने का दावा)।
1.2 उपभोक्ता आंदोलन का ऐतिहासिक उद्भव एवं COPRA 1986
भारत में उपभोक्ता आंदोलन की शुरुआत 1960 के दशक में अनैतिक व्यापारिक तौर-तरीकों के विरुद्ध एक सामाजिक असंतोष के रूप में हुई:
- 1960 के दशक की समस्याएं: देश में खाद्यान्न की तीव्र कमी, जमाखोरी, कालाबाजारी, और खाद्य तेल व दालों में मिलावट के खिलाफ जनता सड़कों पर उतरी। 1970 के दशक तक उपभोक्ता समूहों ने राशन की दुकानों में कदाचार पर लेख लिखे और प्रदर्शन किए।
- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (COPRA 1986): इन सभी संघर्षों के दबाव में आकर भारत सरकार ने 24 दिसंबर 1986 को भारतीय संसद में ऐतिहासिक 'उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम' (Consumer Protection Act - COPRA) पारित किया।
- राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस: COPRA पारित होने के उपलक्ष्य में प्रत्येक वर्ष 24 दिसंबर को भारत में 'राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस' (National Consumer Day) मनाया जाता है।