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CBSE • कक्षा X • Social Science • अध्याय 19
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक

मानव अपने जीवन यापन के लिए निरंतर विभिन्न आर्थिक गतिविधियों में संलग्न रहता है। आर्थिक गतिविधियों की प्रकृति को समझने के लिए उन्हें तीन प्रमुख क्षेत्रकों—प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक—में वर्गीकृत किया जाता है। प्राथमिक क्षेत्रक सीधे प्राकृतिक संसाधनों (भूमि, जल, वनस्पति) का उपयोग करता है (कृषि, वानिकी, मत्स्यन, खनन)। द्वितीयक क्षेत्रक विनिर्माण प्रक्रिया द्वारा प्राकृतिक उत्पादों को उपयोगी वस्तुओं में रूपांतरित करता है (कपास से वस्त्र, गन्ने से चीनी)। तृतीयक क्षेत्रक (सेवा क्षेत्रक) स्वयं किसी वस्तु का उत्पादन नहीं करता बल्कि प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रकों के विकास में सहायता तथा आवश्यक सेवाएं (परिवहन, बैंकिंग, संचार, शिक्षा, स्वास्थ्य, IT) प्रदान करता है। किसी वित्तीय वर्ष में इन तीनों क्षेत्रकों द्वारा उत्पादित सभी 'अंतिम वस्तुओं और सेवाओं' के कुल मूल्य का योग 'सकल घरेलू उत्पाद' (GDP) कहलाता है। पिछले 40 वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था में एक अभूतपूर्व संरचनात्मक बदलाव आया है: उत्पादन में तृतीयक क्षेत्रक सबसे बड़ा बनकर उभरा है (GDP में 60%+ हिस्सा), परंतु रोजगार के क्षेत्र में भारी विसंगति बनी हुई है क्योंकि आज भी देश की लगभग 45% कार्यशील जनसंख्या प्राथमिक (कृषि) क्षेत्रक में लगी हुई है। यह स्थिति 'प्रच्छन्न बेरोजगारी' या 'अल्प-रोजगार' (Disguised Unemployment) को जन्म देती है, जहाँ आवश्यकता से अधिक लोग खेतों में काम करते हैं। रोजगार सृजन के लिए सरकार ने 2005 में 'महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम' (मनरेगा - 100 दिनों के काम की गारंटी) लागू किया। इसके अतिरिक्त, काम की परिस्थितियों के आधार पर संगठित एवं असंगठित क्षेत्रक, तथा स्वामित्व के आधार पर सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक के बीच का अंतर भारतीय आर्थिक परिदृश्य के केंद्र में है। इस अध्याय में हम इन सभी आर्थिक आयामों का गहन, प्रामाणिक और परीक्षा-उन्मुख अध्ययन करेंगे।

यदि एक खेत में 2 लोगों का काम है और वहाँ 8 लोग लगे हैं, तो क्या वे सचमुच काम कर रहे हैं?

भारत के गांवों में जब आप जाएंगे, तो पाएंगे कि एक छोटे से दो बीघा खेत पर परिवार के सभी छह-आठ सदस्य सुबह से शाम तक पसीना बहाते हैं। बाहर से देखने पर सब व्यस्त दिखते हैं, कोई बेरोजगार नहीं लगता। लेकिन यदि इनमें से चार लोगों को खेत से निकाल कर किसी कारखाने में काम दे दिया जाए, तब भी उस खेत की कुल पैदावार में एक दाने की भी कमी नहीं आएगी! अर्थशास्त्र की भाषा में इसे 'प्रच्छन्न' या 'छिपी हुई बेरोजगारी' (Disguised Unemployment) कहते हैं। आइए जानें कि कैसे हमारी अर्थव्यवस्था के तीन पहिए—खेत, कारखाने और दफ्तर—भारत की तकदीर बदल रहे हैं!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

CBSE और CBSE कक्षा 10वीं बोर्ड परीक्षा में 'भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक' सर्वाधिक प्रश्न-प्रदाता अध्यायों में से एक है। प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रकों की तुलना, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में केवल 'अंतिम वस्तुओं' की गणना क्यों की जाती है, भारत में तृतीयक क्षेत्रक के तेजी से बढ़ते महत्व के चार कारण, प्रच्छन्न / छिपी हुई बेरोजगारी की विस्तृत व्याख्या, मनरेगा (MGNREGA 2005) के मुख्य प्रावधान, तथा संगठित बनाम असंगठित क्षेत्रक (कांता बनाम कमल) पर 3 से 5 अंकों के विश्लेषणात्मक प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • आर्थिक क्रियाओं (आय अर्जन हेतु की जाने वाली गतिविधियाँ) की प्राथमिक समझ।
  • सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और राष्ट्रीय आय की बुनियादी जानकारी।
  • बेरोजगारी और रोजगार की सामान्य संकल्पना।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रकों के मध्य अंतर, उनकी परस्पर निर्भरता और GDP में उनके योगदान का विश्लेषण करना।
  • सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की गणना में 'अंतिम वस्तुओं और सेवाओं' के मूल्य को शामिल करने के औचित्य (दोहरी गणना से बचाव) को स्पष्ट करना।
  • भारत में पिछले चार दशकों में तृतीयक क्षेत्रक के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रक के रूप में उभरने के कारणों की व्याख्या करना।
  • कृषि में विद्यमान 'प्रच्छन्न / अल्प बेरोजगारी' की पहचान करना तथा मनरेगा 2005 सहित अतिरिक्त रोजगार सृजन के उपायों का मूल्यांकन करना।
  • संगठित और असंगठित क्षेत्रक तथा सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक के बीच कार्य दशाओं और सामाजिक सुरक्षा के आधार पर तुलना करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. आर्थिक गतिविधियों के तीन क्षेत्र...
2 2. सकल घरेलू उत्पाद (GDP) एवं अंतिम...
3 3. भारत में तृतीयक क्षेत्रक का बढ़त...
4 4. प्रच्छन्न बेरोजगारी एवं अतिरिक्त...
5 5. संगठित बनाम असंगठित क्षेत्रक एवं...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. आर्थिक गतिविधियों के तीन क्षेत्रक एवं उनकी परस्पर निर्भरता

1.1 प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रक

क्षेत्रक का नामपरिभाषा एवं कार्यप्रणालीप्रमुख उदाहरण
1. प्राथमिक क्षेत्रक (Primary Sector)
कृषि एवं सहायक क्षेत्रक
जब हम प्राकृतिक संसाधनों का सीधे उपयोग करके किसी वस्तु का उत्पादन करते हैं। चूंकि अधिकांश प्राकृतिक उत्पाद कृषि, डेयरी, मछली पकड़ने और वनों से प्राप्त होते हैं, इसलिए इसे 'कृषि एवं सहायक क्षेत्रक' भी कहा जाता है।कपास उगाना, डेयरी फार्मिंग (दूध उत्पादन), मत्स्यन, वानिकी, खनिजों का उत्खनन।
2. द्वितीयक क्षेत्रक (Secondary Sector)
औद्योगिक क्षेत्रक
इस क्षेत्रक में प्राकृतिक उत्पादों को विनिर्माण प्रणाली (कारखानों, कार्यशालाओं या घरों में) के माध्यम से अन्य उपयोगी रूपों में परिवर्तित किया जाता है। चूंकि यह क्षेत्रक विभिन्न प्रकार के उद्योगों से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे 'औद्योगिक क्षेत्रक' भी कहते हैं।कपास के रेशे से सूत कातना और कपड़ा बुनना; गन्ने से चीनी व गुड़ बनाना; मिट्टी से ईंटें बनाना और ईंटों से भवन निर्माण करना।
3. तृतीयक क्षेत्रक (Tertiary Sector)
सेवा क्षेत्रक (Service Sector)
यह गतिविधियाँ स्वयं किसी वस्तु का उत्पादन नहीं करतीं, बल्कि उत्पादन प्रक्रिया में सहायता या सहयोग करती हैं। चूंकि ये गतिविधियाँ वस्तुओं के बजाय 'सेवाओं' का सृजन करती हैं, इसलिए इसे 'सेवा क्षेत्रक' भी कहा जाता है।परिवहन (ट्रक, रेल), भंडारण (गोदाम), संचार (टेलीफोन, इंटरनेट), बैंकिंग, बीमा, व्यापार; तथा व्यक्तिगत सेवाएं: डॉक्टर, शिक्षक, धोबी, नाई, वकील, सॉफ्टवेयर इंजीनियर।

1.2 तीनों क्षेत्रकों की परस्पर निर्भरता

तीनों क्षेत्रक एक-दूसरे के बिना कार्य नहीं कर सकते; वे परस्पर गहराई से गुंथे हुए हैं:

  • यदि किसान चीनी मिलों को गन्ना बेचने से मना कर दें, तो मिलें बंद हो जाएंगी (प्राथमिक पर द्वितीयक की निर्भरता)।
  • यदि कारखाने ट्रैक्टर, पंप सेट और कीटनाशक बनाना बंद कर दें, तो कृषि उत्पादन ठप हो जाएगा (द्वितीयक पर प्राथमिक की निर्भरता)।
  • यदि ट्रांसपोर्टर हड़ताल कर दें और किसान का टमाटर व दूध शहरों तक न पहुंचे, तो किसान बर्बाद हो जाएगा और शहर भूखा मरेगा (तृतीयक पर दोनों की निर्भरता)।

2. सकल घरेलू उत्पाद (GDP) एवं अंतिम वस्तुओं की गणना

2.1 केवल 'अंतिम वस्तुओं और सेवाओं' की ही गणना क्यों की जाती है?

अर्थव्यवस्था में हजारों प्रकार की वस्तुओं का उत्पादन होता है। उनका कुल मूल्य निकालते समय एक बड़ी सावधानी रखी जाती है:

दोहरी गणना की समस्या से बचाव (Avoiding Double Counting):
सकल घरेलू उत्पाद में केवल 'अंतिम वस्तुओं और सेवाओं' (Final Goods and Services) के मूल्य को ही जोड़ा जाता है, मध्यवर्ती वस्तुओं (Intermediate Goods) के मूल्य को नहीं!
उदाहरण: एक किसान किसी आटा मिल को 20 रु. प्रति किलोग्राम की दर से गेहूं बेचता है। आटा मिल गेहूं को पीसती है और एक बिस्कुट कंपनी को आटा 25 रु. प्रति किग्रा बेचती है। बिस्कुट कंपनी आटे के साथ चीनी और तेल मिलाकर बिस्कुट के 4 पैकेट बनाती है और बाजार में उपभोक्ताओं को 80 रु. (20 रु. प्रति पैकेट) में बेचती है।
यहाँ बिस्कुट ही 'अंतिम उत्पाद' है जो उपभोक्ता तक पहुंचता है। बिस्कुट के 80 रु. के मूल्य में आटे, चीनी और गेहूं का मूल्य पहले से ही शामिल है। यदि हम गेहूं (20 रु.) + आटा (25 रु.) + बिस्कुट (80 रु.) सबको अलग-अलग जोड़ेंगे तो एक ही वस्तु के मूल्य की बार-बार 'दोहरी गणना' हो जाएगी जो पूरी तरह गलत होगी।

2.2 सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product - GDP) की परिभाषा

सकल घरेलू उत्पाद (GDP): किसी विशेष वर्ष में किसी देश के भीतर तीनों क्षेत्रकों (प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक) द्वारा उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल मौद्रिक मूल्य के योगफल को उस देश का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) कहते हैं। यह देश की कुल आर्थिक शक्ति और उत्पादन क्षमता को दर्शाता है। भारत में इसका मापन केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (CSO) करता है।

3. भारत में तृतीयक क्षेत्रक का बढ़ता महत्व एवं रोजगार की विसंगति

3.1 1973-74 से 2013-14: तृतीयक क्षेत्रक के प्रमुख बनने के कारण

पिछले 40 वर्षों में भारत में तीनों क्षेत्रकों के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई है, परंतु सबसे अधिक वृद्धि तृतीयक (सेवा) क्षेत्रक में हुई है। आज यह भारत का सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्रक बन चुका है। इसके चार प्रमुख कारण हैं:

  1. बुनियादी सेवाओं की अनिवार्यता: किसी भी विकासशील देश में अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान, डाक एवं तार सेवा, पुलिस स्टेशन, कचहरी, ग्रामीण प्रशासनिक कार्यालय, नगर निगम, रक्षा, परिवहन, बैंक और बीमा कंपनियों जैसी बुनियादी सेवाओं के प्रबंधन की जिम्मेदारी सरकार को उठानी पड़ती है।
  2. कृषि एवं उद्योग का विकास: कृषि और विनिर्माण के विकास से परिवहन, भंडारण और व्यापार जैसी सहायक सेवाओं की मांग तेजी से बढ़ती है। प्राथमिक व द्वितीयक क्षेत्रक जितने विकसित होंगे, सेवाओं की मांग उतनी ही अधिक होगी।
  3. आय स्तर में वृद्धि: जब नागरिकों की आय बढ़ती है, तो वे बाहर खाना (रेस्तरां), पर्यटन, खरीदारी (शॉपिंग मॉल्स), निजी अस्पताल, निजी स्कूल और व्यावसायिक प्रशिक्षण जैसी कई अतिरिक्त सेवाओं की मांग करने लगते हैं।
  4. सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (IT) क्रांति: विगत दो दशकों में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी पर आधारित नई सेवाओं (सॉफ्टवेयर, कॉल सेंटर, डेटा प्रोसेसिंग) का तेजी से प्रसार हुआ है और इन सेवाओं के उत्पादन और निर्यात में भारी उछाल आया है।

3.2 भारत की रोजगार विसंगति (अधिकांश लोग कहाँ नियोजित हैं?)

यद्यपि GDP में सबसे बड़ा हिस्सा (60% से अधिक) तृतीयक क्षेत्रक का है, परंतु रोजगार के मोर्चे पर ऐसा नाटकीय बदलाव नहीं हुआ:

क्षेत्रकGDP में हिस्सेदारी (लगभग)रोजगार में हिस्सेदारी (लगभग)आर्थिक विसंगति
प्राथमिक क्षेत्रक (कृषि)मात्र 15% से 18%लगभग 45% से 48%उत्पादन में बहुत कम योगदान, लेकिन देश की आधी आबादी इसी में फंसी है।
द्वितीयक क्षेत्रक (उद्योग)लगभग 25% से 28%लगभग 20% से 22%उद्योगों में उत्पादन 9 गुना बढ़ा, परंतु रोजगार केवल 3 गुना बढ़ा।
तृतीयक क्षेत्रक (सेवाएं)60% से अधिकलगभग 30% से 32%सेवाओं में उत्पादन 14 गुना बढ़ा, परंतु रोजगार केवल 5 गुना बढ़ा।

4. प्रच्छन्न बेरोजगारी एवं अतिरिक्त रोजगार का सृजन (मनरेगा 2005)

4.1 प्रच्छन्न / अल्प बेरोजगारी (Disguised Unemployment)

भारत के कृषि क्षेत्रक में लाखों लोग अल्प-रोजगार (Underemployment) की स्थिति में हैं जिसे 'प्रच्छन्न बेरोजगारी' या 'छिपी हुई बेरोजगारी' कहा जाता है:

लक्षण एवं परिभाषा:
यह वह स्थिति है जहाँ लोग प्रत्यक्ष रूप से काम करते दिखाई देते हैं, परंतु उन सभी से उनकी पूरी क्षमता से कम काम लिया जाता है। यदि इनमें से कुछ व्यक्तियों को काम से हटा भी दिया जाए, तो कुल उत्पादन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता!
उदाहरण (लक्ष्मीनंदन परिवार): किसान लक्ष्मी के पास दो हेक्टेयर असिंचित भूमि है। परिवार के सभी 5 सदस्य उसी खेत में काम करते हैं। वास्तव में उस खेत पर केवल 2 लोगों के श्रम की आवश्यकता है; बाकी 3 सदस्य केवल काम बंटा रहे हैं। यदि इन 3 सदस्यों को खेत से हटाकर किसी कारखाने या सड़क निर्माण में काम पर लगा दिया जाए, तो परिवार की कुल आय बढ़ जाएगी और खेत के उत्पादन में कोई कमी नहीं आएगी।

4.2 अतिरिक्त रोजगार के सृजन के उपाय

  • सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध कराना: किसानों को कुएं, नलकूप और नहरों के निर्माण हेतु ऋण देना ताकि वे साल में दूसरी (रबी) फसल भी उगा सकें और अधिक लोगों को काम मिले।
  • परिवहन और भंडारण में निवेश: पक्की सड़कें और शीतगृह (Cold storage) बनाकर किसानों को फसल बेचने की सुविधा देना जिससे परिवहन व व्यापार में नौकरियां बढ़ें।
  • अर्ध-ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों की स्थापना: दलहन मिलें, शहद संग्रह केंद्र, और आलू-टमाटर प्रसंस्करण इकाइयां खोलना।
  • शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र का विस्तार: योजना आयोग (नीति आयोग) के अनुसार अकेले शिक्षा क्षेत्र में 20 लाख नए रोजगार सृजित किए जा सकते हैं। पर्यटन और क्षेत्रीय हस्तशिल्प में प्रतिवर्ष 35 लाख से अधिक नए रोजगार पैदा हो सकते हैं।

4.3 महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा 2005)

केंद्र सरकार ने देश के लगभग 625 जिलों में 'काम का अधिकार' (Right to Work) लागू करने के लिए मनरेगा (MGNREGA 2005) कानून पारित किया:

मनरेगा 2005 के मुख्य प्रावधान:
1. 100 दिनों के रोजगार की कानूनी गारंटी: ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने के इच्छुक प्रत्येक वयस्क व्यक्ति को वर्ष में कम से कम 100 दिनों के अकुशल शारीरिक श्रम की गारंटी दी जाती है।
2. बेरोजगारी भत्ता: यदि आवेदन करने के 15 दिनों के भीतर सरकार काम उपलब्ध कराने में असमर्थ रहती है, तो वह दैनिक 'बेरोजगारी भत्ता' देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है।
3. महिलाओं के लिए आरक्षण: कुल रोजगार का एक-तिहाई (1/3) भाग महिलाओं के लिए आरक्षित है।
4. टिकाऊ परिसंपत्तियों का निर्माण: इसके तहत ऐसे कार्य कराए जाते हैं जो भविष्य में भूमि से उत्पादन बढ़ाने में मदद करें—जैसे जल संरक्षण, चेकडैम, तालाबों की खुदाई, और वृक्षारोपण।

5. संगठित बनाम असंगठित क्षेत्रक एवं सार्वजनिक बनाम निजी क्षेत्रक

5.1 संगठित क्षेत्रक बनाम असंगठित क्षेत्रक (कांता बनाम कमल)

तुलना का बिंदुसंगठित क्षेत्रक (Organised Sector - कांता)असंगठित क्षेत्रक (Unorganised Sector - कमल)
पंजीकरण एवं कानूनसरकारी नियमों एवं श्रम कानूनों (कारखाना अधिनियम, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम) के तहत पंजीकृत।सरकारी नियंत्रण से बाहर; नियमों व विनियमों का पालन नहीं होता।
रोजगार की सुरक्षानिश्चित रोजगार; नौकरी की पूरी सुरक्षा; नियुक्ति पत्र (Appointment Letter) दिया जाता है।रोजगार असुरक्षित; बिना किसी कारण के कभी भी काम से निकाला जा सकता है।
कार्य के घंटेकाम के घंटे निश्चित होते हैं; अतिरिक्त काम कराने पर ओवरटाइम (Overtime) वेतन मिलता है।काम के घंटे अनिश्चित और लंबे होते हैं; कोई अतिरिक्त वेतन नहीं मिलता।
वेतन एवं अन्य लाभनियमित मासिक वेतन, भविष्य निधि (PF), ग्रेच्युटी, सवेतन अवकाश (Paid Leave), पेंशन, और मुफ्त चिकित्सा सुविधाएं।कम दैनिक मजदूरी; छुट्टी लेने पर उस दिन का वेतन काट लिया जाता है; कोई PF, पेंशन या चिकित्सा लाभ नहीं।

5.2 असंगठित क्षेत्रक के श्रमिकों का संरक्षण कैसे हो?

असंगठित क्षेत्रक के श्रमिकों (खेतिहर मजदूर, हथकरघा बुनकर, ईंट-भट्ठा मजदूर, कबाड़ी, सिर पर बोझा ढोने वाले) को निम्नलिखित संरक्षण की आवश्यकता है:

  • ग्रामीण क्षेत्रों में: समय पर बीज, कृषि उपकरण और खाद की आपूर्ति; उचित ब्याज दर पर संस्थागत बैंक ऋण; और उपज की बिक्री के लिए भंडारण व बाजार की सुविधा।
  • शहरी क्षेत्रों में: लघु उद्योगों को कच्चा माल प्राप्त करने और तैयार माल के विपणन में सरकारी सहायता; न्यूनतम मजदूरी कानून का कड़ाई से प्रवर्तन; तथा स्वास्थ्य, दुर्घटना बीमा और वृद्धावस्था पेंशन की सामाजिक सुरक्षा।

5.3 स्वामित्व के आधार पर: सार्वजनिक बनाम निजी क्षेत्रक

  • सार्वजनिक क्षेत्रक (Public Sector): परिसंपत्तियों पर सरकार का स्वामित्व होता है और सरकार ही सभी सेवाएं उपलब्ध कराती है। इसका मुख्य उद्देश्य अधिकतम सामाजिक कल्याण (Social Welfare) होता है, केवल लाभ कमाना नहीं। उदाहरण: भारतीय रेलवे, डाकघर, BHEL, SAIL।
  • निजी क्षेत्रक (Private Sector): परिसंपत्तियों पर स्वामित्व और सेवाओं के वितरण की जिम्मेदारी निजी व्यक्तियों या कंपनियों के हाथों में होती है। इसका मुख्य उद्देश्य अधिकतम लाभ (Profit) कमाना होता है। उदाहरण: टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO), रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL)।
  • सरकार द्वारा भारी निवेश की आवश्यकता: सड़कें, पुल, रेलवे, बंदरगाह, बिजली संयंत्र और बांध जैसी विशाल बुनियादी परियोजनाओं में इतनी भारी पूंजी लगती है जो निजी क्षेत्र के बस की बात नहीं होती। साथ ही निजी कंपनियां इनके लिए भारी कीमतें वसूलेंगी; अतः जनहित में सरकार स्वयं भारी खर्च करके ये सेवाएं सबको सुलभ कराती है।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

सकल घरेलू उत्पाद (GDP)
एक वर्ष में तीनों क्षेत्रकों द्वारा उत्पादित अंतिम वस्तुओं व सेवाओं का कुल मौद्रिक मूल्य।
अंतिम वस्तुएं
सीधे उपभोक्ता द्वारा उपयोग की जाने वाली वस्तुएं; मध्यवर्ती वस्तुओं की दोहरी गणना से बचाव।
प्राथमिक क्षेत्रक
प्राकृतिक संसाधनों का सीधा दोहन (कृषि, डेयरी, वानिकी, मत्स्यन, खनन)।
द्वितीयक क्षेत्रक
विनिर्माण उद्योग; प्राकृतिक उत्पादों को अन्य उपयोगी रूपों में बदलना (कपास से कपड़ा)।
तृतीयक क्षेत्रक (सेवा)
उत्पादन में सहायक सेवाएं (परिवहन, बैंक, संचार, शिक्षा, स्वास्थ्य, IT)।
प्रच्छन्न बेरोजगारी
छिपी हुई बेरोजगारी; आवश्यकता से अधिक श्रमिक लगे होना; हटाने पर भी उत्पादन अप्रभावित।
मनरेगा 2005
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम; 100 दिनों के काम की कानूनी गारंटी।
1/3 महिला आरक्षण
मनरेगा 2005 के तहत कुल रोजगार का एक-तिहाई भाग महिलाओं हेतु आरक्षित।
15 दिन व बेरोजगारी भत्ता
मनरेगा में 15 दिनों में काम न मिलने पर सरकार द्वारा दैनिक बेरोजगारी भत्ता देय।
संगठित क्षेत्रक
सरकारी नियमों में पंजीकृत, नौकरी की सुरक्षा, निश्चित घंटे, PF, सवेतन अवकाश, पेंशन।
सार्वजनिक क्षेत्रक
सरकार का स्वामित्व व नियंत्रण (रेलवे, डाक); मुख्य ध्येय सामाजिक जन-कल्याण।
निजी क्षेत्रक
निजी व्यक्तियों का स्वामित्व (TISCO, रिलायंस); मुख्य ध्येय अधिकतम मुनाफा कमाना।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
अर्थव्यवस्था के प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रकों की सोदाहरण व्याख्या कीजिए। ये तीनों क्षेत्रक एक-दूसरे पर किस प्रकार निर्भर हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
आर्थिक गतिविधियों को उनकी प्रकृति के आधार पर तीन प्रमुख क्षेत्रकों में बांटा जाता है:

1. प्राथमिक क्षेत्रक (Primary Sector): इसमें वे गतिविधियाँ आती हैं जो सीधे प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके वस्तुएं उत्पन्न करती हैं। जैसे: कृषि (कपास, गेहूं उगाना), डेयरी (दूध उत्पादन), वानिकी, मत्स्य पालन और खनन। इसे 'कृषि एवं सहायक क्षेत्रक' भी कहते हैं।
2. द्वितीयक क्षेत्रक (Secondary Sector): इसमें विनिर्माण (Manufacturing) द्वारा प्राथमिक क्षेत्रक से प्राप्त कच्चे माल को अधिक मूल्यवान वस्तुओं में बदला जाता है। जैसे: गन्ने से चीनी बनाना, कपास से सूत व कपड़ा बुनना, लोहे से मशीनें बनाना। इसे 'औद्योगिक क्षेत्रक' भी कहते हैं।
3. तृतीयक क्षेत्रक (Tertiary Sector): यह क्षेत्रक स्वयं किसी भौतिक वस्तु का उत्पादन नहीं करता, बल्कि प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रकों के सुचारू संचालन में सहायक सेवाएं प्रदान करता है। जैसे: परिवहन (ट्रक, रेल), बैंक, बीमा, गोदाम, संचार, शिक्षक, डॉक्टर आदि। इसे 'सेवा क्षेत्रक' भी कहते हैं。

परस्पर निर्भरता:
ये तीनों क्षेत्रक एक दूसरे के पूरक हैं। उदाहरणार्थ, किसान कपास उगाता है (प्राथमिक); ट्रक ड्राइवर उस कपास को मंडी और कपड़ा मिल तक पहुंचाता है (तृतीयक); कपड़ा मिल उस कपास से सूती वस्त्र तैयार करती है (द्वितीयक); और फिर बैंक तथा थोक व्यापारी उस कपड़े को बाजार में बेचते हैं (तृतीयक)। यदि इनमें से एक भी कड़ी टूट जाए, तो पूरी आर्थिक व्यवस्था ठप हो जाएगी।
उदाहरण 2
सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की गणना करते समय केवल 'अंतिम वस्तुओं और सेवाओं' के मूल्य को ही क्यों शामिल किया जाता है? एक उपयुक्त उदाहरण देकर समझाइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
अंतिम वस्तुओं की गणना का कारण:
सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की गणना में केवल 'अंतिम वस्तुओं और सेवाओं' (जो सीधे अंतिम उपभोक्ता द्वारा उपभोग की जाती हैं) के मूल्य को ही जोड़ा जाता है, ताकि 'दोहरी गणना की त्रुटि' (Double Counting) से बचा जा सके। मध्यवर्ती वस्तुओं का मूल्य अंतिम वस्तु के मूल्य में पहले से ही समाहित होता है。

उदाहरण द्वारा स्पष्टीकरण:
मान लीजिए एक किसान 20 रु. प्रति किलोग्राम की दर से गेहूं एक आटा मिल मालिक को बेचता है। आटा मिल वाला उस गेहूं को पीसकर 25 रु. प्रति किग्रा की दर से एक बिस्कुट निर्माता कंपनी को बेचता है। बिस्कुट कंपनी उस आटे में चीनी और तेल मिलाकर बिस्कुट के 4 पैकेट बनाती है और बाजार में अंतिम उपभोक्ताओं को 80 रु. (20 रु. प्रति पैकेट) में बेचती है।

यहाँ बिस्कुट 'अंतिम उत्पाद' है। बिस्कुट के अंतिम खुदरा मूल्य 80 रु. में गेहूं (20 रु.), आटा (25 रु.), चीनी और निर्माण की लागत पहले से ही पूरी तरह जुड़ी हुई है।
यदि हम गेहूं के 20 रु. + आटे के 25 रु. + बिस्कुट के 80 रु. सबको अलग-अलग जोड़ेंगे, तो कुल मूल्य 125 रु. हो जाएगा, जो कि बिल्कुल गलत होगा क्योंकि इसमें गेहूं और आटे के मूल्य को तीन बार गिन लिया गया। अतः केवल अंतिम वस्तु (बिस्कुट = 80 रु.) को ही GDP में शामिल किया जाता है।
उदाहरण 3
पिछले 40 वर्षों में भारत में 'तृतीयक (सेवा) क्षेत्रक' सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्रक बनकर क्यों उभरा है? इसके पीछे उत्तरदायी चार प्रमुख कारणों का विश्लेषण कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
1973-74 से 2013-14 के बीच 40 वर्षों में भारत के GDP में तृतीयक क्षेत्रक का योगदान सबसे अधिक बढ़ा है। इसके चार प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

1. बुनियादी और अनिवार्य सेवाओं का विस्तार: किसी भी विकासशील देश में नागरिकों के कल्याण हेतु कई बुनियादी सेवाओं—जैसे अस्पताल, प्राथमिक व उच्च शिक्षण संस्थान, डाक एवं तार, पुलिस स्टेशन, कचहरी, नगर निगम, रक्षा, बैंक और बीमा—का प्रबंधन सरकार को करना पड़ता है। इनके विस्तार से सेवा क्षेत्रक बहुत बड़ा हो गया है।
2. कृषि और उद्योग का तीव्र विकास: जैसे-जैसे प्राथमिक (कृषि) और द्वितीयक (उद्योग) क्षेत्रकों में उत्पादन बढ़ता है, वैसे-वैसे कच्चे माल और तैयार माल को ढोने के लिए परिवहन (रेल, ट्रक), रखने के लिए गोदामों (भंडारण) और बेचने के लिए व्यापार व बैंकिंग की मांग स्वतः कई गुना बढ़ जाती है।
3. जनता के आय स्तर में वृद्धि: उदारीकरण और आर्थिक विकास के बाद मध्यम वर्ग की आय में भारी वृद्धि हुई है। अधिक आय वाले लोग अब बाहर खाना (रेस्तरां), पर्यटन, शॉपिंग, निजी अस्पताल, निजी स्कूल और मनोरंजन जैसी नई-नई सेवाओं पर खुलकर खर्च करने लगे हैं।
4. सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (IT) क्रांति: विगत दो दशकों में इंटरनेट, सॉफ्टवेयर, मोबाइल टेलीकॉम, बीपीओ (कॉल सेंटर्स) और डेटा प्रबंधन जैसी सूचना आधारित सेवाओं का पूरे भारत में विस्फोटक विस्तार हुआ है जिसने वैश्विक स्तर पर खरबों डॉलर का कारोबार खड़ा किया है।
उदाहरण 4
प्रच्छन्न बेरोजगारी (अल्प-रोजगार) से क्या तात्पर्य है? शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों से इसके दो-दो उदाहरण दीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
प्रच्छन्न बेरोजगारी का अर्थ:
प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment) को 'छिपी हुई बेरोजगारी' भी कहा जाता है। यह वह स्थिति है जिसमें लोग प्रत्यक्ष रूप से काम करते हुए दिखाई देते हैं, परंतु वास्तव में वे अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर रहे होते हैं। यदि इनमें से कुछ अतिरिक्त श्रमिकों को काम से हटा भी दिया जाए, तो कुल उत्पादन में कोई गिरावट नहीं आती (अर्थात इन अतिरिक्त श्रमिकों की सीमांत उत्पादकता शून्य होती है)।

ग्रामीण क्षेत्र के उदाहरण:
1. पारिवारिक खेती: एक छोटे किसान के पास दो एकड़ जमीन है। उस जमीन पर केवल दो लोगों के श्रम की जरूरत है, लेकिन परिवार के सभी 5 सदस्य उसी खेत पर काम करते हैं। वे तीनों अतिरिक्त सदस्य प्रच्छन्न रूप से बेरोजगार हैं।
2. मौसमी कृषि मजदूर: बुवाई और कटाई के समय तो मजदूरों को काम मिलता है, लेकिन साल के बाकी महीनों में वे नाममात्र के काम में लगे रहते हैं。

शहरी क्षेत्र के उदाहरण:
1. सेवा क्षेत्र के अनौपचारिक कामगार: शहरों में हजारों प्लंबर, बढ़ई, पेंटर और मरम्मत करने वाले मजदूर रोज सुबह चौराहों (मजदूर मंडियों) पर खड़े होते हैं। वे पूरा दिन काम ढूंढते हैं लेकिन कई दिनों तक उन्हें कोई काम नहीं मिलता या वे आधा-अधूरा काम करते हैं।
2. ठेले और फेरीवाले: सड़कों पर ठेला खींचने वाले या सामान बेचने वाले लोग जो दिन भर घूमकर पसीना बहाते हैं लेकिन शाम को बहुत ही कम कमाई कर पाते हैं; वे यह काम इसलिए करते हैं क्योंकि उनके पास कोई बेहतर विकल्प नहीं है।
उदाहरण 5
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा 2005) के प्रमुख उद्देश्यों और प्रावधानों की व्याख्या कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता उन्मूलन और रोजगार सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने 2005 में 'काम का अधिकार' (Right to Work) के तहत मनरेगा (MGNREGA 2005) लागू किया। इसके प्रमुख प्रावधान निम्न हैं:

1. 100 दिनों के रोजगार की कानूनी गारंटी: ग्रामीण क्षेत्र के प्रत्येक परिवार के वयस्क सदस्यों को, जो अकुशल शारीरिक श्रम करने के इच्छुक हैं, एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 100 दिनों के रोजगार की गारंटी दी जाती है।
2. बेरोजगारी भत्ते का कानूनी अधिकार: यदि किसी पंजीकृत ग्रामीण को आवेदन करने के 15 दिनों के भीतर सरकार काम उपलब्ध कराने में विफल रहती है, तो आवेदक को पहले दिन से ही दैनिक 'बेरोजगारी भत्ता' पाने का कानूनी अधिकार होता है।
3. महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण: योजना के तहत सृजित कुल रोजगार का कम से कम एक-तिहाई (33%) हिस्सा महिलाओं के लिए आरक्षित किया गया है, जिससे महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा मिला है।
4. कार्यस्थल पर बुनियादी सुविधाएं: कार्यस्थल पर पीने का स्वच्छ पानी, छाया, प्राथमिक चिकित्सा पेटी और यदि 5 वर्ष से छोटे बच्चे हों तो उनकी देखभाल हेतु पालनाघर (Crèche) की व्यवस्था अनिवार्य है।
5. टिकाऊ ग्रामीण संपत्तियों का निर्माण: मनरेगा में केवल गड्ढे नहीं खोदे जाते, बल्कि ऐसे कार्य कराए जाते हैं जो भविष्य में सूखे और अकाल से निपटने तथा भूमि की उत्पादकता बढ़ाने में मदद करें—जैसे जल संचयन, चेकडैम, तालाबों का जीर्णोद्धार, नहरों की सफाई और वृक्षारोपण।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

तृतीयक क्षेत्रक को केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

तृतीयक (सेवा) क्षेत्रक में सरकारी और निजी दोनों प्रकार की सेवाएं शामिल हैं, जैसे निजी डॉक्टर, वकील, धोबी, नाई, बैंक कर्मी, ट्रांसपोर्टर और सॉफ्टवेयर इंजीनियर।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

GDP की गणना में सभी उत्पादित वस्तुओं (कच्चा माल + तैयार माल) के मूल्यों को जोड़ना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

GDP में केवल 'अंतिम वस्तुओं और सेवाओं' का मूल्य जोड़ा जाता है। यदि कच्चे माल या मध्यवर्ती वस्तुओं को जोड़ेंगे तो 'दोहरी गणना' हो जाएगी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

प्रच्छन्न बेरोजगारी को खुली बेरोजगारी (Open Unemployment) के समान मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

खुली बेरोजगारी में व्यक्ति के पास बिल्कुल कोई काम नहीं होता और वह स्पष्ट बेरोजगार दिखता है। प्रच्छन्न बेरोजगारी में व्यक्ति काम करता दिखता है परंतु उसकी सीमांत उत्पादकता शून्य होती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

मनरेगा 2005 को शहरी क्षेत्रों की योजना समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मनरेगा मुख्य रूप से 'ग्रामीण क्षेत्रों' के अकुशल श्रमिकों के लिए 100 दिनों के रोजगार की कानूनी गारंटी योजना है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सार्वजनिक क्षेत्रक का मुख्य उद्देश्य केवल लाभ कमाना लिख देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सार्वजनिक क्षेत्रक (Public Sector) का मुख्य उद्देश्य 'जन कल्याण और सामाजिक सेवाएं' प्रदान करना होता है; जबकि निजी क्षेत्रक (Private Sector) का मुख्य उद्देश्य 'लाभ कमाना' होता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक: GDP योगदान, रोजगार विसंगति एवं मनरेगा 2005

भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक: GDP, प्रच्छन्न बेरोजगारी एवं मनरेगा 20051. तीन क्षेत्रक व GDPप्राकृतिक से सेवा तक• प्राथमिक: कृषि, डेयरी, खनन• द्वितीयक: विनिर्माण व उद्योग• तृतीयक: सेवाएं (बैंक, IT, रेल)• केवल अंतिम वस्तुएं:दोहरी गणना से बचाव (बिस्कुट)• GDP = अंतिम वस्तुओं का योग• तीनों क्षेत्रक परस्पर निर्भर2. सेवा क्षेत्रक व विसंगतिGDP 60%+ बनाम कृषि रोजगार• सेवा क्षेत्रक उछाल के कारण:बुनियादी सेवाएं, कृषि-उद्योग विकास,आय वृद्धि व IT संचार क्रांति• रोजगार विसंगति:GDP में सेवा 60%+, पर रोजगार मेंकृषि 45%+ (आधे लोग फंसे हैं)• प्रच्छन्न बेरोजगारी:खेतों में अतिरिक्त लोग (लक्ष्मी परिवार)हटाने पर भी उत्पादन में कमी नहीं3. मनरेगा व संगठित क्षेत्रकाम का अधिकार व सुरक्षा• मनरेगा 2005 (Right to Work):100 दिनों के रोजगार की गारंटी15 दिन में काम नहीं = बेरोजगारी भत्ता1/3 रोजगार महिलाओं हेतु आरक्षित• संगठित (कांता):निश्चित घंटे, PF, पेंशन, सवेतन अवकाश• असंगठित (कमल):असुरक्षित नौकरी, कोई अवकाश नहीं• सार्वजनिक (रेल) vs निजी (TISCO)बोर्ड परीक्षा के प्रमुख संप्रत्यय (Golden Economics Capsule)अंतिम वस्तुएं (GDP):उपभोक्ता तक पहुंचने वाला माल; मध्यवर्ती वस्तुओं की दोहरी गणना से बचाव।प्रच्छन्न बेरोजगारी:खेतों में आवश्यकता से अधिक लोग; कुछ को हटाने पर भी उत्पादन पर कोई असर नहीं।मनरेगा 2005:100 दिन के अकुशल काम की कानूनी गारंटी; 1/3 महिला आरक्षण व बेरोजगारी भत्ता।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
आर्थिक गतिविधियों को तीन क्षेत्रकों में बांटा जाता है: प्राथमिक (कृषि व प्राकृतिक), द्वितीयक (औद्योगिक विनिर्माण), और तृतीयक (सेवाएं)।
मुख्य बिंदु 2
सकल घरेलू उत्पाद (GDP) एक वर्ष में तीनों क्षेत्रकों द्वारा उत्पादित सभी 'अंतिम वस्तुओं और सेवाओं' का कुल मौद्रिक मूल्य है।
मुख्य बिंदु 3
मध्यवर्ती वस्तुओं के मूल्य को अलग से नहीं जोड़ा जाता ताकि दोहरी गणना की गलती से बचा जा सके।
मुख्य बिंदु 4
विगत 40 वर्षों में बुनियादी सेवाओं के विस्तार, आय वृद्धि और IT क्रांति के कारण तृतीयक क्षेत्रक GDP का सबसे बड़ा क्षेत्रक बन गया है।
मुख्य बिंदु 5
उत्पादन में तृतीयक क्षेत्रक का 60%+ हिस्सा होने के बावजूद रोजगार में आज भी लगभग 45% लोग प्राथमिक (कृषि) क्षेत्रक में लगे हैं।
मुख्य बिंदु 6
कृषि में 'प्रच्छन्न बेरोजगारी' पाई जाती है, जहाँ जरूरत से ज्यादा लोग लगे हैं और कुछ को हटाने पर भी उत्पादन अप्रभावित रहता है।
मुख्य बिंदु 7
मनरेगा (MGNREGA 2005) के तहत ग्रामीण वयस्कों को 100 दिनों के अकुशल काम की कानूनी गारंटी दी जाती है (1/3 महिलाओं हेतु आरक्षित)।
मुख्य बिंदु 8
संगठित क्षेत्रक में सरकारी नियमों का पालन, नौकरी की सुरक्षा, निश्चित घंटे, PF और सवेतन अवकाश होता है; असंगठित में ये सुविधाएं नहीं होतीं।
मुख्य बिंदु 9
सार्वजनिक क्षेत्रक (रेलवे, डाक) का मुख्य उद्देश्य सामाजिक कल्याण है; जबकि निजी क्षेत्रक (TISCO, रिलायंस) का उद्देश्य लाभ कमाना है।
मुख्य बिंदु 10
सिंचाई, ग्रामीण सड़कों, कोल्ड स्टोरेज और सस्ते संस्थागत ऋण से कृषि में नए रोजगार पैदा किए जा सकते हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की गणना में केवल 'अंतिम वस्तुओं' के मूल्य को ही क्यों शामिल किया जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि अंतिम वस्तु (जैसे बिस्कुट) के मूल्य में सभी मध्यवर्ती वस्तुओं (जैसे गेहूं, आटा, चीनी) का मूल्य पहले से ही शामिल होता है। यदि मध्यवर्ती वस्तुओं को अलग से जोड़ेंगे तो 'दोहरी गणना' हो जाएगी।
2
प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment) किसे कहते हैं? एक कृषि उदाहरण दीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: जब किसी कार्य में आवश्यकता से अधिक लोग लगे होते हैं और यदि उनमें से कुछ लोगों को काम से हटा भी दिया जाए तब भी कुल उत्पादन पर कोई असर नहीं पड़ता, तो उसे प्रच्छन्न बेरोजगारी कहते हैं (उदा: 2 एकड़ के खेत में 2 की जगह परिवार के 5 सदस्यों का काम करना)।
3
मनरेगा 2005 (MGNREGA) के किन्हीं दो मुख्य कानूनी प्रावधानों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
  1. ग्रामीण परिवारों को वर्ष में कम से कम 100 दिनों के अकुशल काम की कानूनी गारंटी (काम न मिलने पर बेरोजगारी भत्ता देय)। 2. कुल रोजगार का एक-तिहाई (1/3) भाग महिलाओं के लिए आरक्षित।

4
संगठित क्षेत्रक और असंगठित क्षेत्रक में काम करने वाले श्रमिकों की कार्य दशाओं में दो प्रमुख अंतर बताइए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
  1. संगठित क्षेत्रक में काम के घंटे निश्चित होते हैं, नौकरी सुरक्षित होती है और सवेतन अवकाश मिलता है। 2. असंगठित क्षेत्रक में रोजगार असुरक्षित होता है, काम के घंटे लंबे होते हैं और छुट्टी लेने पर उस दिन का वेतन काट लिया जाता है।

5
सार्वजनिक क्षेत्रक (Public Sector) और निजी क्षेत्रक (Private Sector) के मुख्य उद्देश्यों में क्या बुनियादी अंतर है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: सार्वजनिक क्षेत्रक (उदा: रेलवे) का मुख्य उद्देश्य अधिक से अधिक सामाजिक जन-कल्याण करना होता है; जबकि निजी क्षेत्रक (उदा: TISCO) का मुख्य उद्देश्य केवल अपना व्यावसायिक लाभ (मुनाफा) कमाना होता है।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
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कक्षा 10 Social Science के सभी अध्याय

अध्याय 1: यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय अध्याय 2: भारत में राष्ट्रवाद अध्याय 3: भूमंडलीकृत विश्व का बनना अध्याय 4: औद्योगिकीकरण का युग अध्याय 5: मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया अध्याय 6: संसाधन एवं विकास अध्याय 7: वन एवं वन्यजीव संसाधन अध्याय 8: जल संसाधन अध्याय 9: कृषि अध्याय 10: खनिज तथा ऊर्जा संसाधन अध्याय 11: विनिर्माण उद्योग अध्याय 12: राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की जीवन रेखाएँ अध्याय 13: सत्ता की साझेदारी (Power-sharing) अध्याय 14: संघवाद (Federalism) अध्याय 15: लिंग, धर्म और जाति अध्याय 16: राजनीतिक दल (Political Parties) अध्याय 17: लोकतंत्र के परिणाम अध्याय 18: विकास (Development) अध्याय 19: भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक अध्याय 20: मुद्रा और साख अध्याय 21: वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था अध्याय 22: उपभोक्ता अधिकार

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