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CBSE • कक्षा X • Social Science • अध्याय 8
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

जल संसाधन

जल एक अत्यंत अमूल्य, नवीकरण योग्य प्राकृतिक संसाधन है। यद्यपि पृथ्वी का तीन-चौथाई धरातल जल से ढका हुआ है, परंतु इसमें से 96.5% जल महासागरों में खारे पानी के रूप में है और केवल 2.5% जल ही अलवणीय (मीठा/ताजा) जल है। अलवणीय जल का लगभग 70% भाग अंटार्कटिका, ग्रीनलैंड और पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ की चादरों व हिमानियों के रूप में जमा है, और 30% से भी कम भाग भूमिगत जल (Groundwater) के रूप में मानव उपयोग हेतु उपलब्ध है। भारत में विश्व की कुल वृष्टि (वर्षा) का लगभग 4% भाग प्राप्त होता है, परंतु प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता की दृष्टि से भारत का विश्व में 133वां स्थान है। बढ़ती जनसंख्या, अनियंत्रित औद्योगिकीकरण, अत्यधिक भूजल दोहन और रासायनिक प्रदूषण ने देश के सामने 'जल दुर्लभता' (Water Scarcity) का गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। स्वतंत्रता के बाद देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं (जैसे भाखड़ा नांगल, हीराकुंड, सरदार सरोवर) का निर्माण किया गया, जिन्हें पं. जवाहरलाल नेहरू ने गर्व से 'आधुनिक भारत के मंदिर' कहा था। परंतु इन बांधों ने स्थानीय लोगों के विस्थापन, वनों के जलमग्न होने और पारिस्थितिक असंतुलन को भी जन्म दिया, जिसके विरोध में 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' और 'टिहरी बांध आंदोलन' जैसे जनसंघर्ष उभरे। इस अध्याय में हम जल संकट, बहुउद्देशीय परियोजनाओं के लाभ व हानियां, तथा जल संरक्षण की प्राचीन व आधुनिक तकनीकों—विशेष रूप से राजस्थान के 'टांका' (पार्लर पानी), 'खादीन' व 'जोहड़', पश्चिमी हिमालय की 'गुल व कुल', मेघालय की 'बांस ड्रिप सिंचाई प्रणाली', और तमिलनाडु में कानूनी रूप से अनिवार्य 'छत वर्षा जल संचयन' (Rooftop Rainwater Harvesting) का गहन, प्रामाणिक और परीक्षा-उन्मुख अध्ययन करेंगे।

क्या 2025 तक भारत का एक बड़ा हिस्सा जल विहीन हो जाएगा?

संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक जल रिपोर्ट के अनुसार 2025 तक दुनिया के 200 करोड़ लोग भयंकर जल संकट में जीने को मजबूर होंगे, और भारत का एक विशाल भूभाग भी इस कतार में खड़ा है! राजस्थान के तपते थार में महिलाएं आज भी पानी का एक मटका भरने के लिए रोज 10 किलोमीटर पैदल चलती हैं। दूसरी ओर, हमारे शहरों में भूमिगत जल स्तर पाताल में जा चुका है। लेकिन हमारे पूर्वजों के पास ऐसे चमत्कारिक तरीके थे—जैसे छत से टपकने वाली एक-एक बूंद को भूमिगत टांकों में सालों-साल सहेज कर 'पार्लर पानी' बनाना, या मेघालय में बांस की नलियों से पानी टपकाना! आइए जानें कि कैसे पानी की हर बूंद को बचाकर हम अपना भविष्य सुरक्षित कर सकते हैं।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

CBSE एवं CBSE 10वीं बोर्ड परीक्षा में 'जल संसाधन' भूगोल का अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यावहारिक अध्याय है। जल दुर्लभता के गुणात्मक व मात्रात्मक कारण, बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं के पक्ष और विपक्ष में तर्क (नेहरू जी के 'आधुनिक भारत के मंदिर' बनाम नर्मदा बचाओ आंदोलन), तथा भारत की पारंपरिक वर्षा जल संचयन प्रणालियाँ (टांका, खादीन, जोहड़, गुल/कुल, बांस ड्रिप सिंचाई) पर 3 से 5 अंकों के विस्तृत प्रश्न प्रतिवर्ष पूछे जाते हैं। साथ ही, भारत के मानचित्र पर सलाल, भाखड़ा नांगल, टिहरी, राणा प्रताप सागर, सरदार सरोवर, हीराकुंड, नागार्जुन सागर और तुंगभद्रा बांधों को दर्शाना अनिवार्य होता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • जल चक्र (Hydrological Cycle) की प्रक्रिया (वाष्पीकरण, संघनन, वर्षण) की समझ।
  • धरातलीय जल (नदियां, झीलें) और भूमिगत जल (भौम जल) के बीच का अंतर।
  • सिंचाई के विभिन्न साधनों (नहरें, कुएं, नलकूप) का सामान्य ज्ञान।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • विश्व और भारत में जल संसाधनों के मात्रात्मक वितरण तथा जल दुर्लभता के कारणों का विश्लेषणात्मक मूल्यांकन करना।
  • बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं के बहुआयामी उद्देश्यों (सिंचाई, बिजली, बाढ़ नियंत्रण) और उनके पर्यावरणीय व सामाजिक दुष्प्रभावों की तुलना करना।
  • पंडित जवाहरलाल नेहरू के 'आधुनिक भारत के मंदिर' कथन और 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' के तर्कों का समालोचनात्मक परीक्षण करना।
  • भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में विकसित पारंपरिक वर्षा जल संचयन प्रणालियों (टांका, खादीन, जोहड़, गुल/कुल, बांस ड्रिप प्रणाली) की कार्यप्रणाली को समझना।
  • तमिलनाडु में छत वर्षा जल संचयन की कानूनी अनिवार्यता और आधुनिक शहरों में जल संरक्षण की रणनीतियों की व्याख्या करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. जल संसाधन: वैश्विक वितरण, भारत क...
2 2. बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएं:...
3 3. वर्षा जल संचयन: पारंपरिक प्रणालि...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. जल संसाधन: वैश्विक वितरण, भारत की स्थिति एवं जल दुर्लभता

1.1 जल की उपलब्धता: कुछ महत्वपूर्ण तथ्य एवं आंकड़े

जल एक नवीकरण योग्य प्राकृतिक संसाधन है जो निरंतर जलीय चक्र (Hydrological Cycle) के माध्यम से गतिशील और नवीकृत रहता है:

  • विश्व का 96.5% जल महासागरों में उपस्थित है जो अत्यधिक खारा (Saline) होने के कारण मानव उपयोग के योग्य नहीं है।
  • केवल 2.5% जल ही अलवणीय (मीठा/ताजा) जल है।
  • अलवणीय जल का लगभग 70% भाग अंटार्कटिका, ग्रीनलैंड और पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ की चादरों व हिमानियों के रूप में जमा है।
  • अलवणीय जल का 30% से भी कम भाग भौम जल (Groundwater) के रूप में भूमिगत जलभृतों (Aquifers) में संचित है।
  • भारत की स्थिति: भारत को विश्व की कुल वर्षा का लगभग 4% हिस्सा प्राप्त होता है। प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष जल उपलब्धता के मामले में भारत का विश्व में 133वां स्थान है। अनुमान है कि 2025 तक भारत का एक बड़ा हिस्सा पूर्ण जल अभाव की स्थिति में पहुंच जाएगा।

1.2 जल दुर्लभता (Water Scarcity) के प्रमुख कारण

जल दुर्लभता का अर्थ केवल पानी की कमी नहीं, बल्कि उपयोग योग्य जल का अभाव है। इसके दो मुख्य आयाम हैं:

आयामप्रमुख कारणप्रभाव एवं उदाहरण
1. मात्रात्मक कमी (Quantitative Shortage)• जनसंख्या विस्फोट: घरेलू उपयोग और अनाज उत्पादन हेतु जल की अत्यधिक मांग।
• कृषि में अति-दोहन: शुष्क ऋतु में भी नकदी फसलें उगाने हेतु नलकूपों द्वारा भूजल का अनियंत्रित दोहन, जिससे जल स्तर (Water Table) नीचे गिर रहा है।
• उद्योग व शहरीकरण: बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा विद्युत उत्पादन (भारत में 22% बिजली जल विद्युत से) और औद्योगिक प्रक्रियाओं में अत्यधिक जल का उपभोग।
शहरों में पानी के टैंकरों के लिए लंबी कतारें; कुओं और नलकूपों का सूखना।
2. गुणात्मक ह्रास (Qualitative Degradation)जल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने के बावजूद प्रदूषित होने के कारण मानव उपयोग के योग्य नहीं रह गया है:
• घरेलू सीवेज और कचरे का नदियों में निस्तारण।
• उद्योगों का अनुपचारित जहरीला रासायनिक अपशिष्ट।
• कृषि में अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और खरपतवारनाशकों का उपयोग जो रिसकर भूजल को विषाक्त बना देते हैं।
गंगा, यमुना जैसी प्रमुख नदियों का 'विषाक्त नालों' में बदल जाना; जल-जनित महामारियां।

2. बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएं: लाभ, हानियां एवं जन आंदोलन

2.1 बहुउद्देशीय परियोजनाएं क्या हैं? ('आधुनिक भारत के मंदिर')

जब किसी नदी पर एक विशाल बांध बनाकर एक साथ कई उद्देश्यों (सिंचाई, जल विद्युत, बाढ़ नियंत्रण, आदि) की पूर्ति की जाती है, तो उसे बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना (Multipurpose River Valley Project) कहते हैं।

'आधुनिक भारत के मंदिर' (Temples of Modern India): भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं को गर्व से 'आधुनिक भारत के मंदिर' कहा था। उनका मानना था कि इन परियोजनाओं के कारण कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का औद्योगिकीकरण और नगरीय अर्थव्यवस्था के साथ तीव्र समन्वित विकास होगा।

प्रमुख उद्देश्य एवं लाभ:

  1. सिंचाई: नहरों के माध्यम से सूखे क्षेत्रों में जल पहुंचाना।
  2. जल विद्युत उत्पादन: भारत की कुल विद्युत का लगभग 22% भाग जल विद्युत से प्राप्त होता है।
  3. बाढ़ नियंत्रण: अत्यधिक वर्षा के जल को जलाशयों में रोककर बाढ़ का शमन करना।
  4. अंतर्देशीय नौवहन, मत्स्य पालन और पर्यटन: झीलों में नौकायन, मछली पालन और मनोरंजक पर्यटन।

2.2 भारत की प्रमुख बहुउद्देशीय परियोजनाएं एवं नदियां

परियोजना / बांधनदीलाभान्वित प्रमुख राज्य / विशेषताएं
भाखड़ा नांगल परियोजनासतलुज - व्यासपंजाब, हरियाणा, राजस्थान; जल विद्युत और सिंचाई का विशाल केंद्र।
हीराकुंड परियोजनामहानदीओडिशा; विश्व का सबसे लंबा मिट्टी का बांध; बाढ़ नियंत्रण और जल संचयन।
सरदार सरोवर बांधनर्मदा नदीगुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र; गुजरात के सूखाग्रस्त इलाकों हेतु वरदान।
टिहरी बांध परियोजनाभागीरथी नदीउत्तराखंड; भारत का सबसे ऊंचा बांध; विशाल जल विद्युत क्षमता।
नागार्जुन सागर बांधकृष्णा नदीआंध्र प्रदेश और तेलंगाना; दक्षिण भारत की विशाल सिंचाई परियोजना।
राणा प्रताप सागर बांधचंबल नदीराजस्थान; चंबल घाटी परियोजना का अभिन्न अंग।

2.3 बड़े बांधों के विपक्ष में तर्क और जन आंदोलन

हाल के वर्षों में बड़े बांधों के पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक दुष्प्रभावों के कारण इनके विरुद्ध गंभीर सवाल खड़े हुए हैं:

बांधों के प्रमुख नुकसान व आपत्तियां:
1. नदियों का प्राकृतिक प्रवाह अवरुद्ध होना: बांध बनाने से नदी का प्राकृतिक प्रवाह रुक जाता है जिससे तलछट (गाद) जलाशयों के तल में जमा होने लगती है। नदी का तल अधिक पथरीला हो जाता है और जलीय जीवों का भोजन व प्रजनन चक्र नष्ट हो जाता है।
2. विशाल वनों और उपजाऊ भूमि का जलमग्न होना: विशाल जलाशयों के निर्माण से लाखों हेक्टेयर मूल्यवान वन और कृषि भूमि जलमग्न होकर सड़ जाती है।
3. स्थानीय समुदायों का विस्थापन: लाखों गरीब किसानों और आदिवासियों को अपनी पुश्तैनी जमीन, आजीविका और सांस्कृतिक परिवेश छोड़कर बेघर होना पड़ता है। उन्हें पुनर्वास का उचित लाभ कभी नहीं मिलता।
4. सामाजिक विवाद: पानी के बंटवारे को लेकर राज्यों के बीच अंतर्-राज्यीय जल विवाद उत्पन्न होते हैं (जैसे कावेरी जल विवाद, कृष्णा जल विवाद)।
5. बाढ़ का कारण बनना व भूकंपीय खतरा: विडंबना यह है कि जो बांध बाढ़ नियंत्रण के लिए बनाए गए थे, अत्यधिक वर्षा के समय उन्हीं बांधों से अचानक भारी पानी छोड़े जाने पर विनाशकारी बाढ़ आई (जैसे 2006 में गुजरात और महाराष्ट्र की बाढ़)। बड़े बांधों से भूकंप का खतरा भी बढ़ जाता है।

नर्मदा बचाओ आंदोलन (NBA): मेधा पाटकर के नेतृत्व में एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) जिसने सरदार सरोवर बांध के कारण विस्थापित होने वाले आदिवासियों, किसानों और पर्यावरणविदों को लामबंद किया और मानवीय पुनर्वास की मांग उठाई।

3. वर्षा जल संचयन: पारंपरिक प्रणालियाँ एवं आधुनिक तकनीकें

3.1 वर्षा जल संचयन का महत्व एवं प्राचीन इतिहास

बांधों के सामाजिक-आर्थिक विवादों को देखते हुए वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) जल संकट का एक पारिस्थितिक रूप से अनुकूल और आर्थिक रूप से किफायती समाधान है।

  • प्राचीन भारत में जल संचयन:
    • ईसा पूर्व पहली सदी में इलाहाबाद (प्रयागराज) के पास श्रंगवेरपुरा में गंगा नदी के बाढ़ के जल को संचित करने के लिए एक उत्कृष्ट जल-संचयन तंत्र बनाया गया था।
    • चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में बड़े पैमाने पर बांधों, झीलों और सिंचाई तंत्रों का निर्माण किया गया था।
    • 11वीं सदी में निर्मित भोपाल झील तत्कालीन समय की सबसे बड़ी कृत्रिम झीलों में से एक थी।
    • 14वीं सदी में सुल्तान इल्तुतमिश ने दिल्ली में सीरी किले के क्षेत्र में जल आपूर्ति के लिए प्रसिद्ध हौज खास (Hauz Khas) जलाशय बनवाया था।

3.2 भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पारंपरिक जल संचयन प्रणालियाँ

क्षेत्र / राज्यपारंपरिक प्रणाली का नामकार्यप्रणाली एवं विशेषताएं
पश्चिमी हिमालय (पर्वतीय क्षेत्र)'गुल' अथवा 'कुल' (Guls or Kuls)पहाड़ी ढलानों पर नदी या झरने के पानी को खेतों तक ले जाने के लिए बनाई गई संकरी सिंचाई वाहिकाएं।
पश्चिमी राजस्थान (शुष्क क्षेत्र)'टांका' (Tanka)बीकानेर, फलोदी और बाड़मेर में हर घर में आंगन में बना पक्का भूमिगत कमरा जैसा गड्ढा (टैंक)। छत से पीवीसी पाइप द्वारा वर्षा जल इसमें उतारा जाता है। इस शुद्धतम प्राकृतिक जल को 'पार्लर पानी' कहा जाता है जो अगली गर्मियों तक पीने के काम आता है।
राजस्थान (कृषि क्षेत्र)'खादीन' एवं 'जोहड़'ढलवां भूमि पर मिट्टी की मेड़ बनाकर वर्षा जल को खेतों में रोका जाता है ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे और रबी की फसल उगाई जा सके। जैसलमेर में इसे 'खादीन' और अन्य इलाकों में 'जोहड़' कहते हैं।
मेघालय (पूर्वोत्तर)बांस ड्रिप सिंचाई प्रणाली (Bamboo Drip Irrigation)200 वर्ष पुरानी तकनीक; पहाड़ों के झरनों से पानी को बांस के विभिन्न व्यास वाले पाइपों के नेटवर्क द्वारा सैकड़ों मीटर दूर ले जाया जाता है और प्रति मिनट 20 से 80 बूंदें पौधे की जड़ पर टपकाई जाती हैं। (विशेषकर काली मिर्च व सुपारी हेतु)।
पश्चिम बंगाल (बाढ़ मैदान)बाढ़ जल वाहिकाएं (Inundation Channels)नदियों के बाढ़ के पानी को खेतों तक पहुंचाने के लिए वाहिकाएं बनाकर सिंचाई की जाती थी।

3.3 छत वर्षा जल संचयन (Rooftop Rainwater Harvesting) एवं तमिलनाडु मॉडल

छत वर्षा जल संचयन में घर की छत पर गिरने वाले बारिश के पानी को नालियों और पीवीसी पाइपों के सहारे भूमिगत गड्ढे, कुएं या टंकी में संचित किया जाता है। पानी को रेत और ईंटों के फिल्टर से छानकर सीधे भूजल पुनर्भरण (Recharge) हेतु कुओं में भेजा जाता है।

तमिलनाडु का अनुकरणीय कानून: तमिलनाडु भारत का पहला और एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ पूरे राज्य में हर घर के लिए छत पर वर्षा जल संचयन संरचना बनाना कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया गया है। ऐसा न करने वाले भवन स्वामियों के खिलाफ सख्त कानूनी दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

96.5% - 2.5%
पृथ्वी का 96.5% जल खारा (महासागर) और मात्र 2.5% जल अलवणीय (मीठा)।
70% व 30% अलवणीय
मीठे जल का 70% हिमानियों/बर्फ में जमा, 30% से कम भौम जल (भूजल)।
4% वैश्विक वर्षा
भारत को विश्व की कुल वृष्टि का लगभग 4% प्राप्त होता है।
133वां स्थान
प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता की दृष्टि से भारत का विश्व में स्थान।
22% जल विद्युत
भारत में कुल उत्पादित विद्युत का लगभग 22% भाग जल विद्युत से प्राप्त होता है।
आधुनिक भारत के मंदिर
पंडित नेहरू द्वारा बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं को दिया गया ऐतिहासिक नाम।
भाखड़ा नांगल
सतलुज-व्यास नदी पर निर्मित बहुउद्देशीय परियोजना (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान)।
हीराकुंड बांध
महानदी (ओडिशा) पर निर्मित विश्व का सबसे लंबा मिट्टी का बांध।
सरदार सरोवर बांध
नर्मदा नदी (गुजरात); नर्मदा बचाओ आंदोलन का केंद्र।
टांका व पार्लर पानी
राजस्थान में भूमिगत जल संचयन टैंक; इसमें एकत्र शुद्ध वर्षा जल को 'पार्लर पानी' कहते हैं।
बांस ड्रिप सिंचाई
मेघालय में 200 वर्ष पुरानी तकनीक; बांस पाइपों से झरनों का पानी बूंद-बूंद टपकाना।
तमिलनाडु कानून
भारत का पहला राज्य जहाँ हर घर में छत जल संचयन ढांचा बनाना कानूनी रूप से अनिवार्य है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
जल दुर्लभता (Water Scarcity) से क्या अभिप्राय है? इसके मुख्य कारणों की विवेचना कीजिए। क्या प्रचुर जल वाले क्षेत्र भी जल संकट का सामना कर सकते हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
जल दुर्लभता का अर्थ:
जल की मांग की तुलना में स्वच्छ और उपयोग योग्य जल की अपर्याप्तता को जल दुर्लभता कहते हैं। यह केवल पानी की भौतिक अनुपस्थिति ही नहीं, बल्कि जल के अत्यधिक उपभोग और प्रदूषण के कारण भी होती है。

जल दुर्लभता के मुख्य कारण:
1. अत्यधिक जनसंख्या और खाद्यान्न उत्पादन: बढ़ती जनसंख्या की भोजन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए शुष्क ऋतु में भी नकदी फसलें उगाई जा रही हैं, जिसके लिए नलकूपों द्वारा भूजल का अनियंत्रित दोहन किया जा रहा है।
2. तीव्र औद्योगिकीकरण और शहरीकरण: स्वतंत्रता के बाद विशाल उद्योगों की स्थापना हुई जो न केवल भारी मात्रा में जल का उपभोग करते हैं बल्कि उन्हें चलाने के लिए जल विद्युत की भी भारी आवश्यकता होती है।
3. जल का असमान वितरण: समाज के विभिन्न वर्गों में जल संसाधनों की पहुंच असमान है; अमीर कॉलोनियों में पानी बर्बाद होता है जबकि मलिन बस्तियों में एक-एक बूंद के लिए संघर्ष होता है。

प्रचुर जल वाले क्षेत्रों में संकट (गुणात्मक कमी):
हाँ, किसी क्षेत्र में जल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने के बावजूद जल संकट हो सकता है यदि वह जल प्रदूषित और अनुपयोगी हो जाए। हमारे शहरों और गांवों में घरेलू सीवेज, औद्योगिक जहरीले रासायनिक कचरे, और खेतों के रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों के मिलने से नदियां और भूजल इतने दूषित हो चुके हैं कि वे पीने योग्य नहीं रहे हैं।
उदाहरण 2
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं को 'आधुनिक भारत के मंदिर' क्यों कहा था? इन परियोजनाओं के किन्हीं चार प्रमुख लाभों का उल्लेख कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
'आधुनिक भारत के मंदिर' कहे जाने का कारण:
स्वतंत्रता के पश्चात पंडित जवाहरलाल नेहरू का दृढ़ विश्वास था कि विशाल बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएं भारत के आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने की सबसे सशक्त कुंजी हैं। उनका तर्क था कि ये परियोजनाएं कृषि के विकास, ग्रामीण अर्थव्यवस्था के उत्थान, तीव्र औद्योगिकीकरण और नगरीय विकास को एक साथ समन्वित रूप से आगे बढ़ाएंगी, जिससे देश आत्मनिर्भर और आधुनिक बनेगा। अतः उन्होंने इन परियोजनाओं को श्रद्धापूर्वक 'आधुनिक भारत के मंदिर' कहा था。

बहुउद्देशीय परियोजनाओं के चार प्रमुख लाभ:
1. सिंचाई का विस्तार: बांधों से विशाल नहर प्रणालियाँ निकालकर सूखाग्रस्त और वर्षा-विहीन क्षेत्रों में लाखों हेक्टेयर भूमि को सिंचित किया जाता है (जैसे भाखड़ा नांगल और इंदिरा गांधी नहर)।
2. जल विद्युत उत्पादन: बहते हुए जल की गतिज ऊर्जा से टर्बाइन चलाकर प्रदूषण-मुक्त जल विद्युत का उत्पादन किया जाता है (भारत की 22% बिजली इसी से बनती है)।
3. बाढ़ नियंत्रण: मानसून के दौरान नदियों के उफान और अतिरिक्त जल को विशाल जलाशयों में रोककर निचली घाटियों को विनाशकारी बाढ़ से बचाया जाता है (जैसे महानदी पर हीराकुंड बांध)।
4. मत्स्य पालन और अंतर्देशीय नौवहन: जलाशयों में बड़े पैमाने पर मछली पालन होता है और गहरी नहरों का उपयोग माल व यात्रियों के सस्ते परिवहन हेतु किया जाता है।
उदाहरण 3
हाल के दशकों में बड़े बांधों के निर्माण का कड़ा विरोध क्यों हो रहा है? 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' के संदर्भ में बांधों के प्रमुख दुष्प्रभावों की व्याख्या कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और स्थानीय समुदायों द्वारा बड़े बांधों के विरोध के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

1. प्राकृतिक प्रवाह और तलछट अवरोध: बांध बनाने से नदी का प्राकृतिक बहाव रुक जाता है जिससे उपजाऊ गाद (Sediment) नीचे बहने के बजाय जलाशय के तल में बैठ जाती है। इससे नदी का तल पथरीला हो जाता है और जलीय जीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो जाता है।
2. विशाल वनों और उपजाऊ भूमि का जलमग्न होना: विशाल जलाशयों के भरने से लाखों हेक्टेयर बहुमूल्य वन संपदा और उपजाऊ खेत पानी में डूबकर नष्ट हो जाते हैं।
3. जनजातियों और किसानों का विस्थापन: सरदार सरोवर जैसे बांधों से लाखों गरीब आदिवासी और किसान अपनी जन्मभूमि, आजीविका और सांस्कृतिक जड़ों से उखड़ गए। बांधों से होने वाले लाभ (बिजली और पानी) बड़े उद्योगपतियों और धनी किसानों को मिलते हैं, जबकि विस्थापितों को केवल विस्थापन और गरीबी झेलनी पड़ती है。

नर्मदा बचाओ आंदोलन (Narmada Bachao Andolan):
मेधा पाटकर के नेतृत्व में चले इस गैर-सरकारी जन-आंदोलन ने सरदार सरोवर बांध के कारण विस्थापित होने वाले 2.5 लाख से अधिक आदिवासियों और किसानों के मानवीय पुनर्वास और नर्मदा घाटी के पर्यावरण संरक्षण के लिए ऐतिहासिक संघर्ष किया और विश्व बैंक को इस परियोजना से अपना वित्तपोषण वापस लेने पर मजबूर किया।
उदाहरण 4
राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में 'छत वर्षा जल संचयन' और 'टांका' प्रणाली की कार्यप्रणाली का सचित्र विवरण दीजिए। 'पार्लर पानी' क्या है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
राजस्थान की 'टांका' प्रणाली:
राजस्थान के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों (विशेषकर बीकानेर, फलोदी और बाड़मेर) में पीने के पानी को संचित करने के लिए हर घर में एक भूमिगत टैंक बनाया जाता था जिसे 'टांका' (Tanka) कहते हैं:
1. आकार एवं संरचना: टांका घर के आंगन या कमरे के नीचे बनाया जाता है। इसका आकार एक बड़े कमरे जितना (उदा. 6.12 मीटर गहरा, 4.27 मीटर लंबा और 2.44 मीटर चौड़ा) हो सकता है। यह पक्का और ढक्कनदार होता है।
2. जल संचयन विधि: घरों की ढलवां छतों से पीवीसी पाइपों को जोड़कर पानी को भूमिगत टांके में उतारा जाता है। बारिश के पहले दौर के पानी से छत और पाइपों को साफ किया जाता है और उसे टांके में नहीं जाने दिया जाता; इसके बाद का सारा वर्षा जल टांके में इकट्ठा किया जाता है。

'पार्लर पानी' (Palar Pani):
राजस्थान में वर्षा जल को स्थानीय भाषा में 'पार्लर पानी' कहा जाता है। इसे प्राकृतिक जल का शुद्धतम रूप माना जाता है। टांकों में जमा यह पार्लर पानी अगली बारिश आने तक (पूरी गर्मियों में) पीने के लिए उपयोग किया जाता है। गर्मियों में जब अन्य सभी स्रोत सूख जाते हैं, तब यह जीवनदायिनी सिद्ध होता है। साथ ही, टांके के चारों ओर बने कमरों में रहने से भीषण गर्मी में भी ठंडक बनी रहती है।
उदाहरण 5
मेघालय की 200 वर्ष पुरानी 'बांस ड्रिप सिंचाई प्रणाली' और तमिलनाडु के छत वर्षा जल संचयन कानून की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
मेघालय की बांस ड्रिप सिंचाई प्रणाली (Bamboo Drip Irrigation):
मेघालय के चेरापूंजी और अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में सदियों से बांस की नलियों द्वारा झरनों के पानी को खेतों तक पहुंचाने की अनूठी प्रणाली प्रचलित है:
1. पहाड़ों के ऊपरी भाग में बहने वाले प्राकृतिक झरनों के पानी को बांस के विभिन्न व्यास वाले पाइपों के नेटवर्क द्वारा मोड़ा जाता है।
2. बांस के पाइपों को खूंटों के सहारे जमीन से ऊपर उठाकर सैकड़ों मीटर की दूरी तक ले जाया जाता है।
3. अंतिम छोर पर पानी का प्रवाह नियंत्रित करके प्रति मिनट 20 से 80 बूंदें पौधे की जड़ पर सीधे टपकाई जाती हैं। यह प्रणाली विशेष रूप से पान और काली मिर्च की खेती के लिए वरदान है और इसमें पानी की एक भी बूंद व्यर्थ नहीं होती。

तमिलनाडु का कानूनी मॉडल:
तमिलनाडु भारत का पहला और एकमात्र राज्य है जिसने जल संरक्षण को अनिवार्य बनाने के लिए ऐतिहासिक कदम उठाया है:
1. राज्य के प्रत्येक घर और इमारत में छत पर गिरने वाले वर्षा जल को भूमिगत गड्ढों या कुओं में उतारने वाली संरचना (Rooftop Rainwater Harvesting Structure) बनाना कानूनी रूप से बाध्यकारी है।
2. कानून का उल्लंघन करने वाले भवन स्वामियों के खिलाफ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जाती है। इस कदम ने चेन्नई और पूरे तमिलनाडु में तेजी से गिरते भूजल स्तर को पुनः ऊपर उठाने में चमत्कारी सफलता हासिल की है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि पृथ्वी पर मौजूद 70% जल मीठा (अलवणीय) जल है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पृथ्वी का 96.5% जल खारा महासागरीय जल है और केवल 2.5% जल ही मीठा है। इस 2.5% मीठे जल का लगभग 70% भाग बर्फ/ग्लेशियरों के रूप में जमा है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भाखड़ा नांगल बांध को गंगा नदी पर स्थित लिख देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

भाखड़ा नांगल बांध सतलुज नदी (सतलुज-व्यास बेसिन) पर स्थित है। टिहरी बांध भागीरथी नदी पर स्थित है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

हीराकुंड बांध को विश्व का सबसे ऊंचा बांध समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

हीराकुंड (ओडिशा, महानदी) विश्व का सबसे 'लंबा' मिट्टी का बांध (लगभग 25.8 किमी) है। भारत का सबसे 'ऊंचा' बांध टिहरी बांध (उत्तराखंड) है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

पार्लर पानी को नल का या भूजल का पानी समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पार्लर पानी राजस्थान में छत से सीधे टांकों में संचित किए गए शुद्ध प्राकृतिक वर्षा जल को कहा जाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि बड़े बांधों से बाढ़ की समस्या हमेशा के लिए समाप्त हो गई है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

बांधों में गाद जमने से उनकी जलधारण क्षमता घट गई है; मानसून में अत्यधिक वर्षा होने पर जब बांधों से अचानक भारी पानी छोड़ा जाता है, तो वे स्वयं विनाशकारी बाढ़ का कारण बन जाते हैं।

भारत में जल संसाधन प्रबंधन: बहुउद्देशीय बांध एवं पारंपरिक वर्षा जल संचयन

जल संसाधन: बहुउद्देशीय परियोजनाएं एवं भारत की जल संचयन प्रणालियां1. वैश्विक व भारतीय परिदृश्यजल की मात्रा व संकट• 96.5% खारा जल (महासागर)• मात्र 2.5% अलवणीय (मीठा) जल• 70% हिमानियों में, <30% भौम जल• भारत: 4% वैश्विक वर्षाप्रति व्यक्ति उपलब्धता: 133वां स्थान• 22% विद्युत जल ऊर्जा से• जल दुर्लभता के कारण:अति-दोहन, उद्योग व प्रदूषण2. बहुउद्देशीय परियोजनाएंआधुनिक भारत के मंदिर• नेहरू जी का विजन:कृषि + उद्योग का समन्वित विकास• भाखड़ा नांगल: सतलुज नदी• हीराकुंड: महानदी (बाढ़ नियंत्रण)• सरदार सरोवर: नर्मदा नदी• विपक्ष में जन-आंदोलन:नर्मदा बचाओ (मेधा पाटकर), टिहरी;विस्थापन, गाद व वन जलमग्न3. वर्षा जल संचयनपारंपरिक व टिकाऊ प्रणालियाँ• राजस्थान: टांका व पार्लर पानीआंगन में टैंक; शुद्धतम पेयजल• खादीन (जैसलमेर) व जोहड़• पश्चिमी हिमालय: गुल व कुल• मेघालय: बांस ड्रिप सिंचाईबांस पाइपों से 20-80 बूंद/मिनट• तमिलनाडु कानून:हर घर में छत जल संचयन अनिवार्यबोर्ड परीक्षा के प्रमुख संप्रत्यय (Golden Water Management Capsule)पार्लर पानी (Palar Pani):राजस्थान के टांकों में एकत्र प्राकृतिक वर्षा जल; शुद्धतम पीने योग्य जल।सरदार सरोवर व NBA:नर्मदा नदी पर बांध; मेधा पाटकर के नेतृत्व में विस्थापितों हेतु जनांदोलन।तमिलनाडु मॉडल:देश का पहला राज्य जहाँ हर घर में रूफटॉप वर्षा जल संचयन कानूनी रूप से अनिवार्य।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
पृथ्वी का 96.5% जल खारा है और मात्र 2.5% जल ही मीठा (अलवणीय) है, जिसका 70% बर्फ/हिमानियों में और 30% से कम भौम जल के रूप में है।
मुख्य बिंदु 2
भारत को वैश्विक वर्षा का 4% हिस्सा मिलता है, परंतु प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में भारत 133वें स्थान पर है।
मुख्य बिंदु 3
जल दुर्लभता के दो मुख्य आयाम हैं: मात्रात्मक कमी (जनसंख्या, सिंचाई व उद्योग) और गुणात्मक ह्रास (सीवेज, रसायनों व कचरे से प्रदूषण)।
मुख्य बिंदु 4
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं को 'आधुनिक भारत के मंदिर' कहा था क्योंकि वे कृषि और उद्योग का समन्वित विकास करती हैं।
मुख्य बिंदु 5
भारत में कुल उत्पादित विद्युत ऊर्जा का लगभग 22% भाग जल विद्युत से प्राप्त होता है।
मुख्य बिंदु 6
बड़े बांधों से जलीय जीवों का विस्थापन, तलछट का जमाव, वनों का जलमग्न होना और लाखों आदिवासियों-किसानों का विस्थापन जैसे गंभीर खतरे पैदा हुए।
मुख्य बिंदु 7
मेधा पाटकर के नेतृत्व में 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' ने सरदार सरोवर बांध के कारण विस्थापित लोगों के मानवाधिकारों और पर्यावरण की रक्षा की।
मुख्य बिंदु 8
पश्चिमी राजस्थान में हर घर में बने भूमिगत 'टांकों' में संचित शुद्ध वर्षा जल को 'पार्लर पानी' कहा जाता है; जैसलमेर में 'खादीन' और अन्यत्र 'जोहड़' प्रसिद्ध हैं।
मुख्य बिंदु 9
मेघालय में 200 वर्ष पुरानी 'बांस ड्रिप सिंचाई प्रणाली' द्वारा झरनों के पानी को बांस पाइपों से पौधों की जड़ों पर 20-80 बूंद/मिनट टपकाया जाता है।
मुख्य बिंदु 10
तमिलनाडु भारत का पहला राज्य है जहाँ हर घर में छत पर वर्षा जल संचयन ढांचा बनाना कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया गया है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
पृथ्वी पर अलवणीय (मीठे) जल का कितना प्रतिशत हिस्सा मानव उपयोग के लिए भौम जल (Groundwater) के रूप में उपलब्ध है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पृथ्वी पर कुल अलवणीय जल केवल 2.5% है, और इस अलवणीय जल का 30% से भी कम हिस्सा भूमिगत भौम जल के रूप में उपलब्ध है (लगभग 70% हिमानियों और ध्रुवीय बर्फ में जमा है)।
2
पंडित नेहरू ने बांधों को 'आधुनिक भारत के मंदिर' क्यों कहा था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि उनका मानना था कि बहुउद्देशीय नदी परियोजनाएं सिंचाई, बिजली, बाढ़ नियंत्रण और उद्योगों को एक साथ बढ़ावा देकर कृषि और औद्योगिक अर्थव्यवस्था का समन्वित विकास करेंगी।
3
'पार्लर पानी' किसे कहते हैं और इसे राजस्थान में किस प्रकार संचित किया जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: राजस्थान में छत से सीधे भूमिगत 'टांकों' (Tanka) में संचित किए गए शुद्ध प्राकृतिक वर्षा जल को 'पार्लर पानी' कहते हैं। इसे शुष्क महीनों में मुख्य पेयजल के रूप में उपयोग किया जाता है।
4
मेघालय की 'बांस ड्रिप सिंचाई प्रणाली' की क्या विशेषता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: यह 200 वर्ष पुरानी स्थानीय तकनीक है जिसमें पहाड़ों के झरनों के पानी को बांस के विभिन्न आकारों के पाइपों द्वारा दूर खेतों तक ले जाकर प्रति मिनट 20 से 80 बूंदें पौधों की जड़ों पर सीधे टपकाई जाती हैं।
5
तमिलनाडु में वर्षा जल संचयन के संदर्भ में क्या ऐतिहासिक कानूनी व्यवस्था की गई है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: तमिलनाडु भारत का पहला ऐसा राज्य है जहाँ राज्य के सभी घरों में छत वर्षा जल संचयन संरचना (Rooftop Rainwater Harvesting) बनाना कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया गया है और उल्लंघन करने वालों पर दंडात्मक कार्रवाई होती है।
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अध्याय 1: यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय अध्याय 2: भारत में राष्ट्रवाद अध्याय 3: भूमंडलीकृत विश्व का बनना अध्याय 4: औद्योगिकीकरण का युग अध्याय 5: मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया अध्याय 6: संसाधन एवं विकास अध्याय 7: वन एवं वन्यजीव संसाधन अध्याय 8: जल संसाधन अध्याय 9: कृषि अध्याय 10: खनिज तथा ऊर्जा संसाधन अध्याय 11: विनिर्माण उद्योग अध्याय 12: राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की जीवन रेखाएँ अध्याय 13: सत्ता की साझेदारी (Power-sharing) अध्याय 14: संघवाद (Federalism) अध्याय 15: लिंग, धर्म और जाति अध्याय 16: राजनीतिक दल (Political Parties) अध्याय 17: लोकतंत्र के परिणाम अध्याय 18: विकास (Development) अध्याय 19: भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक अध्याय 20: मुद्रा और साख अध्याय 21: वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था अध्याय 22: उपभोक्ता अधिकार

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