1.1 श्रम का लैंगिक विभाजन (Sexual Division of Labour)
जैविक बनाम सामाजिक बनावट: यह श्रम विभाजन किसी प्राकृतिक या जैविक अंतर पर आधारित नहीं है, बल्कि यह केवल सामाजिक अपेक्षाओं और रूढ़िवादिता की देन है। जब इन्हीं घरेलू कामों के पैसे मिलते हैं तो पुरुष भी इन्हें खुशी-खुशी करने लगते हैं—जैसे होटलों में अधिकांश रसोइए (शेफ) और दर्जी पुरुष होते हैं!
1.2 पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव के प्रमुख रूप
हमारा समाज आज भी एक पितृसत्तात्मक समाज (Patriarchal Society) है, जिसमें पुरुषों का वर्चस्व और महिलाओं का गौण स्थान होता है। महिलाओं के साथ भेदभाव निम्नलिखित रूपों में दिखता है:
- 1. साक्षरता दर में विषमता: महिलाओं में साक्षरता दर मात्र 54% है जबकि पुरुषों में यह 76% है। माता-पिता बालकों की उच्च शिक्षा पर खुलकर खर्च करते हैं परंतु बालिकाओं को स्कूल की पढ़ाई के बाद घर बैठा लेते हैं।
- 2. उच्च वेतन वाले पदों पर उपेक्षा: भारत में औसतन एक महिला एक पुरुष की तुलना में रोजाना एक घंटा अधिक काम करती है, फिर भी उच्च वेतन और सम्मानजनक पदों पर महिलाओं का प्रतिशत नगण्य है।
- 3. समान पारिश्रमिक अधिनियम (Equal Remuneration Act 1976) की अवहेलना: कानूनन समान काम के लिए समान वेतन अनिवार्य है, फिर भी खेल, सिनेमा, कृषि और निर्माण क्षेत्रों में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी दी जाती है।
- 4. बाल लिंगानुपात एवं कन्या भ्रूण हत्या: बेटे की चाह में लिंग परीक्षण कराकर गर्भ में ही बच्चियों को मार दिया जाता है। इसके कारण देश का बाल लिंगानुपात (Sex Ratio) गिरकर प्रति 1,000 बालकों पर मात्र 919 बालिकाएं रह गया है (पंजाब व हरियाणा के कई जिलों में यह 850 से भी कम है)।
- 5. घरेलू हिंसा और असुरक्षा: महिलाओं का घर के भीतर और बाहर कार्यस्थल पर शारीरिक, मानसिक उत्पीड़न और यौन शोषण आम बात है।